कानूनी प्रक्रिया में बाधक अनुबंध

कानूनी प्रक्रिया में बाधक अनुबंधों को शून्य माना जाना किसी भी ऐसे राज्य की पहली शर्त होनी चाहिए जिस का शासन कानून के आधार पर चलता है। भारत एक ऐसा ही राज्य है। इस कारण से कल प्रस्तुत कंट्रेक्ट एक्ट की धारा-28 का महत्व बढ़ जाता है। सिद्धान्त यह है कि कोई भी व्यक्ति कंट्रेक्ट कर के खुद को न्यायालयों द्वारा प्रदत्त सुरक्षा से वंचित नहीं कर सकता। (प्रिविकौंसिल-1917) ऐसा अनुबंध जिस के द्वारा कर्मचारी अपनी गलत सेवा-च्युति को चुनौती देने के अधिकार से वंचित कर दे अवैध है।
क्षेत्राधिकार को सीमित करने वाले अनुबंध-
यह कानून का स्थापित सिद्धान्त है कि कोई भी व्यक्ति एक निजि अनुबंध के द्वारा किसी अदालत को क्षेत्राधिकार प्रदान नहीं कर सकते, इसी तरह वे सामान्य कानून के द्वारा किसी अदालत को प्राप्त क्षेत्राधिकार को समाप्त कर सकते हैं। जैसे इस तरह का कोई भी अनुबंध कि कोई भी विवाद होने पर कोई भी, या कोई एक पक्षकार अदालत में दावा नहीं कर सकेगा एक शून्य होगा।
लेकिन जहां किसी  दावे के लिए दावे का कारण एक से अधिक अदालतों के क्षेत्राधिकार में उत्पन्न  होने की संभावना हो तथा एक से अधिक अदालतों में दावे किए जा सकते हों वहाँ पक्षकार इस तरह का अनुबंध कर सकते हैं कि किसी एक विशेष अदालत को ही क्षेत्राधिकार होगा। क्यों कि इस से दावा करने का अधिकार समाप्त नहीं होता। इस तरह की शर्त होने से कि विवाद होने की दशा में केवल स्थान विशेष की अदालत को ही सुनने का क्षेत्राधिकार होगा, अनुबंध शून्य नहीं हो जाता है। लेकिन इस तरह का अनुबंध मूल कंट्रेक्ट में ही होना चाहिए। एक कंट्रेक्ट के तहत माल सप्लाई करने पर मूल कंट्रेक्ट में इस तरह की शर्त न होने, तथा माल के बिल में इस तरह की शर्त दर्ज होने मात्र से उसे किसी एक अदालत मे दावा करने का कंट्रेक्ट नहीं माना जा सकता।
एक अदालत का क्षेत्राधिकार समाप्त करने और एक अदालत को सम्पूर्ण क्षेत्राधिकार प्रदान करने वाली शर्ते बहुत साफ और आसानी से समझने वाली भाषा में होना चाहिए। किसी भी प्रकार का असमंजस उत्पन्न करने वाली शर्त भी शून्य होगी। ऐसा भी कोई अनुबंध शून्य होगा जिस में कहा गया हो कि किसी एक ही अदालत को क्षेत्राधिकार होगा। भले ही दावा करने का कारण किसी दूसरी अदालत के क्षेत्र में उत्पन्न हुआ हो। यह कानून भारत के बारे में है, इस कारण से ऐसा अनुबंध जिस में यह कहा गया हो कि दावा भारत में नहीं बल्कि केवल भारत के बाहर किसी देश की अदालत में ही किया जा सकेगा भी शून्य होगा।  
मियाद को सीमित किये जाने वाले अनुबंध-
किसी प्रकार का दावा करने की मियाद तीन वर्ष हो और यह अनुबंध कर लिया जाए कि विवाद उत्पन्न होने पर एक वर्ष के उपरांत कोई दावा नहीं किया जा सकेगा एक शून्य अनुबंध है। किसी बीमा पॉलिसी में यह शर्त कि एक वर्ष के बाद कोई भी दावा स्वीकार नहीं किया जाएगा अवैध शर्त है।
किसी फायर इंश्योरेंस पॉलिसी में यह शर्त कि घटना के एक वर्ष बाद कोई भी दावा स्वीकार नहीं किया जा सकेगा एक शून्य अनुबंध है और इस से कोर्ट में कानून द्वारा निर्धारित समय सीमा में दावा करने का अधिकार सीमित नहीं होगा।
अधिकारों को समाप्त  करने वाले अनुबंध-
इस तरह के अनुबंधों में दावा करने का अधिकार पूरी तरह समाप्त होता हो तो ही अनुबंध शून्य होगा। जैसे किसी माल या संपत्ति को हस्तांतरण में प्राप्त करने वाले व्यक्ति के उस हस्तांतरण के अंतर्गत दावों को करने से प्रतिबंधित करने वाले अनुबंध शून्य होंगे।
अपवाद-
इस कानून के अपवादों के अनुसार इस तरह का अनुबंध कि पक्षकारों के बीच कोई भी विवाद होने पर उसे मध्यस्थ को निर्देशित किया जाएगा और उस का निर्णय  मान्य होगा एक शून्य अनुबंध नहीं होगा। लेकिन मध्यस्थ के निर्णय को अदालत  के समक्ष चुनौती दी जा सकेगी। 
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3 टिप्पणियाँ

  1. Comment by Shastri:

    इस विषय को इतनी सरल भाषा में समझाने के लिये आभार !!

  2. Comment by अभिषेक ओझा:

    “शर्ते बहुत साफ और आसानी से समझने वाली भाषा में होना चाहिए। किसी भी प्रकार का असमंजस उत्पन्न करने वाली शर्त भी शून्य होगी। “

    ‘आसानी से समझने वाली भाषा’, ‘असमंजस उत्पन्न करने वाली शर्त’ कुछ अपरिभाषित से शब्द लगे. जो किसी के को आसानी से समझ में आए किसी के लिया कलिष्ट होना स्वाभाविक है. पर फिर शायद यही सही ग़लत करना तो वकालत है.

  3. Comment by Udan Tashtari:

    आभार इस बेहतरीन जानकारी का…ज्ञानवर्धन हुआ!!

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