विशिष्ट आलेख Archive

पाठकों से निवेदन –

December 30, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

प्रिय पाठकों,

स वेब साइट को अपडेट करने का दायित्व मैं अकेला वहन करता हूँ।  पिछली 26 दिसम्बर से मैं बाहर हूँ। जहाँ न तो साधन उपलब्ध हैं और न ही समय मिल पा रहा है। इस बीच राजस्थान पत्रिका के शनिवारीय परिशिष्ट मी-नेक्स्ट में तीसरा खंबा का रिव्यू प्रकाशित हुआ है। जिस से अनेक नए पाठक इस से जुड़े हैं। जिस ने तीसरा खंबा को अधिक उत्तरदायित्व सौंप दिये हैं।

लेकिन जब तक मैं स्वयं अपने स्थान पर पुनः नहीं पहुँच जाता हूँ तब तक इसे नियमित रूप  से अपडेट करना संभव नहीं हो पाएगा। जो असुविधा इस से पाठकों को हो रही है उस के लिए मुझे खेद है। अनेक पाठकों से उन की समस्याएँ प्राप्त हुई हैं। लेकिन उन में अधिकांश ऐसी हैं जिन के समान समस्याओं का समाधान पहले से तीसरा खंबा पर दिया जा चुका है। यदि पाठक चाहें तो तीसरा खंबा के किसी पेज पर दायीं तरफ ऊपरी कोने में बने नीले रंग के बाक्स में जा कर अपनी  समस्या की समान समस्या सर्च कर के अपने लिए समाधान तलाश  सकते हैं।

ब 6 जनवरी तक ही तीसरा खंबा को नियमित रूप से  अपडेट कर सकना संभव हो सकेगा। इस बीच संभव हुआ तो कुछ समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया जाएगा।

सभी पाठकों को नववर्ष की शुभकामनाएँ!!!

 

आप का शुभाकांक्षी-

                               दिनेशराय द्विवेदी

                               संचालक, तीसरा खंबा

महाराष्ट्र सरकार शीघ्र अन्धश्रद्धा निर्मूलन कानून बनाए।

August 20, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

 ड़ॉ. नरेन्द्र धाभोलकर की हत्या वैज्ञानिक विचारधारा के प्रयासों को तेज करेगी।

dabholkarअंधविश्वास और काले जादू के ख़िलाफ़ मुहिम चलाने वाले डॉ. नरेन्द्र धाभोलकर पुणे स्थित अपने निवास से सुबह की सैर के लिए निकले थे कि औंकारेश्वर पुल के नजदीक मोटरसाइकिल पर सवार दो हमलावरों ने उनके सिर पर क़रीब से गोलियां दाग कर उन की हत्या कर दी। उन्हें देख कर लोगों ने उन्हें ससून अस्पताल पहुँचाया जहाँ उन की मृत्यु हो गई। पुणे के पुलिस आयुक्त गुलाबराव ने दाभोलकर की मौत की पुष्टि करते हुए बताया कि पुलिस हत्या के कारणों की जांच की जा रही है लेकिन अभी तक किसी हमलावर की पहचान नहीं हुई है।

देश और दुनिया भर के अंधश्रद्धा विरोधी और वैज्ञानिक विचार के समर्थक लोगों और उन के आन्दोलन को इस घटना से गहरा दुख पहुँचा है। अनेक राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने धाभोलकर की हत्या की कड़ी निंदा करते हुए उन्हें प्रगतिवादी सोच के लिए समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता बताया है। डॉ. धाभोलकर प्रगतिवादी सोच के लिए महाराष्ट्र में  विशेष रूप से काम कर रहे थे।

हाराष्ट्र के मुख्यमंत्री  पृथ्वीराज चव्हाण ने डॉ. धाभोलकर की हत्या की निंदा करते हुए उनके हत्यारों का सुराग बताने वाले को दस लाख रुपए इनाम की घोषणा की है। राज्य के गृह मंत्री आरआर पाटिल ने डॉ. धाभोलकर की हत्या पर क्षोभ और दुख व्यक्त करते हुए कहा कि पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को इस मामले की तह में जाने का निर्देश दिया है। पुलिस ने बताया कि 69 साल के डॉ. धाभोलकर को कुल चार गोलियां मारी गई थीं जिनमें दो उनके सिर पर लगी थीं।

माज में व्याप्त अंधविश्वासों को खत्म करने और वैज्ञानिक चेतना जगाने के लिए चलाए जा रहे अभियान अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की अगुवाई कर रहे थे। साथ ही वे प्रगतिवादी विचारधारा की पत्रिका ‘साधना’ के संपादक भी थे। महाराष्टर के सतारा ज़िले के रहने वाले डॉ. धाभोलकर सामाजिक कुप्रथाओं और अंधविश्वास के ख़िलाफ क़ानून लाने के लिए महाराष्ट्र विधानसभा में एक विधेयक लाने का प्रयास कर रहे थे लेकिन कुछ लोग उनकी इस मुहिम के ख़िलाफ थे। इस विधेयक में जिन कृत्यों को अपराध घोषित किए जाने का प्रस्ताव था वे निम्न प्रकार हैं …

  1. भूत उतारने के बहाने किसी व्यक्ति को, रस्सी या ज़ंजीर से बांधकर रखना, पीटना, लाठी या चाबुक से मारना, पादत्राण भिगाकर उसका पानी पिलाना, मिरची का धुआं देना, छत से लटकाना, रस्सी या बालों से बांधना, उस व्यक्ति के बाल उखाडना, व्यक्ति के शरीर पर या अवयवों पर गरम की वस्तु के दाग देकर हानि पहुँचाना, सार्वजनिक स्थान पर लैंगिक कृत्य करने की जबरदस्ती करना, व्यक्ति पर अघोरी कृत्य करना, मुँह में जबरदस्ती मूत्र या विष्ठा डालना या ऐसी कोई कृति करना।
  2. किसी व्यक्ति को तथाकथित चमत्कार कर उससे आर्थिक प्राप्ति करना और इसी प्रकार ऐसे तथाकथित चमत्कारों का प्रचार और प्रसार कर लोगों को फंसाना, ठगना अथवा उन पर दहशत निर्माण करना।
  3. अतिन्द्रीय शक्ति की कृपा प्राप्त करने के लिए ऐसी अघोरी प्रथाओं का अवलंब करना जिन से जान का खतरा होता हो या शरीर को प्राणघातक जख्म होते हों; और ऐसी प्रथाओं का अवलंब करने के लिए औरों को प्रवृत्त करना, उत्तेजितकरना या उन के साथ जबरदस्ती करना।
  4. मूल्यवान वस्तु, गुप्त धन, जलस्रोत खोजने के बहाने या तत्सम कारणों से करनी, भानामति इत्यादि नामों से कोई भी अमानुष कृत्य करना या ऐसे अमानुष कृत्य करने और जारणमारण अथवा पर नरबलि देना या देने का प्रयास करना, या ऐसे अमानुष कृत्य करने की सलाह देना, उसके लिए प्रवृत्त करना, अथवा प्रोत्साहन देना।
  5. अपने भीतर अतींद्रिय शक्ति है ऐसा आभास निर्माण कर अथवा अतींद्रिय शक्ति संचरित होने का आभास निर्माण कर औरों के मन में भय निर्माण करना या उस व्यक्ति का कहना न मानने पर बुरे परिणाम होने की धमकी देना।
  6. कोई विशिष्ट व्यक्ति करनी करता है, काली विद्या करता है, भूत लगाता है, मंत्र-तंत्र से जानवरों की दूध देने की क्षमता समाप्त करता है, ऐसा बताकर उस व्यक्ति के बारे में संदेह निर्माण करना, इसी प्रकार कोई व्यक्ति अपशकुनी है, रोग फैलने का कारण इत्यादि बताकर या आभास निर्माण कर संबंधित व्यक्ति का जीना मुश्किल करना, कष्टमय करना या कठिन करना, कोई व्यक्ति शैतान या शैतान का अवतार है, ऐसा घोषित करना।
  7. जारणमारण, करनी या टोटका करने का आरोप लगा कर किसी व्यक्ति के साथ मारपीट करना, उसे नग्नावस्था में घुमाना या उसके रोज के व्यवहार पर पाबंदी लगाना।
  8. मंत्र की सहायता से भूत-पिशाचों का आव्हान कर या आव्हान करने की धमकी देकर लोगों के मन में घबराहट निर्माण करना, मंत्र-तंत्र अथावा तत्सम बातें बनाकर किसी व्यक्ति को विष-बाधा से मुक्त करने का आभास निर्माण करना, शारीरिक हानि (क्षति) होने के लिए भूत या अमानवी शक्ति का कोप होने का आभास करा देना, लोगों को वैद्यकीय उपचार लेने से रोककर, उसके बदले उन्हें अघोरी कृत्य या उपाय करने के लिए प्रवृत्त करना अथवा मंत्र-तंत्र (टोटका) जादूटोना अथवा अघोरी उपाय करने का आभास निर्माण कर लोगों को मृत्यु का भय दिखाना, पीडा देना या आर्थिक अथवा मानसिक हानि पहुँचाना।
  9. कुत्ता, साँप, बिच्छु आदि के काटे व्यक्ति को वैद्यकीय उपचार लेने से रोककर या प्रतिबंध कर, उसके बदले, मंत्र-तंत्र, गंडा-धागा आदि अन्य उपचार करना।
  10. उंगली से शस्त्रक्रिया कर दिखाता हूँ ऐसा दावा करना या गर्भवती स्त्री के गर्भ का लिंग बदल कर दिखाता हूँ ऐसा दावा करना।
  11. (क) स्वयं में विशेष शक्ति होने या किसी का अवतार होने या स्वयं पवित्र आत्मा होने का आभास निर्माण कर या उसके बातों में आई व्यक्ति को पूर्वजन्म में तू मेरी पत्नी, पति या प्रेयसी, प्रियकर था ऐसा बताकर, उस व्यक्ति के साथ लैंगिक संबंध रखना।
    (ख) संतान न होनेवाली स्त्री को अतींद्रिय शक्ति द्वारा संतान होने का आश्वारसन देकर उसके साथ लैंगिक संबंध रखना।
  12. मंद बुद्धि के (mentally retarded) व्यक्ति में अतींद्रिय शक्ति है ऐसा अन्य लोगों के मन में आभास निर्माण कर उस व्यक्ति का धंधे या व्यवसाय के लिए प्रयोग करना।

डॉ. धाभोलकर की इस हत्या से वैज्ञानिक विचारधारा के सभी समर्थक अत्यन्त हतप्रभ हैं। लेकिन यह वैज्ञानिक विचारधारा के समर्थन में अभियान चलाने वालों के जीवन समाप्त कर देने के प्रयासों का पहला अवसर नहीं है। इतिहास में ऐसा होता आया है। लेकिन इस के बावजूद मनुष्य का अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने का प्रयास कभी रुका नहीं, वह और बलवान हो कर आगे बढ़ता रहा। अब भी इस घटना से यह अभियान रुकने वाला नहीं है वह और मजबूत हो कर आगे बढ़ेगा। हम इस अभियान को निरंतर आगे बढ़ाएंगे। एक दिन अवश्य होगा जब दुनिया अंधश्रद्धा से निर्मूल होगी।

“तीसरा खंबा” और “अनवरत” डॉ. धाभोलकर की इस हत्या कि कड़ी निन्दा करते हैं। उन्हें उन के अथक प्रयासों के लिए सलाम करते हैं। हम आव्हान करते हैं कि वैज्ञानिक विचार के पक्षधर लोग एकजुट हों और अपने अपने क्षेत्र में इस अभियान को सक्रिय हो कर गति प्रदान करें।

Service of summonsप्रिय पाठको¡

तीसरा खंबा बहुत समय से पाठकों की कानूनी समस्याओं के समाधान और उपाय बताने का कार्य कर रहा है। लेकिन तीसरा खंबा को अनेक प्रश्न ऐसे प्राप्त होते हैं जिन में अत्यन्त सामान्य जानकारी चाही गई होती है। ऐसी सामान्य जानकारियाँ बहुत थोड़े से प्रयत्न से इंटरनेट का उपयोग करने वाले खुद प्राप्त कर सकते हैं या फिर अपने आसपास पूछ कर भी काम चला सकते हैं।

तीसरा खंबा के एक पाठक श्री विनोद कुमावत हैं जो राजस्थान के गुढ़ा गौरजी ग्राम के निवासी हैं। इन की कृषि भूमि संयुक्त थी जिस के कारण आपस में झगड़े होते रहते थे। मेरे सुझाव पर इन्हों ने विभाजन का वाद प्रस्तुत किया जो डिक्री हो गया। इन्हें इन की विभाजित भूमि नाप सहित प्राप्त हो गई। इस बीच हर माह कम से कम दो सामान्य प्रश्न ये तीसरा खंबा से पूछते रहे। तीसरा खंबा ने कुछ का उत्तर दिया और कुछ का नहीं दिया। अभी भी इन्हों ने एक प्रश्न मुझ से पूछा है कि कृषि भूमि का नामान्तरण  होने के कितने समय बाद नामान्तरण इंटरनेट पर दर्ज होता है? अब यह प्रश्न केवल अपना खाता की कार्यपद्धति से संबंधित है। इस का कोई कानूनी महत्व नहीं है। यह तो अपना खाता संचालित करने वाले बता सकते हैं या फिर इन की तहसील के पटवारी या तहसीदार का स्टाफ अधिक अच्छी तरह बता सकता है। तीसरा खंबा से कानूनी सुविधा प्राप्त कर के उस से लाभान्वित होने वाला व्यक्ति जब इस तरह के प्रश्न पूछता है तो लगता है कि यह इस सुविधा का दुरुपयोग कर रहा है। हम इस तरह के प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं देते। कृपया पाठक इस तरह के प्रश्न तीसरा खंबा को प्रेषित न करें।

जोधपुर राजस्थान से श्री अशोक माली ने पूछा है कि मेरे दादा जी 2001 में चल बसे लेकिन बेटियों ने संपत्ति के विभाजन के लिए वाद किया है संपत्ति पैतृक है, क्या करना चाहिए?

भाई बेटियों को भी पैतृक संपत्ति में अधिकार प्राप्त है, वे उन के अधिकार के लिए मुकदमा तो करेंगी। वे अपना अधिकार भी प्राप्त करेंगी। आप अदालत में जाइए और कानून के अनुसार बँटवारा करने में सहयोग करिए। आप को अपना हिस्सा मिल जाएगा। इन की जिज्ञासा में कोई कानूनी प्रश्न या समस्या नहीं थी। लेकिन इन्हों ने इस प्रश्न को भी यहाँ डाल दिया।

क और पाठक श्री अरविंद भोपाल मध्यप्रदेश के हैं ये पूछते हैं कि आपसी सहमति से तलाक हो गया है। फिर भी पत्नी कोई मुकदमा कर सकती है क्या?

ब इन्हें क्या जवाब दिया जाए। इन का पत्नी से तलाक हुआ है, पति-पत्नी का संबंध समाप्त हो चुका है। जिस दिन से यह संबंध समाप्त हुआ है उस दिन से पति-पत्नी के रूप में दोनों के एक दूसरे के प्रति अधिकार और दायित्व समाप्त हो चुके हैं। लेकिन उस तिथि के पूर्व जो दायित्व और अधिकार थे वे तो समाप्त नहीं हुए हैं। उन से संबंधित कोई भी मुकदमा पति या पत्नी दोनों ही कर सकते हैं। फिर न्यायालय में कोई भी आवेदन या वाद प्रस्तुत करने पर तो कोई पाबंदी नहीं है। यदि वह आवेदन या वाद निराधार होगा तो निरस्त हो जाएगा। इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है कि फलाँ व्यक्ति मुकदमा तो न कर देगा?

मारा पाठकों से इतना निवेदन है कि तीसरा खंबा न तो कोई संस्था है और न ही कई व्यक्तियों का संयुक्त प्रयास। यह मात्र एक वकील और एक तकनीकीकर्मी कुल दो मित्रों का निजि प्रयास है। तीसरा खंबा का प्रयास है कि प्रतिदिन कम से कम एक प्रश्न का उत्तर अवश्य दिया जाए।

स कारण हम बहुत से प्रश्नों का उत्तर नहीं देते। हमारा प्रयास रहता है कि रोज जो उत्तर दिया जाता है वह ऐसा हो जिस से प्रश्नकर्ता ही नहीं अन्य पाठक भी लाभान्वित हों। पाठकों से भी हम अपेक्षा करते हैं कि वे ऐसे ही प्रश्न हम से पूछें जिस में कोई कानूनी समस्या हो और उस का उपाय पूछा गया हो।IMG_27

शा है पाठकों का सहयोग तीसरा खंबा को प्राप्त होता रहेगा।

-दिनेशराय द्विवेदी   

जनहित याचिकाएँ क्या हैं?

May 9, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

Supreme Court Indiaगाजियाबाद, उत्तर प्रदेश से अनुज त्यागी ने तीसरा खंबा से पूछा है कि वे एक जनहित याचिका प्रस्तुत करना चाहते हैं। इस के लिए उन्हों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री कार्यालय और मानवाधिकार आयोग को लिखा भी है। लेकिन कहीं से भी उचित उत्तर प्राप्त नहीं हुआ। यहाँ तक कि मेरी प्रार्थना खारिज या मंजूर करने की सूचना भी नहीं  मिली। मैं जनहित याचिका प्रस्तुत करने की सही प्रक्रिया जानना चाहता हूँ जिस से में अपनी प्रार्थना न्यायालय तक पहुँचा सकूँ। त्यागी जी को जनहित याचिका प्रस्तुत करने की प्रक्रिया बताई जाए उस से पहले यह आवश्यक है कि वे जनहित याचिका क्या है यह जान लें। यहाँ इस आलेख में जनहित याचिका के बारे में सामान्य जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।

सार्वजनिक हित की रक्षा के लिए किया गया कोई भी मुकदमा जनहित याचिका है। यह अन्य सामान्य अदालती मुकदमों से भिन्न है और इस में यह आवश्यक नहीं की पीड़ित पक्ष स्वयं अदालत में जाए।  यह किसी भी नागरिक द्वारा पीडितों के पक्ष में किया गया मुकदमा है। स्वयं न्यायालय भी किसी सूचना पर प्रसंज्ञान ले कर इसे आरंभ कर सकता है। इस तरह के अब तक के मामलों ने कारागार और बन्दी, सशस्त्र सेना, बालश्रम, बंधुआ मजदूरी, शहरी विकास, पर्यावरण और संसाधन, ग्राहक मामले, शिक्षा, राजनीति और चुनाव, लोकनीति और जवाबदेही, मानवाधिकार और स्वयं न्यायपालिका के व्यापक क्षेत्रों को प्रभावित किया है। न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका का विस्तार बहुत हद तक समांतर रूप से हुआ है और जनहित याचिका का मध्यम-वर्ग ने सामान्यत: स्वागत और समर्थन किया है। जनहित याचिका भारतीय संविधान या किसी कानून में परिभाषित नहीं है, यह उच्चतम न्यायालय की संवैधानिक व्याख्या से व्युत्पन्न है।

जनहित याचिका का पहला प्रमुख मुकदमा 1979 में हुसैनआरा खातून और बिहार राय केस में कारागार और विचाराधीन कैदियों की अमानवीय परिस्थितियों से संबद्ध था। यह मामला एक वकील ने राष्ट्रीय दैनिक में बिहार के जेलों में बन्द हजारों विचाराधीन कैदियों के अमानवीय  हाल पर छपी खबर के आधार पर दायर किया गया था। मुकदमे के नतीजे में 40000 से भी अधिक कैदियों को रिहा किया गया। त्वरित न्याय को एक मौलिक अधिकार माना गया, जो उन कैदियों को नहीं दिया जा रहा था। इस सिद्धान्त को बाद के मामलों में भी स्वीकार किया गया।

2001 में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल), राजस्थान ने भोजन के अधिकार को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित चायिका दायर की। यह याचिका उस समय दायर की गई, जब एक ओर देश के सरकारी गोदामों में अनाज का भरपूर भंडार था, वहीं दूसरी ओर देश के विभिन्न हिस्सों में सूखे की स्थिति एवं भूख से मौत के मामले सामने आ रहे थे। इस केस को भोजन के अधिकार केस के नाम से जाना जाता है। भोजन के अधिकार को न्यायिक अधिकार बनाने के लिए देश की विभिन्न संस्थाएं, संगठन और ट्रेड यूनियनों ने संघर्ष किया है।  यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित व्यक्ति के जीने के अधिकार के आधार पर प्रस्तुत की गई थी।

एम सी मेहता और भारतीय संघ और अन्य (1985-2001) के मामले में न्यायालय ने आदेश दिया कि दिल्ली मास्टर प्लान के तहत और दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए  रिहायशी इलाकों से करीब एक लाख औद्योगिक इकाईयों को बाहर स्थानांतरित किया जाए। इस निर्णय ने वर्ष 1999 के अंत में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में औद्योगिक अशांति और सामाजिक अस्थिरता को जन्म दिया था, और इसकी आलोचना भी हुई थी कि न्यायालय द्वारा आम मजदूरों के हितों की अनदेखी पर्यावरण के लिए की जा रही है। इस मामले से करीब 20 लाख लोग प्रभावित हुए थे। एक अन्य जनहित मामले में उच्चतम न्यायालय ने अक्टूबर 2001 में आदेश दिया था कि दिल्ली की सभी सार्वजनिक बसों को चरणबद्ध तरीके से सिर्फ सीएनजी  ईंधन से चलाया जाए। यह माना गया कि सीएनजी डीजल की अपेक्षा कम प्रदूषणकारी है।

पिछले कुछ वर्षों में उच्चतम न्यायालय में भारत का नाम बदलकर हिंदुस्तान करने, अरब सागर का नाम परिवर्तित कर सिंधु सागर रखने और यहां तक कि राष्ट्रगान को बदलने तक के लिए जनहित याचिकाएं दाखिल की जा चुकी हैं। अदालत इन्हें ‘हस्तक्षेप करने वालों’ की संज्ञा दे चुकी है और कई बार इन याचिकाओं को खारिज करने का डर भी दिखाया जा चुका है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें यूपी की सीएम मायावती को नोटों की माला पहनाए जाने के मामले की सीबीआई से जांच कराए जाने की मांग की गई थी। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने राय के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और उनकी पत्नी के खिलाफ दायर की गई उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसके तहत लोकायुक्त को इनके खिलाफ कथित डंपर (ट्रक) घोटाले की जांच में तेजी लाने का निर्देश देने की मांग की गई थी। मप्र हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में पूर्व चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन, जस्टिस दीपक वर्मा और जस्टिस बीएस चौहान के खिलाफ जनहित याचिका दाखिल की गई। याचिका में सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी पर आपत्ति जताई गई है जिसमें लिव इन रिलेशन के मामले में राधा-कृष्ण का जिक्र किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने निर्वासित जीवन बिता रहे मशहूर पेंटर एम. एफ. हुसैन को अदालत या देश का प्रधानमंत्री भी भारत लौटने पर मजबूर नहीं कर सकता। यह कहते हुए अदालत ने हुसैन के खिलाफ देश में चल रहे आपराधिक मामलों को रद्द करने संबंधी जनहित याचिका भी खारिज कर दी।  इंदौर की एमजी रोड स्थित एक लाख वर्गफुट की आवासीय जमीन को मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह व अन्य उच्च अधिकारियों द्वारा कामर्शियल उपयोग के लिए करोड़ों में बेचे जाने का आरोप लगाने वाली याचिका को भी हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।

PILन्याय पाने के लिए जनहित याचिकाओं और सूचना के अधिकार के तहत कानूनी प्रक्रिया में आई तेजी की तुलना संचार में मोबाइल टेलीफोन और इंटरनेट के विस्तार से की जा सकती है। लेकिन अब ये भय भी सताने लगा कि ये याचिकाएँ महज वक्त की बरबादी करने का साधन भर न बन जाएँ। देश की सर्वोच्च अदालत दशक भर से कई मामलों में इस तरह की याचिकाओं की कड़ी आलोचना भी कर चुकी है। अदालत इन्हें ‘हस्तक्षेप करने वालों’ की संज्ञा दे चुकी है और कई बार इन याचिकाओं को खारिज करने का डर भी दिखाया जा चुका है।

अदालत ने जब न्यायिक क्षेत्र के दायरे की समीक्षा की, तब पाया कि गरीबी, अनदेखी, भेदभाव और निरक्षरता की वजह से समाज के एक बड़े तबके की न्याय तक पहुंच ही नहीं है। तब अदालत ने कहा था, ‘गरीब, वंचित, कमजोर और भेदभाव के शिकार लोगों को न्याय दिलाने के लिए यह अदालत जनहित याचिका की शुरुआत करती है और इसे और मजबूत बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है।’ लेकिन जब निरर्थक याचिकाएँ भी प्रस्तुत होने लगीं तो सर्वोच्च न्यायालय को कुछ नियम भी तय करने पड़े। जैसे अदालतें वास्तविक जनहित याचिकाओं को पूरी गंभीरता दें और उतनी ही गंभीरता से गलत मकसद से दायर की गई याचिकाओं को नकारें। जनहित याचिका पर सुनवाई से पहले याचिका दाखिल करने वाले व्यक्ति की भी अच्छी तरह से जांच परख करनी चाहिए। अदालत को पहले ही याचिका की विषयवस्तु और उससे जुड़े जनहित की समीक्षा करनी चाहिए।

अदालतें यह भी करें कि अमुक जनहित याचिका का सरोकार किसी दूसरी जनहित याचिका से ज्यादा है, ऐसे में अधिक सरोकार वाली याचिका को वरीयता मिलनी चाहिए। अदालत को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी जनहित याचिका से जनता में असंतोष के स्वर न उभरें। इसके साथ ही अदालतों को यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कोई जनहित याचिका किसी के व्यक्तिगत फायदे से तो नहीं जुड़ी है। यह भी कि अदालतों को बेवजह की याचिकाओं को नहीं सुनना चाहिए। इसके लिए उन पर आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है।

अब त्यागी जी को समझ आ गया होगा कि जनहित याचिका क्या है? प्रक्रिया के बारे में हम उन्हें यह बता सकते हैं कि उन के पत्रों का उत्तर देने के लिए कोई भी न्यायालय, प्रधानमंत्री कार्यालय या अन्य कोई कार्यालय बाध्य नहीं है। यदि न्यायालय को लगता कि उन का पत्र महत्वपूर्ण है तो वह मामले पर प्रसंज्ञान ले लेता। फिर भी उन्हें लगता है कि जो मामला वे उठाना चाहते हैं वह महत्वपूर्ण और संवेदनशील है तो वे स्वयं उच्चतम न्यायालय अथवा किसी उच्च न्यायालय के समक्ष अपना मामला उठा सकते हैं। इस के लिए उन्हें वही सब कुछ करना होगा जो एक सामान्य रिट याचिका प्रस्तुत करने के लिए किसी को करना पड़ता है। इस मामले में वे किसी वकील से व्यक्तिगत रूप से मिलें। इस काम में समय और धन दोनों खर्च होंगे। समय तो उन्हें खुद ही देना पड़ेगा धन के लिए वे कुछ अन्य लोगों या संस्था को इस काम में जोड़ सकते हैं या फिर वे स्वयं खर्च कर सकते हैं।  जनहित याचिकाओं पर कुछ अच्छी किताबें उपलब्ध हैं। किसी को भी जनहित याचिका प्रस्तुत करने के पहले इन में कोई एक किताब चुन कर अवश्य पढ़ लेनी चाहिए।

कापीराइट – कृतिकारों की संपत्ति

April 23, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

copyright3दो बरस पहले विश्व पुस्तक एवं कापीराइट दिवस मनाने के सप्ताह भर बाद ही बंगलूरू पुलिस ने भारत के प्रसिद्ध इंटरनेट सर्चइंजन गुरुजी डाट कॉम के दफ्तर पर छापा मारा और उन के बहुत सारे कंप्यूटर जब्त कर लिए।  कंपनी के फाउंडर और सीईओ अनुराग डोड और कुछ अन्य अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया।  पुलिस ने यह कार्रवाई टी-सिरीज ब्रांड के संगीत उत्पादों की निर्माता कंपनी द्वारा कराई गई एफआईआर पर की थी जिस में टी-सिरीज ब्रांड के  संगीत उत्पादों के कापीराइट का उल्लंघन करने का आरोप लगाया था।  गुरूजी डाट कॉम अपने सर्च इंजिन के लिए प्रसिद्ध हुआ था। लेकिन कुछ समय से उन्हों ने संगीत के लिए सर्च इंजन बनाया था जो किसी भी संगीत रचना को तुरन्त तलाश कर सकता था। इतना ही नहीं वह वैसे लिंक भी उपलब्ध कराता था जिस पर जा कर कोई भी व्यक्ति तुरंत उस संगीत रचना को सुनने के साथ ही उसे डाउनलोड कर के अपने कंप्यूटर पर सेव कर सकता था और जब चाहे उस का उपयोग कर सकता था। निश्चित रूप से गुरूजी डाट कॉम की इस सेवा से सभी संगीत उत्पादों की बिक्री पर बुरा असर पड़ा था।  लेकिन यह तो सर्च इंजन की विशिष्टता थी। उस सर्च इंजन ने किसी भी संगीत उत्पाद या उस के अंश को न तो प्रस्तुत किया था और न ही किसी तरह का उपयोग किया था। इस कारण आईटी इंडस्ट्री में इस गिरफ्तारी से सनसनी फैल गई। यह अपनी तरह का पहला और विचित्र मामला था जिस में गुरूजी डाट कॉम ने एक एफिशियंट सर्च इंजन बनाया था तथा शिकायतकर्ता कंपनी के किसी भी उत्पाद का कोई उपयोग नहीं किया था। उन का सर्च एंजिन केवल उन लिंकों का रास्ता बताता था जहाँ से शिकायतकर्ता कंपनी के उत्पादों को बिना कोई मूल्य दिए हासिल किया जा सकता था। इस मामले से यह सवाल खड़ा हो गया था कि क्या इस तरह के स्वतंत्र कार्य को भी कापीराइट एक्ट का ऐसा गंभीर अपराध माना जा सकता है जिस में पुलिस अपने विवेक से प्रसंज्ञान ले कर कंपनी की संपत्ति को जब्त कर ले तथा उस के उच्चाधिकारियों को गिरफ्तार कर ले? इस मामले में गिरफ्तारी तक कहीं भी अदालत और कानून विशेषज्ञों की कोई भूमिका नहीं थी लेकिन अभियुक्तों को अदालत के समक्ष प्रस्तुत करते ही वह आरंभ हो जाने वाली थी। इस मामले में अभी न्यायालय का निर्णय आना शेष है जो अत्यन्त महत्वपूर्ण होगा और जो कापीराइट एक्ट से जुड़े अपकृत्यों, अपराधों के विस्तार और सीमाओं को स्पष्ट करेगा।

हाल ही में यूरोप के तीन प्रमुख पुस्तक प्रकाशकों ने दिल्ली विश्वविद्यालय पर मुकदमा किया है जिस में विश्वविद्यालय लायसेंस प्राप्त व्यक्ति द्वारा उन की छात्रोपयोगी पुस्तकों की फोटोकापी करने को कापीराइट का उल्लंघन बताया है।  इन प्रकाशकों की आपत्ति को मान लिया जाए जाए तो छात्र उन महंगी पुस्तकों का उपयोग करने से वंचित हो जाएंगे। इस आपत्ति को प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन सहित अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने इस आधार पर खारिज कर दिया है कि इस का शैक्षणिक गतिविधियों पर बुरा प्रभाव होगा। लेकिन कुछ लोगों ने उस का उपाय भी सुझाया है कि यदि फोटोकापियाँ प्रकाशकों से लायसेंस प्राप्त कर के की जाएँ तो एक-डेढ़ रुपया प्रति पृष्ट की दर पर छात्रों को उपलब्ध हो सकती हैं और प्रकाशकों को भी उस का लाभ मिल सकता है।

न दो घटनाओं ने सिद्ध कर दिया कि कापीराइट आम लोगों को प्रभावित करने लगा है और ‘सब चलता है’ कहते हुए कापीराइट का उल्लंघन किया जाना भारी पड़ सकता है। अब आम लोगों को यह जानना जरूरी हो गया है कि कापीराइट क्या है? जिस से वे अपनी अज्ञानता और  लापरवाही से यह अपराध करने से बचें।

कापीराइट – एक कानूनी अधिकार

कापीराइट का अधिकार नैसर्गिक या दीवानी अधिकार नहीं  है। यह कानून द्वारा प्रदत्त और नियंत्रित है जिस की उत्पत्ति प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार और पुस्तकों की अनियंत्रित प्रतिलिपियाँ बनाए जाने से जुड़ी है।  इंग्लेंड के चार्ल्स द्वितीय इस स्थिति से चिंतित हुए और तब 1662 में ब्रिटिश संसद ने ‘लायसेंसिग ऑफ प्रेस एक्ट’ पारित किया।  प्रिंटिंग प्रेस और मशीनों के विकास और प्रसार ने धीरे धीरे इस अधिकार की जरूरत को दुनिया भर में पहुँचा दिया और एक के बाद दूसरे देश में इस तरह के कानून बनने लगे।  ये कानून कृतिकारों और व्यवसायियों को केवल अपने ही देश में संरक्षण प्रदान कर सके। किसी भी कृति की दूसरे देश में कितनी ही प्रतियाँ बनाई और वितरित की जा सकती थीं।  इस पर रोक लगाने के लिए देशों के बीच सन्धियाँ होने लगीं जिन्हें कानून में स्थान दिया जाने लगा। आज लगभग सभी देश कापीराइट पर हुई सन्धियों में से किसी न किसी एक में पक्षकार हैं जिस से इस अधिकार को लगभघ पूरे विश्व में स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है।  भारत में कापीराइट का आरंभ  “भारतीय कापीराइट एक्ट-1914” से हुआ जो उस समय इंग्लेण्ड में प्रचलित अंग्रेजी कानून “कापीराइट एक्ट 1911(य़ू.के)” में मामूली हेर-फेर के साथ बनाया गया था। स्वतंत्रता के बाद भारत को  “कापीराइट” पर एक सम्पूर्ण स्वतंत्र कानून की जरूरत महसूस होने लगी। प्रसारण और लिथो फोटोग्राफी जैसे नए, आधुनिक संचार माध्यमों और भारत सरकार द्वारा स्वीकृत अन्तर्राष्ट्रीय दायित्वों के निर्वाह के लिए संसद ने “कापीराइट एक्ट, 1957” पारित किया जो समय समय पर बदलती हुई परिस्थितियों के कारण संशोधित किया जाता रहा।

कापीराइट – एक संपत्ति

copyright2ब भी व्यक्ति अपने मस्तिष्क में उत्पन्न विचार को किसी भी रूप में अभिव्यक्त करता है तो वह किसी न किसी कृति का सृजन करता है और स्वयं कृतिकार हो जाता है।  इस सद्यजात कृति या उस के किसी महत्वपूर्ण अंश का किसी भी रूप में उपयोग करने का अधिकार ही कापीराइट है। भारत में कापीराइट का स्वामित्व मूलतः कृतिकार का होता है लेकिन कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के नियोजन में रहते हुए अथवा किसी कान्ट्रेक्ट के अंतर्गत नियोजन या कांट्रेक्ट की शर्तों के अंतर्गत काम करते हुए किसी कृति को जन्म दे तो उस कृति में प्रथम अधिकार उस के नियोजक या उस व्यक्ति का होता है जिस के लिए वह कांट्रेक्ट पर काम करता है।  किसी भी कृति में कापीराइट का स्वामित्व उस कृति के कृतिकार की मृत्यु के अगले केलेंडर वर्ष के आरंभ से 60 वर्ष तक का रहता है। लेकिन फोटोग्राफ, सिनेमा फिल्म, साउंड रेकार्डिंग, कंप्यूटर प्रोग्रामों, वास्तु कलात्मक कृतियों, सरकारी कार्यों और अन्तराष्ट्रीय कार्यों में कृति के प्रकाशन से 60 वर्ष तक निहित रहता है। यह अवधि समाप्त हो जाने पर कृति पर कापीराइट का अधिकार समाप्त हो जाता है और कृति पब्लिक डोमेन में चली जाती है।  तब उस कृति का कोई भी व्यक्ति उपयोग कर सकता है। कापीराइट का यह अधिकार कोई भी कृतिकार स्वेच्छा से त्यागना चाहता है तो कापीराइट रजिस्ट्रार को नोटिस दे कर त्याग सकता है। कापीराइट रजिस्ट्रार इस की अधिसूचना गजट में जारी कर देता है। कापीराइट एक स्वअर्जित संपत्ति की तरह है जिसे उस का स्वामी हस्तांतरित कर सकता है, उस के उपयोग के लिए लायसेंस दे सकता है, उस की वसीयत कर सकता है और यदि वसीयत नहीं करता है तो उस के जीवनकाल के बाद यह अधिकार कापीराइट के स्वामी पर प्रभावी पर्सनल लॉ के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाता है।

कापीराइट – कब नहीं रहता

कापीराइट में किसी भी कृति को किसी भी तात्विक रुप में पुनः प्रस्तुत करना या  इलेक्ट्रॉनिक विधि से किसी माध्यम में संग्रहीत करना शामिल है। इस के अतिरिक्त किसी कृति की प्रतियाँ जनता में वितरित करना, उस का सार्वजनिक प्रदर्शन या उसे जनता में संप्रेषित करना, उस के संबंध में सिनेमा फिल्म बनाना, उस का सार्वजनिक प्रदर्शन करना, साउंड रिकार्डिंग करना, अनुवाद करना, रूपान्तरण या अनुकूलन करना और किसी कृति के अनुवाद या रुपान्तरण (अनुकूलन) तथा किसी कंप्यूटर प्रोग्राम के सम्बन्ध में उक्त सभी काम करना शामिल है।  एक अनुवाद को भी स्वतंत्र मौलिक कृति माना गया है यदि वह मूल कृति के स्वामी की स्वीकृति से किया गया हो।  लेकिन किसी सिनेमा फिल्म के महत्वपूर्ण अंश में तथा किसी साहित्यिक, नाटकीय या संगीतीय कृति के संबंध में निर्मित साउंड रिकार्डिंग में किसी अन्य कृति के कापीराइट का उलंघन किया गया हो तो इस प्रकार निर्मित किसी भी कृति में कापीराइट स्थित नहीं रहता।

कापीराइट – पंजीकरण जरूरी नहीं

कापीराइट किसी भी कृति के तैयार हो जाने पर या प्रथम प्रकाशन के साथ ही उस में उत्पन्न हो जाता है। इस के रजिस्ट्रेशन की कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन इस के सबूत के लिए कि किसी विशेष कृति पर किस व्यक्ति का कापीराइट है कापीराइट के रजिस्ट्रेशन के लिए रजिस्ट्रार की व्यवस्था की है इस का देश में एक मात्र कार्यालय नई दिल्ली में स्थित है।

कापीराइट – लायसेंस

दि कोई व्यक्ति कापीराइट के स्वामी की अनुमति के बिना या कापीराइट पंजीयक से लायसेंस प्राप्त किये बिना कृति का उपयोग करता है या लायसेंस की शर्तों का उल्लंघन करता है या वह उस कृति की उलंघनकारी प्रतियाँ बेचने के लिए बनाता है, या भाड़े पर लेता है, या व्यवसाय के लिये प्रदर्शित करता है या बेचने या भाड़े पर देने का प्रस्ताव करता है, या व्यवसाय के लिये या इस हद तक वितरित करता है जिस से कापीराइट का स्वामी प्रतिकूल रुप से प्रभावित हो, या व्यावसायिक रुप से सार्वजनिक रुप से प्रदर्शित करता है तो यह उस कृति में कापीराइट का उलंघन है।

कापीराइट – कैसे बना कानून?

copyright1कापीराइट का कानून कृतियों का उस के स्वामी के अलावा अन्य व्यक्तियों द्वारा किए जा रहे अनियंत्रित उपयोग को सीमित करने के लिए अस्तित्व में आया था। किन्तु इस से शिक्षा, ज्ञान और कला के प्रसार को बाधा पहुँचने का खतरा भी कम नहीं था। इस कारण कृतियों के कुछ उपयोग ऐसे भी निर्धारित किए गए जिन्हें कापीराइट का उल्लंघन नहीं माना गया। कम्प्यूटर प्रोग्राम के अतिरिक्त अन्य साहित्यिक, नाटकीय, संगीतीय या कलात्मक कृति का व्यक्तिगत या रिसर्च में उपयोग, कृति की आलोचना एवं समीक्षा करने के लिए किया गया उचित-व्यवहार कापीराइट का उलंघन नहीं है। कम्प्यूटर प्रोग्राम की प्रति को कानूनी धारक द्वारा स्वीकृत उपयोग के लिए प्रतियाँ बनाना या उस का रूपान्तरण करना, उस के नष्ट होने और क्षति से सुरक्षा के लिए एक प्रति बनाना, किसी अन्य प्रोग्राम के साथ उसे चलाने के लिए नई सूचना प्राप्त करने के उद्देश्य से कोई काम करना  तथा गैर-वाणिज्यिक व्यक्तिगत उपयोग के लिए प्रतियां बनाना या रूपान्तरण करना कापीराइट का उलंघन नहीं है। इसी तरह साहित्यिक, नाटकीय, संगीतीय या कलात्मक कृति का उपयोग सामयिक घटनाओं को रिपोर्ट करने, किसी समाचार-पत्र, पत्रिका या समान प्रकार के सावधिक पत्रों, या सिनेमा फिल्म या चित्रों में प्रसारण हेतु किया गया समुचित उपयोग भी कापीराइट का उलंघन नहीं है।  लेकिन सार्वजनिक रूप से किए गए संबोधनों या भाषणों के संग्रह का प्रकाशन उचित व्यवहार नहीं है। किसी साहित्यिक, नाटकीय, संगीतीय या कलात्मक कृति की न्यायिक कार्यवाहियों, या न्यायिक कार्यवाहियों की रिपोर्ट के उद्देश्य से पुनरुत्पादन, विधायिका के सचिवालय द्वारा सदन के सदस्यों के उपयोग हेतु पुनरुत्पादन या प्रकाशन। किसी कृति के उचित सार का जनता के बीच पठन-पाठन। किसी अध्यापक या प्यूपिल के निर्देशों पर किसी परीक्षा में किसी प्रश्न में या प्रश्नों के उत्तर के रुप में या किसी शैक्षणिक संस्थान की गतिविधियों के क्रम में उस के विद्यार्थियों और स्टॉफ द्वारा प्रस्तुतिकरण, या एक सिनेमा फिल्म या साउंड रिकार्डिंग का प्रस्तुतिकरण आदि कृत्य कापीराइट का उलंघन नहीं हैं। इन के अलावा अनेक ऐसे कार्य कानून द्वारा निर्धारित किए गए हैं जो कापीराइट उलंघन हो सकते हैं या नहीं हो सकते हैं।

कापीराइट – उलंघन पर उपाय

कापीराइट के उल्लंघन से संबंधित मामलों में उसे रोकने के लिए निषेधाज्ञा प्राप्त करने, क्षतिपूर्ति प्राप्त करने, हिसाब किताब मांगने आदि अनेक उद्देश्यों के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत किए जा सकते हैं। इसी तरह कापीराइट के अनेक प्रकार के उलंघनों को अपराध बनाया गया है। आरोप सिद्ध हो जाने पर अभियुक्त को जुर्माने से लेकर तीन वर्ष तक के कारावास के दंड दंडित किया जा सकता है।

कापीराइट – रॉयल्टी की नई व्यवस्था

कापीराइट कानून से जहाँ कृतिकारों को उन के द्वारा कृति के निर्माण पर जो श्रम किया जाता है उस का उचित मूल्य और रायल्टी मिलने लगी है उस से कृतिकारों को राहत प्राप्त हुई है। लेकिन इस में अनेक कमियाँ भी हैं। अधिकांश कलाकारों से निश्चित शुल्क पर काम करवा कर कृतियों का निर्माण करवा कर व्यवसायी कृति में उत्पन्न स्वामित्व का लाभ जीवन भर उठाते हैं। इस स्थिति को बदलने के लिए 2012 में कानून को संशोधित किया गया। अब इस तरह के कुछ विशिष्ट प्रकार के कार्यों के लिए कलाकारों को जीवन भर उन के योगदान से बनी कृतियों पर रायल्टी की व्यवस्था की गई है। लेकिन इस कानून से ज्ञान, कला और शिक्षा के विस्तार में बाधा उत्पन्न हुई है। इस मामले में विद्वान अनेक प्रकार के मत रखते हैं। कुछ इस के समर्थक हैं तो सामाजिक आंदोलनों के अधिकांश नेता इस का विरोध भी करते हैं। महात्मा गांधी का विचार था कि सर्वोत्तम तो यह है कि स्वयं कृतिकार ही अपने जीवन काल में उचित परिस्थितियों में कृति पर से अपना कापीराइट सार्वजनिक हित में त्याग दे और उसे आम जनता के लिए सुलभ बना दे।

वसीयत कब और किस आयु में कर देनी चाहिए?

April 14, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

वसीयत कब करेंक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है कि वसीयत कब कर देनी चाहिए? लोग सोचते हैं कि वसीयत वृद्धावस्था में ही करनी चाहिए और जब वे अशक्त होने लगते हैं तभी वसीयत लिखने की योजना बनाते हैं। लेकिन यह एक तथ्य है कि अधिकांश व्यक्तियों की मृत्यु बिना वसीयत लिखे ही हो जाती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में आज भी 80 प्रतिशत लोगों की मृत्यु वसीयत किए बिना ही हो जाती है। वसीयत न लिखने के क्या परिणाम होते हैं? इस पर हमें विचार करना चाहिए।

किसी व्यक्ति का देहान्त कोई वसीयत लिखे बिना हो जाता है तो उस के द्वारा छोड़ी गई संपत्ति उस व्यक्ति पर प्रभावी व्यक्तिगत विधि अर्थात हिन्दू सक्सेशन एक्ट/मुस्लिम पर्सनल लॉ के उपबंधों के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों का स्वामित्व स्थापित हो जाता है। यदि एक से अधिक उत्तराधिकारी हों तो वे सभी उस संपत्ति के संयुक्त स्वामी हो जाते हैं। फिर संपत्ति का बँटवारा व्यक्तिगत विधि के अनुसार होता है न कि दिवंगत व्यक्ति की इच्छानुसार।

मृतक व्यक्ति का जो धन बैंक, बीमा आदि संस्थाओं या सरकारी विभागों में जमा होता है, जो कर्जा दिया हुआ होता है और जो कर्जा लिया हुआ होता है (Securities & Liabilities) उन सब के संबंध में जिला न्यायालय से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करना होता है तभी वे धन उस व्यक्ति को प्राप्त होते हैं जो उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त कर लेता है। उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए एक लंबी न्यायिक प्रक्रिया का पालन करना होता है जिस के कारण उसे प्राप्त करने में छः माह से एक वर्ष तक का और कभी कभी एकाधिक दावेदार होने पर उस से भी अधिक समय लग जाता है।  उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने में व्यक्ति को न सिर्फ अपना समय अपितु (Securities & Liabilities) के कुल मूल्य का 8 से 10 प्रतिशत तक का या उस से अधिक खर्च कोर्ट फीस, अन्य न्यायिक खर्च व वकील की फीस के रूप में करना होता है।

जो चल संपत्ति नकदी और वस्तुओं के रूप में मृतक छोड़ जाता है उस पर परिवार के अथवा परिवार के बाहर के किसी भी व्यक्ति का कब्जा स्थापित हो जाता है। तब यह साबित करना कठिन हो जाता है कि वे वस्तुएँ और नकदी मृतक की ही थीं और उन पर उस के उत्तराधिकारियों का स्वामित्व है।

जो अचल संपत्ति मकान जमीन आदि के रूप में होती है उन्हें उत्तराधिकारियों को आपस में बाँटने के लिए आपसी सहमति से बँटवारा कर उसे उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत कराना होता है। सहमति न होने पर बँटवारे का मुकदमा करना होता है जिस के निर्णय में कई वर्ष गुजर जाते हैं। जिस में उन का धन और समय खर्च होता है। इस बीच जो व्यक्ति संपत्ति पर काबिज होता है वही उस का उपयोग अपने हित में करता रहता है। वास्तविक उत्तराधिकारी उस के उपयोग से वंचित रह जाते हैं।

ई बार तो यह होता है कि उत्तराधिकारियों को मृतक की संपत्ति के बारे में जानकारी ही नहीं होती है जिस से उस संपत्ति को प्राप्त करना उन के ले कठिन हो जाता है और उस संपत्ति से वंचित भी हो सकता है। वसीयत न होने पर उत्तराधिकारियों की टैक्स प्लानिंग की गुंजाइश समाप्त हो जाती है और उत्तराधिकारी पर्याप्त टैक्स बचत नहीं कर पाते हैं, जबकि वसीयत होने पर उत्तराधिकारी अपनी टैक्स प्लानिंग सही ढंग से कर सकते हैं।

धिकांश व्यक्ति वसीयत नहीं बनाते क्योंकि उनका मानना होता है कि उनके पास अधिक संपत्ति नहीं है एवं जो संपत्ति है, उसमें उन्होंने नॉमिनेशन कर रखा है।  जबकि नॉमिनी केवल ट्रस्टी की हैसियत से ही संपत्ति प्राप्त कर सकता है। नॉमिनेशन कर दिए जाने से मृत्यु उपरांत नॉमिनी को संपत्ति पर अधिकार प्राप्त नहीं होता है और उस का कानूनी कर्तव्य यह होता है कि वह उस संपत्ति को उस के सही व कानूनी उत्तराधिकारियों को सौंप दे। यदि कोई व्यक्ति नोमिनेशन कर के यह समझता है कि उस से उस की संपत्ति नामिनी को मिल जाएगी। जब कि उस पर नामिनी का अधिकार नहीं होता है। जिस संपत्ति के लिए नामिनी निर्धारित कर दिया गया है उस की भी वसीयत लिखनी चाहिए।

Willसीयत लिखने से व्यक्ति के जीवन काल में संपत्ति पर उसी का हक होता है एवं मृत्यु उपरांत ही वसीयती को वह संपत्ति प्राप्त करने का अधिकार होता है। एक व्यक्ति अपने जीवनकाल में कितनी भी बार वसीयत बदल सकता है। मृत्यु के उपरान्त उस की अंतिम वसीयत ही मान्य होती है। वसीयत लिखने से संपत्ति पर व्यक्ति के अधिकार उस के जीवनकाल में सुरक्षित रहते हैं।

ब इस आलेख के पाठक खुद यह तय कर सकते हैं कि वसीयत कब करनी चाहिए? कोई भी व्यक्ति जिस की आयु 18 वर्ष या उस से अधिक हो गई है वह अपनी वसीयत करने के लिए सक्षम है। इस कारण से जो भी व्यक्ति संपत्ति रखता है उसे अपनी वसीयत जल्दी से जल्दी कर देनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर दूसरी वसीयत की जा सकती है जिस से पहले वाली निरस्त हो जाती है। मेरी राय में 18 वर्ष या उस से अधिक आयु के मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्तियों को जिन के भी संपत्ति हो या जिन का धन बैंक में जमा हो या जीवन बीमा पॉलिसी अथवा अन्य सीक्योरिटीज हों उन्हें तुरन्त अपनी वसीयत आवश्यक रूप से लिख देना चाहिए। अब आप क्या सोच रहे हैं? यदि अब तक आप ने अपनी वसीयत नहीं बनाई है तो तुरन्त बना दें।

लोक अदालत, विधिक सेवा प्राधिकरण और स्थाई लोक अदालतें

April 3, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
समस्या-

बिलासपुर छत्तीसगढ़ से नवीन अग्रवाल ने पूछा है-

ह लोक अदालत क्या है? उन का गठन कैसे होता और उन का कार्यक्षेत्र क्या है?

समाधान –

लोक अदालत 3पराधिक मामलों के अतिरिक्त जितने भी मामले हैं उन में कोई न कोई एक पक्षकार अपने किसी न किसी दीवानी अधिकार के लिए न्यायालय के समक्ष दावा प्रस्तुत करता है। दूसरे पक्षकारों को न्यायालय द्वारा बुलाया जाता है और सुनवाई के उपरान्त मुकदमों में निर्णय प्रदान किया जाता है। कोई अपील न होने या अपील के बाद जब निर्णय अंतिम  हो जाता है तो उसे पक्षकारों को मानना होता है यदि पक्षकार उसे नहीं मानते तो उस निर्णय के आधार पर बने जयपत्र (डिक्री) का निष्पादन न्यायालय कराती है। यही न्याय की सामान्य प्रक्रिया है।

जादी के बाद से अभी तक हमारी राज्य व्यवस्था त्वरित न्याय के लिए पर्याप्त न्यायालय स्थापित नहीं कर सकी है। हमारे न्यायालयों पर काम का बोझ अत्यधिक है। नित नए कानूनों के कारण यह बोझ लगातार बढ़ता भी है। लेकिन बढ़ते हुए बोझ के अनुरूप भी न्यायालयों की स्थापना नहीं हो पा रही है। वर्तमान में हमारी न्याय व्यवस्था में न्यायालयों की संख्या जरूरत की 20 प्रतिशत है। भारत में 10 लाख की आबादी पर औसतन 11-12 न्यायाधीश हैं। जब कि इतनी आबादी पर ब्रिटेन में 55 और अमरीका में 130 के लगभग न्यायाधीश हैं। अमरीका से हमारी न्याय पालिका 10 प्रतिशत ही है। इस कारण से मुकदमों की संख्या कम करने के उद्देश्य से लोक अदालत का सिद्धान्त सामने आया।

गैर अपराधिक मामलों में पक्षकारों के बीच समझौता हो जाए तो मामला निपट जाता है। न्यायालय समझौते के आधार पर निर्णय और डिक्री पारित कर देता है। आधार दोनों पक्षकारों की सहमति होने से उस की कोई अपील भी नहीं हो सकती और अधिकांश मामलों में निष्पादन कराने की आवश्यकता भी नहीं होती है। तब यह सोचा गया कि ऐसे मामलों में यदि दोनों पक्षकारों को समझा-बुझा कर किन्हीं शर्तों पर समझौता करा दिया जाए और उस के आधार पर निर्णय पारित कर दिया जाए तो अदालतों के पास मुकदमों की संख्या कम की जाए। कुछ स्थानों पर इस तरह के प्रयत्न किए गए जिनमें सफलता भी मिली। तब इसे अभियान का रूप दे दिया गया। जिस में समाज के प्रभावशाली लोगों की मदद भी हासिल की गई। बाद में यह सिद्धान्त मामूली अपराधों के मामलों पर भी लागू किया गया। यदि कोई अपराधी यह अपना अपराध कबूल कर ले तो उस के प्रति नरमी बरती जाए। कोशिश की जाए कि ऐसे अपराधियों को चेतावनी दे कर या जुर्माने मात्र की सजा से दंडित कर छोड़ दिया जाए। तो इन मामली अपराधिक मामलों में भी आवेदन आने लगे कि उन का निपटारा लोक अदालत में किया जाए।

स तरह जो लोक अदालत लगती है वह वास्तव में एक आयोजन होता है जिस में समझौते के आधार पर या अपराध स्वीकृति के आधार पर मामलों का निपटारा कर दिया जाता है। कई राज्यों में हर अदालत माह में एक दिन या सप्ताह में एक दिन इस तरह से मामलों का निपटारा करती है। इसी दिन को कहा जाता है कि लोक अदालत लगी है।

र्ष 1976 में 42 वें संशोधन के द्वारा भारत के संविधान में अनुच्‍छेद 39 के जोडा गया था जिसके द्वारा शासन से अपेक्षा की गई कि वह यह सुनिश्चित करे कि भारत का कोई भी नागरिक आर्थिक या किसी अन्‍य अक्षमताओं के कारण न्‍याय पाने से वंचित न रह जाये। इस उददेश्‍य की प्राप्ति के लिए सबसे पहले 1980 में केन्‍द्र सरकार के निर्देश पर सारे देश में कानूनी सहायता बोर्ड की स्‍थापना की गई। बाद में इसे कानूनी जामा पहनाने हेतु भारत सरकार द्वारा विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 पारित किया गया जो 9 नवम्‍बर 1995 में लागू हुआ। इस अधिनियम के अन्‍तर्गत विधिक सहायता एवं स्थाई लोक अदालतों की स्थापना के उपबंध बनाए गए। स्थाई लोक अदालतों के संचालन का अधिकार राज्‍य स्‍तर पर राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण को दिया गया।

लोक अदालत 1राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण में कार्यकारी अध्‍यक्ष के रूप में उच्‍च न्‍यायालय के सेवानिवृत्त अथवा सेवारत न्‍यायाधीश और सदस्‍य सचिव के रूप में वरिष्ठ जिला जज की नियुक्ति की जाती है। इसके अतिरिक्‍त महाधिवक्‍ता, सचिव वित, सचिव विधि, अध्‍यक्ष अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन’जाति आयोग, मुख्‍य न्‍यायाधीश के परामर्श से दो जिला न्‍यायाधीश, अध्‍यक्ष बार काउन्सिल, राज्य प्राधिकरण के सचिव प्राधिकरण के सदस्‍य होते हैं। इनके अतिरिक्‍त मुख्‍य न्‍यायाधीश के परामर्श से 4 अन्‍य व्‍यक्तियों को नाम’ निर्दिष्‍ट सदस्‍य बनाया जाता है।

सी प्रकार प्रत्‍येक जिला में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण का गठन किया गया है। जिसके अध्‍यक्ष संबंधित जिला के जिला जज हैं और सब जज स्‍तर के एक न्‍यायिक अधिकारी को जिला प्राधिकरण का सचिव नियुक्‍त किया गया है।  पुलिस अधीक्षक, जिला दण्‍डाधिकारी, अध्‍यक्ष जिला बार एसोसियेशन, जिला शासकीय अधिवक्‍ता, दीवानी फौजदारी एवं राजस्‍व जिला प्राधिकरण के पदेन सदस्‍य होते है। इसके अतिरिक्‍त राज्‍य सरकार द्वारा माननीय मुख्‍य न्‍यायाधीश के परामर्श से 2 अन्‍य सदस्‍यों को नाम निर्दिष्‍ट किया जाता है।

            राज्य और जिला स्तर के विधिक सेवा प्राधिकरण निम्न कार्य करते हैं-

1.         पात्र व्‍यक्तियों को विधिक सेवा उपलब्‍ध कराना।

2.         लोक अदालतों का आयोजन करके सुलह समझौते के माध्‍यम से विवादों का निपटारा कराना।

3.         निवारक और अनुकूल विधिक सहायता कार्यक्रमों का संचालन करना।

4.         विधिक सेवा उपलब्‍ध कराने हेतु अत्‍यधिक प्रभावी एवं कम खर्चीली योजनायें तैयार करके उन्‍हें क्रियान्वित करना।

5. ग्रामीण क्षेत्रों, गन्‍दी बस्तियों या श्रमिक कालोनियों में समाज के    कमजोर वर्गों को उनके विधिक अधिकारों की जानकारी देने हेतु विधिक शिविरों का आयोजन करना।

6       पारिवारिक विवादों को सुलह समझौते के आधार पर निपटाना।

जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों के अंतर्गत ही जिला स्तर पर स्थाई लोक अदालतों का गठन किया गया है। इन अदालतों का क्षेत्राधिकार पूरा जिला होता है तथा किसी भी मूल्य के गैर राजस्व और गैर अपराधिक मामले यहाँ प्रस्तुत किए जा सकते हैं। स्थाई लोक अदालतों में प्रस्तुत किए गए मामलों को लोकउपयोगी सेवाओँ के मामले तथा अन्य मामलों में विभाजित किया गया है।

विधिक सेवा प्राधिकरण( संशोधन) अधिनियम,2002 के द्वारा इस एक नया अध्‍याय  जोड कर जन उपयोगी सेवा को परिभाषित करते हुये वायु, थल, अथवा जल यातायात सेवा जिससे यात्री या समान ढोया जाता हो, डाक, तार, दूरभाष सेवा, किसी संस्‍थान द्वारा शक्ति, प्रकाश या जल की आम लोगों को की गयी आपूर्ति, जन संरक्षण या स्‍वास्‍थ्‍य से संबंधित प्रबंध, अस्‍पताल या औषधालय की सेवा तथा बीमा सेवाओं को लोकउपयोगी सेवाएँ इसमें शामिल किया गया है। इन जन उपयोगी सेवाओं से संबंधित मामलों को स्‍थायी लोक अदालतों द्वारा निपटारा किया जा सकता है।

लोक अदालत2न लोक अदालतों में आवेदन प्रस्तुत होने पर प्रत्‍येक पक्ष को निदेश दिया जाता है कि वे अपना लिखित कथन, दस्तावेज व शपथ पत्र पर साक्ष्य प्रस्तुत करें। इसके बाद लोक अदालत पक्षकारों में सुलह करवाने की प्रक्रिया करता है। वह उभय पक्ष में सुलह करने के लिये शर्त भी तय करता है ताकि वे सुलह कर लें और सुलह होने पर वह एवार्ड देता है। यदि पक्षकारों में सुलह नहीं होती है तो वह मामले का निष्‍पादन प्राकृतिक न्‍याय, सबके लिये बराबर का व्‍यवहार, समानता तथा न्‍याय के अन्‍य सिद्धान्‍तों के आधार पर बहुमत से कर देता है। इस लोक अदालत का एवार्ड अन्तिम होता है तथा इसके संबंध में कोई मामला, वाद या इजराय में नहीं लिया जा सकता है। इस लोक अदालत में इससे संबंधित आवेदन के उपरान्‍त कोई भी पक्ष किसी अन्‍य न्‍यायालय में नहीं जा सकता है।

लोक सेवाओँ से संबंधित मामलों के अतिरिक्त अन्य मामलों में स्थाई लोक अदालत पक्षकारों में सुलह करा कर समझौते के आधार पर अवार्ड दे सकती है लेकिन सुलह संभव नहीं हो सके तो वह अवार्ड पारित नहीं कर सकती और वैसी स्थिति में वह पक्षकारों को राय देती है कि वे अपना मामला नियमित न्यायालयों के समक्ष प्रस्तुत करें। किसी न्यायालय में पहले से लंबित मामलों में आवेदन दे कर उन्हें स्थाई लोक अदालत को स्थानान्तरित कराया जा सकता है और न्यायालय में कोई मामला प्रस्तुत करने के पहले भी मामले को स्थाई लोक अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।

Justice K Hemaकेरल उच्च न्यायालय की निवर्तमान न्यायाधीश के. हेमा ने उन की सेवा निवृत्ति पर आयोजित समारोह में अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों को संबोधित करते हुए। अत्यन्त महत्वपूर्ण तथ्य को उजागर किया जिसे सब जानते हैं लेकिन जिस पर खुल कर बात नहीं करते। उन्हों ने कहा कि न्यायाधीश और अधिवक्ता पूर्वाग्रह युक्त होते हैं और उन का यह पूर्वाग्रह न्यायिक निर्णयों को प्रभावित करता है। पूर्वाग्रह सभी इंसानों में मौजूद रहता है। न्यायाधीश और अधिवक्ता भी इन्सान हैं। कोई इंसान नहीं जो पूर्वाग्रहों से मुक्त हो। उन्हों ने कहा कि एक मामले को तीन अलग अलग जजों को निर्णय करने के लिए दिया जाए तो वे तीनों अलग अलग निर्णय देंगे।

न्यायिक प्रणाली में उपस्थित इन पूर्वाग्रहों में कानून की व्याख्या करने वाले पूर्व निर्णयों का अनुसरण करने का पूर्वाग्रह भी शामिल है। अधिवक्ता और न्यायाधीश इस मकड़जाल में बुरी तरह से उलझे हुए हैं। एक बार जब कानून के किसी उपबंध या प्रावधान की पहली या दूसरी बार व्याख्या कर दी जाती है और उस में कोई गलती हो जाती है तो न्यायिक प्रणाली उस गलती का अनुसरण करती है और उस से बड़ी से भी बड़ी गलतियाँ दोहराती चली जाती है।

न निहित पूर्वाग्रहों के कारण अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों से रही गलतियों के कारण न्याय प्रभावित हो रहा है यहँ तक कि एक न्याय करने में सक्षम और ईमानदार जज भी गलतियाँ करने को अभिशप्त होता है।

न्याय को इन पूर्वाग्रहों से मुक्त करने की सख्त की जरूरत है। न्यायमूर्ति हेमा ने कहा कि हमें अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों की मदद से उन तरीकों की खोज करने की सख्त जरूरत है जिन से इन पूर्वाग्रहों की पहचान की जा सके और न्याय प्रणाली को उन से मुक्त किया जा सके। यह कोई आसान काम नहीं है। लेकिन यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो न्यायाधीश और अधिवक्ता न्याय प्रणाली के संरक्षक होने के कारण इस के लिए दोषी होंगे।

असुविधा के लिए खेद ….

March 14, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

पाठकों और मित्रों!

दो दिनों से तीसरा खंबा की कोई पोस्ट नहीं खुल रही थी। कारण तलाश करने पर पकड़ में आया और उसे दुरुस्त कर दिया गया। लेकिन इस तीसरा खंबा की थीम परिवर्तित हो गयी है। वर्तमान थीम तब तक ही है जब तक कि तीसरा खंबा उस की पुरानी थीम में वाापस नहीं लौटता या फिर उस के लिए कोई नई उपयुक्त थीम नहीं तलाश ली जाती है।

स बीच उन पाठकों को अधिक असुविधा हुई है जिन के कानूनी सलाह के प्रश्न तीसरा खंबा के पास हैं और जिन का उत्तर उन्हें नहीं मिल रहा है।  पाठकों और मित्रों को हुई इस असुविधा के लिए खेद है।

शा है पाठकों का सहयोग तीसरा खंबा को पूर्ववत् मिलता रहेगा।

पाठक मित्रों!

तीसरा खंबा पाठकों की कानूनी समस्या के लिए समाधान प्रस्तुत करता है।  यदि किसी पाठक के पास अपनी, अपने परिवारजन की, अपने किसी संबंधी या मित्र की कोई वास्तविक समस्या हो तो उस का पूरा विवरण समस्या से संबंधित जिले, प्रान्त व नगर/ गाँव का उल्लेख करते हुए लिखें।  अनेक समस्याओं के साथ जरूरी विवरण नहीं होते जिस के कारण उन्हें ठीक से समझना और उस का समाधान प्रस्तुत करना कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में सुझाया गया उपाय गलत भी हो सकता है. और हो सकता है वह कारगर न हो। समस्या के साथ जो प्रश्न आप पूछना चाहते हैं उन्हें स्पष्ट रूप से लिखें। अनेक बार समस्या तो लिख दी जाती है लेकिन प्रश्न नदारद होते हैं। इस कारण समस्या को विस्तार से लिखें।

पनी कानूनी समस्या का समाधान चाहने वाले अनेक व्यक्ति अपना नाम पता गोपनीय रखना चाहते हैं, वे अपने असली नाम पता के साथ काल्पनिक नाम व पता लिख सकते हैं।  लेकिन समस्या जिस जिले, प्रान्त और नगर या गाँव  से संबंधित है उस का उल्लेख सही सही करें और अवश्य करें।  क्यों कि किसी भी  समस्या के समाधान का उस से सम्बन्धित नगर/ गाँव, जिला और प्रान्त से गहरा संबंध होता है अनेक कानूनी उपबंधों में भी अन्तर होता है।  सभी समस्याओं के लिए उपाय केवल तीसरा खंबा पर ही प्रस्तुत किए जाएंगे। कोई भी व्यक्ति यह अपेक्षा न करे कि समस्या का समाधान उसे मेल द्वारा या टेलीफोन द्वारा सूचित किया जाएग। टेलीफोन नं. का उद्देश्य मात्र इतना है कि समस्या का समाधान देते समय यदि कुछ तथ्यों की जानकारी हमें करनी हो तो हम संबंधित व्यक्ति से उन की जानकारी कर लें।

लेकिन हमारा उद्देश्य है कि अन्य लोग भी उस समस्या से कुछ सीखें और समय आने पर अपने ज्ञान का उपयोग करें। हम पाठकों की समस्या का समाधान शीघ्रता से देने का प्रयत्न करते हैं। कुछ पाठक जल्दबाजी में अपना प्रश्न हमें भेज देते हैं। समस्या का समाधान वेबसाइट पर प्रस्तुत कर देने के उपरान्त उन्हें लगता है कि कुछ विवरण छूट गया है और वे दुबारा प्रश्न भेज देते हैं। एक ही पाठक की एक ही समस्या के समाधान के बारे में बार बार वेबसाइट पर नहीं लिखा जा सकता है। इस कारण प्रश्नकर्ता से यह अपेक्षा है कि वे अपने प्रश्न से संबंधित समस्त विवरण एक बार में ही हमें प्रस्तुत करें।  एक बार समाधान वेबसाइट पर प्रस्तुत कर देने के उपरान्त उस समस्या के बारे में आगे पुनः चर्चा कर पाना संभव नहीं होगा

तीसरा खंबा को प्रतिदिन ही अनेक समस्याएँ समाधान हेतु प्राप्त होती हैं। वर्ष 2012 में लगभग 600 समस्याएँ हमें प्राप्त हुईं। इन दिनों प्रतिदिन दो-तीन समस्याएँ प्राप्त होती हैं। हर समस्या को समझना पड़ता है, उस का व्यवहारिक समाधान प्रस्तुत करना श्रमसाध्य काम है। हम चाहते हैं कि प्रतिदिन कम से कम एक समस्या का समाधान अवश्य प्रस्तुत करें। लेकिन प्रयत्न करते हुए भी वर्ष 2012 में हम 600 में से केवल 325 समस्याओं के समाधान प्रस्तुत कर सके।  इस से स्पष्ट है कि तीसरा खंबा के लिए अपनी वर्तमान क्षमता के अनुरूप उसे प्राप्त सभी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करना संभव नहीं है। हमें अनेक समस्याएँ ऐसी प्राप्त होती हैं कि उन में पर्याप्त तथ्य नहीं होते। अनेक बार तो समाधान के लिए आवश्यक तथ्यों का अभाव होता है वैसी स्थिति में उन का समाधान प्रस्तुत करना संभव नहीं होता। ऐसी समस्याओं का हम कोई उत्तर नहीं देते। कोई भी समस्या प्राप्त होते ही उसे तुरन्त देखा जाता है और यदि उस का समाधान तुरन्त प्रस्तुत करना हमें जरूरी लगता है तो हम तुरंत उस का समाधान प्रस्तुत करते हैं उस से पहले प्राप्त समस्या का बाद में।  किसी भी समस्या का समाधान आम तौर पर 15-20 दिनों में प्रस्तुत कर दिया जाता है। यदि किसी पाठक की समस्या का समाधान 20 दिनों तक तीसरा खंबा पर दिखाई न दे तो उसे समझना चाहिए कि उस ने अपनी समस्या में तथ्यों की कमियाँ छोड़ दी हैं जिस के कारण उस का समाधान प्रस्तुत कर पाना संभव नहीं है। वह पाठक अपनी समस्या को सभी आवश्यक तथ्यों सहित दुबारा भेज सकता है लेकिन उसे चाहिए कि वह पहले भेजी गई समस्या की तिथि अवश्य अंकित करे।

तीसरा खंबा तकनीकी सहयोग के अतिरिक्त एक व्यक्ति का व्यक्तिगत प्रयास है, उस के साधन बहुत सीमित हैं। अपने पास आई सभी समस्याओं का उत्तर देना तीसरा खंबा के लिए संभव नहीं है। यदि किसी पाठक को उस की समस्या का समाधान तीसरा खंबा से प्राप्त न हो तो कृपया वह हमें क्षमा करें।

अंग्रेजीमें कानूनी समस्याओं के समाधान के लिए अनेक वेब साइटस् उपलब्ध हैं। अंग्रेजी में अपनी समस्या लिखने और समाधान चाहने वाले वहाँ जाएँ। एक साइटलायर्स क्लब इंडिया की है पाठक यहाँ क्लिक कर के वहाँ जा सकते हैंऔर अपनी समस्या का समाधान कर सकते हैं।   पाठक अपनी समस्या को हिन्दी में टाइप करें। यदि यूनिकोड हिन्दी टाइपिंग नहीं आती है तो क्रुतिदेव फोन्ट में अन्यत्र टाइप कर यहाँ पेस्ट कर दें या रोमन हिन्दी में टाइप करें। यदि आप ने अपनी समस्या अंग्रेजी में लिखी है तो उस का समाधान प्रस्तुत करना हमारे लिए संभव नहीं होगा।

कुछ पाठक जिन्हें तीसरा खंबा की सलाह से लाभ होता है वे अनेक समस्याओं को बार बार इस तरह प्रस्तुत करते हैं जैसे तीसरा खंबा उन का व्यक्तिगत  विधिक सलाहकार हो। इस तरह एक ही पाठक की अनेक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करना तीसरा खंबा के लिए संभव नहीं है।

 

-दिनेशराय द्विवेदी

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