दीवानी विधि Archive

समस्या-

संगीता ने प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं शादी शुदा हूँ और मेरी एक बहन है, वो भी शादी शुदा हैं। मेरे पिता जी सरकारी नौकरी पर कार्यरत थे। दोनों बेटियों की शादी कर देने पर उन्होंने हम दोनों बहनो को बिना बताये अपने सगे भतीजे के बेटे को पंजीकृत गोद ले लिया। उसे  अपनी सम्पति का मालिक बना दिया सेवा के दौरान उनका देहांत हो गया तो क्या हम दोनों बहनो गोद नामा कैंसल करवा सकती हैं और अनुकम्पा के आधार पर नौकरी किसे मिल सकती है? हम को या दत्तक पुत्र को और मेरी सहमति के बिना दत्तक पुत्र को नौकरी मिल सकती है?

समाधान-

आप कैसे कहती हैं कि दत्तक पुत्र को आप के पिता ने संपूर्ण संपत्ति का स्वामी बना दिया? क्या उन्हों ने कोई वसीयत की है। यदि कोई वसीयत नहीं की है तो जैसे एक पुत्र के होते हुए विवाहित पुत्रियों को जो अधिकार प्राप्त हैं वे सभी अधिकार आपको प्राप्त हैं। आप कृषि भूमि के अतिरिक्त तमाम संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार हैं और दत्तक पुत्र भी। आप तीनों  में से प्रत्येक पिता की छोड़ी हुई संपत्ति में एक तिहाई हिस्से की हकदार हैं। अनुकंपा के आधार पर उस आश्रित को नियुक्ति मिल सकती है जो शेष आश्रितों की अनापत्ति ले आए।  आप की आपत्ति करेंगी या अनापत्ति नहीं देंगी तो दत्तक पुत्र अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त नहीं कर सकेगा। गोदनामा आप तभी निरस्त करवा सकती हैं जब कि वह कानून के अनुसार न हो। इस के लिए आप गोदनामा की प्रति प्राप्त कर किसी स्थानीय वकील से सलाह कर सकती हैं और गोद के नियमों का उल्लंघन हुआ हो तो उसे निरस्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं।

विक्रय निरस्त करने, विभाजन और पृथक हिस्से के कब्जे का वाद

September 6, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

कल्पना ने फरीदाबाद, हरयाणा से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी ने अपनी पैतृक जमींन अपनी पुत्र वधू के नाम 6 वर्ष पूर्व बेच दी। पिताजी को किसी प्रकार की आर्थिक आवश्यकता नहीं थी तथा पुत्र वधू किसी प्रकार की आय नहीं करती थी। अब मेरे पिताजी और मेरा बड़ा भाई मुझे, मेरे बच्चों व मेरे पति का मान सम्मान नहीं करते व हमें गाली-गालोंज भी करते है। .क्या अब मैं अपना हक/ ज़मीन वापस ले सकती हूँ?  समाज में बेटी के मान-सम्मान का भी प्रश्न है। कृपया राह सुझाएँ।

समाधान-

प पहले जाँच लें कि जमीन पैतृक ही है। कौन सी जमीन पैतृक है जिस में संतानों का जन्म से अधिकार होता है इस पर तीसरा खंबा पर पहले पोस्टें लिखी जा चुकी हैं, उन्हें सर्च कर के पढ़ लें। लड़कियों को 2005 से पैतृक संपत्ति में अधिकार मिला है। आप की जमीन की बिक्री बाद में हुई है। इस तरह आप जमीन के विक्रय को चुनौती दे सकती हैं। इस मामले में लिमिटेशन की बाधा भी नहीं आएगी। यदि पिता किसी संतान का का हक किसी और को दे देता है तो वाद 12 वर्ष तक की अवधि में किया जा सकता है। आप को चाहिए कि आप विक्रय पत्र निरस्त करवाने तथा संपत्ति का बँटवारा कर आप का हिस्सा अलग करते हुए उस का पृथक कब्जा आप को देने का वाद दीवानी न्यायालय में संस्थित करें।

 

संयुक्त संपत्ति में हिस्सेदार अपना हिस्सा विक्रय कर सकता है।

September 2, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जमीला खातून ने सीतापुर उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ज़मीला खातून निवासी बाराबंकी, हाल सीतापुर मैंने सन १९९५ में एक ६०० स्क्वायर फुट का घर ख़रीदा था। उस बैनामे पर मेरा नाम व मेरी ५ पुत्रियों के नाम भी अंकित हैं। अब मैं अपना मकान बेचना चाहती हूँ, लेकिन मेरी बड़ी पुत्री उसमे टांग मार रही है और उससे मेरा विवाद चल रहा है। तो कृपा करके उसके बेचने का हल बताएँ कि किस प्रकार मैं उसे बेच सकती हूँ? क्या उसमें मैं कोई केस करूँ या पुलिस से शिकायत करूँ? अभी मकान में ताला पड़ा है। मेरी ५ नंबर की पुत्री जिससे मेरा विवाद चल रहा है वो भी अब उस मकान में नहीं रहती है परन्तु जबरन पूरा मकान हथियाना चाह रही है।

समाधान-

प का मकान एक संयुक्त संपत्ति है। इस के छह हिस्सेदार हैं। इस कारण कोई भी हिस्सेदार पूरा मकान नहीं बेच सकते। पूरा मकान सभी छह हिस्सेदार मिल कर ही बेच सकते हैं। हाँ आप पाँच हिस्सेदार अर्थात आप और आप की चार बेटियाँ मिल कर मकान के पाँच हिस्से बेच सकते हैं और मकान का कब्जा आप के पास हो तो खरीददार को हस्तान्तरित कर सकते हैं। लेकिन इस के बाद आपत्ति करने वाली पुत्री का छठा हिस्सा उस मकान में उसी का बना रहेगा। चाहे तो खरीददार प्रयत्न कर के आप की बेटी से छठा हिस्सा भी बाद में खरीद सकता है। या आप की आपत्ति करने वाली बेटी विभाजन का वाद कर सकती है। मकान छोटा होने से उस के भौतिक विभाजन की संभावना नहीं होने से स्थिति यही होगी कि बेटी को कहा जाएगा कि जो भी बाजार मूल्य है उस का छठा हिस्सा ले कर अपना हिस्सा छोड़ दे।

दूसरा रास्ता है कि आप बंटवारे का वाद प्रस्तुत करें और विभाजन करवाएँ विभाजन की कार्यवाही में भी वही होगा जो पहले हम बता चुके हैं। जब आप बेटी का हिस्सा खरीद लें तब आप पूरा मकान बेच सकती हैं।

बँटवारा कैसे किया जाए?

August 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

नटवर साहनी ने गोबरा नवापारा, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

क्या पैतृक सम्पति का बँटवारा करवाने पर बटवारा करने वाला जीवित न रहने पर मान्य रहता है?  क्या बटवारा नामा बिना पंजीकृत मान्य रहता है? क्योंकि वह पंजीकृत करवाने में असहाय है।

समाधान-

किसी भी साझी संपत्ति का बँटवारा आपसी सहमति से हो सकता है। यदि साझीदार या परिवार किसी एक व्यक्ति के द्वारा सुझाए गए बंटवारे पर सहमत हों तो वैसे भी किया जा सकता है। पर सभी साझीदारों की सहमति जरूरी है। एक बार बँटवारा हो जाने पर और सब के अपने अपने हिस्से पर काबिज हो जाने पर एक लंबे समय तक स्थिति वैसे ही बने रहने पर उस बँटवारे को चुनौती देना संभव नहीं होता है।

यह बँटवारा मौखिक हो कर बँटवारे के अनुसार संपत्ति का कब्जा सब को मिल जाने पर उस का निष्पादन हो जाता है। बँटवारे के कुछ समय बाद चाहेँ तो सारे साझीदार बँटवारे का स्मरण पत्र लिख कर उस पर सभी के हस्ताक्षर और गवाहों के हस्ताक्षर करवा कर उसे नौटेरी से प्रमाणित करा कर रख सकते हैं इसे भविष्य में किसी भी  मामले में साक्ष्य में प्रस्तुत किया जा सकता है।

बँटवारा यदि लिखित में होता है तो उस का पंजीकृत होना आवश्यक है, यदि वह पंजीकृत न हुआ तो भविष्य में साक्ष्य में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में उस दस्तावेज का कोई महत्व नहीं रह जाता है।

बेहतर यह है कि बँटवारा पंजीकृत हो। यदि नहीं होता है तो बँटवारा मौखिक हो और बँटवारे के मुताबिक संपत्ति पर पृथक पृथक कब्जे दे दिए जाएँ और उस के बाद बँटवारे का स्मरण पत्र नौटेरी से निष्पादित करा लिया जाए तो वह पर्याप्त है।

समस्या-

महावीर ने गाँव सुमाड़ी भरदार, पो0 तिलवाड़ा, जिला रूद्रप्रयाग गढ़वाल , उत्तराखंड  समस्या भेजी है कि-

मुख्य रास्ते से मेरे घर जाने का रास्ता मेरे पड़ोसियों के खेत से जाता है।  इन्होंने मेरे पिता जी की मृत्यु के बाद यह रास्ता बन्द कर दिया है, जबकि यह रास्ता पूर्व से ही खेत में कृषि कार्य के लिए निर्धारित होने पर भी मेरे पिता ने 100रू देकर लिया था।  मेरी माँ रास्ता बन्द करने की सूचना SDM कार्यालय में दर्ज कराने पर भी निर्माण न रूकने पर DM के समक्ष उपस्थित होकर प्रार्थना पत्र देने पर भी हमारी गैरमौजूदगी में रास्ता बन्द कर दिया है। जिस रास्ते को हमें उपयोग हेतु बता रहे हैं उस पर बरसात में भयंकर बरसाती पानी बहता है। जिसका वीडियो DM साहब को भी दिखाया दिया है। कृपया रास्ता खुलवाने हेतु जानकारी दें।

समाधान-

पने घर और अपनी संपत्ति पर आने जाने के रास्ते का अधिकार अत्यन्त महत्वपूर्ण अधिकार है। 100 रुपए दे कर रास्ता खरीदने की बात कुछ जम नहीं रही है। वैसे 99 रुपए तक की कोई स्थावर संपत्ति खरीदी जाए तो उस की रजिस्ट्री कराना जरूरी नहीं है। यदि 99 रुपए या  उस से कम का सौदा हुआ हो और उस की लिखत हो तो उसे काम मेें लिया जा सकता ैहै। अन्यथा उस रास्ते का उपयोग करते हुए आप को 20 वर्ष से अधिक तो हो ही गए होंगे तो आप का उस खेत में से गुजरने का अधिकार आप का सुखाधिकार का अधिकार है। इस अधिकार का प्रवर्तन दीवानी न्यायालय द्वारा कराया जा सकता है।

आप तुरन्त दीवानी न्यायालय में राज्य सरकार को तहसीलदार के माध्यम से पक्षकार बनाते हुए विपक्षी पक्षकार के विरुद्ध दीवानी न्यायालय में स्थाई ्व्यादेश का वाद प्रस्तुत करें और साथ में अस्थाई व्यादेश का आवेदन प्रस्तुत कर तुरन्त निर्माण को रुकवाने और आने जाने में बाधा पैदा न करने का आदेश करावें। यदि रास्ता स्थाई रूप से बंद कर दिया गया हो तो फिर घोषणा की प्रार्थना भी साथ ही इसी वाद में करनी होगी।  राज्य सरकार के विरुद्ध कोई भी वाद  60 दिन का नोटिस दे कर ही प्रस्तुत किया जा सकता है लेकिन आवश्यक होने पर बिना नोटिस के वाद पेश करने की अनुमति के लिए आवेदन धारा 80 सीपीसी के साथ वाद तुरन्त प्रस्तुत किया जा सकता है।

समस्या-

नीलेश ने रॉबर्ट्सगंज, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी जमींदार थे। सन 2001 में उन्होंने एक रजिस्टर्ड वसीयत लिखी थी। पर उसे सम्पत्ति में से आधा हिस्सा 2003 में उन्होंने ही बेच दिया। क्या यह वसीयत मान्य होगी?

समाधान-

सीयत के संबंध में विधि यह है कि कोई भी व्यक्ति वसीयत कर सकता है। अपने जीवनकाल में उसे बदल सकता है, एक से अधिक वसीयत होने पर अन्तिम वसीयत मान्य होगी। यदि आप के दादा जी ने एक ही वसीयत की है जो पंजीकृत भी है तो वह मान्य होगी।

यदि वसीयत की गयी संपत्तियों में से कोई संपत्ति वसीयतकर्ता द्वारा विक्रय कर दी गयी है तो वैसी स्थिति में जो  भी संपत्ति वसीयतकर्ता की मृत्यु के समय मौजूद होगी वह वसीयती को प्राप्त होगी। इस कारण आपके दादा जी की वसीयत उन संपत्तियों के संबंध में जो कि उन की मृत्यु के समय मौजूद थीं प्रभावी रहेगी।

समस्या-

ईशा ने झारिया, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मैं एक 2 साल की लड़की को गोद लेना चाहती हूूँ जो मेरे रिश्ते में ही आती है,  लेकिन कानूनी रूप से नहीं। मैं उसे हायार एजुकेशन देकर सेल्फ़ डिपेंड बनाना चाहती हूँ और विवाह का दायित्व लेना चाहती हूँ। लेकिन भविष्य में अपनी संपत्ति का कोई अधिकार उसे नहीं देना चाहती हूँ। मेरा स्वयं का एक बेटा है। क्या ऐसा संभव है।

समाधान-

क्यों कि आप का स्वयं का एक पुत्र है इस कारण से आप किसी भी संतान को विधिक रुप से गोद नहीं ले सकती हैं। आप ऐसा खुद भी नहीं करना चाहती हैं। इस कारण इसे गोद लेना तो कहा नहीं जा सकता। लेकिन जो कुछ आप उस के लिए करना चाहती हैं वह भी एक उत्तम विचार है। इस के लिए यदि उस लड़की के माता पिता तैयार हों तो ऐसा आपस में संविदा के माध्यम से किया जा सकता है।

लड़की के माता पिता और आप व आपके पति के मध्य एक लिखित संविदा निष्पादित हो जाए जो एग्रीमेंट के लिए आवश्यक स्टाम्प पर लिखी जाए और बाद में नोटेरी से तस्दीक करा ली जाए। इस दस्तावेज को उप पंजीयक के यहाँ भी एक संविदा के रूप में पंजीकृत कराया जा सकता है। इस संविदा के अनुसार लड़की के माता पिता लड़की की अभिरक्षा उस के विवाह तक के लिए आप को देंगे। आप लड़की की परवरिश अपनी स्वयं की संतान की तरह करेंगी, उसे स्वावलंबी बनाने की कोशिश करेंगी और उस के विवाह योग्य होने पर विवाह का व्यय उठाएंगी। बदले में उस के माता पिता अपनी बेटी की अभिरक्षा का दावा नहीं करेंगे। इस एग्रीमेंट की एक शर्त यह भी होगी कि वह लड़की कभी भी स्वयं को आप की पुत्री होने का दावा नहीं करेगी, आप की संपत्ति पर अथवा बाद में उत्तराधिकारी के रूप में किसी तरह का दावा नहीं करेेगी। इस तरह की संविदा होने के बाद आप लड़की को अपनी अभिरक्षा में ला सकती हैं।

विधवा द्वारा ग्रहण की गई दत्तक संतान का पिता कौन कहलाएगा?

August 3, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

पुरुषोत्तम शर्मा ने हनुमानगढ़, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

श्रीमती कमला पत्नी स्व. लालचन्द कमला देवी की आयु 45 वर्ष थी और कमला देवी के कोई औलाद नहीं थी और ना ही होने की सम्भावना थी। कमला के पति लालचन्द की मृत्यु हो चुकी.थी। कमला.ने अपने जेठ लक्ष्मीनारायण के लड़के धर्मवीर को हिन्दू रीति रिवाज के अनुसार बचपन से गोद ले रखा है। गोदनामा बना हुआ है कमला.ने अपनी सम्पति का त्याग कर धर्मवीर के नाम कर दी है। तो आप मुझे ये बताएँ कि पहले सभी डाँक्यूमेन्ट में धर्मवीर पुत्र श्री  लक्ष्मीनारायण था अब पि.मु./दत्तक पुत्र होने के बाद भविष्य में सभी धर्मवीर के डाक्युमेन्ट में क्या नाम करवाया जाए? लालचन्द की मृत्यु के बाद कमला ने धर्मवीर को गोद लिया था। अब.पहचान पत्र, आधार कार्ड, राशन कार्ड, भामाशाह कार्ड, बैक खाता, लाईसेन्स, सभी डाक्युमेन्ट में क्या नाम करवाया जाए, जो भविष्य मे पूर्ण रुप से सही हो और कोई समस्या ना आए? कोई कहता है. धर्मवीर पि.मु./दत्तक पुत्र कमला करवा लो और कोई कहता है धर्मवीर पि.मु./दत्तक पुत्र लालचन्द करवा लो। तो आप ही बताएँ कि भविष्य में क्या नाम पूर्ण रूप से सही होगा? आपका सुझाव यह था कि बच्चे का दत्तक ग्रहण होने के उपरान्त उस के पिता के स्थान पर उस के दत्तक पिता का ही नाम होना चाहिए। अन्यथा अनेक प्रकार की परेशानियाँ हो सकती हैं। मुझे थोड़ा समझने मे समस्या आ रही है कि धर्मवीर को कमला देवी ने गोद लिया था, ना कि लालचन्द ने। धर्मवीर को गोद लेने से पहले ही लालचन्द की मृत्यु हो चुकी थी। लालचन्द की मृत्यु होने के कुछ समय बाद कमला देवी ने धर्मवीर को गोद लिया था।

समाधान-

मारा जो सुझाव था वही सही है। यदि विधवा किसी पुत्र को दत्तक ग्रहण करती है तो उस का दत्तक पिता दत्तक ग्रहण करने वाली स्त्री का पति ही होगा। उस के पिता के स्थान पर उस के जन्मदाता पिता का नाम तो इस कारण अंकित नहीं किया जा सकता कि वह तो अपनी पत्नी की सहमति से अपने पुत्र को दत्तक दे चुका होता है और पिता होने की हैसियत को त्याग देता है।

हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण पोषण अधिनियम 1956 की धारा 14 की उपधारा (4) में उपबंधित किया गया है कि जब एक विधवा या अविवाहित स्त्री किसी बालक को दत्तक ग्रहण करती है और बाद में किसी पुरुष से विवाह करती है तो जिस पुरुष से वह विवाह करती है वह उस दत्तक बालक का सौतेला पिता कहलाएगा।

इस उपबंध से स्पष्ट है कि किसी विधवा द्वारा दत्तक ग्रहण करने पर दत्तक ग्रहण किए गए बालक का पिता उस विधवा स्त्री का मृत पति ही होगा। इस मामले में दत्तक ग्रहण किए गए बालक के दस्तावेजों में धर्मवीर पुत्र स्व. श्री लालचंद लिखवाना होगा। जो कि दत्तक ग्रहण विलेख की प्रति प्रस्तुत कर परिवर्तित कराया जा सकता है। हर दस्तावेज में परिवर्तन की प्रक्रिया भिन्न भिन्न हो सकती है जो आप संबंधित विभाग से पता करें।

नामान्तरण निरस्ती को दीवानी न्यायालय में चुनौती दें।

August 1, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

डॉ. मोहन कुमार वर्मा ने उज्जैन, मध्यप्रेदश से  समस्या भेजी है कि-

मैंने नगरपालिका सीएमओ को नामांतरण हेतु आवेदन किया, जिसमें मैंने पिता की पंजीकृत वसियत एवं अनुप्रमाणित गवाह की फोटोकॉपी प्रस्तुत की। इस पर मेरे भाई बहनों ने आपत्ति दर्ज कराई।  उन्होंने बटवारा विलेख नोटरी का प्रस्तुत किया जिस पर सलाहकार ने टीप दिया कि आवेदक ने पंजिकृत वसीयत दिया जिस पर न्यायालय का स्टे नहीं है अतः नामांतरण में आपत्ति नहीं है। न.पा.शुजालपुर पी.आइ.सी. की बैठक में नामांतरण स्वीकार हो मेरा नामांतरण होगया। तत्पश्चात मैंने वर्ष 2011-12 से 2016-17 तक संपत्ति कर प्रति वर्ष जमा किया। वर्ष 17-18 का सं.कर जमा करने गया तो मालुम हुआ कि मेरा नामांतरण निरस्त कर मेरे पिताजी का नाम अंकित कर दिया गया। शायद आपत्तिकर्ताओं ने अधिकारियों से साठगांठ करके मेरे नामांतरण अवैध रूप से निरस्त करा दिया अब मुझे क्या कार्यवाही करना चाहिए?

समाधान-

क बार आप के पक्ष में हो चुका नामान्तरण बिना आप को सुनवाई का अवसर दिए निरस्त नहीं हो सकता था। नगरपालिका ने गलती की है। आप नगर पालिका को इस मामले में नगरपालिका अधिनियम के अंतर्गत नोटिस दें कि उन्हों ने नामान्तरण को निरस्त कर के गलती की है। यदि वे नामान्तरण निरस्तीकरण का आदेश वापस न ले कर नामान्तरण आप के नाम नहीं करते हैं तो आप दीवानी अदालत में नगर पालिका के विरुद्ध दीवानी वाद संस्थित करेंगे।

नोटिस देने के उपरान्त दो माह की अवधि व्यतीत हो जाने पर आप नगर पालिका के विरुद्ध उक्त नामान्तरण निरस्तीकरण को हटाने का व्यादेश पारित करने तथा इस आशय की घोषण करने का वाद संस्थित करें कि पंजीकृत वसीयत से पिता की मृत्यु के बाद आप स्वामी हो गए हैं। इस मामले में वाद संस्थित करने के लिए किसी अच्छे वकील की सेवाएँ प्राप्त करें।

समस्या-

प्रशान्त वर्मा ने नवाकपुरा, लंका, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी हमसे पिछले 21 वर्षों से अलग रह रही है। मेरी माँ की मृत्यु के पश्चात मुझे अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी मिली। अब मेरी पत्नी चाहती है कि मेरी सेवा पुस्तिका और अन्य अभिलेखों में नामिनी के तौर पर उसका नाम दर्ज हो।  जबकि मैं ने अपने प्रधान लिपिक से इस बारे मे बात की तो उन्होंने कहा कि यह कर्मचारी के ऊपर निर्भर करता है कि वह किसे नामिनी बनाए। क्या यह मुझ पर निर्भर है मैं किसे नामिनी बनाऊँ या यह पत्नी का अधिकार है?  जबकि मेरी पत्नी हमसे मुक़दमा भी लड़ती है 125 दं.प्र.सं. 498 भा.दं.सं के मुकदमे किए हैं मैं माननीय उच्च न्यायालय के आदेश से अपनी पत्नी को हर माह 1500/ प्रति माह देता हूँ। उसने ये भी कहा है कि उसे विभाग द्वारा पैसा दिलवाया जाए। कृपया उचित मार्गदर्शन करे।

समाधान-

धिकांश लोगों को यह नहीं पता कि सरकारी विभाग में, पीएफ के लिए या बीमा के लिए नॉमिनी क्यों बनाए जाते हैं। आप को और आप की पत्नी को भी संभवतः यह पता नहीं है। इस कारण सब से पहले यह जानना आवश्यक है कि नॉमिनी का अर्थ क्या है।

नौकरी करते हुए किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए तो उस का वेतन व अन्य लाभ नियोजक के यहाँ अथवा सरकारी विभाग की ओर बकाया रह जाते हैं। इस राशि को प्राप्त करने का अधिकार उस कर्मचारी के कानूनी उत्तराधिकारियों का है। लेकिन उत्तराधिकारियों की स्थिति हमेशा बदलती रहती है। हो सकता है मृत्यु के कुछ दिन पूर्व ही कर्मचारी को संतान हुई हो लेकिन उस का नाम विभाग में दर्ज न हो। मृत्यु के बाद अक्सर उत्तराधिकारियों के बीच इस बात की होड़ भी लगती है कि मृतक की संपत्ति में से अधिक से अधिक उसे मिल जाए। इस कारण विभाग या कर्मचारी या बीमा विभाग या भविष्य निधि विभाग किसे उस राशि का भुगतान करे यह तय करना कठिन हो जाता है। इस के लिए नॉमिनी की व्यवस्था की जाती है। नॉमिनी की नियुक्ति एक ट्रस्टी के रूप में होती है। जिस का अर्थ यह है कि विभाग किसी कर्मचारी या बीमा कर्ता की मृत्यु के उपरान्त कर्मचारी की बकाया राशियाँ नॉमिनी को भुगतान कर दे। नॉमिनी का यह कर्तव्य है कि वह उस राशि को प्राप्त कर उसे मृतक के उत्तराधिकारियों के मध्य उन के कानूनी अधिकारों के अनुसार वितरित कर दे। इस तरह नॉमनी हो जाने मात्र से कोई व्यक्ति किसी की संपत्ति प्राप्त करने का अधिकारी नहीं हो जाता, अपितु उस का दायित्व बढ़ जाता है। लेकिन समझ के फेर में लोग समझते हैं कि किसी का नॉमिनी नियुक्त हो जाने से वह मृत्यु के उपरान्त उस की संपत्ति का अधिकारी हो जाएगा। जब नॉमिनी को संपत्ति मिल जाती है तो वह उसे मृतक के उत्तराधिकारियों में नहीं बाँटता और उत्तराधिकारी अपने अधिकार के लिए नॉमनी से लड़ते रह जाते हैं और मुकदमेबाजी बहुत बढ़ती है।

यदि किसी व्यक्ति को अपनी मृत्यु के उपरान्त अपनी संप्तति किसी व्यक्ति विशेष को देनी हो तो वह उस के नाम वसीयत लिखता है। नोमिनी वसीयती या उत्तराधिकारी नहीं होता। इस कारण नॉमिनी उसी व्यक्ति को नियुक्त करें जो मृत्यु के पश्चात आप की संपत्ति को पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ आप के उत्तराधिकारियों में कानून के अनुसार वितरित कर दे। यह पूरी तरह आप की इच्छा पर निर्भर करता है कि आप किसे अपने नोमिनी नियुक्त करते हैं।

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