दंड प्रक्रिया संहिता Archive

अपराधिक केस फर्जी होने पर प्रतिरक्षा करना ही उपाय है।

December 21, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जितेन्द्र ने शैखपुरा बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे विरुद्ध एक सरकारी कर्मचारी द्वारा धारा 341, 323, 353, 379, 504, 506/34 में एक फर्जी केस दर्ज करवा दिया है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

जितेन्द्र जी,

प के विरुद्ध मुकदमा हुआ है। केवल आप जानते हैं कि वह फर्जी है। बाकी पुलिस ने तो गवाही और सबूतों के आधार पर ही आरोप पत्र प्रस्तुत किया होगा। इस का एक ही इलाज है कि आप इस मुकदमे में अच्छा वकील करें और अपनी प्रतिरक्षा करें। यदि यह सिद्ध हो जाता है कि यह एक फर्जी मुकदमा है तो आप न्यायालय से यह निवेदन कर सकते हैं कि उक्त मामले में फर्जी मुकदमा दर्ज कराने वाले कर्मचारी के विरुदध कार्यवाही की जा कर उसे सजा दी जाए।

यदि आप इस मुकदमे में बरी हो जाते हैं तो आप दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के लिए हर्जाना प्राप्त करने के लिए उक्त सरकारी कर्मचारी के विरुदध दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

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बन्दी रखने वाला ससुराल छोड़ कर ही आगे बढा़ जा सकता है।

September 19, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_Desertion-marriage.jpgसमस्या-

मोनिका ने हिसार, हरियाणा से पूछा है-

मेरी शादी को पाँच महिने हुए हैं। कुछ दिन बाद से ही मरे ससुराल वाले और पति मुझे परेशान कर रहे हैं। शादी से पहले मुझे बताया था कि मेरा पति ड्रिंक नहीं करता है औऱ शादी के बाद मैं अपनी पढ़ाई जारी रख सकती हूँ। लेकिन ये मुझे पढ़ाई नहीं करने देते हैं, न ही नौकरी करने देते हैं। घर से भी नहीं निकलने देते, मुझे कैद कर रखा है। मेरा पति रोज ड्रिंक कर के घर आता है और मुझ से लड़ाई करता है। मुझे मायके भेजने की धमकी देते हैं। मैं पढ़ना चाहती हूँ, आगे बढ़ना चाहती हूँ कुछ बोलती हूँ तो सब मेरे साथ बोलना बन्द कर देते हैं 20-20 दिन मुझ से कोई नहीं बोलता। मायके गयी तो एक माह तक मुझे लेने कोई नहीं आया। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प के कथनों से एक बात पक्की लग रही है कि आप के ससुराल वालों को आप जैसी बहू नहीं बल्कि घर में बन्द रह कर घर का काम करने वाली बहू चाहिए थी। आम तौर पर विवाह के पहले लोग वायदे कर देते हैं यह सोच कर कि विवाह के बाद सब ठीक हो जाएगा। हमें नहीं लगता कि आप अपनी ससुराल में रह कर पढ़ाई आगे बढ़ा सकती हैं। आप का पति भी ड्रिंक करना नहीं छोड़ेगा। घर के बाहर निकलना भी आप का स्वतंत्रता पूर्वक नहीं हो सकता।

यदि आप इन परिस्थितियों से तंग हैं तो आप अपनी ससुराल छोड़ सकती हैं इस का आप को अधिकार है। क्यों कि आप के साथ ससुराल में वाजिब व्यवहार नहीं हो रहा है जो कि आप के साथ क्रूरता है। यदि आप के मायके वाले सपोर्ट करने में सक्षम हों तो आप मायके जा कर वहाँ नौकरी तलाश कर के नौकरी कर सकती हैं और अपनी पढ़ाई जारी रख सकती हैं। इस के साथ ही आप अपने पति से प्रतिमाह भऱण पोषण राशि प्राप्त कर सकती हैं जिस के लिए आप को धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता अथवा घरेलू हिंसा अधिनियम के अन्तर्गत आवेदन करने होंगे। आप चाहें तो ससुराल वालों की क्रूरता के लिए उन के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है जिस पर धारा 498ए का मामला दर्ज हो सकता है।

आप यदि वास्तव में अपनी परिस्थितियों को बदलना चाहती हैं तो आप को ससुराल छोड़ना ही पड़ेगा। एक बार ससुराल छोड़ दें फिर किसी अच्छे स्थानीय वकील से मिल कर सलाह करते हुए आगे का रास्ता तय कर सकती हैं।

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समस्या-

प्रियंका गौतम ने इस्लामपुरा, सोरन, जिला टोंक राजस्थान से पूछा है-

मेरे पापा को 20 अगस्त 2016 को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है दारू के केस में जो कि 2006 का केस है। मेरे पापा की पिछली बार हम ने जमानत पर छुड़वाया था उस के बाद ताऱीख पर न जाने के कारण कोर्ट ने उन को भगोड़ा घोषित कर दिया। कोर्ट ने उन को भगोड़ा घोषित क्यों किया? 2010 के बाद कोई पुलिस वाला हमारे पास नहीं आया, कोई नोटिस नहीं आया।

 

समाधान-

ब दारू के केस में आप के पापा पहली बार पकड़े गए तो अदालत ने उन की जमानत ले कर उन्हें छोड़ दिया क्यों कि जमानत इस बात की थी कि वे हर तारीख पर अदालत में हाजिर होते रहेंगे। लेकिन वे तारीख चूके और उन का गिरफ्तारी वारंट निकला। आप ने उन की जमानत करवा ली। वे फिर से तारीख पर नहीं गए तो फिर से जमानत जब्त हो गयी और फिर गिरफ्तारी वारंट निकल गया।

इस तरह यह जरूरी नहीं है कि गिरफ्तारी वारंट निकालने के लिए किसी मुलजिम को फरार या भगोड़ा घोषित किया ही जाए और उस के पहले उसे तथा उस के पते पर कोई नोटिस या समन भेजा ही जाए।

हमें नहीं लगता कि आप के पिताजी को भगोड़ा घोषित किया गया है।दो-तीन बार जमानत पर छोड़े जाने के बाद भी कोई अभियुक्त पेशी चूके तो उसे भगोड़ा घोषित किया जा सकता है उस के लिए उस की संपत्ति को कुर्क करना होता है। यदि उन की संपत्ति कुर्क की गयी होती तो संपत्ति पर नोटिस जरूर चस्पा होते।

आप अपने पापा की जमानत करवा सकते हैं, हालांकि यह आसानी से नहीं होगी। फिर भी एक दो सप्ताह जेल में रहने के बाद हो सकती है। आप को प्रयत्न करना चाहिए।

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rp_Desertion-marriage.jpgसमस्या-

प्रमोद ने भिलाई छत्तीसगढ़ से पूछा है-

त्नी व ससुराल वालों ने मेरे व मेरे परिवार के विरुद्ध आजमगढ़ न्यायालय (उ.प्र.) में डी.वी. एक्ट 2005, 125, 498ए, 323, 504, 506, 3/4 डी.पी. एक्ट के तहत झूठा मुकदमा लगाया है। उसने अपने आरोप पत्र में दहेज मांगने, दिनांक 15/08/2015 को मार-पीट गाली-गलौज करके घर (गांव के घर) से निकाल देने का आरोप लगाया है। उसने अपने गांव के सरपंच से फर्जी कागज बनवाया है जिसमें उसने शादी का स्थान उसके गांव कोलमोदीपुर (आजमगढ़) को दर्शाया व उसे न्यायालय में लगाया है। जबकि शादी दिनांक 22/02/2015 को गाजीपुर (उ.प्र.) में होने के गवाह व सबूत हैं तथा दिनांक 15/08/2015 को मैं अपने गांव के घर में नहीं था उस दिन मैं ट्रैन से यात्रा कर रहा था उसका टिकट व गवाह हैं। मेरे भाई भी गांव में नहीं थे वे हमारे मूल- निवास भिलाई (छ.ग.) में थे।  मेरे पास ये भी सबूत है कि पत्नी के विदाई के दिनांक 14/08/2015 को ही पत्नी अपने पिता व रिश्तेदार के साथ मिलकर गांव-समाज व पंचायत के सामने अपने मांग का सिन्दूर पोंछकर तलाक देने की बात कहकर अपना पूरा सामान गहना व हमलोगों से रुपये लेकर अपने मायके चली गयी थी।  मेरे पास पत्नी के द्वारा दिया हुआ नोटरियल इकरारनामा/ शपथपूर्वक कथन है जिसमें स्पष्ट लिखा है कि मैं और मेरा परिवार कभी भी उससे या उसके परिवार से धन- दहेज की मांग नहीं किये है, कभी भी उसके साथ मार- पीट गाली गलौज व दुर्व्यवहार नहीं किया है। उल्टा पत्नी ने ही मेरे व मेरे परिवार वालो से गाली गलौज व दुर्व्यवहार किया है तथा उसके तलाक देना व उसकी धमकियों का विवरण है। उसने यह नोटरी अपने मायके (गाजीपुर) में रहते हुए गाजीपुर न्यायालय में दिनांक 07/12/2015 को कर के दिया है। जिसमें उसका फोटो व हस्ताक्षर तथा उसके पिता व चार गवाहों के हस्ताक्षर हैं।  मेरे पास गवाह दस्तावेजी सबूत है जिससे यह साबित हो जायेगा कि मैं और मेरा परिवार निर्दोष है तथा पत्नी व ससुराल वाले दोषी साबित हो जायेंगे। मेरे ससुराल वाले किसी भी तरह से समझौता नहीं करना चाहते हैं। मेरा प्रश्न आप से यह है कि क्या मैं सीआरपीसी की धारा 340 के तहत मुकदमा कर सकता हूँ यदि हाँ तो किस प्रकार से और किस न्यायालय में (मेरी शादी के स्थान गाजीपुर या मूल निवास भिलाई में) और यदि नहीं तो किस वजह से नहीं कर सकता हूँ इसका कारण बताईये । यह भी जानना चाहता हूँ कि और कौन- कौन सा मुकदमा उनके विरुद्ध कर सकता हूँ?

समाधान-

प ने अपनी समस्या से संबंधित काफी तथ्य यहाँ रखे हैं। हमारी अपराधिक न्याय व्यवस्था ऐसी है कि जब तक न्यायालय किसी अपराधिक मामले में प्रसंज्ञान नहीं ले लेता तब तक अभियुक्त को कुछ कहने का अधिकार नहीं है, अदालत को भी उसे सुनने का अधिकार नहीं है। प्रसंज्ञान लेने के उपरान्त आरोप विरचित करने के लिए बहस होती है वहाँ अभियुक्त को सुनवाई का अवसर प्राप्त होता है वहाँ आप अपनी बात कह सकते हैं, लेकिन वहाँ भी आप के बचाव वाले सबूतों को नहीं देखा जाएगा।

जब मुकदमे की सुनवाई होगी तब आप को गवाहों से जिरह का अवसर मिलेगा। अभियोजन पक्ष की गवाही हो जाने के उपरान्त आप को बचाव में साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा तब आप इन सारे सबूतों का उपयोग कर सकते हैं। मुकदमे तो आप को लड़ने ही होंगे।

धारा 340 दंड प्रक्रिया संहिता में आप उसी न्यायालय को शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं जहाँ आप के विरुद्ध झूठे सबूत या गवाही आदि दी जा रही है। पर यदि आप अभी यह आवेदन प्रस्तुत करेंगे तो यह जल्दबाजी होगी। पहले उन सबूतों को गवाही से प्रमाणित हो जाने दीजिए तभी तो आप धारा 340 के अन्तर्गत आवेदन दे सकेंगे।

आप किन किन धाराओं के अन्तर्गत धारा 340 का आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं यह आप की सामग्री का अध्ययन कर तथा आप से बातचीत कर के आप के वकील तय कर सकते हैं।

फिर भी आप को लगता है कि प्रथम दृष्टया ही आप यह साबित कर सकते हैं कि आप के विरुद्ध किए गए मुकदमे झूठे हैं तो आप प्रथम सूचना रिपोर्ट तथा मुकदमा रद्द कराने के लिए उच्च न्यायालय में धारा 482 के अन्तर्गत रिविजन याचिका दायर कर सकते हैं।

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समस्या-Havel handcuff

शीलू ने उन्नाव, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरा एक लड़के से कई दिनों से अफेयर चल रहा था। पहले उसने मेरे साथ जबरदस्ती की थी। लेकिन बाद में उसने कहा कि वह उससे शादी कर लेगा। लेकिन 2 से 3 साल बीत जाने पर अब वह मना कर रहा है। वह कह रहा है कि जो करना है कर लो वह शादी नहीं करेगा। उसके घर वालो को सब पता है। मुझे शुरू से बहुत डरा धमका रहा है इसलियें मैंने अपने घर में सबको नहीं बताया है। मेरी अपेक्षा वह पैसे वाला भी है। अब वह मुझको डराकर अपने दास्तों से सम्बन्ध बनाने के लिये कह रहा है। घर पर मैंने अपने भाई से बताया है तो वह कह रहा है कि चुपचाप रहो और मैं लड़का देखकर कहीं और शादी कर दूंगा।  नहीं तो सब जगह अपनी ही बदनामी होगी। उसके पास पैसा है उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। वह अच्छा वकील कर के छूट जायेगा।  लेकिन मैं अब उसी लड़के से शादी करना चाहती हूँ क्या करूँ। अगर कुछ हल नहीं निकला तो मैं आत्महत्या कर लूंगी।  मेरी मदद करें।

समाधान-

म उन लोगों की बात का कोई उत्तर नहीं देते जो अपने प्रश्न में यह कहते हैं कि हल न निकला तो आत्महत्या कर लूंगा/ लूंगी। इस प्रश्न का उत्तर इस कारण दे रहा हूँ कि इस तरह का प्रश्न पहली बार हमारे पास आया है।

आप के कहने से पता लगता है कि उस लड़के ने कभी आप से प्रेम नहीं किया। उस ने पहले आप के साथ जबर्दस्ती की। फिर समाज में प्रचलित इस धारणा का कि जिस लड़की के साथ किसी ने बलात्कार कर दिया वह विवाह और परिवार में रहने लायक नहीं होती, दुरूपयोग करते हुए आप को धमकाया साथ में आप को विवाह का लालच दिया। आप भी यही समझती हैं कि बलात्कार की इस श्रंखला को छुपाना ही श्रेयस्कर है आप ने भी अपने शोषण को स्वीकार कर लिया। अब उस लड़के ने पीठ दिखा दी है। वह समझता है कि आप में अब इतना नैतिक साहस शेष नहीं है कि आप पुलिस में बलात्कार की इस श्रंखला की शिकायत कर सकें। इस कारण वह अकड़ गया है।

यह सब कथानक यह बताता है कि वह लड़का आप से कभी प्रेम नहीं करता था। ऐसा व्यक्ति कभी किसी से प्रेम नहीं कर सकता। क्यों कि जो व्यक्ति किसी लड़की का बलात्कार कर सकता है और उसे धमका कर और लालच दिखा कर बलात्कार को जारी रखता है वह कभी किसी से प्रेम करने लायक हो ही नहीं सकता। वह आप का ही नहीं अपितु समस्त स्त्री समुदाय का अपराधी है, इस समाज का अपराधी है उस की शिकायत होनी चाहिए और उसे दंडित होना चाहिए।

आप के भाई का सुझाव भी जैसा हमारा समाज है वैसा ही है। अक्सर ऐसी घटनाओं की शिकार लड़कियों में से 99 प्रतिशत लड़कियाँ यही करती हैं कि वे चुपचाप विवाह कर अपनी ससुराल चली जाती हैं और सारा जीवन इस भय में गुजार देती हैं कि उन के पति को या ससुराल वालों को या अन्य किसी को उन के जीवन का यह अंधेरा पता न लगे।

यदि आप उस लड़के के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट कराती हैं तो उस का पैसा भी उसे नहीं बचा पाएगा। उस के विरुद्ध बलात्कार और ब्लेकमेल करने के अपराध में मुकदमा भी चलेगा और उसे सजा भी मिलेगी। अभी आप उस लड़के के चंगुल में हैं, जब वह चंगुल में फंसेगा तो दस बार आप के सामने विवाह के लिए नाक रगड़ेगा। हमारा सुझाव है कि आप को उस लड़के के विरुद्ध पुलिस रिपोर्ट करना चाहिए और उसे दंडित कराना चाहिए। यदि आप पूरी मुस्तैदी से यह काम करती हैं तो आप समाज का भला करेंगी, उन तमाम स्त्रियों के हक में काम करेंगी जो इस तरह शिकार बनती हैं। जब वह खुद को बचाने के लिए  पुनः विवाह का प्रस्ताव रखे तो उसे मना कर दीजिएगा, यही उस की सजा होगी। हमें विश्वास है कि आप को कोई न कोई सच्चा जीवन साथी भी मिल जाएगा जो आप के अतीत को जानते हुए भी आप के साथ पूरा जीवन बिताने को तैयार होगा।

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rp_judge5.jpgसमस्या-

 

रजनीश रानू ने सुपौल बिहार से पूछा है-

 

दो भाई आपस में ज़मीनी विवाद किए और उसमें मेरा नाम दे दिए। मैं पुलीस जाँच और चार्जशीट से बाहर हो गया। परंतु सीजीएम ने हमारे ऊपर प्रसंज्ञान ले लिया है। क्या करूँ? उपाय सुझायें।

 

समाधान-

 

प के पास दो विकल्प हैं-

 

पहला विकल्प तो यह है कि जैसे इस मुकदमे के सब अभियुक्त मुकदमे में अपना बचाव करेंगे वैसे ही आप भी करिए। जब आप पर आरोप मिथ्या है तो आप बरी हो जाएंगे।

 

दूसरा विकल्प यह है कि आप अपने विरुद्ध प्रसंज्ञान लेने के आदेश के विरुद्ध रिविजन याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं और न्यायालय द्वारा लिए गए प्रसंज्ञान को रद्द करवा सकते हैं। यह दूसरा विकल्प आप को अवश्य अपनाना चाहिए।

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rp_judge-caricather11.jpgसमस्या-

पिंकी कुमारी ने बिहार से पूछा है-

मैं एक अनुसूचित जाति की लड़की हूँ और मैं बिहार सरकार की एक सोसायटी में काम करती हूँ।  मैंने अपने वरिष्ठ पदाधिकारी की प्रताड़ना से तंग आकर वरिष्ठ पदाधिकारी के विरुद्ध न्यायालय में परिवाद पत्र दायर किया था। जिस पर न्यायालय ने प्रसंज्ञान लेते हुए धारा 3(1) (x) अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत सम्मन जारी किया है जिस में आरोपित को दो महीने बाद उपस्थित होना है। क्या इस बीच आरोपित व्यक्ति की गिरफ़्तारी हो सकती है।

समाधान-

किसी भी मामले में न्यायालय द्वारा प्रसंज्ञान लिए जाने के उपरान्त अभियुक्त को न्यायालय में लाने के लिए प्रोसेस धारा 204 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत जारी किया जाता है। यदि मामला समन्स केस का हो तो न्यायालय अभियुक्त को न्यायालय के समक्ष लाने के लिए समन्स जारी कर सकता है। लेकिन यदि मामला वारंट केस का हो तो न्यायालय उस मामले में अपने विवेक से समन्स या वारंट दोनों में से कोई एक तरीका अभियुक्त को कोर्ट के समक्ष लाए जाने हेतु अपना सकता है।

आप के मामले नें न्यायालय ने समन्स से अभियुक्त को बुलाना उचित समझा है। इस कारण इस मामले में अभी वारंट जारी होना या गिरफ्तारी संभव नहीं है। यदि अभियुक्त समन्स तामील होने पर भी न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं होता है तो आप न्यायालय से आग्रह कर सकती हैं कि गिरफ्तारी वारंट जारी किया जाए। न्यायालय मामले में वारंट जारी कर सकता है और पुलिस अभियुक्त को गिरफ्तार कर के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकती है।

इस मामले में न्यायालय ने समन्स जारी किए हैं इस कारण अगली बार भी गिरफ्तारी के स्थान पर जमानती वारंट ही जारी किए जाने की संभावना है।

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107 दं.प्र.सं. के प्रकरण का नौकरी पर कोई असर नहीं।

June 25, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

Law-advice-teesarakhamba समस्या-

मनोज कुमार ने जौनपुर उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरी एयरफोर्स में नियुक्ति हो गयी है। मेरे पड़ौसी ने रंजिशवश मेरा नाम 107, 116(3) दंडप्रक्रिया संहिता के प्रकरण में लिखा दिया है क्या मेरे वेरीफिकेशन में दिक्कत आएगी? मुझे जमानत करा लेनी  चाहिए या फिर वैसे ही जोइनिंग पर चले जाना चाहिए? घटना के दिन मैं कालेज में था डायरेक्टर ने वेरीफाई कर रखा है। क्या मेरी नौकरी पर कोई आँच आएगी।

समाधान-

धारा 107, 116 (3) दंड प्रक्रिया संहिता की हैं और धारा 107 में यदि किसी व्यक्ति से शान्ति भंग होने की सम्भावना हो तो उस के विरुद्ध कार्यवाही की जा सकती है। तथा कार्यवाही के चलते रहने के दौरान उसे शान्ति बनाए रखने के लिए पाबंद किया जा सकता है। इस मामले में या तो पुलिस धारा 151 में गिरफ्तार कर व्यक्ति को एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करती है या फिर एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद दाखिल करती है जिस का समन व्यक्तियों को तामील कराया जाता है। आप के मामले में संभवतः आप को समन भेजा जाएगा।

यदि आप को समन नहीं मिला है तो आप बिना जमानत कराए ड्यूटी के लिए जा सकते हैं आप को कोई परेशानी नहीं होगी। लेकिन यदि आप को समन मिल गया है तो आप पर न्यायालय में तारीख पर उपस्थित होने की जिम्मेदारी आ गयी है वर्ना आप का जमानती वारंट भी निकाला जा सकता है। यदि समन नहीं मिला है तो बेहतर है आप उसे लेना टालें और पहले अपनी नौकरी जोइन करें।

यदि समन मिल ही गया है तो चूंकि आप घटना के समय कालेज में थे इस कारण आप इस कार्यवाही को निरस्त कराने के लिए सेशन न्यायालय में रिवीजन याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं, जिस से यह कार्यवाही रुक जाएगी और आप अपनी नौकरी जोइन कर सकेंगे। यह कार्यवाही किसी अपराध के संबंध में नहीं है इस कारण इस से आप की नौकरी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

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समस्या-

बबिता वाधवानी ने मानसरोवर, जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा प्रेम विवाह 1994 में आर्य समाज मन्दिर में हुआ। पति के सकाराक व्‍यवहार न होने के कारण व समय के साथ अपमान करने की हदें पार करने के कारण मैंने सितम्‍बर 2005 में आपसी सहमति से तलाक ले लिया। तलाक के दिन घर आकर क्‍योंकि हम एक ही घर के दो कमरों में अलग अलग रहते थे, मैंने कारण पूछा था कि इस नकारात्‍मक व्‍यवहार के पीछे क्‍या कारण था तो मुझे जवाब मिला कि दोस्‍तो में शर्त लगी थी कि कौन इस लडकी से प्‍यार का नाटक कर शादी कर सकता है, तो मैंने शर्त जीतने के लिए प्‍यार का नाटक किया था और तुमसे शादी की थी। मेरी बेटी का जन्‍म 1997 में हुआ। मैंने कोर्ट में बच्‍ची की जिम्‍मेदारी मांगी लेकिन मैंने उसकी पढाई का खर्चा पिता को उठाने के लिए लिखा। मैंने अपने लिए कोई खर्चा नहीं मांगा क्‍योंकि उसके साथ रहते हुए ही मैंने अपनी कमाई से ही अपने लिए दो रोटी जुटाई तो तलाक के बाद उससे आशा रखना बेकार था। उसने बेटी की जिम्‍मेदारी मांगी नहीं तो बेटी की कस्‍टडी मुझे मिल गयी। कोर्ट ने निर्णय में लिखा ही नहीं कि बेटी की पढाई का खर्चा पिता उठायेगा। घर पर हमारी आपसी स‍हमति थी कि इस घर में मैं व मेरी बच्‍ची रहेगी, उसे जाना होगा। तलाक के कुछ महीने बाद ही मुझे बैंक का नोटिस मिला कि आपके मकान पर लोन लिया गया है उसकी किस्‍त चुकाये। मैंने जानकारी जुटायी तो मुझे पता चला कि मकान किसी अन्‍य स्‍त्री के नाम किया जा चुका है व मोटी रकम लोन के रूप में ली जा चुकायी है। उस रकम से विदेश यात्रा की जा चुकी थी व रकम खर्च की जा चुकी थी। ये रकम चुकाना मेरे लिए सम्‍भव नहीं था । मैंने रूवा महिला एजीओ से सम्‍पर्क भी किया था तो मुझे जवाब मिला दूसरी महिला के नाम मकान हो चुका है तो आपको कुछ नहीं मिलेगा। वो बिक गया और बैंक लोन की रकम चुकाने के बाद मेरे पास थोडी सी रकम बची। मैं दस साल तक किराये के मकान में रही व अतिरिक्‍त हानि किराये के रूप में उठायी। बेटी की फीस स्‍कूल में अनियमित रूप से जमा हुयी यानि अकसर फीस का चैक अनादरण हो जाता। मुझे हर बार कोर्ट में शिकायत कर दूंगी कह कर फीस लेनी पडी। आज मेरी बेटी कालेज में आ गयी है। पिछले चार महीने से वो कुछ भी खर्चा बेटी को नहीं भेज रहा क्‍योंकि वो दिल्‍ली में रहकर अपनी पढाई कर रही है तो पिता का फर्ज है कि वो उसको खर्चा भेजे। पारिवारिक पेन्‍शन मुझे प्राप्‍त होती है लेकिन मुझ पर आर्थिक दबाव आ रहा है। मैं चाहती हूँ कि कानूनी रूप से इस व्‍यक्ति से कर्तव्‍यपालन कराया जाये कि बेटी की पढाई का खर्चा नियमित उठाये। लेकिन इस मामले का एक पक्ष ये भी है कि जैसे मैंने अपने लिए कभी खर्चा नहीं मांगा, मेरी बेटी भी शायद ही ये बयान दे कि मुझे पिता से खर्चा चाहिए। क्‍या ऐसे में केस किया जा सकता है। क्‍या मैं खुद इस हेतु पारिवारिक कोर्ट में आवेदन दे सकती हूँ। मैं वकील का खर्चा नहीं उठा सकती, राज्‍य विधिक सेवा बहुत समय लगाती है वकील देने में व राज्‍य विधिक सेवा से प्राप्‍त वकील केस में रूचि नहीं लेते ये मैं प्रत्‍यक्ष देख रही हूँ। कुछ मामलों में, सामाजिक कार्यकर्ता होने के नाते। क्‍या मैं अपना केस खुद देख सकती हूँ व इसके लिए कौन सी धाराओं में आवेदन करना होगा । क्‍या कोई आवेदन का तरीका निश्‍चित है या सादे कागज में लिख कर दिया जा सकता है। इन सब प्रकियाओं में कितना समय लगता है। आवेदन का प्रारूप किसी बेबसाइट पर प्राप्‍त किया जा सकता है क्‍या। कानून किसी पुरूष को इतनी छूट कैसे दे सकता है कि वो औरत की गोद में बच्‍चा दे व उसका भरण पोषण भी न करे।

समाधान-

प की बेटी का जन्म 1997 में हुआ है उस हिसाब से वह 18 वर्ष की अर्थात बालिग हो चुकी है। इस कारण केवल वही अपने लिए अपने पिता से खर्चा मांग सकती है। न्यायालय में आवेदन उसे ही करना होगा। यदि आप की समस्या यह है कि आप की बेटी स्वयं भी अपने पिता से भरण पोषण का खर्च नहीं मांगना चाहती तो फिर आप इस मामले में कुछ नहीं कर सकतीं। लेकिन यदि वह स्वयं चाहे कि उस का पिता उस के भरण पोषण का खर्च दे तो फिर वह धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में स्वयं के भरण पोषण के लिए खर्चा अपने पिता से प्राप्त करने का आवेदन का आवेदन कर सकती है। यह आवेदन यदि उस का पिता जयपुर में निवास करता है तो जयपुर के परिवार न्यायालय में किया जा सकता है। परिवार न्यायालय में वकील किए जाने पर वैसे भी वर्जित है वहाँ वकील केवल न्यायालय की अनुमति से ही किसी पक्षकार की पैरवी कर सकते हैं। आप की पुत्री की समस्या यह है कि वह दिल्ली में अपना अध्ययन कर रही है।

स आवेदन के प्रस्तुत करने के उपरान्त मुकदमे की प्रत्येक सुनवाई पर प्रार्थी का न्यायालय में उपस्थित होना आवश्यक है। किन्तु यदि न्यायालय चाहे तो ऐसा आवेदन देने वाले को व्यक्तिगत उपस्थिति से मुक्त कर सकता है और आप के माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति दे सकता है वैसी स्थिति में आप उस की पैरवी कर सकती हैं। लेकिन कम से कम कुछ पेशियों पर आप की बेटी को उस का खुद का बयान दर्ज कराने और जिरह कराने के लिए तो न्यायालय में उपस्थित होना ही पड़ेगा। अब यह आप को सोचना होगा कि आप अपनी बेटी को यह आवेदन करने के लिए तैयार कर सकती हैं या नहीं।

दि आप किसी वकील की मदद नहीं लेना चाहती हैं तो आप को सारी प्रक्रिया स्वयं जाननी होगी। आवेदन के प्रारूप तो पुस्तकों में मिल जाते हैं। कोई भी हिन्दी में प्रकाशित अभिवचनों की पुस्तक में सभी प्रकार के आवेदनों के प्रारूप मिल जाएंगे। यह पुस्तक आप खरीद सकती हैं। इसी पुस्तक में आप को यह जानकारी भी मिल जाएगी कि अभिवचनों में क्या क्या होना आवश्यक है।

किसी भी मुकदमे में पक्षकार अपनी पैरवी स्वयं कर सकता है यह उस का नैसर्गिकअधिकार है। वकील तो वह स्वयं अपनी मर्जी से ही करता है। कानून ने वकील करने का अधिकार पक्षकार को दिया है। लेकिन वह इस का उपयोग न करना चाहे तो वह स्वतंत्र है। अदालतें वकील लाने की बात बार बार इस कारण करती हैं कि हमारे यहाँ न्याय की प्रक्रिया कुछ अधिक तकनीकी हो गयी है जिस के लिए अनेक जानकारियाँ होनी आवश्यक हैं। वे जानकारियाँ पक्षकार को न होने के कारण न्यायालय का समय बहुत जाया होता है। देश में अदालतें जरूरत की 20 प्रतिशत भी नहीं हैं। कार्याधिक्य होने से वकील करने पर न्यायालय जोर देता है क्यों कि इस से उसे सुविधा होती है। लेकिन कोई भी न्यायालय किसी पक्षकार का मुकदमा केवल इस लिए खारिज नहीं कर सकता कि उस ने वकील नहीं किया है।

ह सही है कि हर एक व्यक्ति के बस का नहीं है कि वह वकील की फीस चुका सके। विधिक सेवा प्राधिकरण में भी वकील देने में समय लगता है और वहाँ से नियत वकील को फीस इतनी कम मिलती है कि वह पैरवी में कम रुचि लेता है। इसी कारण यह योजना एक असफल योजना बन कर रह गयी है।

क व्यक्ति जो स्वयं अपने मुकदमों की अथवा किसी अन्य व्यक्ति की पैरवी करना चाहता है उसे लगभग वह सब सीखना होता है जो एक वकील अपने प्रोफेशन के लिए सीखता है। यदि आप स्वयं यह काम करना चाहती हैं तो आप को स्वयं यह दक्षता हासिल करनी होगी। बहुत लोग इस देश में हुए हैं जो कि वकील या एडवोकेट न होते हुए भी न्यायालय में पैरवी करते रहे हैं। वर्तमान में भी अनेक लोग ऐसा कर रहे हैं। श्रम न्यायालय में यूनियनों के लीडर और उपभोक्ता न्यायालयों में अनेक व्यक्ति इस तरह पैरवी कर रहे हैं। पर उस के लिए आप को बहुत श्रम करना पड़ेगा। आप चाहें तो स्वयं भी एलएलबी कर सकती हैं और एक एडवोकेट के रूप में बार कौंसिल में अपना पंजीकरण करवा सकती हैं। आप एक सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं तो आप को तो बार बार न्यायालय में जाना ही होगा। आप को स्वयं कानून की पढ़ाई करने और एक एडवोकेट होने का प्रयत्न करना चाहिए। आप के लिए यह बेहतर होगा। इस तरह आप स्वयं बहुत लोगों की मदद कर पाएंगी।

क बात और अंत मे आप से कहना चाहूंगा कि हमारी समाज व्यवस्था न्यायपूर्ण नहीं है। इस की न्याय व्यवस्था भी जितना न्याय लोगों को चाहिए उस का सौवाँ अंश भी नहीं कर पाती। इस समाज व्यवस्था को बदलने की जरूरत है, यह सब आप अपने अनुभव से अब तक जान गयी होंगी। लेकिन उस के लिए देश के लाखों-करोडों जनगण को जुटना होगा। बहुत लोग इस दिशा में काम कर रहे हैं। आप का भी थोड़ा ही सही उस तरफ योगदान है। आप कोशिश करें कि उस काम में कुछ अधिक योगदान कर सकें।

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lawसमस्या-

वैभव ने जलगाँव, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मैं ने एक कांन्ट्रेक्टर को 3 लाख रुपया दिया था, मकान निर्माण के लिए। पर उस ने हमें मकान नहीं दिया और पैसे भी नही दे रहा है। उस ने पुलिस स्टेशन जाकर कंप्लेंट दी है कि इनकी वजह से मेरी जान को धोका है। पैसे मांगने पर पैसा भी नहीं दे रहा है। उसके लिए क्या करूँ?

समाधान-

प के पास कांट्रेक्टर को तीन लाख रुपया देने का कोई सबूत तो अवश्य होगा। आप किसी वकील से अथवा खुद उसे रजिस्टर्ड ए.डी. के माध्यम से एक नोटिस प्रेषित कीजिए जिस में लिखिए कि उस ने आप से मकान निर्माण करने के लिए रुपए तीन लाख एडवांस लिए थे, जिसे वह नहीं लौटा रहा है और उस धन का उस ने बेईमानी से निजी कामों में उपयोग कर लिया है जो धारा 406 आईपीसी में अपराध है। वह आप का धन 12% वार्षिक ब्याज या जो भी बाजार दर हो ब्याज सहित 15 दिनों में लौटा दे अन्यथा आप उस के विरुद्ध दीवानी और अपराधिक दोनों प्रकार की कार्यवाही करेंगे। इस नोटिस की प्रति और उस की रजिस्ट्री की रसीद तथा एडी प्राप्त हो जाए तो उसे संभाल कर रखें।

स के बाद आप किसी वकील के माध्यम से धारा 406 आईपीसी का परिवाद न्यायालय में प्रस्तुत करें और न्यायालय से आग्रह करें कि उस परिवाद को अन्वेषण हेतु धारा 156(3) दं.प्र.संहिता में पुलिस को भिजवा दिया जाए। यदि पुलिस अन्वेषण के दौरान कांट्रेक्टर आप को आप का रुपया लौटा देता है तो ठीक है अन्यथा उस के विरुद्ध या तो न्यायालय में पुलिस द्वारा आरोप पत्र प्रस्तुत किया जाएगा अथवा मामले को दीवानी प्रकृति का बताते हुए अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत होगा। यदि आरोप पत्र न्यायालय में नहीं दिया जाता है तो न्यायालय आप को सूचना दे कर न्यायालय में बुलाएगा। तब आप आपत्तियाँ प्रस्तुत कर के आप का तथा अपने गवाहों के बयान वहाँ करवाने से न्यायालय कांट्रेक्टर के विरुद्ध अपराधिक मामले में प्रसंज्ञान ले कर उस के विरुद्ध मुकदमा चला कर उसे दंडित कर सकता है।

दि आप के पास तीन लाख रुपए देने का लिखित सबूत है तो आप 3 लाख रुपया, ब्याज व न्यायालय के खर्चा प्राप्त करने के लिए कांट्रेक्टर के विरुद्ध दीवानी वाद भी संस्थित कर सकते हैं।

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