कानून, नियम और उन के अंतर्गत जारी अधिसूचनाएँ अंतर्जाल पर उपबल्ध क्यों नहीं ?

पिछले दिनों ‘तीसरा खंबा’ से पटना, बिहार के महेश कुमार वर्मा ने पूछा कि  “प्रा. कं., लि. कं., प्रा. लि. कं. इत्यादि कंपनी में क्या अंतर है?  यह भी बताएं कि ये सब कंपनी किस स्थिति में अपने कामगार को पी.एफ. की सुविधा देने के लिए बाध्य है तथा यदि कंपनी द्वारा पी. एफ. की सुविधा नहीं दी जाती है तो क्या करनी चाहिए?  यह भी बताएं कि पी.एफ. के अलावा अन्य कौन सी सुविधा देने के लिए कंपनी बाध्य है?”

हेश जो जानना चाहते हैं वह भारत का कोई भी नागरिक जानना चाह सकता है और यह जानकारी सहज ही प्राप्त होना प्रत्येक भारतीय नागरिक का कानूनी अधिकार होना चाहिए।  आखिर देश के प्रत्येक नागरिक को यहाँ के कानून जानने का अधिकार है और यह देश की सरकारों का कर्तव्य होना चाहिए कि वे नागरिकों के इस महत्वपूर्ण अधिकार की पूर्ति के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध कराएँ।  लेकिन देश के कानून, नियम और राजकीय अधिसूचनाएँ आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।  उन की प्रकाशित प्रतियों को बाजार का माल बना दिया गया है।  जिस का अर्थ यह है कि यदि कोई नागरिक इन्हें जानना चाहता है तो उसे बाजार जा कर इन्हें खरीदना पड़ेगा।

ज अंतर्जाल तक प्रत्येक नागरिक की पहुँच सब से आसान चीज है।  जो जानकारी अंतर्जाल पर उपलब्ध है उस तक पहुँचना आम नागरिक के लिए दुरूह और अधिक व्ययसाध्य नहीं है।  यूँ तो भारत सरकार का यह कर्तव्य होना चाहिए कि संसद द्वारा पारित सभी कानूनों और नियमों को अंग्रेजी और हिन्दी के अतिरिक्त सभी भारतीय भाषाओं में अंतर्जाल पर उपलब्ध कराए।  क्यों कि किसी भी कानून की पालना तभी संभव हो सकती है जब कि उस का नागरिकों को ज्ञान हो, या कम से कम जब भी वह इन के बारे में जानना चाहे उसे अपनी भाषा में आसानी से उपलब्ध हो।  इसी तरह सभी प्रदेशों को भी प्रादेशिक कानूनों और नियमों को अपने प्रदेशों की भाषाओं में उपलब्ध कराना चाहिए।  पर न तो केन्द्र सरकार ही इसे अपना कर्तव्य और दायित्व    मानती है और न ही राज्य सरकारें।  संसद और विधानसभाएँ कानून पारित करती हैं और सरकारी गजट में प्रकाशित कर छोड़ देती हैं।  गजट की प्रतियाँ सीमित होती हैं उतनी ही जितनी कि राजकीय विभागों के लिए आवश्यक हों।  इसी से वे लगभग अप्राप्य होते हैं।

किसी भी कानून को अंतर्जाल पर उपलब्ध कराना सरकारों के लिए कोई बड़ा व्यय साध्य काम नहीं है।  गजट में प्रकाशन के लिए आज कल सब से पहले कंप्यूटरों पर कानूनों और नियमों की सोफ्टकॉपी तैयार होती है।  सभी सरकारों के पास एनआईसी की अंतर्जाल व्यवस्था उपलब्ध है, उन के अपने सर्वर हैं और देश भर में फैला पूरा तामझाम है। सरकारों को करना सिर्फ इतना है कि राजकीय मुद्रणालय गजट प्रकाशन के लिए जो सोफ्टकॉपी तैयार करें उसे एनआईसी को उपलब्ध कराएँ और एनआईसी उसे तुरंत अन्तर्जाल पर उपलब्ध करा दे।  होना तो यह चाहिए कि प्रत्येक सरकार का राजकीय गजट मुद्रित रूप के साथ साथ अंतर्जाल पर भी प्रकाशित हो।

अंग्रेजी में तो यह काम आसानी से हो सकता है।  हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं की समस्या यह है कि राजकीय मुद्रणालय गजट की सोफ्टप्रति जिन फोण्टों में तैयार करते हैं वे यूनिकोड के नहीं हैं और उन्हें सीधे सीधे अंतर्जाल पर डालना संभव नहीं है।  इस के लिए सब से पहले तो एक ऐसे प्रशासनिक निर्णय की जरूरत है जिस से हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं का कंप्यूटरों पर होने वाला सारा सरकारी कामकाज केवल यूनिकोड फोण्टों में होने लगे।  यदि हमें देश के तमाम कामकाज को कंप्म्प्यूटरों पर लाना है तो यह एक न एक दिन करना ही पड़ेगा तो फिर अविलम्ब क्यों न किया जाए?

ब तक सारा काम यूनिकोड़ फोण्टों में न होने लगे तब तक एनआईसी यह कर सकती है कि जिन फोण्टों में काम होता है उन से टेक्स्ट को यूनिकोड फोण्टों में परिवर्तित करने के लिए फोण्ट परिवर्तक तैयार कर ले और राजकीय मुद्रणालयों से सोफ्टकॉपी मिलने पर उस का फोण्ट परिवर्तित कर अंतर्जाल पर उन्हें प्रकाशित कर दे।  यह व्यवस्था बिना किसी विशेष खर्च के उपलब्ध साधनों के आधार पर सरकारें लागू कर सकती हैं।  देरी केवल सरकारों की इच्छा की कमी और निर्णय लेने अक्षमता में छुपी है। शायद हमारी सरकारें ही नहीं चाहतीं कि देश के नागरिकों को देश का कानून जानना चाहिए। शायद वे हमेशा इस बात से आतंकित रहती हैं कि यदि देश के कानून तक आम लोगों की पहुँच होने लगी तो वे अपना अंधाराज कैसे चला सकेंगे?

 

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24 टिप्पणियाँ

  1. Comment by Yash:

    महेश कुमार वर्मा: आप कम्पनी एक्ट पढ़ो आपको सब पता चल जायेगा

  2. Comment by मनीराम शर्मा:

    आप पी एफ के मुख्य आयुक्त नई दिल्ली से संपर्क कर सकते हैं | वैसे पी एफ विभाग की वेबसाइट भी है| पटना कार्यालय का पता इस प्रकार है|

    Bhavishyanidhi Bhawan, R-Block, Road No. 06,
    Patna – 800 001
    E-mail: ro.patna@epfindia.gov.इन
    R.P.F.C (I)
    Shri Chandramauli Chakraborty
    0612
    2227139
    2506632
    मनीराम शर्मा का पिछला आलेख है:–.न्यायपालिका पर नए सवालMy Profile

  3. Comment by महेश कुमार वर्मा:

    आपने ऊपर पटना के पी. एफ. दफ्तर जाकर पी. एफ. के बारे में पता लगाने के लिए लिखा है. पर या दफ्तर है कहाँ यह कैसे पता चलेगा? इस तरह की समस्या के बारे में मैं पहले भी इसी पोस्ट के कमेंट में लिखा कि हरेक तरह का कार्य की जानकारी या शिकायत का अलग-अलग ऑफिस है. लोगों को सही जानकारी नहीं रहती है कि वह किस विभाग की जानकारी कहाँ से ले व शिकायत कहाँ करे. सभी जानकारी लेने व शिकायत करने के लिए एक ऑफिस रहना चाहिए. लोग वहाँ जाए फिर वह शिकायत को संबंधित ऑफिस को भेजकर शिकायत पर कार्रवाई करनी चाहिए.

  4. Comment by दिनेशराय द्विवेदी:

    @ महेश कुमार वर्मा
    आप एक लाइन का प्रश्न पूछते हैं। समस्या कुछ और होती है। आप ने पूछा कि कंपनियाँ कितनी प्रकार की होती हैं। इस प्रश्न का आप की इस समस्या से क्या लेना देना था? एक मजदूर के लिए उस का नियोजक नियोजक होता है। वह चाहे कंपनी हो या कोई पार्टनरशिप फर्म हो या फिर कोई व्यक्तिगत स्वामित्व का व्यवसाय/उद्योग हो। आप को अपनी समस्या को मूल रूप में ही रखना चाहिए। अभी भी आपने बहुत सी बातें सूत्र रूप में लिख दी हैं। लेकिन मूल रूप से कुछ नहीं बताया है।
    हमारे यहाँ श्रम कानून बहुत हैं लेकिन सरकार की उन्हें लागू कराने में कोई रुचि नहीं है। श्रम कानून सिर्फ वहाँ लागू हो पाते हैं जहाँ मजदूर संगठित हैं। जहाँ मजदूर संगठित नहीं हैं वहाँ कानून लागू नहीं होते। कोई कामगार शिकायत करता है तो उस की शिकायत ठीक से नहीं सुनी जाती और कहा जाता है मुकदमा कर दो। मुकदमा बरसों बरस चलता रहता है। मजदूर लड़ लड़ कर थक जाता है और घर बैठता है। किसी भी मजदूर को उस का वेतन महिना पूरा होने के सात या दस दिनों के भीतर मिल जाना चाहिए। लेकिन कोई शिकायत नहीं करता। करता है तो सुनी नहीं जाती। होना तो ये चाहिए कि जो मालिक सात/दस दिनों में मजदूरी अदा नहीं करे उसे जेल में डाल देने का प्रावधान होना चाहिए और उसे तभी छोड़ा जाए जब वह मजदूरों का बकाया वेतन ब्याज और दंड अदा कर दे। लेकिन यह तभी हो सकता है जब कि मजदूर संगठित हों उन की संगठित शक्ति राज्य शासन पर कब्जा कर ले। लेकिन मजदूर संगठित होने लगता है तो उन्हें जाति, धर्म, क्षेत्रीयता आदि के आधार पर बाँटा जाता है।
    संसद और विधानसभाएँ मजदूरों के पक्ष में दिखाने के लिए कानून बनाती हैं लेकिन उन्हें लागू करने का प्रबंध नहीं करतीं। क्यों कि वर्तमान शासन चाहे उसे जनतंत्र कहा जाता हो लेकिन वह पूंजीपतियों की तानाशाही है। १९७० से १९८५ के मध्य मजदूर आंदोलन जोरों पर था तो श्रमिकों से संबंधित कानून ६५०-७० प्रतिशत लागू होते थे। अब वह संगठित शक्ति नहीं है तो १० प्रतिशत भी लागू नहीं हैं।
    महेश जी, आप के हर माह का वेतन अगले माह की ७ तारीख को मिलना चाहिए। पर मजदूर उस की शिकायत नहीं करता। वह शिकायत करे तो श्रम विभाग की जिम्मेदारी है कि तुरंत उद्योग का चालान बनाए और मजदूरों का वेतन दिलाए वेतन दिलाने के लिए कार्यवाही करे। लेकिन वह कुछ नहीं करता। खुद मजदूर को मुकदमा चलाने को कहता है। ३-४ हजार रुपए के वेतन के लिए कोई भी मजदूर वकील की कितनी फीस दे सकता है अधिक से अधिक ३-४ सौ रुपए। इस फीस में कोई भी वकील काम करने को तैयार नहीं हो सकता। इस के लिए आवश्यक है कि मजदूर संगठन बनाएँ। हर सदस्य हर माह चंदा दे। यूनियन के फंड से कार्यवाहियाँ की जाएँ। मजदूर वर्ग संगठित हुए बिना अपनी छोटी से छोटी लड़ाई भी नहीं लड़ सकता। मालिकों ने ज्यादातर मजदूरों के बीच यह भ्रम फैला रखा है कि वे यूनियन बनाएंगे या बनी हुई यूनियन में शामिल होंगे तो मालिक नौकरी से निकाल देगा। वे संगठित होने से जी चुराते हैं और इसी तरह से लगातार असंगठित बने रहते हैं। आप को तो जीवन भर नौकरियाँ ही करनी हैं। ये झगड़े हर नौकरी में खड़े होते रहेंगे। आप को चाहिए कि आप किसी स्थानीय श्रम संगठन से जुड़ें उस की सदस्यता ग्रहण करें। फिर वह संगठन आप के नियोजन से संबंधित झगड़ों को देखने लगेगा। आप जिज्ञासु हैं। यदि आप श्रमिकों के अधिकारों की लड़ाई सीख लेते हैं तो आप केवल अपने लिए ही नहीं अन्य श्रमिकों के लिए भी काम कर सकते हैं।
    आप ने कंपनी कानून और पीएफ से संबंधित सवाल पूछे थे। कंपनी कानून आप को जानने की कोई आवश्यकता नहीं है। वह अत्यन्त जटिल है उस की बारीकियाँ यहाँ इस साइट पर समझा पाना संभव नहीं है। पीएफ के संबंध में भी जब तक आप के संस्थान के बारे में पूरी जानकारी नहीं होती तब तक पता नहीं लग सकता कि उस पर पीएफ लागू होता है या नहीं। आप इस मामले में पटना के पीएफ के दफ्तर जा कर पता कर सकते हैं कि आप जिस संस्थान में काम करते हैं वहाँ पीएफ कानून लागू होता है या नहीं। वहाँ आप को संस्थान का नाम, पता, वहाँ होने वाला काम, कर्मचारियों की संख्या आदि बतानी होगी तब पता लगेगा कि आप के संस्थान पर पीएफ की योजना लागू होगी या नहीं।
    दिनेशराय द्विवेदी का पिछला आलेख है:–.बेनामी संपत्ति पर उसी का अधिकार है जिस के नाम वह खरीदी गई हैMy Profile

    • Comment by bharat:

      जब सवाल का जवाब नहीं पता तो लोगों को उल्लू क्यों बना रहे हो भाई…सवाल सिंपल है सिंपल जवाब दो ना…महेश जी का सवाल सही है..लेकिन तुम्हे कुछ आता जाता नहीं है…बंद कर अपना वेबसाइट..लगता है तुम भी अपने कर्मचारियों को पीएफ नहीं देते हो…भाई महेश इस गदहे के चक्कर में मत पड़..किसी वकील से मिल ले…जानकार वकील से…वहीं सही सलाह मिलेगा तुम्हे.

  5. Comment by महेश कुमार वर्मा:

    खेमराज जी के बातों से मैं सहमत हूँ. कानून की पढ़ाई को विद्यार्थी के पढाई में अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए.
    –महेश

  6. Comment by महेश कुमार वर्मा:

    खेमराज जी के बातों से मैं सहमत हूँ. कानून की पढ़ाई को विद्यार्थी के पढाई में अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए.

    –महेश
    महेश कुमार वर्मा का पिछला आलेख है:–.मेरा कष्ट बढ़ाकर क्यों होते हो आनंदMy Profile

  7. Comment by Khemraj:

    कानून की जानकारी को अगर लोगों तक पहुँचाना ही हैं तो इन्टरनेट के साथ-साथ उन्हें माध्यमिक विद्यालय के पाठ्यक्रम में भी स्थान मिलना चाहिए I

  8. Comment by Khemraj:

    सर कानून की जानकारी को अगर लोगों तक पहुँचाना ही हैं तो इन्टरनेट के साथ-साथ उन्हें माध्यमिक विद्यालय के पाठ्यक्रम में भी स्थान मिलना चाहिए I

  9. Comment by दिनेशराय द्विवेदी:

    @ रमेश कुमार जैन
    महेश जी के प्रश्न का एक भाग कंपनी कानून के विषय में है। उन्हें विस्तार से बताना होगा। जिस से अन्य पाठक भी लाभान्वित हों। एक अकेले उन की संतुष्टि के लिए तो इतना समय देना संभव नहीं है। कंपनी कानून में बदलाव निकट भविष्य में होने जा रहे हैं। इस कारण यदि अभी मैं उस पर लिखने के लिए श्रम करूँ भी तो कुछ दिन के बाद वह व्यर्थ हो जाएगा। दूसरी जिज्ञासा उद्योगों में काम करने वाले कर्मचारियों को मिलने वाले लाभों के बारे में है। वह भी एक विस्तृत विषय है। उस पर श्रंखलाबद्ध तरीके से लिखा जा सकता है। अभी उस के लिए समय निकाल पाना संभव नहीं हो पा रहा है। वैसे कंपनी कानून के बारे में कंपनी अधिनियम पढ़ कर और श्रमिकों को प्राप्त होने वाली सुविधाओं के लिए सभी श्रमकानूनों की जानकारी देने वाली पुस्तक हिन्दी में उपलब्ध हैं। पर उन का काम उन से नहीं चलेगा। वे और उलझ जाएंगे। इस लिए समय आने पर लिखूंगा। उन के साथ बहुत से पाठकों की जिज्ञासा शांत हो सकेगी।
    दिनेशराय द्विवेदी का पिछला आलेख है:–.विक्रय पत्र में बेची गयी संपत्ति का पूरा वर्णन न हो तो विक्रेता से संशोधन विक्रय पत्र निष्पादित करवा कर पंजीकृत करवाएँMy Profile

  10. Comment by महेश कुमार वर्मा:

    पर मैं जो जानना चाहा वह जानकारी कहाँ है?

    • Comment by दिनेशराय द्विवेदी:

      आप बताएँ तो कि आप जानना क्या चाहते हैं और आप को क्या जानकारी नहीं मिली। वैसे तीसरा खंबा की अपनी सीमाएँ हैं। जरूरी नहीं कि वह सब जानकारी यहाँ उपलब्ध करवा सके। फिर भी कोशिश यही रहती है कि हर संभव कानूनी समस्या हल करने का प्रयत्न किया जाए।
      दिनेशराय द्विवेदी का पिछला आलेख है:–.वसीयत होने पर मृतक की संपत्ति का बँटवारा उसी के अनुसार होगाMy Profile

      • Comment by महेश कुमार वर्मा:

        मैं जो पूछा इस ये सब प्राइवेट कंपनी में क्या अंतर है तथा ये श्रमिक को किस-किस प्रकार के सुविधा देने के लिए बाध्य है तथा यदि वह सुविधा नहीं दिया जाता है तो श्रमिक को क्या करना चाहिए, मुझे इससे संबंधित जानकारी नहीं मिली. खैर आपके अनुसार तीसरा खंबा की सीमा है और यदि मेरा प्रश्न या मैं जो चाहता हूँ वह उस सीमा से बाहर है तब तो मैं आपको जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं करूँगा पर अपनी सीमा को बताने के लिए जरुर बाध्य करूँगा.
        असुविधा के लिए खेद है.
        महेश कुमार वर्मा का पिछला आलेख है:–.मेरा कष्ट बढ़ाकर क्यों होते हो आनंदMy Profile

      • Comment by रमेश कुमार जैन उर्फ सिरफिरा:

        गुरुदेव जी, मुझे लगा इस आलेख की दूसरी कड़ी आयेगी तब “महेश कुमार वर्मा” के प्रश्न का उत्तर दिया जायेगा. मेरे ख्याल से अपने प्रश्न की बात कर रहे है. जो नीचे दिया है. वैसे ऐसा होता नहीं है कि प्रश्नकर्त्ता को पूरे आलेख में उत्तर ना मिले. मगर इस बार ऐसा ही हुआ है.

        पटना, बिहार के महेश कुमार वर्मा ने तीसरा खंबा से पूछा कि “प्रा. कं., लि. कं., प्रा. लि. कं. इत्यादि कंपनी में क्या अंतर है? यह भी बताएं कि ये सब कंपनी किस स्थिति में अपने कामगार को पी.एफ. की सुविधा देने के लिए बाध्य है तथा यदि कंपनी द्वारा पी. एफ. की सुविधा नहीं दी जाती है तो क्या करनी चाहिए? यह भी बताएं कि पी.एफ. के अलावा अन्य कौन सी सुविधा देने के लिए कंपनी बाध्य है?”
        रमेश कुमार जैन उर्फ सिरफिरा का पिछला आलेख है:–.हम कौन है ?My Profile

        • Comment by दिनेशराय द्विवेदी:

          आप देखेंगे कि यहाँ मैं ने एक विषय पर अपनी बात कही है महेश जी के प्रश्न के माध्यम से। किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया है। उन का प्रश्न भी भ्रामक है। एक और तो वे कंपनियों के भेद पूछ रहे हैं। दूसरी और वे उद्योगों में लागू होने वाली सुविधाओं की बात कर रहे हैं। कंपनी स्वयं एक विधिक व्यक्ति होती है और वह एक या कई उद्योग चलाती है। इस लिए इस प्रश्न में दो प्रश्न हैं दोनों के विषय अलग अलग हैं। विषय गंभीर हैं उन का तुरंत उत्तर देना संभव नहीं है। फिर उन का प्रश्न किसी समस्या से संबंधित न हो कर जिज्ञासा मात्र है। ऐसी जिज्ञासाओं का उत्तर समय ले कर दिया जा सकता है लेकिन समस्या का समाधान शीघ्र करना होता है।
          दिनेशराय द्विवेदी का पिछला आलेख है:–.पिताजी भाइयों को संपत्ति दे कर मुझे घर से बेदखल कर रहे हैं …My Profile

          • Comment by रमेश कुमार जैन उर्फ सिरफिरा:

            जी, बहुत अच्छा. क्या कोई ऐसा संदर्भ नहीं है यानि कोई किताब या वेबसाईट का पता महेश को बता दिया जाए. जिससे उनकी जिज्ञासा शांत हो जाए.
            रमेश कुमार जैन उर्फ सिरफिरा का पिछला आलेख है:–.हम कौन है ?My Profile

          • Comment by महेश कुमार वर्मा:

            श्रीमान जी,
            कानूनी सलाह में प्रश्न देते समय जो जानकारी मांगी गयी थी उसे ध्यान से देखें तो आप पायेंगे की मेरा मामला अदालत में है इसीलिए मैं यह प्रश्न पूछा. आगे मैं आपको बता दूँ कि मेरा प्रश्न सिर्फ जिज्ञासा ही नहीं समस्या से जुड़ा हुआ है. और अब मैं थोड़ा विस्तृत भी बता देता हूँ. मामला कुछ इस प्रकार है. जहां काम करता था वहाँ की स्थिति ऐसी है कि वहाँ स्टाफ को समय पर मजदूरी / सैलरी नहीं मिलता था यहाँ तक कि हिसाब भी नहीं होता था. कितने स्टाफ ऐसे हैं कि उसका हिसाब पिछले ११ माह से नहीं हुआ है. कितने स्टाफ ऐसे हैं जिसका इधर हिसाब हुआ तो उस स्टाफ का लगभग २०-२५ हजार रुपया निकल रहा है. यह हिसाब किये हुए भी लगभग १-२ माह हो गया पर फिर भी अभी तक पैसा नहीं मिला है.
            मुझे भी सही ढंग से पैसा नहीं मिल रहा था. वह पैसा के लिए आज-कल आज-कल कर रहे थे पर पैसा नहीं दे रहे थे. उचित सैलरी भी नहीं दी जा रही थी. एक दिन पैसा लेने के लिए बुलाया गया. पर वहाँ सैलरी के नाम पर उचित तरीका से न तो हिसाब किया गया न तो जो पैसा का आश्वासन दिया गया था वह ही दिया गया. बल्कि मालिक व उनके भाई द्वारा मेरे साथ मारपीट किया गया. मुझे काफी चोट लगी. शारीर पर कटा भी. खून भी निकला. जिसके लिए मुझे हॉस्पिटल में ईलाज भी करना पड़ा. मैं उनदोनों पर भारतीय दंड संहिता के धरा ३२३ एवं ३२४ के तहत केस कर दिया हूँ. अभी तक मेरी गवाही हो चुकी है. बकाया मजदूरी व क्षतिपूर्ति के लिए मैं श्रम अधीक्षक के के यहाँ केस किया हूँ. …………………
            मैं यह भी बता दूँ कि वहाँ पर कुल कामगारों की संख्या ३० के आसपास या इससे ऊपर होगा. उस दिन के घटना के बाद से मैं कार्य पर नहीं जा रहा हूँ.
            इसी घटना के कारण मैं यह प्रश्न पूछा. चूँकि मुझे पी. एफ. की सुविधा नहीं मिलती थी इसी कारण मैं पी.एफ. के बारे में पूछा ताकि पी. एफ. के लिए भी क्लेम कर सकूँ.
            दूसरी बात आप मुझे यह भी बता दें कि मैं भा. दं. सं. के धरा ३२३ व ३२४ के तहत केस किया हूँ. क्या इस मामला में श्रम कानून के तहत अन्य धारा भी लागू होगा? बताएं कि यदि मालिक अपने स्टाफ के साथ मारपीट करता है तो क्या इसके लिए श्रम कानून में और भी कोई विशेष धारा है जिसके अनुसार केस किया जा सके.
            आशा है अब आप मुझे जल्द जवाब देंगे ताकि मुझे अपने केस में कार्रवाई में सहूलियत हो.

            आपका
            महेश
            महेश कुमार वर्मा का पिछला आलेख है:–.मेरा कष्ट बढ़ाकर क्यों होते हो आनंदMy Profile

  11. Comment by महेश कुमार वर्मा:

    पर मैं जो जानना चाह वह जानकारी कहाँ है?

  12. Comment by महेश कुमार वर्मा:

    आपके बातों से मैं सहमत हूँ. कानून की जानकारी सबों तक आसानी से पहुंचना चाहिए. पर यह भी बात सही है की अंतरजाल यानी इन्टरनेट तक भी तो सबों की खाशकर आम जन की पहुँच नहीं है अतः आम जन तक कानून की बात पहुँचाने की बात सोचना चाहिए.
    महेश कुमार वर्मा का पिछला आलेख है:–.मेरा कष्ट बढ़ाकर क्यों होते हो आनंदMy Profile

    • Comment by दिनेशराय द्विवेदी:

      महेश जी, हर व्यक्ति तक कानून कभी भी नहीं पहुँचाया जा सकता। लेकिन उस तक सब की पहुँच बनाई जा सकती है। आज कल सब जानते हैं कि इंटरनेट पर क्या जानकारी उपलब्ध है। ग्रामीणों को उन के जमीन के दस्तावेज वहाँ दिखाई दे जाते हैं। जब उन्हें पता लगेगा कि कानूनी जानकारी वहाँ से प्राप्त की जा सकती है तो वे अवश्य अपनी जरूरत के मुताबिक जानेंगे। आप की बात सही भी हो तो भी कम से कम अभी से तो कई गुना लोग कानून तक पहुँच सकेंगे।
      दिनेशराय द्विवेदी का पिछला आलेख है:–.वसीयत होने पर मृतक की संपत्ति का बँटवारा उसी के अनुसार होगाMy Profile

      • Comment by महेश कुमार वर्मा:

        हमारी शिक्षा व्यवस्था की यह बहुत बड़ी खामी है की यहाँ कानून की जानकारी की शिक्षा अनिवार्य नहीं है. किसी भी स्तर के बच्चे / विद्यार्थियों को उनकी शिक्षा में कानून की पढ़ाई अनिवार्य नहीं है. शुरूआती से ही कानून की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए. और फिर यदि किसी को कोई जानकारी चाहिए तो वह जानकारी कहाँ से मिलेगी इसकी भी व्यवस्था होनी चाहिए. इसी तरह यदि कोई व्यक्ति किसी कार्यालय की अनियमितता की शिकायत या अन्य किसी स्थान की गड़बड़ी की शिकायत करना चाहे तो इसके लिए एक निशिचित जगह होनी चाहिए कि लोग वहाँ शिकायत करे फिर वह उससे संबंधित विभाग को शिकायत भेजे. पर यहाँ हरेक तरह के अनियमितता के शिकायत करने के लिए अलग-अलग कार्यालय है और लोगों को यह भी मालुम नहीं हो पाता है कि कौन सी शिकायत कहाँ करें. जैसे उपभोक्ता को शिकायत करने का स्थान अलग है. श्रमिक के लिए अलग स्थान है. बैंक के लिए अलग स्थान है. उसी तरह अलग-अलग सेवा के लिए अलग-अलग स्थान है. इस कारण से लोगों को अपनी शिकायत करने में काफी परेशानी होती है और समय की भी बर्बादी होती है. फिर शिकायत पर उचित कारवाई भी नहीं हो पाती है. अतः सभी सेवा के लिए एक निश्चित स्थान होना चाहिए जहां लोग अपनी शिकायत करे फिर वहाँ से शिकायत उचित कार्रवाई के लिए अग्रेसित किया जाना चाहिए.

      • Comment by shorya:

        सर आपके प्रयास बहुत सराहनिये है ! दिनेश जी आप के द्वारा जो जानकारिया दी जा रही है वे आम आदमी के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हो रही है !
        में आपके सभी लेख पड़ता हु और दिल से आजीवन आपका आभारी रहूँगा !
        धन्यवाद !
        आपका प्रशंसक और अनुज
        शोर्य मिश्रा

      • Comment by shorya:

        सर आपके प्रयास बहुत सराहनिये है ! दिनेश जी आप के द्वारा जो जानकारिया दी जा रही है वे आम आदमी के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हो रही है !
        में आपके सभी लेख पड़ता हु और दिल से आजीवन आपका आभारी रहूँगा !
        धन्यवाद !
        आपका प्रशंसक और अनुज
        शोर्य मिश्रा

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