Archive for August 13th, 2017

तलाक का आधार हो तो दूसरे पक्ष की सहमति की जरूरत नहीं।

August 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

नवीन ने साईखेड़ा, नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी को एक  साल हो चुका है। मेरी पत्नी छत से कूदने की, फाँसी लगाने की धमकी देती है। काम करने की मना कर चुकी है। शादी से पहले उसका अफ़ेयर रह चुका है। घर से 2 बार व मायके से 1 बार भाग चुकी है। एक रात कहीं रह चुकी है। 4 माह से उसका मानसिक इलाज़ करा रहा हूँ। दूसरों के सामने अच्छा व्यवहार करती है। तलाक की याचिका लगा दी है पर वो तलाक देने को तैयार नहीं है। क्या करूँ?

समाधान-

प के सवाल का छोटा सा जवाब है कि “मुकदमा लड़िए”।

आप की ही तरह मेरे पास ऐसे बहुत लोग समस्या ले कर आते हैं, जो यही कहते हैं कि मेरी पत्नी या पति तलाक के लिए राजी नहीं है। 1955 में हिन्दू मैरिज एक्ट प्रभावी होने के पहले तो भारत में कोई भी इस बात पर राजी नहीं था कि हिन्दू विवाह में तलाक होना चाहिए।

फिर हिन्दू मैरिज एक्ट आया तो उस में तलाक के प्रावधान आए जिन के अनुसार कुछ आधारों पर पति या पत्नी तलाक की मांग कर सकते थे, कुछ ऐसे मुद्दे थे जिन पर केवल पत्नी तलाक की मांग कर सकती थी। लेकिन कानून के अनुसार इस के लिए अदालत में आवेदन देना अनिवार्य था। पति की अर्जी पर पत्नी या पत्नी की मर्जी पर पति अदालत में सहमत भी होता था तो तलाक होना असंभव था। स्थिति यह थी कि जो भी तलाक लेना चाहता/ चाहती थी उसे जिस आधार पर तलाक चाहिए था उसे साक्ष्य के माध्यम से साबित करना जरूरी था। आधार मुकम्मल रूप से साबित होने पर ही तलाक मिल सकता था। तलाक का यह तरीका हिन्दू मैरिज में अभी भी मौजूद है।

फिर  1976 में सहमति से तलाक का प्रावधान आया। पहले यदि पति पत्नी दोनों सहमत होते हुए भी तलाक लेने जाते थे तब भी कम से कम एक पक्ष को विपक्षी के विरुद्ध तलाक के आधार को साक्ष्य से साबित करना पड़ता था। अब दोनों पक्षों के सहमत होने पर इस की जरूरत नहीं रह गयी। बस सहमति से तलाक का आवेदन पेश करें और छह माह बाद भी सहमति बनी रहे तो अदालत तलाक की डिक्री प्रदान करने लगी।

तो नवीन जी¡ तो कुछ समझ आया? आप के पास तलाक के लिए आधार मौजूद है। आपने अपनी समस्या में जो बातें लिखी हैं उन में से शादी के पहले के अफेयर की बात के सिवा सारी बातें अदालत में साबित कर देंगे तो आप को तलाक की डिक्री मिल जाएगी। उस के लिए पत्नी की सहमति की जरूरत नहीं है। बस ये है कि कुछ समय अधिक लगेगा।

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बँटवारा कैसे किया जाए?

August 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

नटवर साहनी ने गोबरा नवापारा, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

क्या पैतृक सम्पति का बँटवारा करवाने पर बटवारा करने वाला जीवित न रहने पर मान्य रहता है?  क्या बटवारा नामा बिना पंजीकृत मान्य रहता है? क्योंकि वह पंजीकृत करवाने में असहाय है।

समाधान-

किसी भी साझी संपत्ति का बँटवारा आपसी सहमति से हो सकता है। यदि साझीदार या परिवार किसी एक व्यक्ति के द्वारा सुझाए गए बंटवारे पर सहमत हों तो वैसे भी किया जा सकता है। पर सभी साझीदारों की सहमति जरूरी है। एक बार बँटवारा हो जाने पर और सब के अपने अपने हिस्से पर काबिज हो जाने पर एक लंबे समय तक स्थिति वैसे ही बने रहने पर उस बँटवारे को चुनौती देना संभव नहीं होता है।

यह बँटवारा मौखिक हो कर बँटवारे के अनुसार संपत्ति का कब्जा सब को मिल जाने पर उस का निष्पादन हो जाता है। बँटवारे के कुछ समय बाद चाहेँ तो सारे साझीदार बँटवारे का स्मरण पत्र लिख कर उस पर सभी के हस्ताक्षर और गवाहों के हस्ताक्षर करवा कर उसे नौटेरी से प्रमाणित करा कर रख सकते हैं इसे भविष्य में किसी भी  मामले में साक्ष्य में प्रस्तुत किया जा सकता है।

बँटवारा यदि लिखित में होता है तो उस का पंजीकृत होना आवश्यक है, यदि वह पंजीकृत न हुआ तो भविष्य में साक्ष्य में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में उस दस्तावेज का कोई महत्व नहीं रह जाता है।

बेहतर यह है कि बँटवारा पंजीकृत हो। यदि नहीं होता है तो बँटवारा मौखिक हो और बँटवारे के मुताबिक संपत्ति पर पृथक पृथक कब्जे दे दिए जाएँ और उस के बाद बँटवारे का स्मरण पत्र नौटेरी से निष्पादित करा लिया जाए तो वह पर्याप्त है।

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