न्याय Archive

rp_judge-caricather.jpgसमस्या-

आरके ने भरतपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे तलाक के केस को लगभग चार साल होने को हैं, लेकिन अभी तक कुछ नही हुआ है। मैं और मेरे माता-पिता बहुत परेशान हो चुके हैं। माता-पिता बुजुर्ग हैं और उनकी देख भाल करने वाला कोई नहीं है। क्योंकि मैं सरकारी कर्मचारी हूँ इसलिए घर से दूर रहता हूँ। मेरी उम्र भी लगभग 37 वर्ष होने वाली है। तलाक का केस अवैध सम्बन्ध व मानसिक क्रूरता के कारण किया है, कोई सन्तान नहीं है। कृपया ऐसा कोई रास्ता बताये जिससे समस्याओं का समाधान हो सके। मैंने जो सी० डी० पेश की है विरोधी पक्ष ने उस CD की कॉपी प्राप्त करने हेतु कोर्ट मे एप्लीकेशन लगाई है, क्या हमें CD की कॉपी देनी पडेगी?

समाधान-

प ने क्रूरता और जारता के आधार पर तलाक का मुकदमा प्रस्तुत कर रखा है। अब उस के निपटारे में समय तो लगेगा। आप सिर्फ इतना करें कि जिस स्थानीय वकील से सलाह लेते रहे हैं उस से सलाह लेते रहें और गंभीरता से इस मुकदमे को लड़ें। आप के मुकदमे में समय इस कारण लग रहा है कि हमारे यहाँ आवश्यकता से बहुत कम, जरूत की चौथाई से भी कम अदालतें हैं। यदि सरकार आप के यहाँ एक परिवार न्यायालय और खोल दे तो जल्दी निर्णय होने लगें। जो भी परिस्थिति है उस में कुछ धैर्य रखने की तो जरूरत है। माता-पिता बुजुर्ग हैं तो उन की देखभाल के लिए कोई अन्य व्यवस्था कीजिए। विवाह इस बात की गारन्टी नहीं होता कि आप को अपने माता पिता की देखभाल के लिए स्थायी व्यक्ति मिल गया है।

आप के द्वारा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गयी सीडी भी एक तरह से दस्तावेज ही है। इस की प्रति प्रतिपक्षी को देना अनिवार्य है। आप को यह सीडी की प्रति देनी होगी। प्रत्येक व्यक्ति जो मुकदमा लड़ रहा है उसे पता होना चाहिए कि उस के विरुद्ध क्या क्या न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया है।

यहाँ क्लिक कर सबसे पहले टिप्पणी कीजिए

मजदूरों के लिए श्रम विभाग और न्यायालयों में कोई न्याय नहीं।

July 20, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_retrenchment-300x300.jpgसमस्या-

टीकम सिंह परिहार ने चौपासनी स्कूल तिलवारियॉ बैरा राजस्थान से पूछा है-

मैं “मेक शॉट ब्लास्टिंग इक्विपमेंट प्राईवेट लिमिटेड” में पिछले 7 साल से काम करता था यह 30 साल पुरानी प्राइवेट लिमिटेड़ कंपनी है यहाँ पर PF, ESI की सुविधा भी है। यहाँ पर 200 से 250 वर्कर्स हैं जो परमानेंट कर्मचारी हैं। मैं भी उन में से एक हूँ। पहले हमें इनसेंटिव मिलता था जो इन लोगो ने बंद कर दिया और दिपावली का बोनस भी 10,000 से ज्यादा सेलेरी वालों को यह कहते हुए नहीं देते कि यह सरकार का नियम हे और 10000 से कम वालो को अभी तक नही दिया  आज़ कल आज़ कल कर रहे हैं, जब कि पहले 20% देते थे। इस के अलावा ड्रेस, जुते, साबुन आदि की सुविधा भी बंद कर दी गई और पिछले साल जुलाई 2014 से महिने की सैलेरी भी समय पर नहीं मिल रही है। इस से पहले सैलेरी 07 तारीख से पहले मिल जाती थी। फिर 07 से 08, 10, 12, 14, 16, 18 और अब अगले महिने कि 20 से 25 तारिख को मिलती है। ओवर टाईम भी यहां पर रोज 3, 4 घंटे होता है उस का भुगतान पहले ड़बल किया जाता था अब सिंगल देते हैं, वो भी 1, 1 1/2 महिना चढ़ा कर। कंपनी साफ सफाई का भी ध्यान नहीं रखती। बाथरूम व पीने के पानी की जगह इतनी गंदगी है कि नाक पर रूमाल लगा कर जाना पड़ता है। इस के बारे में जीएम, मैनेजर, व कंपनी मालिक से भी बात कर चुके हैं लेकिन समस्याओ का कोई समाधान नहीं हुआ। यहाँ पर फैब्रिकेशन का काम है बड़ी बड़ी मशीनें बनती हैं। हमारा काम बहुत ही मेहनत का है। मेन्टीनेंस का काम भी समय पर नहीं करवाते। बिजली के तार भी जगह जगह से खुले पड़े हैं। 4-5 साल तक भी मेन्टीनेंस की परवाह नहीं करते। इन सभी समस्याऔ के कारण मैं ने अपना त्याग पत्र 01/06/2016 को नोटिस देकर 30/06/2016 तक मेरा कम्पलीट हिसाब करने को लिखित में दिया जिस में वैतन,दिपावली बोनस,गे्चुटी ,व अन्य परिलाभ शामिल हैं जिस की फोटो कापी मय हस्ताक्षर मेरे पास है, मगर आज़ 18/07/2016 तक भी मुझे 1 पेसा भी नहीं मिला।  कानूनन मुझे क्या करना चाहिए? क्या मैं वेतन, दीपावली बोनस, ग्रेच्युटी के साथ बकाया ओवर टाईम पिछले 7 साल का (सिंगल जो बाकी है), 3 साल वेतन लेट का ब्याज क्या कानूनन ले सकता हूँ?    कृपया हमें मार्ग बताएँ। क्या कोई नियम नहीं है। मैं जोधपुर श्रम आयुक्त के कार्यालय भी गया। उन्होंने कारवाही करने कि बजाय कम्पनी को ही फोन कर के बता दिया कि मैं मुकदमा दर्ज़ करवाने आया हूँ और मुझे वहाँ से भगा दिया, कृपया समाधान बताएँ।

समाधान-

राजस्थान ही नहीं देश भर में श्रमिकों के मामलों में न्याय की स्थिति अत्यन्त खराब है। इस का कारण श्रम संगठनों का ह्रास है। अधिकांश श्रम संगठन श्रमिकों के संगठन नहीं है बल्कि उन्हें या तो कुछ राजनैतिक दल चलाते हैं जिन्हें राजनीति के लिए श्रमिकों के वोटों की जरूरत होती है, या फिर कुछ लोग व्यक्तिगत रूप से या सामुहिक रूप से मिल कर इसे एक व्यवासय के रूप में चलाते हैं। मजदूर वर्ग की जरूरत के कारण बने श्रमसंगठनों का लगभग अभाव है। जोधपुर की भी यही स्थिति है। आप किसी श्रम संगठन से संबद्ध प्रतीत नहीं होते जिस के कारण आप ने यहाँ यह समस्या पोस्ट की है।

आप ने उद्योग की जो स्थिति बताई है उस से लगता है कि अब यह उद्योग इस के मालिकों के लिए अधिक मुनाफे का सौदा नहीं रहा। इस कारण वे इस उद्योग की हालत जानबूझ कर खराब कर रहे हैं। उद्योग को बिना राज्य सरकार की इजाजत के बिना बन्द नहीं किया जा सकता। लेकिन धीरे धीरे मजदूरों का बकाया बढ़ाया जा रहा है इसी तरह बाजार के लेनदारों का भी बकाया बढ़ा रखा होगा और बैंकों से ऋण भी ले रखा होगा। कुछ दिन बाद यह उद्योग अपनी कंपनी को बीमार बता कर बीआईएफआर में आवेदन करेगी और मजदूरों को उकसा कर हड़ताल वगैरा करने पर मजबूर करेगी या अपने ही एजेंटों के माध्यम से कारखाने में कोई हिंसा करवा कर कारखाने में तालाबंदी करवा देगी। उस के बाद यह कारखाना कभी नहीं खुलेगा। मजदूर बरसों तक अपनी बकाया राशि के लिए अदालतों के चक्कर लगाते रहेंगे। ऐसा देश के सैंकड़ों कारखानों में हो चुका है।

मालिकों की यह योजना किसी मुकाम तक पहुंचती उस के पहले ही आप ने हालात को भांप कर स्तीफा दे दिया है। अब मालिक समझ नहीं रहा है कि आप का हिसाब दे या न दे। उस के सलाहकारों ने यह सलाह दी होगी कि हिसाब मत दो, जब मुकदमा करे और लड़ लड़ कर पक जाए तब मजदूर को आधा अधूरा हिसाब दे देना।

श्रम न्यायालयों, व  श्रम विभाग की स्थिति यह है कि श्रम न्यायालय जितने होने चाहिए उस के आधे भी राज्य में  नहीं हैं। अधिकांश न्यायालयों में उन की क्षमता से दस दस गुना मुकदमे लंबित हैं। मकदमों का निर्णय 20-30 वर्षों तक नहीं हो पा रहा है। वेतन भुगतान, न्यूनतम वेतन, ग्रेच्युटी, कामगार क्षतिपूर्ति आदि के न्यायालयों में श्रम विभाग राजस्थान के अधिकारी पीठासीन होते हैं। आधे से अधिक न्यायालयों में अधिकारी नहीं हैं। एक एक अधिकारी चार चार न्यायालयों को संभालता है  जिस का नतीजा यह है कि वहाँ भी न्याय नहीं हो रहा है।

इतना सब हो जाने के बावजूद राजस्थान का मजदूर वर्ग सोया पड़ा है। मजदूरों के नाम पर जितने भी संगठन राजस्थान में काम कर रहे हैं वे सिर्फ अपने स्वार्थों के लिए काम कर रहे हैं उन में से कोई भी वास्तविक मजदूर संगठन या ट्रेडयूनियन नहीं है। ऐसा लगता है कि श्रमिकों के लिए इस राज्य में न्याय है ही नहीं।

इन विपरीत परिस्थितियों में आप को चाहिए कि आप अपने नगर में ही किसी ऐसे वकील से मिलें जो श्रम संबंधी मामलों की वकालत करता हो। सीधे उस से बात करें कि आप त्याग पत्र दे चुके हैं और आप को अपना हिसाब अपने नियोजक से लेना है। यह हिसाब लेने के लिए उन के माध्यम से कार्यवाही करें। इस के लिए आप को दो तीन मुकदमे करने पड़ सकते हैं। ग्रेच्युटी के लिए एक फार्म में आवेदन प्रेषित कर दें ग्रेच्यूटी न देने पर उस का आवेदन प्रस्तुत करें। एक आवेदन बकाया वेतन व अन्य लाभ जो वेतन की परिभाषा में आते हों उन के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में कार्यवाही करें। अन्य सभी परिलाभों के लिए भी आप की स्थिति देख कर तथा तमाम तथ्यों की जानकारी कर के आप के वकील निर्धारित करेंगे कि क्या कार्यवाही करनी चाहिए?

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

समस्या-rp_courtroom1.jpg

अभिनव ने रीवा मध्यप्रदेश से पूछा है-

मारे किराएदार जो बहुत पहले से है वह अभी बहुत ही कम किराया देते हैं। ओर खाली करने कीकहने पर 20 लाख रुपयों की मांग कर रहे हैं। दूसरे लोगों को किराए पर दे कर खुद अच्छा किराया वसूल करते हैं। क्या उन से आसानी से हटाया जा सकता है या किराया बढ़ाया जा सकता है। क्या लोक अदालत में इस की कार्यवाही हो सकती है?

समाधान-

म ने हमेशा कहा है कि किराएदार किराएदार ही रहता है वह कभी मकान मालिक नहीं हो सकता। किराएदार कम किराया देता है तो उस का कारण है कि आप ने किराया बढ़ाने के लिए कभी कानूनी कार्यवाही नहीं की। यदि समय रहते आप ने किराया बढ़ाने की कार्यवाही की होती तो अब तक किराया बढ़ चुका होता। यदि आप किराया बढ़ाना चाहते हैं तो आप को न्यायालय में कार्यवाही करनी ही होगी।

आप के किराएदार आप को कम किराया देता है और उस ने अन्य व्यक्ति को वही परिसर या उस का कोई भाग अधिक किराये पर दे रखा है तो आप को इस बात के सबूत एकत्र करना चाहिए कि आप के किराएदार ने परिसर को शिकमी किराएदारी पर चढ़ा दिया है। यदि आप के किराएदार ने परिसर को शिकमी किराएदार को चढ़ा दिया है तो आप इसी आधार पर अपना परिसर खाली करवा सकते हैं।

किराएदार से परिसर खाली कराने का हर राज्य में अलग कानून बना है। इसी तरह मध्यप्रदेश में भी है। आप को तुरन्त किसी वकील से संपर्क करना चाहिए। आप किराया भी बढ़ा सकते हैं और परिसर खाली भी करवा सकते हैं। वकील आप से जरूरी सारे तथ्य जान कर उपाय बता सकता है।

कई लोग सोचते हैं कि अदालत में मुकदमा करने से बहुत समय लगेगा। तो अदालत में समय तो लगता है। कितना समय लगेगा यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। यदि अदालत में मुकदमे बहुत अधिक संख्या में लंबित हैं तो समय भी अधिक लगेगा। मुकदमों में देरी होने का कारण अदालतों की संख्या का बहुत कम होना है। देश के मुख्य न्यायाधीश ने देश भर में 70000 अदालतों की और जरूरत बताई है। जब तक देश में पर्याप्त अदालतें नहीं होतीं तब तक मुकदमों के निर्णय में देरी होना जारी रहेगा। वैसे अधीनस्थ न्यायालय स्थापित करने का दायित्व राज्य सरकार का है। लोगों को चाहिए कि अधिक अदालतें स्थापित करने के लिए राज्य सरकार पर दबाव बनाएँ।

लेकिन यह सोच गलत है कि अदालत में मुकदमा करने से देरी होगी इस कारण अन्य उपाय तलाशा जाए। अन्य कोई भी वैध उपाय उपलब्ध नहीं है इस कारण आप को जाना तो अदालत ही पड़ेगा। आप अदालत जाने में जितनी देरी करेंगे उतनी ही देरी से आप को राहत प्राप्त होगी। इस कारण मुकदमा करने में देरी न करें।

लोक अदालत में न्याय बिलकुल नहीं मिलता। वहाँ भी मजबूर पक्ष को ही झुकना पड़ता है और जो कुछ मिल रहा है उस पर इसलिए सब्र करना पड़ता है कि अदालतें समय रहते न्याय करने में सक्षम नहीं हैं। वस्तुतः लोक अदालतें तो लोगों को न्याय प्राप्ति से दूर करने की तरकीब है जो सरकारों और न्यायपालिका ने मिल कर तलाश कर ली है। यह पूरी तरह से न्याय से विचलन है।

अब तक 3 टिप्पणियाँ, आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएँ!!!

November 11, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

मित्रों और पाठकों और सहयोगियो¡

दीपावली शुभकामनाएँ!दैव की तरह दीपावली का त्यौहार फिर आ गया है। आप सभी दीपावली के इस त्यौहार को मनाने में व्यस्त हैं। आठ वर्ष से कुछ अधिक समय पहले दीपावली के कुछ दिन पूर्व 28 अक्टूबर 2007 को ‘तीसरा खंबा’ एक ब्लाग के रूप में आरंभ हुआ यह नितांत वैयक्तिक प्रयास एक दिन वेबसाइट का रुप ले लेगा और इस के पाठकों के लिए एक जरूरी चीज बन जाएगा, ऐसा मैं ने सोचा भी नहीं था।

रंभ में सोचा यही गया था कि यदा कदा मैं अपने इस ब्लाग पर न्याय व्यवस्था के बारे में अपने विचारों को प्रकट करते हुए कुछ न कुछ विचार विमर्श करता रहूंगा। जब भी कहीं विमर्श आरंभ होता है तो वह हमेशा ही कुछ न कुछ कार्यभार उत्पन्न करता है। यदि विमर्श के दौरान समस्याओं के कुछ हल प्रस्तुत होते हैं तो फिर यह बात निकल कर सामने आती है कि समस्याओं के हल की ओर आगे बढ़ा जाए।  समस्याग्रस्त लोगों के सामने जो हल प्रस्तुत करता है उसी से यह अपेक्षा भी की जाती है कि वह हल की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कोई अभियान का आरंभ करे, उस के रास्ते पर उन का पथप्रदर्शक भी बने।  दुनिया के छोटे बड़े अभियानों से ले कर समाज को आमूल चूल बदल देने वाली क्रांतियों का आरंभ इसी तरह के विमर्शों से हुआ है।

न्याय समाज व्यवस्था का एक आवश्यक अंग है।  समाज की छोटी से छोटी इकाई परिवार से ले कर  बड़ी से बड़ी इकाई राज्य को स्थाई बनाए रखने के लिए न्याय आवश्यक है। यदि चार लोग साथ रहते हों और जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं को जुटाने का काम करते हों तो भी जो कुछ वे जुटा लेते हैं उस का उपयोग वे न्याय के बिना नहीं कर सकते। एक दिन के शाम के भोजन के लिए कुछ रोटियाँ जुटाई गई हैं तो उन का आवश्यकतानुसार न्यायपूर्ण वितरण आवश्यक है। यदि उन में से दो लोग सारी रोटियाँ खा जाएँ तो शेष दो लोगों को भूखा रहना होगा। एक-आध दिन  और यदा-कदा तो यह चल सकता है। लेकिन यदि नियमित रूप से ऐसा ही होने लगे तो दोनों पक्षों में संघर्ष निश्चित है और साथ बना रहना असंभव। जब चार लोगों का एक परिवार बिना न्याय के एकजुट नहीं रह सकता तो एक गाँव, एक शहर, एक अंचल, एक प्रान्त और भारत जैसा एक विशाल देश कैसे एकजुट रह सकता है। इस कारण मैं अक्सर यह कहता हूँ कि मनुष्य केलिया न्याय रोटी से पहले की आवश्यकता है।

ज समाज में न्याय पूरी तरह हमारी संवैधानिक व्यवस्था पर निर्भर है।  भारत के गणतंत्र का रूप लेने और संविधान के अस्तित्व में आने पर उसने एक न्याय व्यवस्था देने का वायदा इस देश की जनता के साथ किया। इस संवैधानिक न्याय व्यवस्था के लागू होने की एक अनिवार्य शर्त यह भी थी कि इस के वैकल्पिक उपायों का पूरी तरह उन्मूलन कर दिया जाए। लेकिन गणतंत्र के 66वें वर्ष में भी संवैधानिक न्याय व्यवस्था पूरी तरह स्थापित नहीं हो सकी है और संविधानेतर संस्थाएं (जातीय पंचायतें और खापें) अब भी मनमाना न्याय कर रही हैं और अपने जीवन को बनाए रखने के लिए समाज के जातिवादी विभाजन पर आधारित प्राचीन  संगठनों से शक्ति प्राप्त करती हैं।  एक जनतांत्रिक समाज के निर्माण के लिए इन पुरानी संस्थाओं और संगठनों का समाप्त किया जाना नितांत आवश्यक था। इन पुरानी संस्थाओं और उन के अवशेषों को पूरी तरह समाप्त करने का यह कार्यभार गणतंत्र की संवैधानिक संस्थाओं पर था।  लेकिन जब जातिवाद ही सर्वोच्च संवैधानिक संस्था संसद के सदस्यों को चुने जाने का आधार बन रहा हो वहाँ यह कैसे संभव हो सकता था? हमारा जनतांत्रिक गणतंत्र एक चक्रव्यूह में फँस गया है जिस में जातिवादी संस्थाएँ संसद को चुने जाने का आधार बन रही हैं।  संसद को इन संस्थाओं की रक्षा करने की आवश्यकता है। जिस के लिए जरूरी है कि संवैधानिक न्याय व्यवस्था अधूरी और देश की आवश्यकता की पूर्ति के लिए नाकाफी बनी रहे जिस से इन जातिवादी संस्थाओं को बने रहने का आधार नष्ट न हो सके। जनतंत्र कभी सफल हो ही नहीं सके।

ही कारण है कि भारत की केन्द्र और राज्य सरकारों ने कभी न्यायपालिका को जरूरी स्तर की सुविधाएँ प्रदान नहीं कीं। जब देश में अंग्रेजों का शासन था तो अदालतें सिर्फ इतनी थीं कि वे देश की जनता पर अपना आधिपत्य बनाए रखें। उन्हें सामाजिक न्याय की कोई आवश्यकता नहीं थी। लेकिन एक जनतांत्रिक गणतंत्र बन जाने के बाद देश की गरीब से गरीब जनता को न्याय प्रदान करना इस गणतंत्र की प्राथमिक आवश्यकता है। यदि यह आवश्यकता पूरी नहीं की जा सकी है तो हमें जानना चाहिए कि हमारा यह गणतंत्र अधूरा है। आप इस से अनुमान कर सकते हैं कि संयुक्त राज्य अमरीका में 10 लाख की आबादी पर 135-140 जज नियुक्त हैं जब की भारत में 10 लाख की इसी आबादी पर केवल 12-13 जज नियुक्त हैं। अमरीका के मुकाबले केवल दस प्रतिशत अदालतें हों तो न्याय व्यवस्था कैसे चल सकती है। यही कारण है कि अदालतों में अम्बार लगा है। एक एक जज दस दस जजों का काम निपटा रहा है। ऐसे में न्याय हो सकना किसी तरह संभव नहीं है। अदालतें सिर्फ कागजी न्याय (पेपर जस्टिस) कर रही हैं। जज न्याय करने के काम ऐसे कर रहे हैं जैसे उन्हें मशीन से लॉन की घास काटना हो। अब भी न्याय केवल कारपोरेट्स, वित्तीय संस्थाओं, धनपतियों और दबंगों को मिल रहा है। इस के बाद जिस विवाद में ये लोग पक्षकार नहीं हैं उन विवादों में इन का किसी पक्षकार के पक्ष में हस्तक्षेप न्याय को अन्याय में परिवर्तित कर देता है। अदालतें कम होने पर मुकदमों का अंबार लगा है। कई कई पीढियाँ गुजर जाने पर भी न्याय नहीं मिलता। अनेक निरपराध लोग जीवन भर जेलों में सड़ते रहते हैं। जरूरी होने पर अनेक वर्षों तक तलाक नहीं मिलता, बच्चों को उपयुक्त अभिरक्षा नहीं मिलती। मकान मालिक को अपना ही मकान उपयोग के लिए नहीं मिलता तो किराएदार बिना वजह मकान से निकाल दिए जाते हैं। न्याय के अभाव में जितना अन्याय इस देश में हो रहा है उस का सानी किसी जनतांत्रिक देश में नहीं मिल सकता। उस पर जब हमारे लोग इसे दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र कहते हैं तो शर्म से सिर झुकाने के सिवा कोई रास्ता नहीं सूझता।

दि देश की जनता को वास्तविक जनतंत्र चाहिए तो उसे इस चक्रव्यूह को तोड़ना होगा। वास्तविक जनतंत्र इस देश की श्रमजीवी जनता, उजरती मजदूरों-कर्मचारियों, किसानों, विद्यालयों-महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों, बेरोजगार व रोजगार के लिए देस-परदेस में भटकते नौजवानों की महति आवश्यकता है। वे ही और केवल वे ही इस चक्रव्यूह को तोड़ सकते हैं। लेकिन उन्हें इस के लिए व्यापक एकता बनानी होगी।

ह एक मकसद था जिस के लिए तीसरा खंबा ब्लाग के रूप में आरंभ हुआ था।  एक न्यायपूर्ण जीवन की स्थापना सुंदर और उत्तम लक्ष्य तो हो सकता है पर उस की प्राप्ति के लिए जीवन को जीना स्थगित नहीं किया जा सकता। वह तो जैसी स्थिति में उस में भी जीना पड़ता है।  वर्तमान समस्याओं से लगातार निपटते हुए जीना पड़ता है।  यह एक कारण था कि तीसरा खंबा से पाठकों की यह अपेक्षा हुई कि वह वर्तमान समस्याओं के अनन्तिम और अपर्याप्त ही सही पर मौजूदा हल भी प्रस्तुत करे। तीसरा खंबा को यह आरंभ करना पड़ा।  आज स्थिति यह है कि तीसरा खंबा के पास सदैव उस की क्षमता से अधिक समस्याएँ मौजूदा समाधान के लिए उपस्थित रहती हैं।  पिछले एक डेढ़ वर्ष में यह भी हुआ कि तीसरा खंबा जो बात लोगों के सामने रखना चाहता था वे नैपथ्य में चली गईं और समस्याओं के मौजूदा समाधान मंच पर आ कर अपनी भूमिका अदा करते रहे।

श्री बीएस पाबला

   बीएस पाबला

स बीच 1 जनवरी 2012 को तीसरा खंबा को वेब साइट का रूप मिला।  शायद यह कभी संभव नहीं होता यदि तीसरा खंबा के आरंभिक मित्र श्री बी.एस.पाबला  इस के लिए लगातार उकसाते न रहते और इसे तकनीकी सहायता प्रदान न करते। उन के कारण ही तीसरा खंबा को आप एक वेबसाइट के रूप में देख पा रहे हैं।  इस रूप में इस के पाठकों की संख्या के साथ कानूनी समस्याओं में भी वृद्धि हुई।  पहली जनवरी 2012 से 10 नवम्बर 2015 तक 3 वर्ष 10 माह दस दिनों में (11,69,400) ग्यारह लाख उनहत्तर हजार चार सौ से अधिक पाठक तीसरा खंबा पर दस्तक दे चुके हैं। वर्तमान में लगभग 2000 पाठक तीसरा खंबा पर प्रतिदिन दस्तक दे रहे हैं। हमें यह महसूस हुआ कि प्रतिदिन एक समस्या का समाधान प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं है। उसे बढ़ा कर दो करना पड़ा। लेकिन उसे हम अधिक दिन नहीं चला पाए। वह तभी संभव हो सकता है जब कि तीसरा खंबा को व्यवसायिक स्तर पर चलाया जाए। पर वह भी फिलहाल संभव नहीं है। कानूनी समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करना मात्र इस वेब साइट का एक-मात्र लक्ष्य न तो कभी था और न हो सकता है। हम चाहते हैं कि सप्ताह में कुछ विशिष्ठ आलेख वर्तमान न्याय व्यवस्था की समस्याओं और एक जनतांत्रिक आवश्यकता के लिए आवश्यक आदर्श न्याय व्यवस्था के लक्ष्य पर प्रकाशित किए जाएँ।  लेकिन यह तभी संभव है जब तीसरा खंबा के कुछ सक्षम मित्रों की सहभागिता इस में रहे।  सभी सक्षम मित्रों से आग्रह है कि इस काम में तीसरा खंबा के साथ खड़े हों और न्याय व्यवस्था के संबंध में अच्छे आलेखों से इस वेब साइट की समृद्धि में अपना योगदान करें।

श्री मनोज जैन, एडवोकेट

       मनोज जैन

बी.एस. पाबला जी जैसे निस्वार्थ व्यक्तित्व के निशुल्क तकनीकी सहयोग के बिना इस साइट को यहाँ तक लाना संभव नहीं था। मुझे हमेशा महसूस होता है कि इस काम में कुछ विधिज्ञो को और जोड़ा जा सके तो हम इसे अधिक विस्तार दे सकते हैं। इस वर्ष मेरे एक युवा ऊर्जावान साथी श्री मनोज जैन इस के साथ जुड़े हैं। हम दोनों अपने प्रोफेशन में भी सहभागी हैं। उन का योगदान तीसरा खंबा को नई ऊंचाइयों तक जाने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।  हम तीसरा खंबा में उन का स्वागत करते हैं।

दीपावली के अवसर पर तीसरा खंबा अपने सभी पाठकों और मित्रों का हार्दिक अभिनंदन करता है।  सभी के लिए हमारी शुभकामना है कि वे आने वाले समय में जीवन को और अधिक उल्लास के साथ जिएँ।  साथ ही यह आशा भी है कि तीसरा खंबा को पाठकों और मित्रों का सहयोग लगातार प्राप्त होता रहेगा।

                                                                                                                                                                                                  … दिनेशराय द्विवेदी

अब तक 5 टिप्पणियाँ, आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

rp_judge-cartoon-300x270.jpgसमस्या-

अमित ने हजारीबाग, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता एक रिटायर सरकारी पदाधिकारी है। हम लोग चार भाई हैं। मेरे पिता के किसी दूसरी महिला के साथ संबध है। मेरे पिता से पूछने पर वह इस संबध होने से इनकार करते रहे। इसके अलावा वे मेरी मां को कोई पैसा नहीँ देते थे। पूछने पर वो गाली गलोज करते रहे। वो हम लोग के पास कुछ दिन रहते थे और बिना बताये एकाएक उसके पास जो दूसरे शहर मे चले जाते थे। इस बात को लेकर मेरी मां की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ा जो अक्सर बीमार रहने लगी। मेरे भाईयों की हालात भी ठीक नहीँ थी उनका बहुत मुशकिल से गुज़ारा हो पाता है। 10 नबंम्बर 2014 को मेरे मां की अचानक तबीयत ख़राब हुई तब मेरे पिता साथ में थे और भाई काम से बाहर। उस हालात में मेरे पिता छोड़कर उस महिला के पास चले गये। मैं उस समय पुलिस की ट्रेनिंग के लिए बाहर था। जब भाईयो को पता चला कि मां बीमार है तो उन्हें अस्पताल ले जाया गया। लेकिन तबतक हालात ख़राब हो चुकी थी। पड़ोसियों से पैसे लेकर एडमिट करवाया गया। 20 नवम्बर 2014 को मेरी मां का देहान्त हो गया। अभी मैं ट्रेनिंग पूरा कर घर आया हूँ। मैं ने अपने पिता से इस बारे में बात की तो उन्होने कहा मुझे झूठे केस में फंसा देंगे। उन्होंने बहुत लोगों पर केस कर रखा है। बात बात पर केस मुकदमा करना उनकी पुरानी आदत है। मेरे पिता की लापरवाही के कारण मेरी मां का देहान्त हुआ है। मेरी मां को न्याय कैसे मिलेगा मेरा मार्गदशन करें।

समाधान-

प की माता जी के साथ जो होना था हो चुका। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। यदि उन्हें कुछ करना था तो अपने जीते जी करना था। अब वे नहीं रही हैं तो पिता को दूसरा सम्बन्ध बनाए रखने में कोई बाधा नहीं है। अपने पिता जी की लापरवाही को साबित करने के लिए आप को सबूत भी पर्याप्त नहीं मिलेेंगे। उसे साबित करने में आप को बहुत परेशानी आएगी और फिर भी आप उसे साबित नहीं कर पाएंगे। आप पिता की शिकायत करेंगे तो आप के पिता को भी आप के विरुद्ध शिकायत और मुकदमे करने का बहाना मिल जाएगा। जिस से आप को ही परेशानी आने वाली है हो सकता है इस का असर नौकरी तक भी जाए।

प सब भाई बहन बालिग हैं और कानून के अनुसार बालिग बच्चों के प्रति पिता का कोई दायित्व नहीं होता। पिता की कमाई हुई संपत्ति पर भी उस की बालिग संतानों का कोई हक नहीं होता। इस तरह आप यदि पिता जी से लड़ेंगे तो पिताजी की जिस चल अचल संपत्ति का आप अभी उपयोग कर रहे हैं या कर सकते हैं उस से वंचित किए जा सकते हैं। माँ तो अब नहीं रहीं उन के साथ न्याय हो या अन्याय इस से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। हमारी न्याय व्यवस्था की यह हालत है कि जो उस में न्याय के लिए जाता है खुद ही उलझा पड़ा रहता है। वस्तुतः हमारी न्याय व्यवस्था न्याय प्राप्त करने वालों के साथ बहुत बुरी तरह पेश आती है। यह बात आप कुछ दिन पुलिस की नौकरी कर लेंगे तो बखूबी समझ लेंगे। कम से कम मौजूदा न्याय प्रणाली तो आप को या आप की माता जी को कभी न्याय नहीं दिला सकेगी।

मारे विचार में आप अपने पिता को अपने हाल पर छोड़ दें उन के कर्मों का फल प्रकृति अपने आप उन्हें देगी, आप को कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। आप इस धारणा को छोड़ कर अपने जीवन को सुधारने, अपनी माली हालत को ठीक करने के काम में अपना समय लगाएँ।

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

Market dictatorshipसमस्या-

टीकम सिंह परिहार ने जोधपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी कंपनी पिछले 1 साल से वेतन का भुगतान समय पर नहीं कर रही है। हर महीने 14 से 20 तारीख को कर रही है। एक साल पहले 7 तारीख तक भुगतान कर दिया जाता था। कुल 250 से 300 कर्मचारी है PF, ESI, सही है। पर वेतन समय पर मिले इस के लिए क्या करें?

समाधान-

जिन उद्योगों में 1000 से कम कर्मचारी हैं उन में अगले माह की 7 तारीख तक तथा जहाँ 1000 या अधिक कर्मचारी हैं उन में कर्मचारियों को 10 तारीख तक वेतन का भुगतान कर दिया जाना चाहिए। इस के बाद किया गया भुगतान देरी से किया गया भुगतान है। जिस में प्रत्येक कर्मचारी को हर बार 25 रुपया जुर्माना दिलाया जा सकता है। लेकिन उस के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में मुकदमा करना पड़ेगा। यदि आप अकेले मुकदमा करेंगे तो प्रबंधन आप को किसी भी तरह से नौकरी से निकाल देगा। इस कारण यह लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती है। इसे लड़ने के लिए सारे उद्योग के श्रमिकों को एक जुट होना पड़ेगा।

कुछ साल पहले तक यह श्रम विभाग की जिम्मेदारी थी कि वह नियोजक से समय पर वेतन दिलाए। यदि समय पर वेतन का भुगतान नहीं होता था तो श्रम विभाग के निरीक्षक उस नियोजक के विरुद्ध श्रमिकों की ओर से वेतन भुगतान प्राधिकारी के यहाँ मुकदमा करते थे। लेकिन अब सरकारों ने श्रमिकों की ओर से मुकदमा करना बन्द कर दिया है। सरकारों का मानना है कि वेतन समय पर दिलाना सरकारों का नहीं बल्कि कानून और अदालत का काम है। यदि समय पर वेतन चाहिए तो मजदूर खुद मुकदमा करे। मुकदमा करने के लिए काम से गैर हाजिर हो, नुकसान उठाए। इस तरह वह मुकदमा करेगा ही नहीं और उद्योगपति अपनी मनमर्जी चलाते रहेंगे। यही मौजूदा भाजपा और पिछली कांग्रेस सरकार का सत्य है। वे मालिकों के लिए बनी हैं और उन के लिए ही काम करेंगी। श्रम विभाग में अफसर नहीं हैं। तीन चार अदालतों को एक अफसर चलाता है। फैसले बरसों तक नहीं होते। श्रम न्यायालय भी जरूरत के अनुसार नहीं हैं। जिस से 30-35 साल पुराने मुकदमे भी अभी तक लंबित पड़े हैं।

दि कोई उद्योग एक माह देरी से वेतन देता है तो उस की उपेक्षा की जा सकती है लेकिन साल भर से यही हो रहा है तो सरकार को खुद उस पर मुकदमा चलाना चाहिए और मजदूरें को देरी के एक एक दिन का ब्याज 12% की दर से पैनल्टी के साथ दिलाना चाहिए। वैसे भी मजदूर रोज काम करता है और कमाता है। उस कमाई को एक माह से अधिक समय तक अपने पास रख कर उद्योगपति मुनाफा कमाता है। उस का कोई हिसाब नहीं होता। ब्रिटेन में वेतन इसी कारण हर सप्ताह भुगतान किया जाता है जिस से मजदूर की मजदूरी का पैसा मालिक के पास अधिक दिन न रहे और मालिक अनुचित लाभ न उठाए।

ब हर उद्योग के मजदूर को संगठित होना पड़ेगा। केवल एक उद्योग के मजदूर को नहीं अलग अलग उद्योगों के मजदूरों को भी आपस में संगठित होना पड़ेगा। अब उन की लड़ाई केवल सामुहिक सौदेबाजी या अदालत की नहीं रह गयी है। क्यों कि इन दोनों तरह की लड़ाइयों को सरकार मालिकों के पक्ष में तब्दील कर देती है। इस तरह हमारे देश की व्यवस्था भी जनतांत्रिक नहीं रह गयी है। वह कहने को जनतांत्रिक है लेकिन चरित्र में वह पूंजीपतियों-भूस्वामी वर्गों की शेष जनता पर तानाशाही है।

ब मजदूरों की समस्याओं का इस देश में एक ही इलाज रह गया है कि मजदूर एक वर्ग के रूप में राजनैतिक रूप से संगठित हों और वर्तमान सत्ता को पलट कर अपनी वर्गीय सत्ता स्थापित करें। तभी पूंजीपतियों और भूस्वामियों और उन के दोस्त विदेशी पूंजीपतियों की इस तानाशाही को धराशाही किया जा कर जनता का जनतंत्र स्थापित किया जा सकता है।

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

divorceसमस्या-

सौरभ ने प्रतापगढ़, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

कृपया मुझे बतायें कि. 1. धारा 125 दं.प्र.संहिता का केस पत्नी मायके में कर सकती है या पतिगृह? अगर पतिगृह नहीं करे और मायके कर दे तो क्या किया जाये? 2. धारा 498 ए का केस कहाँ कर सकती है पति गृह या मायके? और अगर मायके नहीं कर सकती हो फिर भी कर दे तो क्या करें जब पुलिस परेशान कर रही हो? मैं ने पहले आप को अपनी समस्या भेजी थी जिसका समाधान आप ने 25-११-१४ को दिया था आप के कहे अनुसार मैं ने किया परन्तु सफलता नहीं मिली। ना ही अभी तक पत्नी से उसके घर वालों ने मेरी बात होने दी। 4 बार मैं जा कर आया हूँ। मैं अपना घर किसी भी हालात में बिगाड़ना नहीं चाहता हूँ। जब कि मेरे ससुर मुझ से बडी रकम लेने के चक्कर में हैं। उन के मित्र का फोन आया था बोला 10 लाख देदो और तलाक ले लो।

समाधान-

धारा 125 दं.प्र.संहिता का केस पत्नी वर्तमान में जहाँ निवास कर रही है वहाँ कर सकती है। यदि आप के विरुद्ध मुकदमा कर दिया गया है तो आप के पास एक ही विकल्प है कि आप के विरुद्ध जिस अदालत में मुकदमा किया गया है वहाँ जा कर अपना प्रतिवाद प्रस्तुत करें और मुकदमे में अपनी प्रतिरक्षा करें।

धारा 498 ए आईपीसी का मुकदमा वास्तव में एक अपराधिक मुकदमा है। यह मुकदमा ऐसे किसी भी स्थान पर हो सकता है जहाँ वह अपराधिक परिघटना घटित हुई है जिस की शिकायत की जा रही है, या उस का कोई अंश घटित हुआ है। जब भी कोई पत्नी अपने मायके में ऐसी शिकायत प्रस्तुत करती है तो उस के विवरण में घटना का कोई एक अंश मायके के पुलिस थाने के क्षेत्राधिकार में घटित हुआ बताया जाता है।

दि आप के विरुद्ध धारा 498 ए आईपीसी का मुकदमा दर्ज हुआ है और पुलिस परेशान कर रही है तो सब से अच्छा उपाय यही है कि आप अपनी गिरफ्तारी पूर्व जमानत करवा लें। जिस से आप गिरफ्तारी से बच सकें। यदि पुलिस ऐसे मामले में आरोप पत्र प्रस्तुत करती है तो फिर से आप के लिए यही विकल्प शेष रह जाता है कि आप अपने विरुद्ध मुकदमे में प्रतिरक्षा करें।

दि पत्नी आप के साथ रहना ही नहीं चाहती है तो आप उसे जबरन तो अपने साथ रख नहीं सकते। वैसी स्थिति में विवाह विच्छेद ही एक मात्र मार्ग शेष रह जाता है। आप घर बिगाड़ना नहीं चाहते तो आप जिला विधिक सहायता समिति में मुकदमा पूर्व समझौता कराने के लिए आवेदन प्रस्तुत करें। वे आप की पत्नी को बुला कर आप से बातचीत करवा देंगे। यदि कोई हल निकलता है तो ठीक है वर्ना आप को समझौता कर के आपसी सहमति से विवाह विच्छेद कर लेना चाहिए। 10 लाख की तो मांग है इस से आधी या उस से कम राशि पर भी समझौता हो सकता है।

यहाँ क्लिक कर सबसे पहले टिप्पणी कीजिए

चैक बाउंस के मुकदमे ब्लेक मेलिंग का आधार बन रहे हैं।

February 24, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

arrested-man-in-handcuffsसमस्या-

प्रियंका असरानी ने सांगानेर, जयपुर, राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता जी ने किसी से 4 साल पहले 90,000 रुपये उधार लिए थे। उस में से कुछ रुपया हम ने वापस भी किया था। पर हमारी आर्थिक हालत कमजोर होने के कारण जब हम ने पैसा देना कुछ समय के लिए रोक दिया तो उस व्यक्ति ने झूठा अमाउंट भर कर चैक लगा दिया, अब मामला कोर्ट में है और बयान मुल्ज़िम तक पहुँच गया है। ये बात हमें भी पता है की चेक में भरा गया पैसा हमें देना पड़ेगा। लेकिन उस ने चेक में 350000 रुपया भरा है और हमारे वकील साहब का कहना है कि कोर्ट आपको 2 साल तक की सजा और चेक अमाउंट से डबल तक जुर्माना सुना सकता है, बेहतर होगा आप उस व्यक्ति से बात कर राजीनामा कर लें। जब हम ने उस व्यक्ति से बात की तो वह हम से केस वापस लेने की एवज में 450000 रुपये देने की मांग करने लगा। हम ने जितना पैसा लिया था उस से 5 गुना ज्यादा उसने पहले ही चेक में भर दिया है फिर भी हम मज़बूरी क कारण उसे चेक का अमाउंट देने को तैयार हैं। लकिन उसने तो इंसानियत को ही मार दिया। अगर हम कोर्ट में 350000 का डिमांडिंग ड्राफ्ट बनवा के दे तब भी क्या हमें जुर्माना दुगना तक ही देना पड़ेगा। अगर कोई रास्ता या कानून में ऐसा कोई क्लोज है तो प्लीज बताये हम बड़ी परेशानी में है।

समाधान-

प की समस्या बहुत आम है। धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम जिस तरह है उस में अपराध यह है कि यदि आप ने कोई चैक दिया है तो उस का भुगतान होना चाहिए। वह बाउंस होता है तो नोटिस मिलने के 15 दिन में चैक राशि का भुगतान होना चाहिए। अन्यथा चैक बाउंस की रकम अदा करने का नोटिस मिलने के 15 दिन में भुगतान न करना अपराध है जिस का दंड वही है जो आप के वकील ने बताया है। अर्थात 2 वर्ष तक का कारावास तथा चैक की राशि के दुगने तक जुर्माना। लेकिन यह बिलकुल जरूरी नहीं है कि अदालत दो वर्ष तक की सजा दे ही। अधिकांश मामलो में छह माह की और कुछ मामलों में एक वर्ष की सजा होती है। सजा होने के बाद भी अदालत कम से कम एक माह तक उसे निलंबित कर देता है जिस से अपील की जा सके। इस अवधि में अपील प्रस्तुत कर सजा को लंबित कराया जा सकता है। अपील कोर्ट निचली अदालत के निर्णय के अनुसार या उस से कम राशि जमा कराने की शर्त पर सजा को निलंबित कर देती है। इस कारण पहली अदालत के निर्णय तक इन्तजार किया जा सकता है।

सल में जब से यह कानून अस्तित्व में आया है किसी को भी खाली चैक हस्ताक्षर कर के किसी को भी नहीं देना चाहिए। चैक में धनराशि भर कर तारीख डाल कर ही देना चाहिए और उस तिथि को चैक की राशि बैंक में रखना चाहिए जिस से वह बाउंस न हो। लेकिन मजबूरी में और अज्ञान के कारण लोग ऐशा करते हैं। उधार देने वाले सूदखोर लोगों ने इस कानून को लूटने का माध्यम बना लिया है। एक तरह से वे इस कानून की सहायता से अदालतों को ब्लेकमेल का साधन बना रहे हैं। जिस पर किसी का ध्यान नहीं है। अदालतें कानून के मुताबिक फैसले देती हैं, उन्हें देना पड़ता है। वे कानून की पालना करती हैं, न्याय नहीं करतीं। वास्तव में यह कानून वित्तीय संस्थाओं की सुविधा के लिए बनाया गया है। उन्हें इसी में सुविधा है। जिस का लाभ सूदखोर लोग खूब उठा रहे हैं। यह कानून ही गलत है लेकिन इस का बड़े पैमाने पर विरोध नहीं हो रहा है। यह कानून हमारे देश की गरीब जनता पर अन्याय है।

स कानून में मुकदमा होने पर बचने का एक ही मार्ग है कि अभियुक्त खुद यह साबित करे कि उक्त चैक किसी दायित्व की पूर्ति के लिए नहीं दिया गया था। जो साबित करना असंभव जैसा है। इस कारण जब भी चैक के आधार पर उधार लिया जाए तो उधार का दस्तावेज जरूर लिखा जाए और उस में दिए गए चैक का नंबर और धनराशि सहित वर्णन जरूर हो।

प के पिताजी का मुकदमा बयान मुल्जिम में है। उस के बाद आप के पिता न्यायालय की अनुमति ले कर अपना बयान और अपने पक्ष में सबूत प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि वे यह साबित करते हैं कि यह चैक सीक्योरिटी के लिए दिया गया था न कि दायित्व के भुगतान के लिए और परिवादी ने जानबूझ कर अधिक रकम भर ली है और अब मुकदमे की आड़ में आप के पिता को ब्लेकमेल कर रहा है उन्हें राहत मिल सकती है। आप के पिताजी को इस तरह के छल और ब्लेकमेलिंग के विरुद्ध पुलिस को भी रिपोर्ट करानी चाहिए क्यों कि उस का यह कृत्य आईपीसी के अन्तर्गत अपराध है। उस व्यक्ति ने एक झूठा मुकदमा प्रस्तुत कर आप के पिता को परेशान किया है। आप की यह शिकायत तो सच्ची और वाजिब होगी। यदि पुलिस कार्यवाही न करे तो न्यायालय में अलग से परिवाद दाखिल करना चाहिए। जिस से उस व्यक्ति पर भी दबाव बने और किसी तरह बीच का मार्ग निकल सके।

यहाँ क्लिक कर सबसे पहले टिप्पणी कीजिए

शासकीय अधिकारी अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या करते हैं

January 23, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

lawसमस्या-

प्रवीण ने रतलाम, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं रतलाम (मध्य प्रदेश) में सहायक लोक अभियाजक के पद पर पदस्थ हूँ। मध्य प्रदेश सरकार ने अपने आदेश दिनांक 11/12/2013 के द्वारा मेरी सेवा समाप्त कर दी थी। सम्बन्धित विवाद माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर में दिनांक 22/12/2013 से लंबित है, माननीय न्यायालय ने सरकार के आदेश दिनांक 11/12/2013 को स्थगित कर रखा है

मेरी समस्या यह है कि मैं पारिवारिक समस्याओं के कारण अपना स्थानान्तरण करवाना चाहता हूँ, लेकिन सरकार का इस सम्बन्ध में मत है कि न्यायालय में प्रकरण लंबित होने के कारण मेरा स्थानान्तरण नहीं हो सकता। क्या सरकार का यह मत उचित है जब कि माननीय न्यायालय ने सरकार के आदेश दिनांक 11/12/2013 को इसलिए स्थगित किया है ताकि मैं सेवा में बना रह सकूँ, उक्त आदेश को स्थगित करने के अलावा कोई अन्य आदेश माननीय उच्च न्यायालय ने नहीं दिया है।

समाधान-

प स्वयं लोक अभियोजक हैं और कानून के व्यवसायी हैं। आप स्वयं समझते हैं कि उच्च न्यायालय के आदेश की आप की व्याख्या सही है। सरकार की व्याख्या सही नहीं है। आप शासकीय सेवा में हैं तो यह भी जानते होंगे कि सरकारी विभागों में उच्च न्यायालयों के आदेशों की व्याख्या करने में दो फैक्टर काम करते हैं। एक तो यह कि कहीं उच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन न हो जाए और उन्हें किसी तरह के कंटेम्प्ट की कार्यवाही का सामना न करना पड़े, दूसरा यह कि उन्हें खुद किस बात में सुविधा है? इसी कारण शासन ने उच्च न्यायालय के आदेश का ऐसी संकीर्ण व्याख्या प्रस्तुत की है। आप ने उस आदेश को यहाँ प्रस्तुत नहीं किया है जिस से हम उस आदेश की अपनी व्याख्या कर सकें। बिना आदेश की भाषा उपलब्ध हुए बिना उस की व्याख्या किया जाना संभव नहीं है।

प इस सम्बन्ध में अपने विभाग के उच्च अधिकारियों को प्रतिवेदन भेज कर स्पष्ट कर सकते हैं कि उक्त आदेश के कारण आप का स्थानान्तरण करने में किसी तरह की कोई समस्या नहीं है। इस मामले में कंटेम्प्ट की कार्यवाही भी सिर्फ आप की ओर से की जा सकती है। आप उन्हें एक अंडरटेंकिंग देते हुए आश्वस्त कर सकते हैं कि यदि आप का स्थानान्तरण किया जाता है तो आप किसी भी तरह की कंटेम्प्ट की कार्यवाही नहीं करेंगे।

आप ने अपनी सेवा मुक्ति को चुनौती देने के लिए रिट याचिका प्रस्तुत की है जिस में यह आदेश पारित हुआ है। इस याचिका में आप ने अपने वकील को नियुक्त किया है जो इस मामले को देख रहे हैं। इस परेशानी का हल निकालने के लिए आप उन से भी राय करें कि आप का स्थानान्तरण किए जाने के लिए क्या किया जा सकता है।

प की सेवा मुक्ति जिस किसी भी कारण से हुई हो। कारण होने के साथ साथ विभाग में किसी न किसी अधिकारी की रुचि भी इस में रही होगी कि आप के विरुद्ध तुरन्त कार्यवाही की जाए। ऐसे व्यक्ति अभी भी शासकीय सेवा में आप के विभाग में होंगे। अभी शासन ने यह व्याख्या की है कि आप का स्थानान्तरण नहीं हो सकता है। लेकिन एक बार यह व्याख्या हो जाने पर कि आप का स्थानान्तरण हो सकता है। ऐसे लोग अपनी कारस्तानी कर सकते हैं और आप का स्थानान्तरण ऐसे स्थान पर भी कर सकते हैं जहाँ आप को रतलाम में जितनी असुविधा हो रही है उस से अधिक असुविधा होने लगे। इस तरह आप के स्थानान्तरण के मामले में जो भी कुछ करना हो वह बहुत सोच समझ कर करें।

यहाँ क्लिक कर सबसे पहले टिप्पणी कीजिए

घरेलू हिंसा मामले में संरक्षा अधिकारी के कर्तव्य …

November 18, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

sexual-assault1समस्या-

राहुल ने कानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

जिला प्रोबेशन ऑफीसर के यहाँ घरेलु हिंसा के अन्तर्गत दिया गया प्रार्थना पत्र तथा पति पत्नी से पूछताछ में पूछे गए सवाल के जवाब को जो वह नोट करता है उसे क्या कहते हैं? तथा उन जवाबों क्या महत्व है? क्या प्रोबेशन अधिकारी के यहाँ से अदालत जाने से पहले सेक्शन 9 दाखिल कर देने से 498-ए तथा अन्य में धराओं में राहत मिल सकती है। जिला प्रोबेशन अधिकारी द्वारा भेदभाव की शिकायत किस से की जा सकती है? क्या एक महीने में एक डेट में ही प्रोबेशन अधिकारी न्यायालय को स्थानांतरित कर सकता है।

समाधान-

हिलाओँ का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम में किसी प्रोबेशन अधिकारी का उल्लेख नहीं है। इस अधिनियम में प्रोटेक्शन / संरक्षा अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान है। ऐसे संरक्षा अधिकारी का कार्य किसी भी महिला के साथ घरेलू हिंसा के मामले की रिपोर्ट बना कर मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत करना तथा उस की प्रतियाँ उस थाना क्षेत्र के भारसाधक अधिकारी को व क्षेत्र के सेवा प्रदाताओं को देना है। संरक्षा अधिकारी  घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला की ओर से आवेदन भी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। संरक्षा अधिकारी द्वारा जो जवाब पूछे जाते हैं उन्हें उस व्यक्ति के बयान के रूप में घरेलू हिंसा की घटना की रिपोर्ट के साथ संलग्न किया जाता है। इन बयानों और घटना रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय प्रथम दृष्टया कोई राहत हिंसा की शिकार महिला को प्रदान कर सकता है।

संरक्षा  अधिकारी का कार्य हि्ंसा से पीड़ित महिला को विधिक सेवा प्राधिकरण से मिलने वाली सहायता उपलब्ध कराना,  पीडित महिला को संरक्षण गृह उपलब्ध कराना , आवश्यक होने पर पीड़िता की चिकित्सकीय जाँच करवाना, मौद्रिक अनुतोष की अनुपालना करवाना तथा घरेलू हिंसा के मामले में न्यायालय की मदद करना है।

धारा-9 का आवेदन प्रस्तुत करने का तात्पर्य मात्र इतना है कि उस से यह स्पष्ट होगा कि आप तो स्वयं ही पत्नी को रखने को तैयार है। इस से अधिक कुछ नहीं। प्रत्येक मामले का निर्णय उस मामले में साक्ष्य द्वारा प्रमाणित तथ्यों पर निर्भर करेगा।

प का अन्तिम प्रश्न समझ से बाहर है। आप किस चीज के स्थानान्तरण की बात कर रहे हैं यह लिखना शायद भूल गए। लेकिन संरक्षा अधिकारी कभी भी न्यायालय को आवेदन या घटना रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकता है।

अब तक 4 टिप्पणियाँ, आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये
Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada