दीवानी विधि Archive

पंजीकृत बैनामा को रद्द कराना आसान नहीं होगा।

January 12, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

विजयलक्ष्मी ने झिंझक, कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम विजय लक्ष्मी है। हम तीन बहिनें हैं, मेरी माँ के पास ६ बीघा जमीन थी। मेरी माँ ने मुझे सबसे पहिले 2 बीघा खेत का बैनामा किया, उसके बाद अन्य दो को। मुझे जो जमीन मिली वह माँ के नाम थी और अन्य दो को मिली वह मेरे पिता की मरने के बाद माँ के नाम हो गयी थी।  मेरी माँ ने मेरी ऊपर दीवनी वाद कर दिया कि बैनामा फर्जी तरीके से किया गया है। मेरी माँ को दिखाई नहीं देता है। मेरी दोनों बहिने माँ को गुमराह करके बैनामा निरस्त करवाना चाहती हैं। क्या बैनामा निरस्त हो सकता है? मेरे बैनामा में मेरी बहिन गवाह भी है, दूसरा गवाह भी माँ की तरफ है।  क्या मैं भी पिता की जमीन में हिस्सा मांग सकती हूँ बैनामा को ३ साल हो चुके हैं।  मैंने लव मैरिज की है, क्या लव मैरिज करने के कारण क्या किसी अपने हक़ से बहिष्कृत क्या जा सकता है मेरे दो बच्चै हैं।

समाधान-

दि बैनामा पंजीकृत है तो उसे निरस्त किया जाना आसान नहीं है वह भी तब जब कि बैनामे को पंजीकृत हुए तीन वर्ष हो चुके हों।

यदि माँ को दिखाई नहीं देता है तो रजिस्ट्री कराते समय रजिस्ट्रार कार्यालय ने सारी पूछताछ के बाद ही उसे रजिस्टर किया होगा तो उस का निरस्त होना और भी दुष्कर है। पर कोई दीवानी वाद हुआ है तो अच्छा वकील करें। कभी कभी वकीलों की गलती से भी जीता हुआ मुकदमा मुवक्किल हार बैठता है।

पिता की जमीन कृषि भूमि होगी तो उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि के उत्तराधिकार का कानून भिन्न है। इस संबंध में अपने दस्तावेज दिखा कर किसी स्थानीय वकील से सलाह करें तो बेहतर होगा।

लव मैरिज या परिवार को छोड़ कर अपनी मर्जी से विवाह करने से परिवार बहिष्कार कर सकता है लेकिन उसे उस के हकों से बेदखल नहीं कर सकता।

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

rp_property.jpgसमस्या-

अजय कुमार ने फरीदाबद, हरियाणा से भेजी है कि-

मस्या मेरे एक संबंधी की है। व्यक्ति के द्वारा ख़रीदे गए मकान पर उस की आकस्मिक मृत्यु के बाद किस का अधिकार है? व्यक्ति का परिवार इस प्रकार है – पत्नी, एक पुत्र, दो पुत्रियां (एक विवाहित, एक अविवाहित) अभी उस मकान में व्यक्ति का पुत्र रहता है जो अपनी माँ और बहनो को रखने को तैयार नहीं है। पुत्र का पहले का आपराधिक रिकॉर्ड है। ऐसे में बेटियों को और उनकी माँ क्या करना चाहिए?

समाधान-

किसी व्यक्ति द्वारा खरीदा गया मकान उस की स्वअर्जित संपत्ति है। उस के देहान्त के उपरान्त उस का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगा। अर्थात व्यक्ति के देहान्त के उपरान्त से ही उक्त संपत्ति में उस की पत्नी, एक पुत्र व दोनों पुत्रियों में से प्रत्येक को एक चौथाई हिस्सा प्राप्त हो चुका है। सभी चारों उस संपत्ति के संयुक्त रूप से स्वामी हैं। पुत्र उस मकान में निवास करता है इस कारण से उस के पास उस मकान का कब्जा है।

इस मकान पर पुत्र का कब्जा होते हुए भी उसे सभी चारो उत्तराधिकारियों का संयुक्त रूप से कब्जा माना जाएगा। माँ और दोनों पुत्रियाँ इस संपत्ति का विभाजन कराने और अपने अपने हिस्से का पृथक कब्जा  दिलाने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। इसी दीवानी वाद में इस तरह का आवेदन दिया जा सकता है कि उक्त संपत्ति के लिए रिसीवर की नियुक्ति की जाए जो कि उस संपत्ति के लाभों को एकत्र कर के रखे जिसे बाद में न्यायालय के आदेश से वितरित कर दिया जाए। इस आशय का अस्थाई व्यादेश जारी करने का आवेदन भी न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है कि उक्त संपत्ति का कब्जा पुत्र किसी अन्य को हस्तांतरित न करे और न ही किसी तरह संपत्ति और उस के स्वामित्व को हानि पहुँचाए।

यहाँ क्लिक कर सबसे पहले टिप्पणी कीजिए

rp_gavel-1.pngसमस्या-

आत्मानन्द पाण्डे ने गाजीपुर उत्तर प्रदेश से पूछा है-

दि किसी के मकान का निकास ग्राम पंचायत की सड़क पर बिना किसी अवरोध के खोलने की सुविधा होने के बावजूद ग्राम सड़क पर निकास ना खोलकर एक दरवाजा पडौसी की जमीन की तरफ खोल कर क्या वह कानूनी रूप से पडौसी की जमीन में रास्ता मांगने का अधिकारी हो जाता है?

समाधान-

कोई भी अपनी भूमि या संपत्ति से सार्वजनिक मार्ग पर जा सकता है, संपत्ति के स्वामी तथा उस में निवास कर रहे लोगों को इस का अधिकार है। यदि किसी भूमि से सार्वजनिक भूमि पर निकास नहीं है तो वह किसी पड़ौसी से निकास की सुविधा मांग सकता है, यह उस की जरूरत है और इसे आवश्यक्ता का सुखाधिकार कहा जाता है। आम तौर पर जब पड़ौसी भूस्वामी की भूमि खाली हो और उस पर हो कर किसी ओर जाना आसान हो तो लोग सडक तक जाने का अलग मार्ग होने पर वहाँ से निकलने लगते हैं और उसे मार्ग बना डालते हैं। बाद में पड़ौसी भूस्वामी जब अपनी भूमि पर निर्माण कराना चाहता है तो ये ही लोग उस में अड़चन पैदा करते हैं कि यह तो उन का रास्ता है और इस पर से निकलना उन का अधिकार है अथवा उन्हें इस तरफ से निकलने का सुखाधिकार प्राप्त हो चुका है।

सुखाधिकार किसी भूस्वामी को पड़ौसी की संपत्ति पर लंबे उपयोग से प्राप्त होता है। लेकिन पडौसी भूस्वामी की भूमि से निकलने का आवश्यकता आधारित सुखाधिकार तभी प्राप्त हो सकता है जब कि किसी भूस्वामी के पास पड़ौसी की भूमि में हो कर जाने के अलावा सड़क तक पहुँचने का कोई अन्य मार्ग न हो। यदि उस के पास सड़क तक पहुँचने का वैकल्पिक मार्ग है तो वह किसी पडौसी की भूमि में हो कर जाने का अधिकार नहीं मांग सकता।

 

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

House constructionसमस्या-

राजेश वर्मा ने ग्राम पोस्ट पिपरौली बड़ा गाँव जिला बलिया, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरा एक नया मकान बना है ! मेरे मकान के पीछे का जो दीवार है. वो मेरे पाटीदारों के छत से लगा हुआ है। मुझे अपने पीछे की दीवार को प्लास्टर करना है, क्योंकि जब बारिश होता है तो बारिश का पानी दीवार के सहारे मेरे घर में आता है इसलिये  मै अपने छत का प्लास्टर  कराना  चाहता  हूँ! लेकिन मेरे पाटीदार वाले मुझे अपने छत पर चढने से रोक रहे हैं और मारने की धमकी देने लगते हैं कृपया मुझे उचित सलाह दें।

समाधान-

सा अक्सर होता है। जब कोई नया मकान बनाता है तो पड़ौसियों को परेशानी होती है। वे बताते हैं लेकिन उस परेशानी को मकान बनाने वाला भी कम नहीं कर सकता। नतीजा ये होता है कि पड़ौसी होते हुए भी आपसी संबंध ऐसे ही तनावपूर्ण हो जाते हैं। अभी तो बरसात निकल गयी है इस कारण सीलन आने की संभावना तो छह आठ माह के लिए नहीं है। यदि संभव हो तो आप उस मकान में जा कर रहने लगें। आपसी रिश्तों को बेहतर बनाने का प्रयत्न करें। यह कर सके तो चार माह बाद वे आप को प्लास्टर करने से मना नहीं करेंगे।

यदि फिर भी मना करें तो पहले उन्हें वकील के माध्यम से नोटिस दिलाएँ, फिर दीवानी वाद दायर कर न्यायालय से व्यादेश (Injunction) जारी कराएँ कि वह आप को प्लास्टर करने दे। इस आदेश के बाद उसे प्लास्टर करने देना होगा। यदि मारने की धमकी देता है तो पुलिस में तुरन्त रिपोर्ट दर्ज कराएँ।

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

Muslim-Girlसमस्या-

पवन ने नरवाना, हरियाणा से पूछा है-

मेरे नाना की अचल संपत्ति है जो पुश्तैनी है। मेरे नाना के एक पुत्र और तीन पुत्रियाँ हैं। पुत्र की मृत्यु हो गयी है। उस की पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है। क्या दूसरा विवाह करने के बाद भी वह स्त्री मेरे नाना की अचल संपत्ति में हिस्सा प्राप्त कर सकती है?

समाधान-

जिस क्षण एक सहदायिकी के किसी सदस्य का देहान्त होता है उस के हिस्से की संपत्ति का उत्तराधिकार निश्चित हो जाता है और उस के उत्तराधिकारी हिस्सेदार बन जाते हैं।

आप की मामी मामा का देहान्त होते ही उस सहदायिकी का हिस्सा बन गयी है जिस में आप के मामा का हिस्सा था अर्थात आप के नाना की पुश्तैनी संपत्ति में। एक बार वह हिस्सेदार हो गयी तो फिर उस के द्वारा फिर से विवाह कर लेने से उस की सहदायिकी की सदस्यता समाप्त नहीं होगी। वह अपने हिस्से के बंटवारे की मांग कर सकती है और न दिए जाने पर वह न्यायालय से बंटवारा करवा सकती है।

यदि आप के नाना की संपत्ति पुश्तैनी न हो और उन की स्वअर्जित हो तब भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आप की मामी उन का हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी हैं। उन के दूसरा विवाह कर लेने से उन का यह अधिकार समाप्त नहीं होगा। इस संदर्भ में मद्रास उच्च न्यायालय का श्रीमती यमुना देवी बनाम श्रीमती डी नलिनी के प्रकरण में दिया गया निर्णय पढ़ा जा सकता है।

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

समस्या-rp_gavel11.jpg

सन्नी गुप्ता ने सांबा, जम्मू और कश्मीर से पूछा है-

मेरे पापा ने अपने भाई पर कोर्ट केस किया है अपनी दुकान वापस लेने के लिए। पापा के भाई ने पापा से दुकान 1995 में अपने बेटे के लिए ली थी। लेकिन अब वो खाली नहां करते। कहते हैं कि हम 1979 से दुकान करते हैं और उन्हों ने श्रम विभाग से फार्म ओ बनाया है 1979 से। जब कि वे तब सरकारी कर्मचारी थे। 2005 में रिटायर हुए हैं। हम ने आरटीआई के जरिए उन का रिकार्ड लिया और विजिलेंस में कम्प्लेंट की। लेकिन विजिलेंस वाले कहते हैं कि वे सेवा निवृत्त कर्मचारी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर सकते। क्या हम उन के इस फ्राड के विरुद्ध कोर्ट में कार्यवाही कर सकते हैं और कोर्ट से कह सकते हैं कि उन की पेंशन बन्द की जाए। क्या ये कार्यवाही उच्च न्यायालय में होगी और क्या ये सिविल पिटीशन होगी।

समाधान-

प की मूल समस्या दुकान खाली कराना है और आप उलझ रहे हैं अपने चाचा को सजा दिलाने के लिए।

आप ने यह भी नहीं बताया कि दुकान का स्वामित्व किस का है यदि आप के पिताजी दुकान के स्वामी हैं तो आप के चाचा को उन्हों ने दुकान व्यवसाय के लिए दी तो वह एक तरह से लायसेंस पर थी। आप के पिताजी को लायसेंस कैंसल करने का नोटिस दे कर नोटिस की अवधि की समाप्ति पर दुकान के कब्जे का दावा करना चाहिए था। हो सकता है ऐसा ही दावा किया गया हो। पर आपने दावे की तफसील नहीं बताई है।

आपने उन्हें दुकान 1995 में लेना बताया है जब कि वे कह रहे हैं कि यह तो 1979 से उन के पास है। श्रम विभाग से जो लायसेंस बनाया है उस का ध्यान से निरीक्षण करना चाहिए हो सकता है वह 1995 में या उस के बाद पिछली तारीखों से बनवाया गया हो।

आप को किसी स्थानीय अच्छे वकील से राय कर के अपने दीवानी मुकदमे को लड़ना चाहिए। यदि आप यह साबित करने में सफल हो गए कि उन्हों ने दुकान 1995 में बेटे के लिए लायसेंस पर ली थी तो आप अपना मुकदमा जीत जाएंगे। चाचा के श्रम विभाग से प्राप्त लायसेंस को इसी आधार पर फर्जी सिद्ध किया जा सकता है कि उस समय वे सरकारी नौकरी में थे। चाचा के विरुद्ध कोई भी कार्यवाही अब उन का पुराना विभाग नहीं करेगा। उन्हें पेंशन अपनी सेवाओं के बदले मिलती है वह बन्द होना संभव नहीं है। वैसे भी यदि आप चाचा के विरुद्ध बदले की भावना से कोई कार्यवाही करेंगे तो अपने लक्ष्य से ही भटकेंगे। किसी के भी विरुद्ध कार्यवाही करने के पहले आप को अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए। बेहतर यह है कि आप अपने दीवानी मुकदमे की पैरवी ठीक से कराने पर ध्यान दें।

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

rp_gavel-1.pngसमस्या-

राजीव दीक्षित ने लुधियाना, पंजाब से पूछा है-

मेरे पापा ने 1975 में 200 गज जमीन अपने नाम से ख़रीदी थी। सन 2000 में उनकी दिमागी हालत ख़राब हो जाने के कारण वो कहीं भाग गए और आज तक वापस नहीं आये। उनकी जमीन हमें अपने नाम करानी है।  हमारे परिवार में मैं मेरी माता जी, मेरा भाई, चाचा, चाची, और दादा हैं। दादी का देहांत 5 साल पहले हो गया है।  तो क्या ये जमीन सबके नाम होगी या सिर्फ हमारे नाम कृपया हमारा मार्गदर्शन कीजिए।

समाधान-

ह जमीन आप के पिता जी के उत्तराधिकारियों के नाम होगी। उन के जीवित उत्तराधिकारियों में आप, आप का भाई और आप की माताजी हैं। इन तीन उत्तराधिकारियों को बराबर का हिस्सा उक्त जमीन में प्राप्त होगा। दादा और चाचा-चाची को इस संपत्ति में से कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। इस संबंध में आप को सबूत प्रस्तुत कर के नगर निगम में नामान्तरण कराना पड़ेगा।

यह नामान्तरण तभी संभव  हो सकेगा जब कि आप अपने पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त कर लेंगे।  इस के लिए आप को नगर निगम में पहले आप के पिता की मृत्यु को पंजीकृत कराना पड़ेगा।  यह कैसे होगा इस की प्रक्रिया आप को स्थानीय नगर निगम से ही पता करना होगा। वे आप के पिता की मृत्यु का पंजीयन करने से मना कर सकते हैं। आप के पिता लापता हैं लेकिन उन्हें कानून के अंतर्गत लापता होने की तिथि से सात वर्ष के उपरान्त मृत माना जा सकता है। साक्ष्य अधिनियम के इस उपबंध के आधार पर एक दीवानी न्यायालय ही इस के लिए घोषणा की डिक्री पारित कर सकता है। तब आप नगर निगम के विरुद्ध दीवानी वाद इस आशय की घोषणा का कर सकते हैं कि आप के पिता को मृत माना जाए क्यों कि उन्हें लापता हुए 7 वर्ष से अधिक समय हो चुका है तथा आप के पिता की संपत्ति का नामान्तरण किया जाए। लापता होने की तिथि उन की गुमशुदगी रिपोर्ट में गुमशुदगी की जो तारीख अंकित है उसी तारीख से उन्हें मृत माना जाएगा।

अब तक 2 टिप्पणियाँ, आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

rp_gavel9.jpgसमस्या-

अरशद ने नवाबगंज, सहारनपुर, उत्तरप्रदेश से पूछा है-

मेरे पिताजी के पास एक मकान है जो उन को मेरे दादा जी से विरासत में मिला था। मेरे पिताजी के पीछे एक आदमी पड़ा है जो उस मकान को खरीदना चाहता है वह पिताजी को दारू पिला देता है पिताजी भी मकान बेचने को तैयार हैं। हमारे घर वालों को क्या कदम उठाने चाहिए कि वे मकान न बेचें।

 

समाधान-

मुस्लिम विधि में सभी संपत्तियाँ वैयक्तिक होती हैं अर्थात संपत्ति पर उसी का अधिकार होता है जिस के वह नाम होती है। यह संपत्ति आप के पिता जी के नाम है तो उन की व्यक्तिगत संपत्ति है और उन्हें इसे बेचने का अधिकार है। वे इस संपत्ति को बेच सकते हैं।

इस संपत्ति को बेचने से रोकने का कोई कानूनी रास्ता नहीं है। कानून तरीके से न आप न आप का परिवार इस संपत्ति को बेचने से आप के पिता को नहीं रोक सकता है। यह आप और आप के परिवार पर निर्भर करेगा कि आप कैसे अपने पिता को इस काम को करने से रोक सकते हैं।

यदि आप या आप के परिवार के लोग उस संपत्ति को परिवार के किसी सदस्य या एक से अधिक सदस्यों के नाम हस्तांतरित करवा लें तो ही यह संपत्ति बिकने से रुक सकती है अन्यथा नहीं।

अब तक 2 टिप्पणियाँ, आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

पत्नी घोषणा अथवा विभाजन का वाद प्रस्तुत कर सकती है।

August 14, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

malicious prosecutionसमस्या-

शैलेश जैन ने शुजालपुर जिला शाजापुर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरे दादा सुसर स्‍व० फूलचंद जी जैन के नाम पर एक मकान है, मेरे दादा ससुर उनकी पहली पत्नी के मरने के पश्‍चात दूसरी शादी की थी।  मेरे दादा ससुर फूलचंद जी की कुल ९ संताने हैं, तीन लडके एवं छ लडकियां। मेरे ससुर सबसे बडे पुत्र थे उनका देहांत हो चुका है। मेरे ससुर के मेरी पत्नी सहित पांच वारिसान हैं। इस प्रकार उक्‍त मकान में कुल चौदह वारिसान हैं। मेरी दादी सास ने मेरे ससुर के वारिसानों को अनदेखा करते हुए नगरपालिका में नांमान्‍तरण हेतु आवेदन किया जिसमें उन्‍होंने उनके नाम का नामांतरण चाहा, नामातंरण प्रकरण में मेरी पत्नी की जानकारी के बिना झूठा सहमति पत्र बनाकर लगा दिया। जिस पर मेरे द्वारा आपत्ति प्रस्‍तुत कर दी गई है। मैं जानना चाहता हूं कि अब मुझे आगे क्‍या करना चाहिए, नगरपालिका का कहना है कि, न्‍यायालय से उत्‍तराधिकार का फैसला होने के बाद ही नामातंरण प्रकरण आगे बढाया जाएगा।

समाधान-

प ने बताया नहीं कि नगरपालिका ने नामान्तरण किए जाने से लिखित में मना किया है या फिर मौखिक ही यह बात कही है कि वे उत्तराधिकार का निर्णय न्यायालय से हुए बिना नामान्तरण नहीं करेंगे। यदि नगरपालिका ने यह मौखिक ही कहा है तो आप आरटीआई में एक आवेदन दे कर नगरपालिका से पूछ लें कि नामान्तरण आवेदन जिस पर आप ने आपत्ति की है का निस्तारण क्यों नहीं किया जा रहा है। इस से नगरपालिका की ओर से आप को उत्तर मिल जाएगा। तब आप की पत्नी नगरपालिका के विरुद्ध घोषणा का वाद प्रस्तुत सकती हैं कि उन का संपत्ति में कितना हिस्सा है। इस में सभी उत्तराधिकारियों को पक्षकार बनाना होगा।

यदि आप की पत्नी चाहे तो सीधे संपत्ति के विभाजन का वाद जिला न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकती है और उस में नगरपालिका को पक्षकार बना कर न्यायालय के निर्णय तक नामान्तरण दर्ज न करने का आदेश दे सकती है।

झूठा सहमति पत्र यदि नगरपालिका की पत्रावली में मौजूद है तो उस की प्रतिलिपि ले कर फर्जी दस्तावेज तैयार करने के अपराध में उसे प्रस्तुत करने वाले के विरुद्ध न्यायालय में अपराधिक परिवाद भी प्रस्तुत किया जा सकता है।

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

वसीयत से उत्तराधिकारी वंचित होते हैं।

August 4, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

Willसमस्या-

राम भजन सिंह ने ग्राम और पोस्ट जरहा, थाना बीजपुर, जिला सोनभद्र, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे बड़े पिता जी के दो पत्नियाँ थीं और दोनों के एक एक लड़की हुई। पिता जी की मृत्यु  के बाद पहली वाली पत्नी के अकेले अपनी लड़की को वसीयत लिख दी क्या सेकेंड वाली पत्नी के लड़की को हिस्सा नहीं मिलना चाहिए।

समाधान-

प की बात ही समझ नहीं आ रही है। वसीयत किस ने लिखी है बड़े पिता जी ने या पहले वाली पत्नी ने? हम आम तौर पर ऐसे प्रश्नों का उत्तर नहीं देते जो अपने आप में स्पष्ट नहीं होते। पर आप के प्रश्न का उत्तर इस कारण से दे रहे हैं कि लोगों को उत्तराधिकार के अधिकार में और वसीयत में भेद के बारे में बताया जा सके।

वसीयत हमेशा व्यक्ति अपने जीवनकाल में करता है कि उस की मृत्यु के उपरान्त उस की संपत्ति का क्या किया जाए। यदि कोई व्यक्ति वसीयत नहीं करता है तो उत्तराधिकार के नियम के हिसाब से उस के उत्तराधिकारियों को संपत्ति प्राप्त होती है। व्यक्ति सहदायिक (पुश्तैनी) संपत्ति में अपने अधिकार को भी वसीयत कर सकता है।

हिन्दू विधि में 1955 से दूसरा विवाह करना वैधानिक नहीं रहा है। इस कारण आप के बड़े पिता का दूसरा विवाह यदि  1955 के बाद हुआ था और पहले वाली पत्नी जीवित थी तो वह अवैध था। हालांकि इस का असर दूसरी पत्नी की संतान पर बस इतना ही होगा कि पुश्तैनी संपत्ति में उस का अधिकार नहीं होगा।

यदि किसी ने अपनी स्वअर्जित संपत्ति की वसीयत अपनी संतानों में से किसी एक के नाम कर दी है तो अन्य संतानें स्वतः ही वंचित हो जाएंगी। आप के मामले में यदि आप के बड़े पिता जी ने वसीयत से अपनी संपत्ति बड़ी पत्नी की पुत्री को दे दी है तो फिर अन्य उत्तराधिकारियों को कुछ नहीं मिलेगा और यह कानूनन है।

अब तक 2 टिप्पणियाँ, आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये
Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada