संपत्ति Archive

समस्या-

निशी ने उदयपुर राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या 25 वर्ष पूर्व शपथ पत्र के माध्यम से बक्शीश या दान में दी गई अचल सम्पत्ति जिसे ग्रहिता ने स्वीकार कर निर्माण किया और वर्तमान में भी काबिज है को दानदाता अपने जीवन में किसी अन्य के नाम पंजीकृत कर सकता या सकती है? जिसका पता ग्रहिता को दाता की मौत के बाद चले, तो क्या उससे वह सम्पत्ति पंजीकृत कराये दूसरे व्यक्ति को मिल जायेगी या होगी जबकि दानग्रहिता जीवित है और सम्पत्ति पर काबिज है?

समाधान-

चल संपत्ति का दान या बख्शीश शपथ पत्र के माध्यम से नहीं हो सकता। दान और बख्शीश संपत्ति का अंतरण हैं और संपत्ति का मूल्य 100 रुपए से अधिक होने के कारण उस का पंजीकृत होना आवश्यक है। आप  दान या बख्शीश पंजीकृत विलेख से नहीं होने के कारण अमान्य है। लेकिन यह दस्तावेज बताता है कि दान प्राप्तकर्ता को उक्त संपत्ति का कब्जा खुद उस के मालिक ने दिया था। कब्जे को 25 वर्ष हो चुके हैं। 25 वर्ष का अबाधित कब्जा होने तथा उस पर ग्रहीता द्वारा निर्माण कार्य भी कराया गया है।

यदि उक्त संपत्ति मूल स्वामी के द्वारा किसी को पंजीकृत विलेख से हस्तांतरित कर भी दी गयी हो तब भी उस का कब्जा तो वास्तविक रूप से नहीं दिया गया है। हस्तांतरण से संपत्ति का स्वामित्व प्राप्त करने वाले को ग्रहीता से संपत्ति का कब्जा प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित करना होगा। यह वाद मियाद के बाहर होने के कारण निरस्त हो सकता है। क्यों कि 25 वर्ष का अबाधित कब्जा होने से ग्रहीता का कब्जा प्रतिकूल हो चुका है और उस से संपत्ति का कब्जा मूल स्वामी या हस्तान्तरण से स्वामित्व प्राप्त व्यक्ति मियाद के बाहर होने से प्राप्त करने में अक्षम रहेगा।

दादी उन के पति से मिले हिस्से की वसीयत कर सकती है।

October 29, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

योगेश सोलंकी ने नामली (रतलाम), मध्य्प्रदेश से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मारे दो मकान ओर एक खेत हैं। कुछ महीनों पूर्व ही मेरी दादी की मृत्यु हुई है और मेरी दादी ने एक रजिस्टर्ड वसीयतनामा किया है उसमें एक बड़ा मकान और वो खेत मेरे चाचा के नाम किया गया और सिर्फ छोटा मकान मेरे पापा को दिया गया। जबकि खेत मेरी दादी के नाम का था और दोनों मकान नगर परिषद में के रजिस्टर में और रजिस्ट्री भी मेरे दादाजी के नाम से है और कानूनी तौर पर भी दोनों मकान मेरे दादा जी के नाम से है। वसीयत सिर्फ खुद की खरीदी हुई या स्वअर्जित संपत्ति पर ही की जाती है। तो ये जो वसीयत की गई वो सही है या गलत और मुझे क्या करना चाहिये?

समाधान-

प बिलकुल सही हैं। दादाजी के नाम की जो संपत्ति है उस का उत्तराधिकार तो दादाजी के समय ही निश्चित हो गया। यदि आप के दादाजी के दो पुत्र ही हैं और कोई पुत्री नहीं थी तो उन की समूची संपत्ति उन के देहान्त पर तीन हिस्सों में विभाजित हो कर एक एक हिस्सा दादी और आप के पिता और चाचा को मिलना चाहिए। इस तरह दोनों मकानों का एक तिहाई हिस्सा आप के पिता को मिला, एक चाचा को और एक दादी को। अब यदि दादी उन मकानों की वसीयत नहीं कर सकती है तो भी वह अपने हिस्से की वसीयत कर सकती है। इस तरह मकानों का 2/3 हिस्सा चाचा को मिलेगा और जमीन दादी के नाम होने से वसीयत से चाचा को मिलेगी।

अब आप को खुद सोचना चाहिए कि अभी जो मकान मिला हुआ है वह दोनों मकानों के मूल्य के एक तिहाई से अधिक मूल्य का है तो कुछ भी करने में कोई लाभ नहीं है। और यदि लड़ाई लड़ी जाए और फिर भी इतना ही अधिक मिले की उस से केवल लड़ाई का खर्च भी न निकले तो लड़ाई लड़ने से कोई लाभ नहीं।

समस्या-

संदीप कुमार ने ब्यावर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता की पहली पत्नी से 1979 में सीमाजिक रीति से तलाक हो चुका था, उस से एक पुत्र का जन्म हुआ था। दूसरी पत्नी से चार पुत्र तथा एक पुत्री का जन्म हुआ। जिनमें से दो अविवाहित पुत्रियों तथा एक विवाहिता पुत्री की मृत्यु हो गई। इसके बाद मेरे पिताजी का भी स्वर्गवास हो गया है। अब मेरे पिताजी की निर्वसीयती सम्पत्ती पर किस किस का अधिकार है। जबकि पहली पत्नी के पुत्र से पिताजी के जीवन काल में कोई वास्ता नहीं था। कृपया सुझाव दें।

समाधान-

दि आप की पिता की पहली पत्नी का तलाक सामाजिक रीति से हुआ था और न्यायालय ने विवाह विच्छेद की डिक्री पारित नहीं की थी तो आप के पिता का दूसरा विवाह अवैध है इस कारण दूसरी पत्नी को वैधानिक दर्जा नहीं मिलेगा। किन्तु सभी संतानों को बराबर उत्तराधिकार मिलेगा।

इस प्रकार यदि न्यायालय में यह कहा गया और साबित हुआ कि दूसरा विवाह वैध नहीं था तो पिताजी की संपत्ति में दूसरी पत्नी को कोई हिस्सा नहीं मिलेगा। जितने जीवित पुत्र पुत्री हैं उन सभी को एक एक हिस्सा मिलेगा तथा एक विवाहित पुत्री जिस की मृत्यु हो गयी है, यदि उस की संतानें और पति जीवित है तो उस का हिस्सा उन्हें प्राप्त होगा। आप ने जो विवरण दिया है उस में यह तथ्य सही अंकित है कि दूसरी पत्नी से चार पुत्र व एक पुत्री हुई है, तो फिर दो अविवाहित व एक विवाहित पुत्री की मृत्यु कहाँ से हो गयी है। आप अपने तथ्यों के हिसाब से इस राय को दुरुस्त कर सकते हैं।

कब्जा किसी भी संपत्ति के स्वामित्व का प्राथमिक साक्ष्य है।

October 27, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

घनश्याम गहलोत ने गंगापुर, भीलवाड़ा राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा परिवार एक मकान में 70 वर्षो से बिना किराए के निवास कर रहा है, बिजली का बिल मेरे दादाजी के नाम पर है जिनका स्वर्गवास हो गया है। अब हमारे पास इस मकान के स्वामित्व के लिए क्या अधिकार है?

समाधान-

कान का बिजली कनेक्शन आप के दादाजी के नाम है। आप पुराने से पुराना दस्तावेज प्राप्त कर के सुरक्षित रखिए जिस से आप दादाजी के नाम के बिजली कनेक्शन को साबित कर सकें। उक्त मकान आप के दादाजी के उत्तराधिकारियों के स्वामित्व की संपत्ति ही मानी जाएगी क्यों कि उन का उस संपत्ति पर 70 वर्ष से अबाधित कब्जा है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 110 में यह प्रावधान है कि –

Burden of proof as to ownership:

When the question is whether any person is owner of anything of which he is shown to be in possession, the burden of proving that he is not the owner is on the person who affirms that he is not the owner.

यदि कभी यह प्रश्न उठे कि क्या कोई व्यक्ति उस संपत्ति का स्वामी है जो उस के कब्जे में है तो यह साबित करने का भार उस व्यक्ति पर होगा जो यह कहता हो कि यह संपत्ति उस व्यक्ति की नहीं है।

यदि आप का परिवार उस मकान में विगत 70 वर्षों से अबाधित रूप से निवास कर रहा है तो उस मकान के स्वामी आप ही हैं। यदि कोई इस बात पर आपत्ति करता है तो उसे साबित करना पड़ेगा कि आप उस के स्वामी नहीं है। इस तरह पूरी दुनिया में यह सिद्धान्त प्रचलित है कि कब्जा किसी भी संपत्ति के स्वामित्व का प्रथम दृष्टया सबूत है। इसीलिए कहा जाता है ‘कब्जा सच्चा दावा झूठा’।

समस्या-

इति श्रीवास्तव ने रांची , झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरी माता का देहांत 2013 में हुआ, वे माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश में सहायक अध्यापिका के पद पर पिछले 30 सालों से अधिक से कार्यरत थीं। 2015 में वह रिटायर होने वाली थीं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी तीन पुत्रियों में से किसी को भी अब तक उनके सेवा से जुड़ी कोई भी राशि प्राप्त नहीं हुई है। जब मैं जे.डी. ऑफिस गई तो मुझे यह बताया गया कि तीनों लड़कियों में से किसी एक को नौकरी मिलेगी और मेरे पिता को पेंशन मिलेगी हालांकि मेरी माता के अन्य बकाया के सम्बंध में कोई बात नहीं की गई। मेरी माता का मेरे पिता से कोई लेना-देना नहीं था, हालांकि दोनों में तलाक नहीं हुआ था, और माँ की सेवा पंजिका में भी उनका नाम है जिसे वो हटाना चाहती थीं लेकिन हटा नहीं सकीं। मेरे पिता कोऑपरेटिव सोसायटी, इलाहाबाद में क्लर्क हैं। मेरी माँ की मृत्यु के समय हम तीनों बहने बेरोजगार थीं और माँ के रिश्तेदारों के घर में रहती थीं। हालांकि 2015 में मुझे केंद्र सरकार में नौकरी मिल गई। पर अन्य दोनों बहनें कम सैलरी पर प्राइवेट जॉब करती हैं और कभी-कभी छोड़ना भी पड़ता है। माँ की जगह पर नौकरी हम तीनों ही नहीं करना चाहते हैं। हम तीनों अविवाहित हैं। अभी हमारी माँ की एक पैतृक अचल सम्पत्ति बिकी उसमें से माँ के रिश्तेदारों, जिनका हिस्सा भी उस सम्पत्ति में था, ने यह कहकर की कानून के अनुसार उनको एक हिस्सा मिलेगा, हमारे शेयर में से पिता को एक हिस्सा दिया जबकि हमलोग उनसे कोई मतलब नहीं रखते। अब मेरे सवाल हैं कि, मेरी माँ के विभाग से नियमतः हम तीनों को किस-किस मद में पैसे मिलने हैं। और एल आई सी तो मुझे पता क्या उनका कोई और भी देय बनता है? उनके पैसे को प्राप्त करने के लिए क्या कागजी कार्रवाई करनी होगी? कैसे मैं अपने पिता को कुछ भी लाभ प्राप्त होने से रोक सकती हूँ, क्योंकि मेरी माँ उनको पैसे नहीं देना चाहती थीं, उनका नाम सेवा पंजिका में सिर्फ इसलिए देना पड़ा क्योंकि हमतीनों नाबालिग थे। और पिता के नाम के नीचे हमतीनों के नाम भी लिखे हैं। एक महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि क्या मैं माध्यमिक शिक्षा परिषद, इलाहाबाद के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकती हूं कि उन्होंने हमारा देय अभी तक नहीं दिया, मेरी माँ की मृत्यु के 4 साल बाद भी! यदि मेरी नौकरी न लगती तो हम तीनों बहनों की हालत दयनीय होती क्योंकि हमारे पिता ने कभी हम पर या माँ पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि हम लड़कियां थे। लेकिन मेरी माँ के सारे पैसे लेने के लिए वो प्रयास कर रहे हैं।

समाधान-

प की समस्या और आप के तर्क वाजिब हैं लेकिन संपत्ति आदि का जो भी निपटारा होना है वह कानून के अनुसार ही होना है। आप की माताजी की मृत्यु के समय तक उन का आप के पिता से तलाक नहीं हो सका था। इस कारण आप की माताजी के उत्तराधिकारियों में आप तीनों बहनों के साथ साथ आप के पिता भी शामिल हैं। उन की जो भी बकाया राशि विभाग, बीमा विभाग, जीवन बीमा, प्रावधायी निधि विभाग और बैंक आदि में मौजूद हैं उन्हें प्राप्त करने का अधिकार आप चारों को है। आप चारों प्रत्येक ¼ हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

यदि आप की माताजी का पिता से विवाद चल रहा था तो उन्हें चाहिए था कि वे अपनी वसीयत लिख देतीं जिस में अपनी तमाम संपत्ति को आप तीनों बेटियों को वसीयत कर सकती थीं और आप के पिता को उत्तराधिकार से वंचित कर सकती थीं। लेकिन उन्हों ने ऐसा नहीं किया जिस के कारण आपके पिता भी उत्तराधिकार प्राप्त करने के अधिकारी हैं। उन्हें यह सब राशियाँ प्राप्त करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं हो सकता है लेकिन वे कानूनी रूप से अधिकारी हैं।

यदि कहीं या सभी स्थानों पर नामांकन आप के पिता का है तो वे यह सारी राशि प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि नोमिनी हमेशा एक ट्रस्टी होता है औऱ उस का कर्तव्य है कि वह राशि को प्राप्त कर के मृतक के सभी उत्तराधिकारियों में उन के अधिकार के हिसाब से वितरित करे। लेकिन अक्सर देखा गया है कि नोमिनी सारी राशि प्राप्त कर के उस पर कब्जा कर के बैठ जाता है और बाकी उत्तराधिकारियों को अपना हिस्सा प्राप्त करने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। इस कारण आप को चाहिए कि आप अपनी माताजी के विभाग, प्रावधायी निधि विभाग, कर्मचारी बीमा विभाग और जीवन बीमा व बैंक आदि को तीनों संयुक्त रूप से लिख कर दें कि नोमिनी होने पर भी आपके पिता को किसी राशि का भुगतान नहीं किया जाए क्यों कि ऐसा करने पर वे आप को आप के अधिकार से वंचित कर सकते हैं।

आप स्वयं अपनी माता जी के विभाग में जा कर संबंधित विद्यालय या जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय से पता कर सकती हैं कि आप की माताजी की कौन कौन सी राशियाँ विभाग के पास बकाया हैं। उन राशियों का मूल्यांकन भी आप पता सकती हैं। यदि समस्या आए तो आप सूचना के अधिकार का उपयोग कर के विभाग से ये सूचनाएं प्राप्त कर सकती हैं। जब आप को पता लग जाए कि कौन कौन सी राशिया विभाग और अन्यत्र बकाया हैं तो आप उन सब के लिए जिला न्यायालय में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकती हैं।  इस के साथ ही जिला न्यायालय में आवेदन कर के विभाग/ विभागों के विरुद्ध यह आदेश भी जारी करवा सकती हैं उत्तराधिकार प्रमाण पत्र बनने के पहले किसी को भी आप की माताजी की बकाया राशियों का भुगतान नहीं किया जाए।

इस मामले में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए आप को स्थानीय वकील की मदद लेनी होगी। इस कारण बेहतर है कि किसी अच्छे स्थानीय वकील से सलाह करें और उस के मुताबिक यह काम करें।

आप तीनों अनुकम्पा नियुक्ति नहीं चाहती हैं, आप के पिता की अनापत्ति के बिना आप  में से किसी बहिन को अनुकम्पा नियुक्ति मिल भी नहीं सकती थी। आप की अनापत्ति के बिना आप के पिता को नहीं मिलेगी। वैसे भी वे अब नौकरी प्राप्त करने की उम्र के नहीं रहे होंगे।

समस्या-

प्रभात झा ने आरा, प्रतापगंज, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे पापा दो भाई हैं। मेरे पापा और बड़े चाचा ने मिलकर जमीन खरीदी परंतु सारी ज़मीन बड़े चाचा ने अपने नाम से ले ली और पापा भी इस पर ध्यान नहीं दे सके क्योंकि वो बाहर रहकर काम करते थे। अब मेरे चाचा जी ने मौखिक रूप से जमीन बँटवारा किया है। लेकिन वो लिखित रूप से जमीन देने के लिए तैयार नही हैं, वो मनमाना ढंग से जमीन का बटवारा करना कहते हैं, साथ ही जेठांस की भी मांग करते हैं। हम लोगों के जोर देने पे वो सारा ज़मीन अपने बेटों के नाम से करने की धमकी देते हैं। हम लोगों के पास जमीन से सम्बंधित कोई दस्तावेज भी नहीं है। मैं जानना चाहता हूँ कि उस जमीन पर पापा का कितना हक़ है और क्या वह जमीन क़ानूनी रूप से दोनों भाई में बटवारा हो सकता है। अगर हाँ तो अब हमें क्या करना चाहिए? साथ ही अगर मेरे चाचा ने जमीन धोखे से अपने बेटों के नाम पर कर दी तो उस स्थिति में हम लोग जमीन पे दावा कर सकते हैं या नहीं।

समाधान-

ब भी कोई संपत्ति संयुक्त रूप से खरीदी जाए तो उस के विक्रयपत्र में इस बात का उल्लेख किया जाना चाहिए कि विक्रय मूल्य की राशि में किस का कितना योगदान है, और खरीददार कौन कौन हैं। लेकिन भारत में अक्सर ये होता है कि रिश्तेदार एक दूसरे के भरोसे में इस तरह के सौदे करते हैं और बाद में उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। हमारा कहना है कि विश्वासघात वहीं होता है जहाँ विश्वास होता है। इस कारण कम से कम चल-अचल संपत्ति और नकदी के मामलों में सहज विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि कैसे भी नहीं किया जाना चाहिए। आप के पिता ने आँख मूंद कर अपने भाई का विश्वास किया और अब उस की परेशानी न केवल वे भुगत रहे हैं बल्कि आप सभी भुगत रहे हैं।

आपके मामले में जमीन के कागजात अर्थात विक्य पत्र में आपके पिता का नाम नहीं है। लेकिन यदि उस जमीन को खरीदने में उन का भी आर्धिक योगदान है तो उस धन को जुटाने और जमीन के लिए भाई को देने के संबंध में कुछ न कुछ सबूत अवश्य होंगे। ये सबूत दस्तावेजी भी हो सकते हैं और मौखिक साक्ष्य से उन्हें साबित किया जा सकता है। य़दि आप के पिता जमीन खरीदने के लिए धन भाई को देना साबित करने की स्थिति में हों तो आप के पिता को तुरन्त भाई के विरुद्ध धोखाधड़ी के लिए पुलिस में रिपोर्ट लिखानी चाहिए। यदि पुलिस रिपोर्ट लिखने और कार्यवाही करने से मना करे तो वकील की सहायता ले कर सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर अन्वेषण के लिए पुलिस थाने को भेजे जाने का की प्रार्थना करना चाहिए। यही एक मात्र रास्ता है जिस से आप के पिता अपनी संपत्ति को वापस प्राप्त कर सकते हैं।

समस्या-

शशि भूषण कुमार ने समस्तीपुर, झितकाही, बिहार वैशाली से समस्या भेजी है कि-

दो बच्चों की विधवा माँ से शादी कर लिया और उसके दोनों बच्चों को अपना लिया। पुनर्विवाह के बाद दो और बच्चा हुआ है। पूर्वजों ने किसी के नाम वसीयत ना की। इस संपत्ति का अधिकार सब बच्चो को बराबर मिलेगा या उस विधवा के पुनर्विवाह होने के बाद जन्में बच्चो को मिलेगा?

समाधान-

पूर्वजों से चली आई संपत्ति को सहदायिक संपत्ति कहा जाता है। इस संपत्ति में केवल पुरुष संतानों को ही अब तक अधिकार मिलता था। 2005 में हुए हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के बाद से इस संपत्ति में पुत्रियों को भी अधिकार मिलना आरंभ हुआ है। इस संपत्ति में से केवल पुरुष की औरस तथा गोद ली हुई संतानो को ही उत्तराधिकार प्राप्त हो सकता है अन्य किसी को नहीं।

विधवा के पूर्व विवाह से जन्मी संतानों को किसी प्रकार का कोई अधिकार अपनी माँ के नए पति की संपत्ति या उस के पूर्वजों की संपत्ति में प्राप्त नहीं होगा। विधवा के नए पति ने बच्चों को अपनाया है तो वह उन का लालन पालन कर सकता है। स्वअर्जित संपत्ति में से कुछ भी अपनी इच्छा से दे सकता है लेकिन बच्चों को उत्तराधिकार का कोई अधिकार माता के नए पति या पूर्वजों से चली आई सहदायिक संपत्ति में उत्पन्न नहीं होता है।

विधवा की मृत्यु के बाद जो भी संपत्ति वह छोड़ कर जाएगी उस संपत्ति में उस के पूर्व पति तथा पुनर्विवाह के बाद वर्तमान पति दोनों से जन्मी संतानों को समान रूप से उत्तराधिकार प्राप्त होगा।

समस्या-

विशाल कुमार ने मवई कलाँ, मलीहा बाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या यह है कि मेरे पापा ने दो शादियाँ की थी। उनकी पहली पत्नी के लडका पैदा हुआ, उसके बाद किसी बीमारी के कारण पहली पत्नी की मृत्यु हो गई उसके बाद मेरे पापा ने दूसरी शादी की जिनका पुत्र मै हूँ।  कुछ समय बाद मेरे पापा की भी मृत्यु हो गयी। उसके बाद मेरे पापा की सारी संपत्ति 1/3 हो गई जिसमें पहले पत्नी के लडके व मेरी माँ को एवम मुझे अधिकार प्राप्त हुआ था अब मेरी माता जी की भी मृत्यु हो गई है क्या मेरी माता जी की संपत्ति मुझे अकेले को प्राप्त होगी।

समाधान-

प की माता जी को जो संपत्ति आपके पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई वह उन की व्यक्तिगत संपत्ति हो चुकी थी। अब आप की माता जी के देहान्त के उपरान्त आप के माताजी का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-15 व 16 से शासित होगा।

इन धाराओं के अनुसार सब से पहले स्त्री की संपत्ति उस के पुत्रों व पुत्रियों को प्राप्त होगी। इस तरह यदि आप के अपनी माता से कोई भाई व बहिन नहीं हैं तो फिर उनकी सारी संपत्ति आप को ही प्राप्त होगी। धारा 15 की उपधारा (2) (बी) में यह उपबंध है कि स्त्री को कोई संपत्ति यदि उस के पति या ससुर से प्राप्त हुई थी तो वह मृतका की संतानों को प्राप्त होगी। निश्चित रूप से आप का सौतेला भाई आप की माँ की संतान नहीं है। इस कारण उसे आप की माता से उत्तराधिकार के रूप में कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।

समस्या-

राजेश ने इसराना, पानीपत, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

म चार भाई बहन हैं हमारे पिता जी एक सरकारी अधिकारी थे उनकी मृत्यु के बाद, nomination होने के कारण सारे पैसे मेरी माँ के नाम हो गए हैं। बहन की शादी हो चुकी है मेरी माँ हम दोनों छोटे भाइयों के पास रहती है। बड़ा भाई 10 साल से अलग है, वो सरकारी नौकरी पर है और अलग राशन कार्ड है, और अलग मकान है। हम दोनों छोटे भाई बेरोजगार हैं पिता की खरीदी हुई गाड़ी भी वही चलाता है जो कि मेरी माँ के नाम है और अब पिता की मृत्यु के एक महीने बाद वो हमसे अपना हिस्सा मांगने लगा है, जबकि वो हमसे 10 साल से अलग है तो क्या पिता के retirement वाले और pension वाले पेसों में उसका हिस्सा है? बताइये हमें क्या करना चाहिये?.

समाधान-

प के भाई ने आप के पिता की संपत्ति में क्या क्या अधिक ले लिया है यह एक अलग विषय है। पिता की संपत्ति में आप की माँ, आप तीनों भाई और आप  की बहन सब का बराबर का हिस्सा है। आप को बराबरी से बांटने की बात करना चाहिए था। यदि आपके भाई इस से अधिक ले लिए हैं तो गलत है, यदि शादी होने के बाद बहिन को कम दिया गया है या कुछ नहीं दिया गया है तो वह भी गलत है।

किसी भी मामले में नोमिनेशन का अर्थ होता है कि नामिनेशन करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद उस के नोमिनी को उस की राशि दे दी जाए। लेकिन इस राशि को प्राप्त करने वाला केवल एक ट्रस्टी होता है उसे वह राशि मृत व्यक्ति के उत्तराधिकारियों में समानता से बाँटनी होती है।

पेंशन पर को आप की माता जी के सिवा किसी का अधिकार नहीं है क्यों कि आप भाई बहनों में कोई भी नाबालिग नहीं है। रहा सवाल रिटायर होने पर मिलने वाली ग्रेच्युटी व भविष्य निधि और अन्य राशियों की तो यह सभी उत्तराधिकारियों तीनों भाइयों, माँ और बहिन में बराबर बाँटी जानी चाहिए।

सहदायिक संपत्ति में पुत्रियों/ स्त्रियों का अधिकार

September 21, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मोहिनी देवी ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

रदादा द्वारा खरीदी गयी कृषि भूमि है जो 1956 के पूर्व खरीदी गयी है, परदादा की मृत्यु 1956 के पूर्व हुई है, मृत्यु पश्चात दादा के नाम हो गयी, दादा की मृत्यु 1956 के बाद हुई है और मेरे पिता की मृत्यु 1993 में हुई है। कृपया मुझे ये बताये की उक्त भूमि में मेरे पिता की मृत्यु पश्चात पुत्रियों का अधिकार उक्त कृषि भूमि में है क्या? इस कृषि भूमि में मेरे पिता द्वारा कोई वसीयत नही बनायीं गयी है?

समाधान-

क्त कृषि भूमि में आप का तथा आपके पिता की अन्य पुत्रियों का अधिकार है।

17 जून 1956 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी हुआ था। इस अधिनियम की धारा-6 में यह व्यवस्था थी कि जो संपत्ति सहदायिक है उस का उत्तराधिकार सर्वाइवरशिप से अर्थात प्राचीन हिन्दू विधि के अनुसार ही होता रहेगा न कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार।  सहदायिक संपत्ति का अर्थ था जो संपत्ति किसी पुत्र को उस के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हो वह सहदायिक है और उस में उस  पुरुष सन्तानों और उन की पुरुष सन्तानों को जन्म से अधिकार प्राप्त हो जाता है।

आपके परदादा की स्वयं की खरीदी हुई कृषि भूमि 1956 के पूर्व उन की मृत्यु के कारण आप के दादा को उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है। इस तरह यह संपत्ति सहदायिक हो गयी और हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने के उपरान्त भी उस में आप के पिता और यदि उन का कोई भाई हुआ तो उस को जन्म से ही अधिकार प्राप्त होता रहा। किन्तु आप को व आप की अन्य बहनों को यह अधिकार जन्मसे प्राप्त नहीं हुआ।

इस तरह की सहदायिक संपत्ति में हिस्सा रखने वाले किसी पुरुष की मृत्यु होने पर उस के हिस्से का उत्तराधिकार सहदायिक संपत्ति के दाय के उत्तरजीविता (सर्वाइवरशिप) के नियम के अनुसार होता था। किन्तु इसी अधिनियम की धारा-6 में यह प्रावधान था कि ऐसे पुरुष की मृत्यु के समय अधिनियम की अनुसूची प्रथम में वर्णित कोई ऐसी स्त्री उत्तराधिकारी या ऐसी स्त्री के माध्यम से अपना उत्तराधिकार क्लेम करने वाला पुरुष उत्तराधिकारी हुआ तो उस के हिस्से का दाय उस पुरुष की वसीयत के द्वारा और वसीयत न होने पर अधिनियम के अनुसार होगा।

आपके पिता की मृत्यु 1993 में हुई तब आप और आप की बहने मौजूद थीं। इस कारण आप के दादा की छोड़ी हुई संपत्ति में जो हिस्सा आप के पिता को प्राप्त हुआ था वह पुश्तैनी होने पर भी उस का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार हुआ और आप को तथा आप की बहनो को पिता की संपत्ति में उन की मृत्यु के उपरान्त हिस्सा प्राप्त हुआ।जब कि आप के भाई को उसी संपत्ति में जन्म से ही अधिकार प्राप्त था। उस को जितना अधिकार जन्म से प्राप्त हो चुका था। इस कारण आपके पिता की छोड़ी हुई अविभाजित संपत्ति में आप को आपके पिता की मृत्यु के दिन से ही उत्तराधिकार के कारण हिस्सा प्राप्त है। यदि आप का कोई भाई जीवित है  तो उसे भी उस संपत्ति में आप के ही समान अधिकार प्राप्त है। लेकिन आपके भाई की कोई पुत्री 2005 के पहले पैदा हो चुकी है तो उसे 2005 में धारा 6 में किए गए संशोधन के प्रभावी होने की तिथि से आप के भाई के जीवनकाल में ही अधिकार प्राप्त हो चुका है, और यदि भाई की कोई पुत्री 2005 के संशोधन के प्रभावी होने के बाद जन्मी है तो उसे जन्म से इस सहदायिक संपत्ति में अधिकार प्राप्त है।

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