व्यवस्था Archive

rp_police-station2.jpgसमस्या-

नितिन अग्रवाल ने सतना मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा एक बैंक खाता श्री बालाजी अर्बन कोऑपरेटिव बैंक में एवम् एक खाता I.D.B.I. बैंक में भी है । 28.02.15 को श्री बालाजी बैंक ने मुझसे कहा कि आपके खाते में गलती से 198000/- (एक लाख अन्ठानवे हजार रुपये) आज से 9 माह पहले जमा हो गये थे, जो आप जमा करवा दीजिये । (28.05.14 को मैंने 2000 I.D.B.I. बैंक से ट्रांसफर किये थे तो उन्होंने 200000 रु. चढ़ा दिये थे ।) तब मैंने कहा कि मुझे थोड़ा समय दीजिये, इतनी जल्दी इतनी बड़ी रकम का इंतज़ाम कठिन है । तब बैंक ने कहा कि क्लोजिंग चल रही है, आपको तुरंत पैसा जमा करना पड़ेगा 15 दिनों के अंदर । मैंने उनको एक आवेदन पत्र भी दिया था कि मेरी एफ.डी. परिपक्व करके मेरे खाते में राशि जमा कर दी जाये और मेरा जो लोन चल रहा है उसको समाप्त कर दिया जाये, जो राशि खाते में जमा है उसको भी लोन में समायोजित करने के बाद जो भी राशि बचती है उसको मैं जमा करने को तैयार हूँ । लेकिन उन्होंने उस आवेदन को स्वीकार नहीं किया । और न ही पावती दी । 19.03.15 को मैं बैंक 2000/- (दो हजार रुपये) जमा करने गया और जमा करने के बाद पासबुक में इंट्री करवाई तो पता चला कि बैंक ने मेरे खाते से दिनांक 28-02-2015 को 198000/- एवं दिनांक 03-03-2015 को 25/- निकाल लिये थे वो भी मेरे साईन और अनुमति के बगैर । 23.03.15 को मैंने मान्यनीय उपभोक्ता फोरम द्वारा बैंक को नोटिस भी भिजवाया कि बैंक ने मेरे खाते से मेरी अनुमति के बिना ही 198000/- और 25/- निकाल लिये हैं । 11.04.15 को बैंक द्वारा सतेंद्र मोहन उपाध्याय टी. आई. सिटी कोतवाली सतना को प्रभाव में लेकर मुझे दोपहर 12 बजे से शाम 06:30 बजे तक थाने में बैठाकर प्रताड़ित किया एवं पैसे जमा करवाने के दवाब बनाया गया, बिना कोई F.I.R. के ही एवं बिना अदालत की अनुमति के हथकड़ी लगवाकर कैदियों के साथ बैठा दिया गया, और मेरी मानवीय गारिमा, सम्मान और सार्वजनिक प्रतिष्ठा को नष्ट किया गया । 13.04.15 को मैंने टी. आई. सिटी कोतवाली सतना एवं बैंक प्रबंधन के खिलाफ एस.पी. साहब के नाम सी.एस.पी. आफिस में लिखित आवेदन हथकड़ी लगी हुयी फोटो के साथ दिया एवं साथ में मानवाधिकार न्यायालय में भी याचिका दर्ज़ करवाई और मानवाधिकार न्यायालय द्वारा नोटिस भी जारी हुआ । और साथ में उच्चाधिकारियों को भी मैंने इस बात की लिखित सूचना भेजी । हथकड़ी लगाने के 18 दिन बाद, दिनांक 29-04-15 को श्री बालाजी बैंक के साथ मिलकर बदले की भावना से टी.आई. सत्येंद्र मोहन उपाध्याय और एस.आई. शत्रुघन वर्मा द्वारा झूठी रिपोर्ट दर्ज़ की गयी और धारा 403 व 406 लगा दी गयी । जबकि मैंने उन लोगों को पहले भी सूचित किया था कि मैंने सिर्फ अपने खाते में ही जमा रकम निकाली थी । चूंकि बैंक ने पैसा लेने के लिये गलत तरीकों का इस्तेमाल किया था । इसलिये आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ कि आगे मैं क्या करूं, क्या करना सही होगा ।

समाधान-

बैंक ने आप के खाते में अधिक धन चढ़ा कर गलती की है। इस गलती को सुधारने का सही तरीका यह था के बैंक उस धन को जमा कराने के लिए आप को लिखित नोटिस देता और आप की जो धनराशियाँ बैंक में जिन जिन खातों में हैं उन्हें सीज कर लेता। इस के साथ ही उस धन को जमा कराने के लिए आप के विरुद्ध दीवानी अदालत में दीवानी वाद संस्थित करता। लेकिन बैंक ने इस गलती को सुधारने के लिए गलत तरीका अपनाया और आप को पुलिस की सहायता से अपमानित किया और मानसिक व शारीरिक संताप पहुँचाया। इस मामले में गलती पुलिस की है जिस ने अवैध रीति अपनाई। आप इस के विरुद्ध उच्च न्यायालय में पुलिस/सरकार के विरुद्ध रिट याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। बैंक की अनियमितता के विरुद्ध आप पहले ही उपभोक्ता अदालत में जा चुके हैं।

प के विरुद्ध जो धारा 403 व 406 का मुकदमा बनाया गया है वह बनता ही नहीं है। उस प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द कराने के लिए भी आप उच्च न्यायालय के समक्ष निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं और प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द करवा सकते हैं।

दालतों की स्थिति सरकार ने ऐसी बना रखी है कि वहाँ न्याय मिलना अनन्त काल तक लंबित रहता है इस बीच न्यायार्थियों को जो तकलीफ भुगतनी पड़ती है उस का कोई हिसाब ही नहीं है। इस स्थिति ने पुलिस, सार्वजनिक व निजि संस्थाओं और सरकारी अमले को निरंकुश बनाया है। उसी का फल आप को भुगतना पड़ा है। इस तरह की स्थितियों से तभी समाज को बचाया जा सकता है जब कि एक त्वरित और उचित न्याय व्यवस्था देश में स्थापित हो। पर वह तो अभी एक सपना लगता है। अभी तो हमारी सरकारों ने जरूरत के केवल 15 प्रतिशत न्यायालय स्थापित किए हुए हैं। इस न्याय व्यवस्था को एक गुणवत्ता वाली त्वरित न्याय व्यवस्था में परिवर्तित होना देश की समूची राजनैतिक व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन हुए बिना संभव नहीं लगता। तब तक इस अपर्याप्त न्यायिक व्यवस्था के दु्ष्परिणाम नागरिकों को भुगतने होंगे।

rp_retrenchment-300x300.jpgसमस्या-
दिलीप सेठिया ने खंडवा, मध्यप्रदेश से  समस्या भेजी है कि-

मैं एक निजी कंस्ट्रेक्सन कंपनी में 4 साल से मार्केटिंग एवं फील्ड का पूरा काम देख रहा हूँ। मेरे 2 बच्चे भी हैं जो स्कूल में अध्यनरत हैं और किराये के मकान में रहते हैं। मुझे कंपनी ने 1 जनवरी 2011 को ऑफर लैटर दे कर काम पर रखा है। मुझे जिस मासिक वेतन 13625/= पर आरंभ में रखा था, वर्तमान मई 2015 में भी वही वेतन बैंक द्वारा दे रहे हैं। 1 जनवरी 2012 को मुझे वेतन बढ़ाने का बोल कर, आज तक मुझे बढ़ी हुई वेतन नहीं दी है। अब मांगता हूँ तो जवाब मिलता है, काम छोड़ दो। मेरे दोनों बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। मैँ अब क्या करूँ?

समाधान-

निजि कम्पनी में आप की नौकरी आप को दिए गए ऑफर लैटर की शर्तों पर निर्भर करती है। आप ने उस ऑफर लैटर को स्वीकार किया और वह एक संविदा में परिवर्तित हो गया। उस में यदि वेतन निश्चित है और वेतन बढ़ाने की कोई शर्त नहीं है तो आप को कोई कानूनी अधिकार नहीं है कि आप अपने वेतन को बढ़ाने की मांग करें। वैसे भी मार्केंटिंग के लोगों को औद्योगिक विवाद अधिनियम के अन्तर्गत वर्कमेन साबित करना बहुत कठिन काम है। यदि किसी तरह की कानूनी लड़ाई लड़ना चाहेंगे तो अदालतों की हालत यह है कि उन का निर्णय आप के जीवनकाल में हो जाए तो समझिए आप को सरकार ने खैरात दे दी। यूँ भी नियोजन क्षेत्र से संबंधित कानून अब कर्मचारियों के पक्ष में नहीं है। इस कारण कोई भी कानूनी उपाय आप के पास इस के लिए उपलब्ध नहीं है। यदि आप बच्चों का भविष्य खराब होने की दुहाई दे कर कुछ राहत की मांग करेंगे तो आप की विवशता देख कर नियोजक आप का वेतन बढ़ाना तो दूर काम की कमी बता कर आप का वेतन कम करने का प्रयत्न करते दिखाई देंगे।

निजि क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को चाहिए कि वे अपना स्किल बढ़ाएँ, अपना अनुभव बढ़ाएँ और अपने काम की मांग पैदा करें। और एक कंपनी की नौकरी को अपना जीवन बनाने से बचें। आप के नियोजक हर काम अपने मुनाफे के लिए करते हैं। जिस दिन उन्हें आप की जरूरत नहीं होगी या आप से कम वेतन में आप का काम करने वाला व्यक्ति मिल जाएगा वे आप को काम से बाहर कर देंगे। इस कारण आप को निरन्तर काम की तलाश भी जारी रखनी पड़ेगी। जैसे ही आप को वर्तमान से बेहतर काम मिले आप तुरन्त छोड़ कर दूसरा नियोजन पकड़ लें।

च्छी तरह समझ लें कि भारत में श्रमिकों और कर्मचारियों के लिए कोई भी सामाजिक सुरक्षा नहीं है। उन्हें उचित वेतन देने के लिए कोई कानून नहीं है। उन के नियोजन की सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है। यदि कोई कानून की किताब खोल कर बताए कि यह कानून है तो उस कानून के आधार पर किसी तरह की राहत पाना आसान नहीं है। एक श्रम न्यायालय में तीन कर्मचारियों की सेवा समाप्ति के विवाद 1983 से चल रहे हैं जिन्हें हम खुद देख रहे हैं। लेकिन आज तक श्रम न्यायालय उन का निर्णय नहीं कर सका। श्रम न्यायालय 32 वर्ष में जब तीन कर्मचारियों को उन के विवाद का निर्णय नहीं दे सकता तो फिर इस देश के न्यायालयों से श्रमिक कर्मचारी वर्ग न्याय की आशा नहीं कर सकता। अब तो श्रमिक वर्ग के लिए इस देश में न्याय तभी संभव होगा जब वे एक जुट हो कर देश की सत्ता को अपने और मित्र वर्गों के हाथों में ले लेंगे। वर्तमान में तो पूंजीपतियों और भूस्वामियों का बोल बाला है। इस व्यवस्था से कुछ भी आशा करना मजदूरों, किसानों, रिटेलरों आदि मेहनतकश वर्गों के लिए मूर्खता सिद्ध हो रहा है।

सुस्त न्यायिक व्यवस्था का इलाज तो राजनीति से ही संभव है।

May 16, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_divorce.jpgसमस्या-

प्रभाकर ने ग्वालियर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मारी शादी हिन्दू विधि से ११ साल पहले हुई थी। २ बच्चे हैं। शादी के बाद कभी भी नहीं बनी पर कोशिश थी कि शायद कुछ ठीक हो जाएगा। मैं किस प्रकार से जल्द तलाक़ ले सकता हूँ, सही कारण तो पत्नी द्वारा मानसिक प्रतारणा है, पर शायद सिद्ध करने में जिंदगी निकल जाएगी। क्या मैं अपना विवाहेतर शारीरिक संबंध सिद्ध करके डिक्री ले सकता हूँ? या मेरा धर्म परिवर्तन करके ये शादी खत्म की जा सकती है? पत्नी ने पहले तलाक़ की धमकी दी थी पर अब तलाक़ देने के लिए सहमत नहीं है। कृपया कुछ और उपाय हो तो सुझाएँ, बच्चो का हक़ भी पत्नी रखे तो चलेगा, मैं बच्चो का भरण पोषण लाइफ टाइम तक करने के लिए तैयार हूँ। शायद मैं कुछ तथ्य न दे कर भावनात्मक बात कर रहा हूँ पर कृपया अन्यथा न लीजिए।

समाधान-

भी तो आप को खुद लग रहा है कि आप शायद भावनात्मक बात कर रहे हैं। इस से स्पष्ट है कि आप के पास पत्नी से विवाह विच्छेद का कोई वैध कारण आप को दिखाई नहीं पड़ रहा है। यदि आप समझते हैं जो कुछ पत्नी कर रही है वह क्रूरता पूर्ण व्यवहार है तो आप उस के आधार पर न्यायिक पृथक्करण या विवाह विच्छेद का आवेदन कर सकते हैं। जहाँ तक सिद्ध करने में जीवन निकल जाने का भय है तो इस का अर्थ यह है कि आप के यहाँ न्याय पालिका बहुत सुस्त है और सभी मामलों में निर्णय देरी से होते हैं। आप को उस पर विश्वास नहीं रहा है।  यद सब इस कारण होता है कि न्यायालय के क्षेत्राधिकार के क्षेत्र से इतने मुकदमे प्रस्तुत होते हैं कि उस के लिए एक न्यायालय पर्याप्त नहीं है। उस क्षेत्र के लिए और न्यायालय स्थापित किए जाने की आवश्यकता है। नए न्यायालय स्थापित करने का काम सरकार का है। कम न्यायालय और अधिक मुकदमे होने से पेशियाँ देरी से होती हैं। प्रतिदिन अधिक मुकदमे न्यायालय की कार्यसूची में लगते हैं जिन में से आधे से अधिक में केवल पेशी ही मिलनी होती है। इस का लाभ वे न्यायार्थी उठाते हैं जो अपने मुकदमों को लंबा करना चाहते हैं। यदि ऐसा है तो कोई भी आधार आप तलाक का हो लेकिन समय उतना ही लगेगा। सुस्त न्यायिक व्यवस्था से वकीलों के भरोसे नहीं लड़ा जा सकता। उसे दुरुस्त करने के लिए राजनीति ही करनी पड़ेगी। ऐसी सरकारें लानी होंगी जो न्यायाक दायित्वों के प्रति सजग हों और जनता को न्याय उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त संख्या में न्यायालय स्थापित करे।

केवल विवाह समाप्त करने के लिए किया गया धर्म परिवर्तन वैध नहीं। फिर उस से पत्नी को विवाह विच्छेद का अधिकार प्राप्त होता है आप को नहीं। हमें लगता है आप के बीच तालमेल की समस्या है। बेहतर तो यह है कि इस समस्या से निपटने के लिए किसी काउंसलर की मदद प्राप्त करनी चाहिए।

अन्तिम प्रतिवेदनों को स्वीकृत होने में देरी क्यों होती है?

May 6, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_supreme-court-of-india4.jpgसमस्या-

योगेश सोलंकी ने पाली, राजस्थान से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

म दो भाई है अपने स्व:माताजी-पिताजी के निधन के बाद से ही अपने पिताजी द्वारा बनाये मकान में रहते है। बड़े भाई का ज्येष्ठ पुत्र प्रेम विवाह कर हम सभी से सबंध समाप्त कर उदयपुर में रहता है। उसकी पत्नी ने मई 2014 मे महिला थाना पाली में धारा 498 अ,313,323,344 व 366 मे झूठी एफआईआर में घर के सभी सदस्यों को नामजद करवा दिया। पुलिस अनुसंधान में उनकी रिपोर्ट झूठी पाए जाने पर हमारे हक मे F.R. देकर मामला माननीय जे.एम.न्यायालय मे अक्टूबर 14 पेश कर दिया गया। जिस पर रिपोर्टकर्ता को नोटिस तामील करवा तारीख पेशी पर हाजिर होने को सूचित भी कर दिया गया। तब से आज तक 5 पेशी पड़ गयी पर वह हाजिर नहीं हुए। उनके बार बार नही आने पर न्यायालय उन्हें अधिकतम कितने अवसर दे सकता है। अगर वह फिर भी नहीं आते हैं तो न्यायालय अपना फैसला कब सुनायेगा? क्या हम जल्दी निर्णय हेतु कहीं आवेदन कर सकते हैं? निर्णय हमारे हित में होने पर परिवादी को अगली अदालत में जाने के लिये कितना समय मिलेगा? निर्णय के बाद हम मानहानि का मुकदमा और झूठे पुलिस केस का मुकदमा कर सकते हैं क्या?

समाधान –

प के इस मामले में पुलिस द्वारा प्रस्तुत किए गए अन्तिम प्रतिवेदन पर न्यायालय अपना निर्णय दे कर उसे स्वीकार या अस्वीकार नहीं कर रहा है और आप को बार बार पेशी पर जा कर ध्यान रखना पड़ रहा है, यही आप की मूल परेशानी है।

प को लग रहा है कि शिकायत कर्ता को तामील हो जाने के बाद भी अदालत उसे उपस्थित होने का अवसर क्यों दिए जा रही है। पर ऐसा नहीं है। वास्तविकता यह है कि हमारे यहाँ अदालतों की संख्या जरूरत की एक चौथाई से भी कम है। जनसंक्या के अनुपात में भारत में जजों की संख्या अमरीका के मुकाबले 10 प्रतिशत, ब्रिटेन के मुकाबले 20 प्रतिशत और चीन के मुकाबले 5 प्रतिशत ही है। यही कारण है कि हमारी अदालतों के पास मुकदमों की भरमार है। हर अदालत के पास उस की अपनी क्षमता से तीन-चार गुना मुकदमे और काम होता है। अदालत के पीठासीन अधिकारी मजिस्ट्रेट के ऊपर यह भी दबाव रहता है कि वह कोटे से कम से कम दुगना काम कर के दे। इस कारण पीठासीन अधिकारी का सारा ध्यान अपने कोटे से दुगना या अधिक काम करने का दबाव रहता है।

स तरह के अन्तिम प्रतिवेदनों पर आदेश पारित करने का काम आम तौर पर सब से अन्तिम वरीयता का कार्य होता है। जब तक उन की पत्रावलियाँ सामने आती हैं तब तक अदालत का समय समाप्त हो जाता है।

स तरह के मामले पुलिस द्वारा अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं। पुलिस की तो हिम्मत ही नहीं होती कि अदालत से उन में आदेश पारित करने को कहे। परिवादी की ओर से कोई उपस्थित नहीं हो रहा है। और आप को पुलिस ने अभियुक्त बनाया ही नहीं है इस कारण से आप भी उपस्थित हो कर अदालत को निवेदन नहीं कर सकते। इस तरह के मामलों में जब तक अदालत प्रसंज्ञान न ले ले तब तक संभावित अभियुक्त को सुनवाई का अधिकार नहीं होता। यही कारण है कि इस तरह के मामलों में देरी होती रहती है, कोई समय सीमा नहीं है। जब तक उच्च न्यायालय इस तरह के मामलों में यह तय न कर दे कि अंतिम प्रतिवेदनों के मामले में परिवादी को तामील होने के बाद की पहली तारीख से एक निश्चित अवधि में मसलन तीन माह में आदेश पारित किया जाना अनिवार्य न कर दिया जाए तब तक यह स्थिति बनी रहेगी।

ब आप को समझ आ गया होगा कि न्यायालय परिवादी को समय और अवसर नहीं दे रहा है। बल्कि अपने कार्याधिक्य के कारण उस मामले में आदेश पारित नहीं कर रहा है। यदि आप कर सकें तो इतना करें कि न्यायालय को मौखिक रूप से निवेदन करें कि इस मामले में अंतिम प्रतिवेदन पर आदेश पारित कर दिया जाए तो भी काम चल जाएगा।

स तरह के मामले में यदि अंतिम प्रतिवेदन स्वीकार कर लिया जाता है तो आप को कुछ नहीं करना है। परिवादी को यदि उस आदेश से कोई आपत्ति हुई तो वह आदेश की तिथि से 90 दिनों में सेशन न्यायालय को निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकता है। यदि आप के विरुद्ध प्रसंज्ञान लिया जाता है तो आप को सम्मन जारी होंगे। आप को उक्त मामले का सम्मन मिलने से 90 दिनों की अवधि में आप उस आदेश के विरुद्ध सेशन न्यायालय को निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। जब अन्तिम प्रतिवेदन स्वीकार हो जाए तब आप अन्तिम प्रतिवेदन व न्यायालय के आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपियों के साथ दुर्भावना पूर्ण अभियोजन के लिए अपराधिक और दीवानी मुकदमे परिवादी के विरुद्ध संस्थित कर सकते हैं। ध्यान रखें। अन्तिम प्रतिवेदन और संलग्न दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ अभी प्राप्त कर लें और न्यायालय के आदेश की प्रतिलिपि भी जल्दी प्राप्त करें। अन्तिम प्रतिवेदन स्वीकार कर लेने के साथ ही पत्रावली वापस पुलिस को लौटा दी जाती है, बाद में अन्तिम प्रतिवेदन की प्रतियाँ प्राप्त करने में परेशानी हो सकती है।

कानूनी सलाहसमस्या-

हितेश ने कैलाशपुरी, राजसमन्द, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

ग्राम पंचायत कैलाशपुरी द्वारा 1995 में सरपंच साहब ने मेरी माताजी के नाम का निशुल्क पट्टा दिया उसका रेकॉर्ड है या नहीं हमें पता नहीं है। हम ने निर्माण कराने के लिए पत्थर डलवाए थे और 1-2 ट्रेक्टर पत्थर पहले से पड़े थे जो 15-20 साल पहले से पड़े थे। हमारे पड़ौस में कब्ज़ा करने के लिए पत्थर किसी ने डलवाए तो किसी की शिकायत पर ग्राम पंचायत ने एक आम सूचना चस्पा की कि ये पत्थर और अन्य सामग्री 3 दिन में उठा ली जाए तो हम ने पत्थर पंचायत नहीं ले जाए इसलिए मालिकाना हक की सूचना ग्राम पंचायत को 3 दिन मे दे दी जो पोस्ट द्वारा भेजी गई ओर उन्हें मिल गई। सूचना सरपंच और सचिव दोनों को भेजी गई थी। तब पंचायत 6 दिन बाद मेरे पत्थर नहीं ले गई। पंचायत द्वारा न तो हमारी सूचना पर हम से पट्टा मांगा गया और न ही पत्थर लेजा ने के बारे में सूचित किया गया। पंचायत की कार्यवाही के दौरान पट्टा बताया तो उसे जाली कह कर पत्थर ले गए। तो आप से अनुरोध है कि मुझे बताएँ कि हम अपने पत्थर और ज़मीन दोनों प्राप्त करने के लिए क्या उन लोगों पर क्रिमिनल ओर सिविल कार्यवाही दोनों एक साथ की जा सकती है। पट्टा निशुल्क वाला है यह 1995 में ग्राम पंचायत ने मेरी माताजी के नाम का दिया था जो निरस्त नहीं किया गया और न ही उस ज़मीन पर 15-20 साल से किसी ने आपत्ति की है। ना ही इस पंचायत द्वारा निरस्त किया गया है। सरपंच ओर अन्य सभी प्रभावशाली लोग हैं तो आप बताएँ कि हम इस मुसीबत से कैसे निपटें?

समाधान-

प की माँ के पास पट्टा है जो इस बात का सबूत है कि आप की माताजी को उस भूखंड पर पट्टे के अन्तर्गत स्वामित्व प्राप्त है। इस के बाद भी पंचायत ने पत्थर उठाए हैं तो आप को पंचायत के समक्ष पत्थर लौटाए जाने के लिए आवेदन देना चाहिए। यदि यह आवेदन निरस्त हो जाता है तो आप जिला कलेक्टर के समक्ष उस की अपील प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि ग्राम पंचायत ने बिना कोई कागजी कार्यवाही किए पत्थर उठाए हैं तो आप अपराधिक मुकदमा कर सकते हैं। लेकिन यदि पंचायत की यह कार्यवाही रिकार्डेड है तो आप को दीवानी और प्रशासनिक उपाय ही करने होंगे।

प को तुरन्त दीवानी न्यायालय में पट्टे के आधार पर घोषणा का वाद दाखिल करना चाहिए तथा इस बात के लिए निषेधाज्ञा प्राप्त करने की प्रार्थना करनी चाहिए कि आप वैध रूप से प्लाट पर काबिज हैं, पट्टे से स्वामित्व प्राप्त है, आप के कब्जे और स्वामित्व में ग्राम पंचायत दखल न दे, नियमानुसार भूखंड पर निर्माण करने की अनुमति प्रदान करते हुए आप को निर्माण करने दे।

प को इसी वाद के साथ अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर तुरन्त अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करनी चाहिए कि ग्राम पंचायत आप के पत्थर लौटाए और आप के कब्जे में दखल नहीं करे तथा नियमानुसार भूखंड पर निर्माण करने की अनुमति प्रदान करते हुए आप को निर्माण करने दे।

Raj-Boardsसमस्या-

साँकरणा, तहसील अहोर, जिला जालोर, राजस्थान से श्रवण कुमार ने पूछा है –

मेरा नाम श्रवण कुमार है लेकिन मेरी दसवीं की अंक तालिका में मेरा नाम सरवण कुमार (Saravan Kumar) छपा है जो गलत है। मैं इसे सही करवाना चाहता हूँ क्या यह संभव है? यदि संभव है तो कैसे किया जा सकता है?

समाधान-

प ने दसवीं कक्षा की परीक्षा माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान अजमेर से पास की है। यदि आप की अंक तालिका या प्रमाण पत्र में किसी तरह की कोई गलती हो गई हो तो उसे वह प्रलेख जारी किए जाने की तिथि से दो वर्ष की अवधि में ठीक करवाया जा सकता है। आप के नाम में तो वर्तनी की अशुद्धि हुई है। इस अशुद्धि को शुद्ध कराने के लिए तो कोई समय सीमा भी निर्धारित नहीं है, इसे कभी भी शुद्ध कराया जा सकता है।

प को अपनी अकंतालिका में अशुद्धि को ठीक कराने के लिए उस स्कूल में संपर्क करना चाहिए जिस से आप ने परीक्षा दी थी और परीक्षा का आवेदन पत्र प्रस्तुत किया था। आप वहाँ आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि स्कूल आप की मदद करने से इन्कार करे तो आप सीधे माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान अजमेर को आवेदन प्रस्तुत कर अपनी अंकतालिका में नाम में हुई वर्तनी की अशुद्धि को ठीक करवा सकते हैं।

उच्च न्यायालय में हिन्दी में रिट व अन्य याचिकाएँ …

August 31, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
jabalpur highcourtसमस्या-

चुरहट, मध्यप्रदेश से पूनम सिंह ने पूछा है-

क्या उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका या अन्य कोई आवेदन हिन्दी भाषा में प्रस्तुत किया जा सकता है? क्या याचिका को पोस्ट के माध्यम से भेजने पर स्वीकृत हो सकता है।

समाधान-

देश के कुछ राज्यों के उच्च न्यायालयों में हिन्दी में रिट याचिका या अन्य किसी भी प्रकार की याचिका प्रस्तुत की जा सकती है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार राज्यों के उच्च न्यायालयों में हिन्दी में कार्य होता है। उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, और झारखंड राज्य भी इन्हीं राज्यों से पृथक हुए हैं इस कारण इन राज्यों के उच्च न्यायालय भी हिन्दी में कार्य होना चाहिए।  आप मध्यप्रदेश से हैं। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में हिन्दी में कार्य होता है वहाँ रिट याचिका या अन्य कोई भी कार्यवाही हिन्दी में संस्थित की जा सकती है।

न्यायालय में संस्थित प्रत्येक मामले में कम से कम दो पक्ष होते हैं और न्यायालय दोनों ही पक्षों को सुन कर अपना निर्णय प्रदान करता है। सुनवाई में दोनों पक्षों का उपस्थित होना अनिवार्य है। इस कारण कोई भी प्रकरण व्यक्तिगत रूप से ही न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इस से पक्षकार को यह भी ज्ञान रहता है कि उस के द्वारा प्रस्तुत या उस के विरुद्ध प्रस्तुत प्रकरण में क्या कार्यवाही हो रही है। इस कारण डाक से याचिका प्रस्तुत करने का अभी तक कोई प्रावधान नहीं है। हालाँ कि सर्वोच्च न्यायालय में ई-फाइलिंग सुविधा अवश्य प्रदान की गई है।

डाक से भेजी गई याचिका या पत्र के किसी महत्वपूर्ण जनहित से संबद्ध होने पर को याचिका के रूप में स्वीकार करने की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय को है लेकिन यह न्यायालय की इच्छा है कि वे उसे याचिका के रूप में स्वीकार करें या न करें। इस कारण यदि आप किसी मामले को उच्च न्यायालय के समक्ष ले ही जाना चाहते हैं तो आप को स्वयं ही उपस्थित हो कर, यहाँ तक कि किसी सक्षम वकील के माध्यम से ही उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

लोक अदालत में मुकदमा कैसे लगवाएँ?

August 12, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
लोक अदालत 1समस्या-

मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश से अफसर अली ने पूछा है –

मारा मुकदमा धारा- निल/२०१२. ६६/६६ग है जिसकी अदालत मैं ३ तारीखें पडं चुकी हैं। हम दोनों पक्ष आपस में रजामंद हैं।  हम यह मुकदमा अदालत से बिल्‍कुल खत्‍म कराना चाहते हैं। लोक अदालत में यह मुकदमा कैसे जायेगा जिस से यह मुकदमा खत्‍म हो जाए। हमारी लोक अदालत मुरादाबाद जिले मे कहाँ लगती है? मुकदमा किस तरह से जायेगा? यह मुकदमा लोक अदालत में हाथों हाथ खत्‍म हो सकता है या नहीं, जबकि दोनो पक्ष आपस में सहमत है?

समाधान –

भी जिला मुख्यालयों पर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण स्थापित किया गया है, इस के अध्यक्ष जिला न्यायाधीश होते हैं। इसी में एक स्थाई लोक अदालत लगाई गई है जो कम से कम सप्ताह में दो दिन अवश्य लगती है। लेकिन इस का कार्यालय साप्ताहिक अवकाश व राजकीय अवकाश के दिनों को छोड़ कर प्रतिदिन खुलता है। इस के अतिरिक्त प्रत्येक अदालत भी माह में कम से कम एक दिन लोक अदालत लगाती है जिस में निर्णय कराने के लिए किसी भी दिन आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है।

प को लोक अदालत में मुकदमे का निर्णय कराने के लिए कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है आप का मुकदमा जिस न्यायालय में चल रहा है उसी अदालत में मुकदमे की पेशी के दिन या किसी भी दिन आप आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। यह आवेदन दोनों सहमत पक्षों द्वारा न्यायालय में प्रस्ततु किया जाए जिस में अंकित किया जाए कि आप दोनों सहमत हैं और लोक अदालत की भावना से उक्त प्रकरण में निर्णय कराना चाहते हैं। आप के आवेदन पर न्यायालय उसी दिन जिस दिन आप ने आवेदन प्रस्तुत किया है मुकदमे का निर्णय कर सकता है अथवा अगली लगने वाली लोक अदालत में मुकदमे को निर्णय के लिए रख सकता है।

श्मशान से अतिक्रमण कैसे हटाएँ?

August 3, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
encroachers on creamation groundसमस्या-

ग्राम शुक्ला बाजार, सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश से आशुतोष तिवारी ने पूछा है-

मेरे घर के सामने सरकारी श्मशान भूमि है। जिस पर कुछ लोगो ने अपना घर बना रखा है। क्या उनके खिलाफ कोई कार्यवाही हो सकती है?  यदि कोई कार्यवाही हो सकती है तो कहाँ और कैसे होगी? क्या उक्त जमीन पर बना हुआ मकान तोडा भी जा सकता है या नहीं।

समाधान-

किसी भी ग्राम या नगर में आबादी भूमि पर अतिक्रमण करने पर कार्यवाही करने का दायित्व ग्राम पंचायत या नगर पालिका का है। इसी तरह यदि भूमि राजस्व विभाग की है तो उस के लिए कार्यवाही करने का अधिकार तहसलीदार को है।

प को पहले पता करना चाहिए कि श्मशान भूमि आबादी में है या राजस्व में है। जहाँ भी वह भूमि स्थित हो उसी तरह से आप को लिखित में शिकायत करनी चाहिए। यदि ग्राम की आबादी भूमि है तो ग्राम पंचायत या पंचायत समिति को या जिला परिषद को शिकायत की जा सकती है। यदि भूमि नगरीय है तो नगरपालिका को लिखित में शिकायत करें। यदि राजस्व विभाग की है तो आप तहसीलदार, उपखण्ड अधिकारी या जिला कलेक्टर को शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं।

दि उक्त अधिकारी कोई कार्यवाही न करें या करने में देरी करें तो गाँव के कोई भी दो व्यक्ति मिल कर दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 91 के अंतर्गत एक जनहित याचिका दीवानी न्यायलय में प्रस्तुत कर सकते हैं जिस में आप ग्राम पंचायत, नगर पालिका या राज्य सरकार जिस का भी यह दायित्व हो उस के विरुद्ध यह वाद प्रस्तुत कर सकते हैं कि भविष्य में अतिक्रमण तुरन्त रोका जाए तथा वर्तमान अतिक्रमण को हटाया जाए। यह वाद प्रस्तुत करने के दो माह पहले आप को सम्बन्धित अधिकारी को विधिक नोटिस धारा 80 दीवानी प्रक्रिया संहिता या नगरपालिका अधिनियम के अन्तर्गत देना होगा।

कानून, अदालत और पुलिस दमन का औजार बन कर रह गए हैं।

July 10, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
Rape victimसमस्या

पटना, बिहार से प्रदीप कुमार ने पूछा है-

मेरी शादी जुलाई 2010 में हुई थी, पत्नी से मेरा रिश्ता बहुत अच्छा है।  शादी के 1 साल बाद मुझे मेरी दूर की साली (वो बहुत गरीब है) ने मुझे बताया कि मेरा सगा साला और उसका दूर का मौसेरा भाई उसका मोबाइल नम्बर अपने दोस्तो को दे कर उसे परेशान करता है।  इस मामले में जब मैं ने अपने साले से इस बारे में बात की तो वह शर्मिन्दा होने के जगह बोला कि वो मेरी दुश्मन है,  मैं उसे बरबाद कर दूँगा।  मैं ने अपने ससुर से भी बात की।  पर कोई हल नहीं निकला।  मैं ने अपनी साली से बहुत पूछा तो बोली कि मैं ने भैया से पापा की नौकरी लगवा देने की बात की थी, तब से परेशान कर रहे हैं।  मुझे उसके परिवार पर दया आ गयी।  मैं ने उसके पिता की नौकरी लगवा दी तथा उसे आगे पढ़ने की सलाह दी।  मेरी सलाह मान कर वो होस्टल में रह कर पढ़ने लगी।  जब यह बात मेरे ससुराल वालों को पता चली तो हमारे सम्बन्ध खराब होने लगे।  तब मेरे साले के दोस्त ने मुझे बताया कि मेरे साले और उस लड़की के बीच हमारी शादी के दिन से अवैध सम्बन्ध था। मेरे बीच में आने के कारण मेरा साला अपने घर वालों के कान भरता है।  जब मैं ने अपनी साली से पुछा तो उस ने सारी बातें सच बता दी उसने बताया कि मेरी शादी के दिन उसका बलात्कार हुआ और लोक लाज के कारण वह ये बात किसी को नही बता सकी।  उस के बाद मेरा साला माफ़ी मांगने के बहाने उस के पास फिर आया और शादी कर लेने की बात कर साल भर तक सम्बन्ध बनाता रहा, जब उस का मन भर गया तो अपने दोस्तो के साथ भी वही सब करने का दबाब देने लगा। अपने दोस्तों को उसका मोबाइल नम्बर दे देता था।  ये सब बात जब मैं ने अपने साले से पूछा तो वह भड़क गया।  तब मैं ने अपनी पत्नी को सारी बातें बताई।  मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि मेरे साले के अवैध सम्बन्ध मेरी पत्नी,  एक और रिस्ते की बहन, एक पड़ौस की लड़की से भी रह चुका था।

ब मैं ने तय किया कि मैं उसे सजा दिला कर रहूँगा।  उस समय मेरी पत्नी ने भी मेरा साथ देने का वादा किया। मैं ने ये बात उन दोनों के परिवार को साथ बिठा कर उन के सामने रखी।  पर कोई बात नहीं बनी।  मेरे ससुर लड़की के माँ बाप को जान से मार देने की धमकी देने लगे तथा लड़की के सगे मामा जो कि एक दलित के नाम पर गलत तरीके से नौकरी कर रहे है को नौकरी से निकलवा देने की धमकी दे कर मेरी पीड़ित साली की पढ़ाई बन्द करवा कर उसे घर में कैद करवा दिया। उसकी शादी की बात चलने लगी।  वो मुझसे एक दो बार मदद के लिये बोली भी।  पर मैं उस समय उसकी मदद करने मे असमर्थ था।  लड़की के माँ बाप भी उसके धमकी के कारण मेरे ससुर की बात मान रहे थे।  उस समय मेरी पत्नी ने अपने पिता का बहुत विरोध किया और अपनी बहन को हमारे पास बुला कर रख लिया।  यहाँ तक बोली कि मैं इसे जिन्दगी भर अपने साथ रखूंगी।  कुछ दिन बाद मेरी पत्नी गर्भवती हो गयी और मेरे घर वालों के दबाब के कारण अपने मायके चली गयी। एक दिन मेरी साली का फोन आया कि उसकी शादी तय हो गयी है और वो जान दे देगी पर ये शादी नहीं करेगी।  मेरे समझ में नही आ रहा था कि मैं उसकी मदद कैसे करुँ।  तब मैं ने उसे बोला कि तुम घर छोड़ कर आ जाओ, मैं तुम्हारा रहने और पढने की व्यवस्था राँची के होस्टल में करवा देता हूँ। वह आ गयी, पर वह कहाँ है? इसका पता मेरे ससुर को चल गया वह डर कर होस्टल छोड़ कर मेरे पास आ गई।  अब मैं समझ नहीं पा रहा था कि रात को उसे कहाँ रखूँ और मैं कहाँ रहूँ।  होटल जाते तो वहाँ उसका परिचय पत्र मांगा जाता।  पर वह सारा समान होस्टल में छोड़ कर आई थी।  दो दिन हमे अपनी गाड़ी में बिताना पडा।  तब मैं ने अपनी साली को शादी का सारा समान खरीद कर दिया और उसे अपनी पत्नी बता कर होटल में उस के साथ कुछ दिन रहा।  उसी समय हमारे बीच सम्बन्ध भी बन गये। (मेरी पत्नी को इस रिश्ते में कोई आपत्ति नहीं थी) उसके बाद मैं ने उसे अपनी पत्नी के रूप में साली का दूसरे होस्टल में दाखिला करवा दिया। तब  मेरे ससुर ने लड़की के पिता पर दबाब बना कर मुझ पर अपहरण का मुकदमा करवा दिया और मुझे साली को उस के घर पहुँचाना पड़ा।

मेरी पत्नी अभी अपने मायके में है और अपने माँ बाप के दबाब में पिछली सारी बातों से इन्कार करती है।  वो अब कहती है कि हम को पता है कि आप हमको नहीं रखेंगे। मेरे बच्चा नहीं था तो आप को बोला था कि मैं उसको (साली) को साथ रखूंगी पर अब तो मेरा खुद का बच्चा है, अब मैं उसको नहीं रखूंगी।  अगर आप उसकी मदद करेंगे तो आप पर दहेज और मार पीट का एफ़आइआर कर दूंगी।  फोन पर वो सारी पुरानी बातें स्वीकार करती है। लेकिन मैं जानता हूँ कि वह अदालत में  मुकर जायेगी।  मैं ने फोन पर होने वाली सारी बातें रिकोर्ड कर ली हैं। मेरी साली घर में है और उसके माँ बाप तक उसका साथ नहीं दे रहे हैं।  मैं उससे कहता हूँ कि मदद के लिये पुलिस के पास जाओ, तो कहती है कि माँ पिताजी ने बोला है कि अगर उस ने कुछ किया तो अब मैं जिन्दगी भर के लिये रिश्ता खतम कर लूंगा।  मैं ने उसे यहाँ तक कहा है कि तुम्हारा सारा खर्च मैं दूंगा, जिस ने तुम्हारी जिन्दगी बरबाद की है, उसे सजा दिलाओ।  मैं तुम्हारे साथ हूँ तो कहती है अब दीदी भी साथ नहीं दे रही है।  आप मेरा फ़िक्र छोड़ दीजिये जब तक ठीक-ठाक चलता है देखते हैं।  नहीं तो फिर आत्मह्त्या कर लूंगी।  मेरे कारण आप क्यों मुसीबत ले रहे हैं? अगर आप के कहने पर मैं सब से लड़ भी लूंगी तो दीदी आप पर एफ़आइआर कर देगी तो आप को जेल हो जायेगी तब मैं अपना खर्च कहाँ से लाउँगी? फिर भी मुझे आत्महत्या करनी पड़ेगी।  आप की भी जिन्दगी ख्रराब हो जायेगी।  आप कानून में रह कर मुझ से शादी कर के ले जाइयेगा तभी आप के साथ जा सकती हूँ ताकि फिर हमें कोई परेशान न करे।

मैं अपनी पत्नी को तलाक नहीं देना चाहता हूँ। अगर मैं तलाक दे दूँगा तो उसकी जिन्दगी खराब हो जायेगी और हमारे यहाँ तलाक के बाद लड़की की शादी बहुत मुश्किल से होती है और मेरी पत्नी तो दिमागी रुप से कमजोर है।  मुझे पता है कि मेरी पत्नी मेरे साथ रहने लगेगी तो वो फिर से मेरे पक्ष में हो जायेगी।  उसे लगता है कि मैं उसे अब नहीं रखना चाहता।  क्योंकि जब से वो मायके गयी है। बहुत बार उस ने मुझे बुलाया है पर मैं अपने ससुर से खराब रिश्ते की वजह से कभी नहीं गया।  मेरे ससुर कहते हैं कि जब तक वे मेरी साली की शादी नहीं करा देंगे मेरी पत्नी को मेरे यहाँ आने नहीं देंगे।  मेरी साली समाज में इतना बदनाम हो गयी है कि उसकी शादी अगर होगी भी तो कोई मजबूरी में ही करेगा जिस से उसकी जिन्दगी बर्बाद हो जायेगी। वह कहती है कि मैं आपको अपना पति मान चुकी हूँ।  मैं जिन्दगी भर आपके नाम के सहारे अकेले जी लूंगी और अगर जबर्दस्ती मेरी शादी करवाई जायेगी तो आत्महत्या कर लूंगी।  मैं चाहता हूँ कि मेरी साली को पढ़ने का अवसर मिले, जिस से वह अपने पैरों पर खड़ी हो कर अपनी जिन्दगी का सही फ़ैसला ले सके और मेरे साले को सजा दिला सके। उसके बाद भी उसे यह लगे कि वो मेरे साथ खुश रहेगी मैं उसे भी रखने को तैयार हूँ।  पर कानून मुझे दूसरी शादी का इजाजत नहीं देता। मेरा साला जिस ने न जाने कितनी जिन्दगियाँ बर्बाद की हैं विजयी मुस्कान के साथ घूम रहा है।  उसे इस बात का तनिक भी अफसोस नहीं है।  मुझे समझ में नही आता कि मैं क्या करुँ,? क्या करना उचित रहेगा? हमेशा मैं परेशान रहता हूँ।

समाधान-

हुत जटिल समस्या है आप की। यह केवल आप की समस्या न हो कर पूरी तरह एक सामाजिक समस्या बन चुकी है। एक तरफ आप के ससुर का परिवार है जो सम्पन्न है और अपनी संपन्नता के बल पर कुछ भी कर सकता है। फर्जी मुकदमे खड़े कर के लोगों को परेशान कर सकता है और अपने विरुद्ध लगाए गए मुकदमों में अपना बचाव कर सकता है, यहाँ तक कि गवाहों को भी अन्यान्य तरीकों से प्रभावित कर सकता है। दूसरी तरफ आप की रिश्ते की साली का परिवार है जो विपन्न है, जिसे जीवन जीने के लिए कुछ भी करना पड़ता है। अपने और अपने परिवार के सदस्यों के साथ हुए हर अन्याय को सहना पड़ता है। विपन्न लोग अपने जीवन यापन का मामूली स्थाई समाधान प्राप्त करने के चक्कर में गैरकानूनी रूप से नौकरी हासिल करने का काम भी कर सकते हैं, इस काम को करने के समय उन्हें यह भय भी नहीं होता कि नौकरी चली जाएगी या फिर फर्जीवाड़े के कारण उन्हें सजा भी हो सकती है। लेकिन एक बार नौकरी मिल जाए तो उसे बचाने को कुछ भी कर सकते हैं। उन के लिए अपना, पत्नी और बच्चों का सम्मान वगैरा सब थोथी चीजें हैं, वे सिर्फ और सिर्फ अपने जीवन को बनाए रखने के लिए ही संघर्ष करते रहते हैं।

न दो परिवारों में से एक परिवार के पुरुष ने दूसरे परिवार की लड़की और अन्य भी अनेक लड़कियों के साथ बलात्कार किए और अपनी संपन्नता के बल पर उन्हें छिपाए रख कर समाज में सम्मान बनाए हुए हैं। वे अपनी संपन्नता के साधनों और अपने मिथ्या सम्मान को बनाए रखने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। ये दोनों तरह के परिवार अपने तरीके से जी रहे हैं। एक अपनी संपन्नता और मिथ्या सम्मान को बनाए हुए और दूसरा अपने जीवन के लिए कड़ा संघर्ष करते हुए। कानून और नैतिकता का दोनों के लिए बस इतना अर्थ है कि जब भी उन में से किसी का अपने साध्य के लिए उपयोग किया जा सके कर लो, वर्ना ये दोनों व्यर्थ हैं।

न दो तरह के परिवारों में से जो संपन्न परिवार था उस की बेटी के साथ विवाह कर के आप उस के दामाद हो गए। इस विवाह का स्वाभाविक परिणाम यह होना चाहिए था कि आप अपने ससुराल के सदस्यों के सभी नैतिक अनैतिक, कानूनी और गैर कानूनी कामों में उन के साथ खड़े हों। यदि आप उन के विरुद्ध खड़े होंगे तो वे अपनी संपन्नता और मिथ्या सम्मान को बचाए रखने के लिए आप के विरुद्ध भी खड़े होंगे। क्यों कि उन की यह सामाजिक स्थिति ही उन के लिए सब से प्रमुख है, शेष सभी बातें बिलकुल गौण हैं।

मारे समाज में कुछ आत्मनिर्भर स्वतंत्र स्त्रियों को छोड़ कर सभी स्त्रियाँ परतंत्रता का जीवन व्यतीत करती हैं। आप की पत्नी भी उन में से एक है। समाज के मूल्य ऐसे हैं कि किसी स्त्री को जबरन बलात्कार का शिकार बनाया जाए तो वही बरबाद होती है, बलात्कारियों का कुछ नहीं बिगड़ता, वे बने रहते हैं। अधिकांश स्त्रियाँ अपने बचपन या किशोरावस्था में ही अपने ही परिजनों के इस बलात्कर्म का शिकार होती हैं और अत्याचारों को बनाए रखने के लिए अस्तित्व में लाए गए स्त्री के कौमार्य और सतीत्व के बेढ़ब सामाजिक मूल्यों की कंदराओं में कैद स्त्रियों के पास यह सब अत्याचार सहने के अलावा कोई मार्ग नहीं होता। वे इसे ही अपनी नियति के रूप में स्वीकार कर लेती हैं, और इसी तरह जीती रहती हैं। वे इस स्थिति से जरा भी विचलित होती हैं तो समाज उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता। आप की पत्नी के साथ उस के ही भाई ने यह अत्याचार किया और फिर रिश्ते की बहिन के साथ भी और अन्य कुछ और स्त्रियों के साथ भी।

ह सारी स्थिति चलती रहती, यदि आप को आप के रिश्ते की साली ने अपनी व्यथा न बताई होती। आप के ससुराल का परिवार, विशेष रूप से आप का साला और ससुर इस मामले में आप का दखल पसंद नहीं था। किसी भी विवाद की स्थिति में उन की सामान्य अपेक्षा यही है कि आप अपने साले और ससुर के साथ खड़े हों चाहे वे कितने ही गलत हों। (हमारे सामाजिक मूल्य यही कहते हैं) इस आप के ससुराल के पुरुषों ने जो भी संतुलन बनाया हुआ था उस में आप की बात से खलल पड़ गया। आप ने रिश्ते की साली के पिता की मदद की उन्हें रोजगार दिला दिया और रिश्ते की साली की पढ़ाई की व्यवस्था कर दी। वहीं से आप के साले और ससुर आप के विरुद्ध हो गए। उन्हें यह खतरा लगने लगा कि लड़की और उस के पिता का जीवन जैसे ही कुछ स्थिर होगा। वे उन के काले कारनामों के लिए उन्हें कानून के सामने खड़ा कर सकते हैं जिस से उन का ताश का महल गिर सकता है। उन्हों ने उस लड़की और उस के पिता को डराना धमकाना आरंभ कर दिया और लड़की और उस के पिता ने जो इन धमकियों का सामना नहीं कर सकते थे हथियार डाल दिए। आप की पत्नी जो स्वयं पीड़ित थी उस ने आप का साथ देना पसंद किया लेकिन किसी बहाने से आप के ससुर उसे अपने कब्जे में ले गए। जहाँ पहुँच कर वही हुआ जो होना था। एक बंदी स्त्री तो केवल उसी का साथ दे सकती है जिस के वह कब्जे में हो।

जो लड़की अनेक बार बलात्कार का शिकार हो चुकी हो। उस के लिए देह की पवित्रता का क्या अर्थ रह जाता है। यह बात आप की पत्नी और रिश्ते की साली के लिए पूरी तरह सच है। आप ने उस का साथ दिया। उस उपकार का आभार प्रकट करने के लिए आप की साली के पास उस की देह आप को समर्पित करने के अलावा कुछ भी नहीं था। परिस्थितियों ने आप को साथ कर दिया और आप के संबंध बन गए। आप की पत्नी को भी इस में क्या आपत्ति हो सकती थी? वह भी तब जब कि वह स्वीकार कर चुकी हो कि वह विवाह के पहले अपने ही भाई के अत्याचार से अपना कौमार्य खो बैठी है। लेकिन जैसे ही वह अपने पिता और भाई के संरक्षण (कब्जे) में गई उस के स्वर बदल गए। आप समझ सकते हैं कि हमारे समाज में स्त्री का अपना कोई स्वर नहीं होता। उस का स्वर उसी पुरुष का स्वर होता है जिस के वह कब्जे में होती है।

न सारी परिस्थितियों में आप अपने ही साले को उस के अपराधों के लिए दंडित कराना चाहते हैं। एक तो उस के अपराध इतने पुराने हो चुके हैं कि उन के सबूत तक नहीं मिलेंगे। दूसरे आप यदि इस कामं को हाथ में लेते हैं तो आप का साला और ससुर हाथ धो कर आप के पीछे पड़ जाएंगे। वे इस काम के लिए कानून का भी इस्तेमाल करेंगे। पलड़ा उन के पक्ष में इसलिए है कि आप की पत्नी आप के पास न हो कर अपने मायके में भाई और पिता के कब्जे में है। आप के रिश्ते की साली इन परिस्थितियों को अच्छी तरह समझती है। इसी लिए उस ने यह शर्त रखी है कि वह आप के साथ केवल वैध विवाह में ही साथ रहने को तैयार है अन्यथा नहीं। क्यों कि उस का सर्वस्व आप के अस्तित्व पर निर्भर करता है और वह नहीं चाहती कि इस लड़ाई में आप को कोई नुकसान पहुँचे। क्योंकि आप का नुकसान उस का बहुत बड़ा नुकसान है। आप को तो सिर्फ नुकसान होगा, जब कि उस का तो सब से बड़ा सहारा छिन जाएगा।

सारी समस्या की कुंजी इस बात में है कि किसी तरह आप की पत्नी आप के ससुर और साले के कब्जे से निकल कर आप के पास आए।  लेकिन आप के ससुर व साले ने इस के लिए यह शर्त रखी है कि पहले आप के रिश्ते की साली का विवाह हो जाए। यदि ऐसा विवाह हो जाता है तो वह केवल फर्जी विवाह होगा और आप के व आप की रिश्ते की साली के मार्ग में एक स्थाई बाधा और खड़ी हो जाएगी।

किसी भी तरह यदि आप आप की रिश्ते की साली का विवाह कराए बिना अपनी पत्नी और बच्चे को अपने ससुराल से निकाल कर अपने पास ला सकते हैं तो फिर पत्नी आप के साथ होगी और संतुलन आप के पक्ष में हो जाएगा। तब आप इस लड़ाई को आगे लड़ सकते हैं। इस के बिना आप के ऊपर कभी खत्न न होने वाली कानूनी कार्यवाहियों, गिरफ्तारी जमानत आदि की तलवार लटकी रहेगी। फिर आप सारी लड़ाई को भूल कर अपने बचाव में लग जाएंगे। आप अपनी पत्नी को इस तरह उस के मायके से निकाल कर अपने पास कैसे लाएंगे यह आप ही तय कर सकते हैं। यदि आप ऐसा कर सकें तो आगे का मार्ग खुल सकता है।

क मार्ग और है। यदि आप की पत्नी आप के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवाती है तो गिरफ्तारी केवल 498 ए तथा 406 आईपीसी के मामलों में हो सकती है। आप इस गिरफ्तारी से बचने की या गिरफ्तारी के बाद एक दो सप्ताह में जमानत पर छूटने की व्यवस्था स्थानीय रूप से बना लें तथा अपनी पत्नी और बच्चे के लिए साल दो साल बाद न्यायालय द्वारा दिलाए जाने वाले निर्वाह भत्ते की राशि देने का साहस कर लें तो एक बार गिरफ्तार हो कर जमानत पर छूटने के बाद इस लड़ाई को आगे ले जा सकते हैं।

क तीसरा मार्ग यह है कि किसी तरह अपनी रिश्ते की साली का विवाह करा दें और पत्नी व बच्चे को ला कर अपने साथ रखें और साली व उस के परिवार को उन के हाल पर छोड़ दें। पर यह भी न होने वाला है क्यों कि साली इस के लिए तैयार नहीं है।

प के तीनों में से एक मार्ग चुनना है। यह आप के ऊपर है कि आप क्या चुनते हैं। लेकिन इतना समझ लें कि कानून, अदालत और पुलिस दमन का औजार बन कर रह गए हैं। उन का उपयोग आप अत्याचारियों को सजा दिलाने के लिए कर सकते हैं तो आप का साला और ससुर भी उन का उपयोग आप के और आप की रिश्ते की साली व उस के परिवार के दमन के लिए कर सकते हैं। परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन इन औजारों का उपयोग करने में बाजी मार ले जाएगा।  इस तरह की समस्याओं का अंत तो समाज में मूल्यों में परिवर्तन से ही संभव है जो अभी बहुत दूर दिखाई पड़ता है।

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