विधि Archive

समस्या-

शशि भूषण कुमार ने समस्तीपुर, झितकाही, बिहार वैशाली से समस्या भेजी है कि-

दो बच्चों की विधवा माँ से शादी कर लिया और उसके दोनों बच्चों को अपना लिया। पुनर्विवाह के बाद दो और बच्चा हुआ है। पूर्वजों ने किसी के नाम वसीयत ना की। इस संपत्ति का अधिकार सब बच्चो को बराबर मिलेगा या उस विधवा के पुनर्विवाह होने के बाद जन्में बच्चो को मिलेगा?

समाधान-

पूर्वजों से चली आई संपत्ति को सहदायिक संपत्ति कहा जाता है। इस संपत्ति में केवल पुरुष संतानों को ही अब तक अधिकार मिलता था। 2005 में हुए हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के बाद से इस संपत्ति में पुत्रियों को भी अधिकार मिलना आरंभ हुआ है। इस संपत्ति में से केवल पुरुष की औरस तथा गोद ली हुई संतानो को ही उत्तराधिकार प्राप्त हो सकता है अन्य किसी को नहीं।

विधवा के पूर्व विवाह से जन्मी संतानों को किसी प्रकार का कोई अधिकार अपनी माँ के नए पति की संपत्ति या उस के पूर्वजों की संपत्ति में प्राप्त नहीं होगा। विधवा के नए पति ने बच्चों को अपनाया है तो वह उन का लालन पालन कर सकता है। स्वअर्जित संपत्ति में से कुछ भी अपनी इच्छा से दे सकता है लेकिन बच्चों को उत्तराधिकार का कोई अधिकार माता के नए पति या पूर्वजों से चली आई सहदायिक संपत्ति में उत्पन्न नहीं होता है।

विधवा की मृत्यु के बाद जो भी संपत्ति वह छोड़ कर जाएगी उस संपत्ति में उस के पूर्व पति तथा पुनर्विवाह के बाद वर्तमान पति दोनों से जन्मी संतानों को समान रूप से उत्तराधिकार प्राप्त होगा।

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सहदायिक संपत्ति में पुत्रियों/ स्त्रियों का अधिकार

September 21, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मोहिनी देवी ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

रदादा द्वारा खरीदी गयी कृषि भूमि है जो 1956 के पूर्व खरीदी गयी है, परदादा की मृत्यु 1956 के पूर्व हुई है, मृत्यु पश्चात दादा के नाम हो गयी, दादा की मृत्यु 1956 के बाद हुई है और मेरे पिता की मृत्यु 1993 में हुई है। कृपया मुझे ये बताये की उक्त भूमि में मेरे पिता की मृत्यु पश्चात पुत्रियों का अधिकार उक्त कृषि भूमि में है क्या? इस कृषि भूमि में मेरे पिता द्वारा कोई वसीयत नही बनायीं गयी है?

समाधान-

क्त कृषि भूमि में आप का तथा आपके पिता की अन्य पुत्रियों का अधिकार है।

17 जून 1956 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी हुआ था। इस अधिनियम की धारा-6 में यह व्यवस्था थी कि जो संपत्ति सहदायिक है उस का उत्तराधिकार सर्वाइवरशिप से अर्थात प्राचीन हिन्दू विधि के अनुसार ही होता रहेगा न कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार।  सहदायिक संपत्ति का अर्थ था जो संपत्ति किसी पुत्र को उस के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हो वह सहदायिक है और उस में उस  पुरुष सन्तानों और उन की पुरुष सन्तानों को जन्म से अधिकार प्राप्त हो जाता है।

आपके परदादा की स्वयं की खरीदी हुई कृषि भूमि 1956 के पूर्व उन की मृत्यु के कारण आप के दादा को उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है। इस तरह यह संपत्ति सहदायिक हो गयी और हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने के उपरान्त भी उस में आप के पिता और यदि उन का कोई भाई हुआ तो उस को जन्म से ही अधिकार प्राप्त होता रहा। किन्तु आप को व आप की अन्य बहनों को यह अधिकार जन्मसे प्राप्त नहीं हुआ।

इस तरह की सहदायिक संपत्ति में हिस्सा रखने वाले किसी पुरुष की मृत्यु होने पर उस के हिस्से का उत्तराधिकार सहदायिक संपत्ति के दाय के उत्तरजीविता (सर्वाइवरशिप) के नियम के अनुसार होता था। किन्तु इसी अधिनियम की धारा-6 में यह प्रावधान था कि ऐसे पुरुष की मृत्यु के समय अधिनियम की अनुसूची प्रथम में वर्णित कोई ऐसी स्त्री उत्तराधिकारी या ऐसी स्त्री के माध्यम से अपना उत्तराधिकार क्लेम करने वाला पुरुष उत्तराधिकारी हुआ तो उस के हिस्से का दाय उस पुरुष की वसीयत के द्वारा और वसीयत न होने पर अधिनियम के अनुसार होगा।

आपके पिता की मृत्यु 1993 में हुई तब आप और आप की बहने मौजूद थीं। इस कारण आप के दादा की छोड़ी हुई संपत्ति में जो हिस्सा आप के पिता को प्राप्त हुआ था वह पुश्तैनी होने पर भी उस का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार हुआ और आप को तथा आप की बहनो को पिता की संपत्ति में उन की मृत्यु के उपरान्त हिस्सा प्राप्त हुआ।जब कि आप के भाई को उसी संपत्ति में जन्म से ही अधिकार प्राप्त था। उस को जितना अधिकार जन्म से प्राप्त हो चुका था। इस कारण आपके पिता की छोड़ी हुई अविभाजित संपत्ति में आप को आपके पिता की मृत्यु के दिन से ही उत्तराधिकार के कारण हिस्सा प्राप्त है। यदि आप का कोई भाई जीवित है  तो उसे भी उस संपत्ति में आप के ही समान अधिकार प्राप्त है। लेकिन आपके भाई की कोई पुत्री 2005 के पहले पैदा हो चुकी है तो उसे 2005 में धारा 6 में किए गए संशोधन के प्रभावी होने की तिथि से आप के भाई के जीवनकाल में ही अधिकार प्राप्त हो चुका है, और यदि भाई की कोई पुत्री 2005 के संशोधन के प्रभावी होने के बाद जन्मी है तो उसे जन्म से इस सहदायिक संपत्ति में अधिकार प्राप्त है।

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तलाक का आधार हो तो दूसरे पक्ष की सहमति की जरूरत नहीं।

August 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

नवीन ने साईखेड़ा, नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी को एक  साल हो चुका है। मेरी पत्नी छत से कूदने की, फाँसी लगाने की धमकी देती है। काम करने की मना कर चुकी है। शादी से पहले उसका अफ़ेयर रह चुका है। घर से 2 बार व मायके से 1 बार भाग चुकी है। एक रात कहीं रह चुकी है। 4 माह से उसका मानसिक इलाज़ करा रहा हूँ। दूसरों के सामने अच्छा व्यवहार करती है। तलाक की याचिका लगा दी है पर वो तलाक देने को तैयार नहीं है। क्या करूँ?

समाधान-

प के सवाल का छोटा सा जवाब है कि “मुकदमा लड़िए”।

आप की ही तरह मेरे पास ऐसे बहुत लोग समस्या ले कर आते हैं, जो यही कहते हैं कि मेरी पत्नी या पति तलाक के लिए राजी नहीं है। 1955 में हिन्दू मैरिज एक्ट प्रभावी होने के पहले तो भारत में कोई भी इस बात पर राजी नहीं था कि हिन्दू विवाह में तलाक होना चाहिए।

फिर हिन्दू मैरिज एक्ट आया तो उस में तलाक के प्रावधान आए जिन के अनुसार कुछ आधारों पर पति या पत्नी तलाक की मांग कर सकते थे, कुछ ऐसे मुद्दे थे जिन पर केवल पत्नी तलाक की मांग कर सकती थी। लेकिन कानून के अनुसार इस के लिए अदालत में आवेदन देना अनिवार्य था। पति की अर्जी पर पत्नी या पत्नी की मर्जी पर पति अदालत में सहमत भी होता था तो तलाक होना असंभव था। स्थिति यह थी कि जो भी तलाक लेना चाहता/ चाहती थी उसे जिस आधार पर तलाक चाहिए था उसे साक्ष्य के माध्यम से साबित करना जरूरी था। आधार मुकम्मल रूप से साबित होने पर ही तलाक मिल सकता था। तलाक का यह तरीका हिन्दू मैरिज में अभी भी मौजूद है।

फिर  1976 में सहमति से तलाक का प्रावधान आया। पहले यदि पति पत्नी दोनों सहमत होते हुए भी तलाक लेने जाते थे तब भी कम से कम एक पक्ष को विपक्षी के विरुद्ध तलाक के आधार को साक्ष्य से साबित करना पड़ता था। अब दोनों पक्षों के सहमत होने पर इस की जरूरत नहीं रह गयी। बस सहमति से तलाक का आवेदन पेश करें और छह माह बाद भी सहमति बनी रहे तो अदालत तलाक की डिक्री प्रदान करने लगी।

तो नवीन जी¡ तो कुछ समझ आया? आप के पास तलाक के लिए आधार मौजूद है। आपने अपनी समस्या में जो बातें लिखी हैं उन में से शादी के पहले के अफेयर की बात के सिवा सारी बातें अदालत में साबित कर देंगे तो आप को तलाक की डिक्री मिल जाएगी। उस के लिए पत्नी की सहमति की जरूरत नहीं है। बस ये है कि कुछ समय अधिक लगेगा।

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समस्या-

ईशा ने झारिया, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मैं एक 2 साल की लड़की को गोद लेना चाहती हूूँ जो मेरे रिश्ते में ही आती है,  लेकिन कानूनी रूप से नहीं। मैं उसे हायार एजुकेशन देकर सेल्फ़ डिपेंड बनाना चाहती हूँ और विवाह का दायित्व लेना चाहती हूँ। लेकिन भविष्य में अपनी संपत्ति का कोई अधिकार उसे नहीं देना चाहती हूँ। मेरा स्वयं का एक बेटा है। क्या ऐसा संभव है।

समाधान-

क्यों कि आप का स्वयं का एक पुत्र है इस कारण से आप किसी भी संतान को विधिक रुप से गोद नहीं ले सकती हैं। आप ऐसा खुद भी नहीं करना चाहती हैं। इस कारण इसे गोद लेना तो कहा नहीं जा सकता। लेकिन जो कुछ आप उस के लिए करना चाहती हैं वह भी एक उत्तम विचार है। इस के लिए यदि उस लड़की के माता पिता तैयार हों तो ऐसा आपस में संविदा के माध्यम से किया जा सकता है।

लड़की के माता पिता और आप व आपके पति के मध्य एक लिखित संविदा निष्पादित हो जाए जो एग्रीमेंट के लिए आवश्यक स्टाम्प पर लिखी जाए और बाद में नोटेरी से तस्दीक करा ली जाए। इस दस्तावेज को उप पंजीयक के यहाँ भी एक संविदा के रूप में पंजीकृत कराया जा सकता है। इस संविदा के अनुसार लड़की के माता पिता लड़की की अभिरक्षा उस के विवाह तक के लिए आप को देंगे। आप लड़की की परवरिश अपनी स्वयं की संतान की तरह करेंगी, उसे स्वावलंबी बनाने की कोशिश करेंगी और उस के विवाह योग्य होने पर विवाह का व्यय उठाएंगी। बदले में उस के माता पिता अपनी बेटी की अभिरक्षा का दावा नहीं करेंगे। इस एग्रीमेंट की एक शर्त यह भी होगी कि वह लड़की कभी भी स्वयं को आप की पुत्री होने का दावा नहीं करेगी, आप की संपत्ति पर अथवा बाद में उत्तराधिकारी के रूप में किसी तरह का दावा नहीं करेेगी। इस तरह की संविदा होने के बाद आप लड़की को अपनी अभिरक्षा में ला सकती हैं।

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तीसरा खंबा को मिले 15 लाख विजिटर्स

July 16, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

हिन्दी ब्लागों को पढ़ते और टिपियाते हुए सुझाव आया कि मुझे भी ब्लाग लिखना चाहिए। 28 अक्टूबर 2007 को मेरा जो पहला ब्लाग सामने आया वह “तीसरा खंबा” था।

“तीसरा खंबा” के माध्यम से विधि के क्षेत्र में कुछ अलग करने का मन था। कुछ किया भी, लेकिन टिप्पणियों में यह फरमाइश होने लगी कि मैं लोगों को उन की समस्याओं के लिए कानूनी उपाय भी बताऊँ। मैं ने वह आरंभ किया तो। तीसरा खंबा पर समस्याएँ आने लगीं। तो मैं ने कम से कम एक समस्या का समाधान या उपाय हर रोज लिखना शुरू किया।  तो “तीसरा खंबा” नियमित ब्लाग हो गया।

उन्हीं दिनों बीएस पाबला जी ने “अदालत” ब्लाग शुरू किया था जिस में वे विधि से संबंधित समाचारों को लिखा करते थे। उन से संपर्क हुआ तो पक्की दोस्ती में बदल गया। 2011 की एक रात पाबला जी से फोन पर बात हो रही थी। उन का सुझाव था कि अपना डोमेन ले लिया  जाए। मैं ने कहा ले लो। पाबला जी से बात पूरी हुई थी कि 10 मिनट बाद फोन की घंटी बजी। पाबला जी थे बता रहे थे कि “तीसरा खंबा” के लिए  http://teesarakhamba.com/  डोमेन मिल गया है। अब उन का कहना था कि ब्लागर के स्थान पर वर्डप्रेस पर जा कर इसे एक वेबसाइट का  रूप दे दिया जाए। वह भी पूरा किया पाबला जी ने ही। आखिर वेबसाइट शुरू हो गयी। हम ने 1 जनवरी 2012 से उस का शुभारंभ मान कर उस की स्टेटिस्टिक्स शुरू की।

एक जनवरी 2012 से कल 15 जुलाई 2017 तक “तीसरा खंबा” ने 15 लाख विजिटर हासिल कर लिए हैं। बीते कल इस पर 4328 विजिटर थे। हिन्दी ब्लाग जगत के लिए इसे एक उपलब्धि तो कहा ही जा सकता है।

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रजिस्टर्ड बंटवारानामा संपत्ति के स्वत्व का दस्तावेज है।

May 17, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जितेन्द्र ने उज्जैन, से मध्य प्रदेश -समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी की मुत्यु हो चुकी है। मेरे दादाजी की स्वंय अर्जित सम्पत्ति का एक मकान जो कि हॉउसिंग बोर्ड द्वारा लीज होल्ड है एवं नगर निगम सीमा में है जिसका सम्पत्ति कर वगैरह उस सम्पत्ति पर निवासरत् दादाजी के 3 पुत्रों द्वारा सम्मिलित रूप से जमा किया जाता है। दादीजी का भी देहान्त दिनांक हो गया है। दादाजी की कुल 7 संतानें (5 पुत्र एवं 2 पुत्रियां) हैं। दादाजी ने अपनी मृत्यु के पूर्व कोई भी वसियत भी नहीं की थी। इस सम्पत्ति पर वर्तमान में 3 पुत्रों के परिवार निवासरत है, अन्य में से 1 पुत्र लापता है, 1 पुत्र अन्यत्र निवासरत है, 1 पुत्री का देहान्त कुछ समय पूर्व हो चुका है एवं 1 पुत्री अन्यत्र निवासरत होकर अविवाहित है। इस सम्पत्ति का बंटवारा किस प्रकार किया जा सकता है? सभी संतानों का मालिकाना हक किस प्रकार इस सम्पत्ति पर हो सकता है? मालिकाना हक से संबंधित क्या दस्तावेज तैयार करवा सकते हैं? कृपया बतायें- 1. क्या इस सम्मत्ति की रजिस्ट्री होगी? 2. हॉउसिंग बोर्ड इस सम्पत्ति में क्या कार्यवाही कर सकता है ? 3. रजिस्टर्ड बंटवारा ओर रजिस्ट्री में क्या कोई अंतर है? क्या रजिस्टर्ड बंटवारा में रजिस्ट्री के सभी अधिकार प्राप्त होते है या नहीं?

समाधान-

ब आप रजिस्ट्री शब्द का उल्लेख करते हैं तो आम तौर पर उसका अर्थ पंजीकृत विक्रय पत्र से या पंजीकृत लीज डीड से होता है। लेकिन पंजीकरण का कानून यह है कि यदि 100 रुपए से अधिक कीमत की कोई अचल संपत्ति का हस्तांतरण हो तो उस की रजिस्ट्री होना जरूरी है। बंटवारा भी ऐसा ही एक विलेख है। पंजीकरण कानून कहता है कि बंटवारे के विलेख का पंजीकृत होना जरूरी है वर्ना वह विलेख जरूरत पड़ने पर किसी कार्यवाही में नहीं पढ़ा जाएगा।

संपत्ति के सभी साझेदारों के बीच आपसी सहमति से बंटवारा होता है तो उसे पंजीकृत कराना जरूरी है। यह पंजीकृत विलेख ही संपत्ति के स्वामित्व का विलेख होगा। हाउसिंग बोर्ड या नगर निगम में जहाँ संपत्ति का रिकार्ड रहता है वे अपने रिकार्ड में नामान्तरण करते हैं लेकिन नामान्तरण हो जाने से किसी को स्वत्वाधिकार प्राप्त नहीं होता है। नामान्तरण गलत होने पर न्यायालय के आदेश से उसे हटाया या दुरुस्त किया जा सकता है। स्वअर्जित संपत्ति में सभी पुत्रों और पुत्रियों का समान हिस्सा है। यदि किसी का देहान्त हो गया है तो उस की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों को जाएगी। किसी के मर जाने से या गायब हो जाने से उस का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता है।

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समस्या-

नीलम खन्ना ने मनीमाजरा, चंडीगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी को उनके पिताजी से साल 1911 में संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। मेरे पिताजी को दादा जी से उनकी संपत्ति साल 1971 में उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। हम दो भाई बहन हैं। मेरे पिताजी ने सारी संपत्ति की वसीयत मेरे भाई के बेटे के नाम कर दी, मेरे पिताजी के देहांत के बाद सारी संपत्ति मेरे भतीजे के नाम हो गई। मैंने जुलाई 2016 में अपने हिस्से के लिए केस दायर किया, मैंने संपत्ति को बेचने से रोकने के लिए अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन किया, लेकिन उस समय मेरे पास संपत्ति का पिछला रिकॉर्ड ना होने के कारण अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन रद्द हो गया। मैंने अब पिछला सारा रिकॉर्ड निकलवा लिया है क्या मैं अब दोबारा अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन कर सकती हूँ? क्या मुझे अपना हिस्सा मिल सकता है?

समाधान-

प के द्वारा दिए गए विवरण से यह स्पष्ट है कि उक्त संपत्ति सहदायिक है। आप ने विवरण में यह नहीं बताया है कि आप के पिताजी की मृत्यु कब हुई है। यदि आप के पिता जी की मृत्यु. 2005 के बाद हुई है तब आप को 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में हुए संशोधन से इस सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त हो चुका था। उस वक्त आप के पिता केवल अपने हिस्से की वसीयत कर सकते थे न कि पूरी संपत्ति की। इस प्रकार आप का हिस्से का दावा सही है आप को हिस्सा मिलना चाहिए।

दावा तो पहले भी हिस्से का ही हुआ होगा। अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन तो उसी दावे में प्रस्तुत किया गया होगा। यदि वह दावा अभी चल रहा है तो उसी दावे में अस्थाई निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र पुनः प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि दावा भी आप ने खारिज करवा लिया है या अदम हाजरी अदम पैरवी में खारिज हो चुका है तो उस का रिकार्ड देख कर तय करना पड़ेगा कि उसे दुबारा किस प्रकार किया जा सकता है। बेहतर है आप वहीं दीवानी मामलों के किकसी अच्छे वकील से सलाह कर आगे कार्यवाही करें।

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समस्या-

प्रशान्त ने ग्राम नूरपुर, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे दादाजी चार भाई थे जिस में एक निस्सन्तान थे। मेरे दादा जी से पहले उन के दो भाइयों की मृत्यु हो गयी। उन के हिस्से कि संपत्ति उन के उत्तराधिकारियों को मिल गयी। 2004 में निस्सन्तान दादाजी की संपत्ति मेरे दादाजी को मिल गयी।  अब 2012 में मेरे दादाजी की भी मृत्यु हो गयी। उन की संपत्ति हमारे नाम आ गयी। अब मेरे दादा जी के भाई का लड़का बोलता है कि मेरा भी हिस्सा था इस में, तो क्या 29.06.2004 को  भाई का हक भतीजे को भी मिलता था?

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में कोई व्यक्ति निस्सन्तान मर जाए और उस की पत्नी और पिता भी जीवित न हों तो फिर उस की सम्पत्ति जीवित भाई को ही प्राप्त होगी।  इस तरह आप के दादा जी के भाई की मृत्यु पर आप के दादा जी को प्राप्त हुई वह सही थी। उस में मृत भाई के पुत्र का का कोई हिस्सा नहीं था।

लेकिन यदि दादाजी के निस्संतान भाई की संपत्ति में उत्तरप्रदेश में स्थित कोई कृषि भूमि है तो उस भूमि का उत्तराधिकार उ.प्र. जमींदारी विनाश अधिनियम से तय होगा और उस स्थिति में पूर्व मृत भाई के पुत्र को भी हि्स्सा पाने का अधिकार है। यह विधि 29.06.2004 को भी प्रचलित थी।

 

 

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हकत्याग विलेख को पंजीकृत कराए बिना हकत्याग संभव नहीं है।

May 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

छैल कँवर ने मेवानगर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं  मेरे पिता और माता की एकमात्र सन्तान हूँ। मेरे पिता का देहांत मेरे जन्म से पहले ही हो गया था। जिससे समस्त जमीन मेरे माताजी के नाम हो गई। मेरी माताजी का देहांत 1883 में हो गया उस समय में ससुराल में थी। मेरे कोई भाई या बहन नहीं है, जिसके कारण जमीन का नामानतरण मेरे नाम होना था। लेकिन मेरे दादाजी के भाई के बेटे ने जो उस समय सरपंच थे वे मेरे ससुराल आये और मुझे ये कहा कि आप मेरे साथ चलो आपकी जमीन आपके नाम करवा रहे हैं। वो मुझे एक वकील के पास लेकर गए और एक स्टाम्प पर अंगूठा लगवाया। मुझे अब पता चला हे की उन्होंने उस स्टाम्प के आधार पर मेरी समस्त जमीन अपने बेटे के नाम हकतर्क करवा ली जो उस समय मात्र 14 साल का था। जब मैंने रिकॉर्ड निकलवाया तो उसके फोतगी में पटवारी ने लिखा था की “असन कँवर (माताजी) के फौत होने पर उनकी बेटी छेल कँवर (स्वयं) इकरार नामा 7 रूपये के स्टाम्प पर मनोहरसिंह (जिसके नाम हकतर्क किया गया उम्र 14 साल) के हक में ओथ कमिश्नर द्वारा 28.1.1983 को तस्दीक दस्तावेज पर नामान्तरण खोला गया।” श्रीमान में निम्न सवालों के जवाब जानना चाह रही हूँ- 1. क्या 1983 मैं ओथ कमिश्नर द्वारा जारी स्टाम्प के आधार पर नामन्तरण खोला जा सकता था? 2. क्या मेरे दादाजी के भाई के बेटे के बेटे के नाम हक तर्क हो सकता था जो उस समय 14 साल का था?  न ही वो मेरे पिताजी द्वारा गोद लिया पुत्र है। 3.श्रीमान मैं एक निरक्षर महिला हूँ। मुझे धोखे से एक बार वकील के आगे एक स्टाम्प पर अंगूठा लगवाया था इसके अलावा मैंने न तो किसी पटवारी, तहसीलदार, या रजिस्ट्रार के आगे कोई अंगूठा लगाया हे। 4. मेरी माताजी का देहांत मेरे ननिहाल में 1983 में हुआ था, में अब उनका मृत्यू प्रमाण पत्र बनवाना चाहती हूँ लेकिन मेरे पास उनकी मृत्यु या उनसे सम्बंधित कोई दस्तावेज नहीं है? उचित सलाह प्रदान करें।

समाधान-

नामान्तरण से कभी भी किसी संपत्ति का टाइटल निर्धारित नहीं होता। चूंकि आप को अब पता लगा है कि नामान्तरण आप के नाम होने के स्थान पर आप के दादा जी भाई के पुत्र ने अपने पुत्र के नाम नामान्तरण खुलवा लिया है। इस कारण अब आप तुरन्त नामान्तरण के आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त कर उस आदेश के विरुद्ध अपील कर सकती हैं।

हकत्याग एक प्रकार का अचल संपत्ति का हस्तान्तरण है इस कारण उस का उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत होना अनिवार्य है। इस तरह नोटेरी के यहाँ तस्दीक किए गए हकत्याग के विधि विपरीत विलेख के आधार पर नामान्तरण खोला जाना पूरी तरह गलत है।

आप को चाहिए कि राजस्व (खेती-बाड़ी) की जमीनों का काम देखने वाले किसी अच्छे वकील को अपने सारे दस्तावेज दिखाएँ और नामान्तरण की अपील प्रस्तुत करें। आप टाइटल के आधार पर भी राजस्व रिकार्ड में संशोधन और जमीन का कब्जा दिलाए जाने के लिए दावा प्रस्तुत कर सकती हैं। लेकिन जो भी करें अपने वकील को समस्त दस्तावेज दिखा कर उन की राय के अनुसार काम करें।

हक त्याग सिर्फ और सिर्फ किसी भी संपत्ति के सहस्वामी के हक में किया जा सकता है। उक्त भूमि की आप एक मात्र स्वामी थीं। इस कारण से किसी भी व्यक्ति के नाम आप के दादा जी के भाई के पोते के नाम  भी हकत्याग होना संभव नहीं था। इस कारण भी वह हक त्याग वैध नहीं है।

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समाधान-

राम नारायण ने बड़ौदा, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या ये है कि मेरे पिता की स्वअर्जित सम्पति है।  जिसे मेरे पिता ने 1965 में लिया था।  मेरे पिता का देहांत 03/10/2005 को हो गया है।  मेरे पिता ने कोई वसीयत नहीं बनाई थी।  देहांत के बाद मेरी 3 बहनो में से एक बहन ने अपनी परिस्थिति का रोना रोकर मेरे से मेरा एक रूम ले लिया और बोली की मेरी परिस्थिति ठीक होने के बाद मैं चली जाउंगी। लेकिन अब 8 साल हो गया है। लेकिन वो जाने को नहीं बोलती है और झगड़ा करती है। मेरी माँ मेरे साथ ही रहती है। उससे भी झगड़ा करती है। मेरी बहन को रूम से निकालने के लिए क्या करना होगा? मेरी बहन का आदमी भी उसके साथ ही रहता है।


समाधान-

प के पिता की स्वअर्जित संपत्ति पर आप के पिता की मृत्यु के साथ ही उन के उत्तराधिकारियों का स्वत्वाधिकार स्थापित हो गया। आप अकेले उस संपत्ति के स्वामी नहीं हैं। पुत्र होने के नाते आप अकेले उस मकान के स्वामी नहीं हो सकते। इस मकान में फिलहाल पाँच हिस्से हैं। एक आप की माँ का तीन आप की बहनों के और पाँचवाँ आपका। यदि आप बहिन से कुछ कहेंगे तो वह अदालत में बंटवारे का दावा करेगी। दूसरी बहनों और माँ को भी साथ ले लेगी तो आप को केवल पाँचवाँ हिस्सा ही प्राप्त होगा, जो आप का है। वैसे भी जब तकआप को सभी बहनों से रिलीज डीड के माध्यम से हक प्राप्त नहीं हो जाए उन सभी का हि्स्सा बना रहेगा।

बहिन ने परिस्थिति का रोना रो कर जो कमरा प्राप्त किया है वह उस का हक है। उस ने कैसे भी मकान पर कब्जा प्राप्त कर लिया है और उसी में रहती भी है आप अपनी बहन को रहने दें। जो भी समाधान हो वह प्यार से आपसी समझ से करें।

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