मुस्लिम विधि Archive

समस्या-

विवाहित हिन्दू स्त्री का इस्लाम धर्म अपनाने के बाद क्या उसके पहले पति से विवाह रहता है या टूट जाता है, वह दूसरी शादी के लिए तलाक ले या नहीं?

-सुलेमान,  तहसील नोहर जिला हनुमानगढ़ राज्य राजस्थान

समाधान-

को भी हिन्दू स्त्री-पुरुष जब एक बार हिन्दू विधि से विवाह कर लेते हैं तो वे दोनों उस विवाह में तब तक रहते हैं जब तक कि उस विवाह के विच्छेद की डिक्री पारित नहीं कर दी जाती है। यदि उन में से कोई भी धर्म परिवर्तन कर लेता है तब भी यह विवाह बना रहता है, वे साथ साथ रह सकते हैं।।  किन्तु धर्म परिवर्तन से धर्म परिवर्तन करने वाले के पति या पत्नी को यह अधिकार उत्पन्न हो जाता है कि वह धर्म परिवर्तन के आधार पर अपने साथी से विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सके और वह  हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13(ii) में विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कर सकता है और साथी के धर्म परिवर्तन के आधार पर उसे विवाह विच्छेद की डिक्री पारित हो सकती है। तब वह दूसार विवाह कर सकता/ सकती है।

यदि आप का प्रश्न यह है कि किसी स्त्त्री द्वारा इस्लाम ग्रहण कर लेने के बाद उसे दूसरा विवाह करने के लिए अपने पूर्व पति से तलाक लेना जरूरी तो नहीं? तो उस का उत्तर यह है कि उसे विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करा कर अपने पूर्व पति से  विवाह विच्छेद करना होगा। इस्लाम धर्म के अनुसार भी एक स्त्री एक विवाह में रहते हुए निकाह नहीं कर सकती। उसे पहले पूर्व विवाह से तलाक लेना पड़ेगा और फिर इद्दत की अवधि भी व्यतीत करनी होगी। इस मामले में हिन्दू स्त्री को धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम हो जाने के बाद भी अपने हिन्दू पति से हिन्दू विधि से विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करनी होगी। डिक्री पारित होने के उपरान्त इद्दत की अवधि गुजर जाने पर ही वह इस्लामी शरीयत के अनुसार निकाह कर सकती है।

 

समस्या-

मैंने अपने पति इरशाद अली  पर भरण पोषण का मुकदमा किया था, जिसका फैसला 1 दिसम्बर 2017 को मेरे पक्ष में हुआ। मेरे लिये 5000 और दोनों बेटो के लिये 2500, 2500 रुपये का प्रतिमाह का खर्चा निश्चित किया गया। परंतु उस के दूसरे दिन मेरे पति और उनकी बहन ने मुझे वापस ससुराल ले जाने के लिये ज़ोर देने शुरू कर दिया और सामाजिक दबाव के चलते मुझे वापस ससुराल आना पड़ा।  मुझे बताये बिना मेरे पति ने न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील लगायी है, परंतु न तो वो खुद किसी तारीख पर गये न मुझे जाने दिया। मुझे मेरे मायके भी नहीं जाने देते,  न ही किसी को मुझसे मिलने देते हैं, मुझे मारते पीटते हैं, मेरी सास मुझे और मेरे बच्चों को खाने का सामान भी नहीं देती है। कई बार मेरे पति गैस का सिलेंडर निकाल कर कमरे में बंद कर देते हैं। मेरी सास राशन के कमरे में ताला लगा कर रखती हैं, मेरे पति मुझे तलाक भी नहीं देना चाहते और दूसरा विवाह करना चाहते हैं। 2 बार जब मेरे पति ने मुझे बुरी तरह मारा पीटा तब मैंने महिला हेल्प लाइन को 181 पर कॉल की थी उन लोगो ने केवल समझौता करा दिया। लेकिन उसके बाद से मेरे सास और पति ने मेरे कमरे का बिजली का कनेक्शन काट दिया ताकि मैं मोबाइल चार्ज न कर पाऊँ।  मेरा मायका ससुराल से 360 किलोमीटर दूर है, मैं अपनी सास के घर में नही रहना चाहती। मेरी इच्छा है कि मैं किसी किराये के कमरे में अपने दहेज़ का सामान ले आऊं और जो खर्च न्यायालय द्वारा मुझे मिलना तय हुआ था वो मै यहाँ अपने ससुराल के क्षेत्र के न्यायालय से प्राप्त कर सकूँ। क्या यह कानूनी रूप से सम्भव है? यदि हां तो इसके लिये मुझे क्या करना होगा?

– जूही, मुसाफिरखाना, अमेठी, उत्तर प्रदेश

समाधान-

धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में जो मेंटीनेंस का आदेश हुआ है उस के अनुसार आप के पति को आप को प्रतिमाह गुजारा भत्ता देना चाहिए। वे नहीं दे रहे हैं तो आप धारा 125(3) के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं जिस में गुजारा भत्ता ने देने के लिए हर माह आप के पति को जैल भेजा जा सकता है। लेकिन यह आवेदन मजिस्ट्रेट के उसी न्यायालय में प्रस्तुत करना पड़ेगा जिस ने उक्त धारा 125 का आदेश प्रदान किया था।

आप अलग निवास स्थान चाहती हैं जिस का खर्चा आप का पति दे और आप को धारा 125 के अंतर्गत जो आदेश हुआ है उस के मुताबिक आप को अपने और बच्चों के लिए मुआवजा मिल सके। इस के लिए आप को महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा-12 के अंतर्गत स्थानीय (जहाँ आप के पति का निवास है और आप रह रही हैं) न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना होगा।

इस परिवाद में आप सारी परिस्थितियों का वर्णन कर सकती हैं। कि किस तरह धारा 125 का गुजारे भत्ते का आदेश हो जाने पर आप को धोखा दे कर आप के पति ले आए और उस के बाद आप के साथ लगातार हिंसा का व्यवहार हो रहा है। परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि आप अपने पति के साथ या ससुराल वालों के साथ नहीं रह सकतीं। इस लिए पति को आदेश दिया जाए कि वह आप के लिए अलग आवास व्यवस्था करे और आप के व बच्चों के लिए प्रतिमाह गुजारा भत्ता दे। इस के साथ ही पति व उस के ससुराल वालों को पाबंद किया जाए कि वे आप के प्रति किसी तरह की हिंसा न करें और आप से दूर ही रहें। इस के लिए आप को किसी स्थानीय वकील से मिलना होगा जो इस तरह का आवेदन कर सके।

समस्या-

जमीला खातून ने सीतापुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति ने एक जमीन 1998 में खरीदी थी। मेरे पति की मृत्यु हो गयी। उन से मेरी चार लड़कियाँ हैं। मेरा और मेरी लड़कियों का जमीन में कितना कितना हिस्सा होगा। मेरे देवर जो मेरे पति के सगे भाई हैं उन का क्या हक है, जब कि वह जमीन उन की पुश्तैनी नहीं है यह जमीन मेरे पति ने अकेले ही खरीदी थी। कृपया मुस्लिम ला के मुताबिक पूरी जानकारी दें।

समाधान-

मुस्लिम व्यक्तिगत विधि में पुश्तैनी जमीन जैसा कोई सिद्धान्त नहीं है और कोई संपत्ति पुश्तैनी नहीं होती। जो भी संपत्ति होती है वह व्यक्तिगत होती है हाँ यदि किसी मृतक व्यक्ति की संपत्ति का बंटवारा न हो और किसी उत्तराधिकारी की पहले ही मृत्यु हो जाए तो वैसी संपत्ति में मृतक का हित बना रहता है और वह उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाता है। इस तरह आप के पति की जमीन चाहे उन्हों ने खुद खरीदी हो या पूर्वजों से प्राप्त हुई है वह व्यक्तिगत ही है।

मुस्लिम विधि के अनुसार आप के पति की संपत्ति में से 1/8 आप को, 2/3 सभी लड़कियों को मिला कर और 1/6 हिस्सा आप के पति के भाई अर्थात आप के देवर को मिलेगा। शेष बचा हुआ हिस्सा भी लड़कियों को मिलेगा। आप अपने पति की संपत्ति के 24 हिस्से बनाएँ, उस में से 3 हिस्से आप के, 4 हिस्से आप के देवर के तथा 17 हिस्से लड़कियों को संयुक्त रूप से प्राप्त होंगे।। प्रत्येक लड़की को कुल संपत्ति का 4.25 हिस्सा मिलेगा।

पता लगने पर एकतरफा फैसले को रद्द कराया जा सकता है।

April 27, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जूही ने पीलीभीत, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरा विवाह सन 2013 मे अमेठी उत्तरप्रदेश के मुसाफिरखाना निवासी इरशाद अली से हुआ। विवाह के बाद मुझे सास ने बहुत प्रताड़ित किया। मुझे बार् बार मायके ज़बरदस्ती भेज देती है। मेरे दोनों बेटे सिज़ेरियन से मेरे मायके में हुए। दोनों बार न कोई मेरे ससुराल से बच्चो को देखने आया न ही कोई खर्च दिया।  परिवार परामर्श केंद्र पीलीभीत में मेरा समझौता हुआ, लेकिन मेरे पति मुझे लेकर नहीं गये, बल्कि पुलिस में मेरे भाइयों के खिलाफ मारपीट की झूठी रिपोर्ट लिखा दी।  सितम्बर 2016 को उन्हीं ने मेरे खिलाफ विदाई का मुकदमा दायर कर दिया। लेकिन आज तक कोई सम्मन या नोटिस हमें नहीं मिला। पति से बात की तो कह रहे थे कि हमने नोटिस पर गलत पता लिखवाया है। मेरे पति ने गलत पता क्यों लिखवाया? जानकारी के भाव मे हम किसी पेशी पर नही पहुँच सके तो अब क्या कोर्ट मेरे खिलाफ फैसला दे देगा?


समाधान-

गता है आप की आप के पति से बातचीत फोन पर हो जाती है। यदि ऐसा है तो आप फोन पर अस्थाई रूप से हर काल को रिकार्ड करने की व्यवस्था कर लें। जब भी पति या ससुराल से कोई फोन आए तो वह रिकार्ड हो जाए फिर उन काल्स को आप स्थाई रूप से रिकार्ड में रख सकती हैं। ये सबूत के बतौर काम आएंगे।

आप का झगड़ा आप के पति से नहीं लगता। लेकिन आप की सास आप को बिलकुल नहीं देखना चाहती और आप के पति कुछ नहीं बोलते। यह स्थिति ठीक नहीं है। एक स्त्री चाहे वह किसी जाति व धर्म या मुल्क की हो यदि उस की अपनी स्वयं की पर्याप्त आय नहीं है जिस से वह अपनी और अपने बच्चों की देखभाल पालन पोषण कर सके तो सब कुछ पति और रिश्तेदारों पर निर्भर हो जाता है तब जिन्दगी या तो नर्क हो जाती है या फिर स्वर्ग हो जाती है। बेहतर है कि स्त्रियाँ पैरों पर खड़ी हों और किसी दूसरे के भरोसे जिन्दगी जीना बन्द करें।

परिवार परामर्श केन्द्र के समझौते का कोई बड़ा महत्व नहीं है। आप के पति ने विदाई का मुकदमा किया है और आप का गलत पता दिया है तो यह इरादा रहा हो सकता है कि किसी तरह अदालत से एक तरफा फैसला ले लिया जाए। पर उस तरह के फैसले से कोई लाभ आपके पति को नहीं मिलेगा। जब भी आप को उस फैसले की कोई जानकारी मिले आप उस फैसले को देने वाली अदालत में दर्ख्वास्त दे कर उस फैसले को रद्द करवा कर दुबारा सुनवाई करवा सकती हैं।

बिन मांगी सलाह है कि ऐसे में इस शादी में बने रहने का कोई अर्थ नहीं है। तब भी जब कि पति का थोड़ा बहुत झुकाव आप की तरफ हो। क्यों कि जो अपनी माँ या किसी के कहने पर अपनी ही पत्नी के साथ इस तरह का व्यवहार करे उसे पति बने रहने काअधिकार नहीं है। आप उस के व्यवहार के आधार पर कोर्ट से विवाह विच्छेद की मांग कर सकती हैं और आप को मिल सकता है। आप धारा 125 दं.प्र.संहिता में अपने लिए व अपने बच्चों के लिए भरण पोषण की मांग भी कर सकती हैं जो आप के पति को देना ही पड़ेगा, न देने पर अदालत उन्हें जेल में भिजवा सकती है। यदि आप विवाह विच्छेद भी करा लें तब भी आपको को दूसरा विवाह करने तक यह भरण पोषण राशि मिलती रह सकती है।

समस्या-

मोहम्मद असलम ने मया बाजार, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरी बहन जिसका नाम काल्पनिक जोया की शादी 3 साल पहले अहमदाबाद निवासी फिरोज के साथ हुई थी, मेरी बहन की भी दूसरी शादी है और फिरोज की भी यह दूसरी शादी है, दोनों की एक-एक तलाक हो चुका है। पिछले 3 सालों से लगातार मेरी बहन के पति का व्यवहार क्रूरतम से क्रूरतम रहा है, उसका पति और उसके पूरे परिवार वाले उसको प्रतिदिन प्रताड़ित करते हैं, उन लोगों के मारपीट से तंग हो कर मेरी बहन अब उस घर में रहना नहीं चाहती और अपने पति से तलाक चाहती है। मेरा घर फैजाबाद उत्तर प्रदेश में है मेरी बहन के हस्बैंड का घर अहमदाबाद जिला गुजरात में है। अगर हम कानूनी रुप से तलाक लेना चाहें और मेरी बहन का हस्बैंड तलाकनामे पर साइन ना करें और वह जाकर दूसरी औरत के साथ शादी कर ले तो इस पोजीशन में मेरी बहन क्या कर सकती है? क्योंकि मुस्लिम में पुरुष तो शादी कर सकता है,  और मेरी बहन को जब तक तलाकनामा नहीं मिलेगा तब तक यह तीसरी शादी कर नहीं सकती ऐसी स्थिति में मेरी बहन के लिए क्या कानून है?


समाधान-

मुस्लिम समाज में यह अज्ञान है कि मुस्लिम महिला को विवाह विच्छेद कराने का अधिकार नहीं है। यह एक तरह का भ्रम है जो जानबूझ कर फैलाया जाता है। मुस्लिम महिलाओं को भी तलाक लेने का हक है और वे कुछ निश्चित आधारों पर तलाक की डिक्री पारित करने के लिए दीवानी न्यायालय (जहाँ पारिवारिक न्यायालय हैं वहाँ पारिवारिक न्यायालय) के समक्ष विवाह  विच्छेद कराने के लिए दावा प्रस्तुत कर सकती हैं और न्यायालय विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर सकता है।

दी डिसोल्यूशन ऑव मुस्लिम मैरिज एक्ट, 1939 की धारा 2 में उन आधारों का वर्णन किया गया है जिन पर एक मुस्लिम महिला अपने विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर सकती है। इन आधारों में एक आधार क्रूरतापूर्ण व्यवहार का भी है। आपकी बहिन के साथ क्रूर से क्रूरतम व्यवहार हुआ है तो वे इस आधार पर खुद विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करने के लिए आवेदन कर सकती हैं। इस वाद में न्यायालय का क्षेत्राधिकार दो तथ्यों से तय होगा पहला यह कि जहाँ प्रतिवादी रहता है, दूसरा वहाँ जहाँ वाद कारण पूरी तरह व आंशिक रूप से उत्पन्न हुआ है। तो इस मामले में वाद कारण भी अहमदाबाद में ही उत्पन्न हुआ है। दोनों ही आधारो पर यह वाद अहमदाबाद में दाखिल करना पड़ेगा। लेकिन वाद दाखिल करने के उपरान्त सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगा कर वाद को फैजाबाद स्थानान्तरित कराने का प्रयत्न किया जा सकता है।

गलतियों की माफी से ही आगे का रास्ता बनेगा।

September 22, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_two-vives.jpgसमस्या-

रशीद वारसी ने आगरा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरी शादी 2012 में हुई थी। 3 साल बाद मैं ने अपनी बीवी को कुछ गलतफहमियों की वजह से छोड़ दिया और मैं किसी और के साथ लिव इन में रहने लगा। मुझे पता लगा कि मेरी बीवी मुझ पर केस करने जा रही है तो मैं ने बिना पूछे 10 रुपए के स्टाम्प पेपर पर उसे तीन बार तलाक लिख कर भेज दिया। क्या मेरी तलाक हो गयी? मेरी उस से एक बेटी भी है। वो मुझे उस से भी नहीं मिलने देती। मैं क्या करूँ? मैं अपनी बीवी को वापस लाना चाहता हूँ। कोई कानूनी तरीका हो तो बताएँ।

समाधान-

प बड़े अजीब आदमी हैं। आप ने गलतफहमी के चलते अपनी बीवी को छोड़ दिया। किसी अन्य महिला के साथ लिव इन में रहने लगे। गलतफहमी आप को थी बीवी को नहीं। बीवी ने बिना किसी कसूर के दंड भुगता। जब आप को पता लगा कि वह मुकदमा करेगी तो डर के मारे आप ने 10 रुपए के स्टाम्प पेपर पर तीन बार तलाक लिख कर भेज दिया। अब आप को बेटी याद आ रही है। आप औरतों और लड़कियों को समझते क्या है? तीन औरतों को आप ने परेशान कर दिया है। बीवी को छोड़ा, बेटी को पिता के स्नेह से वंचित किया और जिस के साथ लिव इन में रहे हैं उस का क्या उस की तो कोई चिन्ता तक आप ने इस सवाल में व्यक्त नहीं की है। यदि आप धार्मिक व्यक्ति हैं तो खुद सोचिए इन तीन इंसानों के साथ जो गुनाह आपने किए हैं क्या आप का खुदा उन्हें माफ कर देगा? क्या वे माफ कर दिए जाने के काबिल हैं? और यदि नहीं हैं तो उस की सजा आप को क्या मिलनी चाहिए?

आप को सब से पहले तीनों से अपने रिश्ते तय करने होंगे। आप अब अपनी लिव इन वाली स्त्री के साथ किस तरह के संबंध रखने चाहेंगे। यदि आप उस से संबंध न ऱखेंगे तो क्या वह बखेड़ा नही ख़ड़ा करती रहेगी। आप को उस से माफी मांग कर उस से अपने संबंध समाप्त करने होंगे। अपनी पत्नी से भी आप को माफी मांगनी चाहिए। उस के बाद यदि वह वाकई आप को माफ कर दे तो ठीक वर्ना आप अपनी बीवी को कभी साथ नहीं रख पाएंगे और जीवन भर बीवी और बेटी के लिए भरण पोषण का खर्च देते रहने पड़ेगा।

आप ने पूछा है कि क्या आप का तलाक हो गया है? यदि आप ने एक ही स्टाम्प पेपर पर तीन जगह तलाक लिख कर भेजा है तो इसे शरीयत के मुताबिक तलाक नहीं माना जा सकता। भारतीय न्यायालयों की व्याख्या यह है कि तीनों के तलाकों के बीच में पर्याप्त अंतर होना चाहिए जिस से खाविंद और बीवी दोनों को सोचने का अवसर मिले और दोनों के बीच समझौते की बात चल सके। इस तरह यदि आप अदालत जाएंगे तो आप का तलाक अवैध माना जाएगा। इस तरह आप की बीवी अब भी आप की बीवी है। उसे वापस लाने के लिए आप को हलाला की जरूरत नहीं पड़ेगी। पर आप की समस्या का हल यही है कि आप अपनी लिव इन को छोड़ें, बीवी और बेटी के साथ न्याय पूर्वक अपना जीवन बिताएँ। इस के लिए आप को प्रयास करने होंगे। आप फिलहाल आप के दाम्पत्य जीवन की पुनर्स्थापना के लिए वाद संस्थित कर सकती हैं। जब एक बार दावा अदालत में जाएगा तो बातचीत और समझौते का मार्ग भी निकलेगा।

हिबानामा पंजीकृत होना जरूरी नहीं।

September 14, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

gift propertyसमस्या-

इमरान ने बसना, रायपुर छत्तीसगढ़ से पूछा है-

म लोग 5 साल हुआ मेरे नाना जी के साथ रहते हैं…मेरे नाना age 65 और उनकी अम्मी age ७५ ..और मेरे नानी जी और मामा 40 साल से अलग ररहते थे…..और मेरे नाना जी के पास नहीं आते थे और ओ लोग बोहत तकलीफ उठाते थे …तब मेरे नाना जी ने मेरे अम्मी को बुलाया और हम उनको 4 साल से केयर किआ तो मेरे नाना जी ने खुश होके उनका आबादी मकान मेरे अम्मी के नाम कर दिए हैं …१०० का स्टाम्प में नोटरी करके दिए हैं .अब ओ इस दुनिया में नहीं हैं।  तो मेरे मामा और नानी .. जो मकान नाना जी ने हम को दे दिए हैं उस पर हम से हिस्सा मांग ‘रहे हैं …और परेसान कर रहे हैं ….अब हम क्या करें सर? …. …..और नाना जी ने स्टाम्प पे उल्लेख किए हैं कि … मैं हाजी कदर अपनी राजी खुसी से @ … मेरी बेटी अमरीन बनो को अपना मकान दे रहा हूँ। मेरे चलने फिरने में तकलीफ होती है इसलिए मेरी सेवा मेरी बेटी अमरीन बानो ने की है इस से उस को खुस होके दे रहा हूँ …आज १२-३-२०१२ से उक्त मकान की मालिक अमरीन होगी और मेरा नाम राजस्व अभिलेख और पटवारी अभिलेख से हटा कर खुद का नाम जोड़ लें …………. हम लोगों ने नगर पंचायत से उनका नाम हटा कर अम्मी का नाम जोड़ लिए हैं .. …पर पटवारी अभिलेख में उनका नाम हटा कर अम्मी का नाम कैसे कैसे जोड़े …पटवारी के पास जाने से ओ जबाब नहीं दे रहा है …उस को मेरे मामा पैसा खिला दिया है …. हम को क्या करना होगा।

समाधान-

प के नानाजी ने मकान अपनी बेटी, आप की माँ के नाम तहरीर कर दिया। यह हिबा है। आप की माँ उसी मकान में निवास भी कर रही है इस कारण से उस का कब्जा भी उस मकान पर है। इस तरह यह हिबानामा अन्तिम हो चुका है। आप के नानाजी चाहें तो वे स्वयं भी इस मकान को वापस नहीं ले सकते।

आप को जो परेशानी आ रही है वह इस कारण से कि हिबा एक दान भी है और दान पत्र का पंजीकरण होना जरूरी है। लेकिन यदि हिबा किया गया हो और हिबा की गयी संपत्ति पर कब्जा भी प्राप्त कर लिया गया हो तो ऐसे मामले में हिबानामा को पंजीकृत होना कतई जरूरी नहीं है।

हालांकि आप के नाना जीवित हैं और आप चाहें तो उन से इस हिबानामा को उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत करवाया जा सकता है। उस के बाद इस संपत्ति का स्वामित्व आप की माँ का होने के मामले में किसी तरह की कोई शंका शेष नहीं रहेगी। बस यही है कि इस संपत्ति के बाजार मूल्य पर आप को स्टाम्प ड्यूटी व पंजीयन शुल्क अदा करना होगा।

यदि आप पंजीयन न भी करा पाएँ तो भी आप की माँ के इस संपत्ति पर स्वामित्व को उन से नहीं छीना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने हफीजा बीबी बनाम शेख फरीद के मामले में यह निर्धारित किया है कि इस तरह के हिबानामा का पंजीकृत होना जरूरी नहीं है।

rp_gavel9.jpgसमस्या-

अरशद ने नवाबगंज, सहारनपुर, उत्तरप्रदेश से पूछा है-

मेरे पिताजी के पास एक मकान है जो उन को मेरे दादा जी से विरासत में मिला था। मेरे पिताजी के पीछे एक आदमी पड़ा है जो उस मकान को खरीदना चाहता है वह पिताजी को दारू पिला देता है पिताजी भी मकान बेचने को तैयार हैं। हमारे घर वालों को क्या कदम उठाने चाहिए कि वे मकान न बेचें।

 

समाधान-

मुस्लिम विधि में सभी संपत्तियाँ वैयक्तिक होती हैं अर्थात संपत्ति पर उसी का अधिकार होता है जिस के वह नाम होती है। यह संपत्ति आप के पिता जी के नाम है तो उन की व्यक्तिगत संपत्ति है और उन्हें इसे बेचने का अधिकार है। वे इस संपत्ति को बेच सकते हैं।

इस संपत्ति को बेचने से रोकने का कोई कानूनी रास्ता नहीं है। कानून तरीके से न आप न आप का परिवार इस संपत्ति को बेचने से आप के पिता को नहीं रोक सकता है। यह आप और आप के परिवार पर निर्भर करेगा कि आप कैसे अपने पिता को इस काम को करने से रोक सकते हैं।

यदि आप या आप के परिवार के लोग उस संपत्ति को परिवार के किसी सदस्य या एक से अधिक सदस्यों के नाम हस्तांतरित करवा लें तो ही यह संपत्ति बिकने से रुक सकती है अन्यथा नहीं।

mother_son1समस्या-

साहिला असलम ने हरदोई, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरा पति शराब पीकर मुझको मारता पीटता था‚ मैंने उसके विरूद्ध धारा 498ए‚ 323‚ 504‚ 506 भादवि व 3⁄4 डीपी एक्ट में एफआईआर दर्ज करायी‚ मामले को सुलह एवं मध्यस्थता केन्द्र भेजा गया जहॉं मैंने अपने भविष्य के कारण सुलह कर ली परन्तु मेरे पति द्वारा अपनी हरकतों में कोई बदलाव नहीं किया गया और मुझे शराब के लिए पैसे मांगते हुए मारने पीटने लगा‚ इस कारण मैं अपने घर चली अायी लेकिन इसके बाद भी उसने अपने कुछ साथियों के साथ मेरे घर में घुसकर मुझे व मेरी माँ को मारा पीटा जिससे मेरे माँ के हाथ की हडडी अपनी जगह से हट गयी‚ मेरे द्वारा इस सम्बन्ध में धारा 452‚ 323‚ 504‚ 506‚ 498ए भादवि व 3⁄4 डीपीएक्ट में मुकदमा पंजीकृत कराया है‚ जिसकी विवेचना प्रचलित है‚ लेकिन पुलिस कोई कार्यवाही नहीं कर रह है। मैं अपने पति से छुटकारा चाहती हूँ लेकिन वह तलाक भी नहीं दे रहा है‚ मेरा एक तीन वर्ष का पुत्र भी है। कृपया मुझे सरल प्रक्रिया बताये कि मुझे उससे कैसे छुटकारा मिल सकता है एवं कितना समय लगेगाॽ

 

समाधान-

प ने पुलिस के समक्ष जो शिकायत की है उस पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई है या नहीं पहले यह तलाश करें। यदि पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं की है तो आप एक पत्र पंजीकृत डाक से एस.पी. को प्रेषित करें जिस के साथ अपनी मूल शिकायत की प्रति भी भेजें। इस से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो कर कार्यवाही आरंभ हो जाएगी। यदि तब भी न हो तो किसी स्थानीय वकील की मदद से आप सीधे न्यायालय को परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं।

यदि पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर ली तो उन के लिए कार्यवाही करना जरूरी है। या तो वे आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करेंगे या फिर यह रिपोर्ट की कोई मामला नहीं बनता है। यदि वे मामला न बनने वाली रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे तो न्यायालय आप को सूचित करेगा तब आप अपनी आपत्तियाँ प्रस्तुत कर सकती हैं अपना व अपने गवाहों के बयान करवा सकती हैं जिस पर न्यायालय प्रसंज्ञान ले सकता है।

जिस तरह का आप के पति का व्यवहार है उस से आप को अलग रहने का हक मिल गया है। आप अपने पुत्र के साथ अलग रह सकती हैं। आप स्वयं अपने लिए और अपने पुत्र के लिए धारा 125 दण्ड प्रकिया संहिता में तथा घरेलू हिंसा अधिनियम में भरण पोषण के खर्चे के लिए स्वयं वकील की मदद से न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं। फिलहाल आप इतना करें।। इतना सब होने के बाद आप का पति आप को तलाक देने पर विचार कर सकता है। आगे की स्थिति पर बाद में विचार किया जा सकता है।

तलाक़ और दूसरा निक़ाह भी शरीयत के कायदे से ही करें।

May 29, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

यूसुफ ने जयपुर राजस्थान से पूछा है-

मेरा निकाह 2012 में अहमदाबाद में हुआ था। शादी के छह माह बाद ही वह बच्चेदानी का इलाज करवाने के बहाने अपने पिता के साथ अहमदाबाद चली गयी। अब आने से इन्कार कर दिया है और दस लाख की मांग की। फिर मैं ने उसे आने के लिए तीन नोटिस भी दिए मगर उस ने लेने से इनकार कर दिया। बाद में मैं ने 4 फरवरी 2015 को तलाक भिजवा दिया। मगर उस ने तलाक भी नहीं लिया और इद्दत के पैसे भी नहीं लिए। तीन माह बाद मैं ने उसे अपना सामान ले जाने के लिए नोटिस दिया वह भी नहीं लिया। अब मैं दूसरा निकाह करना चाहता हूँ। क्या मैं दूसरा निकाह कर सकता हूँ। मुझे क्या करना होगा?

समाधान-

प ने कायदे से निकाह किया है तो तलाक भी कायदे से ही होना चाहिए। कायदा ये है कि पहला तलाक हो जाने के बाद दोनों पक्षों के प्रतिनिधि आपस में बात करें और समझाइश कराएँ, समझाइश से बात न बने तो तीसरा तलाक भी हो जाए। जिन काजी साहब ने आप का निकाह पढ़ाया था और तब जो वकील आप की बीवी के थे उन से बात की जा सकती है।

खैर, यह तो बात हुई तलाक की। दूसरा निकाह तो आप तलाक के बिना भी पढ़ सकते हैं। उस के लिए यह जरूरी है कि आप की दो बीवियाँ हों तो दोनों के प्रति प्रत्येक व्यवहार में समानता बरतें। जब आप की पहली बीवी साथ रह ही नहीं रही है तो यह तो हो नहीं सकता। दूसरी बात कि पहली बीवी की अनुमति या सहमति हो। वह भी नहीं ली जा सकती। बेहतर है कि आप अपनी बीवी को नोटिस दें कि वह साथ आ कर रहने को तैयार नहीं है और दस लाख रुपए मांगती है जो नाजायज है। इस कारण आप दूसरा निकाह पढ़ने को तैयार हैं, यदि एक हफ्ते में उस का कोई जवाब न मिला तो आप निकाह पढ़ लेंगे। यह नोटिस रजिस्टर्ड डाक से भेजा जा सकता है, बीवी के रहने की जगह अखबार में शाया कराया जा सकता है और दो गवाहों के सामने बीवी के रहने के मकान और पड़ौस के मकानों पर चस्पा किया जा सकता है। ऐसा करने के बाद आप बेशक दूसरा निकाह पढ़ सकते हैं।

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