मानवाधिकार Archive

पुलिस तथा प्रशासन केवल समर्थों की मदद करते हैं

November 11, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
समस्या-

सीहोर, मध्यप्रदेश से देवेन्द्र चौहान से पूछा है-

मैं ने हनमत से 2009 में पंजीकृत वि‍क्रय पत्र से जमीन खरीदी तथा वि‍क्रेता से जमीन का कब्‍जा भी ले लि‍या, नामान्तरण भी हो गया।  चूंकि भूमि सडक के कि‍नारे थी तो कई लोगों का हि‍त था।  वे सभी लोग जमीन बेचने के लि‍ए दबाब बनाने के लि‍ए कि‍सी न कि‍सी प्रकार का विवाद रोज करने लगेा।  वे सभी लोग गांव के सम्‍पन्‍न तथा राजनीतिक दखल वाले व्‍यक्ति हैं।  फसल मेरे द्वारा बोई गर्इ।  काटते समय वि‍वाद कि‍या।  मैं थाने गया, धारा 145 का प्रकरण बनाया।  पुलि‍स तथा पटवारी की मि‍ली भगत से कब्‍जा उनका लि‍ख गया और फसल प्रति‍वादी को देने का फैसला कि‍या।  एसडीएम द्वारा मुझे ही सलाह दी गई कि धारा 250 भू राजस्‍व अधिनियम के तहत कब्‍जा लो।  तहसीलदार ने मौके पर कब्‍जा दि‍लाया। मैं ने आदेश 39 नियम 1, 2 सिविल प्रक्रिया संहिता का दीवानी वाद दायर कि‍या कि मेरे आधि‍पत्‍य में हस्‍ताक्षेप न करे।  पुलिस तथा प्रशासन कि‍सी प्रकार की मदद नहीं करता।  मामला अदालत में है।  थाने में कोई सुनवाई नहीं करते हैं। राजस्‍व का मामला है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

मारे देश में कहा तो यह जाता है कि कानून का राज है।  लेकिन अदालतें केवल आदेश और निर्णय करती हैं। उन की पालना पुलिस और सामान्य प्रशासन द्वारा ही संभव है। यदि पुलिस और सामान्य प्रशासन न्यायालयों के आदेशों का पालन न करें तो किसी भी व्यक्ति के लिए अपनी संपत्ति बचाना दुष्कर हो जाता है।  देश में सामान्य प्रशासन और पुलिस दोनों ही पूंजीपतियों, व्यापारियों और जमींदारों के पक्ष में काम करते हैं। संविधान और कानून प्रदत्त अधिकार इन के सामने निरीह साबित होते हैं। इस स्थिति को केवल तब बदला जा सकता है जब कि श्रमजीवियों और किसानों के मजबूत जनतांत्रिक संगठन मौजूद हों और वे राजनीति को प्रभावित करने की स्थिति में आ जाएँ।  लेकिन यह स्थिति अभी नहीं है।

फिर भी नागरिकों को अपने अधिकारों के लिए लड़ाई को नहीं छोड़ना चाहिए। आप ने अब तक जो कानूनी कार्यवाही की है वह बिलकुल सही की है। इसी रास्ते से आप को राहत मिल सकती है।  आप ने जो मुकदमा आदेश 39 नियम 1, 2 सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत किया है उस में निषेधाज्ञा जारी करानी चाहिए। इस के बाद पुलिस के लिए आप के कब्जे में दखल करने वालों के विरुद्ध कार्यवाही कर सकना कठिन होगा। इस के अतिरिक्त आप को स्थानीय जन संगठन जो कि मानवाधिकारों और नागरिकों के सिविल अधिकारों के लिए काम करते हैं उन का भी साथ प्राप्त करना चाहिए। जब आप के साथ कोई संगठन खड़ा होगा तो आप के विरुद्ध खड़े लोग भी आसानी से आप के कब्जे में हस्तक्षेप करने से डरेंगे। इस के अतिरिक्त आप अपने विरुद्ध होने वाली प्रत्येक घटना को मीडिया तक अवश्य पहुँचाएँ। मीडिया ने यदि आप के मामले में सचाई को सब के सामने रखना आरंभ किया तो भी आप का पक्ष मजबूत होगा। पुलिस प्रशासन केवल समर्थों की मदद करती है। आप जैसे लोगों के अपने मजबूत जनतांत्रिक संगठन हों तो पुलिस और सामान्य प्रशासन को कानून की पालना करने पर मजबूर होना होगा।

समस्या-

ठाणे, महाराष्ट्र से गुड्डू यादव ने पूछा है –

मुझे एक वरिष्ठ पुलिस उपनिरीक्षक द्वारा फँसाया और मारा व पीटा गया है।  रात 9 बजे की घटना है,  मेरे घर के नजदीक पुलिस स्टेशन है, वहाँ पर रात्रि को रामलीला हो रही थी।  मैं अपने दोस्त के साथ घर आ रहा था, रास्ते में पुलिस स्टेशन आया तब वहाँ पर रामलीला चल रही थी और बहुत भीड़ थी।  उसी समय मेरे दोस्त ने जोर से चिल्लाकर कह दिया कि “जागते रहो” इतने में वहाँ ड्यूटी पर उपस्थित वरिष्ठ पुलिस उप निरीक्षक ने सुन लिया।  उस समय उन्होंने कुछ भी नहीं किया।  जब हम लोग वहाँ से कुछ दूर चले गए तो पुलिस साहेब ने कुछ कांस्टेबल को भेजकर मुझे और मेरे दोस्त को बुलाया और पुलिस स्टेशन में अन्दर ले जाकर मारने लगे।  वे कह रहे थे कि पुलिस वालों का मजाक उड़ाते हो और कहते हो “जागते रहो”।  हम ने कहा कि हम लोगों ने आपको देखकर नहीं कहा था, तो उन्हें और गुस्सा आ गया।   फिर तो वे डंडे और लात (पैर) से मारने लगे।  कुछ समय के बाद वे हमें पुलिस हेड ऑफिस में ले गये,  ले जाते समय पुलिस गाड़ी में 3 स्टार पुलिस अधिकारी  भैया और यू पी वाला कहकर हमें गाली देने लगा।  कह रहा था कि तुम्हारे नाम पर ऐसी शिकायत (एफ.आइ.आर.) दर्ज करेंगे कि कहीं तुम भैया लोगों को नौकरी भी नहीं मिलेगी।  तुम लोग चरित्र सर्टिफिकेट के लिए यहाँ आओगे तब देख लेंगे, कैसे मिलता है?  यह सब कहकर और माँ-बहन की अश्लील गालियाँ देकर महिला पुलिस के सामने मजाक उडाते रहे और हमें डराते रहे।  इसके बाद जब हमें पुलिस स्टेशन ले गए तो रात के 1:30 बजे तक हमारे खिलाफ कोई शिकायत नहीं लिखी और हमें लॉकअप में बंद करके रखा।  जब हमारे परिवार वाले वहाँ पहुँचे तो उनके साथ बड़े कठोर बर्ताव किया।  कह रहे थे कि सालों को कहीं नौकरी भी नहीं मिलेगी।  अंतत: रात को 2:00 बजे मुझे और मेरे दोस्त को 1250-1250 रुपये का दंड वसूल कर के छोड़ दिए और उसकी रसीद भी दी।  परन्तु मेरा कहना यह है कि हमने उस वरिष्ठ अधिकारी को देखकर ऐसा कुछ नहीं कहा।  हमने माफी भी मांगी, पर अधिकारी सुनने को तैयार नहीं थे।  उन्होंने हमारे खिलाफ धारा 112/117 के अंतर्गत शिकायत दर्ज करके छोड़ दिया है और कोर्ट में जाने के लिए कहा है।

1) मैं आप से ये जानना चाहता हूँ कि मैं ऐसे वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ अपनी शिकायत कहाँ और कैसे दर्ज कराऊँ?  उसका प्रारूप क्या होगा? जैसा कि वरिष्ठ अधिकारी को “जागते रहो” बात से चिढ़ आ गयी थी, जिसका मतलब है कि वो अपने ड्यूटी पर सो रहे थे और हमने उनके सोने पर मजाक उड़ाया है।  अतः मुझे ये बताइए कि क्या “जागते रहो” एक गाली है?  या पुलिस वालों के लिए अपमान जनक (सूचक) शब्द है?  यदि ऐसा नहीं है तो कल भविष्य में इन्कलाब जिंदाबाद¡  वन्दे मातरम¡ और भारत माता की जय¡ जैसे स्लोगन कहने पर भी पुलिस स्टेशन जाना पड़ेगा?

2)मुझे कोर्ट में हाजिर होना है अतः मुझे ये बताइए कि क्या मैं इस शब्द को लेकर अपना गुनाह कबूल करूँ या मैं उस अधिकारी के खिलाफ शिकायत दर्ज करुँ?

3) उस अधिकारी ने मुझे पुलिस स्टेशन में लातों से मारा है मुझे अपमानित किया।  क्या मैं इसके साथ अपनी मानहानि का दावा बिना किसी वकील के कर सकता हूँ?

4) क्या मुझे अपने बचाव के लिए सरकारी वकील मिल सकता है?

5) क्या लात से मारना हमारे मानव अधिकार की अवहेलना नहीं है? यदि है तो क्या इसकी शिकायत मानवाधिकार आयोग को की जा सकती है?

6) क्या वरिष्ठ अधिकारी माँ-बहन की कठोर गाली देकर अपमानित करे तो उसे सहन कर लेना चाहिये?

7)पुलिस द्वारा झूठे मामले में फँसाने की धमकी देने के बारे में कैसे और कहाँ शिकायत दर्ज करानी चाहिये?

8) क्या मैं बचाव के लिए पुलिस स्टेशन में लगे सीसीटीवी  कैमरे की फुटेज सूचना के अधिकार के अंतर्गत ले सकता हूँ?

समाधान-

प के साथ जो व्यवहार पुलिस ने किया है वह केवल निन्दनीय तो है ही। इस मामले में लिप्त पुलिस कर्मियों के विरुद्ध कार्यवाही भी होनी चाहिए।  किसी भी पुलिस अधिकारी को किसी नागरिक के साथ इस तरह का व्यवहार करना उचित ही नहीं अपराधिक भी है। लेकिन आप ने जो विवरण दिया है उस में कुछ बातें समझ नहीं आई हैं। आप पर धारा 112/117 बोम्बे पुलिस अधिनियम का आरोप लगाया गया है। इस मे मात्र जुर्माने का प्रावधान है जो आप से वसूल लिया गया है। इस के बाद भी आप को पुलिस ने अदालत में किस बात के लिए उपस्थित होने को कहा है? यह स्पष्ट नहीं हुआ है। हाँ आप से जुर्माना वसूल किया है उसे आप गलत मानते हैं तो आप उस के विरुद्ध न्यायालय में जा सकते हैं। आप के प्रश्नों के उत्तर निम्न प्रकार हैं-

1. आप पुलिस अधिकारी के विरुद्ध इलाके के पुलिस सुपरिण्टेंडेंट को या आई.जी. पुलिस को शिकायत कर सकते हैं। इसे आप रजिस्टर्ड डाक से भेज दें। घटना की जाँच होगी।

2. आप को अदालत में गुनाह कबूल करने की आवश्यकता नहीं है।  जब आप ने कुछ नहीं किया है तो आप को उस का प्रतिवाद करना चाहिए। न्यायालय जो भी आदेश दे यदि उसे गलत समझें तो आगे अपील करें।

3. यह मानहानि का नहीं अपमानित करने और मारपीट करने का मामला है। इस मामले में आप को न्यायालय में व्यक्तिगत परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

4.यदि आप की आमदनी कम है तो आप अपने जिला न्यायालय में स्थित विधिक सहायता केंद्र में निशुल्क वकील उपलब्ध कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

5. आप मानवाधिकार आयोग को शिकायत कर सकते हैं।

6. बिलकुल सहन नहीं करना चाहिए, प्रतिरोध करना चाहिए। किन्तु पुलिस पूरी व्यवस्था का एक अंग है। उस का प्रतिरोध अकेले नहीं किया जाना चाहिए। यह वैसा ही है जैसे एक बड़े गिरोह से एक साहसी व्यक्ति अकेला टकरा जाए। आप को व्यवस्था से सदैव ही समूह बद्ध हो कर मुकाबला करना चाहिए। आप को इस मामले में अपने क्षेत्र के सिविल राइट्स के लिए काम करने वाले जन संगठनों के साथ जुड़ना चाहिेए और उन के माध्यम से प्रतिवाद करना चाहिए।

7. इस प्रश्न का उत्तर पहले प्रश्न के साथ दिया जा चुका है।

8. पुलिस स्टेशन के सीसीटीवी कैमरे में कुछ नहीं मिलेगा। कैमरा उस समय बंद रहा होगा। पुलिस वाले मूर्ख नहीं हैं जो आप के साथ सीसीटीवी कैमरे के सामने मारपीट और अभद्र व्यवहार करेंगे। सीसीटीवी कैमरे में कुछ दर्ज हुआ भी होगा तो उसे हटा दिया गया होगा। फिर भी इस के लिए आप सूचना के अधिकार के अंतर्गत सूचना अधिकारी, कार्यालय एसपी, पुलिस को आवेदन कर सकते हैं।

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