मानवाधिकार Archive

माता-पिता व वृद्धों के भरण पोषण का कानून

August 3, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

hinduwidowसमस्या-

शीला देवी ने जबलपुर म.प्र. से पूछा है-

मेरी बेटी और दामाद मेरे मकान में कब्जा कर के बैठ गये हैं। ना तो किराया देते हैं ना मकान खाली करते हैं। जब कि मकान मेरे नाम पे है। मेरे पति का देहान्त 1986 में हो गया था। किराए से ही गुजारा चलता था। वो भी ये लोगों ने बन्द कर दिया। मेरा बेटा हैदराबाद में रहता है।

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि आप के बेटी दामाद ने किस तरह आप के मकान में कब्जा किया है? क्या वे किराएदार के बतौर मकान में रहे थे? क्या उन का किरायानामा लिखा गया था। क्या उन्हों ने कभी किराया दिया और आप ने रसीद दी, क्या किसी रसीद पर आप की बेटी या दामाद के हस्ताक्षर हैं? इन तथ्यों के बिना सही उपाय बताया जाना संभव नहीं है। यदि आप दस्तावेजी रूप से यह साबित करने में सक्षम हों कि वे किराएदार की हैसियत से वहाँ निवास कर रहे थे तो आप न्यायालय में उन के विरुद्ध बकाया किराया और बेदखली के लिए वाद प्रस्तुत कर सकती हैं।

यदि ऐसा नहीं है तो आप माता पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण अधिनियम 2007 तथा उस के अंतर्गत बने मध्यप्रदेश के नियम 2009 के अन्तर्गत अपनी बेटी-दामाद तथा पुत्र के विरुद्ध भरण पोषण के लिए आवेदन इस अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप जिला न्यायालय परिसर में स्थापित विधिक सहायता केन्द्र में स्थापित कानूनी समस्या क्लिनिक से भी सहायता प्राप्त कर सकती हैं।

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सब को अपने तरीके से जीने का अधिकार है।

July 11, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_rapevictim.jpgसमस्या-

धर्मपाल ने बुधना, तहसील नारनौद, जिला हिसार हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

मेरा छोटा भाई परमपाल हिसार जिला कारागार में धारा 302 में बन्द है भाई की घर वाली मेरे पास रहती है। कुछ समय से उस के कुछ लोगों से गलत संबंध हैं। विरोध करने पर कानूनी कार्यवाही की धमकी देती है और जान से मारने की धमकी देती है। पुलिस वाले भी उस की बात मानते हैं। उस का एक तीन साल का बच्चा है वह उस की भी केयर नहीं करती है। हमें उस औरत से जान माल का खतरा है। मैं उस से बात करता हूँ तो वह कहती है कि वह मुझे झूठे केस में सजा करवा देगी। मुझे कोई उपाय बताएँ।

समाधान-

प की समस्या मात्र इतनी है कि आप अपने छोटे भाई की पत्नी की धमकी से डर गए हैं। आप को लगता है कि वह पुलिस को झूठी रिपोर्ट करवा कर आप को फँसा देगी। आप को इस डर से निकलने की जरूरत है। डर से तो बहुत सी चीजें खराब हो जाती हैं।

प के भाई की पत्नी की स्थितियों को भी आप को देखना चाहिए। उस का पति जेल में बन्द है उसे अपने पति की अनुपस्थिति में अपने बच्चे का पालन पोषण जैसे भी करना है कर रही है। यह उस का निजी जीवन है जिसे वह अपने तरीके से अपने हिसाब से जी रही है। उसे जीने दें। आप ने यह नहीं बताया कि उस के किसी भी तरीके से जीने से आप को क्या फर्क पड़ रहा है। यदि आप को किसी तरह का नुकसान उस के आचरण से पड़ रहा हो तो आप को शिकायत हो सकती है। यदि आप ने बताया होता कि आप को क्या नुकसान हो रहा है तो हम आप को सुझाव दे सकते थे कि आप को क्या करना चाहिए।

पुलिस को आप क्या शिकायत करेंगे? यही न कि उस औरत के अनेक लोगों से नाजायज संबंध हैं। लेकिन यदि कोई औरत अपने पति के सिवा किसी अन्य से संबंध रखती है तो केवल और केवल उस औरत का पति शिकायत कर सकता है। अन्य कोई नहीं। इस कारण पुलिस को उस के निजी जीवन में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। आप पुलिस में शिकायत करेंगे भी तो पुलिस के पास ऐसा कोई कारण नहीं है जिस से वह उस के विरुद्ध कार्यवाही कर सके।

दि वह औरत आप के किसी अधिकार को नुकसान पहुँचा रही हो तो आप उस के विरुद्ध दीवानी कार्यवाही कर सकते हैं और वह कोई अपराध कर रही हो तो पुलिस को शिकायत कर सकते हैं। पुलिस वाले न सुनें तो पुलिस अधीक्षक को शिकायत की जा सकती है और आगे भी न्यायालय को सीधे परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है। लेकिन यदि उस की जीवन शैली से आप के किसी अधिकार पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा और वह कोई अपराध भी नहीं कर रही है तो आप कुछ भी नहीं कर सकते।

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Market dictatorshipसमस्या-

टीकम सिंह परिहार ने जोधपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी कंपनी पिछले 1 साल से वेतन का भुगतान समय पर नहीं कर रही है। हर महीने 14 से 20 तारीख को कर रही है। एक साल पहले 7 तारीख तक भुगतान कर दिया जाता था। कुल 250 से 300 कर्मचारी है PF, ESI, सही है। पर वेतन समय पर मिले इस के लिए क्या करें?

समाधान-

जिन उद्योगों में 1000 से कम कर्मचारी हैं उन में अगले माह की 7 तारीख तक तथा जहाँ 1000 या अधिक कर्मचारी हैं उन में कर्मचारियों को 10 तारीख तक वेतन का भुगतान कर दिया जाना चाहिए। इस के बाद किया गया भुगतान देरी से किया गया भुगतान है। जिस में प्रत्येक कर्मचारी को हर बार 25 रुपया जुर्माना दिलाया जा सकता है। लेकिन उस के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में मुकदमा करना पड़ेगा। यदि आप अकेले मुकदमा करेंगे तो प्रबंधन आप को किसी भी तरह से नौकरी से निकाल देगा। इस कारण यह लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती है। इसे लड़ने के लिए सारे उद्योग के श्रमिकों को एक जुट होना पड़ेगा।

कुछ साल पहले तक यह श्रम विभाग की जिम्मेदारी थी कि वह नियोजक से समय पर वेतन दिलाए। यदि समय पर वेतन का भुगतान नहीं होता था तो श्रम विभाग के निरीक्षक उस नियोजक के विरुद्ध श्रमिकों की ओर से वेतन भुगतान प्राधिकारी के यहाँ मुकदमा करते थे। लेकिन अब सरकारों ने श्रमिकों की ओर से मुकदमा करना बन्द कर दिया है। सरकारों का मानना है कि वेतन समय पर दिलाना सरकारों का नहीं बल्कि कानून और अदालत का काम है। यदि समय पर वेतन चाहिए तो मजदूर खुद मुकदमा करे। मुकदमा करने के लिए काम से गैर हाजिर हो, नुकसान उठाए। इस तरह वह मुकदमा करेगा ही नहीं और उद्योगपति अपनी मनमर्जी चलाते रहेंगे। यही मौजूदा भाजपा और पिछली कांग्रेस सरकार का सत्य है। वे मालिकों के लिए बनी हैं और उन के लिए ही काम करेंगी। श्रम विभाग में अफसर नहीं हैं। तीन चार अदालतों को एक अफसर चलाता है। फैसले बरसों तक नहीं होते। श्रम न्यायालय भी जरूरत के अनुसार नहीं हैं। जिस से 30-35 साल पुराने मुकदमे भी अभी तक लंबित पड़े हैं।

दि कोई उद्योग एक माह देरी से वेतन देता है तो उस की उपेक्षा की जा सकती है लेकिन साल भर से यही हो रहा है तो सरकार को खुद उस पर मुकदमा चलाना चाहिए और मजदूरें को देरी के एक एक दिन का ब्याज 12% की दर से पैनल्टी के साथ दिलाना चाहिए। वैसे भी मजदूर रोज काम करता है और कमाता है। उस कमाई को एक माह से अधिक समय तक अपने पास रख कर उद्योगपति मुनाफा कमाता है। उस का कोई हिसाब नहीं होता। ब्रिटेन में वेतन इसी कारण हर सप्ताह भुगतान किया जाता है जिस से मजदूर की मजदूरी का पैसा मालिक के पास अधिक दिन न रहे और मालिक अनुचित लाभ न उठाए।

ब हर उद्योग के मजदूर को संगठित होना पड़ेगा। केवल एक उद्योग के मजदूर को नहीं अलग अलग उद्योगों के मजदूरों को भी आपस में संगठित होना पड़ेगा। अब उन की लड़ाई केवल सामुहिक सौदेबाजी या अदालत की नहीं रह गयी है। क्यों कि इन दोनों तरह की लड़ाइयों को सरकार मालिकों के पक्ष में तब्दील कर देती है। इस तरह हमारे देश की व्यवस्था भी जनतांत्रिक नहीं रह गयी है। वह कहने को जनतांत्रिक है लेकिन चरित्र में वह पूंजीपतियों-भूस्वामी वर्गों की शेष जनता पर तानाशाही है।

ब मजदूरों की समस्याओं का इस देश में एक ही इलाज रह गया है कि मजदूर एक वर्ग के रूप में राजनैतिक रूप से संगठित हों और वर्तमान सत्ता को पलट कर अपनी वर्गीय सत्ता स्थापित करें। तभी पूंजीपतियों और भूस्वामियों और उन के दोस्त विदेशी पूंजीपतियों की इस तानाशाही को धराशाही किया जा कर जनता का जनतंत्र स्थापित किया जा सकता है।

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मानवाधिकार आयोग को आवेदन दस्तावेजों के साथ करें।

January 16, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

कानूनी सलाहसमस्या-

पवन जैन ने बारोसी बाजार, जिला कटिहार, बिहार से समस्या भेजी है कि-

माज द्वारा असामाजिक बताते हुवे अनाधिकृत रूप से बहिष्कृत करने के कारण न्याय हेतु कई पदाधिकारियों को आवेदन भेजा था और स्थानीय थाना और अनुमंडल पदाधिकारियों को भी न्याय हेतु गुहार लगाई। लेकिन अनुमंडल पदाधिकारी ने जाँच हेतु स्थानीय थाना को आवेदन भेज दिया लेकिन स्थानीय थाना ने अभी तक इस पर कोई FIR दर्ज नहीं की और अभी तक कोई अनुसन्धान नहीं किया है। सूचना का अधिकार से पता चला कि अभी अनुसन्धान अंतर्गत है। अनुसन्धान के बाद अग्रतर कार्रवाई की जायगी लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसे गंभीरता से लेते हुवे मामला दर्ज किया जिस का फाइल नंबर 4549/4/16/2014 है राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की वेब साइट (http://nhrc.nic.in/) पर स्टेटस देखा तो पता चला कि( The complaint is addressed to other authority with only copy sent to this Commission. The authority is expected to take appropriate action in this matter. Hence, no action is called for. File.) मेरी समझ से उनके द्वारा कहा गया है कि आपने किसी और विभाग में आवेदन दिया है उसकी कॉपी ही हमें दी है। इसलिए हम कोई कार्यवाही नहीं कर सकते क्या मैं पुनः राष्ट्रीय मानवाधिकार के समछ आवेदन देकर उनसे ही न्याय की गुहार लगाऊ जानकारी देने की कृपा करे और क्या इस संबंध में मानवाधिकार आयोग संज्ञान लेगा? मुझे जल्द सुझाव देने की कृपा करे ताकि में जल्द आवेदन पुनः भेज सकूँ।

समाधान-

प ने बिलकुल ठीक समझा है। आप ने मानवाधिकार आयोग को कोई शिकायत भेजी ही नहीं है। केवल अन्य अधिकारी को जो शिकायत भेजी है उस की प्रतिलिपि भेजी है। इस कारण आप की डाक वहाँ जरूर दर्ज है लेकिन शिकायत न होने से कोई कार्यवाही नहीं की गई है।

प को चाहिए कि आप घटना के सम्बन्ध में एक शिकायत सिर्फ मानवाधिकार आयोग को प्रेषित करें और साथ में घटना को प्रमाणित करने वाले जो भी दस्तावेज हों वे भी संलग्न करें। आप की शिकायत पहुँचने पर उसे दर्ज कर आगे कार्यवाही की जा सकती है।

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domestic-violenceसमस्या-

सौरभ ने प्रतापगढ़, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी २०१० में देवास म.प्र. में हुई। १७/०८/२०१४ को मेरी पत्नी अपने माय के गई। वहाँ फोन पर मेरे और मेरे ससुर के बीच पत्नी को समय पर न भेजने को लेकर बहस हो गई। अब वो लोग पत्नी को भेज नहीं रहे है। उन्हों ने मेरे खिलाफ मारपीट का केस कर दिया है। मैं ने भी धारा – ९ एवं महिला आयोग में आवेदन कर दिया है। वो लोग मुझे मारने की एवं धारा ४८९ एवं अन्य केस करने की धमकी दे रहे हैं। मैं अपनी पत्नी को लाने एवं कानूनी बचाव के लिये और क्या कर सकता हूँ।

समाधान-

में तो यह समझ नहीं आ रहा है कि आप के और आप के ससुर जी के बीच आप की पत्नी को समय पर न भेजने के बारे में बहस क्यों हो गयी? लगता है आप अपनी पत्नी को और आप के ससुर अपनी बेटी को एक स्वतंत्र इन्सान ही नहीं समझते। लगता है आप अभी भी अतीत में जी रहे हैं। कानून बदल चुका है, जमाना भी धीरे धीरे बदल रहा है। अब स्त्रियाँ पिता, पति और पुत्र की संपत्ति नहीं रह गई हैं। कम से कम कानून के समक्ष तो नहीं। उन की अपनी इच्छाएँ भी कोई मायने रखती हैं। उन्हें भी अधिकार है कि वे जब जहाँ चाहें रहें। आखिर आप का घर कोई जेलखाना तो नहीं जहाँ से आप की पत्नी मायके पैरोल पर गई हो।

प की पत्नी आप की इच्छा के अनुसार समय पर नहीं आई थी तो आप को उस से सीधे बात करनी चाहिए थी कि क्या कारण है कि उसे अधिक रुकना पड़ा? कारण जानने के बाद आप को कहना चाहिए था कि यदि वजह वाजिब है तो कुछ दिन और रुक लो पर यहाँ भी उस के बिना काम खराब हो रहा है। यदि उस का मन होता तो आ जाती। लेकिन नहीं यहाँ आप पत्नी को अपनी सम्पत्ति समझते हैं, तो उधर ससुर जी समझते हैं कि उस संपत्ति पर उन का भी कुछ अधिकार है। दोनों ऐसे लड़ पड़े जैसे दो भाई अपनी पुश्तैनी जायदाद में अधिक हिस्सा हथियाने के लिए लड़ते हैं।

जैसे संपत्ति के मामले में एक दूसरे के विरुद्ध असली और फर्जी दोनों तरह के फौजदारी मुकदमे किए जाते हैं वैसे ही आप ने भी एक दूसरे के विरुद्ध मुकदमे कर दिए हैं। क्या फर्क पड़ता है। दो-चार या दस-बीस साल तक लड़ने के बाद दोनों समझ जाएंगे कि जिस के लिए लड़ रहे थे वह वाकई कोई सम्पत्ति नहीं थी अपितु एक जीता जागता इंसान थी।

प को समस्या का हल निकालना है तो सब से पहले आप पत्नी को इंसान समझिए। उस की इच्छा और जरूरतों को समझिए। फिर उस से बात करिए। जरूरत पड़े तो ससुर को भी समझाइए कि उन की बेटी किसी की सम्पत्ति नहीं है, उस की इच्छा के अनुसार उसे जीने दीजिए। कैसे भी हो, अपनी पत्नी से बातचीत का अवसर निकालिए, उसे विश्वास दिलाइये कि आप उसे संपत्ति नहीं बल्कि अपनी ही तरह इन्सान समझते हैं और उस के अधिकार भी वैसे ही हैं जैसे आप के हैं। उसे विश्वास हो गया तो सारी मुसीबतें और मुकदमे खत्म हो जाएंगे। पत्नी भी घर आ जाएगी और मुकदमे भी खत्म हो जाएंगे।

र्ना दस-बीस साल अदालत में चक्कर लगाने के बाद अपने आप सब को समझ आ जाएगा और समस्या का भी कोई न कोई हल निकल ही आयेगा। पर युद्ध के बाद दोनों पक्षों के पास घायलों और घावों की संख्या बहुत अधिक होती है।

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माता-पिता का संतानों से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार

November 20, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

courtroomसमस्या-

हरीश बोहरा ने जोधपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी ने 1947 में एक मकान खरीदा। हम 2 भाई 1 बहन हैं। माताजी जनवरी 1983 में और पिताजी जून 1983 में गुजर गये। हम तीनों के अलावा और कोई वारिस नहीं है सो तीनो ने 1/3,1/3,1/3 हिस्सा ले लिया। मेरे बड़े भाई के 2 लड़के 1 लड़की है। उन का बड़ा लड़का लव मेरिज कर के उन से अलग दूसरे शहर में रहता है। भाई को हार्ट की बीमारी है वो बिस्तर पर ही रहते हैं। घर का पूरा खर्चा छोटा भतीजा चलाता है। बड़ा कुछ भी नहीं देता है उल्टा बोलना-चालना और आना-जाना भी बंद है। अब वो धमकिया देता है कि उस का उस के दादा की प्रॉपर्टी में हिस्सा है सो मेरा हिस्सा दो नहीं तो कोर्ट में जाऊंगा। भाई साहब और भी परेशान रहते हैं। कृपया बताएँ कि क्या भतीजे का क़ानूनी हक़ बनता है? अगर बनता है तो कितना और कैसे? भतीजा अपने मा-बाप की कोई भी मदद नहीं करता है तो उसका क्या अधिकार है या फिर उस से भरण-पोषण प्रप्त किया जा सकता है?

समाधान-

जिस मकान को आप के पिता ने खरीदा था वह उन की निजी संपत्ति थी। उन का देहान्त जून 1983 में हुआ तब तक आप की माँ का देहान्त हो चुका था। इस तरह उन के आप आप का भाई व बहिन तीन ही उत्तराधिकारी हुए। तीनों ने मकान को बाँट लिया। यह बँटवारा कानून के अनुसार हुआ इस में कोई त्रुटि नहीं है।

17 जून 1956 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम पारित होने के बाद से पिता से उत्तराधिकार में पुत्र को प्राप्त संपत्ति में उस के जीवन काल में किसी भी और व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं है। इस तरह आप के भाई के पुत्रों व पुत्री का उक्त संपत्ति में उन के जीवनकाल में कोई अधिकार नहीं है। आप के भाई चाहें तो मकान के बँटवारे में प्राप्त हिस्से को विक्रय कर सकते हैं, दान कर सकते हैं या फिर किसी एक या अधिक व्यक्तियों के नाम से वसीयत कर सकते हैं। लेकिन यदि वे विक्य, दान या वसीयत नहीं करते हैं तो उन के जीवनकाल के उपरान्त उन के हिस्से के मकान में उन के उत्तराधिकारियों उन की पत्नी, दोनों पुत्रों और एक पुत्री का समान अर्थात ¼ हिस्सा होगा। तब भाई के बड़े लड़के को अधिकार प्राप्त हो सकता है। वर्तमान में उस का उस संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है।

माता पिता के असहाय होने पर अर्थात स्वयं का भरण पोषण करने में असमर्थ होने पर अपने पुत्रों व पुत्री से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार है। यदि आप के भाई व भाभी की स्थिति ऐसी ही है तो वे अपने पुत्र पुत्रियों में से उन के विरुद्ध जो कमाते हैं भरण पोषण राशि प्राप्त करने के लिए धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। यह पुत्र का कर्तव्य है यदि वह इस कर्तव्य को पूरा करता है तब भी उसे यह अधिकार नहीं है कि वह अपने पिता को उस की संपत्ति को वसीयत, दान या विक्रय करने से रोक सके।

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घरेलू हिंसा मामले में संरक्षा अधिकारी के कर्तव्य …

November 18, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

sexual-assault1समस्या-

राहुल ने कानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

जिला प्रोबेशन ऑफीसर के यहाँ घरेलु हिंसा के अन्तर्गत दिया गया प्रार्थना पत्र तथा पति पत्नी से पूछताछ में पूछे गए सवाल के जवाब को जो वह नोट करता है उसे क्या कहते हैं? तथा उन जवाबों क्या महत्व है? क्या प्रोबेशन अधिकारी के यहाँ से अदालत जाने से पहले सेक्शन 9 दाखिल कर देने से 498-ए तथा अन्य में धराओं में राहत मिल सकती है। जिला प्रोबेशन अधिकारी द्वारा भेदभाव की शिकायत किस से की जा सकती है? क्या एक महीने में एक डेट में ही प्रोबेशन अधिकारी न्यायालय को स्थानांतरित कर सकता है।

समाधान-

हिलाओँ का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम में किसी प्रोबेशन अधिकारी का उल्लेख नहीं है। इस अधिनियम में प्रोटेक्शन / संरक्षा अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान है। ऐसे संरक्षा अधिकारी का कार्य किसी भी महिला के साथ घरेलू हिंसा के मामले की रिपोर्ट बना कर मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत करना तथा उस की प्रतियाँ उस थाना क्षेत्र के भारसाधक अधिकारी को व क्षेत्र के सेवा प्रदाताओं को देना है। संरक्षा अधिकारी  घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला की ओर से आवेदन भी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। संरक्षा अधिकारी द्वारा जो जवाब पूछे जाते हैं उन्हें उस व्यक्ति के बयान के रूप में घरेलू हिंसा की घटना की रिपोर्ट के साथ संलग्न किया जाता है। इन बयानों और घटना रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय प्रथम दृष्टया कोई राहत हिंसा की शिकार महिला को प्रदान कर सकता है।

संरक्षा  अधिकारी का कार्य हि्ंसा से पीड़ित महिला को विधिक सेवा प्राधिकरण से मिलने वाली सहायता उपलब्ध कराना,  पीडित महिला को संरक्षण गृह उपलब्ध कराना , आवश्यक होने पर पीड़िता की चिकित्सकीय जाँच करवाना, मौद्रिक अनुतोष की अनुपालना करवाना तथा घरेलू हिंसा के मामले में न्यायालय की मदद करना है।

धारा-9 का आवेदन प्रस्तुत करने का तात्पर्य मात्र इतना है कि उस से यह स्पष्ट होगा कि आप तो स्वयं ही पत्नी को रखने को तैयार है। इस से अधिक कुछ नहीं। प्रत्येक मामले का निर्णय उस मामले में साक्ष्य द्वारा प्रमाणित तथ्यों पर निर्भर करेगा।

प का अन्तिम प्रश्न समझ से बाहर है। आप किस चीज के स्थानान्तरण की बात कर रहे हैं यह लिखना शायद भूल गए। लेकिन संरक्षा अधिकारी कभी भी न्यायालय को आवेदन या घटना रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकता है।

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ओवरटाइम मांगने पर धमकी, क्या करें?

November 9, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
trade unionसमस्या-
सौरभ कुमार ने भागलपुर, मायागंज, बिहार से समस्या भेजी है कि
मैं भागलपुर डेयरी, भागलपुर  में जूनियर टेक्नीशियन के पद पर काम करता हुँ ! मुझे १ साल से अतिकाय भुगतान नहीं मिला है। आवेदन कई बार दे चुका हूँ कोई सुनवाई नहीं होती है। शाखा प्रभारी को कहने पर नौकरी से निकालने, प्रमोशन रोकने जैसी धंमकी मिलती है। बताएँ मैे क्या कर सकता हूँ?

समाधान-

वरटाइम काम करने पर दुगनी दर से मजदूरी प्राप्त करना कामगार का कानूनी अधिकार है। जो सीधे सीधे एक दिन में 8 घंटे से अधिक काम न लिए जाने के अधिकार के साथ जुड़ा है। कानून बन जाने के बाद भी कोई भी नियोजक चाहे वह बड़ा पूंजीपति हो या छोटा, कोई सहकारी संस्था हो या फिर सरकारी, अर्धसरकारी संस्था, इस अधिकार को नहीं देना चाहती। वह ओवरटाइम काम कराती है, जब कामगार उस की मजदूरी मांगता है तो उसे इस तरह की धमकियाँ देती है।

नौकरी से गैर कानूनी तरीके से नहीं निकाला जा सकता। लेकिन यदि निकाल दिया जाए तो कामगार क्या करे? वह केवल मुकदमा कर सकता है। मुकदमा भी केवल श्रम न्यायालय के माध्यम से कर सकता है। श्रम न्यायालय जरूरत से इतने कम हैं कि कई मुकदमे 30 सालों से भी अधिक समय से वहाँ लंबित हैं। पूरा जीवन मुकदमा लड़ने में गुजर जाता है और अदालत फैसला नहीं देती।  दे भी दे तो आगे उच्च न्यायालय है, उच्चतम न्यायालय है। नियोजक कुछ भी कर लेंगे लेकिन कामगार को उस का कानूनी अधिकार न देंगे। यही इस युग का सच है। यह पूंजी का युग है, उस की तूती बोलती है, इस पूंजी का निर्माण श्रम से होता है, लेकिन श्रम करने वाला पूंजी पर कब्जा जमाए पूंजीपतियों के सामने लाचार, बेबस है।

15-20 वर्ष पूर्व तक अदालतें गैर कानूनी तरीके से नौकरी से निकाले कामगार को उस के पिछले पूरे वेतन समेत नौकरी पर लेने का फैसला देती थी। धीरे धीरे यह पूरा वेतन 3/4, 1/2, 1/4 तक हो गया और अब 1/5 तक पहुँच चुका है। मुकदमे के निर्णय में देरी अदालत के पास काम की अधिकता के कारण होती है लेकिन अब अदालत मानती है कि देरी हो जाने से कामगार का फिर से नौकरी पर जाने का अधिकार खत्म हो गया है। उसे मुआवजा दिलाया जा सकता है। यह मुआवजा 10-20-40-50 ह्जार तक हो सकता है। किसी किसी मामले में लाख तक हो जाता है। न्याय इतना मंहगा हो गया है कि इतना पैसा मुकदमा लड़ने, वकील को देने और आने जाने में खर्च हो जाता है।

कुल मिला कर हालात ऐसे बना दिेए गए हैं कि कामगार सिर्फ और सिर्फ नियोजक की शर्तों पर काम करे, खटता रहे। वर्ना नौकरी करने की बात न सोचे। इन हालात के लिए किसे जिम्मेदार कहा जाए? वास्तव  में इस के लिये खुद श्रमजीवी वर्ग जिम्मेदार है। उस के पास सिर्फ एक ताकत होती है, वह होती है एकता और उस के बल पर संघर्ष। उस ने इस ताकत को खो दिया है। इसी कारण पूंजी ने सारी सत्ता हथिया ली है श्रमजीवी और कामगार उन के सामने मजबूर हैं।

मित्र, मैं ने वास्तविक हालत यहाँ बताए हैं। लेकिन इस का अर्थ ये तो नहीं कि आप न्याय के लिए लड़ना छोड़ दें। आप नहीं लड़ेंगे तो हालात और बदतर होते जाएंगे। अब श्रमजीवी वर्ग के लिए कानूनी और व्यक्तिगत लड़ाई का वक्त नहीं रहा है। अब श्रमजीवी वर्ग  के पास संगठित होने और अपनी खुद की राजनीति को मजबूत कर राज्य पर अपना वर्गीय आधिपत्य स्थापित करने के  सिवा कोई मार्ग इस देश में शेष नहीं बचा है। आप इसे अभी समझना चाहें तो अभी समझ लें। न समझना चाहें तो न समझें। देर सबेर आप को परिस्थितियाँ यह सब समझा देंगी।

आप को अपने अधिकारों के लिए लड़ना तो होगा। नौकरी से निकाले जाने और प्रमोशन न होने के खतरों को दर किनार कर के लड़ना होगा। आप के आस पास मजदूरों की जो भी मजबूत यूनियन हो उस से संपर्क करें। उन की मदद से श्रम विभाग को शिकायत करें कि आप को ओवरटाइम मजदूरी नहीं दी जा रही है और नौकरी से निकालने, प्रमोशन रोकने की धमकी दी जा रही है। ओवर टाइम मजदूरी जो नहीं दी जा रही है उस के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में आवेदन प्रस्तुत करें। यदि आप इन परिणामों से डरते हैं तो कुछ न करें। एक मध्यकालीन गुलाम की तरह जीने के लिए तैयार रहें।

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young widowसमस्या-

श्रीमती ललिता कुँवर ने कैमूर भाबुआ बिहार से पूछा है-

 

मेरे दो वयस्क और विवाहित पुत्र हैं, मैं विधवा हूँ। मेरे दोनों पुत्रों के नाम से एक मकान है उस के अलावा किसी के नाम से कोई संपत्ति नहीं है। अब दोनों बेटे कहते हैं कि तुम इस मकान से निकल जाओ। उस मकान में मुझे हिस्सा मिल सकता है या नहीं?

 

समाधान-

प उस मकान में निवास कर रही हैं। मकान पुत्रों के नाम है इस कारण से आप उन से मकान के किसी हिस्से को आप के स्वामित्व में देने की मांग तो नहीं कर सकतीं। लेकिन यदि पुत्र आप को उस मकान से निकलने को कहते हैं या आप को परेशान करते हैं तो आप महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम की धारा 12 के अन्तर्गत आप आवेदन कर सकती हैं।इस आवेदन में आप अपने पुत्रों से आप के भरण पोषण के लिए मासिक खर्चे की मांग कर सकती हैं, मकान में निवास के लिए उपयुक्त परिसर दिलाए जाने की मांग कर सकती हैं तथा यह आदेश भी पारित करा सकती हैं कि आप के पुत्र आप के विरुद्ध किसी तरह की हिंसा न करें।

स आवेदन में आप अन्तरिम रूप से यह राहत मांग सकती हैं कि आप को उस घर से न निकाला जाए और जो हिस्सा आप के कब्जे में है उस से बेदखल न किया जाए।

 

 

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कानून, अदालत और पुलिस दमन का औजार बन कर रह गए हैं।

July 10, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
Rape victimसमस्या

पटना, बिहार से प्रदीप कुमार ने पूछा है-

मेरी शादी जुलाई 2010 में हुई थी, पत्नी से मेरा रिश्ता बहुत अच्छा है।  शादी के 1 साल बाद मुझे मेरी दूर की साली (वो बहुत गरीब है) ने मुझे बताया कि मेरा सगा साला और उसका दूर का मौसेरा भाई उसका मोबाइल नम्बर अपने दोस्तो को दे कर उसे परेशान करता है।  इस मामले में जब मैं ने अपने साले से इस बारे में बात की तो वह शर्मिन्दा होने के जगह बोला कि वो मेरी दुश्मन है,  मैं उसे बरबाद कर दूँगा।  मैं ने अपने ससुर से भी बात की।  पर कोई हल नहीं निकला।  मैं ने अपनी साली से बहुत पूछा तो बोली कि मैं ने भैया से पापा की नौकरी लगवा देने की बात की थी, तब से परेशान कर रहे हैं।  मुझे उसके परिवार पर दया आ गयी।  मैं ने उसके पिता की नौकरी लगवा दी तथा उसे आगे पढ़ने की सलाह दी।  मेरी सलाह मान कर वो होस्टल में रह कर पढ़ने लगी।  जब यह बात मेरे ससुराल वालों को पता चली तो हमारे सम्बन्ध खराब होने लगे।  तब मेरे साले के दोस्त ने मुझे बताया कि मेरे साले और उस लड़की के बीच हमारी शादी के दिन से अवैध सम्बन्ध था। मेरे बीच में आने के कारण मेरा साला अपने घर वालों के कान भरता है।  जब मैं ने अपनी साली से पुछा तो उस ने सारी बातें सच बता दी उसने बताया कि मेरी शादी के दिन उसका बलात्कार हुआ और लोक लाज के कारण वह ये बात किसी को नही बता सकी।  उस के बाद मेरा साला माफ़ी मांगने के बहाने उस के पास फिर आया और शादी कर लेने की बात कर साल भर तक सम्बन्ध बनाता रहा, जब उस का मन भर गया तो अपने दोस्तो के साथ भी वही सब करने का दबाब देने लगा। अपने दोस्तों को उसका मोबाइल नम्बर दे देता था।  ये सब बात जब मैं ने अपने साले से पूछा तो वह भड़क गया।  तब मैं ने अपनी पत्नी को सारी बातें बताई।  मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि मेरे साले के अवैध सम्बन्ध मेरी पत्नी,  एक और रिस्ते की बहन, एक पड़ौस की लड़की से भी रह चुका था।

ब मैं ने तय किया कि मैं उसे सजा दिला कर रहूँगा।  उस समय मेरी पत्नी ने भी मेरा साथ देने का वादा किया। मैं ने ये बात उन दोनों के परिवार को साथ बिठा कर उन के सामने रखी।  पर कोई बात नहीं बनी।  मेरे ससुर लड़की के माँ बाप को जान से मार देने की धमकी देने लगे तथा लड़की के सगे मामा जो कि एक दलित के नाम पर गलत तरीके से नौकरी कर रहे है को नौकरी से निकलवा देने की धमकी दे कर मेरी पीड़ित साली की पढ़ाई बन्द करवा कर उसे घर में कैद करवा दिया। उसकी शादी की बात चलने लगी।  वो मुझसे एक दो बार मदद के लिये बोली भी।  पर मैं उस समय उसकी मदद करने मे असमर्थ था।  लड़की के माँ बाप भी उसके धमकी के कारण मेरे ससुर की बात मान रहे थे।  उस समय मेरी पत्नी ने अपने पिता का बहुत विरोध किया और अपनी बहन को हमारे पास बुला कर रख लिया।  यहाँ तक बोली कि मैं इसे जिन्दगी भर अपने साथ रखूंगी।  कुछ दिन बाद मेरी पत्नी गर्भवती हो गयी और मेरे घर वालों के दबाब के कारण अपने मायके चली गयी। एक दिन मेरी साली का फोन आया कि उसकी शादी तय हो गयी है और वो जान दे देगी पर ये शादी नहीं करेगी।  मेरे समझ में नही आ रहा था कि मैं उसकी मदद कैसे करुँ।  तब मैं ने उसे बोला कि तुम घर छोड़ कर आ जाओ, मैं तुम्हारा रहने और पढने की व्यवस्था राँची के होस्टल में करवा देता हूँ। वह आ गयी, पर वह कहाँ है? इसका पता मेरे ससुर को चल गया वह डर कर होस्टल छोड़ कर मेरे पास आ गई।  अब मैं समझ नहीं पा रहा था कि रात को उसे कहाँ रखूँ और मैं कहाँ रहूँ।  होटल जाते तो वहाँ उसका परिचय पत्र मांगा जाता।  पर वह सारा समान होस्टल में छोड़ कर आई थी।  दो दिन हमे अपनी गाड़ी में बिताना पडा।  तब मैं ने अपनी साली को शादी का सारा समान खरीद कर दिया और उसे अपनी पत्नी बता कर होटल में उस के साथ कुछ दिन रहा।  उसी समय हमारे बीच सम्बन्ध भी बन गये। (मेरी पत्नी को इस रिश्ते में कोई आपत्ति नहीं थी) उसके बाद मैं ने उसे अपनी पत्नी के रूप में साली का दूसरे होस्टल में दाखिला करवा दिया। तब  मेरे ससुर ने लड़की के पिता पर दबाब बना कर मुझ पर अपहरण का मुकदमा करवा दिया और मुझे साली को उस के घर पहुँचाना पड़ा।

मेरी पत्नी अभी अपने मायके में है और अपने माँ बाप के दबाब में पिछली सारी बातों से इन्कार करती है।  वो अब कहती है कि हम को पता है कि आप हमको नहीं रखेंगे। मेरे बच्चा नहीं था तो आप को बोला था कि मैं उसको (साली) को साथ रखूंगी पर अब तो मेरा खुद का बच्चा है, अब मैं उसको नहीं रखूंगी।  अगर आप उसकी मदद करेंगे तो आप पर दहेज और मार पीट का एफ़आइआर कर दूंगी।  फोन पर वो सारी पुरानी बातें स्वीकार करती है। लेकिन मैं जानता हूँ कि वह अदालत में  मुकर जायेगी।  मैं ने फोन पर होने वाली सारी बातें रिकोर्ड कर ली हैं। मेरी साली घर में है और उसके माँ बाप तक उसका साथ नहीं दे रहे हैं।  मैं उससे कहता हूँ कि मदद के लिये पुलिस के पास जाओ, तो कहती है कि माँ पिताजी ने बोला है कि अगर उस ने कुछ किया तो अब मैं जिन्दगी भर के लिये रिश्ता खतम कर लूंगा।  मैं ने उसे यहाँ तक कहा है कि तुम्हारा सारा खर्च मैं दूंगा, जिस ने तुम्हारी जिन्दगी बरबाद की है, उसे सजा दिलाओ।  मैं तुम्हारे साथ हूँ तो कहती है अब दीदी भी साथ नहीं दे रही है।  आप मेरा फ़िक्र छोड़ दीजिये जब तक ठीक-ठाक चलता है देखते हैं।  नहीं तो फिर आत्मह्त्या कर लूंगी।  मेरे कारण आप क्यों मुसीबत ले रहे हैं? अगर आप के कहने पर मैं सब से लड़ भी लूंगी तो दीदी आप पर एफ़आइआर कर देगी तो आप को जेल हो जायेगी तब मैं अपना खर्च कहाँ से लाउँगी? फिर भी मुझे आत्महत्या करनी पड़ेगी।  आप की भी जिन्दगी ख्रराब हो जायेगी।  आप कानून में रह कर मुझ से शादी कर के ले जाइयेगा तभी आप के साथ जा सकती हूँ ताकि फिर हमें कोई परेशान न करे।

मैं अपनी पत्नी को तलाक नहीं देना चाहता हूँ। अगर मैं तलाक दे दूँगा तो उसकी जिन्दगी खराब हो जायेगी और हमारे यहाँ तलाक के बाद लड़की की शादी बहुत मुश्किल से होती है और मेरी पत्नी तो दिमागी रुप से कमजोर है।  मुझे पता है कि मेरी पत्नी मेरे साथ रहने लगेगी तो वो फिर से मेरे पक्ष में हो जायेगी।  उसे लगता है कि मैं उसे अब नहीं रखना चाहता।  क्योंकि जब से वो मायके गयी है। बहुत बार उस ने मुझे बुलाया है पर मैं अपने ससुर से खराब रिश्ते की वजह से कभी नहीं गया।  मेरे ससुर कहते हैं कि जब तक वे मेरी साली की शादी नहीं करा देंगे मेरी पत्नी को मेरे यहाँ आने नहीं देंगे।  मेरी साली समाज में इतना बदनाम हो गयी है कि उसकी शादी अगर होगी भी तो कोई मजबूरी में ही करेगा जिस से उसकी जिन्दगी बर्बाद हो जायेगी। वह कहती है कि मैं आपको अपना पति मान चुकी हूँ।  मैं जिन्दगी भर आपके नाम के सहारे अकेले जी लूंगी और अगर जबर्दस्ती मेरी शादी करवाई जायेगी तो आत्महत्या कर लूंगी।  मैं चाहता हूँ कि मेरी साली को पढ़ने का अवसर मिले, जिस से वह अपने पैरों पर खड़ी हो कर अपनी जिन्दगी का सही फ़ैसला ले सके और मेरे साले को सजा दिला सके। उसके बाद भी उसे यह लगे कि वो मेरे साथ खुश रहेगी मैं उसे भी रखने को तैयार हूँ।  पर कानून मुझे दूसरी शादी का इजाजत नहीं देता। मेरा साला जिस ने न जाने कितनी जिन्दगियाँ बर्बाद की हैं विजयी मुस्कान के साथ घूम रहा है।  उसे इस बात का तनिक भी अफसोस नहीं है।  मुझे समझ में नही आता कि मैं क्या करुँ,? क्या करना उचित रहेगा? हमेशा मैं परेशान रहता हूँ।

समाधान-

हुत जटिल समस्या है आप की। यह केवल आप की समस्या न हो कर पूरी तरह एक सामाजिक समस्या बन चुकी है। एक तरफ आप के ससुर का परिवार है जो सम्पन्न है और अपनी संपन्नता के बल पर कुछ भी कर सकता है। फर्जी मुकदमे खड़े कर के लोगों को परेशान कर सकता है और अपने विरुद्ध लगाए गए मुकदमों में अपना बचाव कर सकता है, यहाँ तक कि गवाहों को भी अन्यान्य तरीकों से प्रभावित कर सकता है। दूसरी तरफ आप की रिश्ते की साली का परिवार है जो विपन्न है, जिसे जीवन जीने के लिए कुछ भी करना पड़ता है। अपने और अपने परिवार के सदस्यों के साथ हुए हर अन्याय को सहना पड़ता है। विपन्न लोग अपने जीवन यापन का मामूली स्थाई समाधान प्राप्त करने के चक्कर में गैरकानूनी रूप से नौकरी हासिल करने का काम भी कर सकते हैं, इस काम को करने के समय उन्हें यह भय भी नहीं होता कि नौकरी चली जाएगी या फिर फर्जीवाड़े के कारण उन्हें सजा भी हो सकती है। लेकिन एक बार नौकरी मिल जाए तो उसे बचाने को कुछ भी कर सकते हैं। उन के लिए अपना, पत्नी और बच्चों का सम्मान वगैरा सब थोथी चीजें हैं, वे सिर्फ और सिर्फ अपने जीवन को बनाए रखने के लिए ही संघर्ष करते रहते हैं।

न दो परिवारों में से एक परिवार के पुरुष ने दूसरे परिवार की लड़की और अन्य भी अनेक लड़कियों के साथ बलात्कार किए और अपनी संपन्नता के बल पर उन्हें छिपाए रख कर समाज में सम्मान बनाए हुए हैं। वे अपनी संपन्नता के साधनों और अपने मिथ्या सम्मान को बनाए रखने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। ये दोनों तरह के परिवार अपने तरीके से जी रहे हैं। एक अपनी संपन्नता और मिथ्या सम्मान को बनाए हुए और दूसरा अपने जीवन के लिए कड़ा संघर्ष करते हुए। कानून और नैतिकता का दोनों के लिए बस इतना अर्थ है कि जब भी उन में से किसी का अपने साध्य के लिए उपयोग किया जा सके कर लो, वर्ना ये दोनों व्यर्थ हैं।

न दो तरह के परिवारों में से जो संपन्न परिवार था उस की बेटी के साथ विवाह कर के आप उस के दामाद हो गए। इस विवाह का स्वाभाविक परिणाम यह होना चाहिए था कि आप अपने ससुराल के सदस्यों के सभी नैतिक अनैतिक, कानूनी और गैर कानूनी कामों में उन के साथ खड़े हों। यदि आप उन के विरुद्ध खड़े होंगे तो वे अपनी संपन्नता और मिथ्या सम्मान को बचाए रखने के लिए आप के विरुद्ध भी खड़े होंगे। क्यों कि उन की यह सामाजिक स्थिति ही उन के लिए सब से प्रमुख है, शेष सभी बातें बिलकुल गौण हैं।

मारे समाज में कुछ आत्मनिर्भर स्वतंत्र स्त्रियों को छोड़ कर सभी स्त्रियाँ परतंत्रता का जीवन व्यतीत करती हैं। आप की पत्नी भी उन में से एक है। समाज के मूल्य ऐसे हैं कि किसी स्त्री को जबरन बलात्कार का शिकार बनाया जाए तो वही बरबाद होती है, बलात्कारियों का कुछ नहीं बिगड़ता, वे बने रहते हैं। अधिकांश स्त्रियाँ अपने बचपन या किशोरावस्था में ही अपने ही परिजनों के इस बलात्कर्म का शिकार होती हैं और अत्याचारों को बनाए रखने के लिए अस्तित्व में लाए गए स्त्री के कौमार्य और सतीत्व के बेढ़ब सामाजिक मूल्यों की कंदराओं में कैद स्त्रियों के पास यह सब अत्याचार सहने के अलावा कोई मार्ग नहीं होता। वे इसे ही अपनी नियति के रूप में स्वीकार कर लेती हैं, और इसी तरह जीती रहती हैं। वे इस स्थिति से जरा भी विचलित होती हैं तो समाज उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता। आप की पत्नी के साथ उस के ही भाई ने यह अत्याचार किया और फिर रिश्ते की बहिन के साथ भी और अन्य कुछ और स्त्रियों के साथ भी।

ह सारी स्थिति चलती रहती, यदि आप को आप के रिश्ते की साली ने अपनी व्यथा न बताई होती। आप के ससुराल का परिवार, विशेष रूप से आप का साला और ससुर इस मामले में आप का दखल पसंद नहीं था। किसी भी विवाद की स्थिति में उन की सामान्य अपेक्षा यही है कि आप अपने साले और ससुर के साथ खड़े हों चाहे वे कितने ही गलत हों। (हमारे सामाजिक मूल्य यही कहते हैं) इस आप के ससुराल के पुरुषों ने जो भी संतुलन बनाया हुआ था उस में आप की बात से खलल पड़ गया। आप ने रिश्ते की साली के पिता की मदद की उन्हें रोजगार दिला दिया और रिश्ते की साली की पढ़ाई की व्यवस्था कर दी। वहीं से आप के साले और ससुर आप के विरुद्ध हो गए। उन्हें यह खतरा लगने लगा कि लड़की और उस के पिता का जीवन जैसे ही कुछ स्थिर होगा। वे उन के काले कारनामों के लिए उन्हें कानून के सामने खड़ा कर सकते हैं जिस से उन का ताश का महल गिर सकता है। उन्हों ने उस लड़की और उस के पिता को डराना धमकाना आरंभ कर दिया और लड़की और उस के पिता ने जो इन धमकियों का सामना नहीं कर सकते थे हथियार डाल दिए। आप की पत्नी जो स्वयं पीड़ित थी उस ने आप का साथ देना पसंद किया लेकिन किसी बहाने से आप के ससुर उसे अपने कब्जे में ले गए। जहाँ पहुँच कर वही हुआ जो होना था। एक बंदी स्त्री तो केवल उसी का साथ दे सकती है जिस के वह कब्जे में हो।

जो लड़की अनेक बार बलात्कार का शिकार हो चुकी हो। उस के लिए देह की पवित्रता का क्या अर्थ रह जाता है। यह बात आप की पत्नी और रिश्ते की साली के लिए पूरी तरह सच है। आप ने उस का साथ दिया। उस उपकार का आभार प्रकट करने के लिए आप की साली के पास उस की देह आप को समर्पित करने के अलावा कुछ भी नहीं था। परिस्थितियों ने आप को साथ कर दिया और आप के संबंध बन गए। आप की पत्नी को भी इस में क्या आपत्ति हो सकती थी? वह भी तब जब कि वह स्वीकार कर चुकी हो कि वह विवाह के पहले अपने ही भाई के अत्याचार से अपना कौमार्य खो बैठी है। लेकिन जैसे ही वह अपने पिता और भाई के संरक्षण (कब्जे) में गई उस के स्वर बदल गए। आप समझ सकते हैं कि हमारे समाज में स्त्री का अपना कोई स्वर नहीं होता। उस का स्वर उसी पुरुष का स्वर होता है जिस के वह कब्जे में होती है।

न सारी परिस्थितियों में आप अपने ही साले को उस के अपराधों के लिए दंडित कराना चाहते हैं। एक तो उस के अपराध इतने पुराने हो चुके हैं कि उन के सबूत तक नहीं मिलेंगे। दूसरे आप यदि इस कामं को हाथ में लेते हैं तो आप का साला और ससुर हाथ धो कर आप के पीछे पड़ जाएंगे। वे इस काम के लिए कानून का भी इस्तेमाल करेंगे। पलड़ा उन के पक्ष में इसलिए है कि आप की पत्नी आप के पास न हो कर अपने मायके में भाई और पिता के कब्जे में है। आप के रिश्ते की साली इन परिस्थितियों को अच्छी तरह समझती है। इसी लिए उस ने यह शर्त रखी है कि वह आप के साथ केवल वैध विवाह में ही साथ रहने को तैयार है अन्यथा नहीं। क्यों कि उस का सर्वस्व आप के अस्तित्व पर निर्भर करता है और वह नहीं चाहती कि इस लड़ाई में आप को कोई नुकसान पहुँचे। क्योंकि आप का नुकसान उस का बहुत बड़ा नुकसान है। आप को तो सिर्फ नुकसान होगा, जब कि उस का तो सब से बड़ा सहारा छिन जाएगा।

सारी समस्या की कुंजी इस बात में है कि किसी तरह आप की पत्नी आप के ससुर और साले के कब्जे से निकल कर आप के पास आए।  लेकिन आप के ससुर व साले ने इस के लिए यह शर्त रखी है कि पहले आप के रिश्ते की साली का विवाह हो जाए। यदि ऐसा विवाह हो जाता है तो वह केवल फर्जी विवाह होगा और आप के व आप की रिश्ते की साली के मार्ग में एक स्थाई बाधा और खड़ी हो जाएगी।

किसी भी तरह यदि आप आप की रिश्ते की साली का विवाह कराए बिना अपनी पत्नी और बच्चे को अपने ससुराल से निकाल कर अपने पास ला सकते हैं तो फिर पत्नी आप के साथ होगी और संतुलन आप के पक्ष में हो जाएगा। तब आप इस लड़ाई को आगे लड़ सकते हैं। इस के बिना आप के ऊपर कभी खत्न न होने वाली कानूनी कार्यवाहियों, गिरफ्तारी जमानत आदि की तलवार लटकी रहेगी। फिर आप सारी लड़ाई को भूल कर अपने बचाव में लग जाएंगे। आप अपनी पत्नी को इस तरह उस के मायके से निकाल कर अपने पास कैसे लाएंगे यह आप ही तय कर सकते हैं। यदि आप ऐसा कर सकें तो आगे का मार्ग खुल सकता है।

क मार्ग और है। यदि आप की पत्नी आप के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवाती है तो गिरफ्तारी केवल 498 ए तथा 406 आईपीसी के मामलों में हो सकती है। आप इस गिरफ्तारी से बचने की या गिरफ्तारी के बाद एक दो सप्ताह में जमानत पर छूटने की व्यवस्था स्थानीय रूप से बना लें तथा अपनी पत्नी और बच्चे के लिए साल दो साल बाद न्यायालय द्वारा दिलाए जाने वाले निर्वाह भत्ते की राशि देने का साहस कर लें तो एक बार गिरफ्तार हो कर जमानत पर छूटने के बाद इस लड़ाई को आगे ले जा सकते हैं।

क तीसरा मार्ग यह है कि किसी तरह अपनी रिश्ते की साली का विवाह करा दें और पत्नी व बच्चे को ला कर अपने साथ रखें और साली व उस के परिवार को उन के हाल पर छोड़ दें। पर यह भी न होने वाला है क्यों कि साली इस के लिए तैयार नहीं है।

प के तीनों में से एक मार्ग चुनना है। यह आप के ऊपर है कि आप क्या चुनते हैं। लेकिन इतना समझ लें कि कानून, अदालत और पुलिस दमन का औजार बन कर रह गए हैं। उन का उपयोग आप अत्याचारियों को सजा दिलाने के लिए कर सकते हैं तो आप का साला और ससुर भी उन का उपयोग आप के और आप की रिश्ते की साली व उस के परिवार के दमन के लिए कर सकते हैं। परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन इन औजारों का उपयोग करने में बाजी मार ले जाएगा।  इस तरह की समस्याओं का अंत तो समाज में मूल्यों में परिवर्तन से ही संभव है जो अभी बहुत दूर दिखाई पड़ता है।

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