राजस्व Archive

समस्या-

प्रशान्त ने ग्राम नूरपुर, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे दादाजी चार भाई थे जिस में एक निस्सन्तान थे। मेरे दादा जी से पहले उन के दो भाइयों की मृत्यु हो गयी। उन के हिस्से कि संपत्ति उन के उत्तराधिकारियों को मिल गयी। 2004 में निस्सन्तान दादाजी की संपत्ति मेरे दादाजी को मिल गयी।  अब 2012 में मेरे दादाजी की भी मृत्यु हो गयी। उन की संपत्ति हमारे नाम आ गयी। अब मेरे दादा जी के भाई का लड़का बोलता है कि मेरा भी हिस्सा था इस में, तो क्या 29.06.2004 को  भाई का हक भतीजे को भी मिलता था?

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में कोई व्यक्ति निस्सन्तान मर जाए और उस की पत्नी और पिता भी जीवित न हों तो फिर उस की सम्पत्ति जीवित भाई को ही प्राप्त होगी।  इस तरह आप के दादा जी के भाई की मृत्यु पर आप के दादा जी को प्राप्त हुई वह सही थी। उस में मृत भाई के पुत्र का का कोई हिस्सा नहीं था।

लेकिन यदि दादाजी के निस्संतान भाई की संपत्ति में उत्तरप्रदेश में स्थित कोई कृषि भूमि है तो उस भूमि का उत्तराधिकार उ.प्र. जमींदारी विनाश अधिनियम से तय होगा और उस स्थिति में पूर्व मृत भाई के पुत्र को भी हि्स्सा पाने का अधिकार है। यह विधि 29.06.2004 को भी प्रचलित थी।

 

 

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हकत्याग विलेख को पंजीकृत कराए बिना हकत्याग संभव नहीं है।

May 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

छैल कँवर ने मेवानगर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं  मेरे पिता और माता की एकमात्र सन्तान हूँ। मेरे पिता का देहांत मेरे जन्म से पहले ही हो गया था। जिससे समस्त जमीन मेरे माताजी के नाम हो गई। मेरी माताजी का देहांत 1883 में हो गया उस समय में ससुराल में थी। मेरे कोई भाई या बहन नहीं है, जिसके कारण जमीन का नामानतरण मेरे नाम होना था। लेकिन मेरे दादाजी के भाई के बेटे ने जो उस समय सरपंच थे वे मेरे ससुराल आये और मुझे ये कहा कि आप मेरे साथ चलो आपकी जमीन आपके नाम करवा रहे हैं। वो मुझे एक वकील के पास लेकर गए और एक स्टाम्प पर अंगूठा लगवाया। मुझे अब पता चला हे की उन्होंने उस स्टाम्प के आधार पर मेरी समस्त जमीन अपने बेटे के नाम हकतर्क करवा ली जो उस समय मात्र 14 साल का था। जब मैंने रिकॉर्ड निकलवाया तो उसके फोतगी में पटवारी ने लिखा था की “असन कँवर (माताजी) के फौत होने पर उनकी बेटी छेल कँवर (स्वयं) इकरार नामा 7 रूपये के स्टाम्प पर मनोहरसिंह (जिसके नाम हकतर्क किया गया उम्र 14 साल) के हक में ओथ कमिश्नर द्वारा 28.1.1983 को तस्दीक दस्तावेज पर नामान्तरण खोला गया।” श्रीमान में निम्न सवालों के जवाब जानना चाह रही हूँ- 1. क्या 1983 मैं ओथ कमिश्नर द्वारा जारी स्टाम्प के आधार पर नामन्तरण खोला जा सकता था? 2. क्या मेरे दादाजी के भाई के बेटे के बेटे के नाम हक तर्क हो सकता था जो उस समय 14 साल का था?  न ही वो मेरे पिताजी द्वारा गोद लिया पुत्र है। 3.श्रीमान मैं एक निरक्षर महिला हूँ। मुझे धोखे से एक बार वकील के आगे एक स्टाम्प पर अंगूठा लगवाया था इसके अलावा मैंने न तो किसी पटवारी, तहसीलदार, या रजिस्ट्रार के आगे कोई अंगूठा लगाया हे। 4. मेरी माताजी का देहांत मेरे ननिहाल में 1983 में हुआ था, में अब उनका मृत्यू प्रमाण पत्र बनवाना चाहती हूँ लेकिन मेरे पास उनकी मृत्यु या उनसे सम्बंधित कोई दस्तावेज नहीं है? उचित सलाह प्रदान करें।

समाधान-

नामान्तरण से कभी भी किसी संपत्ति का टाइटल निर्धारित नहीं होता। चूंकि आप को अब पता लगा है कि नामान्तरण आप के नाम होने के स्थान पर आप के दादा जी भाई के पुत्र ने अपने पुत्र के नाम नामान्तरण खुलवा लिया है। इस कारण अब आप तुरन्त नामान्तरण के आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त कर उस आदेश के विरुद्ध अपील कर सकती हैं।

हकत्याग एक प्रकार का अचल संपत्ति का हस्तान्तरण है इस कारण उस का उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत होना अनिवार्य है। इस तरह नोटेरी के यहाँ तस्दीक किए गए हकत्याग के विधि विपरीत विलेख के आधार पर नामान्तरण खोला जाना पूरी तरह गलत है।

आप को चाहिए कि राजस्व (खेती-बाड़ी) की जमीनों का काम देखने वाले किसी अच्छे वकील को अपने सारे दस्तावेज दिखाएँ और नामान्तरण की अपील प्रस्तुत करें। आप टाइटल के आधार पर भी राजस्व रिकार्ड में संशोधन और जमीन का कब्जा दिलाए जाने के लिए दावा प्रस्तुत कर सकती हैं। लेकिन जो भी करें अपने वकील को समस्त दस्तावेज दिखा कर उन की राय के अनुसार काम करें।

हक त्याग सिर्फ और सिर्फ किसी भी संपत्ति के सहस्वामी के हक में किया जा सकता है। उक्त भूमि की आप एक मात्र स्वामी थीं। इस कारण से किसी भी व्यक्ति के नाम आप के दादा जी के भाई के पोते के नाम  भी हकत्याग होना संभव नहीं था। इस कारण भी वह हक त्याग वैध नहीं है।

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समस्या-

अर्जुन ने चौमू, जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


म ३ भाई और ३ बहिन है, जिस में से हमारी बड़ी बहिन की डेथ हो गयी २००६ में तथा मेरे पिताजी की डेथ २००९ में हो गई। पिता जी की डेथ के बाद किसी ने हमारी जमीन का गलत नामांतरण खुलवा दिया। अगर बहिन की डेथ पहले हो गयी और पिताजी की बाद में तो क्या बहिन के नाम नामांतरण खुल सकता है क्या? और अगर क़ानूनी रूप से यदि ये गलत है तो गलत नामांतरण खोलने वालों व खुलवाने वालो को दंड दिलवाने के लिए क्या करवाई की जानी है, उस के बारे में उचित जानकारी देने की कृपा करें।


समाधान-

प ने समस्या को ठीक से रखा ही नहीं है। आप ने खुद फैसला कर लिया कि नामान्तरण गलत खुला है। नामान्तरण में क्या गलत हुआ है यह ठीक से नहीं लिखा है। नामान्तरण हिन्दू उत्तराधिकार के नियम के अनुसार किया  जाना चाहिए। यह सही है कि नामान्तरण पिताजी के खाते का खुला है इस कारण उन के उत्तराधिकारियों के नाम उन के स्थान पर खाते में अंकित किए जाएंगे।

आप की बड़ी बहिन का देहान्त पिताजी के देहान्त के तीन वर्ष पहले ही हो चुका है। किसी मृत व्यक्ति के नाम तो नामान्तरण हो नहीं सकता। लेकिन यदि नामांतरण करने वाले अधिकारी को यह न बताया जाए कि आप की बहिन की मृत्यु हो चुकी है तो उसे जीवित मानते हुए ही उस के नाम नामान्तरण किया जा सकता है। यदि उस के समक्ष बड़ी पुत्री की मृत्यु का प्रमाण उपस्थित न किया गया हो तो इस निर्णय में कोई गलती नहीं है। लेकिन फिर भी गलत नामांकन हो गया है तो उस की अपील की जा सकती है।

लेकिन जिस दिन पिताजी का देहान्त हुआ है उस दिन आप की बहिन के उत्तराधिकारी अर्थात उन की संतानें जीवित हुई तो वे भी प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी हैं। उन का नाम उन के स्थान पर अंकित होगा।

लेकिन नामान्तरण यदि जानबूझ कर गलत किया गया है तो उस की शिकायत बड़े अधिकारी से की जा सकती है। यह उस अधिकारी के नियोक्ता अधिकारी का कर्तव्य है कि उस की जाँच करे और किसी तरह का दोष पाए जाने पर उसे नियमानुसार दंडित करे।

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किसी को भी स्थावर संपत्ति से जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता।

May 6, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

गोलू साहू ने पंडुका, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-


मेरे पिता ने पैतृक संपत्ति को बिना हमारे जानकारी व सहमति तथा बिना हमारा हिस्सा अलग किये बिना ही 1/2 एकड़ जमीन को अज्ञात महिला व्यक्ति के नाम पर रजिस्ट्री कर दी है। तथा उस व्यक्ति द्वारा नामांतरण व रिकॉर्ड में अपना नाम भी दर्ज करवा लिया है।  लेकिन जमीन पर कब्जा हमारा है , सर क्या हम कब्जे पर बने रहे..? क्या वह व्यक्ति जबरदस्ती हमसे कब्जा छीन सकता है….? हमें क्या करना चाहिए…….?


समाधान-

कोई भी व्यक्ति जबरन किसी से स्थावर सम्पत्ति का कब्जा छीन कर वर्तमान में काबिज व्यक्ति को बेदखल नहीं कर सकता। यदि कोई ऐसी कोशिश करता है या बेदखल करता है तो तुरन्त पुलिस को रिपोर्ट करें तथा एसडीएम के न्यायालय में धारा 145-146 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत करें। यदि किसी को ऐसा आवेदन प्रस्तुत करने के पहले के 60 दिनों में बेदखल भी कर दिया गया है तो उसे संपत्ति का कब्जा वापस दिलाया जाएगा।

पैतृक/ सहदायिक संपत्ति का बंटवारा हुए बिना कोई भी पिता अपनी संतानों को पैतृक संपत्ति से अलग नहीं कर सकता। इस तरह संपत्ति का उक्त हस्तान्तरण वैध नहीं है। लेकिन उस जमीन में पिता अपने हिस्से की जमीन को बिना बंटवारा किए भी हस्तांतरित कर सकता है, उस हस्तान्तरण के आधार पर नामान्तरण भी खोला जा सकता है। लेकिन जिस व्यक्ति को संपत्ति का हिस्सा हस्तांतरित किया गया है वह व्यक्ति संपत्ति पर कब्जा केवल बंटवारे के माध्यम से ही प्राप्त कर सकता है। आप रजिस्ट्री को निरस्त कराने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं तथा संपत्ति से बेदखली के विरुद्ध इसी न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। इस मामले में दस्तावेजों को किसी स्थानीय वकील को दिखा कर सलाह लें और आगे की कार्यवाही करें।

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समस्या-

भोजपाल ने ग्राम पोस्ट धावरभाटा, मगरलोड, छत्तीसगढ़ समस्या भेजी है कि-


मैं एक बहुत बड़ी समस्या से जूझ रहा हूँ।  मेरे पिता के नाम की खेती की जमीन जो पैतृक थी उसे कुछ लोगों के द्वारा मेरे पिता की मानसिक स्थिति का फायदा उठकार बंधक की बात कहकर मेरे तथा परिवार के सदस्यों की बिना जानकारी व सहमति के रजिस्ट्री पत्र पर हस्ताक्षर करवा लिए गए हैं।  जिसकी जानकारी मुझे पंचायत के द्वारा प्रमाणीकरण सूचना पत्र प्रदान करने पर हुयी। उक्त रजिस्ट्री पत्र में 1.16 हेक्टेयर का प्रतिफल राशि को चेक के माध्यम से 1387000 रूपये देना दर्शाया गया है जो पूर्णतः कूटरचित व फर्जी है किसी प्रकार का चेक नहीं दिया गया है, न ही उनके खाते में पैसा डाला गया है। इसकी जानकारी होने पर मैंने पुलिस अधीक्षक कार्यालय में लिखित शिकायत की थी जिस पर प्रशासन ने चेक संबंधी कोई जाँच नहीं की और रजिस्ट्री पत्र को वैधानिक बताकर न्यायालय जाने हेतु पुलिस हस्तक्षेप अयोग्य पत्र दे दी। इस संदर्भ में मैंने पुलिस को वैधानिक बताये जाने का आधार व चेक संबंधी जानकारी आरटीआई के माध्यम से मांगा लेकिन मुझे कोई संतोसप्रद जानकारी नहीं मिली। मैंने कलेक्टर महोदय को पुनः जाँच के लिए शिकायत आवेदन किया। पुनः जाँच में अनावेदक क्रेता ने यह ब्यान दिया कि उसने 6 लाख रूपये में ये जमीन खरीदी है तथा पैसा नगद देना बताया।  चेक के माध्यम से नहीं। जबकि रजिस्ट्री पत्र में प्रतिफल राशि चेक के माध्यम से 1387000 रूपये मिलना दर्शया है जो कि कूटरचित है। लेकिन पुलिस विभाग द्वारा इस तरीके से धोखाधड़ी करने वालों पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की गयी। सर मैं बहुत परेशान हूँ। मेरे पिता के नाम की सभी जमीन को धोखे से रजिस्ट्री करा लिए हैं क्योकि मैं, मेरा भाई और बहन बाहर पढाई करते थे इसलिए इसकी जानकारी हमें नहीं हुई। यदि जमीन उनके नाम हो गयी तो हम लोग रस्ते पर आ जायेंगे, मैं पूरी तरह से मानसिक रूप से परेशान हूँ और आर्थिक रूप से कमजोर भी। प्लीज सर मुझे सुझाव दे की मैं क्या करूँ?


समाधान-

पुलिस ने यदि जाँच करके मामले को पुलिस हस्तक्षेप योग्य नहीं माना है तो आप को चाहिए कि आप मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करें।  रजिस्ट्री की प्रमाणित प्रति प्राप्त करें तथा कलेक्टर के आदेश से जो जांच हुई है उस की तथा उस जाँच में दिए गए अनावेदक क्रेता के बयान की प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर उन्हें भी परिवाद के साथ प्रस्तुत करें। इस के लिए आप को स्थानीय किसी वकील की सेवाएँ प्राप्त करनी होंगी।

इस के अलावा समय रहते विक्रय पत्र की रजिस्ट्री को निरस्त करने के लिए आप को दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा। क्यों कि कोई भी पिता पुश्तैनी / सहदायिक संपत्ति में से अपनी संतानों के भाग को विक्रय नहीं कर सकता। इस आधार पर यह रजिस्ट्री निरस्त हो जाएगी। यही आपत्ति आप उक्त भूमि के राजस्व रिकार्ड के नामान्तरण की कार्यवाही में प्रस्तुत कर सकते हैं।

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समस्या-

नीरज ने इन्दौर मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे चाचा की पुश्तैनी जमीन है, उनके कोई संतान नहीं थी और उनका देहांत हो गया। उन्होंने अपनी जमीन मेरे नाम से ‍रजिस्ट्री कर दी थी अर्थात रजिस्ट्री में बेचे जाने का उल्लेख किया गया है।‍ मतलब उसको मेरे द्वारा खरीदा गया है जिसे चार साल हो गये हैं।  उस जमीन पर मेरे दूसरे चाचा के लडके ने दावा कर दिया है तो क्या वह जमीन मेरे दूसरे चाचा के लडके भी ले सकते है।

समाधान-

प के चाचा की जमीन पुश्तैनी थी और दूसरे चाचा के लड़के ने उस में हिस्से का दावा किया है। जब कि आप के चाचा अपनी जमीन को अपने जीवन काल में ही आप को विक्रय कर चुके थे।

किसी भी व्यक्ति को पुश्तैनी जमीन में अपने हिस्से को भी बेच देने का अधिकार होता है। चाहे उस जमीन का बँटवारा हो कर वह उस के अलग खाते में आई हो या नहीं आई हो। वह अपने हिस्से की जमीन को बेच कर उस के अधिकार से वंचित हो सकता है। यदि जमीन का बँटवारा हो कर खाता न खुला हो तो अलग खाता खोले जाने के लिए खरीददार बँटवारे का दावा कर सकता है और बँटवारा करवा कर अपना हिस्सा अलग करवा सकता है।

आप के मामले में ऐसा लगता है कि पुश्तैनी जमीन का बंटवारा हो कर वह आप के चाचा के अलग खाते में आ गयी थी। उसे बेचने का उन्हें अधिकार था। उन्हों ने अपने जीवनकाल में ही वह जमीन आप को बेच दी थी। इस प्रकार आप उनके जीवनकाल में ही उक्त जमीन के स्वामी हो चुके थे। आप के दूसरे चाचा के लड़के का दावा सही नहीं है। इस वाद में आप को अच्छा वकील कर के मुस्तैदी से मुकदमा लड़ना चाहिए। आप से उस जमीन को कोई नहीं ले सकेगा।

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समस्या-

हितेश गोयल ने भोपाल, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी का देहांत 2002 में हो गया है तथा मेरे दादा जी का देहांत वर्ष 2014 में हो गया मेरे दादा जी ने वर्ष 2013 में अपनी रजिस्टर्ड वसीयत की थी जिसमे उन्होंने इस बात का उल्लेख किया की उनकी चारो पुत्रियों के विवाह उन्होंने सम्पन्न करा दिया है तथा उनके कर्तव्यों का निर्वहन हो चूका है तथा मेरे पिता जी के अलावा मेरे अन्य दो ताऊ जी को कुछ भी नहीं देना है तथा जो पक्का बना मकान है वो मेरे नाम हो तथा एक जमीन है जो मेरी माता जी के नाम हो! इस वसीयत में नामंतरण करवाने की लिए सभी वारिसों के हस्ताक्षर की बात कही जा रही है तथा मेरे दोनों ताऊजी को तथा एक बुआ को इस पर आपत्ति है! मैंने ऐसा सुना है की यदि इसे प्रोबेट करा लिया जाये तो यह संपत्ति बिना आपति के हस्तांतरित करवाई जा सकती है! कृपया उचित मार्गदर्शन प्रदान करे जिस से हम इस प्रकरण को जल्द से जल्द निपटा सके!

समाधान-

ब भी किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उस की संपत्ति उस के उत्तराधिकारियों को समान रूप से प्राप्त होती है। लेकिन यदि मृतक ने वसीयत कर दी हो तब वसीयत के अनुसार प्राप्त होती है। नामांतरण की कार्यवाही में वसीयत के आधार पर नामांतरण का आवेदन आने पर यदि आपत्तियाँ प्राप्त होती हैं तो राजस्व विभाग को यह अधिकार नहीं है कि वह इन आपत्तियों का निस्तारण कर सके। वसीयत को प्रमाणित करने पर वसीयत उचित है या नहीं यह केवल दीवानी न्यायालय ही तय कर सकता है। इसी कारण से प्रोबेट कराना उचित है। आप को प्रोबेट की यह सलाह स्वयं नामान्तरण करने वाले अधिकारी ने ही दी होगी।

प्रोबेट में सभी उत्तराधिकारियों के साथ साथ एक सामान्य सूचना समाचार पत्र के माध्यम से भी प्रकाशित होगी। उस के उपरान्त आप वसीयत को उस के गवाहों और उप पंजीयक या उस के कार्यालय के कर्मचारी के बयानों के आधार पर प्रमाणित करवा सकते हैं। प्रोबेट हो जाने पर राजस्व विभाग वसीयत के आधार पर नामान्तरण दर्ज कर देगा।

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प्रतिकूल कब्जा प्रतिरक्षा का सिद्धान्त है।

December 12, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

राजेश तिवारी ने सोरों बदरिया, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मारे गाँव से दो किलो मीटर की दुरी पर ४ बीघा जमीन को हमारे पूर्वज 40साल से करते आ रहे थे।  उनकी मोत के बाद अब हम कर रहे हेै।  उस जमीन में २६ लोगों के नाम हैं, सब ने वह जमीन छोड़ रखी है।  अब एक आदमी आता है  वह जमीन छोड़ने के लिए कहता है।  उस आदमी के बाप का नाम उस जमीन में है, बाप जिन्दा है।  हम जानना चाहते हैं कि क़ानूनी तरीके से उस जमीन पर हमारा कुछ हक बनता है कि नहीं, जब कि 40 साल से कोई जमीन पर अपना हक जताने नहीं आया। हम किस कोर्ट में कोन सी धारा में अपना मुकद्दमा डाल सकते हैं। हमें उचित सलाह दें।


समाधान-

जिस जमीन पर आप और आप के पूर्वज 40 वर्ष से खेती करते आ रहे हैं और इन 40 वर्षों में किसी ने आप के खेती करने पर कोई आपत्ति नहीं की इस तरह आप का उस जमीन पर प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) है। लेकिन प्रतिकूल कब्जे का यह सिद्धान्त केवल प्रतिरक्षा के लिए। यह हथियार हमले के लिए नहीं बल्कि रक्षा के लिए है। जिस का सीधा अर्थ ये है कि यदि कोई आप को उस जमीन से हटाने  के लिए वाद संस्थित करे या कोई भी कानूनी कार्यवाही करे तो आप इस हथियार का उपयोग कर सकते हैं। इस तरह आप को अदालत जा कर किसी तरह का आवेदन देने, वाद प्रस्तुत करने या कोई और कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है। आप तो जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखें।

यदि कोई आप को धमकी देता है कि वह जबरन कब्जा छीन लेगा तो यह अपराधिक कार्यवाही है। आप को उस के विरुद्ध पुलिस में रपट दर्ज करानी चाहिए और पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर अपराधिक परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए।  आप दीवानी /राजस्व न्यायालय में  इस तरह की निषेधाज्ञा प्राप्त करने का वाद संस्थित कर सकते हैं कि आप 40 वर्षों से अधिक से भूमि पर काबिज काश्त हैं, आप का कब्जा अवैध तरीके से नहीं हटाया जा सकता है, यदि किसी का अधिकार है तो वह न्यायालय से आदेश या डिक्री प्राप्त किए आप को न हटाए।

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संपत्ति के बँटवारे का वाद राजस्व न्यायालय में संस्थित करें।

December 11, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

agricultural-landसमस्या-

दिनेश ने भुवाना, उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


मेरे दादा जी की मृत्यु फरवरी 2001 में हो गयी थी। दादा जी ने अगस्त 2000 में सारी संपत्ति मेरे चाचा जी के नाम वसीयत कर दी थी। यह सारी संपत्ति पुश्तैनी है। पटवारी और तहसीलदार ने वसीयत खारिज करते हुए 3 भाई और 4 बहनों के नाम इन्तकाल में चढ़ा दिए हैं। मुझे क्या करना चाहिए?


समाधान-

जो भी संपत्ति पुश्तैनी होती है वह सदैव पुश्तैनी ही रहती है। लेकिन 2001 में प्रचलित हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार जिस व्यक्ति के उत्तराधिकारियों में पुत्रियाँ भी हों पुश्तैनी संपत्ति में उस के हिस्से की संपत्ति का उत्तराधिकार धारा 8 हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार होगा। इस तरह राजस्व रिकार्ड में हुआ नामांतरण सही है। इस भूमि में आप के पिता का हिस्सा तो हैे ही आप का भी हिस्सा जन्म से ही है।

यदि आप चाहते हैं कि इस संपत्ति में आप के अपने हिस्से की संपत्ति पर आप को पृथक कब्जा मिल जाए तो आप उक्त भूमि के बंटवारे का वाद निकट के एसडीओ की अदालत में दाखिल कर सकते हैं।

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सहदायिक संपत्ति की आय से निर्मित संपत्ति भी सहदायिक है।

December 7, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_Hindu-Succession-199x300.jpgसमस्या-

राहुल ने अजमेर राजस्थान से पूछा है-

मेरे दादा जी के दो लड़के और तीन लड़कियाँ हैं। दादा जी के पास जो जमीन थी उसमें आधी पुस्तैनी थी  और आधी स्वअर्जित थी।|  दादा जी ने दोनों लड़को के बीच मे मार्च 1998 मे आपसी राजीनामे से जमीन का बँटवारा एक सादे कागज पर किया जिसमें दोनों लड़को का हिस्सा रखा और लड़कियों का हिस्सा नहीं रखा।  और इस कागज पर मेरे दादा जी के और उनके दोनों लड़को और दो गवाहों  के हस्ताक्षर हैं| और इस बटवारे के अनुसार जो दादा जी की पुस्तैनी जमीन  थी वो उनके बड़े लड़के को दी और जो स्वअर्जित थी उसको छोटे लड़के को दी। और इस बटवारे के अनुसार ही दोनों भाई कब्ज़ा करके कास्त करने लग गए।  फिर लगभग 3 माह बाद ही मेरे दादा जी को उनके छोटे बेटे ने बातो मे बहकाकर उस स्वअर्जित जमीन की वसीयत करा कर उसको रजिस्टर्ड करवा लिया।  इस बात से उनका बड़ा लड़का (मेरे पिताजी) बिलकुल अनजान था। मेरे दादा जी का देहांत 2012  में होने के बाद इस बात का पता चला। अब मेरे दादा जी के देहांत के पश्चात मेरे पिताजी के हिस्से की जमीन में दूसरे भाई और तीनो बहनो का नाम भी लग गया है।  जबकि मेरे चाचा के हिस्से में वसीयत के अनुसार केवल मेरे चाचा का नाम ही लगा है।  अब मेरा चाचा मेरे पिताजी के हिस्से की जमीन में से भी बँटवारा करना चाहता है।  मेरे पापा के पास केवल सबूत के रूप में वो सादा कागज ही है।  अब मेरे पापा को अपना हिस्सा पाने के लिए क्या करना होगा?  क्या मेरे बुआजी (पिताजी की बहने) उनका हिस्सा मेरे पापा के पक्ष में कर सकती हैं? और अगर ऐसा हो सकता हैं तो  इसमें लगभग कितना खर्च आएगा | कागज के बटवारे के अनुसार मेरे पिताजी के हिस्से में लगभग 22  बीघा जमीन है।  प्लीज  मेरे पिताजी के साथ हो रहे इस अन्याय से बचाने का रास्ता बताइये।

 

समस्या-

मारा उत्तराधिकार का कानून ही न्याय की अवधारणा के विपरीत है। इसी कारण अक्सर लोगों के साथ अन्याय होता है और वे न्याय प्राप्त करने के लिए सारा जीवन अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं। जो पुश्तैनी जमीन है उस में जन्म से ही पुत्रों का अधिकार बन जाता था। जब कि पुत्रियों का भरण पोषण के अतिरिक्त कोई अधिकार नहीं होता था। फिर उस में पुत्रियों को भी उत्तराधिकार प्राप्त होने लगा। 2012 में जब आप के दादा जी का देहान्त हुआ तब पुत्रियों को भी जन्म से ही पुश्तैनी संपत्ति में वही अधिकार प्राप्त हो चुका था जो कि पुत्रों को है। इस कारण से पुश्तैनी संपत्ति में तो दोनों पुत्रों और पुत्रियों को समान अधिकार प्राप्त है। उस के सीधे सीधे पाँच हिस्से होंगे। तीन पुत्रियों के और दो पुत्रों का। 1/5 हिस्सा आप के चाचा का होगा और इतना ही आप के पिता का और आप की बुआओं के। यदि तीनों बुआएँ अपना हिस्सा आप के पिता जी को दे दें तो उन के पास पुश्तैनी जमीन का 4/5 हिस्सा हो सकता है।

सहदायिक संपत्ति की आय से निर्मित संपत्ति भी सहदायिक है। इस कारण स्वअर्जित भूमि पर यह आपत्ति उठायी जा सकती है कि आप के दादा जी के पास पुश्तैनी भूमि की आय के सिवा और कोई आय नहीं थी। स्वअर्जित भूमि उसी पुश्तैनी से हुई आय से खरीदी गयी। यदि कोई संपत्ति पुश्तैनी भूमि की आय से खरीदी जाती है तो वह भी पुश्तैनी ही होती है। इस तरह आप के दादा जी के पास कोई स्वअर्जित भूमि नहीं रह जाती है। आप के पिताजी को इसी तरह का प्रतिवाद अपने पक्ष में खड़ा करना होगा। आप के पिता जी के पास यदि पूरी भूमि का आधा हिस्सा है तो वे इस विवाद के चलते अपने कब्जे की भूमि पर काबिज रह सकते हैं। इस तरह के मुकदमे बहुत लंबे चलते हैं। लड़ने वाले थक जाते हैं और एक ही परिवार के होने के कारण किसी न किसी स्तर पर आपसी समझौता हो जाता है।

हमारी राय है कि आप इस मामले में किसी अच्छे स्थानीय वकील से राय कर के आगे बढ़ें। बहुत कुछ आप के वकील की काबिलियत और मेहनत पर ही आप की लड़ाई का परिणाम निर्भर करेगा।

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