उत्तराधिकार Archive

समस्या-

जमीला खातून ने सीतापुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति ने एक जमीन 1998 में खरीदी थी। मेरे पति की मृत्यु हो गयी। उन से मेरी चार लड़कियाँ हैं। मेरा और मेरी लड़कियों का जमीन में कितना कितना हिस्सा होगा। मेरे देवर जो मेरे पति के सगे भाई हैं उन का क्या हक है, जब कि वह जमीन उन की पुश्तैनी नहीं है यह जमीन मेरे पति ने अकेले ही खरीदी थी। कृपया मुस्लिम ला के मुताबिक पूरी जानकारी दें।

समाधान-

मुस्लिम व्यक्तिगत विधि में पुश्तैनी जमीन जैसा कोई सिद्धान्त नहीं है और कोई संपत्ति पुश्तैनी नहीं होती। जो भी संपत्ति होती है वह व्यक्तिगत होती है हाँ यदि किसी मृतक व्यक्ति की संपत्ति का बंटवारा न हो और किसी उत्तराधिकारी की पहले ही मृत्यु हो जाए तो वैसी संपत्ति में मृतक का हित बना रहता है और वह उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाता है। इस तरह आप के पति की जमीन चाहे उन्हों ने खुद खरीदी हो या पूर्वजों से प्राप्त हुई है वह व्यक्तिगत ही है।

मुस्लिम विधि के अनुसार आप के पति की संपत्ति में से 1/8 आप को, 2/3 सभी लड़कियों को मिला कर और 1/6 हिस्सा आप के पति के भाई अर्थात आप के देवर को मिलेगा। शेष बचा हुआ हिस्सा भी लड़कियों को मिलेगा। आप अपने पति की संपत्ति के 24 हिस्से बनाएँ, उस में से 3 हिस्से आप के, 4 हिस्से आप के देवर के तथा 17 हिस्से लड़कियों को संयुक्त रूप से प्राप्त होंगे।। प्रत्येक लड़की को कुल संपत्ति का 4.25 हिस्सा मिलेगा।

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समस्या-

श्वेता ने जबलपुर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है

मेरी बड़ी दीदी की शादी जबलपुर में हुई है उनको 25 साल हो गये। शादी के बाद से जीजाजी मज़दूरी करते हैं इसलिए ज़्यादा इनकम नहीं होती जिससे कि वो अपना स्वयं का घर बना सकें। लेकिन उनके फादर का बहुत बड़ा मकान है, उनकी 3 बेटियाँ हैं जिस में से एक बेटी ने शादी नहीं की हैं और वह जबलपुर हाईकोर्ट में एडवोकेट भी है। 4 बेटे हैं जिस में से किराए के मकान में रहते हैं। उनकी बेटी जो एडवोकेट है और 45 वर्ष  की है ने उनको घर से निकालने के लिए उच्च न्यायालय में  मुक़दमा कर दिया है की मेरी दीदी उनको गाली देती है, लड़ाई करती है इसलिए हम इनको अपनी प्रॉपर्टी से बेदखल करते हैं। इनसे हमारा कोई लेना देना नहीं है। मेरी दीदी हमेशा से ही अत्याचार सहते आई है, उसे कई बार मारा पीटा भी, लेकिन उसने कभी कोई एक्शन नहीं लिया। हमेशा इज़्ज़त को लेकर चलती थी जिसकी वजह से उन्हें आज ये सब देखना पड़ रहा है? क्या बेटे का अपने पिता की संपत्ति पर कोई हक नहीं होता? यदि पिता चाहे तो ही उसे हक मिलेगा और न चाहे तो नहीं? क्या फादर की इच्छा से ही प्रॉपर्टी का बटवारा हो सकता है।

समाधान-

प की बहिन की समस्या का हल आप को संपत्ति के बंटवारे में  नजर आता है। लेकिन यह संपत्ति तो आप के जीजाजी को तभी मिल सकती है जब कि वह संपत्ति सहदायिक हो और उस में आप के जीजाजी का हक हो। तीसरा खंबा पर आप सर्च करेंगी तो आप को यह मिल जाएगा कि संपत्ति सहदायिक कब हो सकती है। यदि यह संपत्ति 60-70 वर्ष पुरानी है और 17 जून 1956 के पूर्व आप के जीजाजी के पिता या उन के पिता या दादा जी को उन के पिता से उत्तराधिकार में  मिली हो तो ही वह सहदायिक हो सकती है।

यदि आप के जीजाजी के परिवार की यह संपत्ति सहदायिक है तो उस में जन्म से आप के जीजाजी का अधिकार हो सकता है और आप के जीजाजी उस का बंटवारा करने तथा अपने हिस्से की संपत्ति पर कब्जा प्राप्त करने का दावा कर सकते हैं। इस के लिए आप के जीजाजी को दीवानी कानून के जानकार किसी अच्छे वकील से मिल कर अपनी समस्या बतानी चाहिए।

लेकिन यदि उक्त संपत्ति आप के जीजाजी के पिता की स्वअर्जित संप्तति हुई तो उस में आप के जीजाजी का कोई हक नहीं है और उन्हें उस संपत्ति से पिता के जीवनकाल में कुछ नहीं मिलेगा। यदि पिता उन की संपत्ति की कोई वसीयत कर गए और उस में आप के जीजाजी को कुछ नहीं दिया तो उन्हें कुछ नही मिलेगा। यदि पिता की मृत्यु के उपरान्त कोई संपत्ति निर्वसीयती शेष रही तो उस में से आप के जीजाजी को कोई हिस्सा मिल सकता है।

 

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समस्या-

मोहित ने सहारनपुर उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी उम्र २७ वर्ष है।. मेरा एक बड़ा भाई है जो मुझसे १ या दो साल बड़ा होगा, उसकी शादी हो चुकी है। वो पिताजी के साथ रहता है ओर मैं माता जी के साथ। मेरी माता जी मेरे जन्म के वर्ष से ही ससुराल पक्ष द्वारा मारपीट किए जाने के कारण अपने मायके आ गई थी। सुलह की तमाम कोशिशों के बाद पिता जी पर मारपीट ओर भरण-पोषण का मुक़दमा दर्ज किया गया। आज २७ साल बाद भी वो मुक़दमा चल रहा है। वो थोड़ा बहुत खर्च देते है कोर्ट के द्वारा। पर इसी बीच उन्होने (वर्ष २००० के लगभग) दूसरी शादी कर ली और दूसरी पत्नी से उनको एक पुत्र, एक पुत्री है। दूसरी पत्नी, दोनो बच्चे और मेरा बड़ा भाई पिताजी के साथ ही हरियाणा के गाँव में रहते हैं जहा पिता जी का बाकी परिवार भी रहता है। ज़मीन जयदाद के नाम पर कुछ नहीं हैं केवल मकान हैं (मेरे संज्ञान मे) जिसपर मैं दावा कर सकूँ। मैंने अपना घर सहारनपुर में बना लिया है जो की मेरी मम्मी के नाम है। मैं उनपर कार्यवाही चाहता हूँ कि उन्होंने अपनी पत्नी और पुत्र के लिए कुछ नहीं किया और बिना तलाक़ लिए दूसरी शादी कर ली है। इसके लिए मुझे क्या करना होगा और क्या सबूत पेश करने होंगे।

समाधान-

प ने जिस तरह तथ्य सामने रखे हैं उस से पता लगता है कि आप अपने पिता पर कोई मुकदमा करते हैं तो भी आप को कुछ हासिल नहीं होगा। लगता है आप के मन में पिता से बदला लेने की भावना है, यह होना स्वाभाविक भी है। आखिर आप का भी हक था पिता पर। पर किसी भी तरह से बदले की भावना तो उचित नहीं है।

पहला अपराध आप के पिता ने आप की माताजी के प्रति किया था। माताजी उन के विरुद्ध दूसरी शादी के लिए पुलिस में जा सकती थीं और उन्हें सजा हो सकती थी। पर या तो माताजी ने ऐसा करना ठीक नहीं समझा या फिर पुलिस ही यह साबित करने में असमर्थ रही कि आप के पिताजी की दूसरी शादी शादी न हो कर केवल लव इन रिलेशन है। और कोई अपराधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती।

संपत्ति के नाम पर आप के पिता के पास मकान हैं। हो सकता है वे संयुक्त संपत्ति हों। यह भी हो सकता है कि आप की माताजी के भय से उन संपत्तियों में से पिता ने अपना अधिकार अलग कर लिया हो जिस से आप की माताजी या आप हक न जता सकें।

आप ने अपनी और अपनी माँ के लिए एक अलग दुनिया बना ली है। वह बेहतर है। पिता से बदले के चक्कर में न पड़ें। इस से आप अपने लिए बेवजह परेशानियाँ मोल लेंगे, मिलेगा कुछ नहीं। एक सलाह बिना मांगे दे रहे हैं कि आप ने अपना पैसा लगा कर सहारनपुर में जो मकान बनाया है वह माताजी के नाम से है। उसे अपने नाम हस्तांतरित करवा लें या फिर उस की पंजीकृत वसीयत अपने नाम करवा लें। आप की माताजी अभी भी आप के पिता की पत्नी हैं जिस के कारण पिता उन के उत्तराधिकारी हो सकते हैं। आप का बड़ा भाई तो उत्तराधिकारी है ही। ऐसी कोई व्यवस्था न होने पर माताजी के देहान्त के बाद आप का बड़ा भाई और पिता दोनों इस मकान में आप से हिस्सा मांग सकते हैं। इसे गंभीरता से लें।

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समस्या-

धर्मेन्द्र सिंह ने बालोतरा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी का मकान है जिनकी मृत्यु हो गयी है। अब इस मकान पर उनका छोटा पुत्र कब्जा करना चाहता है। मेरी दादीजी जिंदा है वो यह मकान नहीं देना चाहती हैं। ये मकान दादीजी के नाम करवाना है और उनके छोटे पुत्र को बाहर निकलना है। इसके लिए मैं क्या करुँ?

समाधान-

प के दादा जी का देहान्त होने के पहले उन्हों ने कोई वसीयत नहीं की है। आप के दादा जी के देहान्त के साथ ही उन का उत्तराधिकार खुल गया है औोर उन की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उन के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो चुकी है। आप के दादा जी के उत्तराधिकारी, उन के पुत्र, पुत्रियाँ, मृत पुत्र/ पुत्रियों की पत्नी/ पति और उन की संतानें, उन की पत्नी (आप की दादीजी) हैं। ये सभी उस मकान के संयुक्त रूप से स्वामी हो चुके हैं। आप के दादाजी के छोटे पुत्र को भी उस मकान के स्वामित्व में हिस्सेदारी प्राप्त हुई है। इस हिस्सेदारी से उसे अलग नहीं किया जा सकता।

आप की दादी या अन्य कोई भी उत्तराधिकारी यह कर सकता है कि मकान के बंटवारे का दावा करे और सब को अलग अलग हिस्सा देने की राहत प्रदान करने की मांग करे, या फिर यह भी राहत मांगी जा सकती है कि आप के दादाजी के छोटे पुत्र को उस के हिस्से की कीमत अदा कर के उस मकान से बेदखल करने की डिक्री की मांग की जाए। इस बीच अस्थाई निषेधाज्ञा जारी कराई जा सकती है कि दादाजी का छोटा पुत्र न्यूसेंस पैदा न करे। यदि वह फिर भी कुछ गड़बड़ करता है या तंग करता है तो दादी जी की ओर से महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा का प्रतिषेध अधिनियम में कार्यवाही की जा सकती है।

 

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हक तर्क करना या रिलीज डीड निष्पादित करना क्या है?

June 15, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

सुरेन्द्र पाल सिंह ने बालोतरा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या किसी नाबालिग (18 वर्ष से कम) के नाम जमीन का हक तर्क किया जा सकता हे? हक तर्क करने के नियम क्या है ?  हक तर्क से सम्बंधित नियम और कानून की जानकारी कौन सी किताब या नियमावली या अधिनियम में मिल सकती है? जानकारी प्रदान करवाने की कृपा करावे।

समाधान-

क तर्क करना अथवा रिलीजी डीड निष्पादित करने का अर्थ है किसी संपत्ति में अपने अधिकार को किसी दूसरे के हक में छोड़ देना है। लेकिन  इस के लिए जरूरी है कि जो हक तर्क कर रहा है और जिस के हक में हक तर्क किया जा रहा है दोनों एक ही सम्पत्ति में हिस्सेदार हों और संपत्ति संयुक्त हो। जैसे किसी व्यक्ति के देहान्त के उपरान्त उत्तराधिकार में संपत्ति उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाती है। तब कोई एक या अधिक उत्तराधिकारी किसी दूसरे उत्तराधिकारी के हक में अपना हक छोड़ सकते हैं। दो लोगों ने संयुक्त रूप से संपत्ति खरीदी हो और दोनों संयुक्त स्वामी हों तो उन में से एक दूसरे के हक में हक त्याग कर सकता है।
हक तर्क करने वाले का वयस्क होना जरूरी है।  जिस के हक में हक तर्क किया जा रहा है उस का बालिग होना जरूरी नहीं है वह नाबालिग हो सकता है। हक तर्क करना एक प्रकार से संपत्ति का हस्तान्तरण है और 100 रुपए से अधिक मूल्य की अचल संपत्ति के हस्तान्तरण का पंजीकरण होना जरूरी है। यदि हक तर्क की जाने वाली सम्पत्ति का मूल्य यदि 100 रुपए से अधिक है और वह अचल संपत्ति है तो हक तर्क करने के दस्तावेज का पंजीकृत होना जरूरी है।
हक तर्क करने / रिलीज डीड निष्पादन के मामले में दो अधिनियम सामने हैं। एक तो संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम और दूसरा पंजीकरण अधिनियम। पंजीकरण के लिए स्टाम्प ड्यूटी और फीस का पता करना भी जरूरी है क्यों कि रिलीज डीड पर पंजीकरण शुल्क अन्य हस्तान्तरणों से कम है।

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समस्या-

ना़जिया खान ने लखनऊ, उत्तर प्रदेश  से भेजी है कि-

क्या सरकारी नौकरी वाला बिना सरकारी इजाजत के दूसरी शादी कर सकता है? और दूसरी बात ये कि क्या पीएफ में जिस का नाम नौमिनी के रूप में दर्ज  है उसी को मिलता है?

समाधान-

दि किसी व्यक्ति की पर्सनल लॉ में दूसरा विवाह करना अवैध नहीं है तो वह व्यक्ति दूसरा विवाह कर सकता है। यदि किसी नौकरी के नियमों में यह शर्त है कि वह दूसरा विवाह बिना अनुमति के नहीं कर सकता तो वैसी स्थिति में दूसरा विवाह करने के बाद शिकायत हो जाने पर ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध नौकरी मेें अनुशासनिक कार्यवाही की जा सकती है और परिणाम स्वरूप नौकरी से बर्खास्त किया जा सकता है। लेकिन यदि उस की मृत्यु हो गयी है तो फिर कुछ भी नहीं किया जा सकता।

यदि कोई आपत्ति नहीं करे तो पीएफ अर्थात भविष्यनिधि की राशि नौमिनी को ही दी जाती है। लेकिन नौमिनी के पास यह राशि एक ट्रस्टी के रूप में होती है और नौमिनी की यह जिम्मेदारी होती है कि वह इस राशि को उस के उत्तराधिकारियों में नियम के अनुसार वितरित कर दे। यदि किसी उत्तराधिकारी को आशंका हो कि नौमिनी सारी राशि उस के उत्तराधिकारियों को देने के बजय खुद रख सकता है तो वे उस की विभाग को शिकायत कर सकते हैं और जिला न्यायाधीश के यहाँ उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं और पीएफ की राशि के भुगतान को रोकने का आदेश जिला न्यायाधीश से प्राप्त कर सकते हैं।

 

 

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समस्या-

पंकज पच्चीगर ने सूरत, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरे मामाजी जो अविवाहित थे, उनकी डेथ हो चुकी है, उनकी संपति के 6 हिस्सेदार हैं ,उन में से 1 हिस्सेदार को ज्यादा हिस्सा चाहिये। ये बहाना करके हिस्सा बांटने को मना कर रहा है क्यों कि कुल संपत्ति के १५% जो शेयर्स और बैंक डिपोजिट है उस में नोमिनी के तौर पर उसका नाम है। अब उस के मना करने के बाद हम कैसे अपना हिस्सा पाएँ?

समाधान-

मृतक की 15% संपत्ति में एक उत्तराधिकारी के नोमिनी होने के कारण संपत्ति में ज्यादा हिस्सा चाहना पूरी तरह अनुचित है। नोमिनी वस्तुतः मृतक की संपत्ति का ट्रस्टी मात्र होता है। वह संपत्ति को बैंक आदि से प्राप्त तो कर सकता है लेकिन संपत्ति पर स्वामित्व सभी उत्तराधिकारियों का बना रहता है। यह नॉमिनी का दायित्व है कि वह संपत्ति को प्राप्त कर उस के उत्तराधिकारियों को कानून के अनुसार प्रदान करे। पर बेईमानी आ जाने के कारण हो सकता है कि वह व्यक्ति चुपचाप इस जुगाड़ में लगा हो कि जितनी जल्दी हो उतना वह इस 15% संपत्ति पर कब्जा कर ले।

आप को चाहिए कि आप उक्त संपत्ति जिस में वह नौमिनी है उस का उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए जिला न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर दें उस के साथ ही मृतक की संपत्ति के विभाजन का वाद भी जिला न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें और इस वाद में संपत्ति को खुर्द-बुर्द न करने की निषेधाज्ञा सभी उत्तराधिकारियों के विरुद्ध प्राप्त करें। इसी वाद में बंटवारा होने तक संपत्ति को किसी रिसीवर के आधिपत्य में रखे जाने व संपत्ति के लाभों को सुरक्षित रखे जाने के लिए भी आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है।

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समस्या-

नीलम खन्ना ने मनीमाजरा, चंडीगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी को उनके पिताजी से साल 1911 में संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। मेरे पिताजी को दादा जी से उनकी संपत्ति साल 1971 में उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। हम दो भाई बहन हैं। मेरे पिताजी ने सारी संपत्ति की वसीयत मेरे भाई के बेटे के नाम कर दी, मेरे पिताजी के देहांत के बाद सारी संपत्ति मेरे भतीजे के नाम हो गई। मैंने जुलाई 2016 में अपने हिस्से के लिए केस दायर किया, मैंने संपत्ति को बेचने से रोकने के लिए अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन किया, लेकिन उस समय मेरे पास संपत्ति का पिछला रिकॉर्ड ना होने के कारण अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन रद्द हो गया। मैंने अब पिछला सारा रिकॉर्ड निकलवा लिया है क्या मैं अब दोबारा अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन कर सकती हूँ? क्या मुझे अपना हिस्सा मिल सकता है?

समाधान-

प के द्वारा दिए गए विवरण से यह स्पष्ट है कि उक्त संपत्ति सहदायिक है। आप ने विवरण में यह नहीं बताया है कि आप के पिताजी की मृत्यु कब हुई है। यदि आप के पिता जी की मृत्यु. 2005 के बाद हुई है तब आप को 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में हुए संशोधन से इस सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त हो चुका था। उस वक्त आप के पिता केवल अपने हिस्से की वसीयत कर सकते थे न कि पूरी संपत्ति की। इस प्रकार आप का हिस्से का दावा सही है आप को हिस्सा मिलना चाहिए।

दावा तो पहले भी हिस्से का ही हुआ होगा। अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन तो उसी दावे में प्रस्तुत किया गया होगा। यदि वह दावा अभी चल रहा है तो उसी दावे में अस्थाई निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र पुनः प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि दावा भी आप ने खारिज करवा लिया है या अदम हाजरी अदम पैरवी में खारिज हो चुका है तो उस का रिकार्ड देख कर तय करना पड़ेगा कि उसे दुबारा किस प्रकार किया जा सकता है। बेहतर है आप वहीं दीवानी मामलों के किकसी अच्छे वकील से सलाह कर आगे कार्यवाही करें।

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समस्या-

प्रशान्त ने ग्राम नूरपुर, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे दादाजी चार भाई थे जिस में एक निस्सन्तान थे। मेरे दादा जी से पहले उन के दो भाइयों की मृत्यु हो गयी। उन के हिस्से कि संपत्ति उन के उत्तराधिकारियों को मिल गयी। 2004 में निस्सन्तान दादाजी की संपत्ति मेरे दादाजी को मिल गयी।  अब 2012 में मेरे दादाजी की भी मृत्यु हो गयी। उन की संपत्ति हमारे नाम आ गयी। अब मेरे दादा जी के भाई का लड़का बोलता है कि मेरा भी हिस्सा था इस में, तो क्या 29.06.2004 को  भाई का हक भतीजे को भी मिलता था?

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में कोई व्यक्ति निस्सन्तान मर जाए और उस की पत्नी और पिता भी जीवित न हों तो फिर उस की सम्पत्ति जीवित भाई को ही प्राप्त होगी।  इस तरह आप के दादा जी के भाई की मृत्यु पर आप के दादा जी को प्राप्त हुई वह सही थी। उस में मृत भाई के पुत्र का का कोई हिस्सा नहीं था।

लेकिन यदि दादाजी के निस्संतान भाई की संपत्ति में उत्तरप्रदेश में स्थित कोई कृषि भूमि है तो उस भूमि का उत्तराधिकार उ.प्र. जमींदारी विनाश अधिनियम से तय होगा और उस स्थिति में पूर्व मृत भाई के पुत्र को भी हि्स्सा पाने का अधिकार है। यह विधि 29.06.2004 को भी प्रचलित थी।

 

 

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हकत्याग विलेख को पंजीकृत कराए बिना हकत्याग संभव नहीं है।

May 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

छैल कँवर ने मेवानगर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं  मेरे पिता और माता की एकमात्र सन्तान हूँ। मेरे पिता का देहांत मेरे जन्म से पहले ही हो गया था। जिससे समस्त जमीन मेरे माताजी के नाम हो गई। मेरी माताजी का देहांत 1883 में हो गया उस समय में ससुराल में थी। मेरे कोई भाई या बहन नहीं है, जिसके कारण जमीन का नामानतरण मेरे नाम होना था। लेकिन मेरे दादाजी के भाई के बेटे ने जो उस समय सरपंच थे वे मेरे ससुराल आये और मुझे ये कहा कि आप मेरे साथ चलो आपकी जमीन आपके नाम करवा रहे हैं। वो मुझे एक वकील के पास लेकर गए और एक स्टाम्प पर अंगूठा लगवाया। मुझे अब पता चला हे की उन्होंने उस स्टाम्प के आधार पर मेरी समस्त जमीन अपने बेटे के नाम हकतर्क करवा ली जो उस समय मात्र 14 साल का था। जब मैंने रिकॉर्ड निकलवाया तो उसके फोतगी में पटवारी ने लिखा था की “असन कँवर (माताजी) के फौत होने पर उनकी बेटी छेल कँवर (स्वयं) इकरार नामा 7 रूपये के स्टाम्प पर मनोहरसिंह (जिसके नाम हकतर्क किया गया उम्र 14 साल) के हक में ओथ कमिश्नर द्वारा 28.1.1983 को तस्दीक दस्तावेज पर नामान्तरण खोला गया।” श्रीमान में निम्न सवालों के जवाब जानना चाह रही हूँ- 1. क्या 1983 मैं ओथ कमिश्नर द्वारा जारी स्टाम्प के आधार पर नामन्तरण खोला जा सकता था? 2. क्या मेरे दादाजी के भाई के बेटे के बेटे के नाम हक तर्क हो सकता था जो उस समय 14 साल का था?  न ही वो मेरे पिताजी द्वारा गोद लिया पुत्र है। 3.श्रीमान मैं एक निरक्षर महिला हूँ। मुझे धोखे से एक बार वकील के आगे एक स्टाम्प पर अंगूठा लगवाया था इसके अलावा मैंने न तो किसी पटवारी, तहसीलदार, या रजिस्ट्रार के आगे कोई अंगूठा लगाया हे। 4. मेरी माताजी का देहांत मेरे ननिहाल में 1983 में हुआ था, में अब उनका मृत्यू प्रमाण पत्र बनवाना चाहती हूँ लेकिन मेरे पास उनकी मृत्यु या उनसे सम्बंधित कोई दस्तावेज नहीं है? उचित सलाह प्रदान करें।

समाधान-

नामान्तरण से कभी भी किसी संपत्ति का टाइटल निर्धारित नहीं होता। चूंकि आप को अब पता लगा है कि नामान्तरण आप के नाम होने के स्थान पर आप के दादा जी भाई के पुत्र ने अपने पुत्र के नाम नामान्तरण खुलवा लिया है। इस कारण अब आप तुरन्त नामान्तरण के आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त कर उस आदेश के विरुद्ध अपील कर सकती हैं।

हकत्याग एक प्रकार का अचल संपत्ति का हस्तान्तरण है इस कारण उस का उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत होना अनिवार्य है। इस तरह नोटेरी के यहाँ तस्दीक किए गए हकत्याग के विधि विपरीत विलेख के आधार पर नामान्तरण खोला जाना पूरी तरह गलत है।

आप को चाहिए कि राजस्व (खेती-बाड़ी) की जमीनों का काम देखने वाले किसी अच्छे वकील को अपने सारे दस्तावेज दिखाएँ और नामान्तरण की अपील प्रस्तुत करें। आप टाइटल के आधार पर भी राजस्व रिकार्ड में संशोधन और जमीन का कब्जा दिलाए जाने के लिए दावा प्रस्तुत कर सकती हैं। लेकिन जो भी करें अपने वकील को समस्त दस्तावेज दिखा कर उन की राय के अनुसार काम करें।

हक त्याग सिर्फ और सिर्फ किसी भी संपत्ति के सहस्वामी के हक में किया जा सकता है। उक्त भूमि की आप एक मात्र स्वामी थीं। इस कारण से किसी भी व्यक्ति के नाम आप के दादा जी के भाई के पोते के नाम  भी हकत्याग होना संभव नहीं था। इस कारण भी वह हक त्याग वैध नहीं है।

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