न्याय Archive

शासकीय अधिकारी अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या करते हैं

January 23, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

lawसमस्या-

प्रवीण ने रतलाम, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं रतलाम (मध्य प्रदेश) में सहायक लोक अभियाजक के पद पर पदस्थ हूँ। मध्य प्रदेश सरकार ने अपने आदेश दिनांक 11/12/2013 के द्वारा मेरी सेवा समाप्त कर दी थी। सम्बन्धित विवाद माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर में दिनांक 22/12/2013 से लंबित है, माननीय न्यायालय ने सरकार के आदेश दिनांक 11/12/2013 को स्थगित कर रखा है

मेरी समस्या यह है कि मैं पारिवारिक समस्याओं के कारण अपना स्थानान्तरण करवाना चाहता हूँ, लेकिन सरकार का इस सम्बन्ध में मत है कि न्यायालय में प्रकरण लंबित होने के कारण मेरा स्थानान्तरण नहीं हो सकता। क्या सरकार का यह मत उचित है जब कि माननीय न्यायालय ने सरकार के आदेश दिनांक 11/12/2013 को इसलिए स्थगित किया है ताकि मैं सेवा में बना रह सकूँ, उक्त आदेश को स्थगित करने के अलावा कोई अन्य आदेश माननीय उच्च न्यायालय ने नहीं दिया है।

समाधान-

प स्वयं लोक अभियोजक हैं और कानून के व्यवसायी हैं। आप स्वयं समझते हैं कि उच्च न्यायालय के आदेश की आप की व्याख्या सही है। सरकार की व्याख्या सही नहीं है। आप शासकीय सेवा में हैं तो यह भी जानते होंगे कि सरकारी विभागों में उच्च न्यायालयों के आदेशों की व्याख्या करने में दो फैक्टर काम करते हैं। एक तो यह कि कहीं उच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन न हो जाए और उन्हें किसी तरह के कंटेम्प्ट की कार्यवाही का सामना न करना पड़े, दूसरा यह कि उन्हें खुद किस बात में सुविधा है? इसी कारण शासन ने उच्च न्यायालय के आदेश का ऐसी संकीर्ण व्याख्या प्रस्तुत की है। आप ने उस आदेश को यहाँ प्रस्तुत नहीं किया है जिस से हम उस आदेश की अपनी व्याख्या कर सकें। बिना आदेश की भाषा उपलब्ध हुए बिना उस की व्याख्या किया जाना संभव नहीं है।

प इस सम्बन्ध में अपने विभाग के उच्च अधिकारियों को प्रतिवेदन भेज कर स्पष्ट कर सकते हैं कि उक्त आदेश के कारण आप का स्थानान्तरण करने में किसी तरह की कोई समस्या नहीं है। इस मामले में कंटेम्प्ट की कार्यवाही भी सिर्फ आप की ओर से की जा सकती है। आप उन्हें एक अंडरटेंकिंग देते हुए आश्वस्त कर सकते हैं कि यदि आप का स्थानान्तरण किया जाता है तो आप किसी भी तरह की कंटेम्प्ट की कार्यवाही नहीं करेंगे।

आप ने अपनी सेवा मुक्ति को चुनौती देने के लिए रिट याचिका प्रस्तुत की है जिस में यह आदेश पारित हुआ है। इस याचिका में आप ने अपने वकील को नियुक्त किया है जो इस मामले को देख रहे हैं। इस परेशानी का हल निकालने के लिए आप उन से भी राय करें कि आप का स्थानान्तरण किए जाने के लिए क्या किया जा सकता है।

प की सेवा मुक्ति जिस किसी भी कारण से हुई हो। कारण होने के साथ साथ विभाग में किसी न किसी अधिकारी की रुचि भी इस में रही होगी कि आप के विरुद्ध तुरन्त कार्यवाही की जाए। ऐसे व्यक्ति अभी भी शासकीय सेवा में आप के विभाग में होंगे। अभी शासन ने यह व्याख्या की है कि आप का स्थानान्तरण नहीं हो सकता है। लेकिन एक बार यह व्याख्या हो जाने पर कि आप का स्थानान्तरण हो सकता है। ऐसे लोग अपनी कारस्तानी कर सकते हैं और आप का स्थानान्तरण ऐसे स्थान पर भी कर सकते हैं जहाँ आप को रतलाम में जितनी असुविधा हो रही है उस से अधिक असुविधा होने लगे। इस तरह आप के स्थानान्तरण के मामले में जो भी कुछ करना हो वह बहुत सोच समझ कर करें।

घरेलू हिंसा मामले में संरक्षा अधिकारी के कर्तव्य …

November 18, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

sexual-assault1समस्या-

राहुल ने कानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

जिला प्रोबेशन ऑफीसर के यहाँ घरेलु हिंसा के अन्तर्गत दिया गया प्रार्थना पत्र तथा पति पत्नी से पूछताछ में पूछे गए सवाल के जवाब को जो वह नोट करता है उसे क्या कहते हैं? तथा उन जवाबों क्या महत्व है? क्या प्रोबेशन अधिकारी के यहाँ से अदालत जाने से पहले सेक्शन 9 दाखिल कर देने से 498-ए तथा अन्य में धराओं में राहत मिल सकती है। जिला प्रोबेशन अधिकारी द्वारा भेदभाव की शिकायत किस से की जा सकती है? क्या एक महीने में एक डेट में ही प्रोबेशन अधिकारी न्यायालय को स्थानांतरित कर सकता है।

समाधान-

हिलाओँ का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम में किसी प्रोबेशन अधिकारी का उल्लेख नहीं है। इस अधिनियम में प्रोटेक्शन / संरक्षा अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान है। ऐसे संरक्षा अधिकारी का कार्य किसी भी महिला के साथ घरेलू हिंसा के मामले की रिपोर्ट बना कर मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत करना तथा उस की प्रतियाँ उस थाना क्षेत्र के भारसाधक अधिकारी को व क्षेत्र के सेवा प्रदाताओं को देना है। संरक्षा अधिकारी  घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला की ओर से आवेदन भी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। संरक्षा अधिकारी द्वारा जो जवाब पूछे जाते हैं उन्हें उस व्यक्ति के बयान के रूप में घरेलू हिंसा की घटना की रिपोर्ट के साथ संलग्न किया जाता है। इन बयानों और घटना रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय प्रथम दृष्टया कोई राहत हिंसा की शिकार महिला को प्रदान कर सकता है।

संरक्षा  अधिकारी का कार्य हि्ंसा से पीड़ित महिला को विधिक सेवा प्राधिकरण से मिलने वाली सहायता उपलब्ध कराना,  पीडित महिला को संरक्षण गृह उपलब्ध कराना , आवश्यक होने पर पीड़िता की चिकित्सकीय जाँच करवाना, मौद्रिक अनुतोष की अनुपालना करवाना तथा घरेलू हिंसा के मामले में न्यायालय की मदद करना है।

धारा-9 का आवेदन प्रस्तुत करने का तात्पर्य मात्र इतना है कि उस से यह स्पष्ट होगा कि आप तो स्वयं ही पत्नी को रखने को तैयार है। इस से अधिक कुछ नहीं। प्रत्येक मामले का निर्णय उस मामले में साक्ष्य द्वारा प्रमाणित तथ्यों पर निर्भर करेगा।

प का अन्तिम प्रश्न समझ से बाहर है। आप किस चीज के स्थानान्तरण की बात कर रहे हैं यह लिखना शायद भूल गए। लेकिन संरक्षा अधिकारी कभी भी न्यायालय को आवेदन या घटना रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकता है।

ओवरटाइम मांगने पर धमकी, क्या करें?

November 9, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
trade unionसमस्या-
सौरभ कुमार ने भागलपुर, मायागंज, बिहार से समस्या भेजी है कि
मैं भागलपुर डेयरी, भागलपुर  में जूनियर टेक्नीशियन के पद पर काम करता हुँ ! मुझे १ साल से अतिकाय भुगतान नहीं मिला है। आवेदन कई बार दे चुका हूँ कोई सुनवाई नहीं होती है। शाखा प्रभारी को कहने पर नौकरी से निकालने, प्रमोशन रोकने जैसी धंमकी मिलती है। बताएँ मैे क्या कर सकता हूँ?

समाधान-

वरटाइम काम करने पर दुगनी दर से मजदूरी प्राप्त करना कामगार का कानूनी अधिकार है। जो सीधे सीधे एक दिन में 8 घंटे से अधिक काम न लिए जाने के अधिकार के साथ जुड़ा है। कानून बन जाने के बाद भी कोई भी नियोजक चाहे वह बड़ा पूंजीपति हो या छोटा, कोई सहकारी संस्था हो या फिर सरकारी, अर्धसरकारी संस्था, इस अधिकार को नहीं देना चाहती। वह ओवरटाइम काम कराती है, जब कामगार उस की मजदूरी मांगता है तो उसे इस तरह की धमकियाँ देती है।

नौकरी से गैर कानूनी तरीके से नहीं निकाला जा सकता। लेकिन यदि निकाल दिया जाए तो कामगार क्या करे? वह केवल मुकदमा कर सकता है। मुकदमा भी केवल श्रम न्यायालय के माध्यम से कर सकता है। श्रम न्यायालय जरूरत से इतने कम हैं कि कई मुकदमे 30 सालों से भी अधिक समय से वहाँ लंबित हैं। पूरा जीवन मुकदमा लड़ने में गुजर जाता है और अदालत फैसला नहीं देती।  दे भी दे तो आगे उच्च न्यायालय है, उच्चतम न्यायालय है। नियोजक कुछ भी कर लेंगे लेकिन कामगार को उस का कानूनी अधिकार न देंगे। यही इस युग का सच है। यह पूंजी का युग है, उस की तूती बोलती है, इस पूंजी का निर्माण श्रम से होता है, लेकिन श्रम करने वाला पूंजी पर कब्जा जमाए पूंजीपतियों के सामने लाचार, बेबस है।

15-20 वर्ष पूर्व तक अदालतें गैर कानूनी तरीके से नौकरी से निकाले कामगार को उस के पिछले पूरे वेतन समेत नौकरी पर लेने का फैसला देती थी। धीरे धीरे यह पूरा वेतन 3/4, 1/2, 1/4 तक हो गया और अब 1/5 तक पहुँच चुका है। मुकदमे के निर्णय में देरी अदालत के पास काम की अधिकता के कारण होती है लेकिन अब अदालत मानती है कि देरी हो जाने से कामगार का फिर से नौकरी पर जाने का अधिकार खत्म हो गया है। उसे मुआवजा दिलाया जा सकता है। यह मुआवजा 10-20-40-50 ह्जार तक हो सकता है। किसी किसी मामले में लाख तक हो जाता है। न्याय इतना मंहगा हो गया है कि इतना पैसा मुकदमा लड़ने, वकील को देने और आने जाने में खर्च हो जाता है।

कुल मिला कर हालात ऐसे बना दिेए गए हैं कि कामगार सिर्फ और सिर्फ नियोजक की शर्तों पर काम करे, खटता रहे। वर्ना नौकरी करने की बात न सोचे। इन हालात के लिए किसे जिम्मेदार कहा जाए? वास्तव  में इस के लिये खुद श्रमजीवी वर्ग जिम्मेदार है। उस के पास सिर्फ एक ताकत होती है, वह होती है एकता और उस के बल पर संघर्ष। उस ने इस ताकत को खो दिया है। इसी कारण पूंजी ने सारी सत्ता हथिया ली है श्रमजीवी और कामगार उन के सामने मजबूर हैं।

मित्र, मैं ने वास्तविक हालत यहाँ बताए हैं। लेकिन इस का अर्थ ये तो नहीं कि आप न्याय के लिए लड़ना छोड़ दें। आप नहीं लड़ेंगे तो हालात और बदतर होते जाएंगे। अब श्रमजीवी वर्ग के लिए कानूनी और व्यक्तिगत लड़ाई का वक्त नहीं रहा है। अब श्रमजीवी वर्ग  के पास संगठित होने और अपनी खुद की राजनीति को मजबूत कर राज्य पर अपना वर्गीय आधिपत्य स्थापित करने के  सिवा कोई मार्ग इस देश में शेष नहीं बचा है। आप इसे अभी समझना चाहें तो अभी समझ लें। न समझना चाहें तो न समझें। देर सबेर आप को परिस्थितियाँ यह सब समझा देंगी।

आप को अपने अधिकारों के लिए लड़ना तो होगा। नौकरी से निकाले जाने और प्रमोशन न होने के खतरों को दर किनार कर के लड़ना होगा। आप के आस पास मजदूरों की जो भी मजबूत यूनियन हो उस से संपर्क करें। उन की मदद से श्रम विभाग को शिकायत करें कि आप को ओवरटाइम मजदूरी नहीं दी जा रही है और नौकरी से निकालने, प्रमोशन रोकने की धमकी दी जा रही है। ओवर टाइम मजदूरी जो नहीं दी जा रही है उस के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में आवेदन प्रस्तुत करें। यदि आप इन परिणामों से डरते हैं तो कुछ न करें। एक मध्यकालीन गुलाम की तरह जीने के लिए तैयार रहें।

मजदूरों के लिए कोई न्याय नहीं…

October 5, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

unity400समस्या-

सुरेन्द्र कुमार ने हनुमानगढ़, राजस्थान से अपनी उत्तराखंड की समस्या भेजी है कि-

कील कोर्ट केस को रसूखदार लोगों (सीएमडी फैक्ट्री) के साथ मिल कर कमजोर कर दे या खुर्द-बुर्द कर दे या केस को लंबा खिंचाता जाए। फिर केस दूसरे राज्य में चल रहा हो तो गरीब आदमी जो एक केस से विक्टिम है दूसरी समस्याओं से कैसे निपटेगा। औद्योगिक विवाद का मामला है कुछ सलाह दें।

समाधान-

प ने अपने मुकदमों के बारे में कोई विवरण नहीं दिया है। जिस से उन का हल प्रस्तुत कर सकना तो संभव नहीं है। लेकिन आप ने अपने वकील पर विपक्षी से मिल कर मुकदमे में देरी करने, कमजोर करने और खुर्दबुर्द करने के आरोप लगाए हैं। आप ने अपने वकील पर जो संदेह व्यक्त किए हैं उन का आधार ठोस सबूत हैं या यह मुकदमे में देरी होने और वकील द्वारा उस के कमजोर होते जाने का उल्लेख करने के आधार पर ही कहा जा रहा है यह स्पष्ट नहीं है। किसी भी वकील पर केवल अनुमान के आधार पर कोई आरोप लगाया जाना उचित नहीं है। यदि आप वकील पर लगाए गए आरोपों को साबित कर सकते हैं तो फिर आप को उस की शिकायत बार कौंसिल को करनी चाहिए जिस से आप के वकील को ऐसा दुराचरण करने का दंड मिले।

लेकिन पूरे देश में श्रम न्यायालयों और औद्योगिक न्यायाधिकरणों की दशा बहुत खराब है। वहाँ बरसों तक जज नियुक्त नहीं किए जाते। पर्याप्त अदालतें न होने से अदालतों में मुकदमों का अम्बार लगा है। एक-एक पेशी छह छह माह में पड़ती है। ऐसी स्थिति में मुकदमे में देरी के लिए वकील नहीं बल्कि राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं जो पर्याप्त मात्रा में अदालतें स्थापित नहीं करतीं और स्थापित अदालतों में समय से जज नियुक्त नहीं करती। नई अदालतों की स्थापना और समय से जजों की नियुक्ति के लिए श्रमिक यूनियनों की ओर से कोई दबाव नहीं है, कोई आंदोलन नहीं है। इस नतीजा ये हुआ है कि औद्योगिक विवादों का निर्णय करने वाली ये अदालतें अब श्रमिकों को न्याय प्रदान नहीं कर रही हैं। उन का काम सिर्फ इतना रह गया है कि वह प्रबंधन के फैसलों के शिकार मजदूरों को अदालती प्रक्रिया में बरसों तक उलझाए रखे। तब तक या तो मजदूर मजबूर हो कर खुद ही अदालत का मैदान छोड़ भागे या फिर मर खप जाए।

द्योगों और उन को चलाने वाली कंपनियों की उम्र सीमित होती है। उदयोग या तो बाजार या पिछड़ती टेक्नोलोजी का शिकार हो कर बंद हो जाते हैं कंपनियाँ खुद को घाटे बता कर खुद बीमार हो कर इलाज के लिए बीआईएफआर के पास चली जाती हैं। कंपनियों के ऐसेट्स खुर्द बुर्द कर दिए जाते हैं। जो नहीं किए जाते वे बैंकों के कर्ज चुकाने को भी पर्याप्त नहीं होते। बैंकों का उधार सीक्योर्ड होता है इस कारण संपत्ति से कर्जा वसूलने का अधिकार उन का पहला है। स्थिति यहाँ पहुंच जाती है कि कोई मजदूर मैदान में डटा रह कर मुकदमा जीत भी ले तो आगे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लटका दिया जाता है। वहाँ से भी उस के जीवनकाल में कोई निर्णय हो जाए तो वह अपना पैसा वसूल करने की स्थिति में नहीं होता। क्यों कि तब तक कंपनी के पास कुछ नहीं रहता सब कुछ पर बैंक कब्जा कर लेते हैं।

जदूरों के लिए इस देश में फिलहाल कोई न्याय नहीं है। यह बात मजदूरों को समझनी होगी। वे अपने लिए न्याय व्यवस्था की मांग को ले कर सामुहिक रूप से लड़ेंगे नहीं तब तक सरकारें कंपनियों और उद्योगपतियों को कोई कष्ट पहुँचे ऐसा काम नहीं करेंगी। मौजूदा व्यवस्था में जब तक मजदूर संगठित रहते हैं और सरकारों पर राजनैतिक दबाव बनाने की स्थिति में होते हैं तब तक ही कानून, सरकारें और अदालतें उन के लिए कुछ राहत प्रदान करने वाली बनी रहती हैं। जैसे ही आंदोलन कमजोर होता है ये थोड़ा बहुत न्याय भी कपूर की भांति उड़ जाता है।

ऐसा कोई बन्दोबस्त नहीं कि आप के खिलाफ कोई मुकदमा न हो।

September 29, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

justiceसमस्या-

अजय साहू ने धमतरी, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरी उम्र 50 वर्ष है, मेरे दो पुत्र हैं। मेरी जित नी भी पैतृक सम्पत्ति है मैंनें दोनों पुत्रों को बराबर हिस्सा दिया है। वर्तमान में जो कृषि भूमि है वह मेरी स्वअर्जित भूमि है। जिसे मैं अपने छोटे बेटे को देना चाहता हूँ जो मुझे अत्यंत प्रिय है। छोटे पुत्र की ही देख रेख में मैं अपना जीवन यापन कर रहा हूँ। मैं जानता हूँ मेरी स्वअर्जित भूमि को मैं किसी को भी दान कर सकता हॅू अंतरित कर सकता हूँ। किसी के नाम कर सकता हूँ, विक्रय कर सकता हूँ, वसीयत कर सकता हूँ। मेरी स्वअर्जित भूमि में मेरा पूर्णतः अधिकार है। वर्तमान में मेरे स्वअर्जित भूमि में हिस्सा पाने के लिए मेरे बड़े पुत्र ने मुझ पर केस किया है। तहसील धमतरी, छ.ग. में 8 माह से केस चल रहा है अभी तक कोई सुनवाई नही हुई है केस और कब तक चलेगा मुझे पता नहीं। मुझे बार बार पेशी में जाने मे परेशानी हो रही है। मेरा आपसे यह सवाल है कि मेरी स्वअर्जित भूमि है जिसमे कानूनी मेरा पूर्णतः अधिकार है इस के बावजूद क्या मुझे केस लड़ना पड़ेगा। वर्तमान में तो मेरा बडा़ पुत्र तहसील मे केस किया है हो सकता है कि आगे चलकर जिला न्यायालय में राजस्व न्यायालय में सिविल कोर्ट में, हाई कोर्ट में, सुप्रीम कोर्ट में कहीं भी केस कर सकता है क्या उसके साथ साथ मुझे भी केस लड़ना पड़ेगा? मुझे भी परेशान होना पड़ेगा? मैं तो तहसील न्यायालय तक के ही केस में थक गया हूँ सर। पता नहीं आगे और किन किन मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा। महोदय आपकी राय से ऐसा कुछ रास्ता नहीं है क्या जिस में मैं इन से बच सकूँ। मेरे बड़े पुत्र के द्वारा किया गया तहसील न्यायालय में केस को खारिज करवा सकूँ और भी अन्य न्यायालयों में अगर वो केस करे तो उसे मैं एक दो पेशी में ही खारिज करवा सकूँ। हमारे कानून में ऐसा कुछ नियम नहीं है क्या जिस से मैं इन केशों से बच सकूँ या ऐसा कोई कागजात बनवा सकता हूँ क्या जिससे मुझे इन सभी केसों से छुटकारा मिल सके या कुछ ऐसा नियम जिस से मेरा पुत्र मुझ पर केस ही ना कर सके। आपसे निवेदन है की जल्द से जल्द मेरा मार्ग प्रशस्त कीजिए इन मुसीबतों से मुझे बाहर निकालिए।

समाधान-

लोग दस-बीस साल तक या पीढ़ियों तक जमीन जायदाद के लिए लड़ते रहते हैं और आप हैं कि 8 माह में ही परेशान हो गए। अब यदि आप के पुत्र ने ही आप पर संपत्ति के लिए दावा किया है तो वह तो लड़ना ही पड़ेगा। इस लड़ाई से आप पीछा नहीं छुड़ा सकते।

संपत्ति का मामला दीवानी या राजस्व का मामला है। इन मामलों में पक्षकार को खुद पेशी पर उपस्थित होने की कोई जरूरत नहीं होती है। केवल जब मामले में पक्षकार के बयान होने हों या गवाहों को बयान के लिए साथ ले कर जाना हो तभी जरूरत होती है। शेष पेशियों पर खुद वकील भी आप की पैरवी कर सकते हैं। लेकिन जब आप पेशी पर न जाएँ तो इस बात का ध्यान रखें कि हर पेशी के दिन सुबह टेलीफोन पर वकील को बता दें कि आज आप के मुकदमे की पेशी है उसे वकील साहब को देखना है। पेशी के रोज शाम को या अगले दिन फोन कर के यह जरूर पूछें कि पेशी में क्या हुआ और अगली तारीख क्या पड़ी है। यदि आप दुर्ग में रह कर इतना कर सकते हैं तो फिर आप इस मुकदमे से परेशान न होंगे। आप इस मामले में अपने वकील से बात कर के सुविधाएँ प्राप्त कर सकते हैं। वैसे भी दावा यदि आप के पुत्र ने किया है तो मामला उसे साबित करना है, आप को नहीं, आप की भूमिका मामूली है।

जैसा हल आप चाहते हैं वैसा कोई हल मिल भी जाए तो फिर ये अदालतें, ये जज, अहलकार, अदालतों के कर्मचारी, वकील और मुंशियों के पास तो काम ही नहीं रहेगा। वे क्या करेंगे? असल में व्यक्तिगत संपत्ति ऐसी चीज है जिस ने सारी दुनिया को उलझा रखा है। यह न होती तो दुनिया में कोई झगड़ा न होता। जब तक यह रहेगी ये झगड़े चलते ही रहेंगे।

justiceसमस्या-
यगदत्त वर्मा ने चित्तौड़गढ़, राजस्थान से पूछा है-

मैं मध्यप्रदेश का निवासी हूँ तथा वर्तमान में मैं राजस्थान में प्राइवेट जॉब कर रहा हूं हमारा कोर्ट केस चल रहा है। मेरे पिताजी ने आज से लगभग 45-47 वर्ष पूर्व नगरपालिका से अपनी नौकरी लगने के पश्चात रहवासी जमीन खरीदी थी दादाजी उस समय जीवित थे पिताजी, दादाजी, दादीजी तथा पिताजी के तीन बहनें व एक भार्इ था जो उस समय नाबालिग थे मेरे पिताजी की आमदनी जमीन के मूल्य से लगभग तीन गुना थी। दादाजी घर के मुखिया थे अत: पिताजी जो भी काम करते थे उनकी सलाह तथा आदेश के अनुसार ही कार्य करते थे अत: वह जमीन मेरे पिताजी ने अपने नाम से खरीदी थी और उसका रूपया कीमत अपने वेतन की बचत से जमा करवाया था तथा सभी प्रकार के टेक्स पिताजी ही भरते हैं और कोर्इ नहीं भरता। दादाजी की मृत्यु के पश्चात पिताजी ने उनके छोटे भार्इ तथा तीनों बहनों की शादी करी, मकान भी अपनी बचत से वेतनभत्तों, जी.पी.एफ. से अग्रिम राशि लेकर तथा रिश्तेदारों से मदद लेकर धीरे-धीरे टुकड़ों में मकान बनवाया तथा छुटपन से छोटे भार्इ (मेरे चाचा) को अपने साथ रखा। चाचा की शादी के कुछ समय पश्चात उसको उसी मकान में अलग रहने की इजाजत दी । मकान में प्रेमवश रहने दिया क्योंकि मेरे के चाचा पास रहने के लिये मकान नहीं था तथा काम धन्धा भी ठीक नहीं था। परन्तु जब मेरे चाचा ने (पिताजी के भार्इ) अपना मकान बना लिया तो पिताजी ने अपने छोटे भार्इ (चाचा) को अपने मकान में जाने के लिये कहा तो पहले तो जाने के लिये तैयार हो गया। परन्तु बाद में मना कर दिया और कहने लगा की ये बेनामी सम्पति है तथा मेरे पिताजी (दादाजी ने) हम दोनों भार्इयों (पिताजी व चाचा) के लिये खरीदी है तथा कहता है दादाजी ने परिवार के सामने मौखिक रूप से जमीन का आधा-आधा हिस्सा कर दिया था। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था। हो सकता है दादीजी से जीवित अवस्था में कोर्इ कोर्ट स्टाम्प पर अंगूठा लगवा लिया हो।, अत: मेरे चाचा आधी जमीन का मालिक खुद को बताता है और कहता है कि मैं नाबालिग था। इसलिये उस समय जमीन बड़े भार्इ के नाते दादाजी ने मेरे पिताजी के नाम खरीदी थी। जबकि दादाजी की कोर्इ आर्थिक सहायता नहीं थी और दादाजी उस समय आर्थिक रूप से सम्पन्न नहीं थे। दादाजी की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण पिताजी को जल्दी नौकरी करनी पड़ी। अभी फिलहाल आधे प्लाट पर मेरे चाचा का ही कब्जा है मेरे चाचा बोलते है की जिस भाग में मैं रहता हूं उसे मैनें ही बनाया है। जबकि उन्होंने कुछ भी पैसा नहीं लगाया है। मेरे पिताजी के पास जमीन के सभी कागज उपलब्ध है तथा मेरे पिताजी के पास निर्माण सम्बन्धी कागजात नहीं है। पिताजी अक्सर शहर से बाहर रहते थे और मकान किसी भी ठेकेदार से और ना ही एक मुश्त बनवाया। जितनी भी बचत होती थी मेरे पिताजी मकान में ही लगाते हैं। कोर्ट ने मकान खाली करने का प्रकरण चल रहा है मेरे चाचा तथा उसका परिवार आधे हिस्से पर कब्जा जमाये हुऐ है। परन्तु मकान का आधा हिस्सा नहीं खाली करते हैं। मेरे पिताजी ने चाचा की समय-समय पर आर्थिक सहायता भी करी परन्तु वह सब मानने को तैयार नहीं है। कोर्ट में वह केस को लम्बा खींचने का प्रयास करता रहता है। अब कोर्ट जिन प्रश्नों पर विचार कर रहा है वह नीचे दिये जा रहे है।  इस सम्बंध में यह भी उल्लेख है कि चाचा ने अभी तक अपने प्रतिवाद के समर्थन में कोर्इ दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किये हैं।
1.क्या विवादित भूखण्ड अपने पिताजी की अनुमति से वादी ने स्वंय प्रीमियम जमा कर अपने पक्ष में रजिस्ट्री करवार्इ थी?
2.क्या भूखण्ड पर एक मात्र वादी ने सम्पूर्ण मकान निर्माण करवाया है यदि हां तो इसलिये उक्त मकान वादी के एक मात्र स्वामित्व का है क्या वादी ने वादग्रस्त मकान में बिना किसी किराये से प्रेम स्नेहवश निवास हेतु प्रदान किया था?
3.क्या वादी के विरूद्ध आदेशात्मक निशेधाज्ञा के माध्यम से विवादित भूखण्ड के हिस्से को रिक्त आधिपत्य प्राप्त करने का अधिकारी है?
4.क्या प्रतिवादी से वादग्रस्त भूखण्ड का आधिपत्य प्राप्त करने तक अन्तरिम लाभ प्राप्त करने का अधिकारी है?

समाधान-

भूखंड व मकान आप के पिता जी के नाम से है। सारे कागजात उन के नाम से हैं। इस कारण यह प्राथमिक रूप से प्रमाणित है कि मकान आप के पिता जी का है। आप के पिता ने स्नेहवश भाई को रहने दिया। इसे हम लायसेंस कह सकते हैं। इस लायसेंस को रद्द कर के आप के पिता मकान का कब्जा प्राप्त कर सकते हैं। आप के चाचा ने अभी तक कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए हैं। इस से स्पष्ट है कि आप के चाचा  का मामला कमजोर है। जितने विवाद्यक न्यायालय ने निर्मित किए हैं वे भी सही हैं। मुझे लगता है कि आप के पिता जी इन्हें साबित कर लेंगे और मुकदमे का निर्णय आप के पिता जी के हक में ही होगा।

प के चाचा का केस कमजोर है इस कारण से वह मुकदमे को लंबा करना चाहता है। भारत में न्यायालयों में मुकदमों को लम्बा करना अत्यन्त आसान है। अधीनस्थ न्यायालयों में एक अदालत जितना काम रोज कर सकती है उस से 8-10 गुना काम रोज कार्यसूची में लगाया जाता है। खुद अदालत कम से कम 60 प्रतिशत मुकदमों में खुद ही आगे की तारीख देना चाहती है। इस कारण आप के चाचा के पक्ष की ओर से किसी भी बहाने से तारीखें आगे खिसकाने का प्रयास होता रहता होगा।

न्यायालयों में मुकदमे लम्बे होने का सब से बड़ा कारण हमारे देश में जरूरत के एक चौथाई से भी कम न्यायालय हैं। देश में न्यायालयों की संख्या बढ़ाने की तुरन्त जरूरत है। यह काम राज्य सरकारों का है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे राजनेता इस तरफ बिलकुल नहीं सोचते। आज तक केवल आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के हाल में हुए आम चुनावों में अदालतों की संख्या बढ़ाने का वादा किया था। बाकी किसी पार्टी ने अदालतों की संख्या बढ़ाने का वायदा करने का साहस नहीं दिखाया। उस का मुख्य कारण है कि जनता स्वयं भी इस मामले में बिलकल सजग नहीं है। देश के चुनाव नजदीक हैं जनता को हर उम्मीदवार से पूछना चाहिए कि वह और उस की पार्टी अदालतों की संख्या बढ़ाने के मामले में क्या सोचती है और उस की घोषणाएँ क्या हैं। इसी तरीके से इस मामले में जागरूकता लाई जा सकती है।

lawसमस्या-
जयपुर, राजस्थान से अभिराम ने पूछा है-

मैं जयपुर के एक निजी विश्वविद्यालय [सुरेश ज्ञान विहार उनिवर्र्सिटी] में  असिस्टेण्ट प्रोफेसर के पद पर पिछले 2 साल से कार्यरत था। मेरे ही साथी  द्वारा गलत अंक अपलोड कर देने के कारण मुझे टर्मिनेट कर दिया क्यों कि यह मेरे विषय का मामला था। अब मेरा पूरे महीने का वेतन 25,500/- रुपये सुरेश ज्ञान विहार यूनिवर्सिटी के चेयरमैन ने रोक रखा है, वह देना नहीं चाहता है। मुझे क्या करना चाहिए?

उत्तर-

प का प्रश्न स्पष्ट नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि आप को सेवा से दुराचरण के आरोप में निष्कासित किया गया है। यह तो आप को दिए गए सेवा समाप्ति आदेश से ही स्पष्ट हो सकता है। यदि दुराचरण के आरोप के कारण आप को सेवा से पृथक किया गया है और किसी तरह की जाँच की गई है या नहीं की गई है तो भी आप सेवा से निष्कासित करने के इस आदेश के विरुद्ध राजस्थान अराजकीय क्षैक्षणिक संस्थाएँ अधिकरण के समक्ष अपने में चुनौती दे सकते हैं।

सी आवेदन में आप आप के बकाया वेतन की वसूली के लिए भी अपनी प्रार्थना सम्मिलित कर सकते हैं। इस के लिए आप को जयपुर में इस अधिकरण के समक्ष पैरवी करने वाले किसी अच्छे वकील से संपर्क करना चाहिए तथा उस की सलाह और मदद से यह आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए।

Supreme Court India
समस्या-
हलद्वानी, उत्तराखण्ड से बीना ने पूछा है-

च्च न्यायालय में प्रस्तुत किसी प्रकरण की सुनवाई में हो रहे अनावश्यक विलम्ब हेतु क्या कहीं शिकायत की जा सकती है? या कार्यवाही शीघ्र करने हेतु कहां अपील करनी चाहिए?

समाधान –

किसी भी उच्च न्यायालय में किसी भी मुकदमे में कोई अनावश्यक देरी नहीं की जाती है। देरी का मुख्य कारण न्यायालय में लम्बित मुकदमों की संख्या है। वास्तव में हमारे न्यायालयों में केवल इतनी संख्या में मुकदमे होने चाहिए कि छह माह से दो वर्ष की अवधि में हर प्रकार के मुकदमे में अन्तिम निर्णय हो जाए। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के पद कम होने तथा जितने पद हैं उतने न्यायाधीश नियुक्त नहीं होने से लम्बित मुकदमों की संख्या बढ़ती जाती है। मुकदमे की ग्रहणार्थ सुनवाई के बाद यदि उस में कोई अन्तरिम राहत का कोई आवेदन नहीं होता या फिर अन्तरिम राहत के प्रार्थना पत्र के निर्णीत कर दिया गया होता है तो उसे क्रमानुसार (ड्यू कोर्स मे) सुनवाई के लिए रख दिया जाता है। इस तरह रखे गए मुकदमों में से प्रति सप्ताह उतने ही सब से पुराने मुकदमे सुनवाई के लिए न्यायालय में रखे जाते हैं जितने मुकदमों का प्रति सप्ताह निर्णय हो जाता है। इस तरह किसी मुकदमे में अनावश्यक देरी नहीं होती।

स देरी को समाप्त करने का यही एक तरीका है कि सर्वोच्च न्यायालाय व उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या पर्याप्त मात्रा में बढ़ाई जाए जिस से जितने मुकदमे प्रति वर्ष न्यायालय में प्रस्तुत होते हैं उन से कम से कम सवाए मुकदमों का निर्णय प्रति सप्ताह किया जा सके और धीरे धीरे मुकदमो की सुनवाई में लगने वाले समय को कम किया जा सके।

सी तरह अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या जरूरत की मात्र 20 प्रतिशत होने के कारण वहाँ मुकदमों के निपटारे में अत्यधिक समय लगता है। वहाँ भी न्यायालयों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए।

र्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या केवल केन्द्र सरकार बढ़ा सकती है क्यों कि उसे बढ़े हुए न्यायाधीशों के खर्च और व्यवस्था के अनुपात में वित्तीय व्यवस्था और करनी पड़ेगी। इस कारण मुकदमों में लगने वाले अधिक समय के लिए केन्द्र सरकार दोषी है। उसी तरह अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या बढ़ाने के लिए राज्य सरकार जिम्मेदार है। वह इस के लिए पर्याप्त वित्तीय व्यवस्था नहीं करती है। सरकारों को केवल मतदाताओं की नाराजगी ही इस काम के लिए बाध्य कर सकती है। लेकिन जब चुनाव होते हैं तो दूसरे रोजमर्रा के मामले अधिक महत्व प्राप्त करते हैं और त्वरित न्याय का मुद्दा सिरे से ही गायब हो जाता है।

हली बार आम आदमी पार्टी यह वायदा कर रही है कि वह इतने न्यायालय खोले जाने के पक्ष में है जिस से जल्दी से जल्दी मुकदमे निपटाए जा सकें। यदि इस पार्टी द्वारा इस मुद्दे को गौण नहीं  किया जाए तो दूसरी पार्टियों को भी यह काम करना होगा। तभी न्याय प्राप्त करने में जो देरी होती है उसे कम किया जा सकेगा।

वैसे यदि किसी मुकदमे में कोई ऐसी बात हो कि उसे तात्कालिक रूप से निपटाए जाने का कोई मजबूत कारण हो तो उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को आवेदन दे कर यह बताया जा सकता है कि उस मुकदमे में तुरन्त सुनवाई की क्या जरूरत है। तब यदि मुख्य न्यायाधीश समझते हैं कि मुकदमे की सुनवाई जल्दी की जानी चाहिए तो वे उस मुकदमे की तत्काल सुनवाई करने का आदेश दे सकते हैं।

पुत्रवधु के पुत्र के प्रति पजेसिव होने का कारण तलाशिए।

December 11, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
widow daughterसमस्या-
भोपाल, मध्य प्रदेश से बाबूलाल ने पूछा है –

मेरे पुत्र का देहांत 3 वर्ष पूर्व बीमारी के कारण हो चुका है। जिस का एक पुत्र भी है। पुत्रवधु की नौकरी अनुकंपा में लग चुकी है। वह अपने पिता के पास परंतु अलग मकान लेकर रह रही है। मेरे पौत्र की उम्र लगभग 6 वर्ष की है। इसका पालन पोषण वह अच्‍छी तरह से कर रही है अपना गुजारा भी कर रही है। परंतु वह हमें पौत्र से मिलने नहीं देती।  मैं या मेरी पत्‍नी जाती है दरवाजा नहीं खेालती है। कभी अचानक हम चले गये तो वह अपने पुत्र के साथ बाहर जाने का कहकर उसे लेकर निकल जाती है। वह उसे बहुत चाहती है परंतु इस के दादा दादी से मिलने नहीं देती। वो भी हमसे मिलने के लिये काफी तरसता है व कभी कभी उसके नानाजी से बोलकर मोबाइल पर मेरी बात हो जाती है। मैं दोनों माता व इसके पुत्र को अलग करना नहीं चाहता हूँ। परतु हम दादा दादी होने के कारण मिलना चाहते हैं।  हमारी आर्थिक स्थिति बहु से कही अधिक अच्‍छी है। वह कभी भी हमसे मदद नहीं लेती। यहाँ तक कि हम देते हैं तो भी वो मना कर देती है। मेरी बहु की उम्र 30 वर्ष करीब है। वह दुबारा विवाह भी नहीं करना चाहती है। परंतु हमें हमारे पोते से मिलने नहीं देती है। कई बार जब विवाद हुआ तो वो यही कहती है कि कोई हम माँ बेटे को अलग नहीं कर सकता है।  क्‍या हम कानूनी या न्‍यायालय की शरण ले सकते हैं?

समाधान-

प ने अपनी पुत्रवधु के इस व्यवहार का कोई कारण तलाशने का प्रयत्न किया? मेरे विचार में नहीं किया। यदि किया होता तो आप उस का उल्लेख यहाँ करते। जिस व्यक्ति से आप अपनी समस्या के लिए उपाय चाहते हैं या जिस व्यक्ति से अपनी बीमारी की चिकित्सा कराना चाहते हैं उस से कुछ भी छुपाना ठीक नहीं है। मेरे विचार में कोई न कोई कारण अवश्य है जिस से आप की पुत्रवधु अपने पुत्र के प्रति पजेसिव हो चुकी है। हो सकता है पति की बीमारी के दौरान कोई गंभीर घटना घटी हो जिस ने आप की पुत्रवधु के मानस को प्रभावित किया हो। हो सकता है ऐसी घटना का आप को अहसास ही न रहा हो। हो सकता है कि उस के देहान्त के बाद वह सोचती रही हो कि आप ने अधिक गंभीर चिकित्सकीय प्रयत्न किए होते तो उस के पति का जीवन बच जाता। पति के देहान्त के बाद उसे आप के परिवार में आप से न सही आप के रिश्तेदारों से अनेक प्रकार की प्रश्न सुनने को मिले हों। कुछ ने कहा हो कि अब बहू का क्या होगा? वह मायके में रहेगी या ससुराल में? विवाह करेगी या नहीं? विवाह कर लेगी तो बच्चे का क्या होगा? तब फिर बच्चा कहाँ रहेगा? बच्चे को दादा दादी के पास ही रखना उत्तम रहेगा? आदि आदि।

ति के देहान्त के उपरान्त पत्नी बहुत संवेदनशील हो जाती है। उस के कान में पहुँचे ये सब प्रश्न और उन पर हुए विचार विमर्श की फुसफुसाहट भी उस के मस्तिष्क में घण्टों की चोट की तरह लगती हैं। उसे यह भय हो गया है कि कहीं उस के पुत्र को उस से अलग न कर दिया जाए या कहीं ऐसा न हो कि केवल अपनी पैतृक संपत्ति के लिए पुत्र उस से अलग न हो जाए। इन आशंकाओं का कोई उत्तर नहीं है।

प अपने पौत्र से स्नेह रखते हैं, अपनी संपन्नता का कोई हिस्सा उसे देना चाहते हैं। आप को सुझाव दे रहा हूँ कि आप की पुत्रवधु और पौत्र किराए के मकान में रहते हैं। यदि आप समर्थ हैं तो पुत्रवधु के पिता के घर के नजदीक अपने पौत्र के नाम एक इतना सा घर जो उन के आवास के लिए पर्याप्त हो अपने पौत्र के नाम से खरीद कर अपनी बहू के आधिपत्य में दे दीजिए। जिस से आप की पुत्रवधु को विश्वास हो कि उस की आशंकाएँ गलत हैं।

कानून में दादा-दादी को यह अधिकार नहीं है कि वे अपने पौत्र की अभिरक्षा उस की माँ के विरुद्ध प्राप्त कर सकें। पौत्र आप से मिलने की इच्छा अवश्य करता होगा। लेकिन यदि अभिरक्षा की बात आएगी तो वह अपनी माँ के पास रहना चाहेगा। वैसी स्थिति में आप उस से मिलने के लिए भी न्यायालय में कोई आवेदन पोषणीय नहीं है। आप के पौत्र के वयस्क हो जाने पर और आप दोनों के वृद्धावस्था के समय अशक्त हो जाने पर यदि कोई निकटतम संबंधी नहीं है तो पौत्र से सहायता प्राप्त करने का आप का अधिकार पुनर्जीवित हो सकता है। इस कारण यदि मेरा सुझाव आप को उचित लगे तो वह कीजिए। हो सकता है कि बिना कानून और न्याय की शरण लिए आप को इच्छित व्यवहार प्राप्त होने लगे।

पिता व भाई दगा करें तो क्या उपाय है?

October 16, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
पति पत्नी और वोसमस्या-
दिल्ली से सुमन दुबे पूछती हैं –

मैं बिहार से हूँ और 2006 से मैं अपने पति के साथ दिल्ली में रहती हूँ। आज से लगभग 3 साल पहले( 2010 में मैं ने अपने पिता को दो लाख रुपये दिया एक लाख मैं ने दिया और एक लाख मैं ने अपने ससुराल से ससुर जी से दिलवाया। लेकिन पिता होने के कारण हम ने उनसे कोई लिखित नहीं लिया। उस के बाद मेरा भाई मेरे पास दिल्ली रहने आया। मेरे पिता ने मुझसे काफ़ी निवेदन किया और हम ने उसे बुला लिया और वह दिल्ली में रह कर ऑटो चलाने लगा। उसके बाद वो ग़लत संगति करना, शराब पीना, मेरे साथ गाली गलोज़ करना दो दो दिन घर से गायब रहना। घर में चोरी करना शुरू कर दिया। ऑटो किराए पर थी, गाड़ी का किराया भी मैं ने अपने गहने गिरवी रख कर दिया और अभी भी गाड़ी वाले का 50000/- रुपये बाकी है। मेरा भाई गाड़ी खड़ी करके भाग गया। आज उसे भागे दो साल  हो चुके हैं।  मेरे भाई और पिता ने मुझे काफ़ी मानसिक और आर्थिक तरीके से मजबूर किया, यहाँ तक कि मैं ने कितनी ही बार आत्म हत्या करने की ठान ली। लेकिन बच्चों के और पति तथा ससुराल वालों के प्यार को देख कर ऐसा नहीं कर पाई। नहीं तो मेरे ससुराल वाले उल्टे ही फँस जाते। लोग कहते हैं कि ससुराल वाले गलत हैं। लेकिन मैं कहती हूँ कि मायके वाले क्या ग़लती नहीं कर सकते? मेरे मायके वालों ने मुझे वो जख्म दिया है जो जीवन भर नहीं भरेगा। मैं अपने ससुराल वालों की बेटी हूँ, बहू नहीं। इतना प्यार मिलता है मुझे। 2012 में मैने अपने पिता को दिए हुए 200000/- रुपये वापस माँगे तो उन्होंने देने से मना करते हुए कहा कि मेरे बेटे ने तुझे कमा कर दे दिया है, अब तेरा कोई रुपया बाकी नहीं है। आज के बाद फ़ोन मत करना।  उस के बाद मैं ने पिता की संपत्ति में बँटवारे का केस डाल दिया। मेरे पिता के पास बिहार में पुश्तैनी घर और 35 बीघा खेती की ज़मीन है। हम तीन बहनें, दो भाई, मेरी दादी है। जब से मैने ये केस जिला न्यायालय में डाला है तब से मेरे भाई और पिता मेरे ससुराल वालों को, मुझे और मेरे पति को डरा-धमका रहे हैं। जान से मारने झूठे केस में फँसाने और किडनैपिंग करने की धमकी देते हैं। मेरे खिलाफ मेरे ससुराल वालों को भड़काते हैं और कहते हैं कि मैं ने आप का रुपया आप की बहू को दे दिया है। अब आप का कोई रुपया बाकी नहीं है। आप सभी लोग जेल जाओगे। मेरे भाई और पिता मेरे ससुराल वालों की और मेरी काफ़ी बेइज्जती करते हैं। मैं ये जानना चाहती हूँ कि क्या मुझे मेरा रुपया ब्याज़ के साथ मिल सकता है और क्या साथ ही पिता की संपत्ति भी मिल सकती है?  कुछ ज़मीनें मेरे दादा जी, दादी जी और पिता जी के नाम पर हैं तथा अभी मेरे पिता व दादी जी जीवित हैं और दादा जी काफ़ी साल पहले गुजर गये। साथ ही क्या मैं अपने मायके वालों पर बेइज्जती के लिए और डराने, धमकाने, के लिए भी दिल्ली में और बिहार में दोनो जगह केस डाल सकती हूँ?  मेरा भाई लोग मुझे गंदी गंदी गालियों का भी इस्तेमाल करता है और बहुत कुछ ऐसी बात कहते हैं जिस का ज़िक्र मैं यहाँ इस में नहीं कर सकती। उम्मीद करती हूँ आप समझ जाएँगे। अब सोचती हूँ की आत्महत्या कर ही लूँ। मेरा भाई यहाँ दिल्ली से हमारे जानने वालों से भी 50000/- रुपये लेकर भाग है दो साल हो गये।  जिससे लिया है वो हमारे ऊपर दबाव बना रहे हैं। अब आप सलाह दें कि क्या करना चाहिए?

समाधान-

प बहुत खुशकिस्मत इंसान हैं। आप को पिता और भाई अच्छे न मिले लेकिन आप को पति और ससुराल वाले अच्छे और भले मिले हैं। आप खुद भी अच्छी और भली हैं, यदि न होतीं तो आप पति और भाई की मदद न करतीं और छल का शिकार नहीं होतीं। लेकिन स्वार्थी और गंदे संबधियों के कारण आत्महत्या की सोचना भी गलत है। यदि आप ऐसा करती हैं तो आप आप से प्यार करने वाले पति, बच्चों और ससुराल के संबंधियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करेंगी। आत्महत्या के बारे में सोचना बिलकुल बंद कर दें। विषम से विषम परिस्थितियों में लड़ना बेहतर होता है, बजाय इस के कि जीवन समाप्त कर लिया जाए।

ब से पहला काम तो आप ये कर सकती हैं कि आप दिल्ली के किसी दैनिक अखबार में सूचना प्रकाशित करवा सकती हैं कि आप के पिता और भाई से आप ने अपने सम्बन्ध उन के व्यवहार के कारण समाप्त कर लिए हैं। जिस से आप के संबंध के आधार पर कोई उन से व्यवहार न करे। जो लोग आप पर भाई का कर्जा चुकाने का दबाव डाल रहे हैं उन्हें साफ कह दें कि आप कुछ नहीं कर सकते। भाई को कर्जा या उधार सामान देते समय आप ने उस की गारन्टी तो नहीं दी थी कि वे आप को तंग करें।

प अपने पिता को दिए गए कर्जे को वसूल नहीं कर सकतीं यदि आप के पास उन्हें कर्ज देने का कोई दस्तावेज सबूत नहीं है। यदि कर्ज का दस्तावेजी सबूत है और कर्ज दिए हुए तीन वर्ष समाप्त नहीं हुए हैं तो आप कर्ज की वसूली के लिए दीवानी वाद दिल्ली के दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत कर सकती हैं।

दि आप की दादा कोई पुश्तैनी जमीन/संपत्ति छोड़ गए हैं और उस का बँटवारा नहीं हुआ है तो आप उस में अपने हिस्से के लिए बिहार में दावा कर सकती हैं। लेकिन इस के लिए आप को उक्त संपत्ति के दस्तावेज दिखा कर बिहार में किसी दीवानी मामलों की वकालत करने वाले वकील से सलाह करनी चाहिए। कृषि भूमि से संबंधित कानून सब राज्यों में भिन्न भिन्न हैं और उन मामलों में राजस्व विभाग के रिकार्ड पर बहुत कुछ निर्भर करता है।

हाँ तक आप के पिता और भाई द्वारा किए गए अपराधिक कृत्यों मारपीट की धमकी देना, गाली गलौज करना आदि के लिए आप जहाँ उन्हों ने ये कृत्य किए हैं पुलिस थाना में रपट लिखा कर कार्यवाही कर सकती हैं या सीधे न्यायालय को शिकायत प्रस्तुत कर के कार्यवाही कर सकती हैं।

लेकिन व्यवहारिक बात ये है कि आप दिल्ली में रहती हैं और आप के पिता व भाई बिहार में। यह सही है कि पिता व भाई ने आप को आर्थिक हानि पहुँचाई है और अपराधिक व्यवहार किया है। उन्हें इस का दंड मिलना चाहिए। लेकिन हमारी न्याय व्यवस्था इतनी सुस्त है कि उस में राहत प्राप्त करने में वर्षों लग जाते हैं। वह इतनी लचीली भी है कि कोई फर्जी रिपोर्ट करा दे या मुकदमा बना दे तो उसे भी प्रारंभिक स्तर पर फर्जी मान कर निरस्त नहीं किया जाता है। आप इस तथ्य पर भी विचार करें कि आप के पिता और भाई भी अपने बचाव में कुछ कार्यवाही कर सकते हैं। बेहतर यही है कि आप अपने पिता व भाई से संबंध विच्छेद करने का विज्ञापन दें और उन्हें उन के हाल पर छोड़ दें। अपने पति, बच्चों व ससुराल के भले और अच्छे लोगों के साथ अपने नए जीवन का आरंभ करें।

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