विधिक इतिहास Archive

पटना उच्च न्यायालय
पटना उच्च न्यायालय
बिहार और उड़ीसा कलकत्ता प्रेसीडेंसी के ही भाग थे। 1912 में बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग कर एक अलग प्रांत बनाया गया। तभी यह निश्चित हो गया था कि इस प्रांत के लिए अलग उच्च न्यायालय होना आवश्यक है। 22 मार्च 1912 को पटना में उच्च न्यायालय की स्थापना के लिए घोषणा पत्र जारी कर दिया गया। 1 दिसंबर 1913 को पटना हाईकोर्ट की इमारत के निर्माण के लिए शिलान्यास हुआ। 1916 में इस इमारत का निर्माण पूर्ण हो जाने पर 3 फरवरी 1916 को उच्च न्यायालय की स्थापना कर दी गई। पटना उच्च न्यायालय में वास्तविक रूप से कार्य 1 मार्च 1916 को ही आरंभ हुआ। पटना उच्च न्यायालय को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समान ही अधिकारिता प्रदान की गई थी। उड़ीसा को बिहार प्रांत से 1936 में पृथक कर दिया गया। हालांकि उड़ीसा उच्च न्यायलय की स्थापना भारत स्वतंत्र हो जाने के उपरांत 1948 में ही हो सकी। तब तक पटना उच्च न्यायालय की अधिकारिता उड़ीसा पर भी बनी रही। 
लाहौर उच्च न्यायालय
लाहौर हाईकोर्ट
पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह ने सदर अदालत की स्थापना की थी। जैसे ही अंग्रेजों ने पंजाब पर अधिकार किया, पूर्व की परंपरा के अनुसार वहाँ चीफ कोर्ट के नाम से सदर अदालत को चालू रखा इसे ही बोर्ड ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन कहा जाता था। 1853 में बोर्ड ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन  को चीफ कमिश्नर की कोर्ट में बदल दिया गया। इस न्यायालय में  एक एडमिनिस्ट्रेशन कमिश्नर और  एक जुडिशियल कमिश्नर हुआ करता था। 1919 में लेटर्स पेटेंट के अंतर्गत लाहौर में उच्च न्यायालय की स्थापना हुई। जिस के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति ब्रिटिश सम्राट द्वारा की गई थी। 21 मार्च 1919 को स्थापित किए गए लाहौर उच्च न्यायालय की अधिकारिता में पंजाब और दिल्ली के क्षेत्र सम्मिलित थे। लाहौर उच्च न्यायालय को भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तरह ही शक्तियाँ प्रदान की गई थीं। स्वतंत्रता के साथ ही देश का विभाजन हो जाने से लाहौर उच्च न्यायालय पाकिस्तान में चला गया। तब पंजाब के लिए पृथक उच्च न्यायालय की स्थापना की गई। 1966 में संघ राज्य दिल्ली के लिए उच्च न्यायालय की पृथक स्थापना तक पंजाब उच्च न्यायालय की अधिकारिता दिल्ली के क्षेत्र पर भी बनी रही।

न् 1861 के अधिनियम की धारा 16 के अंतर्गत ब्रिटिश क्राउन ने 17 मार्च 1886 को एक लेटर्स पेटेंट जारी कर उत्तर पश्चिमी प्रांतों के लिए आगरा में एक उच्च न्यायालय स्थापित करने का उपबंध किया गया था। 1875 में यह उच्च न्यायालय इलाहाबाद अंतरित कर दिया गया। इस तरह इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना हुई। इस उच्च न्यायालय को भी प्रेसीडेंसी नगरों के उच्च न्यायालयों की भांति ही दीवानी और दांडिक अधिकारिता प्रदान की गई थी। लेकिन उसे उन की तरह नौकाधिकरण विषयक और दीवाला विषयक अधिकारिता प्रदान नहीं की गई। प्रेसीडेंसी नगरों के उच्च न्यायालयों को प्रेसीडेंसी नगरों के लिए आरंभिक अधिकारिता प्रदान की गई थी। जब कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय को कोई आरंभिक दीवानी और दांडिक अधिकारिता नहीं दी थी। 
सपरिषद गवर्नर जनरल को उच्च न्यायालयों की अधिकारिता परिवर्तन का अधिकार
च्च न्यायालय अधिनियम, 1865 के उपबंधों के अधीन सपरिषद गवर्नर जनरल को 1861 के अधिनियम के अंतर्गत स्थापित उच्च न्यायालयों की अधिकारिता में उपयुक्त परिवर्तन करने का अधिकार दिया गया। लेकिन उक्त शक्ति का उपयोग ब्रिटिश क्राउन द्वारा अनुमोदन के पश्चात ही किया जा सकता था।
उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि
भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम 1911 के द्वारा 1861 के अधिनियम में आवश्यक संशोधन किए गए। इन के द्वारा मुख्य न्यायाधीश सहित उच्च न्यायालयों में 16 के स्थान पर 20 न्यायाधीश नियुक्त किए जा सकते थे। सपरिषद गवर्नर जनरल उच्च न्यायालय में दो वर्ष के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त कर सकता था। इस अधिनियम में स्पष्ट कर दिया गया था कि न्यायाधीशों को वेतन आदि का संदाय भारतीय राजस्व से ही किया जा सकता था। 
भारत शासन अधिनियम 1915
च्च न्यायालयों के पुनर्गठन और ब्रिटिश भारत में अन्य स्थानों पर उच्च न्यायालय स्थापित करने के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा भारत शासन अधिनियम-1915 पारित किया गया। इस के द्वारा 1861 और  1911 के अधिनियमों का निरसन कर दिया गया। इस अधिनियम के उपबंधों के अंतर्गत न्यायाधीशों की संख्या की सीमा समाप्त कर दी गई और ब्रिटिश सम्राट को उपयुक्त संख्या में मुख्य न्यायाधीश व अन्य न्यायाधीश नियुक्त करने का प्राधिकार प्रदान किया गया। उच्च न्यायालयों को उन्मुक्त समुद्र पर होने वाले अपराधों और नौकाधिकरण विषयक अधिकारिता सहित अपीली दीवानी और दांडिक अधिकारिता दे दी गई। इस अधिनियम के द्वारा उच्च न्यायालयों को अभिलेख न्यायालय का स्तर प्रदान किया गया और उन्हें न्यायालयों के कामकाज को विनियमित करने के लिए नियम बनाने का प्राधिकार प्रदान किया गया। उच्च न्यायालयों को राजस्व संकलन संबंधी कार्यों के लिए जो स्थानीय प्रथाओं और रूढ़ियों के अनुसार किए गए हों उन पर भी अधिकारिता प्रदान की गई थी। 
स अधिनियम से उच्च न्यायालयों को अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण का अधिकार प्रदान किया गया। वे अधीनस्थ न्यायालयों को उपयुक्त विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दे सकते थे और किसी भी मामले को उचित समझने पर स्वयं के समक्ष अंतरित कर सकते थे। अब उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों की कार्यवाही और प्रक्रिया के संबंध में आवश्यक नियम, विनियम व प्रपत्र जारी कर सकते थे, लेक

प्रेसीडेंसी नगरों में उच्च न्यायालयों की स्थापना भारत में न्यायिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव था। इस से पूर्व में प्रचलित दोहरी न्यायिक प्रणाली का अंत हो गया था। यह व्यवस्था व्यावहारिक और सरल थी। पूर्ववर्ती सुप्रीमकोर्ट और सदर दीवानी और सदर निजामत अदालतों की अधिकारिता उच्च न्यायालय में निहित हो जाने से उस का कार्यक्षेत्र अत्यंत विस्तृत हो गया था। पहले सुप्रीम कोर्ट में केवल ब्रिटिश व्यक्ति ही न्यायाधीश हो सकते थे, लेकिन 1861 के अधिनियम से भारतीय व्यक्तियों के हाईकोर्ट में न्यायाधीश बनने का मार्ग खुल गया था। इस अधिनियम से स्थानीय विधियों, प्रथाओं और परंपराओं का न्याय करने में समुचित उपयोग का मार्ग भी खुल गया था। 
पूर्व में अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा जिस विधि का उपयोग किया जाता था, सुप्रीमकोर्ट में उस से भिन्न विधि का उपयोग किया जाता रहा था। उच्च न्यायालयों की स्थापना से विधि और साम्य के सिद्धांतों का सभी न्यायलयों में एक जैसा उपयोग आरंभ हो चला था। उच्च न्यायालय अपनी अपीली अधिकारिता में अधीनस्थ न्यायालयों में अपनाई जाने वाली विधि और साम्य के सिद्धांतों का ही उपयोग करने लगे थे। इस से विधि और साम्य के सिद्धांतों में एक रूपता दृष्टिगोचर होने लगी थी। इस ने न्यायपालिका की विश्वसनीयता में वृद्धि की थी। हालांकि अधिनियम में न्यायाधीशों को सद्विवेक से काम लेने की हिदायत दी गयी थी लेकिन इसे परिभाषित न करने के कारण कोई भी न्यायाधीश सद्विवेक का उपयोग किसी भी तरह कर सकता था और इस से कुछ कठिनाइय़ाँ बढ़ गई थीं। 
च्च न्यायालयों की स्थापना के उपरांत ही सिविल प्रक्रिया संहिता दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड संहिता के निर्माण को बल मिला और इन के निर्माण से संपूर्ण भारत में दंड व्यवस्था और दीवानी और दांडिक न्याय में प्रक्रिया संबंधी एकरूपता स्थापित हो सकी थी। जिन क्षेत्रों में स्पष्ट विधि संहिताएँ नहीं बनाई गई थीं वहाँ विधि की दुविधा बनी रहती थी। इस तरह 1861 के अधिनियम से भारत में उच्च न्यायालयों की स्थापना विधि और न्याय के क्षेत्र में एक युगांतरकारी घटना हो गई थी। इस व्यवस्था से न्याय प्रशासन के अंतर्विरोधों के समाप्त कर सामंजस्य स्थापित करने का प्रयत्न किया गया था। उच्च न्यायालयों की स्थापना से आंग्ल-भारतीय संहिताओं के सृजन की राह बन गई थी। लेकिन यह सब यूँ ही नहीं हो गया था। इस के पीछे 1857 का आजादी का असफल आँदोलन था जिसे अंग्रेजी सत्ता ने एक विद्रोह के रूप में देखा था। और जब जब भी विद्रोह हुए हैं उस का एक प्रमुख कारण तत्कालीन न्याय व्यवस्था पर से जनता का विश्वास उठना रहा है।
दीवानी और दांडिक अधिकारिता के अतिरिक्त उच्च न्यायालयों को कुछ अन्य अधिकारिताएँ भी प्रदान की गई थीं।
नौकाधिकरण की अधिकारिता- इस के अंतर्गत उच्च न्यायालयों को एडमिरल और उपएडमिरल के न्यायालयों के रूप में भारत में उत्पन्न होने वाले दीवानी, दांडिक, प्राइज, आदि नौकाधिकरण संबंधी सभी मामलों का विचारण करने का अधिकार दिया गया था।
वसीयती मामलों पर अधिकार- उच्च न्यायालयों को पूर्ववर्ती सुप्रीमकोर्ट की तरह ही वसीयती मामलों में प्रोबेट और निर्वसीयती मामलों में प्रशासन-पत्र स्वीकृत करने की शक्ति दी गई थी।
वैवाहिक मामलों में अधिकारिता- उच्च न्यायालय को ईसाई धर्मावलंबियों के संबंध में वैवाहिक अधिकारिता प्रदान की गई थी। इस पर यह बंधन लगाया गया था कि न्यायालय किसी ऐसे मामले की सुनवाई नहीं कर सकता जिस की अधिकारिता चार्टर द्वारा नहीं दी गई हो।
एकल न्यायाधीश और खंडपीठ की अधिकारिता- उच्च न्यायालयों को आरंभिक तथा अपीली अधिकारिता के कार्य करने के लिए एकल न्यायाधीश या खंडपीठ द्वारा सुनवाई के अधिकार दिए गए थे। इस तरह मामलों में एक से अधिक न्यायाधीशों की एकराय से  या बहुमत की राय से निर्णय किए जाने का अधिकार उच्च न्यायालयों को प्राप्त हो गया था। खंडपीठ में समान रूप से विपरीत राय होने पर वृहत पीठ गठित की जा सकती थी। 
उच्च न्यायालय की व्यवहार की विधि- उच्च न्यायालय को सिविल मामलों की प्रक्रिया के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता का अनुसरण करने का निर्देश दिया गया था। वह नौकाधिकरण, विवाह और वसीयत आदि के अन्य मामलों में प्रक्रिया के नियम स्वयं बना सकता था। आरंभिक दांडिक मामलों में अपराधिक मामलों के लिए पूर्ववर्ती सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपनाई जा रही प्रक्रिया को ही अपनाने का निर्देश दिया गया था अन्य दांडिक मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता 1861 का उपयोग करने का निर्देश दिया गया था।
अपील –  दांडिक मामलों के अतिरिक्त अन्य 10000 रुपए से अधिक मूल्य के मामलों में उच्च न्यायालय के निर्णय की अपील प्रिवी कौंसिल के समक्ष की जा सकती थी। लेकिन इस के लिए उच्च न्यायालय से यह प्रमाण पत्र प्राप्त करना आवश्यक था कि मामला अपील के योग्य है। 
राजस्व संबंधी अधिकारिता- पू्र्ववर्ती सुप्रीम कोर्ट से राजस्व संबंधी मामलों की अधिकारिता वापस ले ली गई थी। लेकिन उच्च न्यायालय स्थापित होने पर उन्हें राजस्व मामलों पर भी अधिकारिता प्रदान की गई। हालांकि राजस्व संबंधी अधिकारिता पर प्रारंभ में कुछ असमंजस और विवाद बना रहा, लेकिन बाद में यह निर्धारित किया गया कि उच्च न्यायालय राजस्व मंडल को परमादेश जारी कर सकता है।
मामलों को अंतरित करने की शक्ति- उच्च न्यायालय को किसी भी अधीनस्थ न्यायालय से अपराधिक मामले अथवा अपील को किसी भी अन्य अधीनस्थ न्यायालय में अंतरित करने की शक्ति प्रदान की गई थी। वह किसी भी मामले में अन्वेषण करने और विचारण करने का निर्देश दे सकता था।
अन्य विविध अधिकार- उच्च न्यायालय को यह शक्ति प्रदान की गई थी कि वह अपने मुख्यालय के अतिरिक्त कहीं भी अपनी बैठकें कर सकता है। उच्च न्यायालय को सरकार द्वारा विवरण मांगे जाने पर आवश्यक विवरण सरकार को देने हेतु प्रावधान किया गया था। वह अपने यहाँ लिपिक आदि कर्मचारियों की नियुक्ति कर सकता था लेकिन उस के लिए सरकार का अनुमोदन आवश्यक कर दिया गया था। 
विधि व्यवसाइयों का पंजीयन- उच्च न्यायालय को अधिवक्ताओं, वकीलों और अटॉर्नियों को स्वीकृत, अनुमोदित करने और

दिसंबर 1885 में जारी लेटर्स पेटेंट के द्वारा उच्च न्यायालयों की दांडिक अधिकारिता भी निश्चित कर दी गई थी। जो इस प्रकार थी-
1- साधारण आरंभिक दांडिक अधिकारिता- उच्च न्यायालयों की साधारण दांडिक अधिकारिता का विस्तार प्रेसीडेंसी नगर की सीमा में निवास करने वाले समस्त व्यक्तियों और इस सीमा से बाहर रहने वाले ब्रिटिश नागरिकों पर किया गया था। इस अधिकारिता के अंतर्गत उच्च न्यायालय ऐसे सभी व्यक्तियों का विचारण कर सकता था जो विधि की प्रक्रिया द्वारा उस के समक्ष लाए गए हों। इस तरह उच्च न्यायालयों को सुप्रीम कोर्ट की समस्त आरंभिक दांडिक अधिकारिता अंतरित कर दी गई थी। 
2- असाधारण आरंभिक दांडिक अधिकारिता- इस के द्वारा कलकत्ता उच्च न्यायालय को अपने अधीक्षण के अंतर्गत आने वाले किसी भी अधीनस्थ न्यायालय की अधिकारिता के अधीन कहीं भी निवास करने वाले व्यक्तियो का विचारण करने की आरंभिक दी गई थी। इस के अंतर्गत उच्च न्यायालय एडवोकेट जनरल, मजिस्ट्रेट या सरकार द्वारा सक्षम बनाए गए अधिकारी द्वारा उस के समक्ष प्रस्तुत किए गए व्यक्ति पर विचारण कर सकता था। यह उपबंध बिलकुल नया था। इस से पहले सदर निजामत अदालत को इस प्रकार की शक्ति प्राप्त नहीं थी। इस तरह कलकत्ता उच्च न्यायालय की शक्तियों का असीमित विस्तार हो गया था।
3- दांडिक अपीली अधिकारिता- इस के अंतर्गत उच्च न्यायालय अपने अधीक्षण के अंतर्गत अधीनस्थ दांडिक न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई कर सकते थे। लेकिन उसे उच्च न्यायालय की एकल अथवा खंड पीठ के निर्णयों की अपील की सुनवाई का अधिकार नहीं दिया गया था। लेकिन वह ऐसे मामलों में पुनरीक्षण कर सकता था। 
 4- निर्दिष्ट मामलों की सुनवाई और पुनरीक्षण- उच्च न्यायालयों को निर्देशन और पुनरीक्षण का अधिकार दिया गया था। जिस के अंतर्गत वे अपने अधीन सत्र न्यायाधीस या मामलों को निर्दिष्ट करने के लिए नियुक्त अधिकारी द्वारा निर्दिष्ट मामलों की सुनवाई कर सकते थे। वह किसी सक्षम न्यायालय द्वारा मामलों का विचारण किए जाने के उपरांत भी उन के निर्णयों का पुनरीक्षण कर सकता था और दण्ड में उपयुक्त परिवर्तन कर सकता था।
कलकत्ता उच्च न्यायालय
भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम-1861 (Indian High Courts Act-1861) से स्वतः ही किसी उच्च न्यायालय की स्थापना भारत में नहीं हुई। इस के लिए ब्रिटेन की महारानी ने दिनांक 14 मई 1862 को कलकत्ता के लिए आदेश जारी किया लेटर्स पेटेंट 1 जुलाई 1862 को जारी हुआ और अगले दिन 2 जुलाई 1862 से कलकत्ता में उच्च न्यायालय ने काम करना आरंभ कर दिया। यह भारत के न्यायिक इतिहास के लिए मील का पत्थर था। इस दिन से भारतीय न्यायिक व्यवस्था ने एक नए युग में कदम रखा था। जिस के कारण समूचे भारत में एक जैसी न्याय व्यवस्था की नींव पड़ गई थी।  को इसी तरह बम्बई और मद्रास के लिए 26 जून 1862 को लेटर्स पेटेंट जारी किया गया। जिस के अनुसार 14 अगस्त 1862 को मुम्बई में और 16 अगस्त 1862 को मद्रास में उच्च न्यायालयों की स्थापना हुई। बाद में उक्त लेटर्स पेटेंट दोष युक्त पाया गया और उसे निरसित कर 1865 में न्या लेटर्स पेटेंट जारी किया गया। तीनों उच्च न्यायालयों के लिए जारी किए गए लेटर्स पेटेंट समान थे। जिस के कारण तीनों उच्च न्यायालयों को समान अधिकारिता अपने अपने क्षेत्रों में प्राप्त हो गई थी। 28 दिसंबर 1965 को जारी किए गए लेटर्स पेटेंट के द्वारा उच्च न्यायालयों की अधिकारिता सुनिश्चित की गई थी। जो इस प्रकार थी।
सिविल अधिकारिता-
 1- साधारण आरंभिक सिविल अधिकारिता- उच्च न्यायालयों की आरंभिक अधिकारिता में प्रेसीडेंसी नगरों की विनिर्दिष्ट सीमा में अथवा भारत के विधान मंडल की विधि द्वारा निर्धारित सीमा के अंतर्गत होने वाले भूमि और स्थाई संपत्ति संबंधि समस्त मामले समाविष्ट किए गए थे। उच्च न्यायालय इन का विचारण और निपटारा कर सकता था। लेकिन ऋण, क्षतियों और संपत्ति के 100 रुपए से कम मूल्य के मामलों को उच्च न्यायालय की अधिकारिता के बाहर रखा गया था। जो मामले उस समय तक कलकत्ता उच्च न्यायालय में दायर किए जा सकते थे उन के लिए आवश्यक था कि कलकत्ता प्रेसीडेंसी की सीमा में उन के लिए वाद हेतुक  उत्पन्न हुआ हो या संपत्ति उस सीमा में स्थित हो या प्रतिवादी उस सीमा में निवास, व्यापार या लाभार्जन से कोई कार्य करता हो। उच्च न्यायालय को प्रेसीडेंसी नगर की सीमा के बाहर के प्रारंभिक मामलों की सुनवाई और निपटारे का अधिकार नहीं दिया गया था।
2- असाधारण आरंभिक सिविल अधिकारिता- इस अधिकारिता के अधीन उच्चन्यायालय  अपने अधीनस्थ किसी भी न्यायालय में लंबित किसी भी मामले को अपने समक्ष प्रस्तुत करने का लिखित आदेश जारी कर सकता था यदि मामले के पक्षकारों ने इस के लिए सहमति प्रकट की हो या न्याय के निर्वहन के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक हो गया हो। उच्च न्यायालय ऐसे मामलों की सुनवाई कर निर्णीत कर सकता था। 
3- समान वाद हेतुक वाले मामलों में एक साथ सुनवाई करने की शक्ति- उच्च न्यायालय को यह शक्ति प्रदान की गई थी कि एक से अधिक मामलों में समान वाद हेतुक होने पर उन मामलों को एक साथ ग्राह्य किया जा सकता था। ऐसे मामलों में उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा व्यवहृत विधि का ही प्रयोग कर सकता था। 
4- सिविल अपीलीय अधिकारिता- उच्च न्यायालयों को सदर दीवानी अदालतों की सिविल अपीलीय अधिकारिता अंतरित की गई थी। वह समस्त ऐसे मामलों में निर्णयों की अपीलें सुन सकता था जिसे उसे विधि अथवा विनियमो

भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम 1861 : भारत में विधि का इतिहास-77

May 1, 2010 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
ब्रिटिश संसद ने 1861 में भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम पारित किया और इसी के साथ भारत में उच्च न्यायालयों के इतिहास का आरंभ हुआ। इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश क्राउन को भारत में आवश्यकतानुसार उच्च न्यायालय स्थापित करने का प्राधिकार दिया गया था। प्रारंभ में कलकत्ता, मद्रास और बम्बई में उच्च न्यायालय स्थापित किए गए। भविष्य में भी लेटर्स पेटेंट द्वारा भारत में आवश्यकतानुसार उच्च न्यायालय स्थापित करने का अधिकार ब्रिटिश क्राउन को प्रदान किया गया था। इस अधिनियम में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए अर्हताएँ निर्धारित की गई थीं। जिस के अनुसार एक भारतीय को भी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता था। यह दूसरी बात थी कि तब तक भारतियों में शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा रहा हो जो इन अर्हताओं की पूर्ति कर सके। 
धिनियम के अनुसार मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 15 न्यायाधीश एक उच्च न्यायालय में नियुक्त किए जा सकते थे। इन में से एक तिहाई पाँच वर्ष का बैरिस्टरी का अनुभव रखने वालों के लिए, एक तिहाई पद ब्रिटिश सिविल सेवा के अनुबंधित कर्मचारियों के लिए जिन्हें तीन वर्ष तक जिला न्यायाधीश के रूप में काम करने का अनुभव रहा हो या मुख्य सदर अमीन अथवा लघुवाद न्यायालय के न्यायाधीश के  रूप में पाँच वर्ष कार्य किया हो और शेष एक तिहाई सुप्रीम कोर्ट अथवा सदर दीवानी अदालत में 10 वर्ष तक प्लीडर के रूप में काम करने वाले व्यक्तियों के लिए आरक्षित किए गए थे। ये न्यायाधीश ब्रिटिश सम्राट की इच्छा पर्यंत अपने पद पर बने रह सकते थे।उच्च न्यायालय में सुप्रीम कोर्ट की समस्त अधिकारिता अंतरित कर दी गई थी। अधिनियम में स्पष्ट किया गया था कि प्रेसीडेंसी नगरों के लिए समस्त सिविल, दांडिक, नौकाधिकरण विषयक, वसीयती, और विवाह आदि समस्त मामलों पर प्रारंभिक और अपीली अधिकारिता उच्च न्यायालयों को रहेगी। प्रेसीडेंसी नगरों के बाहर के क्षेत्रों के लिए सिविल और दांडिक अधिकारिता उच्च न्यायालय में निहीत की गई थी।
स अधिनियम से ब्रिटिश क्राउन को भारत में उच्च न्यायालय स्थापित करने का प्राधिकार तो मिल गया था लेकिन इस के द्वारा सीधे किसी उच्च न्यायालय की स्थापना नहीं की गई थी। इस अधिनियम  के द्वारा कलकत्ता, मद्रास और बम्बई के सुप्रीम कोर्टों को समाप्त कर उन के अभिलेख को उच्च न्यायालय के रिकार्ड के रूप में मान्यता प्रदान की गई थी। अधिनियम की धारा 9 से ब्रिटिश क्राउन को उच्च न्यायालयो की अधिकारिता में संशोधन का प्राधिकार दिया गया था। धारा 10 से सु्प्रीम कोर्टों और सदर अदालतों की अधिकारिता उच्च न्यायालयों को अंतरित करने का उपबंध किया गया था। पहले के सभी उन कानूनों को बाध्यकारी मान लिया गया था जो इस अधिनियम के विपरीत नहीं थे। धारा 15 से अधीनस्थ न्यायालयो का अधीक्षण करने और उन के लिए नियम बनाने की शक्तियाँ उच्च न्यायालयों को प्रदान की गई थीं। वे अधीनस्थ न्यायालय को विवरण प्रस्तुत करने का आदेश दे सकते थे, अपीलों को किसी भी न्यायालय को अंतरित कर सकते थे। सब से उल्लेखनीय बात यह थी कि उच्च न्यायालयों को प्रक्रिया संबंधी नियम बनाने की स्वायत्तता प्रदान की गई थी। 
ब्रिटिश भारत में 1861 तक जो न्यायिक व्यवस्था विकसित हुई थी वे दो भिन्न प्रकार की थीं। प्रेसीडेंसी नगरों मद्रास, कलकत्ता और मुम्बई में सुप्रीम कोर्ट स्थापित थे जो ब्रिटिश क्राउन के न्यायालय थे। ये ब्रिटिश संसद की विधिक प्राधिकारिता और सुप्रीम कोर्ट द्वारा पंजीकृत विनियमों के प्रति उत्तरदायी थे। वे हिन्दू और मुसलमानों के कुछ विशिष्ठ दीवानी मामलों को छोड़ कर ब्रिटिश विधि का ही अनुसरण करते थे। सुप्रीम कोर्ट की अधिकारिता प्रेसीडेंसी नगरों और उन की विस्तृत अधिकारिता के क्षेत्रों में निवास करने वाले ब्रिटिश प्रजाजनों पर ही लागू थी। मुफस्सल क्षेत्रों के केवल उन्हीं मामलों की सुनवाई का उन्हें अधिकार था जिनमें किसी ब्रिटिश नागरिक के साथ 500 रुपए से अधिक मूल्य की कोई संविदा विवादास्पद हो। अथवा प्रतिवादी ने सुप्रीम कोर्ट से मामले का निपटारा करने की अनुमति दे दी हो। सुप्रीम कोर्टों को राजस्व मामलों की सुनवाई का अधिकार नहीं था। इन के न्यायाधीश सीधे क्राउन द्वारा नियुक्त किए जाते थे जो केवल ब्रिटिश नागरिक हो सकते थे।
प्रेसीडेंसियों के अतिरिक्त मुफस्सल क्षेत्रों में कम्पनी के न्यायालय कार्यरत थे। अधीनस्थ न्यायालयों की उच्चतम अपील सदर दीवानी अदालत और सदर निजामत अदालत में की जा सकती थी। इन अदालतों की अधिकारिता में सामान्यतः केवल भारतीय नागरिकों को ही सम्मिलित किया गया था और यूरोपीय व्यक्तियों को उस से अलग रखा गया था। इन अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रान्तीय सरकारों द्वारा की जाती थी। इन अदालतों में भारतीय परंपरागत हिन्दू और मुस्लिम विधियों को मान्यता दी गई थी। इन अदालतों की प्रक्रिया सुगम थी और सु्प्रीम कोर्ट की भांति जटिल नहीं थी। 
स तरह की दोहरी न्यायिक व्यवस्था से जटिल परिस्थितियाँ उत्पन्न होती रहती थीं। सुप्रीम कोर्टों ने अनेक बार अपने न्यायिक क्षेत्राधिकार के बाहर जा कर मामलों को ग्रहण किया और उन में निर्णय प्रदान कर उन का निष्पादन भी किया। अनेक बार कुछ मामलों को दोनों ही तरह के न्यायालयों ने ग्रहण कर लिया और भिन्न-भिन्न निर्णय प्रदान कर दिए। इस कारण से सुप्रीम कोर्ट और सपरिषद गवर्नरों के बीच विवाद उठते रहते थे। ब्रिटिश भारत में उच्चतम अपील केवल किंग इन कौंसिल को ही की जा सकती थी। यह व्यवस्था सुविधा जनक नहीं थी और इंग्लेंड जा कर अपील करना केवल चंद लोगों के लिए ही मुमकिन हो सकता था। कंपनी न्यायालयों के निर्णय सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार में जा कर निष्पादित करा पाना संभव नहीं था और उन्हें न्याय प्राप्त करने के लिए फिर से सुप्रीम कोर्ट में जाना होता था। 
1833 के अधिनियम से कंपनी न्यायालयों की दीवानी अधिकारिता का विस्तार यूरोपीय व्यक्तियों तक किया जा कर इस विषमता को कम करने का प्रयास किया गया था। किन्तु यह एक अधूरा उपाय था। यूरोपीय व्यक्तियों को उच्चतम दीवानी न्यायालय के निर्णय की अपील भी सुप्रीम कोर्ट में किए जाने का अधिकार दिया गया था। जहाँ मामले पर एक पूरी तरह भिन्न पद्धति से विचार होता था और अक्सर निर्णयों को उलट दिया जाता था। 1853 में नियंत्रण मंडल के अध्यक्ष चार्ल्स वुड ने सुप्रीम कोर्ट दीवानी अदालतों के एकीकरण का सुझाव दिया। लेकिन इसे विधि आयोग द्वारा मान्य नहीं किया गया। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के उपरांत भारत में कम्पनी का राज पूरी तरह समाप्त हो गया और ब्रिटिश भारत पर ब्रिटिश क्राउन का सीधा नियंत्रण स्थापित किया गया। इसी समय दीवानी प्रक्रिया संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड संहिता की रचना की गई। 
सेक्रेट्री और स्टेट ने 1861 में हाउस ऑफ कॉमन्स के समक्ष स्पष्ट किया कि दोनों न्यायिक व्यवस्थाओं का एकीकरण कर के ब्रिटिश कानूनी ज्ञान और भारत की देशज विधियों, प्रथाओं और परम्परागत ज्ञान को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। इस अवधारणा के अंतर्गत 1861 में भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम (Indian High Courts Act) पारित किया गया जो 6 अगस्त 1861 से प्रभावी हुआ। इस अधिनियम के अंतर्गत कलकत्ता, मद्रास और मुम्बई में एक एक उच्च न्यायालय स्थापित करने तथा तीनों प्रेसीडेंसियों में स्थापित सुप्रीम कोर्टों और सदर अदालतों को समाप्त करने  का अधिकार ब्रिटिश क्राउन को दिया गया।
मध्य प्रांत की न्यायिक व्यवस्था
ध्य भारत के ब्रिटिश क्षेत्रों के लिए जिन्हें मध्य प्रांत कहा जाता था, 1865 के 14वें अधिनियम के द्वारा न्यायिक व्यवस्था को सुचारू बनाने के प्रयत्न किए गए। इस अधिनियम के द्वारा जिन न्यायालयों का गठन किया गया वे निम्न प्रकार हैं-
1. तहसीलदार द्वितीय श्रेणी का न्यायालय जो 100 रुपए तक के दीवानी मामले सुन सकता था। 
2. तहसीलदार प्रथम श्रेणी का न्यायालय जो 300 रुपए तक के दीवानी मामले सुन सकता था।  
3. सहायक आयुक्त तृतीय श्रेणी का न्यायालय जो 500 रुपए तक के दीवानी मामलों की सुनवाई कर सकता था।  
4. सहायक आयुक्त द्वितीय श्रेणी का न्यायालय जो 1000 रुपए तक के दीवानी मामलों की सुनवाई कर सकता था।  
5. सहायक आयुक्त प्रथम श्रेणी का न्यायालय जो 5000 रुपए तक के दीवानी मामलों की सुनवाई कर सकता था। उपायुक्त का न्यायालय जो असीमित मूल्य के दीवानी मामलों की सुनवाई कर सकता था।
6. आयुक्त का न्यायालय सभी मूल्यों के दीवानी मामलों की सुनवाई कर सकता था। साथ ही आयुक्त और उपायुक्त न्यायालयों निर्णयों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई कर सकता था।
7. न्यायिक आयुक्त का न्यायालय मध्य प्रांत का सर्वोच्च अपील न्यायालय था। यह आयुक्त के न्यायालय के निर्णयों की सामान्य अपीलें और उपायुक्त के निर्णयों की विशेष अपीलों की सुनवाई कर सकता था।
1885 और 1917 में न्यायिक आयुक्त के न्यायालय का पुनर्गठन किया गया। बाद में इस न्यायालय की अधिकारिता नागपुर उच्चन्यायालय को अंतरित कर दी गई।
अवध की न्यायिक व्यवस्था- 
ध्य प्रांत की न्यायिक व्यवस्था के अनुरूप ही 1865 में अवध में भी न्यायिक व्यवस्था स्थापित की गई थी जिस में 1879 के अधिनियम से न्यायालयों की संरचना में परिवर्तन करते हुए केवल न्यायिक आयुक्त, जिला न्यायाधीश, सहायक न्यायाधीश और मुंसिफ के न्यायालय ही रहने दिए गए। इस अधिनियम से अवध ने एक विनियमित प्रांत का दर्जा हासिल किया। 1925 में न्यायिक आयुक्त के कार्यालय को अवध के मुख्य न्यायालय का दर्जा दिया गया। 1948 में इस मुख्य न्यायालय की अधिकारिता को इलाहाबाद उच्च न्यायालय को अंतरित कर दिया गया। 
न दोनों ही क्षेत्रों में सभी न्यायालयों को दीवानी मामलों की अधिकारिता दिए जाने के साथ ही दांडिक न्याय प्रदान करने की अधिकारिता भी प्रदान की गई थी।

पंजाब की न्यायिक व्यवस्था : भारत में विधि का इतिहास-74

April 28, 2010 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

पंजाब को 1849 में ब्रिटिश भारत में सम्मिलित कर लिया गया। वहाँ जो न्यायिक व्यवस्था स्थापित की गई वह एक ही प्राधिकारी के अधीन सौंपी गई, जिसे न्यायिक आयुक्त (Judicial Commissioner) कहा जाता था। यह व्यवस्था जटिल होने के कारण सफल और उपयोगी सिद्ध नहीं हुई। 1861 में भारतीय विधान परिषद अधिनियम (Indian Council Act) पारित होने के उपरांत न्यायिक व्यवस्था को पुनर्गठित किया गया। 1865 के 19वें अधिनियम के अंतर्गत स्थापित की गई न्यायिक व्यवस्था इस प्रकार थी –
तहसीलदार का न्यायालय- यह सब से निम्न स्तर पर स्थापित किया गया न्यायालय था। जिस की अधिकारिता में 300 रुपए मूल्य तक के दीवानी मामले सुनवाई कर निर्णीत करने की थी।
सहायक आयुक्त का न्यायालय- यह 100 रुपए तक के साधारण दीवानी वादों की सुनवाई कर सकता था। 
विशेष न्यायिक शक्ति युक्त सहायक आयुक्त का न्यायालय- इस न्यायालय की अधिकारिता 500 रुपए तक की थी। 
 पूर्ण न्यायिक शक्ति युक्त सहायक आयुक्त का न्यायालय- इस न्यायालय को 1000 रुपए मूल्य तक के दीवानी वाद सुनने व निर्णीत करने का अधिकार दिया गया था।
उपायुक्त का न्यायालय- यह न्यायालय किसी भी मूल्य के दीवानी वादों की सुनवाई करने के लिए सक्षम था। यह न्यायालय  पूर्ण न्यायिक शक्ति युक्त सहायक आयुक्त के न्यायालय के अतिरिक्त तीनों निचले न्यायालयों के निर्णयों की अपीलें सुन सकता था। 
आयुक्त का न्यायालय- यह न्यायालय किसी भी मूल्य के दीवानी वादों की सुनवाई कर सकता था तथा पूर्ण न्यायिक शक्ति युक्त सहायक आयुक्त के न्यायालय व उपायुक्त के न्यायालय के निर्णयों की अपीले सुनने के लिए अधिकृत किया गया था। 
न्यायिक आयुक्त का न्यायालय- यह न्यायालय पंजाब में सर्वोच्च दांडिक  व दीवानी अपील न्यायालय के रूप में कार्य करता था। 
क्त सभी न्यायालयों को दांडिक अधिकार भी थे। आयुक्त का न्यायालय सिविल और सत्र न्यायालय के रूप में कार्य करता था। आयुक्त सिविल न्यायिक प्राधिकारी और दंड प्राधिकारी के रूप में काम करता था। अन्य अधीनिस्थ न्यायालय भी इसी तरह दोनों तरह का न्यायिक कार्य करते थे। 1919 में पंजाब के न्यायिक आयुक्त के न्यायालय की अधिकारिता लाहौर उच्च न्यायालय को अंतरित कर दी गई। 
पंजाब में प्रयुक्त की जाने वाली विधियों को सर्व प्रथम 1853 में पंजाब सिविल कोड के नाम से संकलन किया गया। इस के अतिरिक्त सपरिषद गवर्नर जनरल के ऐसे आदेश प्रवर्तित होते थे जो पूर्व की किसी विधि के प्रतिकूल नहीं होते थे। इस समय तक विधि अस्पष्ट थी। 1872 पंजाब लॉज एक्ट से प्रचलित विधि की विविधताओं को समाप्त कर के उसे एकरूप बनाने का प्रयास किया गया। इस के अंतर्गत हिन्दू और मुस्लिम व्यक्तिगत विधियों को पूरा संरक्षण प्रदान किया गया था।
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