वाद कभी भी स्वीकार किया जा सकता है, आप को न्याय के लिए लड़ना चाहिए

समस्या-

जयपुर, राजस्थान से मनोज ने पूछा है-

मेरी समस्या है कि मेरा एक मकान है जिसे विक्रय करने हेतु मैं ने 2-4-2011 को एक व्यक्ति साथ एग्रीमेंट किया था (जो कि दिल्ली की रहने वाला है) इस एग्रीमेंट की शर्तों में एक शर्त मेरी तरफ़ से थी कि क्रेता पेशगी रकम के अलावा जो राशी बचेगी उसका आधा चार माह के अंदर अदा कर देगा एंव बाकी राशि आठ माह के अंदर अदा करके रजिस्ट्री अपने नाम करवा लेगा। लेकिन 4 माह बीत जाने पर भी क्रेता ने कोई रकम अदा नहीं की। तब मैं ने दिनांक 3-8-2011 को एक हस्तलिखित रिमाईंडर रजिस्टर्ड डाक से भेजा कि वह शर्त के अनुसार रकम का भुगतान 7 दिन के अंदर कर दे अन्यथा आगे की कर्यवाही का वह स्वयं जिम्मेदार होगा।  इसका उस ने कोई जवाब नहीं दिया।  1-9-2011 को मैं ने अपने वकील द्वारा एग्रीमेंट निरस्त करने का नोटिस उसे रजिस्टर्ड डाक से भेज दिया जिसका भी क्रेता ने कोई उत्तर नहीं दीया।  दो माह बाद 14-11-2011 को क्रेता के वकील का नोटिस मेरे पास आया जिसमें उल्टा मुझ पर ही यह आरोप लगाया गया कि क्रेता 1-7-2011 को चैक लेकर आया था मगर मैं ने नगद लाने को कहा।  फ़िर क्रेता 15-7-2011 को नगद राशि लेकर आया था।  वो भी मैं ने लेने से मना कर दिया (1-7-11 को आने के लिये प्रयोग की गई कार का नं. भी उन्हों ने लिखा है)।  इस नोटिस का जवाब मेरे वकील ने दे दिया कि उनके द्वारा कही गई बातें गलत हैं ऒर एग्रीमेंट निरस्त हो चुका है।  1-12-2011 को क्रेता का फ़ोन मेरे मोबाइल पर आया जो उसने किसी P.C.O. से किया था।  उसने मुझ से रजिस्ट्रार ऑफ़िस आने को कहा।  मैं वहां गया तो वो मुझे नहीं मिला तो मैं ने अपनि उपस्थिति दर्ज करवाने हेतु रसीद कटवा ली।  इसके करीब 9 माह की शान्ति के बाद मेरे पास कोर्ट से नोटिस आया जिस में उसने आदेश 9 -नियम 1 के तहत दीवानी वाद दर्ज किया है।  इसमें 4 राहतें न्यायालय से चाही गई हैं कि 1- वादीगण से शेष राशि प्राप्त करके जायदाद का कब्जा संभला दिया जाए. 2- स्थाई निषेधाग्या जारी की जाए कि प्रतिवादी जायदाद किसी अन्य को अन्तरित नहीं करे।  3- वाद व्यय वादी को प्रतिवादी से दिलाने की कृपा करें। 4- अन्य अनुतोष जो भी न्यायालय उचित समझे प्रतिवादी से दिलाने की कृपा करें।  मेरे मिलने वालों की सलाह है कि एक बार अदालत गए तो सालों बीत जाएंगे इसीलिये जैसा वह कहें कर लो मगर मेरा ये मानना है कि सही होने के बावजूद मैं हार क्यों मानूँ ओर दंड क्यों भुगतूँ?
अब कृपया आप मुझे परामर्श दें कि मुझे क्या करना चाहिये।

समाधान-

प पूरी तरह से सही हैं. आप के उक्त मामले में जो भी सावधानियाँ आप के द्वारा बरती गई हैं। उस के बाद आप का इस मुकदमे में सफल होना निश्चित है। यदि न्यायालय मुकदमे के दौरान इस बात पर किसी तरह की अस्थाई निषेधाज्ञा के माध्यम से उक्त संपत्ति को विक्रय करने या आगे स्थानान्तरित करने पर रोक नहीं लगाता है तो आप को कोई हानि नहीं है। आप ने यह नहीं बताया है कि वादी ने अस्थाई निषेधाक्षा के लिए भी कोई आवेदन प्रस्तुत किया है अथवा नहीं? लेकिन दी हुई परिस्थितियों में हम यह मान कर चलते हैं कि अस्थाई निषेधाज्ञा हेतु कोई आवेदन प्रस्तुत किया गया होगा।

जो तथ्य आप ने यहाँ बताए हैं उन के आधार पर वादी को कोई अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त नहीं होनी चाहिए। फिर भी यदि कोई अस्थाई निषेधाज्ञा का आदेश होता है तो आप उस की अपील अपील-न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। आप को यह मुकदमा लड़ना चाहिए और हार नहीं माननी चाहिए।

दि लोगों की सलाह ही माननी हो तो कम से कम विचारण न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन निर्णीत होने और उस की अपील के निर्णय तक तो आप को प्रतीक्षा करनी चाहिए। जो राहत वादी ने न्यायालय से चाही है उसे तो आप कभी भी स्वीकार कर सकते हैं। यदि कोई अस्थाई निषेधाज्ञा जारी नहीं होती है तो आप संपत्ति को किसी भी समय अपनी इच्छानुसार विक्रय या हस्तांतरित कर सकते हैं।

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