दीवानी विधि Archive

नामान्तरण से स्वामित्व तय नहीं होता।

June 24, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अभिषेक राय ने देवरिया,  उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

चाचा की कोई औलाद नहीं थी। 1978 में चाचा ने मुझे रजिस्टर्ड वसीयत किया। 1996 में उनकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद मैंने दाखिल-खारिज करवाने के लिए नोटिस भेजा, उस में मेरे चाचा के भाई को आपति हुई, केस 1 साल तहसीलदार के वहाँ चला और केस मैं जीत गया, और मेरा नाम खतौनी में चढ़ गया। 20 साल बाद 2016 मेरे 3 अन्य भाई दीवानी में अपील किए कि रजिस्टर्ड वसीयत फ़र्ज़ी है और हमारा भी शेयर हुआ चाचा की संपत्ति में।  2 गवाह में से एक गवाह जो मेरे मामा हैं जिन्हों ने केस कराया है और कहता है कि मैं कोर्ट मे विपरीत बयान दूंगा कि वसीयत फ़र्ज़ी है और मेरे साइन नहीं हैं या चाचा की तबियत ठीक नहीं थी आदि।

समाधान-

प ने 1996 में वसीयत के आधार पर नामान्तरण कराया। लेकिन नामान्तरण से स्वामित्व तय नहीं होता। इस कारण आप के भाइयों ने वसीयत को अब दीवानी न्यायालय में चुनौती दी गयी है। इस दावे में अनेक बिन्दु होंगे जिन के आधार पर यह दावा निर्णीत होगा। केवल वसीयत ही एक मात्र बिन्दु नहीं होगा। इस कारण यदि वसीयत का एक गवाह बदल रहा है तो कम से कम एक गवाह और होगा। इस के अलावा रजिस्टर्ड वसीयत में रजिस्ट्रार के सामने वसीयत होती है वह उसे तस्दीक करता है। 1978 में जो दस्तावेज रजिस्टर्ड हो वह पुराना होने के कारण ही सही माना जाएगा। उस में गवाह की ये बातें नहीं मानी जाएंगी। इस कारण से आप वसीयत को दूसरे गवाह और वसीयत ड्राफ्ट करने वाले के बयान करवा कर भी साबित कर सकते हैं। लेकिन इन सब बिन्दुओँ का जवाब मौके पर आप के वकील ही तलाशेंगे। इस मामले में आप को उन्हीं से बात करनी चाहिए। यदि मामला उन के बस का न हो तो किसी स्थानीय सीनियर वकील की इस मामले में सलाह ले कर मुकदमे को आगे बढ़ाना चाहिए

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समस्या-

धर्मेन्द्र सिंह ने बालोतरा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी का मकान है जिनकी मृत्यु हो गयी है। अब इस मकान पर उनका छोटा पुत्र कब्जा करना चाहता है। मेरी दादीजी जिंदा है वो यह मकान नहीं देना चाहती हैं। ये मकान दादीजी के नाम करवाना है और उनके छोटे पुत्र को बाहर निकलना है। इसके लिए मैं क्या करुँ?

समाधान-

प के दादा जी का देहान्त होने के पहले उन्हों ने कोई वसीयत नहीं की है। आप के दादा जी के देहान्त के साथ ही उन का उत्तराधिकार खुल गया है औोर उन की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उन के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो चुकी है। आप के दादा जी के उत्तराधिकारी, उन के पुत्र, पुत्रियाँ, मृत पुत्र/ पुत्रियों की पत्नी/ पति और उन की संतानें, उन की पत्नी (आप की दादीजी) हैं। ये सभी उस मकान के संयुक्त रूप से स्वामी हो चुके हैं। आप के दादाजी के छोटे पुत्र को भी उस मकान के स्वामित्व में हिस्सेदारी प्राप्त हुई है। इस हिस्सेदारी से उसे अलग नहीं किया जा सकता।

आप की दादी या अन्य कोई भी उत्तराधिकारी यह कर सकता है कि मकान के बंटवारे का दावा करे और सब को अलग अलग हिस्सा देने की राहत प्रदान करने की मांग करे, या फिर यह भी राहत मांगी जा सकती है कि आप के दादाजी के छोटे पुत्र को उस के हिस्से की कीमत अदा कर के उस मकान से बेदखल करने की डिक्री की मांग की जाए। इस बीच अस्थाई निषेधाज्ञा जारी कराई जा सकती है कि दादाजी का छोटा पुत्र न्यूसेंस पैदा न करे। यदि वह फिर भी कुछ गड़बड़ करता है या तंग करता है तो दादी जी की ओर से महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा का प्रतिषेध अधिनियम में कार्यवाही की जा सकती है।

 

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गवाह की समन और वारंट से तलबी

May 21, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

निधि जैन ने उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं किसी व्यक्ति की गवाही कोर्ट में करवाना चाहता हूँ। मुझे विश्वास है कि वह व्यक्ति मेरे पक्ष में बयान देगा, लेकिन पारिवारिक विवाद की वजह से मेरे कहने पर वह व्यक्ति मेरा गवाह नहीं बनेगा। मैं आप से यह जानना चाहता हूँ कि क्या किसी केस में कोर्ट से समन जा सकता है कि वह व्यक्ति गवाही अथवा अपने बयान देवे? अगर ऐसा कोई प्रावधान है तो इसके लिए क्या किया जा सकता है?

समाधान-

किसी भी व्यक्ति की गवाही अदालत में कराये जाने के लिए उस का नाम गवाह की सूची में होना चाहिए। यदि है तो आप अदालत से निवेदन कर सकते हैं कि उस गवाह को समन भेज कर अदालत में गवाही देने के लिए बुलाया जाए। अदालत उसे समन जारी कर के गवाही के लिए बुलाएगी। समन तामील हो जाने पर भी गवाह न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं होता है तो ऐसे गवाह को जमानती वारंट से और जमानती वारंट से भी अदालत में न आने पर गिरफ्तारी वारंट से उसे बुलाया जा सकता है। इस संबंध में दंड प्रक्रिया संहिता तथा दीवानी प्रक्रिया संहिता दोनों में उपबंध हैं।

यदि किसी वजह से गवाह सूची पेश न हो या सूची में गवाह का नाम न हो तो न्यायालय को आवेदन दे कर गवाह का नाम सूची में बढ़ाया जा सकता है।

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समस्या-

रेणु भदोरिया ने अहमदाबाद गुजरात से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

म उत्तर प्रदेश के जसमई गाँव के निवासी थे पिछले 25 सालों से हम अहमदाबाद में निवास कर रहे हैं। हमारे गांव में हमारी पुश्तैनी ज़मीन है घर बनाने की उस में से कुछ ज़मीन पर हमारे परिवार के लोगों ने कब्जा कर लिया था, और हमारे घर के निकालने का रास्ता सिर्फ़ 2.5 फुट छोड़कर अपना निर्माण कर लिया और वो लोग कहते है हमने तुम्हारे ज़मीन पर कब्जा नहीं किया। हमारी घर की ज़मीन का बटवारा प्रधान द्वारा किया गया था, जो बाद में प्रतिपक्ष वालों ने मानने से इनकार कर दिया। इसके अलावा परिवार के दूसरे लोगों द्वारा भी हमारी ज़मीन निर्माण कर लिया गया है। अब मैं चाहती हूँ कि बिना लड़ाई झगड़े के हमें हमारी ज़मीन क़ानून के नियम के हिसाब से मिल जाए। मैं सरकारी बटवारा करना चाहती हूँ। उसके लिए हमें क्या करना पड़ेगा?

समाधान-

प का कहना सही है आप की संयुक्त संपत्ति का बँटवारा नहीं हुआ है। हमारे यहाँ ऐसे ही चलता रहता है। परिवार के कुछ लोग गाँव से बाहर चले जाते हैं। जो रह जाते हैं वे आपस में संपत्ति के अधिक से अधिक भाग पर कब्जा बनाए रखने की कोशिश करते हैं। जब बाहर जाने वाला बंधु वापस आता है तो वह फिर बंटवारे की बात करता है। लेकिन संपत्ति का बंटवारा बिना अदालत जाए नहीं हो पाता।

आप बंटवारा कराना चाहती हैं तो आप को जिला न्यायाधीश के न्यायालय में बंटवारे का वाद प्रस्तुत करना होगा। संयुक्त संपत्ति के सभी स्वामी उस वाद में पक्षकार बनेंगे। अदालत सभी पक्षों को सुन कर बंटवारा कर देगा। यह बंटवारा स्थाई होगा। इस के लिए आप जिला मुख्यालय के किसी दीवानी  मामलों के वकील से मिलें और उस की सहायता से संपत्ति के विभाजन तथा अपने हिस्से का अलग कब्जा दिलाए जाने का वाद संस्थित करें।

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बेनामी संपत्ति व्यवहार क्या है?

May 18, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जितेन्द्र ने  मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे बाबा ने अपनी दो ऐकड जमीन मेरे मामा के नाम बसीयत 1985 में करदी थी। यदि मामा वह जमीन मेरे नाम वसीयत करदे, तो यह जमीन बेनामी सम्पत्ति अधिनियम के अन्तर्तगत तो नहीं आएगी।


समाधान-

बेनामी संपत्ति व्यवहार वह संपत्ति व्यवहार है जिस में संपत्ति किसी के नाम पर खरीदी जाए और जिस का मूल्य किसी और ने चुकाया हो तथा वह संपत्ति जिसे कोई अपने नाम पर किसी अन्य के लाभ के लिए रखता है लेकिन उस संपत्ति का मूल्य चुकाया हो।  इस प्रकार वसीयत और दान आदि व्यवहार किसी तरह के बेनामी व्यवहार नहीं हैं।

आपके मामा को वसीयत में प्राप्त संपत्ति यदि मामा द्वारा आप को वसीयत की जाती है तो यह किसी भी प्रकार से बेनामी संपत्ति नहीं कही जाएगी।

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समस्या-

रवि ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-


मेरा भाई और उसकी पत्नी शादी के 3 महीने बाद से ही घर से अलग रह रहे हैं। उनका आपस मे कोई विवाद हुआ और फिर 498/ 406 125 498और 406 में अभी कोर्ट में नहीं लगा है, एफआर्ईआर  हुए 2 साल हो गए हैं।  गुजारा भत्ता का केस कोर्ट में है जिस में 2500 प्रति माह खर्च देना होगा और पिछले 32000 भी। भाई हिप जुआइन्ट की बीमारी के कारण कुछ काम नहीं कर पाता, उसका खर्च भी दोस्त मिल कर उठाते हैं।  गुज़ारा भत्ता न देने पर कोर्ट ने 30 दिन का समय दिया है, नहीं तो कुर्की की कार्यवाही की जाएगी। भाई के पास कोई सम्पत्ति नहीं है। वह किराये के मकान में रहता है।  क्या कुर्की में माता पिता या भाई की सम्पत्ति को भी जप्त किया जा सकता है क्या?


समाधान-

त्नी का भरण पोषण करने की जिम्मेदारी पति की है न कि पति के रिश्तेदारों की। यह जिम्मेदारी भी पति की वर्तमान आय और संपत्ति पर  निर्भर करती है। यदि इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने आदेश नहीं दिया है तो उस आदेश के विरुद्ध अपील या रिविजन करना चाहिए और वसूली पर स्थगन प्राप्त करना चाहिए। यह तभी संभव हो सकता है जब संपत्ति और वर्तमान आय तथा शारीरिक स्थिति के संबंध में दस्तावेजी सबूत अपील या रिविजन कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए जाएँ।

जहाँ तक वसूली के लिए संपत्ति को कुर्क करने का प्रश्न है तो केवल पति की या उस की साझेदारी वाली किसी संपत्ति को ही कुर्क किया जा सकता है, अन्य किसी संपत्ति को नहीं। यदि किसी गलत फहमी के अंतर्गत किसी अन्य संपत्ति को कुर्क किया भी जाए तो उस संपत्ति का स्वामी संबंधित न्यायालय में अपनी आपत्तियाँ प्रस्तुत कर सकता है।

 

 

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किसी को भी स्थावर संपत्ति से जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता।

May 6, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

गोलू साहू ने पंडुका, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-


मेरे पिता ने पैतृक संपत्ति को बिना हमारे जानकारी व सहमति तथा बिना हमारा हिस्सा अलग किये बिना ही 1/2 एकड़ जमीन को अज्ञात महिला व्यक्ति के नाम पर रजिस्ट्री कर दी है। तथा उस व्यक्ति द्वारा नामांतरण व रिकॉर्ड में अपना नाम भी दर्ज करवा लिया है।  लेकिन जमीन पर कब्जा हमारा है , सर क्या हम कब्जे पर बने रहे..? क्या वह व्यक्ति जबरदस्ती हमसे कब्जा छीन सकता है….? हमें क्या करना चाहिए…….?


समाधान-

कोई भी व्यक्ति जबरन किसी से स्थावर सम्पत्ति का कब्जा छीन कर वर्तमान में काबिज व्यक्ति को बेदखल नहीं कर सकता। यदि कोई ऐसी कोशिश करता है या बेदखल करता है तो तुरन्त पुलिस को रिपोर्ट करें तथा एसडीएम के न्यायालय में धारा 145-146 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत करें। यदि किसी को ऐसा आवेदन प्रस्तुत करने के पहले के 60 दिनों में बेदखल भी कर दिया गया है तो उसे संपत्ति का कब्जा वापस दिलाया जाएगा।

पैतृक/ सहदायिक संपत्ति का बंटवारा हुए बिना कोई भी पिता अपनी संतानों को पैतृक संपत्ति से अलग नहीं कर सकता। इस तरह संपत्ति का उक्त हस्तान्तरण वैध नहीं है। लेकिन उस जमीन में पिता अपने हिस्से की जमीन को बिना बंटवारा किए भी हस्तांतरित कर सकता है, उस हस्तान्तरण के आधार पर नामान्तरण भी खोला जा सकता है। लेकिन जिस व्यक्ति को संपत्ति का हिस्सा हस्तांतरित किया गया है वह व्यक्ति संपत्ति पर कब्जा केवल बंटवारे के माध्यम से ही प्राप्त कर सकता है। आप रजिस्ट्री को निरस्त कराने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं तथा संपत्ति से बेदखली के विरुद्ध इसी न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। इस मामले में दस्तावेजों को किसी स्थानीय वकील को दिखा कर सलाह लें और आगे की कार्यवाही करें।

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समस्या-

सुधा ने इन्दौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे पति द्वारा मुझ पर तलाक प्रकरण किया गया है मैं अपने गम्भीर रूप से बीमार एवं वृद्ध माता के घर पर हूँ। दो अलग-अलग न्यायालयों द्वारा स्वीकृत भरण पोषण एवं अंतरिम भरण पोषण की राशि मेरे पति द्वारा हीला हवाली करने और न्यायालय के दखल के पश्चात मुझे प्रदान की जाती है। उक्त भरण पोषण राशियों की स्वीकृति के सम्बन्ध में मेरे पति द्वारा एक प्रकरण के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय मैं चुनौती प्रस्तुत की थी, जिस में उच्च न्यायालय के आदेश द्वारा उक्त भरण पोषण राशियों को उचित एवं सही माना है। उक्त तलाक प्रकरण को मैं अपने घर से 300 कि.मी.दूर परिवार न्यायालय से स्थानीय ए डी.जे न्यायालय में स्थानांतरित करवाना चाहती हूँ, इसके लिये मुझे क्या करना होगा ?


समाधान-

प का विवाह विच्छेद का प्रकरण पति द्वारा हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत प्रस्तुत किया गया है। इस अधिनियम की धारा 21-ए में इस अधिनियम के अंतर्गत प्रस्तुत प्रकरणों के स्थानान्तरण के उपबंध हैं। इस के अतिरिक्त इस अधिनियम के प्रकरणों पर दीवानी प्रक्रिया संहिता प्रभावी है। धारा 21-ए में उपबंधित है कि यदि धारा 10 और 13 के प्रकरण अलग अलग स्थानों पर प्रस्तुत किए गए हों तो बाद वाले मुकदमे को पहले वाले मुकदमे के स्थान पर स्थानान्तरित किया जा सकता है। इस के लिए स्थानान्तरण चाहने वाले व्यक्ति को उच्च न्यायालय में आवेदन करना होगा। धारा 24 दीवानी प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय किसी भी प्रकरण को किसी पक्षकार की सुविधा के लिए अपने अधीन किसी भी न्यायालय को स्थानान्तरित कर सकता है।

आप को चाहिए कि आप उक्त प्रकरण के स्थानान्तरण के लिए अपने उच्च न्यायालय को आवेदन प्रस्तुत करें। जिस में वे कारण अंकित किए जाएँ जिनके आधार पर आप अपना प्रकरण किसी खास न्यायालय में स्थानान्तरित करना चाहती हैं। उच्च न्यायालय विपक्षी पक्षकार को सुनवाई का अवसर प्रदान करने के उपरान्त स्थानान्तरण के सम्बंध में उचित आदेश पारित कर सकता है।

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समस्या-

नेहा सोनी ने इंदौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति मुझे मेरे मायके छोड़ कर चले गये और मुझे आने के लिए भी मना कर दिया। वो मुझे साथ रखना नहीं चाहते। मैं ने कोर्ट में 125 और 498 ए के मुकदमे लगा रखे हैं।  मेरे पति प्राइवेट कॉलेज मे प्रोफसर हैं। मेरे पास  उन की सैलरी का प्रमाण नहीं है।   मेरा अंतरिम मेंटेनेन्स 1700 रुपए प्रतिमाह तय हुआ है। जबकि मेरे ससुराल वाले काफ़ी संपन्न हैं। वो मुकदमे की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं, ना ही कोई हाल निकालना चाहते हैं।  क्या करूँ बहुत परेशान हूँ। मेरी मदद करें।

समाधान-

भारत में अदालतों की संख्या आबादी के मुकाबले बहुत कम है। दस लाख की आबादी पर अमरीका में 140 अदालतें हैं और ब्रिटेन में 55 जब कि भारत में इसी जनसंख्या पर केवल 12 अदालतें हैं। वैसी स्थिति में न्याय में देरी होना स्वाभाविक है। 498ए की कार्यवाही तो धीमे ही चलेगी उस पर आपका नियंत्रण नहीं हो सकता। वहाँ अभियोजक सरकार होती है। आपको केवल गवाही के लिए बुलाया जाएगा।

धारा 125 दं.प्र.सं. के भरण पोषण के मामले में आप को अंतरिम राहत न्यायालय ने दे दी है। अब जब भी अन्तिम निर्णय होगा तब जो भी गुजारा भत्ता आप का तय होगा वह आप के द्वारा आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने की तिथि से प्रभावी होगा। इस तरह यदि आप का गुजारा भत्ता 5000 प्रतिमाह तय होता है तो 1700 के अलावा जितना गुजारा भत्ता बकाया होगा वह आप को बाद में मिल जाएगा। इस लिए आप को चाहिए कि आप 125 दं.प्र.सं. के प्रकरण में उचित गुजारा भत्ता तय होने पर अधिक ध्यान दें। गुजारा भत्ता का आधार हमेशा पति की आर्थिक स्थिति और मासिक आय होती है। मासिक आय तो आप को प्रमाणित  करनी होगी।

आप को चाहिए कि आप पति के निजी कालेज का पता लगाएँ अपने स्तर पर उन की सेलरी की जानकारी करें और आर्थिक स्थिति का ज्ञान करें। धारा 125 दं.प्र.संहिता का प्रकरण अपराधिक कानून का हिस्सा होने के साथ साथ दीवानी प्रकृति का है। इस कारण से दीवानी प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के प्रावधान सिद्धान्त रूप में इस प्रकरण में प्रभावी होते हैं। इकबाल बानो बनाम स्टेट ऑफ यूपी के मामले में 05.06. 2007 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दीवानी प्रकृति का माना है।आप इस मामले में सीपीसी के प्रावधानों केअनुरूप प्रतिपक्षी को देने के लिए प्रश्नावली दे सकती हैं और न्यायालय उन का उत्तर देने का आदेश प्रतिपक्षी को दे सकता है इसी तरह आप कोई भी दस्तावेज जो प्रतिपक्षी के शक्ति और आधिपत्य में है उसे प्रकट और प्रस्तुत कराने के लिए आवेदन न्यायालय को दे सकती हैं। दं.प्र.संहिता में भी धारा 91 में दस्तावेज प्रतिपक्षी से अथवा किसी से भी मंगाया जा सकता है और दस्तावेज लाने वाले को दस्तावेज साथ ला कर बयान देने के लिए कहा जा सकता है। इस तरह जिस संस्था में आप के पति काम करते हैं उस संस्था के प्रमुख को दस्तावेज ले कर न्यायालय में बुलाने के लिए समन जारी किया जा सकता है। आप इस मामले में अपने वकील से बात करें कि वह सीपीसी और दं.प्र.सं. के प्रावधानों में ऐसे आवेदन प्रस्तुत करे और इस संबंध में न्यायालयों के निर्णय तलाश कर उन का उपयोग करते हुए वस्तु स्थिति को न्यायालय के समक्ष रखे जिस से उचित रूप से आप का गुजारा भत्ता न्यायालय तय कर सके।

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समस्या-

कल्याण सिंह ने राजीव नगर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मुझे एक कंपनी ने (जिस से मेने एक कियोस्क लिया था) नोटिस भेजा है जिसमें यह कहा गया है कि कंपनी जो कमीशन देती है उसमें जितना कमीशन देना चाहिए था उस अमाउंट से 13957 रुपए  ग़लती से ज़्यादा दे दिया है वो नही लोटाए जाने पर आईपीसी की धारा 409 के तहत अपराध है जबकि यह कंपनी मुझे फॉर्म 16 नहीं प्रोवाइड करवा रही और वो भी पिछले 3 साल से जिसमे मेरा टीडीएस कट रहा हे तो सर टीडीएस काट कर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में जमा नही करवाना भी तो एक अपराध है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प को कंपनी ने कमीशन खुद स्वैच्छा से दिया है। यदि अधिक दे दिया है तो वह उस की कानूनी तरीके से वसूली कर सकती है। आप उन्हें लिखिए कि आप के हिसाब से जो कमीशन मिला है वह सही है। इस तरह कमीशन की धनराशि विवादित हो जाएगी और अमानत नहीं रहेगी। यदि वे समझते हैं कि अधिक भुगतान हो गया है तो इस का निर्णय न्यायालय से कराने के लिए कार्यवाही करें। आपने कोई अपराध नहीं किया है।

उन्हें सूचित करें कि उन्होंने आप का जो टीडीएस आज तक काटा है उस का विवरण आप को नहीं भिजवाया है जो कि इनकम टैक्स कानून का उल्लंघन है यदि वे उचित समय में यह विवरण नहीं भिजवाते हैं तो आप इनकम टैक्स विभाग को शिकायत करेंगे। टीडीएस काट कर इनकम टैक्स विभाग में जमा न कराना गंभीर अपराध है इनकम टैक्स विभाग स्वयमेव कार्यवाही करेगा। वैसे यदि कंपनी ने टीडीएस काटा होगा तो आप के पैन नंबर से इनकम टैक्स विभाग की वेबसाइट पर आप को पता लग जाएगा कि कितना टीडीएस काटा गया है।

 

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