कब्जा Archive

संपत्ति पर आप का कब्जा है तो आप को अदालत जाने की जरूरत नहीं।

January 17, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

महेश ने खंडवा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे नानाजी का तीन कमरो का पुराना मकान था। अब उसे तोड़कर मेरी मौसी और माताजी के सहयोग से ये मकान नया बना लिया। मेरे तीनो मामाओ ने जब  मकान बन रहा था तब किसी ने आपत्ति नही ली। मैं उस वक्त पढ़ाई के लिये इंदौर गया था। अब हम उस मकान में चार साल से रह रहे हैं। मेरा बड़ा मामा कह रहा है कि तुम कब्जा करने आ गये हो, तुम्हारा क्या हे यहाँ से निकलो। हमारी मकान की रजिस्ट्री भी नहीं है अब हम क्या कानूनी कार्यवाही करें?

समाधान-

कान तो नाना जी का था जिसे गिराया गया था। फिर आप की माता जी और मौसी के सहयोग से बनाया गया। मामाओं का भी कुछ तो सहयोग रहा होगा। उस मकान में अब कौन कौन रहते हैं यह भी आपने नहीं बताया। जब तक पूरा विवरण न हो पूरा समाधान भी संभव नहीं है। नानाजी अब शायद नहीं हैं। यदि हैं तो मामाजी आप को उस मकान से नहीं निकाल सकते। यदि नहीं हैं तो उस मकान के जितने हिस्से का स्वामी हर मामा है उतने ही हिस्से के मालिक आप की माँ और मौसी हैं। इस कारण यदि उस मकान पर कब्जा है तो वे आप को उस मकान से नहीं निकाल सकते। जैसे बड़े मामान ने कहा है वैसे आप की माँ और मौसी कह सकती हैं कि तुम निकलो मकान हमने बनाया है। जिस के पास संपत्ति का कब्जा है उसे अदालत में जाने की जरूरत नहीं है। जिस के पास संपत्ति का कब्जा नहीं है उसे अदालत जाने दें।

यदि मामाजी कुछ गड़बड़ करें तो मौसी और माताजी अदालत में इस आशय का वाद संस्थित कर सकती हैं कि वे भी मकान में हिस्सेदार हैं और उन्हें मकान से न निकाला जाए। पह हमारी राय है कि अदालत में आप की माँ व मौसी न जाएँ। मामा को अदालत में जाने दें। मौसी व माताजी ने निर्माण में जो खर्च किया उस का हिसाब और सबूत हो तो संभाल कर रखें। मुकदमे में काम आएंगे।

हिस्सेदार अधिक से अधिक मकान के बंटवारे की मांग कर सकते हैं और बंटवारे का वाद संस्थित कर सकते हैं।

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स्वामित्व खरीदें, सम्पत्ति का केवल कब्जा न खरीदें।

December 16, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

एजाज ने चम्पारन, बिहार से समस्या भेजी है कि-

क व्यक्ति 1969 के पूर्व से एक खाली प्लॉट पर घर बना कर रह रहा है और उसी समय 1969 से बिजली बिल उसके नाम से है। म्युनिसिपेलिटी की रसीद भी उसके नाम से है। लेकिन अंचल से म्यूटेशन अभी नहीं हुआ है। क्या यह घर मैं उससे खरीद सकता हूँ। जबकि इस प्लाट का असली मालिक वो नहीं है। असली मालिक कहाँ है यह पता नहीं चल पा रहा है जमीन लेकिन निजी है सरकारी नहीं है।

समाधान-

ब आप खुद जानते हैं कि जो व्यक्ति जमीन बेच रहा है वह उस जमीन का मालिक नहीं है उस पर मकान जरूर उस ने बनाया है। कोई भी जो किसी संपत्ति का मालिक नहीं है वह उस संपत्ति को किसी भी प्रकार विक्रय नहीं कर सकता है। वह व्यक्ति केवल वे अधिकार बेच सकता है जो उसे प्राप्त हुए हैं।

यह व्यक्ति आप से इस तरह का एग्रीमेंट कर सकता है कि जब उसे स्वामित्व मिलेगा तब वह आप को उक्त जमीन  बेच देगा। तब तक वह आप से धनराशि ले कर उस संपत्ति का कब्जा दे सकता है। उस व्यक्ति का तो उस जमीन पर प्रतिकूल कब्जा है जिस के कारण उसे वहाँ से कोई हटा नहीं सकता। लेकिन आप का कब्जा तो फिर भी नया होगा।

हमारी राय में ऐसी संपत्ति लेने का विचार त्याग दें।  आप यदि केवल कब्जा खरीदना चाहें तो खरीद लें, उस पर हमेशा कब्जा बनाए रखने के लिए सतर्क रहना पड़ेगा और प्रतिकूल कब्जे के आधार पर नगर पालिका से कभी पटटा जारी करा सकें तो आप उस के वैध स्वामी हो सकते हैं।   हमारा मानना है कि जब भी खरीदें संपत्ति का स्वामित्व खरीदें, केवल उस का कब्जा न खरीदें। बिना स्वामित्व का कब्जा तो हमेशा ही रिस्की होता है।

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संयुक्त स्वामी तंग करते हैं तो विभाजन का वाद संस्थित करें।

December 14, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राकेश कुमार ने बी-21/ 12 बी, ब्लॉक-बी, ओम नगर, मीठापुर, बदरपुर, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-


र्तमान में मैं जिस मकान में रहता हूँ वह मेरी माँ के नाम है। माँ का देहान्त दिसम्बर 2014 में हो चुका है। मेरे पिता और भाई मुझ से और मेरी पत्नी से रोज लड़ाई करते हैं और कहते हैं कि यहाँ तेरा कोई हक नहीं है तू अपने बीवी बच्चों को ले कर यहाँ से निकल जा। मेरे दो छोटे छोटे बच्चे हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि उस संपत्ति में मेरा कोई अधिकार है या नहीं है। मैं अपने पिता और भाई के विरुद्ध क्या कार्यवाही कर सकता हूँ?


समाधान-

जिस स्थान पर जो निवास करता है अथवा जिस मकान /जमीन पर जिस का कब्जा है वहाँ उसे कब्जा बनाए रखने और निवास करने का अधिकार प्राप्त है। किसी भी व्यक्ति से जिस  संपत्ति पर वह काबिज है उसे जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता। इस तरह आप को भी मकान के उस परिसर से जिस पर आप का कब्जा है और जिस में आऐप रहते हैं जबरन नहीं निकाला जा सकता।

यह मकान माँ के नाम था तो माँ के देहान्त के साथ ही उस का उत्तराधिकार निश्चित हो चुका है। यदि वह मकान किसी के नाम वसीयत था तो उस का स्वामी वह वसीयती हो चुका है। यदि कोई वसीयत नहीं की थी तो माँ के सभी उत्तराधिकारी उस के संयुक्त रूप से स्वामी हो चुके हैं। कोई भी उत्तराधिकारी उस मकान का बँटवारा करवा कर अपने हिस्से का पृथक रूप से कब्जा प्राप्त करने का अधिकारी है। यदि आप के केवल एक भाई है और बहिन नहीं है तो माँ के केवल 3 उत्तराधिकारी आप, आप के पिता और भाई है। इस तरह आप को उस मकान के एक तिहाई हिस्से का स्वामित्व प्राप्त है।

आप चाहें तो तुरन्त उक्त मकान का विभाजन करने और आप के हि्स्से का पृथक कब्जा देने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। इसी वाद में आप यह आवेदन भी दे सकते हैं कि जब तक इस वाद का निर्णय न हो तब तक आप के पिता और भाई आप को उस मकान के उस परिसर से बेदखल न करें और न आप को सामान्य रूप से उस परिसर में रहने में किसी तरह की बाधा उत्पन्न करें। आप को इस वाद के निर्णय तक इस आशय की अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त हो सकती है।

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प्रतिकूल कब्जा प्रतिरक्षा का सिद्धान्त है।

December 12, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

राजेश तिवारी ने सोरों बदरिया, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मारे गाँव से दो किलो मीटर की दुरी पर ४ बीघा जमीन को हमारे पूर्वज 40साल से करते आ रहे थे।  उनकी मोत के बाद अब हम कर रहे हेै।  उस जमीन में २६ लोगों के नाम हैं, सब ने वह जमीन छोड़ रखी है।  अब एक आदमी आता है  वह जमीन छोड़ने के लिए कहता है।  उस आदमी के बाप का नाम उस जमीन में है, बाप जिन्दा है।  हम जानना चाहते हैं कि क़ानूनी तरीके से उस जमीन पर हमारा कुछ हक बनता है कि नहीं, जब कि 40 साल से कोई जमीन पर अपना हक जताने नहीं आया। हम किस कोर्ट में कोन सी धारा में अपना मुकद्दमा डाल सकते हैं। हमें उचित सलाह दें।


समाधान-

जिस जमीन पर आप और आप के पूर्वज 40 वर्ष से खेती करते आ रहे हैं और इन 40 वर्षों में किसी ने आप के खेती करने पर कोई आपत्ति नहीं की इस तरह आप का उस जमीन पर प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) है। लेकिन प्रतिकूल कब्जे का यह सिद्धान्त केवल प्रतिरक्षा के लिए। यह हथियार हमले के लिए नहीं बल्कि रक्षा के लिए है। जिस का सीधा अर्थ ये है कि यदि कोई आप को उस जमीन से हटाने  के लिए वाद संस्थित करे या कोई भी कानूनी कार्यवाही करे तो आप इस हथियार का उपयोग कर सकते हैं। इस तरह आप को अदालत जा कर किसी तरह का आवेदन देने, वाद प्रस्तुत करने या कोई और कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है। आप तो जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखें।

यदि कोई आप को धमकी देता है कि वह जबरन कब्जा छीन लेगा तो यह अपराधिक कार्यवाही है। आप को उस के विरुद्ध पुलिस में रपट दर्ज करानी चाहिए और पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर अपराधिक परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए।  आप दीवानी /राजस्व न्यायालय में  इस तरह की निषेधाज्ञा प्राप्त करने का वाद संस्थित कर सकते हैं कि आप 40 वर्षों से अधिक से भूमि पर काबिज काश्त हैं, आप का कब्जा अवैध तरीके से नहीं हटाया जा सकता है, यदि किसी का अधिकार है तो वह न्यायालय से आदेश या डिक्री प्राप्त किए आप को न हटाए।

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आप से अब मकान का कब्जा कोई छीन नहीं सकता।

November 1, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_property1.jpgसमस्या-

शब्बीर खान ने रीठी, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मारे पूर्वजों ने 25 वर्ष पहले कच्चा लेख लिखवा कर भूमि खरीदी और मकान बना कर रहने लगे। जिस से भूमि खरीदी थी वह अब अपना हक बता कर कब्जा खाली कराना चाहता है। हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

ह इस बात पर निर्भर करेगा कि कच्चा लेख जो लिखा गया है उस में क्या लिखा है। यदि उस में जमीन बेचने का लिखा है और बेचने की रकम प्राप्त कर कब्जा देने की बात लिखी है तो वह एक एग्रीमेंट है। जिस के अनुसार धन दे कर तथा विक्रेता ने कब्जा दे कर आंशिक रूप से एग्रीमेंट का पालन कर दिया है। यदि ऐसा है तो आप से उक्त प्लाट का कब्जा कोई भी नहीं छीन सकता। आप चुपचाप रहें और विक्रेता को कब्जा वापस प्राप्त करने के लिए कानूनी कार्यवाही करने दें। वैसे भी आप का कब्जा 25 वर्ष का है इस तरह आप का प्रतिकूल कब्जा भी उक्त संपत्ति पर है।

यदि विक्रेता किसी प्रकार से आप को तंग करे तो आप पुलिस में रिपोर्ट लिखा सकते हैं। यदि आप को ऐसी आशंका हो कि विक्रेता जबरन आप को बेदखल कर सकता है तो आप जबरन बेदखली के विरुद्ध दीवानी वाद संस्थित कर अस्थाई निषेधाज्ञा व स्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। इस संबंध में आप को किसी स्थानीय वकील की मदद से कार्यवाही करनी चाहिए। स्थानीय वकील दीवानी मुकदमों के मामले में जानकार और अनुभवी हो तो बेहतर होगा।

 

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हिबानामा पंजीकृत होना जरूरी नहीं।

September 14, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

gift propertyसमस्या-

इमरान ने बसना, रायपुर छत्तीसगढ़ से पूछा है-

म लोग 5 साल हुआ मेरे नाना जी के साथ रहते हैं…मेरे नाना age 65 और उनकी अम्मी age ७५ ..और मेरे नानी जी और मामा 40 साल से अलग ररहते थे…..और मेरे नाना जी के पास नहीं आते थे और ओ लोग बोहत तकलीफ उठाते थे …तब मेरे नाना जी ने मेरे अम्मी को बुलाया और हम उनको 4 साल से केयर किआ तो मेरे नाना जी ने खुश होके उनका आबादी मकान मेरे अम्मी के नाम कर दिए हैं …१०० का स्टाम्प में नोटरी करके दिए हैं .अब ओ इस दुनिया में नहीं हैं।  तो मेरे मामा और नानी .. जो मकान नाना जी ने हम को दे दिए हैं उस पर हम से हिस्सा मांग ‘रहे हैं …और परेसान कर रहे हैं ….अब हम क्या करें सर? …. …..और नाना जी ने स्टाम्प पे उल्लेख किए हैं कि … मैं हाजी कदर अपनी राजी खुसी से @ … मेरी बेटी अमरीन बनो को अपना मकान दे रहा हूँ। मेरे चलने फिरने में तकलीफ होती है इसलिए मेरी सेवा मेरी बेटी अमरीन बानो ने की है इस से उस को खुस होके दे रहा हूँ …आज १२-३-२०१२ से उक्त मकान की मालिक अमरीन होगी और मेरा नाम राजस्व अभिलेख और पटवारी अभिलेख से हटा कर खुद का नाम जोड़ लें …………. हम लोगों ने नगर पंचायत से उनका नाम हटा कर अम्मी का नाम जोड़ लिए हैं .. …पर पटवारी अभिलेख में उनका नाम हटा कर अम्मी का नाम कैसे कैसे जोड़े …पटवारी के पास जाने से ओ जबाब नहीं दे रहा है …उस को मेरे मामा पैसा खिला दिया है …. हम को क्या करना होगा।

समाधान-

प के नानाजी ने मकान अपनी बेटी, आप की माँ के नाम तहरीर कर दिया। यह हिबा है। आप की माँ उसी मकान में निवास भी कर रही है इस कारण से उस का कब्जा भी उस मकान पर है। इस तरह यह हिबानामा अन्तिम हो चुका है। आप के नानाजी चाहें तो वे स्वयं भी इस मकान को वापस नहीं ले सकते।

आप को जो परेशानी आ रही है वह इस कारण से कि हिबा एक दान भी है और दान पत्र का पंजीकरण होना जरूरी है। लेकिन यदि हिबा किया गया हो और हिबा की गयी संपत्ति पर कब्जा भी प्राप्त कर लिया गया हो तो ऐसे मामले में हिबानामा को पंजीकृत होना कतई जरूरी नहीं है।

हालांकि आप के नाना जीवित हैं और आप चाहें तो उन से इस हिबानामा को उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत करवाया जा सकता है। उस के बाद इस संपत्ति का स्वामित्व आप की माँ का होने के मामले में किसी तरह की कोई शंका शेष नहीं रहेगी। बस यही है कि इस संपत्ति के बाजार मूल्य पर आप को स्टाम्प ड्यूटी व पंजीयन शुल्क अदा करना होगा।

यदि आप पंजीयन न भी करा पाएँ तो भी आप की माँ के इस संपत्ति पर स्वामित्व को उन से नहीं छीना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने हफीजा बीबी बनाम शेख फरीद के मामले में यह निर्धारित किया है कि इस तरह के हिबानामा का पंजीकृत होना जरूरी नहीं है।

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सन्नी गुप्ता ने सांबा, जम्मू और कश्मीर से पूछा है-

मेरे पापा ने अपने भाई पर कोर्ट केस किया है अपनी दुकान वापस लेने के लिए। पापा के भाई ने पापा से दुकान 1995 में अपने बेटे के लिए ली थी। लेकिन अब वो खाली नहां करते। कहते हैं कि हम 1979 से दुकान करते हैं और उन्हों ने श्रम विभाग से फार्म ओ बनाया है 1979 से। जब कि वे तब सरकारी कर्मचारी थे। 2005 में रिटायर हुए हैं। हम ने आरटीआई के जरिए उन का रिकार्ड लिया और विजिलेंस में कम्प्लेंट की। लेकिन विजिलेंस वाले कहते हैं कि वे सेवा निवृत्त कर्मचारी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर सकते। क्या हम उन के इस फ्राड के विरुद्ध कोर्ट में कार्यवाही कर सकते हैं और कोर्ट से कह सकते हैं कि उन की पेंशन बन्द की जाए। क्या ये कार्यवाही उच्च न्यायालय में होगी और क्या ये सिविल पिटीशन होगी।

समाधान-

प की मूल समस्या दुकान खाली कराना है और आप उलझ रहे हैं अपने चाचा को सजा दिलाने के लिए।

आप ने यह भी नहीं बताया कि दुकान का स्वामित्व किस का है यदि आप के पिताजी दुकान के स्वामी हैं तो आप के चाचा को उन्हों ने दुकान व्यवसाय के लिए दी तो वह एक तरह से लायसेंस पर थी। आप के पिताजी को लायसेंस कैंसल करने का नोटिस दे कर नोटिस की अवधि की समाप्ति पर दुकान के कब्जे का दावा करना चाहिए था। हो सकता है ऐसा ही दावा किया गया हो। पर आपने दावे की तफसील नहीं बताई है।

आपने उन्हें दुकान 1995 में लेना बताया है जब कि वे कह रहे हैं कि यह तो 1979 से उन के पास है। श्रम विभाग से जो लायसेंस बनाया है उस का ध्यान से निरीक्षण करना चाहिए हो सकता है वह 1995 में या उस के बाद पिछली तारीखों से बनवाया गया हो।

आप को किसी स्थानीय अच्छे वकील से राय कर के अपने दीवानी मुकदमे को लड़ना चाहिए। यदि आप यह साबित करने में सफल हो गए कि उन्हों ने दुकान 1995 में बेटे के लिए लायसेंस पर ली थी तो आप अपना मुकदमा जीत जाएंगे। चाचा के श्रम विभाग से प्राप्त लायसेंस को इसी आधार पर फर्जी सिद्ध किया जा सकता है कि उस समय वे सरकारी नौकरी में थे। चाचा के विरुद्ध कोई भी कार्यवाही अब उन का पुराना विभाग नहीं करेगा। उन्हें पेंशन अपनी सेवाओं के बदले मिलती है वह बन्द होना संभव नहीं है। वैसे भी यदि आप चाचा के विरुद्ध बदले की भावना से कोई कार्यवाही करेंगे तो अपने लक्ष्य से ही भटकेंगे। किसी के भी विरुद्ध कार्यवाही करने के पहले आप को अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए। बेहतर यह है कि आप अपने दीवानी मुकदमे की पैरवी ठीक से कराने पर ध्यान दें।

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माता-पिता व वृद्धों के भरण पोषण का कानून

August 3, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

hinduwidowसमस्या-

शीला देवी ने जबलपुर म.प्र. से पूछा है-

मेरी बेटी और दामाद मेरे मकान में कब्जा कर के बैठ गये हैं। ना तो किराया देते हैं ना मकान खाली करते हैं। जब कि मकान मेरे नाम पे है। मेरे पति का देहान्त 1986 में हो गया था। किराए से ही गुजारा चलता था। वो भी ये लोगों ने बन्द कर दिया। मेरा बेटा हैदराबाद में रहता है।

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि आप के बेटी दामाद ने किस तरह आप के मकान में कब्जा किया है? क्या वे किराएदार के बतौर मकान में रहे थे? क्या उन का किरायानामा लिखा गया था। क्या उन्हों ने कभी किराया दिया और आप ने रसीद दी, क्या किसी रसीद पर आप की बेटी या दामाद के हस्ताक्षर हैं? इन तथ्यों के बिना सही उपाय बताया जाना संभव नहीं है। यदि आप दस्तावेजी रूप से यह साबित करने में सक्षम हों कि वे किराएदार की हैसियत से वहाँ निवास कर रहे थे तो आप न्यायालय में उन के विरुद्ध बकाया किराया और बेदखली के लिए वाद प्रस्तुत कर सकती हैं।

यदि ऐसा नहीं है तो आप माता पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण अधिनियम 2007 तथा उस के अंतर्गत बने मध्यप्रदेश के नियम 2009 के अन्तर्गत अपनी बेटी-दामाद तथा पुत्र के विरुद्ध भरण पोषण के लिए आवेदन इस अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप जिला न्यायालय परिसर में स्थापित विधिक सहायता केन्द्र में स्थापित कानूनी समस्या क्लिनिक से भी सहायता प्राप्त कर सकती हैं।

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वाहन बेचना और कब्जा देना साबित करना होगा।

July 12, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

motor accidentसमस्या-

रविन्द्रसिंह ने जयपुर, राजस्थान से पूछा है-

मैं ने एक मोटरवाहन बेचा जिस का बीमा नहीं था। जिसने वाहन खरीदा उस ने स्टाम्प पर लिखित में खरीदना और कब्जा प्राप्त करना दे रखा है। 15 दिन बाद वाहन से दुर्घटना हो गयी। एक व्यक्ति को फ्रेक्चर हुआ है। वाहन अभी तक ट्रान्सफर नहीं हुआ था और बीमा भी नहीं कराया था। इस मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो गयी है।

समाधान-

प इस बात से चिन्तित हैं कि आप दुर्घटना के दिन तक वाहन के पंजीकृत स्वामी थे इस कारण से आप पर क्षतिपूर्ति का दायित्व आएगा।

मोटर यान दुर्घटना में प्राथमिक दायित्व चालक और वाहन स्वामी का होता है, यदि दायित्व बीमित हों तो बीमा कंपनी इन दायित्वों को वहन कर लेती है।

आप के मामले में पुलिस वाहन के नंबर से आप तक पहुँचेगी और जानना चाहेगी कि दुर्धटना के समय वाहन कौन चला रहा था। आप उसे बता दीजिए कि यह आप नहीं बता सकते क्यों कि आप वाहन को बेच चुके थे। इस के साथ ही आप के पास वाहन प्राप्ति की जो रसीद स्टाम्प पर आप के पास है उस की स्वहस्ताक्षरित फोटो प्रति पुलिस को दे दें।

इस के बाद आप के विरुद्ध कोई मोटर दुर्घटना दावा होता है तो आप को वाहन का विक्रय और कब्जा हस्तान्तरित होना साबित करना होगा। आप वहाँ आप यह जवाब दे सकते हैं कि दुर्घटना से आप का कोई लेना देना नहीं था, आप पहले ही वाहन बेच चुके थे। स्टाम्प पर उपलब्ध रसीद के माध्यम से इसे साबित भी कर सकते हैं। इस से आप पर आ रहा दायित्व वाहन क्रेता पर पहुँच जाएगा।

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गिफ्ट डीड के आधार पर कब्जे का वाद संस्थित कर सकते हैं।

December 6, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_house1.jpgसमस्या-

किशन सिंह ने जोधपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

म दो भाई हैं, शहर में पिता के नाम का एक मकान है। जिस में मेरा छोटा भाई रहता है। मेरे पिता ओर माता जी भी उसके साथ रहते थे। मगर भाई ओर भाई की पत्नी ने माता-पिता को परेशान किया जिस के कारण माता-पिता अपने कमरे में ताला लगाकर गाँव में पेतृक मकान में जाकर रहने लगे। मैं अपने मकान मे अलग रहता हूँ। पिता ने छोटे भाई से परेशान हो कर हमारा शहर वाला मकान मुझे गिफ्ट डीड से गिफ्ट कर दिया है। मगर उस मकान को मेरा भाई खाली नहीं कर रहा है। पहले भी पिता ने उस के ऊपर मकान खाली करने के लिया केस किया था जो खारिज हो गया है, अभी भी अपील में केस चल रहा है। इस बीच मे पिता ने मुझे गिफ्ट कर दिया है। मैं जानना चाहता हूँ कि मैं भाई से मकान को खाली केसे कराऊँ? वह कहता है कि उस ने मकान को बनाने के लिए 2 लाख रुपए भी लगाए थे इस कारण वह कहता है कि यह मकान मेरा है।

समाधान-

प के शहर वाले मकान में भाई रहता है। यह मकान आप के पिता के नाम था। इस तरह भाई उस मकान में लायसेंसी के रूप में निवास कर रहा है। आप के पिता ने मकान आप को गिफ्ट डीड पंजीकृत करवा कर गिफ्ट कर दिया है। इस तरह मकान पर आप का स्वामित्व स्थापित हो गया है और आप भाई को लायसेंस समाप्त करने का नोटिस दे कर उस का लायसेंस समाप्त कर सकते हैं और लायसेंस समाप्त करने के नोटिस की तिथि के अनुसार लायसेंस समाप्त हो जाने पर मकान का कब्जा प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। लेकिन यह सब करने में आप के पिताजी ने भाई के विरुद्ध जो मुकदमा किया था वह बाधा बन रहा है।

प के पिताजी ने वह मुकदमा किस आधार पर किया गया था और उस में क्या राहत मांगी गयी थी यह आप ने नहीं बताया है और न ही यह बताया है कि वह मुकदमा क्यों खारिज हुआ और उस में दीवानी अदालत ने क्या क्या अधिकार निर्धारित किए हैं? उस निर्णय तथा उस मुकदमे में किए गए अभिवचनों व साक्ष्य का अध्ययन किए बिना आगे की राह नहीं निकल सकती है। उस निर्णय की अपील भी अभी लंबित है। इस कारण आप के मामले में कुछ भी उपाय बताना हमारे लिए संभव नहीं है। इस तरह के मामलों में बेहतर हो कि आप के पिता के अपील में जो वकील हैं आप उन से राय करें। यदि आप को लगता है कि वे वकील समस्या को समझ नहीं पा रहे हैं या वे ठीक से मामले को नहीं देख पा रहे हैं तो आप स्थानीय स्तर पर किसी अच्छे वकील को मामले को दिखाएँ और सलाह ले कर उस के अनुरूप कार्य करें।

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