माँ और दादी से प्राप्त संपत्ति पैतृक क्यों नहीं है?

 लखनऊ से उमा मिश्रा पूछती हैं –
दादा से उत्तराधिकार में पिता को प्राप्त संपत्ति पैतृक है और उस में संतानों का अधिकार निहित है तो दादी से पिता को प्राप्त संपत्ति में संतानों का अधिकार क्यों नहीं है? क्या वह पैतृक नहीं है।
  उत्तर-

उमा बहिन, 

ब आप ने मुझे टेलीफोन पर पूछा कि क्या दादी से पिताजी को मिली संपत्ति क्या पैतृक नहीं है तो अचानक मैं मुस्कुरा उठा। मैं ने आप को जवाब दिया -नहीं। फिर आप ने पूछा कि ऐसा क्यों नहीं है? तो मेरी हँसी छूट गई। वह इसलिए कि आप के प्रश्न का उत्तर तो आप के प्रश्न में ही छिपा हुआ था। आप उस पर ध्यान ही नहीं दे पा रही थीं। आखिर किसी को भी अपनी माता से प्राप्त संपत्ति पैतृक कैसे हो सकती है? उसे तो भाषा में भी पैतृक नहीं कहा जा सकता। अधिक से अधिक उसे मातृक कह सकते हैं। पर आप के प्रश्न का उत्तर इतना सादा भी नहीं है।
हिन्दू विधि के अतिरिक्त किसी भी अन्य व्यक्तिगत विधि में पैतृक संपत्ति का सिद्धान्त नहीं है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के उपरान्त उस व्यक्ति की संपत्ति उत्तराधिकार में जिस व्यक्ति को प्राप्त होती है वह उस की संपत्ति हो जाती है और उस व्यक्ति को अधिकार होता है कि वह उस संपत्ति का किसी भी प्रकार से व्ययन करे। लेकिन हिन्दू विधि में यह सिद्धान्त है कि यदि किसी व्यक्ति को अपने किसी भी सपिंड पुरुष पूर्वज अर्थात पिता, पितामह, प्रपितामह आदि से कोई संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त होती है तो वह पैतृक संपत्ति है और उस में ऐसे संपत्ति प्राप्तकर्ता उत्तराधिकारी के उत्तराधिकारियों का हित निहित होता है। यदि उत्तराधिकारी अविवाहित हो या उस के कोई संतान न हो तो वह उस संपत्ति का व्ययन कर सकता है। लेकिन यदि वह अपनी संतान के जन्म तक पुरुष पूर्वज से प्राप्त संपत्ति को धारण किए रहता है तो किसी संतान के गर्भ में आते ही ही उस का अधिकार उस सम्पत्ति में निहित हो जाता है। तब वह उस संपत्ति का व्ययन स्वेच्छा से नहीं कर सकता है। इस के विपरीत पुरुष पूर्वजों के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति पैतृक नहीं हो कर व्यक्तिगत संपत्ति है और उस पर उत्तराधिकारी के जीवित रहते किसी अन्य व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं होता। ऐसा उत्तराधिकारी इस संपत्ति का इच्छानुसार व्ययन कर सकता है।
रंपरागत हिन्दू विधि में स्त्रियों को बहुत सीमित उत्तराधिकार प्राप्त था। उन्हें उत्तराधिकार में जो संपत्ति प्राप्त होती थी उस का वे व्ययन नहीं कर सकती थीं, केवल उस संपत्ति से प्राप्त आय का  उपयोग कर सकती थीं और उन के देहान्त के उपरान्त वह संपत्ति जिस पूर्वज से प्राप्त होती थी उसी के उत्तराधिकारियों को मिल जाती थी।
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