Archive for June 14th, 2017

व्यर्थ मुकदमे में भी प्रतिरक्षा करना जरूरी है।

June 14, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

शिवानी ने इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे ताऊजी का अपनी पत्नी से 2008 से घरेलू हिंसा का मुकदमा चल रहा है, जिस में न्यायालय ने सितम्बर 2016 में निर्णय देते हुए भरण पोषण के लिए 5000 रूपये प्रति माह देने और 20000 रुपए एक मुश्त क्षतिपूर्ति देने के लिए कहा है। ताऊजी सेंट्रल गवर्नमेंट के पेंशनर है और चलने फिरने उठने बैठने में असमर्थ है। उनके कोई संतान नहीं है। लड़का था, उसकी मृत्यु 2005 में रोड एक्सीडेंट में हो गयी थी। ताऊजी की देखभाल मेरी माँ करती है । वह भी केंद्रीय कर्मचारी है । मेरे पिताजी की भी मृत्यु हो चुकी है 1994 में। मेरे चाचा भी हैं हम सभी एक घर में रहते हैं। चाचा ने बटवारे का मुकदमा दर्ज किया था 2008 में, जिस में  प्राथमिक डिक्री 2011 में हुई जिसमें चाचा का एक तिहाई हिस्सा घोषित किया गया। फाइनल डिक्री के लिए मेरी माँ की तरफ से 2017 जनवरी में आवेदन दिया गया है जो विचाराधीन है। मैं जानना चाहती हूँ की क्या ताऊ जी के हिस्से में ताईं जी का भी हिस्सा बनता है? ताऊजी के मरने के बाद ताऊ जी ने अपनी रजिस्टर्ड वसीयत मेरे यानि अपनी भतीजी के नाम कर रखी है। ताईजी क्या हिस्से की मांग कर सकती है। डाइवोर्स का केस ख़ारिज हो चुका है। ताई जी का कहना है कि वह परेशान करने के लिए ये सब कर रही है, मुझे कुछ मिले न मिले वकीलो को दिलवाऊंगी और भरना पोषण के लिए और ज्यादा पैसों की मांग के लिए 127 में केस करुंगी। ताऊजी की जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है मार्गदर्शन करें।क्योंकि मेरी माँ ही उनकी देखभाल करती है तो यदि ताऊजी को कुछ हो जाता है तो उसमें मेरी माँ को तो कोई दिक्कत नहीं हो जायेगी। क्योंकि ताई जी ने माँ के ऊपर भी ताऊजी से सम्बन्ध के आरोप लगाए हैं।

समाधान-

केवल आरोप लगा देने से कोई चीज सिद्ध नहीं हो जाती। और कानूनी निर्णय और अधिकार ठोस सबूतों पर निर्भर करते हैं। आप की माँ पर आरोप लगा देने से उन का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। उन्हें कानून की तरफ से कोई परेशानी नहीं होगी। ताऊजी का जो हिस्सा है यदि उन्हों ने उसे वसीयत कर दिया है तो उस का दाय वसीयत के अनुसार होगा बशर्ते कि ताऊजी और कोई वसीयत न करें या की हुई वसीयत में अपने जीवनकाल में कोई बदलाव न करें।

जहाँ तक नाराज और बदले पर उतारू ताईजी का प्रश्न है तो वे कुछ भी कर सकती हैं। वे जितने चाहें मुकदमे करें। आप और आप की माँ पर उस का कोई असर नहीं होगा। हाँ वे यह कर सकती हैं ताऊजी के जीवनकाल के उपरान्त वसीयत को चुनौती दे दें। तब आप को फिजूल में मुकदमा लड़ना पड़ सकता है। आप को कोई अन्य फर्क नहीं पड़ेगा। पर यह भी याद रखें कि यदि किसी के विरुद्ध बेकार और बेदम मुकदमा भी होता है और उस में प्रतिरक्षा ठीक से न की जाए तो उस से नुकसान भी हो सकता है। इस लिए सावधान रहना और अपनी प्रतिरक्षा करने की सजगता रखना आप के लिए आवश्यक है।

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