विभाजन Archive

हिस्से के लिए विभाजन का वाद करें।

February 23, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

हेमन्त मिश्रा ने अजमेर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं जिस मकान में रहता हूँ वो मेरे दादाजी के नाम है। उनकी कोई वसीयत नहीं है, रजिस्ट्री की कॉपी मेरे पास है। ओरिजनल रजिस्ट्री मेरी दादी और बुआ ने गायब कर दी है। मेरे दादाजी का देहांत 1992 में हो गया था। मेरे पिताजी का देहांत भी 2015 में हो गया है। अब घर में मैं, दादी, मम्मी, एक क्वांरी बहिन, मेरी पत्नी और मेरा बच्चा रहता है। हम यहाँ लगभग 30 साल से रह रहे हैं। अब दादी कहती है कि मैं अपनी लड़कियों को हिस्सा या इस मकान को बेच कर पैसे दूंगी। तुम सब जाओ यहाँ से ये मेरे पति का घर है। जबकि मेरे पिताजी ने अपनी बहनों (5) में से (3) की शादी की। अपने जीवित समय तक सारी रस्में निभाई। पर अब दादी अपनी उम्र का फायदा उठा कर मुझे और बाकी सब को परेशान करती रहती है। उन्होंने मेरी छोटी बुआ के साथ मिलकर मेरे खिलाफ झूठी पुलिस कंप्लेन भी की थी। इसके कारण मैं बहुत परेशान रहता हूँ। मैंने घर का हिस्सा करने की बात भी कह दी उनसे पर न तो दादी हिस्सा कर रही है न कोई वसीयत और न ही घर में कुछ मरम्मत करवाती है। घर भी जर्जर हो रहा है। मैं इसमें पैसे लगाने से डरता हूँ क्यूंकि कब दादी और बुआ मिलकर क्या कर दे कुछ पता नहीं। कुछ समाधान बताये।

समाधान-

दि मकान की रजिस्ट्री की मूल प्रति आप को नहीं मिल रही है तो उस की फोटो कॉपी में दर्ज विवरण के आधार पर रजिस्ट्री की प्रमाणित प्रतिलिपि सहायक कलेक्टर स्टाम्प के यहाँ से प्राप्त की जा सकती है।

मकान दादा जी के नाम था। इस कारण उन की मृत्यु के उपरान्त आप की दादी, आप के पिता और आप की 5 बुआओं के कुल सात हिस्से हुए। इस में से एक हिस्सा आप का है। आप के पिता ने अपनी बहनों का विवाह किया है तो वह उन का पारिवारिक दायित्व था। इस से बहनों का अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा कम नहीं हो जाता है।

आप की दादी आप के कहने पर भी हिस्से नहीं कर रही है तो आप न्यायालय में विभाजन का वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि आप की बुआओं में से कोई अपना हिस्सा नहीं लेना चाहती है तो उस से आप अपने नाम या अपनी माँ के नाम रिलीज डीड करवा सकते हैं। यदि आप विभाजन का वाद प्रस्तुत करने के पहले बुआओं से रिलीज डीड पंजिकृत करवा लेते हैं तो बेहतर होगा।

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समस्या-

वेद ने बादशाहपुर, हरयाणा से समस्या भेजी है कि-

मैं एक मध्यम परिवार से ताल्लुक रखता हूँ। मेरे दादा जी ने जो हमारा घर था ,उसको किसी के नाम नही किया, वो स्वर्ग सिधर गये। मेरे दादा जी के तीन लड़के हैं। मेरे पिता जी सब से छोटे हैं। मेरे पिताजी और ताउजी ने अपना अपना बटवारा कर लिया। मेरे पिता जी को जो हिस्सा मिला वो उन्होने सन् 1997 में बेच दिया।  दादा जी के नाम से जो हिस्सा मेरे पिता जी ने बेचा इस में उन्होने मेरे सिग्नेचर करा लिए और अलग जगह पर उस पैसे से ज़मीन लेकर मकान बनाया। जो मकान बनाया वो मेरे पिता जी के नाम पर है। मेरे पिता जी के हम चार बच्चे हैं . जिसमे हमारी दो बहनो की शादी सन् 1993 में और हम दोनों भाइयों की शादी सन् 1996 में हो गई। अभी हम सभी इसी नये मकान मे रहते हैं। हमारे घर मे लड़ाई होती रहती है। बात बात पर मेरे पिता जी और माँ हमें परेशान करते हैं। एक बार मेरे पिता जी ने लड़ाई के बाद जब कुछ लोगों के माध्यम से फ़ैसला किया। जिसमें उन्होने मुझे मकान में तीसरा हिस्सा दिया। जो कि एक लाइन वाली कॉपी के पेज पर लिखा है और रसीदी टिकट लगा कर मेरे पिता जी ने सिग्नेचर किए हैं।  साथ मे दो हमारे दोनो के रिलेटिव है उनके भी सिग्नेचर हैं। लेकिन वो पेपर मेरी अलमारी से गुम / चोरी हो गया। उसकी एक फोटो कॉपी मेरे पास है। अब मेरे पिता जी हमे इस घर से निकलना चाहते हैं। इसलिए हमारे साथ लड़ाई करते हैं कि ये यहाँ से घर छोड़ कर चला जाए। इस घर में बिजली का बिल मेरे नाम से आता है। मेरे पिता जी का एलेक्ट्रिसिटी बिल /मीटर अलग है। क्या मुझे इस मकान मे सिर छुपाने के लिए जगह मिल सकती है।

समाधान-

प के तथ्यों से लग रहा है कि मकान पुश्तैनी संपत्ति है जिसे न्यायालय में साबित किया जा सकता है, जिस का हिस्सा आप को पिताजी पहले ही दे चुके हैं। आप अपने पिताजी से कह सकते हैं कि आप ने मुझे इस मकान में अलग हिस्सा दे चुके हैं और सब को शान्ति से रहना चाहिए। आप को जो हिस्सा मिला है उसे बनाए रखने की कार्यवाही आप को करनी है।

यदि फिर भी बात नहीं बनती है तो आप मकान से निष्कासन पर रोक के लिए स्थाई निषेधाज्ञा का दीवानी वाद प्रस्तुत कर दीवानी न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। इस के लिए आप को अपने शहर के किसी अच्छे दीवानी वकील से सलाह कर के कार्यवाही करना चाहिए। पिताजी का लिखा जो कागज आप से खो गया है या चोरी हो गया है उस की फोटो प्रति न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है और उसे द्वितीयक साक्ष्य के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। उस पर गवाहों के रूप में जिन रिश्तेदारों के हस्ताक्षर हैं उन के बयान करवा कर उसे साबित किया जा सकता है।

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संपत्ति पर आप का कब्जा है तो आप को अदालत जाने की जरूरत नहीं।

January 17, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

महेश ने खंडवा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे नानाजी का तीन कमरो का पुराना मकान था। अब उसे तोड़कर मेरी मौसी और माताजी के सहयोग से ये मकान नया बना लिया। मेरे तीनो मामाओ ने जब  मकान बन रहा था तब किसी ने आपत्ति नही ली। मैं उस वक्त पढ़ाई के लिये इंदौर गया था। अब हम उस मकान में चार साल से रह रहे हैं। मेरा बड़ा मामा कह रहा है कि तुम कब्जा करने आ गये हो, तुम्हारा क्या हे यहाँ से निकलो। हमारी मकान की रजिस्ट्री भी नहीं है अब हम क्या कानूनी कार्यवाही करें?

समाधान-

कान तो नाना जी का था जिसे गिराया गया था। फिर आप की माता जी और मौसी के सहयोग से बनाया गया। मामाओं का भी कुछ तो सहयोग रहा होगा। उस मकान में अब कौन कौन रहते हैं यह भी आपने नहीं बताया। जब तक पूरा विवरण न हो पूरा समाधान भी संभव नहीं है। नानाजी अब शायद नहीं हैं। यदि हैं तो मामाजी आप को उस मकान से नहीं निकाल सकते। यदि नहीं हैं तो उस मकान के जितने हिस्से का स्वामी हर मामा है उतने ही हिस्से के मालिक आप की माँ और मौसी हैं। इस कारण यदि उस मकान पर कब्जा है तो वे आप को उस मकान से नहीं निकाल सकते। जैसे बड़े मामान ने कहा है वैसे आप की माँ और मौसी कह सकती हैं कि तुम निकलो मकान हमने बनाया है। जिस के पास संपत्ति का कब्जा है उसे अदालत में जाने की जरूरत नहीं है। जिस के पास संपत्ति का कब्जा नहीं है उसे अदालत जाने दें।

यदि मामाजी कुछ गड़बड़ करें तो मौसी और माताजी अदालत में इस आशय का वाद संस्थित कर सकती हैं कि वे भी मकान में हिस्सेदार हैं और उन्हें मकान से न निकाला जाए। पह हमारी राय है कि अदालत में आप की माँ व मौसी न जाएँ। मामा को अदालत में जाने दें। मौसी व माताजी ने निर्माण में जो खर्च किया उस का हिसाब और सबूत हो तो संभाल कर रखें। मुकदमे में काम आएंगे।

हिस्सेदार अधिक से अधिक मकान के बंटवारे की मांग कर सकते हैं और बंटवारे का वाद संस्थित कर सकते हैं।

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समस्या-

नीरज ने इन्दौर मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे चाचा की पुश्तैनी जमीन है, उनके कोई संतान नहीं थी और उनका देहांत हो गया। उन्होंने अपनी जमीन मेरे नाम से ‍रजिस्ट्री कर दी थी अर्थात रजिस्ट्री में बेचे जाने का उल्लेख किया गया है।‍ मतलब उसको मेरे द्वारा खरीदा गया है जिसे चार साल हो गये हैं।  उस जमीन पर मेरे दूसरे चाचा के लडके ने दावा कर दिया है तो क्या वह जमीन मेरे दूसरे चाचा के लडके भी ले सकते है।

समाधान-

प के चाचा की जमीन पुश्तैनी थी और दूसरे चाचा के लड़के ने उस में हिस्से का दावा किया है। जब कि आप के चाचा अपनी जमीन को अपने जीवन काल में ही आप को विक्रय कर चुके थे।

किसी भी व्यक्ति को पुश्तैनी जमीन में अपने हिस्से को भी बेच देने का अधिकार होता है। चाहे उस जमीन का बँटवारा हो कर वह उस के अलग खाते में आई हो या नहीं आई हो। वह अपने हिस्से की जमीन को बेच कर उस के अधिकार से वंचित हो सकता है। यदि जमीन का बँटवारा हो कर खाता न खुला हो तो अलग खाता खोले जाने के लिए खरीददार बँटवारे का दावा कर सकता है और बँटवारा करवा कर अपना हिस्सा अलग करवा सकता है।

आप के मामले में ऐसा लगता है कि पुश्तैनी जमीन का बंटवारा हो कर वह आप के चाचा के अलग खाते में आ गयी थी। उसे बेचने का उन्हें अधिकार था। उन्हों ने अपने जीवनकाल में ही वह जमीन आप को बेच दी थी। इस प्रकार आप उनके जीवनकाल में ही उक्त जमीन के स्वामी हो चुके थे। आप के दूसरे चाचा के लड़के का दावा सही नहीं है। इस वाद में आप को अच्छा वकील कर के मुस्तैदी से मुकदमा लड़ना चाहिए। आप से उस जमीन को कोई नहीं ले सकेगा।

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पिता की संपत्ति में हिस्सा?

December 15, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

partition of propertyसमस्या-

सुबाला देवी ने रांची, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मैं एक शादीशुदा महिला हूँ। मैं अपने पिताजी के चल-अचल संपति में हिस्सा चाहती हूँ। लेकिन मेरे पिताजी माँ और मेरे भाई हिस्सा नहीं देना चाहते हैं।  इसके लिए मुझे क्या करना होगा? मेरे पास कोई कगजात भी नहीं हैं।

समाधान-

किसी भी पुत्र या पुत्री को अपने पिता या माता की स्वअर्जित सम्पत्ति में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। जब तक वे जीवित हैं यह संपत्ति उन की है और वे अपनी इच्छानुसार इस का उपयोग कर सकते हैं। यदि माता या पिता में से किसी का देहान्त हो जाए और मृतक ने अपनी संपत्ति या उस का भाग वसीयत न किया हो तो ऐसी संपत्ति का स्वामित्व मृत्यु के साथ ही उस के उत्तराधिकारियों में निहीत हो जाता है। सभी उत्तराधिकारी उस संपत्ति के संयुक्त स्वामी हो जाते हैं। ऐसे संयुक्त स्वामियों में से कोई भी संपत्ति के बंटवारे और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा प्राप्त करने का वाद न्यायालय में संस्थित कर सकता है।

यदि आप के पिता के पास कोई पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति है तो उस में जन्म से ही पुत्रों का अधिकार होता है। 2005 से पुत्रियों का अधिकार भी होने लगा है। तब आप उस संपत्ति की संयुक्त स्वामी हो सकती हैं और उस में आप का हिस्सा हो सकता है। आप चाहें तो बँटवारे और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा प्राप्त करने का वाद न्यायालय में संस्थित कर सकती हैं।

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संयुक्त स्वामी तंग करते हैं तो विभाजन का वाद संस्थित करें।

December 14, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राकेश कुमार ने बी-21/ 12 बी, ब्लॉक-बी, ओम नगर, मीठापुर, बदरपुर, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-


र्तमान में मैं जिस मकान में रहता हूँ वह मेरी माँ के नाम है। माँ का देहान्त दिसम्बर 2014 में हो चुका है। मेरे पिता और भाई मुझ से और मेरी पत्नी से रोज लड़ाई करते हैं और कहते हैं कि यहाँ तेरा कोई हक नहीं है तू अपने बीवी बच्चों को ले कर यहाँ से निकल जा। मेरे दो छोटे छोटे बच्चे हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि उस संपत्ति में मेरा कोई अधिकार है या नहीं है। मैं अपने पिता और भाई के विरुद्ध क्या कार्यवाही कर सकता हूँ?


समाधान-

जिस स्थान पर जो निवास करता है अथवा जिस मकान /जमीन पर जिस का कब्जा है वहाँ उसे कब्जा बनाए रखने और निवास करने का अधिकार प्राप्त है। किसी भी व्यक्ति से जिस  संपत्ति पर वह काबिज है उसे जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता। इस तरह आप को भी मकान के उस परिसर से जिस पर आप का कब्जा है और जिस में आऐप रहते हैं जबरन नहीं निकाला जा सकता।

यह मकान माँ के नाम था तो माँ के देहान्त के साथ ही उस का उत्तराधिकार निश्चित हो चुका है। यदि वह मकान किसी के नाम वसीयत था तो उस का स्वामी वह वसीयती हो चुका है। यदि कोई वसीयत नहीं की थी तो माँ के सभी उत्तराधिकारी उस के संयुक्त रूप से स्वामी हो चुके हैं। कोई भी उत्तराधिकारी उस मकान का बँटवारा करवा कर अपने हिस्से का पृथक रूप से कब्जा प्राप्त करने का अधिकारी है। यदि आप के केवल एक भाई है और बहिन नहीं है तो माँ के केवल 3 उत्तराधिकारी आप, आप के पिता और भाई है। इस तरह आप को उस मकान के एक तिहाई हिस्से का स्वामित्व प्राप्त है।

आप चाहें तो तुरन्त उक्त मकान का विभाजन करने और आप के हि्स्से का पृथक कब्जा देने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। इसी वाद में आप यह आवेदन भी दे सकते हैं कि जब तक इस वाद का निर्णय न हो तब तक आप के पिता और भाई आप को उस मकान के उस परिसर से बेदखल न करें और न आप को सामान्य रूप से उस परिसर में रहने में किसी तरह की बाधा उत्पन्न करें। आप को इस वाद के निर्णय तक इस आशय की अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त हो सकती है।

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संपत्ति के बँटवारे का वाद राजस्व न्यायालय में संस्थित करें।

December 11, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

agricultural-landसमस्या-

दिनेश ने भुवाना, उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


मेरे दादा जी की मृत्यु फरवरी 2001 में हो गयी थी। दादा जी ने अगस्त 2000 में सारी संपत्ति मेरे चाचा जी के नाम वसीयत कर दी थी। यह सारी संपत्ति पुश्तैनी है। पटवारी और तहसीलदार ने वसीयत खारिज करते हुए 3 भाई और 4 बहनों के नाम इन्तकाल में चढ़ा दिए हैं। मुझे क्या करना चाहिए?


समाधान-

जो भी संपत्ति पुश्तैनी होती है वह सदैव पुश्तैनी ही रहती है। लेकिन 2001 में प्रचलित हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार जिस व्यक्ति के उत्तराधिकारियों में पुत्रियाँ भी हों पुश्तैनी संपत्ति में उस के हिस्से की संपत्ति का उत्तराधिकार धारा 8 हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार होगा। इस तरह राजस्व रिकार्ड में हुआ नामांतरण सही है। इस भूमि में आप के पिता का हिस्सा तो हैे ही आप का भी हिस्सा जन्म से ही है।

यदि आप चाहते हैं कि इस संपत्ति में आप के अपने हिस्से की संपत्ति पर आप को पृथक कब्जा मिल जाए तो आप उक्त भूमि के बंटवारे का वाद निकट के एसडीओ की अदालत में दाखिल कर सकते हैं।

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rp_property.jpgसमस्या-

अजय कुमार ने फरीदाबद, हरियाणा से भेजी है कि-

मस्या मेरे एक संबंधी की है। व्यक्ति के द्वारा ख़रीदे गए मकान पर उस की आकस्मिक मृत्यु के बाद किस का अधिकार है? व्यक्ति का परिवार इस प्रकार है – पत्नी, एक पुत्र, दो पुत्रियां (एक विवाहित, एक अविवाहित) अभी उस मकान में व्यक्ति का पुत्र रहता है जो अपनी माँ और बहनो को रखने को तैयार नहीं है। पुत्र का पहले का आपराधिक रिकॉर्ड है। ऐसे में बेटियों को और उनकी माँ क्या करना चाहिए?

समाधान-

किसी व्यक्ति द्वारा खरीदा गया मकान उस की स्वअर्जित संपत्ति है। उस के देहान्त के उपरान्त उस का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगा। अर्थात व्यक्ति के देहान्त के उपरान्त से ही उक्त संपत्ति में उस की पत्नी, एक पुत्र व दोनों पुत्रियों में से प्रत्येक को एक चौथाई हिस्सा प्राप्त हो चुका है। सभी चारों उस संपत्ति के संयुक्त रूप से स्वामी हैं। पुत्र उस मकान में निवास करता है इस कारण से उस के पास उस मकान का कब्जा है।

इस मकान पर पुत्र का कब्जा होते हुए भी उसे सभी चारो उत्तराधिकारियों का संयुक्त रूप से कब्जा माना जाएगा। माँ और दोनों पुत्रियाँ इस संपत्ति का विभाजन कराने और अपने अपने हिस्से का पृथक कब्जा  दिलाने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। इसी दीवानी वाद में इस तरह का आवेदन दिया जा सकता है कि उक्त संपत्ति के लिए रिसीवर की नियुक्ति की जाए जो कि उस संपत्ति के लाभों को एकत्र कर के रखे जिसे बाद में न्यायालय के आदेश से वितरित कर दिया जाए। इस आशय का अस्थाई व्यादेश जारी करने का आवेदन भी न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है कि उक्त संपत्ति का कब्जा पुत्र किसी अन्य को हस्तांतरित न करे और न ही किसी तरह संपत्ति और उस के स्वामित्व को हानि पहुँचाए।

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सहदायिक संपत्ति की आय से निर्मित संपत्ति भी सहदायिक है।

December 7, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_Hindu-Succession-199x300.jpgसमस्या-

राहुल ने अजमेर राजस्थान से पूछा है-

मेरे दादा जी के दो लड़के और तीन लड़कियाँ हैं। दादा जी के पास जो जमीन थी उसमें आधी पुस्तैनी थी  और आधी स्वअर्जित थी।|  दादा जी ने दोनों लड़को के बीच मे मार्च 1998 मे आपसी राजीनामे से जमीन का बँटवारा एक सादे कागज पर किया जिसमें दोनों लड़को का हिस्सा रखा और लड़कियों का हिस्सा नहीं रखा।  और इस कागज पर मेरे दादा जी के और उनके दोनों लड़को और दो गवाहों  के हस्ताक्षर हैं| और इस बटवारे के अनुसार जो दादा जी की पुस्तैनी जमीन  थी वो उनके बड़े लड़के को दी और जो स्वअर्जित थी उसको छोटे लड़के को दी। और इस बटवारे के अनुसार ही दोनों भाई कब्ज़ा करके कास्त करने लग गए।  फिर लगभग 3 माह बाद ही मेरे दादा जी को उनके छोटे बेटे ने बातो मे बहकाकर उस स्वअर्जित जमीन की वसीयत करा कर उसको रजिस्टर्ड करवा लिया।  इस बात से उनका बड़ा लड़का (मेरे पिताजी) बिलकुल अनजान था। मेरे दादा जी का देहांत 2012  में होने के बाद इस बात का पता चला। अब मेरे दादा जी के देहांत के पश्चात मेरे पिताजी के हिस्से की जमीन में दूसरे भाई और तीनो बहनो का नाम भी लग गया है।  जबकि मेरे चाचा के हिस्से में वसीयत के अनुसार केवल मेरे चाचा का नाम ही लगा है।  अब मेरा चाचा मेरे पिताजी के हिस्से की जमीन में से भी बँटवारा करना चाहता है।  मेरे पापा के पास केवल सबूत के रूप में वो सादा कागज ही है।  अब मेरे पापा को अपना हिस्सा पाने के लिए क्या करना होगा?  क्या मेरे बुआजी (पिताजी की बहने) उनका हिस्सा मेरे पापा के पक्ष में कर सकती हैं? और अगर ऐसा हो सकता हैं तो  इसमें लगभग कितना खर्च आएगा | कागज के बटवारे के अनुसार मेरे पिताजी के हिस्से में लगभग 22  बीघा जमीन है।  प्लीज  मेरे पिताजी के साथ हो रहे इस अन्याय से बचाने का रास्ता बताइये।

 

समस्या-

मारा उत्तराधिकार का कानून ही न्याय की अवधारणा के विपरीत है। इसी कारण अक्सर लोगों के साथ अन्याय होता है और वे न्याय प्राप्त करने के लिए सारा जीवन अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं। जो पुश्तैनी जमीन है उस में जन्म से ही पुत्रों का अधिकार बन जाता था। जब कि पुत्रियों का भरण पोषण के अतिरिक्त कोई अधिकार नहीं होता था। फिर उस में पुत्रियों को भी उत्तराधिकार प्राप्त होने लगा। 2012 में जब आप के दादा जी का देहान्त हुआ तब पुत्रियों को भी जन्म से ही पुश्तैनी संपत्ति में वही अधिकार प्राप्त हो चुका था जो कि पुत्रों को है। इस कारण से पुश्तैनी संपत्ति में तो दोनों पुत्रों और पुत्रियों को समान अधिकार प्राप्त है। उस के सीधे सीधे पाँच हिस्से होंगे। तीन पुत्रियों के और दो पुत्रों का। 1/5 हिस्सा आप के चाचा का होगा और इतना ही आप के पिता का और आप की बुआओं के। यदि तीनों बुआएँ अपना हिस्सा आप के पिता जी को दे दें तो उन के पास पुश्तैनी जमीन का 4/5 हिस्सा हो सकता है।

सहदायिक संपत्ति की आय से निर्मित संपत्ति भी सहदायिक है। इस कारण स्वअर्जित भूमि पर यह आपत्ति उठायी जा सकती है कि आप के दादा जी के पास पुश्तैनी भूमि की आय के सिवा और कोई आय नहीं थी। स्वअर्जित भूमि उसी पुश्तैनी से हुई आय से खरीदी गयी। यदि कोई संपत्ति पुश्तैनी भूमि की आय से खरीदी जाती है तो वह भी पुश्तैनी ही होती है। इस तरह आप के दादा जी के पास कोई स्वअर्जित भूमि नहीं रह जाती है। आप के पिताजी को इसी तरह का प्रतिवाद अपने पक्ष में खड़ा करना होगा। आप के पिता जी के पास यदि पूरी भूमि का आधा हिस्सा है तो वे इस विवाद के चलते अपने कब्जे की भूमि पर काबिज रह सकते हैं। इस तरह के मुकदमे बहुत लंबे चलते हैं। लड़ने वाले थक जाते हैं और एक ही परिवार के होने के कारण किसी न किसी स्तर पर आपसी समझौता हो जाता है।

हमारी राय है कि आप इस मामले में किसी अच्छे स्थानीय वकील से राय कर के आगे बढ़ें। बहुत कुछ आप के वकील की काबिलियत और मेहनत पर ही आप की लड़ाई का परिणाम निर्भर करेगा।

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agricultural-landसमस्या-

मनोज राठौर ने भीलवाड़ा, राजस्थान से पूछा है-

मेरी नानाजी के 3 पीढ़ी पुरानी कृषि भूमिं है  जिसको मेरे मामा और नानी ने नामांतरण कर अपने नाम कर दिया है मेरे नानाजी की मृत्यु 2004 से पहले हो गयी है मेरी नानीजी अभी जीवित है.क्या मेरी मम्मी अपने पिता की यानि मेरे नानाजी की पुश्तेनी कृषि भूमि पर अपना हक जता सकती है ?

 

समाधान-

मीन  पुश्तैनी हो, या न हो। 2004 से पहले आप के नानाजी के देहान्त के बाद उक्त जमीन का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार ही निर्धारित होगा। 2005 के संशोधन के पूर्व भी कानून यह था कि यदि कोई संपत्ति पुश्तैनी/  सहदायिक हो तब भी यदि किसी व्यक्ति के पुत्री मौजूद है तो धारा -8 से ही उत्तराधिकार निर्धारित होगा। धारा 8 में पत्नी, पुत्र व पुत्री प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी हैं।

आप की माताजी को इस आधार पर नामान्तरण को चुनौती देते हुए नामांतरण आदेश की अपील प्रस्तुत करनी चाहिए।

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