विधि Archive

रजिस्टर्ड बंटवारानामा संपत्ति के स्वत्व का दस्तावेज है।

May 17, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जितेन्द्र ने उज्जैन, से मध्य प्रदेश -समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी की मुत्यु हो चुकी है। मेरे दादाजी की स्वंय अर्जित सम्पत्ति का एक मकान जो कि हॉउसिंग बोर्ड द्वारा लीज होल्ड है एवं नगर निगम सीमा में है जिसका सम्पत्ति कर वगैरह उस सम्पत्ति पर निवासरत् दादाजी के 3 पुत्रों द्वारा सम्मिलित रूप से जमा किया जाता है। दादीजी का भी देहान्त दिनांक हो गया है। दादाजी की कुल 7 संतानें (5 पुत्र एवं 2 पुत्रियां) हैं। दादाजी ने अपनी मृत्यु के पूर्व कोई भी वसियत भी नहीं की थी। इस सम्पत्ति पर वर्तमान में 3 पुत्रों के परिवार निवासरत है, अन्य में से 1 पुत्र लापता है, 1 पुत्र अन्यत्र निवासरत है, 1 पुत्री का देहान्त कुछ समय पूर्व हो चुका है एवं 1 पुत्री अन्यत्र निवासरत होकर अविवाहित है। इस सम्पत्ति का बंटवारा किस प्रकार किया जा सकता है? सभी संतानों का मालिकाना हक किस प्रकार इस सम्पत्ति पर हो सकता है? मालिकाना हक से संबंधित क्या दस्तावेज तैयार करवा सकते हैं? कृपया बतायें- 1. क्या इस सम्मत्ति की रजिस्ट्री होगी? 2. हॉउसिंग बोर्ड इस सम्पत्ति में क्या कार्यवाही कर सकता है ? 3. रजिस्टर्ड बंटवारा ओर रजिस्ट्री में क्या कोई अंतर है? क्या रजिस्टर्ड बंटवारा में रजिस्ट्री के सभी अधिकार प्राप्त होते है या नहीं?

समाधान-

ब आप रजिस्ट्री शब्द का उल्लेख करते हैं तो आम तौर पर उसका अर्थ पंजीकृत विक्रय पत्र से या पंजीकृत लीज डीड से होता है। लेकिन पंजीकरण का कानून यह है कि यदि 100 रुपए से अधिक कीमत की कोई अचल संपत्ति का हस्तांतरण हो तो उस की रजिस्ट्री होना जरूरी है। बंटवारा भी ऐसा ही एक विलेख है। पंजीकरण कानून कहता है कि बंटवारे के विलेख का पंजीकृत होना जरूरी है वर्ना वह विलेख जरूरत पड़ने पर किसी कार्यवाही में नहीं पढ़ा जाएगा।

संपत्ति के सभी साझेदारों के बीच आपसी सहमति से बंटवारा होता है तो उसे पंजीकृत कराना जरूरी है। यह पंजीकृत विलेख ही संपत्ति के स्वामित्व का विलेख होगा। हाउसिंग बोर्ड या नगर निगम में जहाँ संपत्ति का रिकार्ड रहता है वे अपने रिकार्ड में नामान्तरण करते हैं लेकिन नामान्तरण हो जाने से किसी को स्वत्वाधिकार प्राप्त नहीं होता है। नामान्तरण गलत होने पर न्यायालय के आदेश से उसे हटाया या दुरुस्त किया जा सकता है। स्वअर्जित संपत्ति में सभी पुत्रों और पुत्रियों का समान हिस्सा है। यदि किसी का देहान्त हो गया है तो उस की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों को जाएगी। किसी के मर जाने से या गायब हो जाने से उस का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता है।

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समस्या-

नीलम खन्ना ने मनीमाजरा, चंडीगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी को उनके पिताजी से साल 1911 में संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। मेरे पिताजी को दादा जी से उनकी संपत्ति साल 1971 में उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। हम दो भाई बहन हैं। मेरे पिताजी ने सारी संपत्ति की वसीयत मेरे भाई के बेटे के नाम कर दी, मेरे पिताजी के देहांत के बाद सारी संपत्ति मेरे भतीजे के नाम हो गई। मैंने जुलाई 2016 में अपने हिस्से के लिए केस दायर किया, मैंने संपत्ति को बेचने से रोकने के लिए अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन किया, लेकिन उस समय मेरे पास संपत्ति का पिछला रिकॉर्ड ना होने के कारण अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन रद्द हो गया। मैंने अब पिछला सारा रिकॉर्ड निकलवा लिया है क्या मैं अब दोबारा अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन कर सकती हूँ? क्या मुझे अपना हिस्सा मिल सकता है?

समाधान-

प के द्वारा दिए गए विवरण से यह स्पष्ट है कि उक्त संपत्ति सहदायिक है। आप ने विवरण में यह नहीं बताया है कि आप के पिताजी की मृत्यु कब हुई है। यदि आप के पिता जी की मृत्यु. 2005 के बाद हुई है तब आप को 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में हुए संशोधन से इस सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त हो चुका था। उस वक्त आप के पिता केवल अपने हिस्से की वसीयत कर सकते थे न कि पूरी संपत्ति की। इस प्रकार आप का हिस्से का दावा सही है आप को हिस्सा मिलना चाहिए।

दावा तो पहले भी हिस्से का ही हुआ होगा। अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन तो उसी दावे में प्रस्तुत किया गया होगा। यदि वह दावा अभी चल रहा है तो उसी दावे में अस्थाई निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र पुनः प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि दावा भी आप ने खारिज करवा लिया है या अदम हाजरी अदम पैरवी में खारिज हो चुका है तो उस का रिकार्ड देख कर तय करना पड़ेगा कि उसे दुबारा किस प्रकार किया जा सकता है। बेहतर है आप वहीं दीवानी मामलों के किकसी अच्छे वकील से सलाह कर आगे कार्यवाही करें।

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समस्या-

प्रशान्त ने ग्राम नूरपुर, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे दादाजी चार भाई थे जिस में एक निस्सन्तान थे। मेरे दादा जी से पहले उन के दो भाइयों की मृत्यु हो गयी। उन के हिस्से कि संपत्ति उन के उत्तराधिकारियों को मिल गयी। 2004 में निस्सन्तान दादाजी की संपत्ति मेरे दादाजी को मिल गयी।  अब 2012 में मेरे दादाजी की भी मृत्यु हो गयी। उन की संपत्ति हमारे नाम आ गयी। अब मेरे दादा जी के भाई का लड़का बोलता है कि मेरा भी हिस्सा था इस में, तो क्या 29.06.2004 को  भाई का हक भतीजे को भी मिलता था?

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में कोई व्यक्ति निस्सन्तान मर जाए और उस की पत्नी और पिता भी जीवित न हों तो फिर उस की सम्पत्ति जीवित भाई को ही प्राप्त होगी।  इस तरह आप के दादा जी के भाई की मृत्यु पर आप के दादा जी को प्राप्त हुई वह सही थी। उस में मृत भाई के पुत्र का का कोई हिस्सा नहीं था।

लेकिन यदि दादाजी के निस्संतान भाई की संपत्ति में उत्तरप्रदेश में स्थित कोई कृषि भूमि है तो उस भूमि का उत्तराधिकार उ.प्र. जमींदारी विनाश अधिनियम से तय होगा और उस स्थिति में पूर्व मृत भाई के पुत्र को भी हि्स्सा पाने का अधिकार है। यह विधि 29.06.2004 को भी प्रचलित थी।

 

 

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हकत्याग विलेख को पंजीकृत कराए बिना हकत्याग संभव नहीं है।

May 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

छैल कँवर ने मेवानगर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं  मेरे पिता और माता की एकमात्र सन्तान हूँ। मेरे पिता का देहांत मेरे जन्म से पहले ही हो गया था। जिससे समस्त जमीन मेरे माताजी के नाम हो गई। मेरी माताजी का देहांत 1883 में हो गया उस समय में ससुराल में थी। मेरे कोई भाई या बहन नहीं है, जिसके कारण जमीन का नामानतरण मेरे नाम होना था। लेकिन मेरे दादाजी के भाई के बेटे ने जो उस समय सरपंच थे वे मेरे ससुराल आये और मुझे ये कहा कि आप मेरे साथ चलो आपकी जमीन आपके नाम करवा रहे हैं। वो मुझे एक वकील के पास लेकर गए और एक स्टाम्प पर अंगूठा लगवाया। मुझे अब पता चला हे की उन्होंने उस स्टाम्प के आधार पर मेरी समस्त जमीन अपने बेटे के नाम हकतर्क करवा ली जो उस समय मात्र 14 साल का था। जब मैंने रिकॉर्ड निकलवाया तो उसके फोतगी में पटवारी ने लिखा था की “असन कँवर (माताजी) के फौत होने पर उनकी बेटी छेल कँवर (स्वयं) इकरार नामा 7 रूपये के स्टाम्प पर मनोहरसिंह (जिसके नाम हकतर्क किया गया उम्र 14 साल) के हक में ओथ कमिश्नर द्वारा 28.1.1983 को तस्दीक दस्तावेज पर नामान्तरण खोला गया।” श्रीमान में निम्न सवालों के जवाब जानना चाह रही हूँ- 1. क्या 1983 मैं ओथ कमिश्नर द्वारा जारी स्टाम्प के आधार पर नामन्तरण खोला जा सकता था? 2. क्या मेरे दादाजी के भाई के बेटे के बेटे के नाम हक तर्क हो सकता था जो उस समय 14 साल का था?  न ही वो मेरे पिताजी द्वारा गोद लिया पुत्र है। 3.श्रीमान मैं एक निरक्षर महिला हूँ। मुझे धोखे से एक बार वकील के आगे एक स्टाम्प पर अंगूठा लगवाया था इसके अलावा मैंने न तो किसी पटवारी, तहसीलदार, या रजिस्ट्रार के आगे कोई अंगूठा लगाया हे। 4. मेरी माताजी का देहांत मेरे ननिहाल में 1983 में हुआ था, में अब उनका मृत्यू प्रमाण पत्र बनवाना चाहती हूँ लेकिन मेरे पास उनकी मृत्यु या उनसे सम्बंधित कोई दस्तावेज नहीं है? उचित सलाह प्रदान करें।

समाधान-

नामान्तरण से कभी भी किसी संपत्ति का टाइटल निर्धारित नहीं होता। चूंकि आप को अब पता लगा है कि नामान्तरण आप के नाम होने के स्थान पर आप के दादा जी भाई के पुत्र ने अपने पुत्र के नाम नामान्तरण खुलवा लिया है। इस कारण अब आप तुरन्त नामान्तरण के आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त कर उस आदेश के विरुद्ध अपील कर सकती हैं।

हकत्याग एक प्रकार का अचल संपत्ति का हस्तान्तरण है इस कारण उस का उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत होना अनिवार्य है। इस तरह नोटेरी के यहाँ तस्दीक किए गए हकत्याग के विधि विपरीत विलेख के आधार पर नामान्तरण खोला जाना पूरी तरह गलत है।

आप को चाहिए कि राजस्व (खेती-बाड़ी) की जमीनों का काम देखने वाले किसी अच्छे वकील को अपने सारे दस्तावेज दिखाएँ और नामान्तरण की अपील प्रस्तुत करें। आप टाइटल के आधार पर भी राजस्व रिकार्ड में संशोधन और जमीन का कब्जा दिलाए जाने के लिए दावा प्रस्तुत कर सकती हैं। लेकिन जो भी करें अपने वकील को समस्त दस्तावेज दिखा कर उन की राय के अनुसार काम करें।

हक त्याग सिर्फ और सिर्फ किसी भी संपत्ति के सहस्वामी के हक में किया जा सकता है। उक्त भूमि की आप एक मात्र स्वामी थीं। इस कारण से किसी भी व्यक्ति के नाम आप के दादा जी के भाई के पोते के नाम  भी हकत्याग होना संभव नहीं था। इस कारण भी वह हक त्याग वैध नहीं है।

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समाधान-

राम नारायण ने बड़ौदा, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या ये है कि मेरे पिता की स्वअर्जित सम्पति है।  जिसे मेरे पिता ने 1965 में लिया था।  मेरे पिता का देहांत 03/10/2005 को हो गया है।  मेरे पिता ने कोई वसीयत नहीं बनाई थी।  देहांत के बाद मेरी 3 बहनो में से एक बहन ने अपनी परिस्थिति का रोना रोकर मेरे से मेरा एक रूम ले लिया और बोली की मेरी परिस्थिति ठीक होने के बाद मैं चली जाउंगी। लेकिन अब 8 साल हो गया है। लेकिन वो जाने को नहीं बोलती है और झगड़ा करती है। मेरी माँ मेरे साथ ही रहती है। उससे भी झगड़ा करती है। मेरी बहन को रूम से निकालने के लिए क्या करना होगा? मेरी बहन का आदमी भी उसके साथ ही रहता है।


समाधान-

प के पिता की स्वअर्जित संपत्ति पर आप के पिता की मृत्यु के साथ ही उन के उत्तराधिकारियों का स्वत्वाधिकार स्थापित हो गया। आप अकेले उस संपत्ति के स्वामी नहीं हैं। पुत्र होने के नाते आप अकेले उस मकान के स्वामी नहीं हो सकते। इस मकान में फिलहाल पाँच हिस्से हैं। एक आप की माँ का तीन आप की बहनों के और पाँचवाँ आपका। यदि आप बहिन से कुछ कहेंगे तो वह अदालत में बंटवारे का दावा करेगी। दूसरी बहनों और माँ को भी साथ ले लेगी तो आप को केवल पाँचवाँ हिस्सा ही प्राप्त होगा, जो आप का है। वैसे भी जब तकआप को सभी बहनों से रिलीज डीड के माध्यम से हक प्राप्त नहीं हो जाए उन सभी का हि्स्सा बना रहेगा।

बहिन ने परिस्थिति का रोना रो कर जो कमरा प्राप्त किया है वह उस का हक है। उस ने कैसे भी मकान पर कब्जा प्राप्त कर लिया है और उसी में रहती भी है आप अपनी बहन को रहने दें। जो भी समाधान हो वह प्यार से आपसी समझ से करें।

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समस्या-

पत्रकार रमेश कुमार जैन निर्भीक ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-


जकल बाज़ार में से कोई भी चीज खरीदों. जैसे – मोबाइल की बैटरी, कम्प्यूटर के यू.पी.सी की बैटरी, स्कुटरी की बैटरी या अन्य कोई भी वस्तु जिसपर सीमित समय के लिए गारंटी/ वारंटी होती है. गारंटी अवधि में वस्तु के खराब होने पर दुकानदार/कम्पनी उपरोक्त वस्तु को बदलकर तो दे देते हैं. लेकिन बदली हुई वस्तु पर पहले वाली वस्तु की बची अवधि की ही गारंटी देते हैं. उदाहरण से समझे : पहले वाली वस्तु छह महीने की गारंटी है और वो वस्तु चार महीने के बाद खराब हो गई तो दुकानदार/कम्पनी दूसरी वस्तु पर केवल दो महीने की गारंटी की ही गारंटी देते हैं. कुछ वस्तुओं पर वारंटी होती है तो उस वस्तु में बार-बार कोई खराबी आती है तब उनका सर्विस सेंटर बहुत दूर होने के कारण बार-बार सर्विस सेंटर हर उपभोक्ता के लिए जाना सम्भव नहीं होता है. अनेक बार तो वस्तु इतनी कम कीमत की होती है कि उसको सर्विस सेंटर पर लेकर जाने का खर्चा उससे अधिक होता है. ऐसी समस्याओं के क्या उपाय है और इस विषय में उपभोक्ता कानून क्या कहते हैं ? उपरोक्त समस्या आज दिल्ली या किसी विशेष शहर की समस्या न होकर पूरे भारत वर्ष की आम जनता की है.


समाधान-

वारंटी या गारंटी पर न जाएँ। इसे ऐसा समझें कि किसी माल पर जो बेचा गया है उस पर कोई वारंटी या गारंटी नहीं है। फिर भी कोई व्यक्ति कोई खराब चीज किसी व्यक्ति को नहीं बेच सकता। यदि वह कोई खराब चीज बेचता है तो यह उपभोक्ता के साथ अन्याय है और उपभोक्ता कानून में इस तरह के अन्याय से पीड़ित कोई भी व्यक्ति उपभोक्ता न्यायालय को शिकायत प्रस्तुत कर सकता है और राहत प्राप्त कर सकता है। यदि किसी माल में मैन्युफैक्चरिंग दोष है तो उसे बदलने के लिए किसी वारंटी की कोई जरूरत नहीं है। उपभोक्ता अदालतों ने वारंटी के बिना बेचे गए माल के और वारंटी की अवधि के बाद मैन्युफेक्चरिंग दोष का पता लगने पर किए गए मामलों में उपभोक्ता के पक्ष में निर्णय किए हैं।

कम कीमत के माल के मामले में भी शिकायक की जा सकती है। आखिर अदालत मानसिक संताप के लिए भी तो क्षतिपूर्ति दिलाती है। यदि सर्विस सेंटर जाने में बहुत पैसा खर्च हुआ है और आप उसे साबित कर सकते हैं तो वह खर्चा और आने जाने में हुए समय व कष्ट के लिए भी क्षतिपूर्ति उपभोक्ता न्यायालय दिला सकते हैं।

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समस्या-

घनश्याम पाण्डेय ने सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


 मेरे पड़ोस में मेरी मुँह बोली बहन रहती है। जिसका विवाह मात्र १२ वर्ष के उम्र १९९८ में ही कर दिया गया। यह बाल विवाह ही था, लड़के की उम्र १२ साल ही थी।  खैर यह शादी मात्र चार वर्ष ही चली और २००२ में पंचायत के सामने तलाक करवा दिया गया और उनसे कोई संतान नहीं हुई।  बहन का दूसरा विवाह लगभग १८ की उम्र में २००४ में हुआ, जहाँ पर उसे दो लड़की संताने भी हुई, साल २०११ में उसे दूसरी लड़की पैदा होने पर घर से निकाल दिया गया। अतः वह तब से मायके में ही रहती है। उसके ननद, देवर और पति सभी उस पर अत्याचार करते हैं। जब वह जाती है, बड़ी बेरहमी से पति, देवर मार कर उसे भगा देते हैं।  बहन के मायके वाले भी ज्यादा सहयोगी नहीं। अतः पुनः २०१५ के एक साधारण समारोह द्वारा उसका तीसरी जगह जबरदस्ती घरवालों ने विवाह करवा दिया।  जो कि वैवाहिक संस्कार करके नहीं किये गए थे, उसे कुछ भी नाम दिया जा सकता है। लेकिन यह विवाह भी मात्र २ महीने न चला। अब बहन आज भी बार बार दूसरे विवाह के पति के घर जाती है, जहाँ पर उसकी बड़ी बेटी ले ली गयी, जब कि दूसरी बेटी को पति अपनी संतान स्वीकार नहीं करता है। जब उसका जन्म पति के घर में ही हुआ। अतः ऐसी परिस्थिति में बच्चों के क्या अधिकार अपने नैसर्गिक पिता से बनते हैँ तथा बहन भी क्या अपने दूसरे पति के अधिकार प्राप्त कर सकती है। वह अत्यंत गरीब अवस्था में है, माँ-बाप तथा पति सभी उसके खिलाफ हो गए। वह अपनी छोटी बेटी के साथ किसी तरह गुजारा कर रही है। अतः बच्चों और बहन का क्या अपने दूसरे पति के ऊपर क़ानूनी अधिकार बनता है। बहन आज भी अपने पति के घर जाना चाहती है तथा लगभग पागलपन की अवस्था पर पहुँच गयी है।

समाधान-

हिन्दू विवाह केवल और केवल न्यायालय की डिक्री से ही समाप्त हो सकता है इस कारण से आप की मुहँबोली बहिन यदि अनुसूचित जनजाति से नहीं है तो उस का पहला विवाह आज तक भी समाप्त नहीं हुआ है। उस का पहला पति ही उस का वैधानिक पति है। पहले पति से विवाह विच्छेद वैधानिक न होने से दूसरा विवाह वैध नहीं था। इस कारण आपकी बहिन का दूसरे पति से कोई अधिकार नहीं है। लेकिन उस की दोनों संतानें दूसरे पति से हैं इस कारण संतानों को अपने पिता से भरण पोषण पाने का अधिकार है। तीसरे पति के साथ आप की बहिन दो माह से भी कम समय रही है वह रिश्ता एक लघु अवधि का लिव इन था। इस कारण इस संबंध से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं हुआ है।

अभी तक आपकी मुहँ बोली बहिन का पहले पति से रिश्ता समाप्त नहीं हुआ है इस कारण वह पहले पति से भरण पोषण की मांग कर सकती है। इस के लिए न्यायालय में अर्जी दाखिल कर सकती है। इस के साथ ही वह अपनी छोटी पुत्री के लिए अपने दूसरे पति से भरण पोषण की मांग कर सकती है।

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विधवा को ससुर की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं।

April 28, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

किरन सोनी ने गिरजाबाग, जिला उन्नाव, उत्तरप्रदेश से अपनी समस्या भेजी है-

मेरे पति का देहान्त 1987 में हो चुका है। मेरे ससुर के पास स्वअर्जित 12 बीघा सम्पत्ति है। उनकी उम्र लगभग 96 साल है। मेरे ससुर के चार लड़के और चार लडकिया हैं। इस जमीन पर मेरे पति ईट भट्ठा चलाते थे जो उनके मरने के बाद मेरे देवर सब बर्बाद कर दिया। मेरे ससुर ने अपनी जरूरत के लिये मेरे लड़के का मकान उसको बहला फुसलाकर बिकवा दिया और उसको दो बीघा जमीन रजिस्ट्री करके लिख दी। मेरा लडका प्राईवेट नौकरी करके किसी तरह अपना और मेरा गुजारा करता है। अब वो 2 बीघा जमीन फिर से वापस मांग रहे हैं। उन्होंने अपने छोटे लड़के को करीब 17 दुकानें जो कि उनका मार्केट था। उसमें बिना पैसा लिये रजिस्ट्री कर दी थी। छोटा लड़का उनका पुलिस में दरोगा है और मेरे ससुर उन्हीं के साथ रहते हैं व उनकी बात मानते हैं। बाकी दोनों लड़कों को बहुत कुछ दिया जिसमें नकदी व कुछ जमीन भी शामिल है। लेकिन पैसे के लेन देन का कोई रिकार्ड नहीं है। मेरे पति का दिया हुआ सारा जेवर और सारा सामान, बर्तन तक ले लिये और मुझसे कोई वास्ता नहीं रखा। सब मेरे व मेरे लड़के के खिलाफ हैं क्योकि हम गरीब हैं। मेरे लड़के से मेरे ससुर बात तो करते हैं लेकिन और लड़कों के मतलब के लिये। आज अपने बाकी लड़कों और लड़कियों को रजिस्ट्री करने तहसील में गये हुये है और रजिस्ट्री कर दी होगी। जबकि पैसा मेरे लड़के ने दिया है। और किसी ने कुछ नहीं दिया है मुझे आज तक कुछ नहीं मिला है। मुझे किसी प्रकार से कोई पेंशन वगैरह भी नहीं मिलती है। आज मेरी 3 ननदें मिलकर उस जमीन का बँटवारा मेरे ससुर से करवा रही हैं और मुझे कुछ भी नहीं देने को कह रही है मेरा लड़का भी परेशान है क्योंकि सारी जमा पूंजी भी मेरे ससुर ले चुके है और कुछ देने को नहीं कह रहे हैं। क्या विधवा औरत का ससुर की सम्पत्ति में कोई हक नहीं है जब उसका पति भी नहीं जिन्दा है। क्या मुझे कुछ नहीं मिलेगा? कृपया मेरा मार्गदर्शन करें।

समाधान-

किसी की स्वअर्जित संपत्ति पर उस व्यक्ति के जीते जी किसी अन्य व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं होता है। उस की स्वंय की पत्नी, माता, पिता या संतानों का भी कोई अधिकार नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति बिना कोई वसीयत किए मर जाए तो मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार में उस की पत्नी, माँ व संतानों को उत्तराधिकार प्राप्त होता है। आप के पति का देहान्त हो चुका है। तथा आप के ससुर के पास स्वअर्जित संपत्ति 12 बीघा है। इस संपत्ति पर किसी का कोई अधिकार नहीं है वे जिसे चाहें दे सकते हैं। उस जमीन में से दो बीघा जमीन उन्हों ने आप के बेटे को रजिस्ट्री करवा कर दे दी है। इस के अलावा भी उन के सात लड़के लड़कियाँ हैं। इस तरह उन्हों ने पहले ही जमीन में से आप के पति को आप के ससुर के मरने के बाद मिलने वाले अधिकार से अधिक आप के बेटे को दे दिया है।

यदि आप का लड़का आप के ससुर को या परिवार के दूसरे सदस्यों को कुछ देता है तो उस की मर्जी है और आपके ससुर उस का क्या करते है यह भी उन की इच्छा पर निर्भर करता है। यदि आप के पास धन नहीं हैं तो किसी को देते क्यों हैं और ससुर की बातों में भी क्यों आते हैं। हमारी राय है कि आप के बेटे को जो दो बीघा जमीन रजिस्ट्री से मिल गयी है उसे किसी हालत में वापस न करे। अन्यथा आप को और आप के बेटे को अधिकार के रूप में कुछ भी नहीं मिलने वाला है। बाकी जमीन या संपत्ति जो भी है उसे आप के ससुर कैसे बाँटते हैं यह उन की मर्जी पर है। वे अपनी स्वअर्जित संपत्ति के स्वयं मालिक हैं उस का कुछ भी कर सकते हैं। यह सही है कि विधवा पत्नी का ससुर की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है। उस का अधिकार सिर्फ अपने मृत पति की संपत्ति पर है।

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दिया हुआ उपहार वापस नहीं मांगा जा सकता।

April 7, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

भावेश जैन ने उदयपुर राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


2010 में मैंने अपनी गर्लफ्रेंड को मेरे नाम पर पर एक मोबाइल सिम खरीद कर दी, व्यक्तिगत उपयोग के लिए।  उस सिम को मैंने 2011 में पोस्ट पेड करवा दिया तथा उसके बिल का भुगतान भी में करता था।  जिसके बिल भुगतान की रसीदें मेरे पास हैं। 2016 में उसने मेरे से ब्रेकअप कर लिया तो मैंने उसकी सिम बंद करवा कर उसी नंबर की नयी सिम इशू करवाकर उपयोग करने लग गया हूँ।  क्या मैं ने कोई अपराध किया है? मैं ने उसे एक मोबाइल गिफ्ट किया था क्या मैं उस मोबाइल की मांग कर सकता हूँ ?


समाधान-

सिम अर्थात मोबाइल कनेक्शन आप के नाम था। उस पर आप का स्वामित्व था। आप ने वह अपने पास ले लिया। कोई अपराध नहीं किया।

लेकिन फोन इन्स्ट्रूमेंट आप ने गिफ्ट अर्थात उपहार में दिया था। उपहार का कानून यह है कि वह वापस नहीं होता। उपहारकर्ता अपने उपहार को वापस नहीं मांग सकता।  इस लिए आप का उसे वापस मांगना किसी भी तरह से न तो उचित है और न ही कानूनी।

 

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समस्या-

राकेश कुमार ने अलवर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी ओर मेरे भाई की शादी फऱवरी 2015 में हुई। शादी के 1 साल तक सही रहा।  इसके बाद हम दोनों भाई की उनसे बनी नहीं वो बिना बात पे ही हम से लड़ाई करती थी।  फिर वो दोनों चली गई, हम लेने गए तो दोनो नहीं आई।  बड़ी बहन गर्भ से थी। हम ने धारा 9 का केस डाल दिया। चार माह बाद जब डिलीवरी होने का टाइम आया तो उन्होने कहा कि इनको ले जाओ।  हम दोनों को ले आए। डिलीवरी के दो माह बाद छोटी बहन, मेरी घरवाली कहती है कि मुझे नहीं रहना तलाक चाहिए। हम ने उसको कई बार रहने को बोला लेकिन वो अपने माँ बाप के पास चली गई और उसके बाद उसने मुझे नोटरी करवा कर रुपए 100 के स्टांप पर तलाक़ दे दिया और बड़ी बहन अभी रह रही है, क्या ये तलाक़ मान्य है।

समाधान-

प खुद हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत एक आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर चुके हैं। इस का अर्थ है कि आप हिन्दू विवाह अधिनियम से शासित होते हैं। इस अधिनियम में कोई भी तलाक केवल तभी मान्य होता है जब कि न्यायालय से डिक्री पारित हो जाए।

आप की पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती है और उस ने 100 रुपए के स्टाम्प पर आप को तलाकनामा लिख भेजा है। यह अपने आप में क्रूरता पूर्ण व्यवहार है। आप इसी स्टाम्प के आधार पर तथा अन्य आधारों पर परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी प्रस्तुत कर सकते हैं। आप को तुरन्त कर ही देनी चाहिए। न्यायालय से डिक्री पारित होने और निर्धारित अवधि में उस की कोई अपील दाखिल न होने पर यह तलाक अन्तिम हो सकता है।

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