कानूनी उपाय Archive

समस्या-

र, मेरी जमीन के आगे की जमीन का लेवल बहुत ही नीचे है, उनके द्वारा मिट्टी को निकाल दिया गया है। जिससे हमें कृषि हेतु अनेक प्रकार के परेशानी का सामना करना पड़ा रहा है। पानी खेत में नही टिक पा रहा है तथा सारी मिट्टी सामने वाले के, खेत में जा रही है।  हमारे खेत की मिट्टी कम होती जा रही है। ऐसी बहुत समस्याएं हमारे सामने आ रही हैं। मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या मैं अपने खेत की मिट्टी निकाल सकता हूं क्या?  हमारे पीछे खेत वाले ने हमें धमकी दी है कि अगर तुमने अपने खेत से मिट्टी निकलवाई तो मैं तुरंत पुलिस को सूचित कर दूंगा।  मैं यह जानना चाहता हूं कि हमारा यह अधिकार नहीं है कि हम अपने निजी कार्य हेतु अपने खेत से मिट्टी निकाल सकें। इस संदर्भ में हमें थोड़ी सी जानकारी चाहिए हमें अपने खेत से मिट्टी निकालने के लिए क्या करना चाहिए?

 – रमेश चंद्र चौसाली

समाधान-

प को ध्यान रखना चाहिए कि समस्त कृषि भूमि सरकार के स्वामित्व की होती है और कृषक केवल उस का खातेदार कृषक है जिस की हैसियत एक किराएदार जैसी है। कृषक से किराए के रूप में हर वर्ष सरकार लगान वसूल करती है। जब आप खेत के मालिक ही नहीं हैं तो अपनी मर्जी से अपने काम के लिए मिट्टी कैसे निकाल सकते हैं। लेकिन यही काम आप सरकार की अनुमति से कर सकते हैं।

आप ने हमें नहीं बताया है कि आप का खेत किस राज्य के किस जिले की किस पंचायत में स्थित है। प्रत्येक राज्य के लिए खेती की जमीन का कानून भिन्न भिन्न है। पर लगभग सभी कानूनों में तहसीलदार को राज्य का प्रतिनिधि मान कर यह अधिकार दिया है कि वह खातेदार कृषक को उस की भूमि में से मिट्टी निकालने की अनुमति प्रदान कर सके। यदि आप को अपने निजी कार्य के लिए मिट्टी की आवश्यकता है तो आप अपनी  आवश्यकता बताते हुए तहसील में आवेदन दीजिए। तहसलीदार से लिखित अनुमति प्राप्त  हो जाने पर मिट्टी निकालें। तब पुलिस भी कुछ नहीं कर पाएगी।

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Women rights

समस्या-

रघुनदंन सोलंकी ने विजयनगर, सवाईमाधोपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मारी पुस्तैनी जमीन है।  मेरे पिताजी के हम तीन पुत्र हैं, कोई पुत्री नहीं है। मेरे पिताजी का देहान्त हो चुका है, तथा हमारी माताजी जीवित हैं।  हमारे दोनो बड़े भाईयो की शादी हो चुकी है।  परन्तु शादी के 1 साल बाद हमारे मंझले भाई की निसंतान अवस्था मे मृत्यु हो गई। उसके 1 माह बाद हमारी भाभी मायके चली गई,  6 माह बाद उनके घरवालो ने बिना हमें बताये उनका नाता किसी के साथ कर दिया (नाता प्रथानुसार)।  मेरी भाभी और उनके दूसरे पति ने हम बताये बिना धोखे से हमारी पुस्तैनी जमीन पर नामांतरण खुलवाकर 1/4 में से 1 हिस्सा स्वंय के नाम कर लिया।  नामांतरण 2015 में खुलवाया गया जबकि उनका नाता 2013 में हुआ, जिसके सबूत के रुप मे हमारे पास 2014 में बनाये गये आधार, पहचान पत्र, राशन कार्ड की प्रति है जिनमे पति के रुप में उनके दूसरे पति का नाम है।  उसे दूसरे पति से एक पुत्र भी है।  तो क्या इस स्थिति में भी वह हमारी पुस्तेनी जमीन मे हिस्सेदार है?  क्योंकि हमे डर है कि कहीं वो जमीन बेच न दे? कृपया मदद करें।

समाधान-

प की निस्संतान विधवा भाभी ने नाता विवाह कर लिया है और उस के बाद उस ने आप की पुश्तैनी जमीन का नामान्तरण राजस्व रिकार्ड में करवा लिया है। जिस के अनुसार एक चौथाई संपत्ति उस के नाम दर्ज हो गयी है। इन तथ्यों के साथ मूलतः आप की समस्या यह है कि कही विधवा भाभी उस के नाम नामान्तरित एक चौथाई संपत्ति को  विक्रय न कर दे? क्या उसे नाता करने के बाद भी पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सा प्राप्त करने और नामान्तरण कराने का अधिकार था?

सब से पहले तो आप को यह समझना चाहिए कि पुश्तैनी संपत्ति क्या है?  पुश्तैनी संपत्ति जिन संपत्तियों के सम्बंध में कहा जाता है उन्हें हमें सहदायिक संपत्ति कहना चाहिए। ऐसी संपत्ति जो कि किसी हिन्दू पुरुष को उस के पिता, दादा या परदादा  से उन की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो। ऐसी संपत्ति में उत्तराधिकारी के पुत्र का हिस्सा जन्म से ही निश्चित हो जाता था। लेकिन 17 जून 1956 से हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू हो गया। इस तरह किसी भी स्वअर्जित संपत्ति का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम से शासित होने लगा। जिस में पुत्रों के साथ साथ पुत्रियोँ, पत्नी और माँ को बराबर का हिस्सा दिया गया था।  इस का अर्थ यह हुआ कि उक्त तिथि 17.06.1956 के बाद से कोई भी संपत्ति सहदायिक संपत्ति बनना बन्द हो गयी। इस कारण यदि कोई संपत्ति दिनांक 17 जून 1956 के पहले किसी हिन्दू पुरुष को उसके पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी तो वह सहदायिक होगी। लेकिन इस तिथि के बाद कोई भी स्वअर्जित संपत्ति सहदायिक नहीं हो सकती थी।तो पहले आप जाँच लें कि जिसे आप अपनी पुश्तैनी संपत्ति बता रहे है वह वास्तव में सहदायिक संपत्ति भी है या नहीं है।

आप का मामला 2005 के बाद का है। इस कारण आप की इस संपत्ति पर 2005 के संशोधन के बाद का हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होगा। उस की धारा 6(3) में यह उपबंध है कि किसी सहदायिक संपत्ति मेंं हि्स्सेदार हिन्दू (पुरुष और स्त्री दोनों) की मृत्यु हो जाती है तो यह माना जाएगा कि सहदायिक संपत्ति में उस का जो हिस्सा था वह संपूर्ण सहदायिक संपत्ति का विभाजन हो कर उसे मिल चुका था और उस का उस हिस्से का उत्तराधिकार उत्तरजीविता के आधार पर नहीं बल्कि हिन्दू उतराधिकार अधिनियम के उपबंधों के अनुसार निश्चित किया जाएगा।

उक्त नियम के अनुसार जिस दिन आप के पिता जी की मृत्यु हुई उस दिन उन का हिस्सा तीन भाइयों और माँ को बराबर के चार हिस्सों में मिल गया अर्थात संपत्ति में सभी का 1/4 हिस्सा हो गया। अब एक विवाहित निस्संतान भाई की मृत्यु हो गयी तो उस का हिस्सा उस की पत्नी के हिस्से में उसी दिन चला गया जिस दिन आप के भाई की मृत्यु हो गयी थी। उस भाभी ने बाद में नाता कर लिया। उस ने नाता किया। विधवा होने के बाद तो वह  वैधानिक विवाह भी कर सकती थी। इस नाते को भी वैधानिक विवाह ही माना जाएगा। लेकिन नाता होने से या विवाह कर लेने से  किसी विधवा को उस के पति से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति वापस अन्य उत्तराधिकारियों में जाने की कोई विधि या कानून नहीं है। पति से उत्तराधिकार प्राप्त कर लेने से विधवा के विवाह में भी किसी तरह की रोक नहीं है।

इस तरह आप की विधवा भाभी ने नाता करने के उपरान्त भी जो नामान्तरण खुलवाया है वह विधिपूर्वक है। वह आज भी उस 1/4 हिस्से की स्वामिनी है। वह जमीन का बंटवारा करवा कर अपने हिस्से को अलग करवा कर अपना खाता अलग खुलवा सकती है अपने हिस्से पर अलग से कब्जा प्राप्त कर सकती है और उसे विक्रय या किसी भी प्रकार से हस्तान्तरित कर सकती है। वह बिना बंटवारा कराए भी अपने हिस्से की भूमि का विक्रय कर सकती है।

 

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समस्या-

अतुल कुमार पाठक ने ४, अश्वनीपुरम कालोनी, फैजाबाद, उ०प्र० से पूछा है – 

         मैंने वर्ष २०१२ में राम मनोहर लोहिया अवध यूनिवर्सिटी में पंचवर्षीय विधि स्नातक पाठ्यक्रम में एडमिशन लिया था। यूनिवर्सिटी द्वारा सेमेस्टर एग्जाम हमेशा विलम्ब से सम्पादित कराया गया जिसके कारण आज २०१८ तक (६ वर्षों में) भी मेरा कोर्स पूरा नही हुआ। पांच वर्ष का कोर्स पूरा होने में लगभग ७ वर्ष का समय लग जायेगा। हम छात्रों द्वारा लखनऊ उच्च न्यायलय से डायरेक्शन भी कराया जा चुका है समय से परीक्षा करने के लिए। जिसका कोई फायदा नही मिला। क्या यूनिवर्सिटी से क्षतिपूर्ति प्राप्त किया जा सकता है? और कैसे? यदि कोई केस लॉ हो तो अवश्य बतायें।

समाधान-

            विश्वविद्यालय एक विधि द्वारा स्थापित निकाय है जो किसी विशिष्ठ पाठ्यक्रम में अध्ययन की पूर्णता हो जाने पर विद्यार्थी की जाँच कर के तय करता है कि उस ने यह पाठ्यक्रम सफलतापूर्वक पूर्ण किया है या नहीं। यह विश्वविद्यालय का वैधानिक दायित्व है। परीक्षा आयोजित करने में देरी के कारण उस के विरुद्ध केवल उपभोक्ता कानून के अंतर्गत ही क्षतिपूर्ति प्राप्त किए जाने की संभावना बनती थी। किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार स्कूल एक्जामिनेशन बोर्ड बनाम सुरेश प्रसाद सिन्हा “(2009) 8 एससीसी 483” के प्रकरण में यह निर्धारित किया है कि बोर्ड व विश्वविद्यालय सेवा प्रदाता नहीं हैं और न ही विद्यार्थी एक उपभोक्ता है।

ऐसी स्थिति में वर्तमान में किसी भी विश्वविद्यालय से परीक्षाएं आयोजित करने व परिणाम प्रदान करने में हुई देरी के लिए कोई क्षतिपूर्ति प्राप्त करना संभव नहीं है। यदि कभी कानून में संशोधन कर के विश्वविद्यालयों को सेवा प्रदाता मान लिया जाए और विद्यार्थियों को उपभोक्ता मान लिया जाए तो इस तरह की देरी के लिए उन से क्षतिपूर्ति प्राप्त की जा सकती है। वर्तमान स्थिति में नहीं। कानून में संशोधन केवल विधानसभाएँ और संसद ही कर सकती हैं।

इधर जिस तरह से शिक्षा का बड़े पैमाने पर निजीकरण हुआ है, विश्वविद्यायों को स्वायत्त्त घोषित किया जा रहा है वैसे स्थिति में यह आवश्यक है कि इन के कार्यों को सेवा माना जाए और उन्हें उपभोक्ता कानून के दायरे में लाया जाए। इस के लिए विद्यार्थियों व अभिभावकों को सरकरों पर यह दबाव बनाना चाहिए कि वे कानूनों में पर्याप्त संशोधन कर के विश्वविद्यालयों, शिक्षा बोर्डों तथा विद्यालयों को उपभोक्ता कानून के दायरे में लाएँ।

दत्तक ग्रहण कैसे होगा?

March 19, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

किशन बास वाला ने जयपुर, राजस्थान से पूछा है-

मैं एक हिंदू परिवार से हूं और मेरे दो बच्चे हैं मेरी छोटी वाली बच्ची जिसका जन्म अभी हुआ है, उसको मेरे माता पिता गोद ले रहे हैं।  क्या मैं बच्ची को गोद दे सकता हूँ और यदि गोद देता हूं तो उसकी प्रक्रिया क्या होगी? अभी बच्ची का जन्म सर्टिफिकेट नहीं बना है तो जन्म सर्टिफिकेट बच्ची का किस नाम से बनेगा मेरे नाम से या मेरे माता पिता के नाम से बनेगा? बच्ची का जन्म हॉस्पिटल में हुआ है?

समाधान-

बेटी का जन्म अस्पताल में हुआ है, वहाँ आप की पत्नी और आप का नाम दर्ज है। वे प्रमाण पत्र में भी वही नाम लिखेंगे जिस के आधार पर जन्म मृत्यु पंजीयक के यहाँ से जन्म-प्रमाण पत्र जारी होगा। वैसे भी जन्म के समय तो दत्तक नहीं हुआ था इस कारण जन्म प्रमाण पत्र में तो जन्मदाता माता पिता का नाम ही अंकित किया जाएगा। यदि कोई जुगाड़ कर के आपके माता पिता का नाम दर्ज करा दें तो यह गलत होगा और दर्ज कराने वाला परेशानी में पड़ सकता है कि उस ने गलत तथ्य बता कर जन्म प्रमाण पत्र बनवाया है। ऐसे अनेक अपराधिक मुकदमे राजस्थान में चल भी रहे हैं।

आप अपनी पत्नी की सहमति से बेटी को अपने माता पिता को गोद दे सकते हैं। इस के लिए आप व आप की पत्नी तथा आप के माता-पिता द्वारा दत्तक ग्रहण विलेख निष्पादित कर आपके क्षेत्र के उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत कराना होगा।

गोदनामा और वसीयत दोनों ही प्रभावी रहेंगे।

March 4, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अंकित ने ग्राम सेथवाल, रानी की सराय, जिला आजमगढ़ (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरी नानी ने अपनी दो बेटियों को वसीयत करने के बाद मुझे पंजीकृत विलेख से दत्तक ग्रहण किया है। उनकी छोटी पुत्री मेरी जन्मदात्री माता है।  मैं जानना चाहता हूँ कि सम्पत्ति के लिए गोदनामा प्रभावी है या वसीयत?

समाधान-

गोदनामा और वसीयत दोनों विलेख अपने अपने तरीके से प्रभावी होंगे। वसीयत तो वसीयत करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के उपरान्त प्रभावी होती है। वसीयत को मृत्यु के पहले तक कभी भी बदला जा सकता है। एक ही विषय में अनेक वसीयतें होने पर एक व्यक्ति की अन्तिम वसीयत सभी को सुपरसीड करेगी।

गोदनामा से आप अपनी नानी के गोद पुत्र हो गए हैं। यदि परिवार में पहले से कोई पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति हो तो जो संपत्ति नाना की मृत्यु के बाद नानी को मिली है उस में आप के गोद लेने से नानी के साथ साथ आप का हिस्सा भी तय हो चुका है। अब यदि आप की नानी की मौजूदा वसीयत बनी रहती है तो नानी के हिस्से की जो भी संपत्ति होगी वह वसीयत में आप की माँ व मौसियों को मिलेगी। इस संबंध में आप को सभी दस्तावेज बता कर किसी स्थानीय दीवानी विधि के जानकार वकील से परामर्श करना चाहिए।

मृत पुत्री की पुत्री को भी उत्तराधिकार का अधिकार है।

February 13, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

             श्रीमानजी,  हम दो भाई  ईशर राम और केशर राम और तीन बहिने नाथी, उमा और इंद्रा थे। मेरी बड़ी

 बहिन नाथी की १९७१ में मृत्यु हो गयी। वह एक लड़की पीछे छोड़ गई। उस टाइम मेरी छोटी बहिन इंद्रा कुंवारी थी और हमने सामाजिक रीती रिवाज़ के हिसाब से नाथी की जगह इंद्रा की शादी कर दी। मेरी माताजी की मृत्यु १९९१ में हो गयी और पिताजी की २०१० में मृत्यु हो गयी। उस के बाद पटवारी ने ईशर राम, केशर राम, नाथी, उमा व इंद्रा के नाम से नामकरण दर्ज कर दिया। जबकि नाथी की मृत्यु १९७१ में ही हो चुकी थी। अब नाथी की लड़की ने नाथी का death certificate व वारिस नामा पेश कर १/५ हिस्से में अपना नामकरण दर्ज करवा लिया है

१.जब नाथी की मृत्यु १९७१ में हो चुकी थी फिर भी पटवारी ने २०१० में उस के नाम नामकरण दर्ज किया है क्या यह कानूनी रूप से उचित है?

२. जब हमने नाथी की जगह इंद्रा  की शादी कर दी तो नाथी की लड़की इंद्रा की गोद की लड़की हो गई। वो इंद्रा के हिस्से में से अपना हिस्सा मांग सकती है और इंद्रा के बच्चे और नाथी की लड़की का पिता तो एक ही हुआ, वहाँ उस के गाँव में उसके पिताजी की मृत्यु के बाद में इंद्रा के बच्चो के बराबर ही हिस्सा मिलेगा, जब उसके गाँव में उसके पिताजी की सम्पति में से उसको इंद्रा के बच्चों के बराबर हिस्सा मिलेगा तो हमारे यहां उसको अलग से हिस्सा कैसे मिलेगा?  क्या मुझे उसके नामान्तरण की कोर्ट में अपील करना चाहिए या और कोई कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए?

-केशर राम, निवासी गाँव – पोस्ट–मुर्डकिया, तहसील-सुजानगढ़, जिला चूरू,  राजस्थान

समाधान-

          सब से पहले तो आप यह समझिए कि आप ने अपनी छोटी बहिन इन्द्रा का विवाह किसी दूसरे स्थान पर किया है और फिर समस्या के बारे में सोचिए।

          अब जो नामान्तरण हुआ है उस में यह गलती हुई है कि मृत नाथी के नाम भी हिस्सा चढ़ गया है। यह इस कारण हो सकता है कि नामान्तरण करने वाले अधिकारी के ज्ञान में यह तो आया कि आपके माता पिता के कितनी संतानें हैं और कौन कौन हैं, लेकिन यह ज्ञान में न आया कि उन में से नाथी की मृत्यु हो चुकी है।

          यदि नामान्तरण अधिकारी के ज्ञान में यह होता कि नाथी की मृत्यु हो चुकी है तो भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार पूर्व में मृत पुत्री की पुत्री को उस का हिस्सा प्राप्त होता। उस स्थिति में भी नाथी का हिस्सा नाथी की पुत्री को प्राप्त होता। इस कारण इस नामान्तरण से पुराने नामान्तरण की गलती दुरुस्त कर दी गयी है।

          नाथी के स्थान पर आप ने इन्द्रा का विवाह कर दिया इस से नाथी की पुत्री इन्द्रा की गोद पुत्री नहीं हुई बल्कि सौतेली पुत्री हुई। उसे इन्द्रा के हिस्से में से हिस्सा प्राप्त करने का कोई अधिकार कभी उत्पन्न नहीं होगा।

          नाथी की पुत्री को अपने पिता की किसी संपत्ति में से कुछ उत्तराधिकार में प्राप्त होता है तो वह प्राप्त होगा इस से उस के माँ या नाना नानी की संपत्ति में से उत्तराधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

          इस तरह जो भी वर्तमान स्थिति है वह कानून के अनुसार बिलकुल सही है। आप यदि किसी की खराब सलाह के कारण कोई कानूनी कार्यवाही करते हैं तो उस से आप को कुछ न मिलेगा। आप का समय और धन भी व्यर्थ ही खर्च होगा।

बैनामा कैसे खारिज कराएँ?

January 21, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राकेश  जिला-प्रतापगढ़  उत्तर प्रदेश ने समस्या भेजी है कि-

हम तीन भाई थे।सबसे बड़े बेऔलाद थे।उन्होने सितंबर के प्रथम हप्ते में मेरे एक बेटे को अपनी चल अचल संपत्ति का वारिस(रजिस्टर्ड) बनाया था।इसका पता चलने पर मझला भाई जो लखनऊ में सपरिवार रहता है आकर उन्हें बहला फुसलाकर लखनऊ ले गया(१५सितंबर2017)और सितंबर केआख़िरी हप्ते मे छल और धोखे से उनकी समस्त संपत्ति बैनामा करवा लिया (खुद और अपनी पत्नी के नाम पर)।इस बैनामे में एक गवाह खुद वकील है और दूसरा गवाह उनका बेटा है।बाज़ार में स्थित मकान का बैनामा मकान दर्शाए बिना खाली जमीन के रूप में एक लाख नकद दिखा कर करवा लिया जबकि उसकी बाजार में कीमत25 लाख रुपए है।शेष जमीन का बैनामा 9 लाख रुपए में करवाया है और पेमेंट के रूप में केवल एक चेक का नम्बर लिखा है और बैनामे के दिन की तारीख लिखी है।चेक की फ़ोटो कापी भी संलग्न नहीं है।फिर उन्हें लखनऊ लेकर चले गए।पता चलने पर मैं एक रिश्तेदार के साथ 9अक्टूबर2018कोगया तो वह बोले कि जबर्दस्ती और छल से ऐसा किया।मैं इसको ख़ारिज कराऊंगा लेकिन मुझे घर नहीं जाने दे रहे हैं।इस पर उन लोगों ने कहा कि हम खुद ख़ारिज करवा देंगे और इनको दो दिन में घर पहुंचा देंगे।उन्होंने पैसा नहीं पाने की बात भी कबूली।लेकिन उन लोगों ने पहुँचाया नहीं और21अक्टूबर18को उनकी मौत की खबर आती है।पोस्टमार्टम न कराने के प्रार्थना पत्र पर मेरा दस्तखत लेकर थाने में जमा कर दिये और मुझे दिसम्बर में समाधान करने की बात कह कर टाल दिये।मुझे ऐसा लगता है कि उन लोगों ने भेद खुलने के डर और पैसा भी हड़पने के चक्कर में उनकी हत्या कर दी।भाई ने धोखा और छल की बात कुछ और लोगों को फोन पर बताया था।
क्या अब उनकी मौत की जांच करवाई जा सकती है?यदि हाँ तो कैसे?
इस संबंध में और क्या कदम उठाए जा सकते हैं।ये जमीन पुश्तैनी है।बातचीत की मोबाइल रिकार्डिंग क्या साक्ष के रूप में अदालत में मान्य हो सकती है?
कृपया मार्ग दर्शन करें।
राकेश

 समाधान-

आप के पास पर्याप्त तथ्य और सबूत हैं जिन के आधार पर आप बैनामा खारिज कराने का वाद संस्थित कर सकते हैं। पोस्टमार्टम न कराने के आवेदन पर आप को हस्ताक्षर नहीं करने थे। इस से वे यह साबित करने का प्रयत्न करेंगे कि आप खुद आश्वस्त थे कि उ नकी मृत्यु संदेहास्पद नहीं है। पुश्तैनी जमीन  होने पर और वारिस न होने पर वसीयत की जा सकती है और संपत्ति को विक्रय भी किया जास कता है इस तरह पुश्तैनी संपत्ति होने का कोई फर्क इस मामले पर नहीं पड़ेगा। बेहतर तो यही है कि आप बैनामा खारिज कराएं जिस से वसीयत को लागू किया जा सके। बैनामा खारिज कराने के लिए आप को दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा जिस में आप को बैनामा के मूल्य पर कोर्ट फीस भी देनी होगी।

प्रिय पाठकों!

हम अपने पाठकों से प्राप्त सभी समस्याओं पर अपनी राय ई-मेल से दे रहे हैं।
हम उन्हें यहाँ भी प्रस्तुत कर सकते हैं, जिस से अन्य पाठकों को भी लाभ हो। हम जानना चाहते हैं कि समस्याओं के समाधान इस तरह प्रस्तुत करने का यह प्रारूप आप को कैसा लगा। आशा है आप की टिप्पणियाँ हमें प्राप्त होंगी।
-दिनेशराय द्विवेदी

 

दरवाजा व रास्ता कैसे बनाए रखें?

January 21, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अन्नू पांडे ने पूछा है-

नमस्ते!
मेरे घर के पीछे कुछ खाली ग्राम समाज की जमीन है।
मेरे पिता के चाचा जी जो की मेरे घर से 200 मीटर दूर मकान मे रहते है।
मेरे घर के दवाज़े को लेकर रोज़ झगड़ा करते है की मैं उस दरवाज़े को बन्द कर दूँ।उनका कहना है के ये जमनीं उनकी है।जबकि वो ग्राम समाज है। और मेरे पिता के चाचा जी के पास 15 बीघा से ज्यादा का खेत और बाग अलग से है।
तो अब आप हमे बताइये की में अपना निर्माण कार्य किस प्रकार बिना दरवज़ा बन्द किये जारी रख सकता हूँ???

सलाह  

आप का दरवाजा पहले से है आप उसे कायम रखें।
बन्द करने की कहने वाले को कहें कि वह अदालत में जा कर नालिश करे।
यदि वह आप को तंग करता है तो पुलिस में रिपोर्ट कराएँ,  और फिर भी काम न बने तो अदालत में निषेधाज्ञा का वाद दाखिल कर  निर्माण कार्य तथा रास्ते में बाधा उत्पन्न न करने के लिए विपक्षी के विरुद्ध अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करने का प्रयत्न करें।


प्रिय पाठकों!

हम अपने पाठकों से प्राप्त सभी समस्याओं पर अपनी राय ई-मेल से दे रहे हैं।
हम उन्हें यहाँ भी प्रस्तुत कर सकते हैं, जिस से अन्य पाठकों को भी लाभ हो। हम जानना चाहते हैं कि समस्याओं के समाधान इस तरह प्रस्तुत करने का यह प्रारूप आप को कैसा लगा। आशा है आप की टिप्पणियाँ हमें प्राप्त होंगी।
-दिनेशराय द्विवेदी

 

अनुकंपा नियुक्ति केवल नियमों केअनुरूप ही संभव है।

January 14, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राजेश ढंगारे ने नासिक, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी पशु संवर्धन में परिचर पद पर थे। उन का देहान्त 8 अगस्त 2000 को हुआ। मेरे पिताजी के दो पत्नियाँ थीं। उन्हों ने दूसरा विवाह लड़का न होने के कारण किया था। मैंने पापा के गुजरने के बाद 2001 में अनुकम्पा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। 2008 में उन्हों ने पत्र भेजा कि आप की माँ शासकीय सेवा में परिचर थी इस कारण आप को अनुकम्पा नियुक्ति नहीं मिल सकती। मम्मी को 2008 में पैरालीसिस हुआ तो उन्हों ने स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति प्राप्त कर ली। क्या मुझे पिताजी या माताजी के स्थान पर अनुकंपा नियुक्ति मिल सकती है?

समाधान-

प को और सभी लोगों को यह जान लेना चाहिए कि अनुकंपा नियुक्ति कोई अधिकार नहीं है बल्कि केवल अनुकंपा मात्र है। सुप्रीम कोर्ट बार बार यह कह चुका है कि सरकारी और सरकारों के नियंत्रम वाले नियोजनों में नियोजन खुले निमंत्रण द्वारा योग्यता के आधार पर दिया जाना चाहिए। अनुकंपा नियुक्ति भी केवल परिवार को तुरन्त आर्थिक संकट से बचाने के लिए नियमों के अनुसार ही दी जानी चाहिए। अन्यथा ऐसी नियुक्तियाँ असंवैधानिक होंगी।

आप के पिता का देहान्त हुआ तब आप की माता जी राजकीय सेवा में थी इस कारण नियमों के अंतर्गत अनुकम्पा नियुक्ति आप प्राप्त नहीं कर सकते थे। आप की माताजी ने उन्हें पैरालिसिस हो जाने के कारण सेवा निवृत्ति प्राप्त कर ली। स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति पर अनुकम्पा नियुक्ति दिए जाने का कोई नियम नहीं है। इस कारण आप को नौकरी मिलना संभव नहीं है।

बँटवारा और पृथक कब्जा ही समस्या का हल है।

December 25, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

रामकुमार महतो ने ग्राम बाहेरी, जिला दरभंगा, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा के पिताजी तीन भाई थे, उन तीनों के नाम से एक जमीन है। जिसके पहले कॉलम मे बहिस्सा बराबर लिखा हुआ है, और कैफियत खाना में तीनों के नाम से अलग-अलग खेसरा नं देकर उनके आगे कब्जा दिखाया गया है। जिसके अनुसार सभी अपने हिस्से के जमीन पर बिना किसी विवाद के लगभग 80 वर्षों से रहते चले आ रहे हैं। उस हिस्से में किसी के पास कम जमीन है तो किसी के पास अधिक जमीन है। आगे चलकर कुछ लोगों ने अपने हिस्से की जमीन का कुछ हिस्सा बेच भी दिया है जिस पर किसी को भी कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन कुछ लोगों के कहने पर मेरे विपक्षी ने 2012 से मेरे साथ सम्पत्ति को बराबर हिस्से में बटवारा को लेकर विवाद करने लगे। अब उनके साथ ग्राम पंचायत के पूर्व सरपंच का समर्थन भी है। वे लोग जबरदस्ती मेरे हिस्से की जमीन पर (जिस पर मकान बनाकर हम लोग लगभग 50 वर्ष पूर्व से बिना किसी विवाद के रहते चले आ रहे हैं ) कब्जे की कोशिश करते हैं। जिससे जान माल के नुकसान का भय हमेशा बना रहता है। कृप्या सही सलाह दें?

समाधान-

प की उक्त वर्णित संपत्ति पुश्तैनी है और वह अभी भी आप के परदादा और उन के भाइयों के नाम दर्ज है। जब भी जमीन के किसी खातेदारी की मृत्यु हो जाती है तो उस के उत्तराधिकारियों का यह दायित्व होता है कि वे मृतक का नाम खारिज करवा कर उस के उत्तराधिकारियों के नाम और उन के हिस्से रिकार्ड में दर्ज कराएँ। यदि उत्तराधिकारी उन के नाम और हिस्से दर्ज करवा भी दें तो केवल यह दर्ज होता है कि कुल जमीन में उन का हिस्सा कितना है। उन का पृथक हिस्सा कौन सा है यह दर्ज नहीं होता। उस के लिए किसी भी जमीन के सभी मौजूदा हिस्सेदारों को आवेदन दे कर अपने अपने खाते अलग कराने चाहिए और हिस्से भी अलग अलग करा लेने चाहिए जिस से भविष्य में समस्या न हो।

आपने जो रिकार्ड भेजा है उस में पूरी संपत्ति किस की है यह दर्ज है उन के हिस्से भी दर्जै हैं साथ ही यह भी दर्ज है कि जमीन के कौन से हिस्से पर किस का कब्जा है। जब किसी कब्जे दार ने अपने हिस्से की जमीन का कोई हिस्सा विक्रय किया तो उस ने अपने कब्जे की जमीन में से उतना हिस्सा खऱीददार के कब्जे में दे दिया। जब कि विक्रय या तो खाते में दर्ज ही नहीं हुआ और दर्ज हुआ होगा तब भी वह आप के साथ संयुक्त खातेदार रहेगा जब तक कि सभी खातेदारों / हिस्सेदारों का विभाजन हो कर उन के पृथक पृथक हिस्से दर्ज हो कर उन्हें उन के हिस्सों पर कब्जा न दे दिया जाए।  इस तरह समस्या तो बनी हुई है और इस का समाधान भी आसान नहीं है। इस समस्या का हल या तो आपसी सहमति से हो सकता है या फिर अदालत में विवाद के निर्णय और निष्पादन से। अदालत में विभाजन होना और उस का निष्पादन होना बहुत लंबी प्रक्रिया है। लेकिन वही सही हल है।

आप के कब्जे में जो जमीन और मकान है वह स्पष्ट रूप से रिकार्ड में दर्ज है। इस कारण कोई भी आप को अपने कब्जे से बिना किसी अदालत के निर्णय और निष्पादन के बेदखल नहीं कर सकता। यदि किसी को बंटवारा करवा कर अपना हिस्सा अलग करवाना है तो वह अदालत में विभाजन का दावा करे। जो लोग आप को बेदखल करने का प्रयास कर रहे हैं उन से आप कह सकते हैं कि वे पहले अदालत से फैसला करवाएँ। फिर भी आप यदि परेशानी से बचना चाहते हैं तो किसी वकील से मिल कर राजस्व रिकार्ड में दर्ज आप के कब्जे की जमीन से जबरन बेदखल किए जाने के लिए निषेधाज्ञा प्राप्त करने के लिए दावा करा सकते हैं। एक बार निषेधाज्ञा प्राप्त हो जाने पर बेदखली के विरुद्ध आप को सुरक्षा मिल जाएगी।

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