ससुरालियों द्वारा विधवा की संपत्ति हड़पना और खुर्द-बुर्द करना ग़बन का संगीन अपराध है।

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समस्या-

बड़नगर, उज्जैन से राधा ने पूछा है-

मेरी शादी 31 मई 2010 को राजेश से हुई थी, मेरे पति को पाएल्स हो गया था।  देवास ट्रीटमेंट करने गये।  डॉक्टर ने नींद का इंजेक्शन लगाया और वो इंजेक्शन रिएक्शन कर गया, पति की हालत ज़्यादा बिगड़ गयी तो इंदौर रेफर किया, पर फिर भी उन्हें नहीं बचा पाए, मैं उस समय मायके में थी।  3 दिन पहले ही मुझे मेरे पति छोड़ कर गये थे, मुझे ऑपरेशन के बारे में किसी ने नहीं बताया। पति सुबह 11 बजे से तो रात 10:30 मिनट तक ज़िंदगी और मौत से लड़ते रहे, पर मुझे किसी ने खबर नहीं की, उनका पोस्ट मार्टम  भी नहीं कराया गया, रात 12:50 मिनट पर मुझे मेरे बड़े ससुर जी ने कॉल किया और कहा की राजेश की तबीयत खराब हो गयी है।  उसको अचानक ही चक्कर आए और दर्द हुआ तो हम अपोलो (इंदौर) ले आए हैं ओर आईसयू में भरती किया है, बस इतना कहा।  हम रात को जैसे तैसे गाड़ी कर के गये।  रात 4 बजे हम पहुँचे, ससुराल वालों में से कोई बात करने ही नहीं आया, दूसरे रिश्तेदार थे।  मैंने पति को एक बार देखने को कहा तो टालते गये, मुझे मेरे पति से नहीं मिलाया गया।  सुबह 8 बजे मुझे घर चलने को कहा। मैं ने इनकार किया कि मैं मेरे पति को देखे बिना नही जाऊंगी, तो कहा कि वो घर ही आ रहा है। जब घर पर उनको मेरे सामने लिटाया गया तो मेरे तो होश ही उड़ गये।  कुछ पूछने पर सब मुझे गपलते रहे।  मौत का कारण और समय आखरी समय तक नहीं बताया था उन लोगो ने।  बस टालते रहे। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था।  मेरे साथ मेरे ससुराल वालों ने धोखा किया है।  8 जून 2012 को उनका देहांत हो गया।  उनके जाने के बाद मुझे ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया।  मुझे मेरा समान, गहने और ज़रूरी दस्तावेज़ (मेरे) भी नहीं दिए जा रहे है।  घर के बड़ों ने मिल बैठ कर बात करनी चाही।  पर वो लोग घर आ के हम से बदसलूकी से पेश आए।  मुझे और मेरे परिवार वालों को गंदा गंदा बोला गया, मुझे जान से मारने की धमकी भी दी।  पहले तो मुझे मेरा सामान, मेरी चीज़ें नही दी और मेरे साथ मार पीट भी की है।  मुझे शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी गयी है।  मेरे पति का इधर उधर का पैसा सब खुद के पास जमा कर लिया है।  उनके अकाउंट भी बंद करा दिए हैं।  मुझे मेरा हक़ नहीं देते।  मै पिछले साल सितंबर से बीमार हूँ।  मुझे वीनस साइनस  थ्रॉम्बोसिस है। इस बीमारी के साथ और भी बीमारियों से ग्रस्त हूँ। मुझे दिमाग पर जोर डालने और तनाव से दूर रहने के लिए डॉक्टर ने कहा है। फिर भी ये लोग मुझे परेशान करते हैं जिससे मेरी बीमारी ठीक होने के बजाय बढ़ती जा रही है।  मेरे पास पैसे भी नहीं हैं जिससे मैं अपनी जाँच करा सकूँ और इलाज करा सकूँ।  12वीं फेल हूँ, आमदनी का कोई रास्ता नहीं है।  मे कहीं नौकरी भी नहीं करती हूँ।  जैसे तैसे मेरे पिताजी मुझे जीवन बसर करने मे मददत कर रहे हैं।  पिताजी की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है फिर भी मुझे थोड़ी बहुत मदद करते हैं।  शादी के बाद 4 महीने मैं ससुराल में रही।  फिर मेरे पति मुझे महाराष्ट्र ले जाए साथ रहने के लिए।  उन की नौकरी थी वहाँ पर।  मेर पति ने ईपीएफ और जीपीएफ जैसी चीज़ों में उनकी माताजी को नॉमिनी बनाया था।  मेरी शादी के ढ़ाई साल पहले।  वो नॉमिनी का नाम बदल नहीं पाए। (मेरी बीमारी के चलते और भी कुछ परेशानियों के चलते) और वो इस दुनिया से चले गये।  अब कंपनी से पैसा मिलेगा उस पर क्या मेरा अधिकार नहीं बनता? उन के ईपीएफ और जीपीएफ पर मेरे क्या अधिकार है? उन की एलआईसी भी थी शादी के पहले से ली हुई।  जो कि अभी तक चल रही थी।  उसकी जानकारी मुझ से छुपाई जा रही है मुझे पॉलिसी नंबर नहीं बताए जा रहे हैं। कहते हैं पॉलिसी तो थी ही नहीं।  मेरे पास प्रूफ है, पर पॉलिसी नंबर नहीं है। मैं उसकी जानकारी कैसे कर सकती हूँ? मे पॉलिसी ऑफिस जा चुकी हूँ, मैनेजर ने मदद करने से इनकार कर दिया।  बिना पॉलिसी नंबर के हम आपकी कोई मदद नहीं कर सकते। क्या मेरे पति के जाने के बाद पॉलिसी पर मेरा हक़ बनता है?  अगर है तो मैं कैसे इसे हासिल कर सकती हूँ? हम ने हमारे घर में बहुत सा सामान बसाया था।  महाराष्ट्र में पर पति के जाने के बाद ससुर जी वहाँ गये और सारा सामान ले आए। उस में कुछ तो बेचने की बात कर रहे थे और  मुझे देने से मना कर दिया। क्या मुझे मेरे घर का समान और बिका हुआ सामान मिल सकता है?  क्यों कि ससुरजी ने मुझसे बिना पूछे मेरा सामान बेचा हे।  मुझे मेरा सामान, मेरे कागज़ात, मेरे गहने, सभी बिना टूट फूट के बिना कटे फटे मुझे मिल सकें।  उस के लिए भी कोई क़ानून है?  ससुरजी ने मुझे घर में रखने से ही मना कर दिया और  हिस्सा माँगा तो भी मना कर दिया।  वो कहते हैं कि ये जायदाद मैं ने बसाई है, मैं इसका कुछ भी कर सकता हूँ।  चाहूँ तो दान में दे दूँ।  इसलिए मैं मेरे बेटे को जायदाद से बेदखल करता हूँ।  क्या वे मेरे पति के शांत होने के बाद वो मेरे पति को जायदाद से अलग करने को अभी नवम् में बोलते हैं जब कि मेरे पति जून में ही शांत हो गये हैं।  इसका मतलब कि उनका बेटा गया तो उन की ज़िम्मेदारी ख़त्म।  वो मुझे उन के घर में हिस्सा नहीं देना चाहते और जायदाद में भी हिस्सा नहीं देना चाहते।  उन की इकलौती विधवा बहू होने के नाते भी मेरा हक़ नहीं बनता क्या? इसमे मेरे क्या क्या हक़ हैं?  वे मुझे गालियाँ देते हैं मेरे बारे में ग़लत ग़लत बातें फैला रहे हैं।  पूरे समाज में और गाँव में।  जिस से मुझे बदनामी का सामना करना पड़ रहा है।  इसलिए क्या मैं मानहानि का दावा कर सकती हूँ? क्या इस पर भी कोई क़ानून है?  मेरे ससुराल वाले बड़े लोग है, हम को बहुत परेशान करते हैं।  मुझे आगे पढ़ाई करनी है, मेरा इलाज कराना है,  मुझे अपना भारण पोषण करना है।  पर पैसे के बिना कैसे हो? मुझे शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी गयी है। मुझे मेरे अधिकार के बारे मे बताइये।  मेरी उमर छोटी है।  इसलिए मुझे क़ानून की कोई जानकारी नहीं है।  कृपा कर के मेरी परेशानी का निवारण करें।

समाधान-

प की विस्तृत कहानी पढ़ी। यह भारतीय महिलाओं की सामान्य कहानी है। बहू घर में लायी जाती है पति और उस के परिवार की सेवा करने के लिए। जब पति का देहान्त हो गया हो और उस की विधवा पत्नी बीमार हो, सेवा करने लायक नहीं हो तो आम तौर पर ससुराल वालों का व्यवहार ऐसा ही हो जाता है। वे उस के पति की संपत्ति पर कब्जा कर लेते हैं और बहू को  निकाल फेंकते हैं उस के पिता-भाइयों की जिम्मेदारी पर। जिस देश में काम करने लायक सधवा बहू को दहेज लाने को बाध्य किया जाता हो, न लाने पर जला दिया जाता हो, उस देश में ऐसा व्यवहार आश्चर्य पैदा नहीं करता। लेकिन ऐसा नहीं है कि सारा समाज ऐसा ही है। अच्छे लोग भी हैं। कानून बहू के साथ है लेकिन उस का उपयोग करना बहू नहीं जानती। उसे कानून की जानकारी भी नहीं है।

ही स्थिति आप के साथ है।  लेकिन आप के साथ एक अच्छी बात है कि आप जीवन जीना चाहती हैं। अपनी बीमारी से मुक्त होना चाहती हैं। आगे पढ़ाई कर के अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हैं। अपने अधिकारों को हासिल करना चाहती हैं। जब आप में इतनी हिम्मत है तो आप को समाज में आप का साथ देने वाले भी मिलेंगे जो आप को अपने अधिकार दिलाने में मदद भी करेंगे। लेकिन आप को फर्जी मदद करने वालों से भी सावधान रहना होगा। आप के प्रति फैलाई जा रहे बुरे प्रचार का भी मुकाबला करना होगा। आप दृढ़ता से खड़ी रहेंगी तो अपना जीवन जीत सकती हैं।

ति के मरने के उपरान्त संतान न होने पर उस की समस्त संपत्ति की स्वामिनी पत्नी और मृतक की माती ही हैं।  इस तरह आप अपने पति की सम्पत्ति की स्वामिनी हैं। आप चाहें तो समस्त संपत्ति हासिल कर सकती हैं। आप के पति का जो भी रुपया उस की नौकरी से, ईपीएफ, जीपीएफ, बीमा पालिसी आदि से मिलना है वह सब आप का है। यदि नॉमिनी कोई और भी है और उसे वह धनराशि मिल भी जाती है तो ऐसा धन प्राप्त करने वाला नॉमिनी केवल एक ट्रस्टी मात्र है। ट्रस्टी का कर्तव्य है कि वह मृतक के उत्तराधिकारियों को उन की धन संपत्ति सौंप दे। यदि ट्रस्टी ऐसा नहीं करता है और उस धन संपत्ति को अपने पास रख लेता है तो यह सीधे सीधे भारतीय दंड संहिता की धारा 406 के अंतर्गत न्यास भंग का अपराध है, ग़बन है। आप को चाहिए कि आप अपने पति की संपत्ति आप के ससुराल वालों द्वारा ऱख लिए जाने तथा नौकरी से, ईपीएफ, जीपीएफ, बीमा पालिसी आदि से मिलने वाले धन के लिए पुलिस में रिपोर्ट कराएँ। यदि थाना रिपोर्ट न लिखे, पुलिस अधीक्षक को शिकायत करें और फिर भी काम न चले तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करें। आप की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो जाने पर पुलिस का कर्तव्य है कि वह आप की संपत्ति को रखने वालों को गिरफ्तार कर उस संपत्ति को बरामद करे। इस के बाद आप न्यायालय से उस संपत्ति को अपनी सुपूर्दगी में ले सकती हैं।  जो संपत्ति न मिले और जो खराब मिले उस की प्राप्ति और नुकसान के लिए आप दीवानी वाद न्यायालय में संस्थित कर सकती हैं।

प के ससुर जी का यह कहना सही है कि जो संपत्ति उन्हों ने अर्जित की है उस पर उन का अधिकार है वे इसे कुछ भी कर सकते हैं। लेकिन जो संपत्ति आप के पति ने अर्जित की है उस पर उन का कोई अधिकार नहीं है। आप के ससुर जी का यह कहने का कि वे अपने पुत्र को अपनी जायदाद से बेदखल करते हैं कोई अर्थ नहीं है।  यदि किसी जायदाद में आप के पति का अधिकार है तो उसे समाप्त नहीं किया जा सकता क्यों कि वह तो आप के पति के देहान्त के साथ ही आप का हो चुका है। यदि आप के ससुराल में कोई सहदायिकी पुश्तैनी जायदाद हो तो उस में भी आप के पति का अधिकार था। वह अधिकार अब आप के पति की मृत्यु के उपरान्त आप का है आप उस के लिए भी विभाजन का दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकती हैं। इस के लिए आप को स्थानीय वकील से सलाह करनी चाहिए और सहायता प्राप्त करनी चाहिए। आप के पास यदि मुकदमे लड़ने के लिए धन नहीं है तो आप जिला मुख्यालय पर जिला जज के कार्यालय में स्थापित विधिक सेवा प्राधिकरण में सहायता के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए। यह प्राधिकरण आप को निशुल्क वकील की मदद प्रदान कर सकता है तथा अन्य सहायता भी प्रदान कर सकता है।

बीमा पालिसी के नंबर के बिना उसे तलाश करना अत्यन्त दुष्कर काम है।  लेकिन फिर भी यदि आप को अपने पति की सही जन्मतिथि जो कि उन के सैकण्डरी बोर्ड के प्रमाण पत्र में दर्ज हो तो आप भारतीय जीवन बीमा निगम की किसी शाखा में जा कर अपने पति के नाम, पिता के नाम, निवास स्थान और जन्मतिथि के आधार पर बीमा पालिसी का पता कर सकती हैं तथा संबंधित शाखा और मंडल कार्यालय को लिख कर दे सकती हैं कि बीमा पालिसी की राशि का भुगतान आप के सिवा किसी अन्य को न किया जाए। आप को नौकरी से, ईपीएफ, जीपीएफ, बीमा पालिसी आदि से मिलने वाली धनराशि को आप के अलावा किसी भी अन्य व्यक्ति को भुगतान करने पर रोक लगाने के लिए आप के सास-ससुर को पक्षकार बनाते हुए अपने पति की उत्तराधिकारी होने के आधार पर तुरंत एक दीवानी वाद कर देना चाहिए जिस में आप को अस्थाई निषेधाज्ञा का यह आवेदन करते हुए अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करना चाहिए कि जब तक वाद का निपटार न हो जाए उक्त राशियों का भुगतान किसी को न किया जाए। उक्त सभी राशियों के लिए आप के नाम नॉमिनेशन न होने के कारण आप को जिला न्यायाधीश के न्यायालय से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र हासिल करना होगा।

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2 टिप्पणियाँ

  1. Comment by Ram Singh Suthar Advocate:

    बहुत बढ़िया जानकारी दी इसके लिए थैंक्स,sir

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  2. Comment by Alpana:

    बेहद ज़रुरी जानकारी जिसके अभाव में न जाने कितनी विधवाएँ बेबस,लाचार और दूसरों पर निर्भर हो चुकी हैं.

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