बाल विवाहों के पूर्ण प्रतिषेध के लिए उन्हें प्रारंभ से ही शून्य और अकृत घोषित किया जाए

 क और आखा तीज (अक्षय तृतिया) गुजर गई। इस दिन किए गए दान का पुण्य अक्षय होता है, ऐसी मान्यता है और तमाम हिन्दू धार्मिक पीठें, संत, कथावाचक आदि इस बात का खूब प्रचार भी करते हैं। यह भी मान्यता है कि रजस्वला होने के पूर्व ही कन्या (पुत्री) का कन्यादान कर दिया जाए तो उस से बड़ा दान कुछ नहीं होता। नतीजा यह है कि इन धारणाओं ने आखा तीज को विवाह के लिए अबूझ सावा (विवाह मुहूर्त) बना दिया है। इस दिन थोक में बाल विवाह होते हैं। विशेष रूप से राजस्थान, गुजरात  मध्य प्रदेश और कुछ अन्य प्रांतों में बहुत बड़ी संख्या में बालविवाह  होते रहे हैं। पिछले तकरीबन पैंतीस वर्षों में सामूहिक विवाह होने लगे जिन में बाल विवाह धड़ल्ले से हुए। सांसद और विधायक जो स्वयं कानून बनाते हैं, राजनैतिक दलों के नेता जो बाल विवाह के खिलाफ खूब बोलते हैं, इन सामूहिक विवाह समारोहों में आशीर्वाद देते और वोट पटाते खूब नजर आए। प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी जिन पर संवैधानिक रूप से और अपनी सेवाओं के कर्तव्य के एक भाग के रूप में बाल विवाहों को रोकने की जिम्मेदारी है,  इन सामूहिक विवाहों की व्यवस्था करते रहे।

बाल विवाहों का अनिवार्य परिणाम यह सामने आया कि विवाह संबंधी विवादों में भारी वृद्धि हुई। कुछ भी होता है कि लड़की को पिता के घर रोक लिया जाता है, और फिर धारा 125 दं.प्र.सं. में भरणपोषण के मुकदमे से विवाद का अदालत में आरंभ हो जाता है। अब तो अनेक माध्यम हैं जिन के जरिए अदालत जाया जा सकता है। दं.प्र.सं. के अतिरिक्त घरेलू हिंसा अधिनियम और हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रावधानों का सहारा लिया जा रहा है। इस से पहले से ही मुकदमों से अटी अदालतों में मुकदमों की संख्या और बढ़ी है। कानून के अंतर्विरोध भी इस का कारण बने हैं। सब से बड़ा अंतर्विरोध है कि हिन्दू विवाह अधिनियम में किसी भी बाल विवाह को अवैध नहीं माना जाता। एक बार संपन्न हो जाने के उपरांत विवाह वैध हो जाता है और उसे बाल विवाह होने के कारण अवैध, अकृत, या शून्य घोषित नहीं किया जा सकता है।
क और तो यह स्थिति है, दूसरी और बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम ने बाल विवाह को अपराधिक कृत्य बनाया हुआ है और सजाओं का प्रावधान किया है, इसे विधि की विडम्बना कहा जाए या फिर विधायिका द्वारा निर्मित विधियों से विधिशास्त्र में उत्पन्न किया गया अंतर्विरोध। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम में 18 से कम आयु की स्त्री और 21 वर्ष से कम आयु के पुरुष के विवाह को वर्जित घोषित किया गया है और ऐसा विवाह करने वाले 18 से अधिक और 21 वर्ष से कम आयु के और उस से अधिक आयु के लड़के को अलग अलग दंडों का भागी घोषित किया गया है। इसी विवाह को कराने वाले पुरोहित और माता-पिता के लिए भी दंडों का विधान किया गया है। इस तरह एक ऐसा कृत्य जिस को करने और कराने वाले वयस्क व्यक्तियों को अपराधी कहा गया है उसी कृत्य के परिणाम विवाह को वैध करार दिया गया है। हिन्दू विवाह और अन्य किसी भी व्यक्तिगत विधि के अंतर्गत संपन्न बाल विवाह को हर स्थिति में वैध माना गया है। ऐसे विवाह से उत्पन्न संतानों को वही अधिकार प्राप्त हैं जो कि अन्य विवाहों से उत्पन्न संतानों को प्राप्त हैं। 

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9 टिप्पणियाँ

  1. Comment by राज भाटिय़ा:

    संजय बेंगाणी जी की टिपण्णी से सहमत है जी

  2. Comment by संजय बेंगाणी:

    कानून गलत घोषित कर सकता है, बाल विवाह रोक नहीं सकता. जनजागृति के अलावा कोई चारा नहीं. अब सामन्यतः लड़्कियों की शादी 25 के आस पास होने लगी है तो यह कानून के बल पर नहीं हुआ है. गरीबी अशिक्षा खत्म होगी तो बाल विवाह भी खत्म हो जाएंगे. वैसे धर्म गुरूओं का प्रभाव अच्छा होता है उन्हे इस ओर प्रयास करना चाहिए. वोट बटॉरू नेता तो फालतु चीज है. कोई उम्मीद नहीं,

  3. Comment by नरेश सिह राठौङ:

    आपके इस प्रकार के विचारों का स्वागत है |

  4. Comment by ताऊ रामपुरिया:

    सुंदर पोस्ट, आभार.

    रामराम.

  5. Comment by honesty project democracy:

    इसके लिए समाज में फैले डर व आतंक और दबंगों द्वारा महिलाओं से दुर्व्यवहार करने के लिए सख्त सजा और ईमानदारी से जाँच की व्यवस्था भी करनी परेगी /

  6. Comment by डॉ. मनोज मिश्र:

    अच्छी जानकारी.

  7. Comment by योगेन्द्र मौदगिल:

    sateek evm saarthak post dada…

  8. Comment by Aflatoon:

    इन्हें रोकने के लिए आपके सुझाव सर्वथा उचित हैं ।

  9. Comment by Udan Tashtari:

    अच्छा ही है यह सिर्फ इतिहास के विषय ही रहें.

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