विधि Archive

समाधान-

राम नारायण ने बड़ौदा, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या ये है कि मेरे पिता की स्वअर्जित सम्पति है।  जिसे मेरे पिता ने 1965 में लिया था।  मेरे पिता का देहांत 03/10/2005 को हो गया है।  मेरे पिता ने कोई वसीयत नहीं बनाई थी।  देहांत के बाद मेरी 3 बहनो में से एक बहन ने अपनी परिस्थिति का रोना रोकर मेरे से मेरा एक रूम ले लिया और बोली की मेरी परिस्थिति ठीक होने के बाद मैं चली जाउंगी। लेकिन अब 8 साल हो गया है। लेकिन वो जाने को नहीं बोलती है और झगड़ा करती है। मेरी माँ मेरे साथ ही रहती है। उससे भी झगड़ा करती है। मेरी बहन को रूम से निकालने के लिए क्या करना होगा? मेरी बहन का आदमी भी उसके साथ ही रहता है।


समाधान-

प के पिता की स्वअर्जित संपत्ति पर आप के पिता की मृत्यु के साथ ही उन के उत्तराधिकारियों का स्वत्वाधिकार स्थापित हो गया। आप अकेले उस संपत्ति के स्वामी नहीं हैं। पुत्र होने के नाते आप अकेले उस मकान के स्वामी नहीं हो सकते। इस मकान में फिलहाल पाँच हिस्से हैं। एक आप की माँ का तीन आप की बहनों के और पाँचवाँ आपका। यदि आप बहिन से कुछ कहेंगे तो वह अदालत में बंटवारे का दावा करेगी। दूसरी बहनों और माँ को भी साथ ले लेगी तो आप को केवल पाँचवाँ हिस्सा ही प्राप्त होगा, जो आप का है। वैसे भी जब तकआप को सभी बहनों से रिलीज डीड के माध्यम से हक प्राप्त नहीं हो जाए उन सभी का हि्स्सा बना रहेगा।

बहिन ने परिस्थिति का रोना रो कर जो कमरा प्राप्त किया है वह उस का हक है। उस ने कैसे भी मकान पर कब्जा प्राप्त कर लिया है और उसी में रहती भी है आप अपनी बहन को रहने दें। जो भी समाधान हो वह प्यार से आपसी समझ से करें।

समस्या-

पत्रकार रमेश कुमार जैन निर्भीक ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-


जकल बाज़ार में से कोई भी चीज खरीदों. जैसे – मोबाइल की बैटरी, कम्प्यूटर के यू.पी.सी की बैटरी, स्कुटरी की बैटरी या अन्य कोई भी वस्तु जिसपर सीमित समय के लिए गारंटी/ वारंटी होती है. गारंटी अवधि में वस्तु के खराब होने पर दुकानदार/कम्पनी उपरोक्त वस्तु को बदलकर तो दे देते हैं. लेकिन बदली हुई वस्तु पर पहले वाली वस्तु की बची अवधि की ही गारंटी देते हैं. उदाहरण से समझे : पहले वाली वस्तु छह महीने की गारंटी है और वो वस्तु चार महीने के बाद खराब हो गई तो दुकानदार/कम्पनी दूसरी वस्तु पर केवल दो महीने की गारंटी की ही गारंटी देते हैं. कुछ वस्तुओं पर वारंटी होती है तो उस वस्तु में बार-बार कोई खराबी आती है तब उनका सर्विस सेंटर बहुत दूर होने के कारण बार-बार सर्विस सेंटर हर उपभोक्ता के लिए जाना सम्भव नहीं होता है. अनेक बार तो वस्तु इतनी कम कीमत की होती है कि उसको सर्विस सेंटर पर लेकर जाने का खर्चा उससे अधिक होता है. ऐसी समस्याओं के क्या उपाय है और इस विषय में उपभोक्ता कानून क्या कहते हैं ? उपरोक्त समस्या आज दिल्ली या किसी विशेष शहर की समस्या न होकर पूरे भारत वर्ष की आम जनता की है.


समाधान-

वारंटी या गारंटी पर न जाएँ। इसे ऐसा समझें कि किसी माल पर जो बेचा गया है उस पर कोई वारंटी या गारंटी नहीं है। फिर भी कोई व्यक्ति कोई खराब चीज किसी व्यक्ति को नहीं बेच सकता। यदि वह कोई खराब चीज बेचता है तो यह उपभोक्ता के साथ अन्याय है और उपभोक्ता कानून में इस तरह के अन्याय से पीड़ित कोई भी व्यक्ति उपभोक्ता न्यायालय को शिकायत प्रस्तुत कर सकता है और राहत प्राप्त कर सकता है। यदि किसी माल में मैन्युफैक्चरिंग दोष है तो उसे बदलने के लिए किसी वारंटी की कोई जरूरत नहीं है। उपभोक्ता अदालतों ने वारंटी के बिना बेचे गए माल के और वारंटी की अवधि के बाद मैन्युफेक्चरिंग दोष का पता लगने पर किए गए मामलों में उपभोक्ता के पक्ष में निर्णय किए हैं।

कम कीमत के माल के मामले में भी शिकायक की जा सकती है। आखिर अदालत मानसिक संताप के लिए भी तो क्षतिपूर्ति दिलाती है। यदि सर्विस सेंटर जाने में बहुत पैसा खर्च हुआ है और आप उसे साबित कर सकते हैं तो वह खर्चा और आने जाने में हुए समय व कष्ट के लिए भी क्षतिपूर्ति उपभोक्ता न्यायालय दिला सकते हैं।

समस्या-

घनश्याम पाण्डेय ने सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


 मेरे पड़ोस में मेरी मुँह बोली बहन रहती है। जिसका विवाह मात्र १२ वर्ष के उम्र १९९८ में ही कर दिया गया। यह बाल विवाह ही था, लड़के की उम्र १२ साल ही थी।  खैर यह शादी मात्र चार वर्ष ही चली और २००२ में पंचायत के सामने तलाक करवा दिया गया और उनसे कोई संतान नहीं हुई।  बहन का दूसरा विवाह लगभग १८ की उम्र में २००४ में हुआ, जहाँ पर उसे दो लड़की संताने भी हुई, साल २०११ में उसे दूसरी लड़की पैदा होने पर घर से निकाल दिया गया। अतः वह तब से मायके में ही रहती है। उसके ननद, देवर और पति सभी उस पर अत्याचार करते हैं। जब वह जाती है, बड़ी बेरहमी से पति, देवर मार कर उसे भगा देते हैं।  बहन के मायके वाले भी ज्यादा सहयोगी नहीं। अतः पुनः २०१५ के एक साधारण समारोह द्वारा उसका तीसरी जगह जबरदस्ती घरवालों ने विवाह करवा दिया।  जो कि वैवाहिक संस्कार करके नहीं किये गए थे, उसे कुछ भी नाम दिया जा सकता है। लेकिन यह विवाह भी मात्र २ महीने न चला। अब बहन आज भी बार बार दूसरे विवाह के पति के घर जाती है, जहाँ पर उसकी बड़ी बेटी ले ली गयी, जब कि दूसरी बेटी को पति अपनी संतान स्वीकार नहीं करता है। जब उसका जन्म पति के घर में ही हुआ। अतः ऐसी परिस्थिति में बच्चों के क्या अधिकार अपने नैसर्गिक पिता से बनते हैँ तथा बहन भी क्या अपने दूसरे पति के अधिकार प्राप्त कर सकती है। वह अत्यंत गरीब अवस्था में है, माँ-बाप तथा पति सभी उसके खिलाफ हो गए। वह अपनी छोटी बेटी के साथ किसी तरह गुजारा कर रही है। अतः बच्चों और बहन का क्या अपने दूसरे पति के ऊपर क़ानूनी अधिकार बनता है। बहन आज भी अपने पति के घर जाना चाहती है तथा लगभग पागलपन की अवस्था पर पहुँच गयी है।

समाधान-

हिन्दू विवाह केवल और केवल न्यायालय की डिक्री से ही समाप्त हो सकता है इस कारण से आप की मुहँबोली बहिन यदि अनुसूचित जनजाति से नहीं है तो उस का पहला विवाह आज तक भी समाप्त नहीं हुआ है। उस का पहला पति ही उस का वैधानिक पति है। पहले पति से विवाह विच्छेद वैधानिक न होने से दूसरा विवाह वैध नहीं था। इस कारण आपकी बहिन का दूसरे पति से कोई अधिकार नहीं है। लेकिन उस की दोनों संतानें दूसरे पति से हैं इस कारण संतानों को अपने पिता से भरण पोषण पाने का अधिकार है। तीसरे पति के साथ आप की बहिन दो माह से भी कम समय रही है वह रिश्ता एक लघु अवधि का लिव इन था। इस कारण इस संबंध से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं हुआ है।

अभी तक आपकी मुहँ बोली बहिन का पहले पति से रिश्ता समाप्त नहीं हुआ है इस कारण वह पहले पति से भरण पोषण की मांग कर सकती है। इस के लिए न्यायालय में अर्जी दाखिल कर सकती है। इस के साथ ही वह अपनी छोटी पुत्री के लिए अपने दूसरे पति से भरण पोषण की मांग कर सकती है।

विधवा को ससुर की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं।

April 28, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

किरन सोनी ने गिरजाबाग, जिला उन्नाव, उत्तरप्रदेश से अपनी समस्या भेजी है-

मेरे पति का देहान्त 1987 में हो चुका है। मेरे ससुर के पास स्वअर्जित 12 बीघा सम्पत्ति है। उनकी उम्र लगभग 96 साल है। मेरे ससुर के चार लड़के और चार लडकिया हैं। इस जमीन पर मेरे पति ईट भट्ठा चलाते थे जो उनके मरने के बाद मेरे देवर सब बर्बाद कर दिया। मेरे ससुर ने अपनी जरूरत के लिये मेरे लड़के का मकान उसको बहला फुसलाकर बिकवा दिया और उसको दो बीघा जमीन रजिस्ट्री करके लिख दी। मेरा लडका प्राईवेट नौकरी करके किसी तरह अपना और मेरा गुजारा करता है। अब वो 2 बीघा जमीन फिर से वापस मांग रहे हैं। उन्होंने अपने छोटे लड़के को करीब 17 दुकानें जो कि उनका मार्केट था। उसमें बिना पैसा लिये रजिस्ट्री कर दी थी। छोटा लड़का उनका पुलिस में दरोगा है और मेरे ससुर उन्हीं के साथ रहते हैं व उनकी बात मानते हैं। बाकी दोनों लड़कों को बहुत कुछ दिया जिसमें नकदी व कुछ जमीन भी शामिल है। लेकिन पैसे के लेन देन का कोई रिकार्ड नहीं है। मेरे पति का दिया हुआ सारा जेवर और सारा सामान, बर्तन तक ले लिये और मुझसे कोई वास्ता नहीं रखा। सब मेरे व मेरे लड़के के खिलाफ हैं क्योकि हम गरीब हैं। मेरे लड़के से मेरे ससुर बात तो करते हैं लेकिन और लड़कों के मतलब के लिये। आज अपने बाकी लड़कों और लड़कियों को रजिस्ट्री करने तहसील में गये हुये है और रजिस्ट्री कर दी होगी। जबकि पैसा मेरे लड़के ने दिया है। और किसी ने कुछ नहीं दिया है मुझे आज तक कुछ नहीं मिला है। मुझे किसी प्रकार से कोई पेंशन वगैरह भी नहीं मिलती है। आज मेरी 3 ननदें मिलकर उस जमीन का बँटवारा मेरे ससुर से करवा रही हैं और मुझे कुछ भी नहीं देने को कह रही है मेरा लड़का भी परेशान है क्योंकि सारी जमा पूंजी भी मेरे ससुर ले चुके है और कुछ देने को नहीं कह रहे हैं। क्या विधवा औरत का ससुर की सम्पत्ति में कोई हक नहीं है जब उसका पति भी नहीं जिन्दा है। क्या मुझे कुछ नहीं मिलेगा? कृपया मेरा मार्गदर्शन करें।

समाधान-

किसी की स्वअर्जित संपत्ति पर उस व्यक्ति के जीते जी किसी अन्य व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं होता है। उस की स्वंय की पत्नी, माता, पिता या संतानों का भी कोई अधिकार नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति बिना कोई वसीयत किए मर जाए तो मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार में उस की पत्नी, माँ व संतानों को उत्तराधिकार प्राप्त होता है। आप के पति का देहान्त हो चुका है। तथा आप के ससुर के पास स्वअर्जित संपत्ति 12 बीघा है। इस संपत्ति पर किसी का कोई अधिकार नहीं है वे जिसे चाहें दे सकते हैं। उस जमीन में से दो बीघा जमीन उन्हों ने आप के बेटे को रजिस्ट्री करवा कर दे दी है। इस के अलावा भी उन के सात लड़के लड़कियाँ हैं। इस तरह उन्हों ने पहले ही जमीन में से आप के पति को आप के ससुर के मरने के बाद मिलने वाले अधिकार से अधिक आप के बेटे को दे दिया है।

यदि आप का लड़का आप के ससुर को या परिवार के दूसरे सदस्यों को कुछ देता है तो उस की मर्जी है और आपके ससुर उस का क्या करते है यह भी उन की इच्छा पर निर्भर करता है। यदि आप के पास धन नहीं हैं तो किसी को देते क्यों हैं और ससुर की बातों में भी क्यों आते हैं। हमारी राय है कि आप के बेटे को जो दो बीघा जमीन रजिस्ट्री से मिल गयी है उसे किसी हालत में वापस न करे। अन्यथा आप को और आप के बेटे को अधिकार के रूप में कुछ भी नहीं मिलने वाला है। बाकी जमीन या संपत्ति जो भी है उसे आप के ससुर कैसे बाँटते हैं यह उन की मर्जी पर है। वे अपनी स्वअर्जित संपत्ति के स्वयं मालिक हैं उस का कुछ भी कर सकते हैं। यह सही है कि विधवा पत्नी का ससुर की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है। उस का अधिकार सिर्फ अपने मृत पति की संपत्ति पर है।

दिया हुआ उपहार वापस नहीं मांगा जा सकता।

April 7, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

भावेश जैन ने उदयपुर राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


2010 में मैंने अपनी गर्लफ्रेंड को मेरे नाम पर पर एक मोबाइल सिम खरीद कर दी, व्यक्तिगत उपयोग के लिए।  उस सिम को मैंने 2011 में पोस्ट पेड करवा दिया तथा उसके बिल का भुगतान भी में करता था।  जिसके बिल भुगतान की रसीदें मेरे पास हैं। 2016 में उसने मेरे से ब्रेकअप कर लिया तो मैंने उसकी सिम बंद करवा कर उसी नंबर की नयी सिम इशू करवाकर उपयोग करने लग गया हूँ।  क्या मैं ने कोई अपराध किया है? मैं ने उसे एक मोबाइल गिफ्ट किया था क्या मैं उस मोबाइल की मांग कर सकता हूँ ?


समाधान-

सिम अर्थात मोबाइल कनेक्शन आप के नाम था। उस पर आप का स्वामित्व था। आप ने वह अपने पास ले लिया। कोई अपराध नहीं किया।

लेकिन फोन इन्स्ट्रूमेंट आप ने गिफ्ट अर्थात उपहार में दिया था। उपहार का कानून यह है कि वह वापस नहीं होता। उपहारकर्ता अपने उपहार को वापस नहीं मांग सकता।  इस लिए आप का उसे वापस मांगना किसी भी तरह से न तो उचित है और न ही कानूनी।

 

समस्या-

राकेश कुमार ने अलवर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी ओर मेरे भाई की शादी फऱवरी 2015 में हुई। शादी के 1 साल तक सही रहा।  इसके बाद हम दोनों भाई की उनसे बनी नहीं वो बिना बात पे ही हम से लड़ाई करती थी।  फिर वो दोनों चली गई, हम लेने गए तो दोनो नहीं आई।  बड़ी बहन गर्भ से थी। हम ने धारा 9 का केस डाल दिया। चार माह बाद जब डिलीवरी होने का टाइम आया तो उन्होने कहा कि इनको ले जाओ।  हम दोनों को ले आए। डिलीवरी के दो माह बाद छोटी बहन, मेरी घरवाली कहती है कि मुझे नहीं रहना तलाक चाहिए। हम ने उसको कई बार रहने को बोला लेकिन वो अपने माँ बाप के पास चली गई और उसके बाद उसने मुझे नोटरी करवा कर रुपए 100 के स्टांप पर तलाक़ दे दिया और बड़ी बहन अभी रह रही है, क्या ये तलाक़ मान्य है।

समाधान-

प खुद हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत एक आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर चुके हैं। इस का अर्थ है कि आप हिन्दू विवाह अधिनियम से शासित होते हैं। इस अधिनियम में कोई भी तलाक केवल तभी मान्य होता है जब कि न्यायालय से डिक्री पारित हो जाए।

आप की पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती है और उस ने 100 रुपए के स्टाम्प पर आप को तलाकनामा लिख भेजा है। यह अपने आप में क्रूरता पूर्ण व्यवहार है। आप इसी स्टाम्प के आधार पर तथा अन्य आधारों पर परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी प्रस्तुत कर सकते हैं। आप को तुरन्त कर ही देनी चाहिए। न्यायालय से डिक्री पारित होने और निर्धारित अवधि में उस की कोई अपील दाखिल न होने पर यह तलाक अन्तिम हो सकता है।

पिता की संपत्ति में हिस्सा?

December 15, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

partition of propertyसमस्या-

सुबाला देवी ने रांची, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मैं एक शादीशुदा महिला हूँ। मैं अपने पिताजी के चल-अचल संपति में हिस्सा चाहती हूँ। लेकिन मेरे पिताजी माँ और मेरे भाई हिस्सा नहीं देना चाहते हैं।  इसके लिए मुझे क्या करना होगा? मेरे पास कोई कगजात भी नहीं हैं।

समाधान-

किसी भी पुत्र या पुत्री को अपने पिता या माता की स्वअर्जित सम्पत्ति में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। जब तक वे जीवित हैं यह संपत्ति उन की है और वे अपनी इच्छानुसार इस का उपयोग कर सकते हैं। यदि माता या पिता में से किसी का देहान्त हो जाए और मृतक ने अपनी संपत्ति या उस का भाग वसीयत न किया हो तो ऐसी संपत्ति का स्वामित्व मृत्यु के साथ ही उस के उत्तराधिकारियों में निहीत हो जाता है। सभी उत्तराधिकारी उस संपत्ति के संयुक्त स्वामी हो जाते हैं। ऐसे संयुक्त स्वामियों में से कोई भी संपत्ति के बंटवारे और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा प्राप्त करने का वाद न्यायालय में संस्थित कर सकता है।

यदि आप के पिता के पास कोई पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति है तो उस में जन्म से ही पुत्रों का अधिकार होता है। 2005 से पुत्रियों का अधिकार भी होने लगा है। तब आप उस संपत्ति की संयुक्त स्वामी हो सकती हैं और उस में आप का हिस्सा हो सकता है। आप चाहें तो बँटवारे और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा प्राप्त करने का वाद न्यायालय में संस्थित कर सकती हैं।

Muslim-Girlसमस्या-

पवन ने नरवाना, हरियाणा से पूछा है-

मेरे नाना की अचल संपत्ति है जो पुश्तैनी है। मेरे नाना के एक पुत्र और तीन पुत्रियाँ हैं। पुत्र की मृत्यु हो गयी है। उस की पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है। क्या दूसरा विवाह करने के बाद भी वह स्त्री मेरे नाना की अचल संपत्ति में हिस्सा प्राप्त कर सकती है?

समाधान-

जिस क्षण एक सहदायिकी के किसी सदस्य का देहान्त होता है उस के हिस्से की संपत्ति का उत्तराधिकार निश्चित हो जाता है और उस के उत्तराधिकारी हिस्सेदार बन जाते हैं।

आप की मामी मामा का देहान्त होते ही उस सहदायिकी का हिस्सा बन गयी है जिस में आप के मामा का हिस्सा था अर्थात आप के नाना की पुश्तैनी संपत्ति में। एक बार वह हिस्सेदार हो गयी तो फिर उस के द्वारा फिर से विवाह कर लेने से उस की सहदायिकी की सदस्यता समाप्त नहीं होगी। वह अपने हिस्से के बंटवारे की मांग कर सकती है और न दिए जाने पर वह न्यायालय से बंटवारा करवा सकती है।

यदि आप के नाना की संपत्ति पुश्तैनी न हो और उन की स्वअर्जित हो तब भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आप की मामी उन का हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी हैं। उन के दूसरा विवाह कर लेने से उन का यह अधिकार समाप्त नहीं होगा। इस संदर्भ में मद्रास उच्च न्यायालय का श्रीमती यमुना देवी बनाम श्रीमती डी नलिनी के प्रकरण में दिया गया निर्णय पढ़ा जा सकता है।

दत्तक के सांपत्तिक अधिकार …

October 3, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

Hindu succession actसमस्या-

कृष्णगोपाल शर्मा ने देवगुढा बावडी, वाया जाहोता, तहसील आमेर,  जिला जयपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे दादाजी को उनके चाचाजी ने गोद ले रखा था। मेरे दादाजी की म़त्‍यु सऩ् 2003 में हो गई। हमने पंचायत से एक म़त्‍यु प्रमाण पत्र बनवाया जिसमें उनके दत्‍तक पिताजी का अंकन था,  कुछ समय बाद पता चला कि इनके (दादाजी के चाचाजी) पास कोई पैत़ृक जमीन नहीं है सो हमने अपने निज पिताजी के नाम से दूसरा म़ृत्यु प्रमाण पत्र बनवा लिया तथा उसके आधार पर हमारा जमीन में से नामांतकरण खुल गया। क्‍या इस तरह से एक ही व्यक्ति का म़त्‍यु प्रमाण पत्र दो अलग अलग पिताओं के नाम से बनना कानून की नजर में अपराध है? और क्‍या मेरे दादाजी को अपने वास्‍तविक पिताजी व दत्‍तक पिताजी दोनों की सम्‍पत्ति मिल सकती है या कानून केवल एक पिता की सम्‍पत्ति ही लेने के लिए कहता है।

समाधान-

जिस ने भी दादाजी की मृत्यु का प्रमाण पत्र बनवाया वह प्रक्रिया के अधीन बनवाया। इस प्रक्रिया में मृतक के संबंधी कुछ सूचनाएँ जन्म-मृत्यु पंजीयक को देते हैं उस के आधार पर मृत्यु दर्ज हो जाती है। जब उस से लाभ न हुआ तो कुछ सूचनाएँ परिवर्तित कर दूसरा प्रमाण पत्र बनाया इस का अर्थ है आप ने एक ही व्यक्ति की मृत्यु को दो बार रिकार्ड में अंकित करवाया। यह दंडनीय अपराध है और शिकायत होने पर इस मामले में कार्रवाई हो सकती है।

यदि कोई व्यक्ति गोद चला जाए और किसी सहदायिक (पुश्तैनी) संपत्ति में उस का कोई हिस्सा हो तो वह उसी का बना रहता है। गोद जाने से उस के उस हिस्से के स्वामित्व में कोई अंतर नहीं आता। लेकिन गोद जाने के बाद अपने मूल पिता से उत्तराधिकार प्राप्त करने का अधिकार खो देता है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि गोद जाने वाला व्यक्ति दोनों तरह की संपत्ति प्राप्त करने का अधिकारी होता है। लेकिन ऐसा नहीं है।

हर व्यक्ति को ऐसा अधिकार होता है। यदि कोई सहदायिक संपत्ति हो तो उस में तो किसी व्यक्ति का हिस्सा जन्म से ही मिल जाता है। जब कि उस के पिता, व माता की स्वअर्जित संपत्ति में उत्तराधिकार का उस का अधिकार उन की मृत्यु पर उत्पन्न होता है। इसी तरह गोद गए व्यक्ति को जिस सहदायिक संपत्ति में जन्म से अधिकार मिल गया है वह तो उसी तरह बना रहता है। लेकिन उसे अपने गोद पिता व माता की स्वअर्जित संपत्ति में उत्तराधिकार तो प्राप्त होता ही है लेकिन गोद पिता की सहदायिकी में भी हिस्सा प्राप्त करने का उस का अधिकार गोद लेते ही उत्पन्न हो जाता है।

rp_gavel-1.pngसमस्या-

रोहित ने पटना, बिहारसे पूछा है-

मैं एक निजी संस्थान में बतौर शिक्षक कार्यरत हूँ। मेरी उम्र 31 वर्ष है, इसी वर्ष फ़रवरी में विवाह हुआ है। मेरी माँ की मृत्यु 1994 में हो गयी थी। उस माँ से मेरी एक छोटी बहन (अब विवाहित) तथा एक छोटा भाई है। मेरे पिताजी ने 1995 में पुनर्विवाह किया जिस से उन्हें एक पुत्र है। हम भाई बहन ने हमेशा उनमें माँ ढूंढा मगर उन्हें हमारे लिए कोई वात्सल्य न था, ना आब तक है। मुझे पढ़ाई और कैरियर के नाम पर हमेशा घर से दूर रखा गया। किसी तरह 2016 में मेरी और मेरी बहन की शादी (उनकी मर्ज़ी से ही) हुई। उनकी मर्ज़ी से और पूरी तरह सामाजिक रीति रिवाजों के साथ विवाह करने के बावजूद आज की तारीख में मेरे पिताजी का रवैया मेरा और मेरी पत्नी के प्रति पूरी तरह बदला हुआ है। वे (साथ ही उनकी पत्नी भी) हमे अपने घर से निकल जाने को अक्सर धमकाते रहते हैं। मेरा प्रश्न है कि क्या मेरा कोई क़ानूनी हक़ नहीं है इस घर में रहने का ? मेरे पिता की सम्पत्ति में क्या मेरा कोई हक़ नहीं ? यह घर 2003 में पिताजी ने अपनी दूसरी पत्नी के नाम से बनवाया है।

समाधान-

पुत्र, पुत्री का अपने पिता की संपत्ति में पिता के जीवित रहते कोई अधिकार नहीं होता।  किसी भी व्यक्ति के पुत्र, पुत्री, पत्नी, माता और पिता को स्वयं का भरण पोषण करने में सक्षम न होने पर उस से भरण पोषण का अधिकार है। इस में भी पुत्र को वयस्क होने तक, पुत्री को स्वावलम्बी होने या विवाह होने तक ही यह अधिकार प्राप्त है। यदि कोई सहदायिक संपत्ति है जिस में पिता का हिस्सा है तो पिता के उस हिस्से में पुत्र और अब पुत्रियों को पिता के जीवित रहते बंटवारे का अधिकार प्राप्त है। यह न पूछें कि सहदायिक संपत्ति क्या है इस के लिए आप इस साइट को सर्च कर सकते हैं जवाब मिल जाएगा।

कोई भी व्यक्ति अपनी संपत्ति को जीते जी किसी को भी हस्तान्तरित कर सकता है, वसीयत कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति मृत्यु के समय अपनी संपत्ति को निर्वसीयती छोड़ दे तो उस में उत्तराधिकार के कानून के हिसाब से उत्तराधिकारियों को हिस्सा प्राप्त होता है।

आप के मामले में जो संपत्ति आप के पिता ने आप की सौतेली माता के नाम से खरीदी है उस पर उन का खुद का कोई अधिकार नहीं है उस की स्वामिनी केवल आप की सौतेली माता ही हैं।

 

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