बालक की अभिरक्षा के निर्णय में उस का हित सर्वोपरि

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न्यायालयों के समक्ष अनेक बार माता, पिता और संरक्षक के बीच यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि बालक किस की अभिरक्षा में रहे? ऐसे प्रश्नों पर निर्णय देने में सर्वोपरि तथ्य यह है कि बालक का हित किस के संरक्षण में रहने पर साध्य होगा। सर्वेोच्च न्यायालय ने श्यामराव मारोती कोरवाटे बनाम दीपक किसनराव टेकम के मुकदमे में यही व्यवस्था प्रदान की है।

क्त प्रकरण में दीपक किसनराव का विवाह कावेरी के साथ 2002 में सम्पन्न हुआ था। 2003 में उस ने एक बालक विश्वजीत को जन्म दिया। लेकिन बालक के जन्म के उपरान्त अत्यधिक रक्तस्राव के कारण कावेरी का देहान्त हो गया। माता के देहान्त के उपरान्त बालक उस की नाना श्यामराव मारोती के संरक्षण में पलता रहा। दीपक किसनराव ने दूसरा विवाह कर लिया जिस से उसे एक और पुत्र का जन्म हुआ। इस बीच अगस्त 2003 में बालक के नाना ने बालक का संरक्षक नियुक्त करने के लिए जिला न्यायालय को आवेदन किया जब कि पिता ने बालक की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए। जिला जज ने दोनों प्रार्थना पत्रों पर एक ही निर्णय देते हुए बालक के 12 वर्ष का होने तक की अवधि के लिए  नाना को उस का संरक्षक  नियुक्त किया। न्यायालय ने यह भी निर्णय दिया कि तब तक पिता को बालक से मिलने की स्वतंत्रता होगी। जिला न्यायाधीश ने पिता के आवेदन को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि वह बालक के 12 वर्ष का होने के पश्चात बालक की अभिरक्षा के लिए पुनः आवेदन कर सकता है।

पिता ने जिला न्यायाधीश के निर्णय को मुम्बई उच्च न्यायालय की नागपुर बैंच के समक्ष नअपील प्रस्तुत कर चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने पिता की अपील को स्वीकार करते हुए बालक की अभिरक्षा पिता को देने का निर्णय प्रदान किया। नाना ने उच्च न्यायालय के इस निर्णय को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि पिता के प्राकृतिक संरक्षक होते हुए भी बालक के हितों को देखते हुए न्यायालय किसी अन्य व्यक्ति को संरक्षक नियुक्त कर सकता है। इस मामले में जन्म से ही बालक नाना के साथ निवास कर रहा है और उस का लालन-पालन सही हो रहा है उस की शिक्षा भी उचित रीति से हो रही है ऐसी अवस्था में जिला जज द्वारा नाना को 12 वर्ष की आयु तक के लिए बालक का संरक्षक नियुक्त किया जाना विधिपूर्ण था।

र्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि बालक 12 वर्ष की आयु तक नाना के संरक्षण में ही रहेगा। इस अवधि में पिता बालक के विद्यालय का दो सप्ताह से अधिक का अवकाश होने पर सात दिनों तक के लिए पिता बालक को अपने पास रख सकेगा। जिस के दिनों की पूर्व सूचना पिता बालक के नाना को देगा। इस के अतिरिक्त माह में दो बार अवकाश के दिन शनिवार रविवार को या किसी अन्य त्योहारी अवकाश के दिन नाना बालक को सुबह से शाम तक उस के पिता के पास रहने देगा। इस बीच पिता चाहे तो बालक के स्कूल की फीस, ड्रेस, पुस्तकें व भोजन आदि का खर्च उठा सकता है। बालक 12 वर्ष की आयु का होने के उपरान्त पिता उस की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए जिला न्यायाधीश के समक्ष फिर से आवेदन कर सकेगा।

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4 टिप्पणियाँ

  1. Comment by Surendra kumar joshi:

    श्रीमानजी मेरी समस्या का इतना जल्दी समाधान करने में मदद करने के लिए हदय के अन्तःकरण से आभार एवं दीर्घ एवं सुखी जीवन की शुभकामनाए शुभेछु सुरेन्द्र कुमार जोशी चिड़ावा

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  2. Comment by dr t s daral:

    अफ़सोस इस प्रकरण में बालक की मर्ज़ी का कोई स्थान नहीं है .
    ऐसे में बच्चे की जिंदगी तो यंत्रवत सी हो जाती है . यह बच्चे के लिए बड़ा ट्रौमेतिक होता होगा .

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    • Comment by दिनेशराय द्विवेदी:

      दलाल सा.
      ऐसा नहीं है। बिना बालक से पूछताछ किए यह कैसे तय किया जा सकता है कि उस का हित किस में है? बालक से तो पूछताछ होती ही है।

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      • Comment by दिनेशराय द्विवेदी:

        दराल साहब क्षमा करें। गलती हो गई, दलाल को दराल पढ़ें।

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