राजस्व Archive

खेत में जाने के रास्ते के लिए एसडीओ को आवेदन प्रस्तुत करें।

September 16, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

नवरतन सैन ने रानीसर, बीकानेर से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरा खेत जो कि मेरे पास के गांव बबलु की कांकड़ में पड़ता है उस खेत का मार्ग किसी व्यक्ति ने रोक दिया है और बोल रहा है कि तुम्हारा मार्ग नहीं है। जब मैंने इस सम्बन्ध में पटवारी से बात की तो वह बोला कि तुम्हारा कागजों में कटान का मार्ग नहीं है! तो अब मैं अपने खेत केसे जाउंगा और मुझे अपने खेत का ( कटान) का मार्ग कैसे मिलेगा?

समाधान-

प के खेत पर जाने का मार्ग आप को कितने वर्षों से प्राप्त था यह आप ने नहीं बताया जिस से यह निर्धारित किया जा सके कि क्या यह आप का सुखाधिकार था। यदि आप को यह मार्ग 20 वर्ष से अधिक से मिला हुआ था तो वह  सुखाधिकार हो सकता है। यदि ऐसा है तो फिर उस आधार पर सिविल न्यायालय में भी वाद किया जा सकता है और आप को उस रास्ते से जाने से रोकने के विरुद्ध निषेधाज्ञा प्राप्त की जा सकती है।

यदि आप के खेत पर जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है और आप को अपने खेत तक जाने के लिए किसी के खेत से गुजरना ही हो तो आप राजस्थान टीनेंसी एक्ट 1955 की धारा 251 ए के अंतर्गत एसडीओ के न्यायालय में सब से कम दूरी वाला रास्ता दिलाने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

समस्या-

कपिल शर्मा ने रुद्रप्रयाग, भीरी, टेमरिया वल्ला, बसुकेदा, उत्तराखंड की समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी के भाई ने अपनी 21 नाली जमीन हरिजन समाज कल्याण को बेच दी और उसके बाद वह लापता हो गए। उसके बाद हम ने उस पर विभाग का कब्जा होने नहीं दिया। जिस कारण वह कब्जा हमारे पास ही है, पिछले 30 साल से। तो क्या यह जमीन हमारी ही हो गयी है। अगर नहीं है, तो हमारे नाम पे करवाने के लिए इसमें क्या कार्यवाही की जा सकती है? इस जमीन के पट्टे हमारे यहाँ के हरिजनों को मिले हुए है पर इनका भी कब्जा नहीं है, तो इसमें क्या इन हरिजनों का हक़ बनता है? क्योंकि अब वह 30 साल बाद हमें अपने कब्ज़े के लिए परेशान कर रहे हैं। महोदय मैं बहुत परेशान हूँ ये लोग मुझे बहुत परेशान कर रहे हैं। मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

प के दादाजी के भाई ने जमीन बेच दी, अब उस पर आप का या आप के परिवार के किसी व्यक्ति का कोई हक नहीं रहा है। वह जमीन हरिजनों को आवंटित कर दी गयी है और उस पर उन का हक हो गया। आप ने हरिजनों का कब्जा नहीं होने दिया लेकिन आप का जो कब्जा था वह भी अवैध था। आप अपने बल से कब्जें में थे। अब आप का बल क्षीण हो गया है और हरिजन उन के हक की जमीन पर कब्जा करना चाहते हैं तो आप को परेशानी हो रही है। यही परेशानी पिछले तीस साल से हरिजनों को थी, लेकिन आप को उस से कोई फर्क नहीं पड़ा। तो कब्जा तो बल का मामला है जिस के पास बल है, पुलिस और अफसरों को अपने हक में इस्तेमाल करने की ताकत है उसी का कब्जा है। यदि आप जमीन को अपने नाम करा लेंगे तब भी हरिजनों में ताकत और बल हुआ तो वे जमीन का कब्जा आप से ले लेंगे।

जमीन एक बार अनुसूचित जाति के व्यक्ति के नाम स्वामित्व में आ गयी तो वह अब गैर अनुसूचित जाति के खाते में नहीं आ सकती। आप के खाते में किसी प्रकार नहीं आएगी। आप इस जमीन को अपने नाम कराने की बात को भूल ही जाएँ तो बेहतर है। गनीमत है कि हरिजनों ने आप को अनु.जाति अनु.जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में कोई फौजदारी मुकदमा नहीं किया वर्ना आप को लेने के देने पड़ सकते थे। आप ने तीस सालों से अपने हक की न होते हुए भी इस जमीन से जितनी कमाई की है उस में आप अपने लिए इस से कई गुना जमीन खरीद सकते हैं। यह सोच कर तसल्ली कर लीजिए। जिन का हक है वह तो आप को आगे पीछे देना होगा। उस से बचा नहीं जा सकता।

जो बंटवारा चाहता है उसे कार्यवाही करने दें।

July 1, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

सुनील शर्मा ने कोटा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी ने उनके चारो बेटो को बराबर जमींन बाट दी, लेकिन जमीन नाम पर नहीं हुई। सिर्फ एक पेपर पर लिखा है और सभी के साइन हैं उस पर। लेकिन हमारे हिस्से की जमीन में शहर का रोड निकल गया हे तो बाकी के भाई उस जमींन में हक़ मांग  रहे हैं।  हमें हमारी जमीन अपने नाम पर करवानी है। दादा जी का देहांत हो गया है।

समाधान-

दि आप के दादाजी सभी बेटों को बराबर जमीन बांट गए थे तो उन्हें उसी समय राजस्व रिकार्ड में अलग अलग खाते बनवा देने चाहिए थे, यह काम वे जीतेजी नहीं कर गए। उन की मृत्यु के उपरान्त भी बंटवारा किया जा कर सब के खाते अलग अलग करवा लेने चाहिए थे। लेकिन तब भी नहीं हुआ। अब दादाजी की जमीन का रिकार्ड एक साथ है और उस में सभी पुत्रों के नाम अंकित हैं। इस कारण सारी जमीन अभी तक संयुक्त स्वामित्व मे ंहै। हो सकता है जमीन के कब्जे अलग अलग हों, लेकिन स्वामित्व सारी जमीन पर सब का है।

आप के पास जो दस्तावेज है यदि वह  किसी मौखिक बंटवारे के स्मरण पत्र के रूप में है और उस पर सभी हिस्सेदारों के हस्ताक्षर हों तो न्यायालय उसे बंटवारे के समान मान सकता है। पर इस के लिए आप को कानूनी कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है। यदि आप कानूनन बंटवारा करेंगे तो भी सब को आज की स्थिति में बराबरी से देखा जाएगा और सब को समान रूप से हिस्सा मिलेगा। यदि बंटवारे के स्मरण पत्र को वैध मान लिया गया तो हो सकता है आप के कब्जे की जमीन आप के ही हिस्से में रह जाए।  यदि आप जमीन का खाता अपने नाम कराने जाएंगे तो आप को हानि ही हो सकती है। इस कारण से आपके जो भाई हिस्सा चाहते हैं उन्हें कहें कि वे अपने हक के लिए अपने हिसाब से कार्यवाही करें।

बंटवारे का वाद प्रस्तुत कर न्यायालय से बंटवारा कराएँ।

June 10, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

उमाकान्त ने देवी तहसील सौसर, जिला छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

दादाजी ने अपने जीवनकाल में कोई बंटवारा नहीं किया और न ही नाप के हिसाब से जोतने के लिए दिया। लेकिन उन की मृत्यु के बाद जिन्हें जोतने को ज्यादा मिला वे बंटवारा नहीं चाहते लेकिन बाकी हिस्सेदार बंटवारा चाहते हैं। हमन कुछ कानूनी कार्यवाही की लेकिन उन्हों ने जानपहचान से रद्द करवा दी। बताए हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

प ने क्या कानूनी कार्यवाही की यह नहीं बताया। हमें लगता है कि आप ने कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की बल्कि आप राजस्व अधिकारियों को फिजूल मैं आवेदन देते रहे। अब आप की समस्या का हल न्यायालय द्वारा बंटवारे में है। आप ने यह भी नहीं बताया है कि दादाजी के देहान्त के बाद नामान्तरण भी हुआ है या नहीं। यदि नहीं हुआ है तो नामान्तरण कराना चाहिए।

यदि नामान्तरण हो गया है तो ठीक वर्ना नामान्तरण की कार्यवाही के साथ साथ आप को चाहिए कि आप राजस्व न्यायालय में अपनी जमीन के बंटवारे, खाते अलग अलग करने और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा दिलाए जाने के लिए वाद प्रस्तुत करें। बाकी सभी हिस्सेदार और राज्य सरकार जरिए तहसीलदार पक्षकार बनेंगे। यह वाद तब तक चलेगा जब तक कि बंटवारा हो कर सब को अपने अपने हिस्से पर अलग कब्जा न मिल जाए।

समस्या-

रोहन ने लुधियाना, पंजाब से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे नाना का देहान्त2015 में हुआ। वो हमारे साथ लुधियाना ही रहते थे। सारी संपत्ति हरदोई उत्तर प्रदेश में है। मृत्यु के पहले उन्हों ने वसीयत की इच्छा की थी, वो हमने करवाई। उन्हों ने 4 हिस्सों में अपनी सम्पति वसीयत की क्यों कि उनके 3 लड़के थे। चौथा हिस्सा उन्हों ने हमारी मां को वसीयत किया। उत्तराधिकार में उस सम्पति का नामान्तरण नायब की कोर्ट से 3 लोगो के हक़ में था। बाद में वसीयत दाखिल की हमने और तहसीलदार ने पंजीकृत वसीयत के आधार पर मेरी माँ का नाम भी नामान्तरण करवा दिया। समस्या ये है कि आर्डर के 70 दिन बाद एक मामा ने आर्डर के खिलाफ अपील की है। क्या अपील अवधि बाधित नहीं है?  क्या नामान्तरण हो जाने से भी हमें कोई लाभ नहीं मिलेगा? नाना ने चौथा हिस्सा हमारे नाम किया है क्या उस पे हम कब्जा नहीं ले सकते।  वसीयत के समय छोटे मामा साथ थे, उन्होंने हमारे हक़ में एफिडेविट भी लगाया था । क्या एसडीएम ऑर्डर बदल सकते हैं। हम को कब्जा कैसे मिलेगा एग्रीकल्चर लैंड का,वो 14 बीघा का है? उसका पार्टीशन कैसे करवाए? उसका अलग खाता कैसे करवाएँ?

समाधान-

दि  किसी नामान्तरण के मामले में वसीयत प्रस्तुत हो और  उसे चुनौती दी जाए तो तहसलीदार या नायब उस मामले में नामान्तरण नहीं कर सकता। वैसी स्थिति में नामान्तरण कराने के लिए न्यायालय ही जाना होगा। इस  मामले में आप ने जब वसीयत पेश की तो तहसलीदार ने अन्य पक्षकारों को बुलाया या नहीं या आपत्तियाँ ली या नहीं उस पर बहुत कुछ निर्भर करता है। अपील तो व्यथित पक्षकार का अधिकार है, इस कारण उस पर सुनवाई होगी और तभी उस का निर्णय होगा। अपील यदि अवधि बाधित है तो आप अपील में यह आपत्ति ले सकते हैं। यदि वसीयत में कोई खेोट नहीं है तो अपील भी आप की माँ के पक्ष में निर्णीत हो जाएगी। लेकिन अपील आप के हक में निर्णीत हो जाने मात्र से आप को जमीन का कब्जा नहीं मिल जाएगा। .

नामान्तरण से किसी भी कृषि भूमि में उस के हिस्सेदारो का हिस्सा निर्धारित हो जाता है लेकिन भूमि संयुक्त बनी रहती है उस पर सभी हिस्सेदारों का संयुक्त स्वामित्व बना रहता है। अलग अलग खाता करने के लिए और अपने खाते की भूमि पर अलग कब्जा प्राप्त करने के लिए आप की माता जी को संयुक्त स्वामित्व की भूमि के बंटवारे और अपने हिस्से पर कब्जा दिलाए जाने का दावा करना पड़ेगा। चूँकि नामान्तरण आज भी आप के पक्ष में है इस कारण आप यह दावा तुरन्त कर सकते हैं। आप को अपील का निर्णय होने का इन्तजार किए बिना बंटवारे का दावा कर देना चाहिए।

नामान्तरण संपत्ति के स्वामित्व को प्रमाणित नहीं करता।

May 27, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जितेन्द्र ने उज्जैन मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

दादाजी की मृत्यु के बाद एक मकान जो कि हॉउंसिंग बोर्ड का है, मेरे ताउजी ने अपने सभी 6 भाई बहनों को बहला-फुसलाकर स्वयं के नाम नामान्तरित करवा लिया है। ताउजी द्वारा इस प्रकार हॉउसिंग बोर्ड में नामान्तरण करवा लेने से मेरे पिताजी का क्या उस सम्पति पर अधिकार नही रहेगा? सिर्फ पिताजी ने नामान्तरण के लिये अपनी सहमति दी थी। अभी तक इस सम्पति का रजिस्टर्ड बंटवारा नहीं हुआ है और ना ही ताउजी रजिस्टर्ड बंटवारा करवाना हेतु सहमत हैं। कृपया बताये कि हॉउसिंग बोर्ड में नामान्तरण से क्या वह सम्पति सिर्फ ताउजी की हो जावेगी? एवं हॉउसिंग बोर्ड में नामान्तरण के संबंध में हम क्या कार्यवाही कर सकते है?

समाधान-

नामान्तरण संपत्ति के स्वामित्व को प्रदर्शित नहीं करता है। मकान हाउसिंग बोर्ड से आप के दादाजी को आवंटित हुआ और लीज डीड भी उन के नाम निष्पादित हो गयी। उन के देहान्त के उपरान्त इस मकान की लीज का स्वामित्व उन के सभी उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो गया। सभी उत्तराधिकारियों का यह स्वामित्व अचल संपत्ति के हिस्से का था और उसकी कीमत 100 रुपए से अधिक की थी। यह स्वामित्व बिना किसी रजिस्टर्ड रिलीज डीड के किसी अन्य हिस्सेदार को स्थानान्तरित नहीं किया जा सकता था। इस कारण नामान्तरण के लिए अनापत्ति से भी उस स्वामित्व पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। संपत्ति सभी की बनी रहेगी।

यदि संपत्ति के अन्य हिस्सेदारों में से कोई भी बंटवारा चाहता है तो वह न्यायालय में बंटवारे का वाद संस्थित कर सकता है जिस पर संपत्ति का बंटवारा हो जाएगा। इस वाद में हाउसिंग बोर्ड को भी पक्षकार बनाएँ तो वहाँ भी रिकार्ड दुरुस्त हो जाएगा।

समस्या-

अंजू सिंह मैहर ने ग्राम कटिया थाना न्यू रामनगर, सतना मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता जी ने दो शादी किया था. मैं उनकी दूसरी पत्नी की बेटी हूँ!  मेरे पिताजी जब हम छोटे थे तभी गुजर गए। मेरी मां भी हमें छोड़कर कहीं और चली गयी। मेरी शादी परिवार के चाचा ने किया है। मेरा एक भाई था वह भी 2010 में कैंसर की बीमारी से गुजर गया। मेरी पहली माँ अभी है उनकी एक लड़की है। मेरे दादाजी भी पहले ही गुजर गए हैं। मेरे दादाजी के पास जमीन ज्यादा होने के कारण मेरी बड़ी माँ और बुआ के नाम जमीन पर चढ़वा दिए हैं।  मेरे पिता जी के न रहने के बाद बाकी सब जमीन पर मेरी बड़ी माँ का नाम आ गया है। एक नम्बर पर हम दोनो बहनों के नाम पर वारिसाना है। तो क्या जो हमारे बड़ी माता के नाम पर जमीन है उस पर हमें हिस्सा मिलेगा? सभी जमीन पर मेरी क्या हक है? मैंने मैहर तहसील में आवेदन किया है। क्या हमें न्याय मिलेगा? सर हमें सुझाव दिया जाए। सभी जमीन पुश्तैनी है।

समाधान-

कोई भी हिन्दू एक पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह करता है तो वह विवाह अवैध है। इस प्रकार आप की माँ का आप के पिता के साथ विवाह वैध नहीं था। इस कारण से उन्हें तो इस पैतृक संपत्ति में कोई लाभ नहीं मिल सकता था। लेकिन संतानें तो पिता की हैं और उन्हें वही अधिकार प्राप्त है जो कि वैध पत्नी से उत्पन्न संतानों को प्राप्त है। यदि दादा जी ने अपने जीवनकाल में कोई वसीयत नहीं की है तो आप को भी वही अधिकार प्राप्त हैं जो कि बड़ी मां की पुत्री को प्राप्त हैं।

आप के दादाजी की संपत्ति में आप के पिता और बुआ का समान हिस्सा था। अब पिता के स्थान पर बड़ी माँ का नाम भूमि में आ गया है वह गलत है। वस्तुतः एक हिस्सा तो बुआ के नाम होना चाहिए था तथा दूसरे हिस्से में एक तिहाई आप की बड़ी माँ को, एक तिहाई बड़ी माँ की बेटी को और एक तिहाई आप के नाम मिलना चाहिए था।

यदि बडी माँ और बुआ के नाम नामान्तरण हो चुका हो तो आप को उस नामान्तरण आदेश के विरुद्ध अपील करना चाहिए और उस में देरी नहीं करनी चाहिए। आप किसी स्थानीय अच्छे वकील से मिलें और जल्दी से जल्दी अपील दाखिल कराएँ।

समस्या-

प्रशान्त ने ग्राम नूरपुर, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे दादाजी चार भाई थे जिस में एक निस्सन्तान थे। मेरे दादा जी से पहले उन के दो भाइयों की मृत्यु हो गयी। उन के हिस्से कि संपत्ति उन के उत्तराधिकारियों को मिल गयी। 2004 में निस्सन्तान दादाजी की संपत्ति मेरे दादाजी को मिल गयी।  अब 2012 में मेरे दादाजी की भी मृत्यु हो गयी। उन की संपत्ति हमारे नाम आ गयी। अब मेरे दादा जी के भाई का लड़का बोलता है कि मेरा भी हिस्सा था इस में, तो क्या 29.06.2004 को  भाई का हक भतीजे को भी मिलता था?

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में कोई व्यक्ति निस्सन्तान मर जाए और उस की पत्नी और पिता भी जीवित न हों तो फिर उस की सम्पत्ति जीवित भाई को ही प्राप्त होगी।  इस तरह आप के दादा जी के भाई की मृत्यु पर आप के दादा जी को प्राप्त हुई वह सही थी। उस में मृत भाई के पुत्र का का कोई हिस्सा नहीं था।

लेकिन यदि दादाजी के निस्संतान भाई की संपत्ति में उत्तरप्रदेश में स्थित कोई कृषि भूमि है तो उस भूमि का उत्तराधिकार उ.प्र. जमींदारी विनाश अधिनियम से तय होगा और उस स्थिति में पूर्व मृत भाई के पुत्र को भी हि्स्सा पाने का अधिकार है। यह विधि 29.06.2004 को भी प्रचलित थी।

 

 

हकत्याग विलेख को पंजीकृत कराए बिना हकत्याग संभव नहीं है।

May 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

छैल कँवर ने मेवानगर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं  मेरे पिता और माता की एकमात्र सन्तान हूँ। मेरे पिता का देहांत मेरे जन्म से पहले ही हो गया था। जिससे समस्त जमीन मेरे माताजी के नाम हो गई। मेरी माताजी का देहांत 1883 में हो गया उस समय में ससुराल में थी। मेरे कोई भाई या बहन नहीं है, जिसके कारण जमीन का नामानतरण मेरे नाम होना था। लेकिन मेरे दादाजी के भाई के बेटे ने जो उस समय सरपंच थे वे मेरे ससुराल आये और मुझे ये कहा कि आप मेरे साथ चलो आपकी जमीन आपके नाम करवा रहे हैं। वो मुझे एक वकील के पास लेकर गए और एक स्टाम्प पर अंगूठा लगवाया। मुझे अब पता चला हे की उन्होंने उस स्टाम्प के आधार पर मेरी समस्त जमीन अपने बेटे के नाम हकतर्क करवा ली जो उस समय मात्र 14 साल का था। जब मैंने रिकॉर्ड निकलवाया तो उसके फोतगी में पटवारी ने लिखा था की “असन कँवर (माताजी) के फौत होने पर उनकी बेटी छेल कँवर (स्वयं) इकरार नामा 7 रूपये के स्टाम्प पर मनोहरसिंह (जिसके नाम हकतर्क किया गया उम्र 14 साल) के हक में ओथ कमिश्नर द्वारा 28.1.1983 को तस्दीक दस्तावेज पर नामान्तरण खोला गया।” श्रीमान में निम्न सवालों के जवाब जानना चाह रही हूँ- 1. क्या 1983 मैं ओथ कमिश्नर द्वारा जारी स्टाम्प के आधार पर नामन्तरण खोला जा सकता था? 2. क्या मेरे दादाजी के भाई के बेटे के बेटे के नाम हक तर्क हो सकता था जो उस समय 14 साल का था?  न ही वो मेरे पिताजी द्वारा गोद लिया पुत्र है। 3.श्रीमान मैं एक निरक्षर महिला हूँ। मुझे धोखे से एक बार वकील के आगे एक स्टाम्प पर अंगूठा लगवाया था इसके अलावा मैंने न तो किसी पटवारी, तहसीलदार, या रजिस्ट्रार के आगे कोई अंगूठा लगाया हे। 4. मेरी माताजी का देहांत मेरे ननिहाल में 1983 में हुआ था, में अब उनका मृत्यू प्रमाण पत्र बनवाना चाहती हूँ लेकिन मेरे पास उनकी मृत्यु या उनसे सम्बंधित कोई दस्तावेज नहीं है? उचित सलाह प्रदान करें।

समाधान-

नामान्तरण से कभी भी किसी संपत्ति का टाइटल निर्धारित नहीं होता। चूंकि आप को अब पता लगा है कि नामान्तरण आप के नाम होने के स्थान पर आप के दादा जी भाई के पुत्र ने अपने पुत्र के नाम नामान्तरण खुलवा लिया है। इस कारण अब आप तुरन्त नामान्तरण के आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त कर उस आदेश के विरुद्ध अपील कर सकती हैं।

हकत्याग एक प्रकार का अचल संपत्ति का हस्तान्तरण है इस कारण उस का उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत होना अनिवार्य है। इस तरह नोटेरी के यहाँ तस्दीक किए गए हकत्याग के विधि विपरीत विलेख के आधार पर नामान्तरण खोला जाना पूरी तरह गलत है।

आप को चाहिए कि राजस्व (खेती-बाड़ी) की जमीनों का काम देखने वाले किसी अच्छे वकील को अपने सारे दस्तावेज दिखाएँ और नामान्तरण की अपील प्रस्तुत करें। आप टाइटल के आधार पर भी राजस्व रिकार्ड में संशोधन और जमीन का कब्जा दिलाए जाने के लिए दावा प्रस्तुत कर सकती हैं। लेकिन जो भी करें अपने वकील को समस्त दस्तावेज दिखा कर उन की राय के अनुसार काम करें।

हक त्याग सिर्फ और सिर्फ किसी भी संपत्ति के सहस्वामी के हक में किया जा सकता है। उक्त भूमि की आप एक मात्र स्वामी थीं। इस कारण से किसी भी व्यक्ति के नाम आप के दादा जी के भाई के पोते के नाम  भी हकत्याग होना संभव नहीं था। इस कारण भी वह हक त्याग वैध नहीं है।

समस्या-

अर्जुन ने चौमू, जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


म ३ भाई और ३ बहिन है, जिस में से हमारी बड़ी बहिन की डेथ हो गयी २००६ में तथा मेरे पिताजी की डेथ २००९ में हो गई। पिता जी की डेथ के बाद किसी ने हमारी जमीन का गलत नामांतरण खुलवा दिया। अगर बहिन की डेथ पहले हो गयी और पिताजी की बाद में तो क्या बहिन के नाम नामांतरण खुल सकता है क्या? और अगर क़ानूनी रूप से यदि ये गलत है तो गलत नामांतरण खोलने वालों व खुलवाने वालो को दंड दिलवाने के लिए क्या करवाई की जानी है, उस के बारे में उचित जानकारी देने की कृपा करें।


समाधान-

प ने समस्या को ठीक से रखा ही नहीं है। आप ने खुद फैसला कर लिया कि नामान्तरण गलत खुला है। नामान्तरण में क्या गलत हुआ है यह ठीक से नहीं लिखा है। नामान्तरण हिन्दू उत्तराधिकार के नियम के अनुसार किया  जाना चाहिए। यह सही है कि नामान्तरण पिताजी के खाते का खुला है इस कारण उन के उत्तराधिकारियों के नाम उन के स्थान पर खाते में अंकित किए जाएंगे।

आप की बड़ी बहिन का देहान्त पिताजी के देहान्त के तीन वर्ष पहले ही हो चुका है। किसी मृत व्यक्ति के नाम तो नामान्तरण हो नहीं सकता। लेकिन यदि नामांतरण करने वाले अधिकारी को यह न बताया जाए कि आप की बहिन की मृत्यु हो चुकी है तो उसे जीवित मानते हुए ही उस के नाम नामान्तरण किया जा सकता है। यदि उस के समक्ष बड़ी पुत्री की मृत्यु का प्रमाण उपस्थित न किया गया हो तो इस निर्णय में कोई गलती नहीं है। लेकिन फिर भी गलत नामांकन हो गया है तो उस की अपील की जा सकती है।

लेकिन जिस दिन पिताजी का देहान्त हुआ है उस दिन आप की बहिन के उत्तराधिकारी अर्थात उन की संतानें जीवित हुई तो वे भी प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी हैं। उन का नाम उन के स्थान पर अंकित होगा।

लेकिन नामान्तरण यदि जानबूझ कर गलत किया गया है तो उस की शिकायत बड़े अधिकारी से की जा सकती है। यह उस अधिकारी के नियोक्ता अधिकारी का कर्तव्य है कि उस की जाँच करे और किसी तरह का दोष पाए जाने पर उसे नियमानुसार दंडित करे।

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