कानूनी उपाय Archive

चैक का भुगतान बैंक को लिख कर रुकवाना भी चैक अनादरण ही है।

June 24, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मैंने किसी व्यक्ति को उसके नाम से अगले महीने की डेट का चेक दिया हैतो क्या मैं उसे कैंसिल करवा सकता हूं। क्या वह मुझ पर केस कर सकता है?   मैंने उससे कोई उधार नहीं लिया है।

-राजीव यादव, आवास विकास, रुद्रपुर

समाधान-

कोई भी चैक आप ने किसी को दिया है तो वह उसे बैंक में समाशोधन के लिए प्रस्तुत कर सकता है। यदि चैक किसी भी वजह से डिसऑनर होता है तो चैक धारक आप को चैक की राशि का भुगतान करने के लिए 15 दिन मे ंकरने की लिखित सूचना देगा। आप नोटिस मिलने से 15 दिन में यदि राशि का भुगतान नहीं करते हैं तो आप के विरुद्ध धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनयम के अंतर्गत परिवाद न्यायालय में दाखिल किया जा सकता है।

यदि आप ने चैक किसी दायित्व के अधीन नहीं दिया है तो भी चैक धारक आप के विरुद्ध परिवाद दे सकता है। क्यों कि चैक के मामले में अदालत द्वारा  यह  माना जाएगा कि चैक किसी दायित्व के अधीन दिया गया था। आपको यह साबित करना होगा कि चैक किसी दायित्व के अधीन नहीं दिया गया था।

आप को चैक रुकवाने के लिए बैंक में आवेदन देना होगा कि चैक का भुगतान न किया जाए। लेकिन आप को तब बैंक को यह भी लिखना चाहिए कि वह चैक दायित्व के अधीन नहीं दिया गया था तो किस कारण से दिया गया था। जब आप को नोटिस मिल जाए तो भी आप नोटिस का जवाब देते हुए कहें कि यह चैक दायित्व के अधीन नहीं था। बल्कि अमुक कारण से दिया गया था।

एक बार चैक डिसऑनर हो जाने के बाद और नोटिस कानून के मुताबिक आप को मिल जाने के बाद केस तो हो ही सकता है, आप को लड़ना भी पड़ेगा और अपनी सफाई पेश करनी होगी अन्यथा कुछ भी निर्णय हो सकता है।

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समस्या-

पटना से हर्ष कुमार ने पूछा है-

म तीन भाई थे,  जिसमें सबसे बड़ा मैं हूँ और मेरे बाद वाले भाई का निधन हो गया, जिसकी पत्नी से सबसे छोटे भाई ने  शादी कर लिया।  तो कृपया मुझे ये बताएं कि मेरे पुस्तैनी संपत्ति में सबसे छोटे भाई का क्या हिस्सा होगा?  क्या मंझले भाई की पत्नी के छोटे भाई से शादी करने के बाद उनका हिस्सा भी छोटे भाई को हस्तांतरित हो जायेगा।

समाधान-

मँझले भाई की मृत्यु के साथ ही मँझले भाई का हिस्सा उस की पत्नी को मिल गया है। यदि उस के कोई संतान थी तो आधा संतान को आधा उस की पत्नी को मिला है। वह तो उस का हो चुका। शादी कर लेने के कारण उस से वापस नहीं लिया जा चुका है। यदि आप के कोई बहिन नहीं है तो जमीन के आप, छोटा भाई और मँझले की पत्नी तीनों बराबर के हिस्सेदार हैं। पत्नी की जमीन पर छोटे भाई का कोई अधिकार नहीं है। वह उस की पत्नी को उस से विवाह के पहले ही मिल चुका था।

अब आगे आप तीनों के जीवन काल में यह हिस्से इसी तरह रहने हैं। जीवन काल के बाद जिस की मृत्यु होगी उस के उत्तराधिकारियों को मृतक की संपत्ति प्राप्त होगी।  हाँ एक छूट जरूर है कि आप चाहेँ तो अपना अपना हिस्सा किसी और को बेच सकते हैं। एक दूसरे को रिलीज कर सकते हैं या फिर बेच सकते हैं उस पर कोई पाबंदी नहीं है।

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पत्नी को उस की इ्च्छा के विरुद्ध साथ नहीं रखा जा सकता।

June 13, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

कमलेश कुमार ने रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरी शादी 20 मई 2017 को हिन्दू रीति रिवाज के साथ हुई थी। बारात में मेरे गांव के लोगो से ससुराल पक्ष के लोगो ने मारपीट कर दी। उनके गांव वालों ने एक बाराती को खूब लहूलुहान होने तक मारा और नजदीक के थाना मे बाराती के खिलाफ केस दर्ज कर दिया। इसके बाद हमने समझौता कर के शादी की। लेकिन शादी के 1 माह बाद पता चला कि मेरी लड़की पक्ष के लोगों ने मेरे छोटे भाई के खिलाफ मारपीट की रिपोर्ट की है। फिर यह झुठा मामला समझौता करने पर बहुत मुश्किल से ससुराल पक्ष के हाथ-पांव जोड़ने पर 8-9 महीने में खत्म हुआ। शादी के बाद लड़की मेरे और मेरे परिवार के साथ गलत व्यवहार औऱ मेरे साथ मारपीट करने लगी। बात बात में लड़ने झगड़ने लगी फिर भी मैं इसे सहन करता रहा, कुछ समय बाद ठीक हो जाएगा कह कर। लेकिन दिन ब दिन और ज्यादा लड़ाई झगड़ा करने लगी।  फिर वह कभी 15 दिन के लिए तो कभी 1 माह के लिए बिना पूछे मायके चली जाती थी। कुछ महीनों बाद पता चला कि लड़की का गांव के एक लड़का के साथ अवैध संबंध था। तीज में एक माह से अधिक समय तक अपने घर मे रही और तभी वहीं गर्भवती हो गई। इस अवैध गर्भधारण की बात को उनसे कहने पर दहेज में फंसाने की बात करती थी। फिर भी लड़की को रखने के उद्देश्य से मैंने बात दबा दिया। 17 जून 2017 को एक लड़के को जन्म दिया।  लड़की मेरे साथ मुश्किल से 10 माह ही रही। इसके बाद मेरे घर रायपुर से अपने जीजा के साथ चली गई। उनका अपने जीजा के साथ भी अवैध संबंध है। फिर भी मैंने इस बात को नजरअंदाज कर दिया और उनके साथ रहने के लिए उनके जीजा के खिलाफ थाना में कोई शिकायत नहीँ की। उसके बाद कई प्रयास के बाद भी लड़की वापस नही आई। समाज मे भी आवेदन देके बुलाया लेकिन लड़की नही आई। महिला थाना में रिपोर्ट लिखाई थी की मेरे पति मुझे रख नही रहे है। महिला थाना में भी समझाइस दी गई कि अपने पति के साथ रहो लेकिन लड़की नही मानी और दहेज के समान मांग कर दी। मैं भी समान देने के लिए राजी हो गया। उसको महिला थाने में अपने सामान का लिस्ट देना था जो लड़की नही दी जिससे समान वापस नही कर पाया। अब कोर्ट में भरण पोषण की मांग कर रही है। मैं निजी कंपनी में काम करता हँ। मेरी सैलरी 10,000 महीना है। मैं रायपुर में 3000 किराये के मकान रहता हूं। लड़की मुझसे 12,000 महीना भरण-पोषण के लिए मांग रही है। मेरे और मेरे परिवार के नाम पर  कोई जमीन जायदाद नहीं है और न ही मेरे परिवार का अन्य आय का स्त्रोत है। जब भी समझौता के लिए उनके घर जाता हूँ तो मेरी पत्नी और उनके घर वाले मारपीट करते हैं। कई बार जाति समाज ने इस मामले को सुलझाने के लिए उन्हें बुलाया लेकिन कभी नही आई। इस वजह से मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। वही आफिस का काम भी ठीक ढंग से नहीं कर पा रहा हूं। जिससे नौकरी छूटने का भी खतरा है। अब मैं उस लड़की को मर्जी के हिसाब रखना चाहूंगा अगर वह मेरी साथ नहीं रहना चाहेगी तो मैं तलाक चाहता हूं। लेकिन जल्द से जल्द इस मामला का निराकरण चाहता हूँ। कृपया सलाह प्रदान करें।

समाधान-

प के अनुसार शादी के पहले झगड़ा हुआ, आप के बाराती से मारपीट की तब भी आपने शादी की। फिर वह परिवार वालों से बिना कारण झगड़ने लगी तब भी आप ने उस से कुछ नहीं कहा। वह मर्जी से अपने मायके आती जाती रही। फिर आप को पता लगा कि उस के किसी लड़के से संबंध हैं तब भी आप शान्त रहे। फिर वह मायके में गर्भवती हो गयी और एक बच्चे को जन्म दिया फिर भी आपने कुछ नहीं कहा। फिर वह बच्चे को साथ ले कर जीजा के साथ चली गयी, उस के साथ भी उस के अवैध संबंध हैं। आप ने उस के जीजा के खिलाफ भी कोई शिकायत नहीं की। अब तक आपने अपना कोई दोष नहीं बताया। आप इंसान हैं कि देवता है?

अब आप कहते हैं कि पुलिस ने समझौते के लिए बुलाया वह आप के साथ रहने को मना कर गयी। फिर कहते हैं कि आप उस को अपनी मर्जी के हिसाब से रखेंगे। भाई आप रखेंगे कैसे? वह रहना चाहेगी तब ना। और यदि पत्नी या पति न चाहे तो उसे जबरन तो पुलिस और अदालत भी साथ नहीं रखवा सकती। इस लिए यह ख्याल तो छोड़ दें कि आप उसे मर्जी के अनुसार अपने साथ रखेंगे।

आप तलाक लेना चाहते हैं तो किसी स्थानीय वकील से मिलिए। वे आपसे बात कर के आपसे जरूरी दस्तावेज इकट्ठा कर के पता करेंगे कि आप किन किन आधारों पर तलाक ले सकते हैं। फिर आप तलाक के लिए मुकदमा कर दें। पत्नी खर्चा मांग रही है तो देना पड़ेगा। जब तक वह दूसरी शादी नहीं कर लेती है तब तक देना पड़ेगा। बच्चे का खर्च भी देना पड़ेगा तब तक जब तक कि उस की कस्टडी आप को नहीं मिल जाती। आप तलाक का मुकदमा करने के बाद बच्चे की कस्टडी का मुकदमा कर सकते हैं।

मानसिक संतुलन मत बिगाड़िए, यह बीमारी है डाक्टर के पास जा कर इलाज कराइए। उस से कुछ होने वाला नहीं है और शारीरिक व मानसिक हानि और होगी।

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समस्या-

अनिल कुमार साहू ने धमतरी, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

म लोग 4 भाई और एक बहन हैं। पिताजी गुजर गए हैं, माता जी जीवित है। मेरा शासकीय नॉकरी के चलते गाँव से बाहर रहना होता है। घर मे 34 एकड़ खेती है। मैं परिवार से सम्बन्ध ठीक ना होने के चलते अपना बंटवारा पाना चाहता हूँ। किन्तु मेरे भाइयो के द्वारा माँ से बंटवारा ना देने की बात को बोलवाया जा रहा है। अब वो अपने जीते जी बंटवारा नहीं होने देना चाहती। क्या किया जा सकता है?

समाधान-

प गाँव छोड़ कर बाहर चले गए हैं। भाई ही जमीन को कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में वे चाहते हैं कि आप अपना हिस्सा छोड़ दें और उन से कुछ न लें। माँ के सामने भाई आप  को आप का हिस्सा देने से मना नहीं करना चाहते। माँ के बाद तो कह देंगे कि तुम ले के देख लो। इस कारण माँ को सिखा रखा है कि पुश्तैनी जमीन का तेरे सामने बंटवारा कैसे होने दें?

बेहतर तरीका यही है कि माँ को समझाइए कि वह अपने सामने संपत्ति के हिस्से कर दे। बाद में तो कोर्ट कचहरी करनी ही पड़ेगी। यदि माँ तैयार नहीं होती है तो आप को बंटवारे और अपने हिस्से पर पृथक कब्जे का वाद संस्थित कर दें। इस के लिए स्थानीय वकील की मदद से कार्यवाही करें।

समस्या-

गोंदिया, महाराष्ट्र से राहुल ने पूछा है

मैं हिन्दू हूँ, मेरा विवाह 2013 में हुआ था। में ने जिला न्यायलाय से 2016 में तलाक की डिक्री पारित करा ली। छह माह बाद दूसरा विवाह किया। दूसरी पत्नी का भी यह दूसरा विवाह है। पर उस ने 100 रुपए के स्टाम्प पेपर पर मुक्ति का दस्तावेज लिख कर तलाक लिया है, इस बात की जानकारी मुझे शादी के छह माह बाद हुई हैं। मेरी दूसरी पत्नी तलाक लेने के बाद भी अपने पता के घर से भाग गई थी और एक साल अपने पहले पति के साथ रही। अब मुझे मानसिक परेशानी दे रही है, धमकी देती है कि मैं आत्महत्या कर लूंगी। 498 में अन्दर करवा दूंगी वगैरा वगैरा। मुझे शुगर की बीमारी हो गयी है। मेरी बीमारी का फायदा उठा कर मुझे परेशान कर रही है। मैं बेवजह डिप्रेशन में हूँ। मैं उस से मुक्ति पाना चाहता हूँ। क्या मैं अपनी प्रेमिका से शादी कर सकता हूँ?

समाधान-

प ने जब दूसरा विवाह किया तब आप की पत्नी ने कहा कि वह शादीशुदा है और उस का तलाक हो चुका है तो आप को उस की तलाक की डिक्री देख लेनी चाहिए थी। यह जरूरी है। सब को देखनी चाहिए। मुक्ति के दस्तावेज का कोई विधिक मूल्य नहीं है। जैसे ही आप को पता लगा वैसे ही आप को तुरन्त अपनी पत्नी से अलग हो जाना चाहिए था और तुरन्त धारा 11 हिदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह को शून्य एवं अकृत घोषित करने का दावा करना चाहिए था।

प को अब भी अपनी पत्नी से तुरन्त अलग हो जाना चाहिए और उक्त प्रकार से घोषणा का दावा कर देना चाहिए।

प जानते हैं कि आप का विवाह शून्य और अकृत है इस कारण से आप अब किसी अन्य स्त्री से विवाह कर सकते हैं। उस के लिए दूसरे विवाह के शून्य व अकृत घोषित होने की डिक्री की प्रतीक्षा करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

वसीयत और हक-त्याग विलेख में क्या अन्तर हैं?

May 22, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

लालसोट, जिला दौसा, राजस्थान से अर्जुन मीणा ने पूछा है-

हक त्याग और वसीयत नामा में क्या अंतर है क्या कोई पुरुष या औरत हक त्याग करने के बाद उसकी संपत्ति वापस ले सकती है या नहीं?

समाधान-

क-त्याग हमेशा संयुक्त संपत्ति में अर्थात ऐसी संपत्ति में होता है जिस के एक से अधिक स्वामी हों। यह संपत्ति या तो पुश्तैनी हो सकती है या फिर  संयुक्त रूप से खरीदी गयी हो सकती है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद संपत्ति हमेशा संयुक्त हो जाती है क्यों कि मृत्यु के साथ ही उस के तमाम उत्तराधिकारी उस संपत्ति के संयुक्त स्वामी हो जाते हैं। यदि इन संयुक्त स्वामियों में से कोई एक या अधिक व्यक्ति उस संपत्ति में अपना अधिकार किसी अन्य संयुक्त स्वामी के पक्ष में त्याग दें तो हक त्याग करने वाले का हिस्सा उस संयुक्त स्वामी को मिल जाता है जिस के हक में हक-त्याग विलेख निष्पादित कराया गया है। संपत्ति में हक-त्याग विलेख से संपत्ति का हस्तांतरण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हो जाता है इस कारण इस विलेख का पंजीकृत होना भी आवश्यक है। पंजीकृत कराए बिना हक-त्याग विलेख का कोई मूल्य नहीं है।

क व्यक्ति  जिस संपत्ति का स्वामी है उस संपत्ति को पूरा या उस का कोई भाग किसी अन्य व्यक्ति के नाम वसीयत कर सकता है। वसीयत पर किसी तरह की कोई स्टाम्प ड्यूटी नहीं है और न ही उस का पंजीकृत कराया जाना जरूरी है। इस कारण वसीयत किसी सादा कागज पर भी हो सकती है, किसी भी मूल्य के स्टाम्प पर लिखी जा कर रजिस्टर भी कराई जा सकती है। वसीयत के लिए जरूरी है कि वसीयत करने वाला वसीयत (इच्छा-पत्र) पर अपने हस्ताक्षर कम से कम दो गवाहों की उपस्थिति में करे और वे दो गवाह भी अपने हस्ताक्षर वसीयत पर करें। वसीयत को पंजीकृत भी कराया जा सकता है। इस का लाभ यही है कि तब वसीयत का वसीयतकर्ता द्वारा दो गवाहों के समक्ष निष्पादित किया जाना प्रथम दृष्टया साबित मान लिया जाता है। इस के विपरीत कोई आपत्ति करे तो वह आपत्ति आपत्ति कर्ता को साबित करनी होती है। लेकिन वसीयत से संपत्ति का हस्तान्तरण तब तक नहीं होता जब तक कि वसीयतकर्ता की मृत्यु नहीं हो जाती। उस  की मृत्यु के साथ ही वसीयत प्रभावी हो जाती है और संपत्ति का हस्तान्तरण हो जाता है। लेकिन वसीयत को वसीयतकर्ता कभी भी निरस्त कर सकता है। कभी भी उसी संपत्ति के संबंध में दूसरी वसीयत कर सकता है।  दूसरी वसीयत पहली से भिन्न हो सकती है। एक ही संपत्ति के बारे ेमें कई वसीयतें हो सकती हैं। यदि अनेक वसीयतें हों तो वसीयत कर्ता ने जो वसीयत अंतिम बार की होगी वह मान्य होगी।

क्त विवरण से आप समझ गए होंगे कि वसीयत और हक-त्याग में क्या भिन्नता है। हक-त्याग केवल सहस्वामी के पक्ष में हो सकता है।  हक-त्याग एक बार होने पर निरस्त नहीं हो सकता। वसीयत वसीयतकर्ता कभी भी निरस्त कर सकता है या दूसरी बना सकता है। हक-त्याग विलेख यदि पंजीकृत है तो वह हक-त्याग करने वाले की इच्छा से निरस्त नहीं कराया जा सकता। हाँ उस में कोई अवैधानिकता हो तो उसे कानून के अनुसार न्यायालय में दावा कर के जरूर निरस्त कराया जा सकता है।

नाम परिवर्तन कैसे करें?

April 28, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

भँवर लाल दरोगा  ने बी/2, 405- एचडीआईएल रेजीडैंसी पार्क-1, नारंगी रोड बाई पास, विरार वेस्ट, वसई रोड, जिला पालघर, महाराष्ट्र-401303 से पूछा है-

मैं रेलवे में RPF विभाग में ASI के पद पर कार्यरत हूँ।  मैं मेरा नाम भँवर लाल दरोगा से बदल कर भँवर सिंह कच्छावा कराना चाहता हूँ तो इसके लिए मुझे क्या करना होगा।  केंद्रीय कर्मचारी की नाम बदलने की प्रक्रिया क्या है?

समाधान-

मारे विचार में जब तक कोई भारी अड़चन न आ रही हो तब तक नाम बदलना नहीं चाहिए। क्यों कि नाम बदलने की प्रक्रिया बहुत कष्टकारी है। फिर आप नौकरी कर रहे हैं। आप को अपने नियुक्ति अधिकारी से पत्र लिख कर पूछना चाहिए कि आप अपना नाम बदलना चाहते हैं आप को क्या क्या करना होगा? यदि आप के नियुक्ति अधिकारी सीधे सीधे प्रक्रिया न बताएँ तो आप यह आरटीआई के अंतर्गत आवेदन दे कर भी पूछ सकते हैं। यूँ सभी स्थानों पर नाम परिवर्तन की प्रक्रिया निम्न प्रकरा है-

अपना नाम बदलने के लिए सब से पहले आप को एक शपथ पत्र वांछित मूल्य के नॉन ज्युडीशियल स्टाम्प पेपर (राजस्थान में पचास रुपए का) अपने नाम से खरीद कर उस पर एक शपथ पत्र इस आशय का टाइप करवाना होगा कि आप का पुराना नाम ‘क’ है जिसे आप बदल कर ‘ख’ करना चाहते हैं, तथा इस शपथ पत्र के निष्पादन व सत्यापित कराने के उपरान्त आप नए नाम ‘ख’ से जाने जाएंगे।  इस शपथ पत्र को एक आवेदन पत्र के साथ अपने क्षेत्र के कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष सत्यापित कराने के लिए प्रस्तुत करना होगा। इसे सत्यापित करवाने के उपरान्त किसी अच्छी वितरण संख्या वाले समाचार पत्र में एक विज्ञापन प्रकाशित करवाना होगा कि आप का पुराना नाम ‘क’ था जिसे आप बदल कर ‘ख’ कर लिया है।

इस सत्यापित शपथ पत्र और विज्ञापन वाले समाचार पत्र की एक प्रति के साथ राज्य की राजधानी में स्थित राजकीय प्रेस पर एक आवेदन देना होगा कि आप अपना नाम बदलने की सूचना राजकीय गजट में प्रकाशित करवाना चाहते हैं। राजकीय प्रेस आप से निर्धारित शुल्क ले कर नाम परिवर्तन की सूचना गजट में प्रकाशित कर देगा। इस के बाद आप गजट की कुछ प्रतियाँ खरीद कर अपने पास रख लें।  गजट की ये प्रतियाँ ही आप के नाम परिवर्तन का सबूत होंगी। आप गजट की इन प्रतियों को प्रस्तुत कर अपने सभी दस्तावेजों और रिकार्ड में अपना परिवर्तित नाम दर्ज करवा सकते हैं।

समस्या-

र, मेरी जमीन के आगे की जमीन का लेवल बहुत ही नीचे है, उनके द्वारा मिट्टी को निकाल दिया गया है। जिससे हमें कृषि हेतु अनेक प्रकार के परेशानी का सामना करना पड़ा रहा है। पानी खेत में नही टिक पा रहा है तथा सारी मिट्टी सामने वाले के, खेत में जा रही है।  हमारे खेत की मिट्टी कम होती जा रही है। ऐसी बहुत समस्याएं हमारे सामने आ रही हैं। मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या मैं अपने खेत की मिट्टी निकाल सकता हूं क्या?  हमारे पीछे खेत वाले ने हमें धमकी दी है कि अगर तुमने अपने खेत से मिट्टी निकलवाई तो मैं तुरंत पुलिस को सूचित कर दूंगा।  मैं यह जानना चाहता हूं कि हमारा यह अधिकार नहीं है कि हम अपने निजी कार्य हेतु अपने खेत से मिट्टी निकाल सकें। इस संदर्भ में हमें थोड़ी सी जानकारी चाहिए हमें अपने खेत से मिट्टी निकालने के लिए क्या करना चाहिए?

 – रमेश चंद्र चौसाली

समाधान-

प को ध्यान रखना चाहिए कि समस्त कृषि भूमि सरकार के स्वामित्व की होती है और कृषक केवल उस का खातेदार कृषक है जिस की हैसियत एक किराएदार जैसी है। कृषक से किराए के रूप में हर वर्ष सरकार लगान वसूल करती है। जब आप खेत के मालिक ही नहीं हैं तो अपनी मर्जी से अपने काम के लिए मिट्टी कैसे निकाल सकते हैं। लेकिन यही काम आप सरकार की अनुमति से कर सकते हैं।

आप ने हमें नहीं बताया है कि आप का खेत किस राज्य के किस जिले की किस पंचायत में स्थित है। प्रत्येक राज्य के लिए खेती की जमीन का कानून भिन्न भिन्न है। पर लगभग सभी कानूनों में तहसीलदार को राज्य का प्रतिनिधि मान कर यह अधिकार दिया है कि वह खातेदार कृषक को उस की भूमि में से मिट्टी निकालने की अनुमति प्रदान कर सके। यदि आप को अपने निजी कार्य के लिए मिट्टी की आवश्यकता है तो आप अपनी  आवश्यकता बताते हुए तहसील में आवेदन दीजिए। तहसलीदार से लिखित अनुमति प्राप्त  हो जाने पर मिट्टी निकालें। तब पुलिस भी कुछ नहीं कर पाएगी।

Women rights

समस्या-

रघुनदंन सोलंकी ने विजयनगर, सवाईमाधोपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मारी पुस्तैनी जमीन है।  मेरे पिताजी के हम तीन पुत्र हैं, कोई पुत्री नहीं है। मेरे पिताजी का देहान्त हो चुका है, तथा हमारी माताजी जीवित हैं।  हमारे दोनो बड़े भाईयो की शादी हो चुकी है।  परन्तु शादी के 1 साल बाद हमारे मंझले भाई की निसंतान अवस्था मे मृत्यु हो गई। उसके 1 माह बाद हमारी भाभी मायके चली गई,  6 माह बाद उनके घरवालो ने बिना हमें बताये उनका नाता किसी के साथ कर दिया (नाता प्रथानुसार)।  मेरी भाभी और उनके दूसरे पति ने हम बताये बिना धोखे से हमारी पुस्तैनी जमीन पर नामांतरण खुलवाकर 1/4 में से 1 हिस्सा स्वंय के नाम कर लिया।  नामांतरण 2015 में खुलवाया गया जबकि उनका नाता 2013 में हुआ, जिसके सबूत के रुप मे हमारे पास 2014 में बनाये गये आधार, पहचान पत्र, राशन कार्ड की प्रति है जिनमे पति के रुप में उनके दूसरे पति का नाम है।  उसे दूसरे पति से एक पुत्र भी है।  तो क्या इस स्थिति में भी वह हमारी पुस्तेनी जमीन मे हिस्सेदार है?  क्योंकि हमे डर है कि कहीं वो जमीन बेच न दे? कृपया मदद करें।

समाधान-

प की निस्संतान विधवा भाभी ने नाता विवाह कर लिया है और उस के बाद उस ने आप की पुश्तैनी जमीन का नामान्तरण राजस्व रिकार्ड में करवा लिया है। जिस के अनुसार एक चौथाई संपत्ति उस के नाम दर्ज हो गयी है। इन तथ्यों के साथ मूलतः आप की समस्या यह है कि कही विधवा भाभी उस के नाम नामान्तरित एक चौथाई संपत्ति को  विक्रय न कर दे? क्या उसे नाता करने के बाद भी पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सा प्राप्त करने और नामान्तरण कराने का अधिकार था?

सब से पहले तो आप को यह समझना चाहिए कि पुश्तैनी संपत्ति क्या है?  पुश्तैनी संपत्ति जिन संपत्तियों के सम्बंध में कहा जाता है उन्हें हमें सहदायिक संपत्ति कहना चाहिए। ऐसी संपत्ति जो कि किसी हिन्दू पुरुष को उस के पिता, दादा या परदादा  से उन की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो। ऐसी संपत्ति में उत्तराधिकारी के पुत्र का हिस्सा जन्म से ही निश्चित हो जाता था। लेकिन 17 जून 1956 से हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू हो गया। इस तरह किसी भी स्वअर्जित संपत्ति का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम से शासित होने लगा। जिस में पुत्रों के साथ साथ पुत्रियोँ, पत्नी और माँ को बराबर का हिस्सा दिया गया था।  इस का अर्थ यह हुआ कि उक्त तिथि 17.06.1956 के बाद से कोई भी संपत्ति सहदायिक संपत्ति बनना बन्द हो गयी। इस कारण यदि कोई संपत्ति दिनांक 17 जून 1956 के पहले किसी हिन्दू पुरुष को उसके पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी तो वह सहदायिक होगी। लेकिन इस तिथि के बाद कोई भी स्वअर्जित संपत्ति सहदायिक नहीं हो सकती थी।तो पहले आप जाँच लें कि जिसे आप अपनी पुश्तैनी संपत्ति बता रहे है वह वास्तव में सहदायिक संपत्ति भी है या नहीं है।

आप का मामला 2005 के बाद का है। इस कारण आप की इस संपत्ति पर 2005 के संशोधन के बाद का हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होगा। उस की धारा 6(3) में यह उपबंध है कि किसी सहदायिक संपत्ति मेंं हि्स्सेदार हिन्दू (पुरुष और स्त्री दोनों) की मृत्यु हो जाती है तो यह माना जाएगा कि सहदायिक संपत्ति में उस का जो हिस्सा था वह संपूर्ण सहदायिक संपत्ति का विभाजन हो कर उसे मिल चुका था और उस का उस हिस्से का उत्तराधिकार उत्तरजीविता के आधार पर नहीं बल्कि हिन्दू उतराधिकार अधिनियम के उपबंधों के अनुसार निश्चित किया जाएगा।

उक्त नियम के अनुसार जिस दिन आप के पिता जी की मृत्यु हुई उस दिन उन का हिस्सा तीन भाइयों और माँ को बराबर के चार हिस्सों में मिल गया अर्थात संपत्ति में सभी का 1/4 हिस्सा हो गया। अब एक विवाहित निस्संतान भाई की मृत्यु हो गयी तो उस का हिस्सा उस की पत्नी के हिस्से में उसी दिन चला गया जिस दिन आप के भाई की मृत्यु हो गयी थी। उस भाभी ने बाद में नाता कर लिया। उस ने नाता किया। विधवा होने के बाद तो वह  वैधानिक विवाह भी कर सकती थी। इस नाते को भी वैधानिक विवाह ही माना जाएगा। लेकिन नाता होने से या विवाह कर लेने से  किसी विधवा को उस के पति से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति वापस अन्य उत्तराधिकारियों में जाने की कोई विधि या कानून नहीं है। पति से उत्तराधिकार प्राप्त कर लेने से विधवा के विवाह में भी किसी तरह की रोक नहीं है।

इस तरह आप की विधवा भाभी ने नाता करने के उपरान्त भी जो नामान्तरण खुलवाया है वह विधिपूर्वक है। वह आज भी उस 1/4 हिस्से की स्वामिनी है। वह जमीन का बंटवारा करवा कर अपने हिस्से को अलग करवा कर अपना खाता अलग खुलवा सकती है अपने हिस्से पर अलग से कब्जा प्राप्त कर सकती है और उसे विक्रय या किसी भी प्रकार से हस्तान्तरित कर सकती है। वह बिना बंटवारा कराए भी अपने हिस्से की भूमि का विक्रय कर सकती है।

 

समस्या-

अतुल कुमार पाठक ने ४, अश्वनीपुरम कालोनी, फैजाबाद, उ०प्र० से पूछा है – 

         मैंने वर्ष २०१२ में राम मनोहर लोहिया अवध यूनिवर्सिटी में पंचवर्षीय विधि स्नातक पाठ्यक्रम में एडमिशन लिया था। यूनिवर्सिटी द्वारा सेमेस्टर एग्जाम हमेशा विलम्ब से सम्पादित कराया गया जिसके कारण आज २०१८ तक (६ वर्षों में) भी मेरा कोर्स पूरा नही हुआ। पांच वर्ष का कोर्स पूरा होने में लगभग ७ वर्ष का समय लग जायेगा। हम छात्रों द्वारा लखनऊ उच्च न्यायलय से डायरेक्शन भी कराया जा चुका है समय से परीक्षा करने के लिए। जिसका कोई फायदा नही मिला। क्या यूनिवर्सिटी से क्षतिपूर्ति प्राप्त किया जा सकता है? और कैसे? यदि कोई केस लॉ हो तो अवश्य बतायें।

समाधान-

            विश्वविद्यालय एक विधि द्वारा स्थापित निकाय है जो किसी विशिष्ठ पाठ्यक्रम में अध्ययन की पूर्णता हो जाने पर विद्यार्थी की जाँच कर के तय करता है कि उस ने यह पाठ्यक्रम सफलतापूर्वक पूर्ण किया है या नहीं। यह विश्वविद्यालय का वैधानिक दायित्व है। परीक्षा आयोजित करने में देरी के कारण उस के विरुद्ध केवल उपभोक्ता कानून के अंतर्गत ही क्षतिपूर्ति प्राप्त किए जाने की संभावना बनती थी। किन्तु सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार स्कूल एक्जामिनेशन बोर्ड बनाम सुरेश प्रसाद सिन्हा “(2009) 8 एससीसी 483” के प्रकरण में यह निर्धारित किया है कि बोर्ड व विश्वविद्यालय सेवा प्रदाता नहीं हैं और न ही विद्यार्थी एक उपभोक्ता है।

ऐसी स्थिति में वर्तमान में किसी भी विश्वविद्यालय से परीक्षाएं आयोजित करने व परिणाम प्रदान करने में हुई देरी के लिए कोई क्षतिपूर्ति प्राप्त करना संभव नहीं है। यदि कभी कानून में संशोधन कर के विश्वविद्यालयों को सेवा प्रदाता मान लिया जाए और विद्यार्थियों को उपभोक्ता मान लिया जाए तो इस तरह की देरी के लिए उन से क्षतिपूर्ति प्राप्त की जा सकती है। वर्तमान स्थिति में नहीं। कानून में संशोधन केवल विधानसभाएँ और संसद ही कर सकती हैं।

इधर जिस तरह से शिक्षा का बड़े पैमाने पर निजीकरण हुआ है, विश्वविद्यायों को स्वायत्त्त घोषित किया जा रहा है वैसे स्थिति में यह आवश्यक है कि इन के कार्यों को सेवा माना जाए और उन्हें उपभोक्ता कानून के दायरे में लाया जाए। इस के लिए विद्यार्थियों व अभिभावकों को सरकरों पर यह दबाव बनाना चाहिए कि वे कानूनों में पर्याप्त संशोधन कर के विश्वविद्यालयों, शिक्षा बोर्डों तथा विद्यालयों को उपभोक्ता कानून के दायरे में लाएँ।

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