Archive for October 1st, 2018

समस्या-

अभी मेरी बुआ ने मेरे पिताजी के साथ तीनों भाइयो पर केस किया है खेती की जमीन पर जो मेरे दादा जी से मिली है। यह जमीन मेरे दादा जी को मेरे पड़दादा जी से गोद के रूप में मिली थी। मेरे दादा जी की मृत्यु 2000 में हुई और मेरे दादा जी की मृत्यु के बाद सभी खसरा में मेरे पापा और तीनों भाइयों का नाम आ गया। जब प्रशासन हमारे गांव में आये तब मेरी बुआ ने कॉल पर जमीन लेने से मना कर दिया। उस समय ना हमने उनसे किसी पेपर पर सिग्नेचर करवाया। इतने सालों बाद में मेरी बुआ ने केस फ़ाइल किया है। मैंने सुना है कि हिन्दू उत्तराधिकारी कानून 2005 में बेटी का जमीन पर अधिकार नही होता। अब आगे हम क्या करे कृपया आप हमें बताएं।

– गजेंद्र सिंह, पाली, राजस्थान

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार और सहदायिक संपत्ति के संबध में बहुत गलत धारणाएँ लोगों के बीच पैठी हुई हैं। यह माना जाता रहा है कि यदि किसी हिन्दू पुरुष को कोई संपत्ति उस के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में मिली है तो वह पुश्तैनी संपत्ति है और उस में पुत्रियो को कोई अधिकार नहीं है और यह अधिकार 2005 में ही उन्हें प्राप्त हुआ है।

यह पुश्तैनी शब्द ही हमें भ्रम में डालता है। तो आप को समझना चाहिए कि वह पुश्तैनी संपत्ति जिसमें पुत्र का जन्म से अधिकार होता है वह क्या है? इस के लिए आप को तीसरा खंबा की पुश्तैनी संपत्ति से संबंधित महत्वपूर्ण पोस्ट “पुश्तैनी, सहदायिक संपत्तियाँ और उन का दाय” पढ़नी चाहिए। जिस से आप समझ सकें कि यह पुश्तैनी या सहदायिक संपत्ति क्या है। आप इसे लिंक को क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

उक्त पोस्ट पढ़ कर आप को पता लग गया होगा कि आप ने जिस संपत्ति पर प्रश्न किया है वह पुश्तैनी है या नहीं है।

यह सही है कि पुत्रियों को 2005 के संशोधन से ही पुत्रों के समान सहदायिक संपत्ति में जन्म से अधिकार प्राप्त हुआ है, लेकिन 2005 के पहले भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-6 मे यह उपबंध था कि यदि किसी सहदायिकी के किसी पुरुष सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो उस का दाय उत्तरजीविता से तय होगा। लेकिन यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई भी स्त्री हुई तो उस के सहदायिक संपत्ति में हिस्से का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 से तय होगा न कि मिताक्षर विधि के उत्तरजीविता के नियम के आधार पर। इस तरह 2005 के पूर्व भी पिता की मृत्यु पर पुत्री को उस की संपत्ति में धारा-8 के अनुसार हिस्सा मिलता था लेकिन वह सहदायिकी की सदस्य नहीं होती थी।

इस तरह पूर्व में जो नामान्तरण हुआ है वह गलत हुआ क्यों कि उस में आप की बुआ का हिस्सा तय नहीं हुआ था। आप की बुआ ने जो मांग की है वह सही है वह हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी है।

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