विधिक इतिहास Archive

भारत के संविधान ने सर्वोच्च न्यायालय को कुछ विशेष शक्तियाँ भी दी हैं। वह अनुच्छेद 71 के अंतर्गत  राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव के संबंध में उत्पन्न विवाद का निपटारा कर सकता है और ऐसे मामले में उस का निर्णय अंतिम माना जाएगा। अनुच्छेद 317 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या उस के किसी सदस्य के दुराचरण का मामला  सर्वोच्च न्यायालय को निर्दिष्ट किया जाता है और सर्वोच्च न्यायालय इस नतीजे पर पहुँचता है कि संबंधित सदस्य या अध्यक्ष को उस के पद से हटा दिया जाना चाहिए तो उसे पद से हटा दिया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय के पास मामला लंबित रहने के दौरान राष्ट्रपति ऐसे सदस्य को निलंबित रख सकते हैं।
र्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि को संविधान के अनुच्छेद 141 के द्वारा भारत के सभी न्यायालयों के लिए आबद्धकर घोषित किया गया है। इस तरह सर्वोच्च न्यायालय को विधि के एक स्रोत के रूप में स्वीकार किया गया है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय को अपने स्वयं के निर्णय को उलटने की शक्ति प्रदान की गई है। लेकिन किसी निर्णय को उलट दिए जाने तक वह निर्णय अन्य न्यायालयों पर आबद्धकर रहेगा। 
र्वोच्च न्यायालय संसद या राज्य की विधानसभाओं द्वारा निर्मित की गई विधियों को यदि वे उन की सूची के नहीं हैं तो असंवैधानिक घोषित कर सकता है। दांडिक विधि प्रशासन के मामले में सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वह न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपराधिक मामलों की अपीलों को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय को स्थानांतरित कर सकता है। न्याय प्रशासन की संपूर्णता के लिए सर्वोच्च न्यायालय वह कोई डिक्री या आदेश जारी कर सकता है। वह ऐसी डिक्री और आदेशों के संबन्ध में नियम भी बना सकता है। वह किसी भी व्यक्ति को स्वयं के समक्ष उपस्थित होने का आदेश दे सकता है।
संविधान के अनुच्छेद 145 ने सर्वोच्च न्यायालय को न्यायालय की पद्धति और प्रक्रिया के सामान्य विनियमन के संबंध में नियम बनाने की शक्ति प्रदान की है जिस के अंतर्गत वह संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति के अनुमोदन से नियम बना सकता है। इस शक्ति के अंतर्गत (1) सर्वोच्च न्यायालय अपने यहाँ विधि-व्यवसाय करने वाले व्यक्तियों के संबंध में, (2) अपीलें सुनने की प्रक्रिया और उन्हें ग्रहण किए जाने की अवधि के संबंध में, (3) संविधान के भाग 3 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों में से किसी का प्रवर्तन कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में कार्यवाहियों के बारे में, (4) सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनाए गए किसी निर्णय या आदेश के पुनार्विलोकन की शर्तों, उस की प्रक्रिया और अवधि जिसके भीतर ऐसे पुनार्विलोकन के लिए आवेदन उस न्यायालय में ग्रहण किए जाने हैं के संबंध में, (5) उस न्यायालय में अन्य कार्यवाहियों और उनके आनुषंगिक खर्चों के बारे में, तथा उस की कार्यवाहियों के संबंध में प्रभारित की जाने वाली फीसों के बारे में (6) जमानत मंजूर करने के बारे में (7) कार्यवाहियों को रोकने के बारे में (8) तुच्छ या तंग करने वाली प्रतीत होने वाली या विलंब करने के प्रयोजन से की गई अपीलों के संक्षिप्त अवधारण के लिए उपबंध करने वाले नियम बना सकता है।

सुप्रीम कोर्ट संविधान के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए नियमों के द्वारा किसी प्रयोजन के लिए बैठने वाले न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या तथा एकल न्यायाधीशों और खंड न्यायालयों की शाक्तियों के सम्बंध में नियम बना सकता है।

न दिनों यह बात चर्चा में है कि जब भोपाल त्रासदी के अभियुक्तों के विरुद्ध लगाए गए धारा 304 भाग दो दं.प्र.सं. के आरोपों को भारत का सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णय से धारा 304-ए के साधारण अपराध के आरोप में परिवर्तित कर चुका था और उस के बाद उस निर्णय के पुनर्विचार के लिए प्रस्तुत याचिका निरस्त कर दी गई थी तो अब क्या कोई ऐसा उपाय है जिस से उस निर्णय पर फिर से विचार किया जा सके? वास्तविकता यह है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के विरुद्ध अपील का उपाय उपलब्ध नहीं है। यह सही भी है। आखिर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्णय प्रदान कर देने पर कोई उपाय नहीं है। वह निर्णय अंतिम ही होना चाहिए। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में कोई दोष छूट जाने पर उस पर पुनर्विचार किया जा सकता है। लेकिन कभी अपवाद स्वरूप कोई परिस्थिति ऐसी भी उत्पन्न हो सकती है जहाँ न्याय का गला ही घुट रहा हो, या किन्हीं परिस्थितियों के कारण किसी निर्णय से विपरीत रूप से प्रभावित होने वाला किसी पक्ष की यह धारणा बन रही हो कि न्यायाधीशों ने पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर निर्णय दिया है तब कुछ तो उपाय होना चाहिए।
 
र्ष 2002 में ऐसी ही परिस्थिति का सामना भारत के सर्वोच्च न्यायालय को करना पड़ा जब रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा व अन्य के मामले के साथ कुछ अन्य रिट याचिकाएँ उस के सामने प्रस्तुत हुईं। ये सभी याचिकाएँ इस न्यायालय के पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष तब प्रेषित की गई थीं, जब उसे रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा व अन्य के मामले में एक तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा भेजा गया यह प्रश्न निर्णयार्थ उपस्थित हुआ था कि क्या किसी रिट याचिका की सुनवाई की जा कर यह न्यायालय अपने ही किसी निर्णय को शून्य और अकृत घोषित कर सकता है?
स प्रश्न पर विचार के बाद इस विस्तारित पीठ ने पाया कि कुछ विशेष परिस्थितियों में न्यायालय द्वारा पुनर्विचार याचिका निरस्त कर दिए जाने के उपरांत भी उपचारात्मक याचिका प्रस्तुत की जा सकती है और उस पर विचार किया जा सकता है। इस मामले में निर्णय देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि …….
यह अदालत, अपनी प्रक्रिया का दुरुपयोग और न्याय का गला घोंटे जाने से रोकने के लिए, अपनी निहित शक्ति (Inherent Power) का प्रयोग करते हुए फिर से अपने निर्णय पर विचार कर सकता है।
इस न्यायालय की निहित शक्ति के तहत एक ऐसी उपचारात्मक याचिका पर सुनवाई करने के लिए क्या क्या आवश्यकताएँ हो सकती हैं? जिस से कि एक उपचारात्मक याचिका की आड़ में निहित शक्ति के अंतर्गत एक दूसरी पुनर्विचार याचिका के लिए सुप्रीम कोर्ट के द्वार न खुल जाएँ और उन की बाढ़ न आ जाए। यह एक सामान्य बात है कि बहुत ही मजबूत कारण मौजूद नहीं होने पर सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही एक आदेश पर पुनर्विचार के लिए एक उपचारात्मक याचिका स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए जब कि पुनर्विचार याचिका के निरस्त हो जाने पर निर्णय पहले ही अंतिम हो चुका हो। यह न तो उचित है और न ही संभव है कि एक एक कर के वे सभी कारण बताए जाएँ जिन के आधार पर एक उपचारात्मक याचिका को स्वीकार किया जा सकता हो।
फिर भी, हमें लगता है कि एक याचिकाकर्ता राहत के लिए हकदार हो सकता है यदि वह (1) उस प्रकरण में पक्षकार नहीं था और निर्णय उस के हितों को प्रतिकूल रीति से प्रभावित कर रहा है। यदि वह पक्षकार होता तो उसे प्रकरण की सूचना दी जाती और उसे सु

अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति
र्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 129 के अंतर्गत एक अभिलेख न्यायालय है। इसी कारण से इस न्यायालय को अपनी ही अवमानना के लिए किसी व्यक्ति को दंडित करने की शक्ति प्राप्त है। अवमानना के लिए दंडित करने की इस शक्ति का प्रयोग केवल न्यायालय के न्याय प्रशासन के संबंध में ही किया जा सकता है, किसी न्यायाधीश के व्यक्तिगत अपमान के संबंध में इस शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता। 
इस शक्ति के अधीन सर्वोच्च न्यायालय ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही कर सकता है जो अवांछित उपायों से न्यायाधीशों को प्रभावित करने और न्याय की प्रक्रिया में प्रतिकूल प्रभाव डालने का प्रयत्न करता है। 
न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए अनुच्छेद 121 में यह उपबंध किया गया है कि किसी भी न्यायाधीश के आचरण और निर्णय के संबंध में संसद में चर्चा नहीं की जा सकती है। लेकिन किसी समाचार पत्र में या अन्यथा प्रकाशित किसी आलोचनात्मक आलेख या कथन से स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय प्रशासन के प्रति समुदाय के विश्वास को क्षति पहुँची हो या उस कथन या आलोचना से न्यायिक प्रशासन में अवरोध उत्पन्न हुआ हो तो उक्त कथन अथवा आलोचना को सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना माना जाएगा। 
सर्वोच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति
संविधान के अनुच्छेद 145 के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को अपनी प्रक्रिया को सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त नियम बनाने की शक्ति प्रदान की गई है। सर्वोच्च न्यायालय की नियम बनाने की यह शक्ति संसद द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन है। वह केवल वे ही नियम बना सकता है जो कि संसद द्वारा नहीं बनाए गए हों। इस तरह संसद द्वारा निर्मित विधि और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्मित नियमों में किसी भी तरह के संघर्ष की संभावना को समाप्त कर दिया गया है।
र्वोच्च न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 137 के अंतर्गत शक्ति प्रदान की गई है कि वह अपने ही निर्णयों और आदेशों का पुनर्विलोकन कर सकेगा। लेकिन उस की यह शक्ति संसद द्वारा इस संबंध में बनाए गए नियमों और संविधान के अनुच्छेद 145 के अंतर्गत स्वयं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन रहेगी।
स सम्बंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्मित नियमों में कहा गया है कि किसी भी दीवानी मामले में पुनर्विलोकन आवेदन दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 47 के आधारों के अतिरिक्त आधारों पर स्वीकार नहीं किया जाएगा तथा किसी भी दांडिक मामले में अभिलेखमुख पर दृष्टिगोचर त्रुटि के अतिरिक्त आधार पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। पुनर्विलोकन हेतु कोई भी आवेदन आलोच्य निर्णय या आदेश के तीस दिनों की अवधि में ही प्रस्तुत किया जा सकेगा तथा इस में पुनर्विलोकन किए जाने के आधारों को स्पष्ट रूप से अंकित किया जाएगा। यदि स्वयं न्यायालय कोई आदेश नहीं दे देता है तो यह आवेदन निर्णय प्रदान करने वाले न्यायाधीशों को वितरित कर, बिना मौखिक बहस सुने ही निर्णीत किया जाएगा, लेकिन आवेदक चाहे तो साथ में लिखित बहस संलग्न कर सकता है। 
न्यायालय उस के समक्ष प्रस्तुत किए गए पुनर्विलोकन आवेदन को निरस्त कर सकता है या विपक्षी पक्षकारों को नोटिस जारी कर सकता है। यदि किसी निर्णय या आदेश के विरुद्ध न्यायालय के समक्ष कोई पुनर्विलोकन आवेदन प्रस्तुत किया जाता है और न्यायालय द्वारा निर्णीत कर दिया जाता है तो उस मामले में कोई भी अन्य पुनर्विलोकन आवेदन प्रस्तुत नहीं किया जा सकेगा।
संविधान के अनुच्छेद 143 से सर्वोच्च न्यायालय को परामर्श देने की अधिकारिता प्रदान की गई है। इस उपबंध के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति उन के समक्ष कुछ विशिष्ठ परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर सर्वोच्च न्यायालय को परामर्श देने के लिए निर्देश दे सकते हैं।
नुच्छेद 143 (1) में कहा गया है कि किसी भी समय जब राष्ट्रपति के सन्मुख यह प्रकट होता है कि कोई विधि या तथ्य का प्रश्न उपस्थित हो गया है या होने की संभावना है, जो जनमहत्व का है और जिस में सर्वोच्च न्यायालय का परामर्श प्राप्त किया जाना आवश्यक है तो वह ऐसे प्रश्न को सर्वोच्च न्यायालय को विचार करने और परामर्श देने के लिए संप्रेषित कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ऐसे प्रश्न पर ऐसी सुनवाई करने के उपरांत, जिसे वह उचित समझता है, राष्ट्रपति को अपने परामर्श से अवगत करा सकता है। लेकिन इस उपबंध के अंतर्गत प्रेषित किए गए प्रश्न के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय पर परामर्श  देने की बाध्यता नहीं है।
नुच्छेद 143 (2) में यह उपबंध किया गया है कि राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा कोई भी मामला परामर्श के लिए संप्रेषित कर सकते हैं जो कि अनुच्छेद 131 के अधीन सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता में नहीं आता। ऐसे मामले में सर्वोच्च न्यायालय ऐसी सुनवाई के उपरांत जिसे वह आवश्यक समझता है, अपना परामर्श राष्ट्रपति प्रदान करेगा। इस उपबंध के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय परामर्श देने के लिए आबद्ध है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की ऐसी राय किसी भी न्यायालय पर आबद्धकारी नहीं होगी। इस मामले में दिल्ली लॉज एक्ट और केरल एजुकेशन बिल के मामले उदाहरण हैं, जिन में सर्वोच्च न्यायालय दिए गए परामर्श को न्यायालयों द्वारा आबद्धकर नहीं माना गया था।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय को उस की अपीलीय और आरंभिक अधिकारिता के अतिरिक्त संविधान में नागरिकों को प्रदत्त मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उचित कार्यवाहियाँ करने की अधिकारिता संविधान के अनुच्छेद 32 द्वारा प्रदत्त की गई है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि संविधान के खंड (3) में प्रदत्त अधिकारों को प्रवृत्त करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उचित कार्यवाहियाँ संस्थित करने के अधिकार की गारंटी दी जाती है। इसी अनुच्छेद के दूसरे चरण में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय को संविधान के भाग-3 में उपबंधित अधिकारों को प्रवृत्त करने के लिए निर्देश और आदेश जारी करने का अधिकार है और वह बंदीप्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा में से जो भी उचित हो उसी प्रकृति की रिट जारी कर सकता है। 
नुच्छेद 32 के द्वारा मूल अधिकारों का प्रवर्तन कराने के अधिकार संविधान द्वारा जो गारंटी दी गई है उसे इस संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार के अतिरिक्त किसी भी अन्य प्रकार से निलंबित नहीं किया जा सकता है।
नुच्छेद 139 के  में संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह सर्वोच्च न्यायालय को अनुच्छेद 32 में वर्णित प्रयोजनों से भिन्न किसी अन्य प्रयोजनों के लिए भी रिटें जारी करने की अधिकारिता प्रदान कर सकती है।
र्वोच्च न्यायालय भारत का अंतिम और उच्चतम न्यायिक निकाय है। यही कारण है कि उसे संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत विशेष अनुमति से अपील सुनने का प्राधिकार दिया गया है। इस अनुच्छेद के उपबंधों के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय भारत के राज्यक्षेत्र में किसी भी न्यायालय अथवा अधिकरण के किसी भी निर्णय, डिक्री, अवधारण, दंडादेश, अथवा आदेश के विरुद्ध अपील करने की विशेष अनुमति प्रदान कर सकता है। इस का केवल एक अपवाद यह है कि वह सशस्त्र सेनाओं से संबद्ध विधि के अधीन गठित न्यायालय अथवा अधिकरण के निर्णयों के विरुद्ध इस शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की विशेष अनुमति प्रदान करने की यह शक्ति किसी संवैधानिक सीमा के अधीन नहीं है अपितु सर्वोच्च न्यायालय के विवेकाधीन है। इस उपबंध का मुख्य उद्देश्य अनुच्छेद 132,133 व 134 के अंतर्गत विहित नहीं किए गए मामलों में भी नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का संरक्षण करना और व्यथित न्यायार्थी को उपाय प्रदान करना है। 
नुच्छेद 136 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को प्रदान की गई शक्ति को न तो परिभाषित किया जा सकता है और न ही उस के स्वरूप को निर्धारित किया जा सकता है। इस शक्ति पर किसी प्रकार का कोई निर्बंध नहीं लगाया जा सकता है। लेकिन इतना होने पर भी सर्वोच्च न्यायालय अपनी इस शक्ति का उपयोग अत्यंत आवश्यक और अपवादित मामलों में ही कर सकता है जिस में न्याय के हनन का गंभीर प्रश्न उपस्थित होता है।
र्वोच्च न्यायालय भारत का अंतिम न्यायालय है जहाँ किसी न्यायार्थी को न्याय प्राप्त हो सकता है। इसे सभी प्रकार के मामलों में अपीलीय शक्तियाँ प्राप्त हैं।

संवैधानिक मामले-
संविधान के अनुच्छेद 132 में यह उपबंधित किया गया है कि भारत के किसी उच्च न्यायालय की सिविल, दांडिक या अन्य कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश की अपील सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है यदि वह उच्च न्यायालय अनुच्छेद 134क के अधीन प्रमाणित कर दे कि उस मामले में कानून का ऐसा सारवान प्रश्न अंतरवलित है जिस में संविधान के किसी भाग की व्याख्या की जानी है तो सर्वोच्च न्यायालय को अपील प्रस्तुत की जा सकती है।
स तरह का प्रमाण पत्र उच्च न्यायालय द्वारा जारी कर दिए जाने पर अपील इस आधार पर भी प्रस्तुत की जा सकती है कि उस मामले में किसी प्रश्न को गलत निर्णीत कर दिया गया है।

दीवानी मामले-
संविधान के अनुच्छेद 133 में संवैधानिक प्रश्नों के अलावा अन्य दीवानी मामलों का उल्लेख किया गया है जिस के अनुसार भारत के किसी भी उच्च न्यायालय की सिविल कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश की अपील सर्वोच्च न्यायालय को की जा सकती है यदि उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर दे कि –
1. उस मामले में विधि का सार्वजनिक महत्व का कोई सारवान प्रश्न अंतर्वलित है और उच्च न्यायालय की राय में उस प्रश्न का सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विनिश्चय आवश्यक है।
2. संविधान के अनुच्छेद में संविधान की व्याख्या के संबंध में उपबंध होने पर भी इस अनुच्छेद के अंतर्गत उच्च न्यायालय द्वारा प्रमाणपत्र जारी किए जाने पर की गई अपील में यह आधार भी लिया जा सकता है कि संविधान के किसी उपबंध की व्याख्या से संबंधित विधि का कोई सारवान प्रश्न अंतरवलित है।
3. लेकिन इस अनुच्छेद के उपबंधों के अधीन किसी उच्च न्यायालय की एकल पीठ के किसी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश की अपील सर्वोच्च न्यायालय को तब तक नहीं की जा सकेगी जब तक कि ससंद विधि द्वारा इस बारे में कोई उपबंध न कर दे।

दांडिक मामले –
नुच्छेद 134 के अंतर्गत भारत के किसी उच्च न्यायालय की दांडिक कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, अंतिम आदेश या दंडादेश की अपील सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है  यदि–
1. उस उच्च न्यायालय ने अपील में किसी अभियुक्त या व्यक्ति की दोषमुक्ति के आदेश को उलट दिया है और उसको मॄत्यु दंडादेश दिया है ; या
2. उस उच्च न्यायालय ने अपने प्राधिकार के अधीनस्थ किसी न्यायालय से किसी मामले को विचारण के लिए अपने पास मंगा लिया है और ऐसे विचारण में अभियुक्त या व्यक्ति को सिद्धदोष ठहराया है और उसको मॄत्यु दंडादेश दिया है ; या
3. वह उच्च न्यायालय अनुच्छेद 134क के अधीन प्रमाणित कर देता है कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में अपील किए जाने योग्य है।
स के अतिरिक्त संसद विधि द्वारा उपबंध कर के सर्वोच्च न्यायालय को भारत के किसी उच्च न्यायालय की दांडिक कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, अंतिम आदेश या दंडादेश की अपील ऐसी विधि में उपबंधित शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए अपील ग्
रहण करने और सुनने की अतिरिक्त शक्ति दे सकती है।

क्त संवैधानिक, दीवानी और दांडिक मामलों में किसी उच्च न्यायालय द्वारा अपील योग्य होने का प्रमाणपत्र जारी होने पर भी सर्वोच्च न्यायालय यदि यह समझता है कि उच्च न्यायालय द्वारा प्रमाणपत्र जारी करने के उपबंध का उचित रूप में प्रयोग नहीं किया गया है तो वह मामले को वापस उच्च न्यायालय को पुनःप्रेषित कर सकता है या फिर अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए उस अपील को विशेष अनुमति से की गई अपील मान कर ग्राह्य कर सकता है।
गस्त 1935 में ब्रिटिश संसद ने भारत शासन अधिनियम 1935 पारित किया। इस अधिनियम ने 1919 के अधिनियम का स्थान लिया। इस अधिनियम के उपबंधों से भारत में विधान मंडल, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यों को विनियमित करने का उल्लेखनीय प्रयत्न किया गया था। न्याय और विधि के क्षेत्र में इस अधिनियम द्वारा उच्च न्यायालयों की रचना, गठन, अधिकारिता और शक्तियों क नए सिरे से निर्धारण किया गया।
स अधिनियम से उच्च न्यायालयों को अभिलेख न्यायालयों के रूप में मान्यता प्रदान की गई। इस के द्वारा ब्रिटिश सम्राट को उच्च न्यायालयों के लिए मुख्य न्यायाधीश सहित यथोचित संख्या में न्यायाधीश नियुक्त करने का प्राधिकार प्रदान किया गया। साथ ही सम्राट को न्यायाधीशों को पदच्युत करने की शक्ति भी प्रदान की गई थी। इस अधिनियम के अंतर्गत गवर्नर जनरल को किसी भी उच्च न्यायालय के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त करने का प्राधिकार भी दिया गया था। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 60 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रह सकते थे। नई व्यवस्था में न्यायपालिका को कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया था। पहले की व्यवस्था में न्यायाधीश ब्रिटिश सम्राट की इच्छा पर्यंत अपने पद पर बने रह सकते थे, जब  कि इस अधिनियम के द्वारा उन का कार्यकाल निश्चित कर दिया गया था। न्यायाधीशों पर किसी भी प्रकार का दबाव प्रभावी नहीं हो सकता था और वे स्वतंत्र रूप से न्याय प्रदान कर सकते थे। न्यायाधीशों को हटाने के मामले में प्रिवी कौंसिल ब्रिटिश सम्राट को निर्दिष्ट कर सकती थी। 
न्यायाधीशों की योग्यता भी नए सिरे से विनिर्दिष्ट की गई थी। इस के लिए दस वर्ष तक के अनुभवी बैरिस्टर, भारतीय सिविल सेवा में 10 वर्ष की सेवा पूर्ण कर लेने वाले अधिकारी जिस ने न्यूनतम दो वर्ष जिला न्यायाधीश के रूप में कार्य किया हो, 10 वर्ष से अधिक की अवधि तक लघुवाद न्यायालय में  सहायक न्यायाधीश अथवा न्यायाधीश के कार्य का अनुभव रखने वाले या ऐसे व्यक्ति जो 10 वर्ष तक उच्च न्यायालय में प्लीडर के रूप में कार्य कर चुके हैं उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होने के लिए अर्हता रखते थे। 
न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय ब्रिटिश सम्राट को उन के वेतन, भत्ते और पेंशन आदि लाभों को निर्धारित करने का प्राधिकार दिया गया था। यह स्पष्ट किया गया था कि इस व्यवस्था में न्यायाधीश की नियुक्ति के उपरांत कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा। इस तरह न्यायाधीशों को सेवा सुरक्षा प्रदान की गई थी जो स्वतंत्र न्यायपालिका के विकास के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हुई थी।
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