डी अजित के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का कोई निर्णय नहीं है
कल तीसरा खंबा पर आलेख नहीं था, केवल जनादेश में प्रकाशित आलेख ब्लागर और वेब पत्रकार भी कानूनी दायरे में की सूचना मात्र थी। इस आलेख पर सात टिप्पणियाँ तीसरा ... Continue Reading
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ब्लागर हैं तो क्या? कानून से ऊपर नहीं
दिनेशराय द्विवेदीकल से ही डी अजित के मामले की ब्लाग जगत में चर्चा है। पर्याप्त प्रयत्न करने के उपरांत भी इस मामले में दिया गया सर्वोच्च न्यायालय का मूल आदेश ... Continue Reading
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जुगाड़ को कानूनी मान्यता क्यों नहीं
कुछ दिनों पूर्व मैं अपनी ससुराल अकलेरा, जिला झालावाड़ (राजस्थान) गया था। विवाह में सामानों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लेजाने का बहुत काम होता है। इस काम ... Continue Reading
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नियुक्तियों के अभाव में रिक्त पड़ी अदालतें और भटकते न्यायार्थी
तीसरा खंबा लगातार यह बताता रहा है कि न्यायालयों की कमी के कारण किस तरह आम न्यायार्थी को बरसों तक न्याय नहीं मिल पा रहा है। विगत दिनों भारत के ... Continue Reading
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न्याय व्यवस्था से टूटता मोह : सरकारें जल्दी चेत जाएँ ___
जिस बात का मुझे कुछ बरसों से अंदेशा था वह सामने आ ही गई। आज अदालत ब्लाग पर खबर है कि चंडी गढ़ में चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन पर मुकदमे ... Continue Reading
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अपराधों के अन्वेषण, अभियोजन और अदालतों की पर्याप्तता और स्वतंत्रता-स्वायत्तता के बारे में सोचा जाना जरूरी है
एस. एन. विनोद जो नागपुर के प्रधान संपादक दैनिक 'राष्ट्रप्रकाश' एवं समूह संपादक- मराठी 'दैनिक देशोन्नती' ने अपने ब्लाग चीरफाड़ पर अपने आलेख फिर फैसला हुआ, न्याय नहीं ! ... Continue Reading
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पुलिस क्यों कहती है कि चोरी के बजाय खोना लिखवाइए?
Posted On 15 Feb 2009 By दिनेशराय द्विवेदी. Under कानूनी सलाह.
कामोद पूछते हैं ..... हमारे एक मित्र, जिनके ID Proof खो गये हैं, जिनमें पैन कार्ड, ड्राईविंग लाइसेंस और वोटर पहचान पत्र राह चलते किसी ने चुरा लिया। जिसकी लिखित शिकायत ... Continue Reading
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