न्यायिक सुधार Archive

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अभिनव ने रीवा मध्यप्रदेश से पूछा है-

मारे किराएदार जो बहुत पहले से है वह अभी बहुत ही कम किराया देते हैं। ओर खाली करने कीकहने पर 20 लाख रुपयों की मांग कर रहे हैं। दूसरे लोगों को किराए पर दे कर खुद अच्छा किराया वसूल करते हैं। क्या उन से आसानी से हटाया जा सकता है या किराया बढ़ाया जा सकता है। क्या लोक अदालत में इस की कार्यवाही हो सकती है?

समाधान-

म ने हमेशा कहा है कि किराएदार किराएदार ही रहता है वह कभी मकान मालिक नहीं हो सकता। किराएदार कम किराया देता है तो उस का कारण है कि आप ने किराया बढ़ाने के लिए कभी कानूनी कार्यवाही नहीं की। यदि समय रहते आप ने किराया बढ़ाने की कार्यवाही की होती तो अब तक किराया बढ़ चुका होता। यदि आप किराया बढ़ाना चाहते हैं तो आप को न्यायालय में कार्यवाही करनी ही होगी।

आप के किराएदार आप को कम किराया देता है और उस ने अन्य व्यक्ति को वही परिसर या उस का कोई भाग अधिक किराये पर दे रखा है तो आप को इस बात के सबूत एकत्र करना चाहिए कि आप के किराएदार ने परिसर को शिकमी किराएदारी पर चढ़ा दिया है। यदि आप के किराएदार ने परिसर को शिकमी किराएदार को चढ़ा दिया है तो आप इसी आधार पर अपना परिसर खाली करवा सकते हैं।

किराएदार से परिसर खाली कराने का हर राज्य में अलग कानून बना है। इसी तरह मध्यप्रदेश में भी है। आप को तुरन्त किसी वकील से संपर्क करना चाहिए। आप किराया भी बढ़ा सकते हैं और परिसर खाली भी करवा सकते हैं। वकील आप से जरूरी सारे तथ्य जान कर उपाय बता सकता है।

कई लोग सोचते हैं कि अदालत में मुकदमा करने से बहुत समय लगेगा। तो अदालत में समय तो लगता है। कितना समय लगेगा यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। यदि अदालत में मुकदमे बहुत अधिक संख्या में लंबित हैं तो समय भी अधिक लगेगा। मुकदमों में देरी होने का कारण अदालतों की संख्या का बहुत कम होना है। देश के मुख्य न्यायाधीश ने देश भर में 70000 अदालतों की और जरूरत बताई है। जब तक देश में पर्याप्त अदालतें नहीं होतीं तब तक मुकदमों के निर्णय में देरी होना जारी रहेगा। वैसे अधीनस्थ न्यायालय स्थापित करने का दायित्व राज्य सरकार का है। लोगों को चाहिए कि अधिक अदालतें स्थापित करने के लिए राज्य सरकार पर दबाव बनाएँ।

लेकिन यह सोच गलत है कि अदालत में मुकदमा करने से देरी होगी इस कारण अन्य उपाय तलाशा जाए। अन्य कोई भी वैध उपाय उपलब्ध नहीं है इस कारण आप को जाना तो अदालत ही पड़ेगा। आप अदालत जाने में जितनी देरी करेंगे उतनी ही देरी से आप को राहत प्राप्त होगी। इस कारण मुकदमा करने में देरी न करें।

लोक अदालत में न्याय बिलकुल नहीं मिलता। वहाँ भी मजबूर पक्ष को ही झुकना पड़ता है और जो कुछ मिल रहा है उस पर इसलिए सब्र करना पड़ता है कि अदालतें समय रहते न्याय करने में सक्षम नहीं हैं। वस्तुतः लोक अदालतें तो लोगों को न्याय प्राप्ति से दूर करने की तरकीब है जो सरकारों और न्यायपालिका ने मिल कर तलाश कर ली है। यह पूरी तरह से न्याय से विचलन है।

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सुस्त न्यायिक व्यवस्था का इलाज तो राजनीति से ही संभव है।

May 16, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_divorce.jpgसमस्या-

प्रभाकर ने ग्वालियर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मारी शादी हिन्दू विधि से ११ साल पहले हुई थी। २ बच्चे हैं। शादी के बाद कभी भी नहीं बनी पर कोशिश थी कि शायद कुछ ठीक हो जाएगा। मैं किस प्रकार से जल्द तलाक़ ले सकता हूँ, सही कारण तो पत्नी द्वारा मानसिक प्रतारणा है, पर शायद सिद्ध करने में जिंदगी निकल जाएगी। क्या मैं अपना विवाहेतर शारीरिक संबंध सिद्ध करके डिक्री ले सकता हूँ? या मेरा धर्म परिवर्तन करके ये शादी खत्म की जा सकती है? पत्नी ने पहले तलाक़ की धमकी दी थी पर अब तलाक़ देने के लिए सहमत नहीं है। कृपया कुछ और उपाय हो तो सुझाएँ, बच्चो का हक़ भी पत्नी रखे तो चलेगा, मैं बच्चो का भरण पोषण लाइफ टाइम तक करने के लिए तैयार हूँ। शायद मैं कुछ तथ्य न दे कर भावनात्मक बात कर रहा हूँ पर कृपया अन्यथा न लीजिए।

समाधान-

भी तो आप को खुद लग रहा है कि आप शायद भावनात्मक बात कर रहे हैं। इस से स्पष्ट है कि आप के पास पत्नी से विवाह विच्छेद का कोई वैध कारण आप को दिखाई नहीं पड़ रहा है। यदि आप समझते हैं जो कुछ पत्नी कर रही है वह क्रूरता पूर्ण व्यवहार है तो आप उस के आधार पर न्यायिक पृथक्करण या विवाह विच्छेद का आवेदन कर सकते हैं। जहाँ तक सिद्ध करने में जीवन निकल जाने का भय है तो इस का अर्थ यह है कि आप के यहाँ न्याय पालिका बहुत सुस्त है और सभी मामलों में निर्णय देरी से होते हैं। आप को उस पर विश्वास नहीं रहा है।  यद सब इस कारण होता है कि न्यायालय के क्षेत्राधिकार के क्षेत्र से इतने मुकदमे प्रस्तुत होते हैं कि उस के लिए एक न्यायालय पर्याप्त नहीं है। उस क्षेत्र के लिए और न्यायालय स्थापित किए जाने की आवश्यकता है। नए न्यायालय स्थापित करने का काम सरकार का है। कम न्यायालय और अधिक मुकदमे होने से पेशियाँ देरी से होती हैं। प्रतिदिन अधिक मुकदमे न्यायालय की कार्यसूची में लगते हैं जिन में से आधे से अधिक में केवल पेशी ही मिलनी होती है। इस का लाभ वे न्यायार्थी उठाते हैं जो अपने मुकदमों को लंबा करना चाहते हैं। यदि ऐसा है तो कोई भी आधार आप तलाक का हो लेकिन समय उतना ही लगेगा। सुस्त न्यायिक व्यवस्था से वकीलों के भरोसे नहीं लड़ा जा सकता। उसे दुरुस्त करने के लिए राजनीति ही करनी पड़ेगी। ऐसी सरकारें लानी होंगी जो न्यायाक दायित्वों के प्रति सजग हों और जनता को न्याय उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त संख्या में न्यायालय स्थापित करे।

केवल विवाह समाप्त करने के लिए किया गया धर्म परिवर्तन वैध नहीं। फिर उस से पत्नी को विवाह विच्छेद का अधिकार प्राप्त होता है आप को नहीं। हमें लगता है आप के बीच तालमेल की समस्या है। बेहतर तो यह है कि इस समस्या से निपटने के लिए किसी काउंसलर की मदद प्राप्त करनी चाहिए।

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justiceसमस्या-
यगदत्त वर्मा ने चित्तौड़गढ़, राजस्थान से पूछा है-

मैं मध्यप्रदेश का निवासी हूँ तथा वर्तमान में मैं राजस्थान में प्राइवेट जॉब कर रहा हूं हमारा कोर्ट केस चल रहा है। मेरे पिताजी ने आज से लगभग 45-47 वर्ष पूर्व नगरपालिका से अपनी नौकरी लगने के पश्चात रहवासी जमीन खरीदी थी दादाजी उस समय जीवित थे पिताजी, दादाजी, दादीजी तथा पिताजी के तीन बहनें व एक भार्इ था जो उस समय नाबालिग थे मेरे पिताजी की आमदनी जमीन के मूल्य से लगभग तीन गुना थी। दादाजी घर के मुखिया थे अत: पिताजी जो भी काम करते थे उनकी सलाह तथा आदेश के अनुसार ही कार्य करते थे अत: वह जमीन मेरे पिताजी ने अपने नाम से खरीदी थी और उसका रूपया कीमत अपने वेतन की बचत से जमा करवाया था तथा सभी प्रकार के टेक्स पिताजी ही भरते हैं और कोर्इ नहीं भरता। दादाजी की मृत्यु के पश्चात पिताजी ने उनके छोटे भार्इ तथा तीनों बहनों की शादी करी, मकान भी अपनी बचत से वेतनभत्तों, जी.पी.एफ. से अग्रिम राशि लेकर तथा रिश्तेदारों से मदद लेकर धीरे-धीरे टुकड़ों में मकान बनवाया तथा छुटपन से छोटे भार्इ (मेरे चाचा) को अपने साथ रखा। चाचा की शादी के कुछ समय पश्चात उसको उसी मकान में अलग रहने की इजाजत दी । मकान में प्रेमवश रहने दिया क्योंकि मेरे के चाचा पास रहने के लिये मकान नहीं था तथा काम धन्धा भी ठीक नहीं था। परन्तु जब मेरे चाचा ने (पिताजी के भार्इ) अपना मकान बना लिया तो पिताजी ने अपने छोटे भार्इ (चाचा) को अपने मकान में जाने के लिये कहा तो पहले तो जाने के लिये तैयार हो गया। परन्तु बाद में मना कर दिया और कहने लगा की ये बेनामी सम्पति है तथा मेरे पिताजी (दादाजी ने) हम दोनों भार्इयों (पिताजी व चाचा) के लिये खरीदी है तथा कहता है दादाजी ने परिवार के सामने मौखिक रूप से जमीन का आधा-आधा हिस्सा कर दिया था। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था। हो सकता है दादीजी से जीवित अवस्था में कोर्इ कोर्ट स्टाम्प पर अंगूठा लगवा लिया हो।, अत: मेरे चाचा आधी जमीन का मालिक खुद को बताता है और कहता है कि मैं नाबालिग था। इसलिये उस समय जमीन बड़े भार्इ के नाते दादाजी ने मेरे पिताजी के नाम खरीदी थी। जबकि दादाजी की कोर्इ आर्थिक सहायता नहीं थी और दादाजी उस समय आर्थिक रूप से सम्पन्न नहीं थे। दादाजी की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण पिताजी को जल्दी नौकरी करनी पड़ी। अभी फिलहाल आधे प्लाट पर मेरे चाचा का ही कब्जा है मेरे चाचा बोलते है की जिस भाग में मैं रहता हूं उसे मैनें ही बनाया है। जबकि उन्होंने कुछ भी पैसा नहीं लगाया है। मेरे पिताजी के पास जमीन के सभी कागज उपलब्ध है तथा मेरे पिताजी के पास निर्माण सम्बन्धी कागजात नहीं है। पिताजी अक्सर शहर से बाहर रहते थे और मकान किसी भी ठेकेदार से और ना ही एक मुश्त बनवाया। जितनी भी बचत होती थी मेरे पिताजी मकान में ही लगाते हैं। कोर्ट ने मकान खाली करने का प्रकरण चल रहा है मेरे चाचा तथा उसका परिवार आधे हिस्से पर कब्जा जमाये हुऐ है। परन्तु मकान का आधा हिस्सा नहीं खाली करते हैं। मेरे पिताजी ने चाचा की समय-समय पर आर्थिक सहायता भी करी परन्तु वह सब मानने को तैयार नहीं है। कोर्ट में वह केस को लम्बा खींचने का प्रयास करता रहता है। अब कोर्ट जिन प्रश्नों पर विचार कर रहा है वह नीचे दिये जा रहे है।  इस सम्बंध में यह भी उल्लेख है कि चाचा ने अभी तक अपने प्रतिवाद के समर्थन में कोर्इ दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किये हैं।
1.क्या विवादित भूखण्ड अपने पिताजी की अनुमति से वादी ने स्वंय प्रीमियम जमा कर अपने पक्ष में रजिस्ट्री करवार्इ थी?
2.क्या भूखण्ड पर एक मात्र वादी ने सम्पूर्ण मकान निर्माण करवाया है यदि हां तो इसलिये उक्त मकान वादी के एक मात्र स्वामित्व का है क्या वादी ने वादग्रस्त मकान में बिना किसी किराये से प्रेम स्नेहवश निवास हेतु प्रदान किया था?
3.क्या वादी के विरूद्ध आदेशात्मक निशेधाज्ञा के माध्यम से विवादित भूखण्ड के हिस्से को रिक्त आधिपत्य प्राप्त करने का अधिकारी है?
4.क्या प्रतिवादी से वादग्रस्त भूखण्ड का आधिपत्य प्राप्त करने तक अन्तरिम लाभ प्राप्त करने का अधिकारी है?

समाधान-

भूखंड व मकान आप के पिता जी के नाम से है। सारे कागजात उन के नाम से हैं। इस कारण यह प्राथमिक रूप से प्रमाणित है कि मकान आप के पिता जी का है। आप के पिता ने स्नेहवश भाई को रहने दिया। इसे हम लायसेंस कह सकते हैं। इस लायसेंस को रद्द कर के आप के पिता मकान का कब्जा प्राप्त कर सकते हैं। आप के चाचा ने अभी तक कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए हैं। इस से स्पष्ट है कि आप के चाचा  का मामला कमजोर है। जितने विवाद्यक न्यायालय ने निर्मित किए हैं वे भी सही हैं। मुझे लगता है कि आप के पिता जी इन्हें साबित कर लेंगे और मुकदमे का निर्णय आप के पिता जी के हक में ही होगा।

प के चाचा का केस कमजोर है इस कारण से वह मुकदमे को लंबा करना चाहता है। भारत में न्यायालयों में मुकदमों को लम्बा करना अत्यन्त आसान है। अधीनस्थ न्यायालयों में एक अदालत जितना काम रोज कर सकती है उस से 8-10 गुना काम रोज कार्यसूची में लगाया जाता है। खुद अदालत कम से कम 60 प्रतिशत मुकदमों में खुद ही आगे की तारीख देना चाहती है। इस कारण आप के चाचा के पक्ष की ओर से किसी भी बहाने से तारीखें आगे खिसकाने का प्रयास होता रहता होगा।

न्यायालयों में मुकदमे लम्बे होने का सब से बड़ा कारण हमारे देश में जरूरत के एक चौथाई से भी कम न्यायालय हैं। देश में न्यायालयों की संख्या बढ़ाने की तुरन्त जरूरत है। यह काम राज्य सरकारों का है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे राजनेता इस तरफ बिलकुल नहीं सोचते। आज तक केवल आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के हाल में हुए आम चुनावों में अदालतों की संख्या बढ़ाने का वादा किया था। बाकी किसी पार्टी ने अदालतों की संख्या बढ़ाने का वायदा करने का साहस नहीं दिखाया। उस का मुख्य कारण है कि जनता स्वयं भी इस मामले में बिलकल सजग नहीं है। देश के चुनाव नजदीक हैं जनता को हर उम्मीदवार से पूछना चाहिए कि वह और उस की पार्टी अदालतों की संख्या बढ़ाने के मामले में क्या सोचती है और उस की घोषणाएँ क्या हैं। इसी तरीके से इस मामले में जागरूकता लाई जा सकती है।

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Supreme Court India
समस्या-
हलद्वानी, उत्तराखण्ड से बीना ने पूछा है-

च्च न्यायालय में प्रस्तुत किसी प्रकरण की सुनवाई में हो रहे अनावश्यक विलम्ब हेतु क्या कहीं शिकायत की जा सकती है? या कार्यवाही शीघ्र करने हेतु कहां अपील करनी चाहिए?

समाधान –

किसी भी उच्च न्यायालय में किसी भी मुकदमे में कोई अनावश्यक देरी नहीं की जाती है। देरी का मुख्य कारण न्यायालय में लम्बित मुकदमों की संख्या है। वास्तव में हमारे न्यायालयों में केवल इतनी संख्या में मुकदमे होने चाहिए कि छह माह से दो वर्ष की अवधि में हर प्रकार के मुकदमे में अन्तिम निर्णय हो जाए। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के पद कम होने तथा जितने पद हैं उतने न्यायाधीश नियुक्त नहीं होने से लम्बित मुकदमों की संख्या बढ़ती जाती है। मुकदमे की ग्रहणार्थ सुनवाई के बाद यदि उस में कोई अन्तरिम राहत का कोई आवेदन नहीं होता या फिर अन्तरिम राहत के प्रार्थना पत्र के निर्णीत कर दिया गया होता है तो उसे क्रमानुसार (ड्यू कोर्स मे) सुनवाई के लिए रख दिया जाता है। इस तरह रखे गए मुकदमों में से प्रति सप्ताह उतने ही सब से पुराने मुकदमे सुनवाई के लिए न्यायालय में रखे जाते हैं जितने मुकदमों का प्रति सप्ताह निर्णय हो जाता है। इस तरह किसी मुकदमे में अनावश्यक देरी नहीं होती।

स देरी को समाप्त करने का यही एक तरीका है कि सर्वोच्च न्यायालाय व उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या पर्याप्त मात्रा में बढ़ाई जाए जिस से जितने मुकदमे प्रति वर्ष न्यायालय में प्रस्तुत होते हैं उन से कम से कम सवाए मुकदमों का निर्णय प्रति सप्ताह किया जा सके और धीरे धीरे मुकदमो की सुनवाई में लगने वाले समय को कम किया जा सके।

सी तरह अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या जरूरत की मात्र 20 प्रतिशत होने के कारण वहाँ मुकदमों के निपटारे में अत्यधिक समय लगता है। वहाँ भी न्यायालयों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए।

र्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या केवल केन्द्र सरकार बढ़ा सकती है क्यों कि उसे बढ़े हुए न्यायाधीशों के खर्च और व्यवस्था के अनुपात में वित्तीय व्यवस्था और करनी पड़ेगी। इस कारण मुकदमों में लगने वाले अधिक समय के लिए केन्द्र सरकार दोषी है। उसी तरह अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या बढ़ाने के लिए राज्य सरकार जिम्मेदार है। वह इस के लिए पर्याप्त वित्तीय व्यवस्था नहीं करती है। सरकारों को केवल मतदाताओं की नाराजगी ही इस काम के लिए बाध्य कर सकती है। लेकिन जब चुनाव होते हैं तो दूसरे रोजमर्रा के मामले अधिक महत्व प्राप्त करते हैं और त्वरित न्याय का मुद्दा सिरे से ही गायब हो जाता है।

हली बार आम आदमी पार्टी यह वायदा कर रही है कि वह इतने न्यायालय खोले जाने के पक्ष में है जिस से जल्दी से जल्दी मुकदमे निपटाए जा सकें। यदि इस पार्टी द्वारा इस मुद्दे को गौण नहीं  किया जाए तो दूसरी पार्टियों को भी यह काम करना होगा। तभी न्याय प्राप्त करने में जो देरी होती है उसे कम किया जा सकेगा।

वैसे यदि किसी मुकदमे में कोई ऐसी बात हो कि उसे तात्कालिक रूप से निपटाए जाने का कोई मजबूत कारण हो तो उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को आवेदन दे कर यह बताया जा सकता है कि उस मुकदमे में तुरन्त सुनवाई की क्या जरूरत है। तब यदि मुख्य न्यायाधीश समझते हैं कि मुकदमे की सुनवाई जल्दी की जानी चाहिए तो वे उस मुकदमे की तत्काल सुनवाई करने का आदेश दे सकते हैं।

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मुकदमे का निर्णय होने तक शान्ति से प्रतीक्षा कीजिए . . .

November 12, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
Havel handcuffसमस्या-
हैदरगढ़, बाराबंकी, उत्तर प्रदेश से यू.एस.पाण्डेय ने पूछा है –   

मेरा एक मकान ग्राम खेमीपुर, जिला बाराबंकी, उत्तर प्रदेश में स्थित है। मेरे मकान के सहन के एक हिस्से पर पड़ौस में रहने वाले एक पडौसी ने आज से तीन वर्ष पहले कब्ज़ा कर लिया है।  हम पुलिस के पास गए और पुलिस ने धारा 145 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत केस दर्ज कर दिया जो एसडीएम के न्यायालय में चल रहा है। अभी कोई फैसला नहीं हुआ। लेकिन विरोधी मेरी जमीन पर काबिज है और कब्ज़ा करने कि कोशिश कर रहे हैं। जिसके लिए पुलिस के पास जाते हैं तो विरोधी से पैसा लेते हैं हमें धमकी देते हैं। ज्यादा कोशिश करो तो 107, 151 धारा 145 दंड प्रक्रिया संहिता में बंद कर देते हैं। फ़िलहाल हमें न पुलिस से न एसडीएम से न्याय मिल पा रहा है। क्या करें, बहुत परेशान हैं।

समाधान-

प के मकान की जमीन पर पड़ौसी ने कब्जा कर लिया। पुलिस ने धारा 145 धारा 145 दंड प्रक्रिया संहिता में मामला दर्ज कर के न्यायालय को शिकायत प्रस्तुत कर दी। इस मामले में एसडीएम के न्यायालय को यह निर्णय करना है कि क्या विवादित तिथि को जिस दिन आप पड़ौसी द्वारा आप की भूमि पर कब्जा करना बताते हैं उस दिन के पहले आप का कब्जा था और पडौसी ने जबरन कब्जा कर लिया। यदि वे ऐसा पाते हैं तो भूमि का कब्जा आप को सौंपने का आदेश दिया जा सकता है। लेकिन यह आदेश सुनवाई दोनों पक्षों के की साक्ष्य होने के उपरान्त ही दिया जा सकता है। आप ने यह नहीं बताया कि मुकदमा किस स्तर पर चल रहा है। इस कारण कुछ कह सकना असंभव है।

म तौर पर न्यायालयों में मुकदमों की संख्या बहुत होती है। एसडीएम एक प्रशासनिक अधिकारी भी होता है जो प्राथमिक रूप से प्रशासनिक कार्यों को अधिक महत्व देता है। इस कारण से इस तरह के मामलों में बहुत देरी होती है। इस के लिए राज्य में अधिक न्यायालय होना चाहिए। प्रशासनिक अधिकारियों को इस तरह के न्यायालय संबंधी कार्य नहीं सोंपे जाने चाहिए। ये सभी राज्य में न्यायिक सुधारों से ही संभव है। लेकिन पीड़ित लोग राज्य से इस की मांग नहीं करते। यह कभी राजनीति का विषय नहीं बनता। वोट मांगने आने पर कभी लोग इस बात की मांग नहीं करते कि किसी भी न्यायालय में मुकदमे का निर्णय एक वर्ष में हर हाल में होने जैसी व्यवस्था होनी चाहिए। इस कारण से कोई भी सरकार न्यायिक सुधारों की तरफ कोई ध्यान नहीं देती है। इसी कारण से न्यायार्थी भटकते रहते हैं।

ह अधिक भूमि पर कब्जा नहीं कर सकता क्यों कि न्यायालय में यह स्थिति तो स्पष्ट ही होगी कि किस भूमि पर आप का कब्जा है और किस भूमि पर उस का। यदि उस के कब्जे की विवादित भूमि पर आप कब्जा करने का प्रयत्न करेंगे तो पुलिस निश्चित रूप से आप के विरुद्ध ही कार्यवाही करेगी न कि उस के विरुद्ध। आप के मामले में निर्णय तो एसडीएम के न्यायालय से ही होगा। आप एक काम कर सकते हैं कि अपने वकील को कह सकते हैं कि वह न्यायालय पर जल्दी निर्णय का दबाव बनाए। चूंकि आप के पड़ौसी का वर्तमान में कब्जा है इस कारण से वह कब्जा आप को न्यायालय के निर्णय के उपरान्त ही मिल सकेगा। तब तक आप को शान्त हो कर बैठना ही पड़ेगा।

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Justice K Hemaकेरल उच्च न्यायालय की निवर्तमान न्यायाधीश के. हेमा ने उन की सेवा निवृत्ति पर आयोजित समारोह में अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों को संबोधित करते हुए। अत्यन्त महत्वपूर्ण तथ्य को उजागर किया जिसे सब जानते हैं लेकिन जिस पर खुल कर बात नहीं करते। उन्हों ने कहा कि न्यायाधीश और अधिवक्ता पूर्वाग्रह युक्त होते हैं और उन का यह पूर्वाग्रह न्यायिक निर्णयों को प्रभावित करता है। पूर्वाग्रह सभी इंसानों में मौजूद रहता है। न्यायाधीश और अधिवक्ता भी इन्सान हैं। कोई इंसान नहीं जो पूर्वाग्रहों से मुक्त हो। उन्हों ने कहा कि एक मामले को तीन अलग अलग जजों को निर्णय करने के लिए दिया जाए तो वे तीनों अलग अलग निर्णय देंगे।

न्यायिक प्रणाली में उपस्थित इन पूर्वाग्रहों में कानून की व्याख्या करने वाले पूर्व निर्णयों का अनुसरण करने का पूर्वाग्रह भी शामिल है। अधिवक्ता और न्यायाधीश इस मकड़जाल में बुरी तरह से उलझे हुए हैं। एक बार जब कानून के किसी उपबंध या प्रावधान की पहली या दूसरी बार व्याख्या कर दी जाती है और उस में कोई गलती हो जाती है तो न्यायिक प्रणाली उस गलती का अनुसरण करती है और उस से बड़ी से भी बड़ी गलतियाँ दोहराती चली जाती है।

न निहित पूर्वाग्रहों के कारण अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों से रही गलतियों के कारण न्याय प्रभावित हो रहा है यहँ तक कि एक न्याय करने में सक्षम और ईमानदार जज भी गलतियाँ करने को अभिशप्त होता है।

न्याय को इन पूर्वाग्रहों से मुक्त करने की सख्त की जरूरत है। न्यायमूर्ति हेमा ने कहा कि हमें अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों की मदद से उन तरीकों की खोज करने की सख्त जरूरत है जिन से इन पूर्वाग्रहों की पहचान की जा सके और न्याय प्रणाली को उन से मुक्त किया जा सके। यह कोई आसान काम नहीं है। लेकिन यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो न्यायाधीश और अधिवक्ता न्याय प्रणाली के संरक्षक होने के कारण इस के लिए दोषी होंगे।

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निकट भविष्य में न्याय व्यवस्था में सुधार की कोई संभावना नहीं

April 23, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

न्यायालयों में लंबित प्रकरण और उन के निपटारे में देरी भारतीय न्याय व्यवस्था का कैंसर बनता जा रहा है। उड़ीसा के मुख्य न्यायाधीश वी.गोपाल गौडा ने मैंगलौर में क्षेत्रीय अधिवक्ता कॉन्फ्रेंस-2012 को संबोधित करते हुए कहा कि “देश में तीन करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं।” प्रत्येक मुकदमे में औसतन कम से कम दो व्यक्ति संबन्धित होते हैं इस तरह देश में प्रत्येक बीसवाँ व्यक्ति किसी न किसी मुकदमे से संबंधित है। इस तरह यह संख्या एक महत्वपूर्ण संख्या है। लोगों को जल्दी न्याय दिलाने के लिए कुछ न कुछ तुरंत किया जाना आवश्यक है।

न्यायमूर्ति गौडा ने न्यायाधीशों और वकीलों से आग्रह किया कि वे तकनीकी चीजों में उलझने के स्थान पर लोगों के जल्दी न्याय प्रदान करने में अपना योगदान करें। लेकिन उन्हों ने केन्द्र और राज्य सरकारों के प्रति एक शब्द भी कहना उचित नहीं समझा। जब कि वास्तविकता यह है कि देश में न्यायाधीशों की संख्या देश की आबादी और लंबित मुकदमों के अनुपात में बहुत कम है। इस बात का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जहाँ अमरीका में प्रत्येक दस लाख की आबादी पर 111 न्यायाधीश नियुक्त हैं वहीं भारत मे इन की संख्या केवल 11 है। इस तरह हम अमरीका के मुकाबले केवल दस प्रतिशत न्यायाधीशों से काम चला रहे हैं।

र बार बात की जाती है कि मुकदमों के निपटारे की गति बढ़ानी चाहिए। लेकिन बिना न्यायाधीशों और न्यायालयों की संख्या में वृद्धि किए यह किसी प्रकार से संभव नहीं है। एक मुकदमे में सुनवाई सिर्फ न्यायाधीश कर सकता है। इस के लिए उसे पूरी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। जिस में समय लगना स्वाभाविक है। गवाहों के बयान दर्ज करने की गति को तो किसी प्रकार से नहीं बढ़ाया जा सकता है। इस तरह मुकदमों के निपटारे के लिए सारा दबाव न्यायाधीशों और वकीलों पर बनाया जाता है और उस के खराब नतीजे सामने आ रहे हैं। हड़बड़ी में मुकदमों के निर्णय किए जाते हैं जो गलत होते हैं और उन से हमारी न्याय व्यवस्था की साख गिरती है।

न्यायमूर्ति गौडा ने बताया कि देश में सर्वाधिक मुकदमे मोटर दुर्घटना और औद्योगिक विवादों से संबंधित हैं। देश में इन दोनों प्रकार के मुकदमों के निपटारे के लिए न्यायालयो की स्थापना करने का काम राज्य सरकारों का है लेकिन राज्य सरकारों ने इस के लिए पर्याप्त संख्या मे न्यायालय ही स्थापित नहीं किए हैं। इस तरह के अनेक न्यायालयों में न्यायाधिशों की नियुक्ति समय से नहीं की जाती है और वे लम्बे समय तक खाली पड़े रहते हैं। जिस का नतीजा यह होता है कि लंबित मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ती जाती है।

र्तमान में राज्य सरकारों का काम करने का तरीका यह हो चला है कि वे वही काम करती हैं जिस से जनता को अगले आम चुनाव में यह दिखाया जा सके कि उन्हों ने जनता के लिए कितना काम किया है। न्यायालयों की स्थापना और शीघ्र न्याय प्रदान करने की मांग अभी जनता की ओर से राजनैतिक मांग नहीं बन पायी है जिस के कारण राज्य सरकारें इस ओर से पूरी तरह उदासीन रहती हैं। अधिकांश राज्य सरकारों का तो यह सोचना हो गया है कि न्याय प्रदान करने की जिम्मेदारी उन की है ही नहीं। ऐसी स्थिति में इस बात की कोई संभावना नहीं है कि निकट भविष्य में देश की जनता को शीघ्र न्याय प्राप्त होगा। स्थिति में कोई सुधार होने के स्थान पर आने वाले सालों में न्याय व्यवस्था और खराब होती चली जाएगी। न्यायार्थियों को न केवल और देरी से न्याय मिलेगा अपितु निर्णयों की गुणवत्ता भी इस के साथ ही गिरती चली जाएगी।

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क्यों नहीं मिलते न्यायाधीश पदों के लिए योग्य व्यक्ति ?

January 23, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

‘भारतीय न्यायिक दृष्टिकोण-2022’ विषय पर अखिल भारतीय न्यायाधीश एसोसिएशन के दो दिवसीय अखिल भारतीय न्यायाधीश सम्मेलन के शुभारंभ के अवसर पर बोलते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमश कबीर ने स्वीकार किया किया कि राजस्थान में उच्च न्यायालय में नियु्क्ति हेतु योग्य व्यक्ति नहीं मिल रहे हैं। इसी अवसर पर राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अरुण मिश्रा ने प्रदेश में अदालतों की संख्या को कम बताते हुए और अदालतें खोलने की जरूरत पर बल दिया है।

न्यायाधीश अल्तमश कबीर

च्च न्यायालयों में न्यायाधीश वकीलों से सीधी भर्ती द्वारा और उच्च न्यायिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों में से चयन के माध्यम से नियुक्त किए जाते हैं। वकीलों में से तो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद के लिए योग्य व्यक्ति प्राप्त हो जाते हैं लेकिन उच्च न्यायिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों में से योग्य व्यक्तियों का मिलना कठिन हो रहा है तो इस के कारणों का अनुसंधान किया जाना चाहिए। जो व्यक्ति अपने बीस-पच्चीस वर्ष न्यायिक सेवा में व्यतीत करता है उसे तो अधिक योग्य होना चाहिए। आखिर उस के पास मुकदमों की सुनवाई का अधिक अनुभव होता है। फिर क्या कारण है कि वह उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने योग्य योग्यता प्राप्त नहीं कर पाता है?

स्तुतः इस का प्रश्न का उत्तर राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश अरुण मिश्रा के वक्तव्य में छिपा है। उन का कहना है कि राजस्थान में पर्याप्त संख्या में न्यायालय नहीं है। उन्हों ने अपने वक्तव्य में एक तथ्य और नहीं बताया कि राजस्थान में जितने न्यायालय हैं उन में से बीस प्रतिशत न्यायालय न्यायाधीशों के अभाव में रिक्त पड़े हैं। एक और तो निम्नतम स्तर पर न्यायाधीशों की भर्ती की प्रक्रिया को नौकरशाही के हवाले कर दिया गया है कि वह आवश्यकता के अनुसार न्यायाधीशों की भर्ती नहीं कर पाती। जब तक वह रिक्त पदों को भरने लायक न्यायाधीशों को तैयार करती है तब तक उतने ही पद और रिक्त हो जाते हैं। न्यायायाधीशों की भर्ती की योजना इस तरह की होनी चाहिए कि योग्य व्यक्तियों के चयन और प्रशिक्षण के उपरान्त उन की नियुक्ति में लगने वाले समय में कितने पद और रिक्त हो जाएंगे इस का पहले से आकलन किया जाना चाहिए। इस आकलन के अनुरूप ही व्यक्तियों का चयन किया जाना चाहिए। जिस से कम से कम राज्य का कोई भी न्यायालय न्यायाधीश के अभाव में रिक्त न रहे। एक बार राज्य में यह स्थिति ले आई जाए तो राज्य में मुकदमों के निपटारे की गति को तीव्र किया  जा सकता है।

नेक न्यायालयों में न्यायाधीश का पद रिक्त हो जाने का असर यह होता है कि शेष न्यायालयों पर उन न्यायालयों के मुकदमों की सुनवाई का भार आ पड़ता है। इस तरह एक न्यायाधीश को एक से अधिक न्यायालयों का कार्य देखना होता है। पहले ही राजस्थान के अनेक न्यायालयों की स्थिति ऐसी है कि उन में चार से पाँच हजार मुकदमे लंबित हैं। पक्षकारों और वकीलों का न्यायालयों पर जल्दी जल्दी पेशियाँ देने का दबाव रहता है। जिस के कारण न्यायालयों की दैनिक कार्यसूची में तीन चार गुना मुकदमें लगते हैं। न्यायाधीशों का बहुत सारा समय केवल पेशियाँ बदलने के काम में जाया होता है। वे वास्तविक न्यायिक कार्य पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते। उन पर कोटे के अनुसार मुकदमों के निपटारे का दबाव भी होता है। इस तरह अधीनस्थ न्यायालयों का प्रत्येक न्यायाधीश अत्यन्त दबाव में काम करता है। जिस से निर्णयों की गुणवत्ता समाप्त होती जा रही है। यह वैसी ही स्थिति है जैसी हम निर्माण के कार्य में लगे मजदूरों की देखते हैं। वहाँ ठेकेदार का मुंशी लगातार मजदूरों की छाती पर खड़ा रहता है और जल्दी जल्दी काम निपटाने के लिेए लगातार दबाव बनाए रखता है। इधर न्यायाधीशों के कार्य का आकलन उन के द्वारा निपटाए गए मुकदमों की संख्या के आधार पर होने लगा है। गुणवत्ता के आधार पर नहीं।  न्यायाधीश अपने द्वारा निर्णीत मुकदमों की संख्या बढ़ाते हैं लेकिन गुणवत्ता की ओर ध्यान नहीं देते। संख्या मुख्य हो गई है और गुणवत्ता गौण। ऐसे में किसी भी प्रकार यह आशा नहीं की जा सकती कि अधीनस्थ न्यायालयों में काम कर रहे न्यायाधीशों में से उच्च न्यायालय में नियुक्ति के योग्य व्यक्ति मिल सकेंगे। जिला और अपर जिला न्यायाधीश के पदों पर नियुक्त अनेक न्यायाधीश ऐसे हैं जो उन पदों के भी योग्य नहीं हैं।

ज जब न्यायपालिका के तुरंत विस्तार की आवश्यकता है। भारत में विकसित देशों की तुलना में आबादी के लिए केवल दस प्रतिशत न्यायाधीश नियुक्त हैं। हमें इस अनुपात को तुरंत सुधारना होगा। इस स्थिति को देश कब तक ढोता रहेगा कि कानून तो हैं लेकिन उन की पालना कराने के लिए न्यायालय नहीं हैं। मुकदमों का अंतिम निपटारा या तो होता ही नहीं है और होता है तो उस में 20-30-50 वर्ष तक लग रहे हैं। इस से हमारी न्याय व्यवस्था तेजी के साथ जन विश्वास खोती जा रही है। यही स्थिति बनी रही तो यह एक दिन जन विद्रोह का एक बड़ा कारण भी बन सकती है। इस स्थिति से न्यायपालिका में काम कर रहे न्यायाधीश चिंतित हैं। वकील चिंतित हैं। लेकिन यदि सब से कम चिंतित हैं तो हमारी राज्य सरकारें हैं। उन के माथे पर इस विषय पर कोई चिंता की लकीर तक दिखाई नहीं देती। सरकारों के प्रधान अगले चुनाव में वोट की व्यवस्था बनाने की ही चिंता करते दिखाई देते हैं। यह सब से बुरी स्थिति है। निकट भविष्य में इस स्थिति से निजात मिलती दिखाई नहीं देती और देश के न्यायिक परिदृश्य में निकट भविष्य में सुधार की कोई संभावना भी नजर नहीं आती।

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बिजनेस स्टेंडर्ड के 18 सितंबर 2011 के अंक में एम. जे. एंटनी के एक लेख का हिन्दी अनुवाद वकीलों की चालबाजी से लंबी खिंच जाती है मुकदमे बाजी शीर्षक से प्रकाशित किया है। इस आलेख में उन्हों ने उच्चतम न्यायालय के दो निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा है कि सभी न्यायाधीश अतीत में अधिवक्ता की भूमिका अदा कर चुके होते हैं, इसी तरह सभी अधिवक्ताओं के भविष्य में न्यायाधीश बनने की संभावना रहती है। इस तरह वे समूची न्याय प्रणाली को अंदरूनी तौर पर जानते हैं। ऐसे में अगर न्यायाधीश उन कुछ युक्तियों का खुलासा करते हैं जिनको अपना कर विधि पेशे के लोग न्याय प्रक्रिया में देरी करते हैं तो लोगों को उनकी बातों को गौर से सुनना चाहिए। 
ल्लखित मामलों में से एक मामला तो दिल्ली उच्च न्यायालय में वर्ष 1977 में शुरू हुआ था।
यह मामला इतने न्यायालयों में घूमता रहा कि सर्वोच्च न्यायालय को इन का आकलन करने में छह पन्ने लग गए। रामरामेश्वरी देवी बनाम निर्मला देवी के इस मामले में अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, ‘यह इस बात का शानदार नमूना है कि कैसे हमारे न्यायालयों में मामले चलते हैं और किस तरह बेईमान वादी इनके जरिए अनंतकाल तक अपने विरोधियों तथा उनके बच्चों को परेशान करने के लिए न्याय प्रणाली का दुरुपयोग कर सकते हैं।’
ह मामला एक व्यक्ति को भूखंड आवंटन से आरंभ हुआ था, बाद में तीन छोटे भाई भी उसके साथ रहने लगे। छोटे भाइयों ने संपत्ति के बँटवारे की मांग की। बँटवारे का मामला तो बहुत पहले ही निपट गया था लेकिन न्यायाधीशों के मुताबिक मामले की लागत कौन वहन करेगा जैसेतुच्छ तथा महत्त्वहीन प्रश्न शेष रह गए। आखिर ये मामले भी सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच ही गए। इस मामले में एक पक्ष द्वारा पेश किए गए बहुत सारे आवेदनों को देखकर (जिनमें से कुछ गलत तथ्यों पर आधारित थे) न्यायालय ने पहले कहा था, ‘याचिकाकर्ताओं का एक मात्र उद्देश्य मुकदमे में देरी करना है, जबकि यह मामला पहले ही 18 वर्षों से लंबित है। यह बात साबित हो चुकी है कि ऐसी तुच्छ मुकदमेबाजी न्याय प्रक्रिया को शिथिल बनाती है और इसकी वजह से सही वादियों को आसानी से और तेज गति से न्याय मिलने में देरी होती है।’
र्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में आगे कहा, ‘और अधिक समय गँवाए बिना प्रभावी उपचारात्मक उपाय नहीं अपनाए गए तो समूची न्यायपालिका की विश्वसनीयता दाँव पर लग जाएगी।’ मामले में न्याय मित्र की भूमिका निभा रहे एक वरिष्ठ अधिवक्ता की किताब “जस्टिस, कोट्र्स ऐंड डिलेज” का हवाला देते हुए न्यायाधीश ने कहा कि न्यायालयों का 90 फीसदी समय और संसाधन अनचाहे मामलों की सुनवाई में निकल जाते हैं। यह हमारी मौजूदा प्रणाली की कमियों के चलते होता है जिसमें गलती करने वाले को सजा के बजाय प्रोत्साहन मिलता है। यदि न्यायालय इस मामले में चौकस रहें तो मुकदमेबाजी का गलत फायदा उठाने वालों की संख्या को काबू किया जा सकता है। 
पुस्तक के मुताबिक हर लीज अथवा लाइसेंस अपनी नियत तिथि की समाप्ति पर किसी न किसी मामले की वजह बन जाते हैं। न्यायालय ऐसे मामलों से भरे हुए हैं क्योंकि इनमें गलत करने वालों को स्वाभाविक तौर पर लाभ हासिल हो

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जनसंख्या-न्यायाधीश अनुपात

September 9, 2011 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

कानून और न्याय मंत्री जनाब सलमान खुर्शीद साहब ने राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में फरमाया है कि विधि आयोग ने 31 जुलाई 1987 को दी गई अपनी 120वीं रिपोर्ट में यह सिफारिश की थी कि दस लाख की आबादी पर न्यायाधीशों की संख्या 10.5 से बढ़ा कर 50 की जानी चाहिए। उच्चन्यायालयों में जजों की संख्या के लिए प्रत्येक तीन वर्ष में पुनरावलोकन किया जाता है और मुकदमों के दर्ज होने और निपटारा किए जाने की संख्या के आधार पर समीक्षा की जाती है। खुर्शीद साहब ने यह भी फरमाया है कि सर्वोच्च न्यायालय ने All India Judges’ Association & Ors Vs. Union of India & Ors ऑल इंडिया ‘न्यायाधीश एसोसिएशन व अन्य बनाम. भारत संघ व अन्य के प्रकरण में 21.03.2002 को पारित निर्णय में केन्द्र और राज्यों को निर्देश दिया था कि वे प्रति दस लाख आबादी पर न्यायाधीशों के 10.5 से 13 तक के तत्कालीन अनुपात को शीघ्रता से 50 तक बढ़ाएँ। इस के बाद केन्द्र ने सर्वोच्च न्यायालय से प्रार्थना की कि इस निर्देश को कम से कम केंद्र सरकार की जिम्मेदारी को कार्यभार और मुकदमों की संख्या के आधार पर निर्धारित किया जाए। सलमान खुर्शीद साहब ने राज्य सभा को यह सूचना नहीं दी कि केंद्र सरकार की प्रार्थना पर सर्वोच्च न्यायालय ने क्या आदेश दिया। उन्हों ने यह भी नहीं बताया कि केन्द्र और राज्यों ने विधि आयोग की 120वीं रिपोर्ट की सिफारिशों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की पालना में क्या प्रगति की है।

न्यायपालिका राज्य का अनिवार्य अंग है। लेकिन राज्य की व्यवस्था सरकारें, संसद और विधानसभाएँ देखती हैं। वही निर्धारित करते हैं कि न्यायपालिका को कितना दाना-पानी दिया जाए। जब बजट आता है तो न्यायपालिका के लिए निर्धारित किए गए दाना-पानी की मात्रा की सूचना किसी कोने में छुपी रहती है। सब का ध्यान लगाए गए टैक्सों पर होता है। यहाँ तक कि मीडिया और समाचार पत्र में इस की चर्चा तक नहीं होती। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री और अन्य मंत्री इस विषय पर कभी नहीं बोलते। यह विषय हमेशा ही उपेक्षित रह जाता है। यही उपेक्षा कालान्तर में व्यवस्था को बहुत भारी पड़ती है। इस का एक उदाहरण हमने अभी हाल ही में देखा कि जब अन्ना का अनशन तिहाड़ से निकल कर रामलीला मैदान तक पहुँचा और जनता उस और दौड़ने लगी तो प्रधानमंत्री का सब से पहला बयान था कि केवल लोकपाल से कुछ नहीं होगा। हमें न्यायिक व्यवस्था में सुधार करने होंगे।

न का वह बयान बिलकुल सही था। लोकपाल आ गया, वह अन्वेषण कर के अभियोजन दाखिल करने लगा तो भी फैसले तो अदालतो ने ही करने हैं। जब तक अदालतें फैसला न कर देंगी तब तक कोई भ्रष्टाचारियों का क्या बिगाड़ लेगा? वे अदालतों के फैसलों की तारीख तक जेलों को थोड़े ही आबाद करेंगे। महिने दो महिनों में उन की जमानत लेनी ही पड़ेगी, आखिर सामान्य नियम जेल नहीं बेल (जमानत) है। वे बाहर आएंगे और अपने खिलाफ गवाहों के बयान बदलने की जुगाड़ में जुट जाएंगे। प्रधानमंत्री न्यायिक सुधार के बारे में फिर चुप हो गए। अन्ना के भय से शायद गलती से सच मुहँ से निकल गया था।

खिर कब….? आखिर कब तक विधि आयोग की 120वीं रिपोर्ट बस्ते में पड़ी धूल खाती रहेगी। सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश कब तक पालना की प्रतीक्षा करेगा? 1987 से 2011 तक 24 वर्ष गुजर

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