संपत्ति Archive

समस्या-

संध्या कश्यप ने रेलवे पाड़ा, अडावल, जगदलपुर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

35 वर्ष से हमारे ससुर ने घर के समीप एक जमीन पर कब्जा कर रका था। उस समय पर वहाँ कोई मकान नहीं था। अब सरपंच पंचायत की जमीन बता कर दूसरो को बेच रहे हैं और हमें क्या तुम्हारे पास पट्टा है कह कर डरा रहे हैं। क्या यह जमीन हमें मिल सकती है? क्या हम लोग कोई कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं? सरपंच का काम पंचायत के लोगों को सुरक्षित करना है कि उन्हें लूटें।

समाधान-

प का घर के पास की किसी जमीन पर इतना पुराना कब्जा है इस का अर्थ ये तो नहीं कि आप उस जमीन के स्वामी हो गए हैं। यदि जमीन पंचायत की है तो वह सार्वजनिक है और उस पर कब्जा हटाने की कार्यवाही पंचायत को करने का अधिकार है। वे आप का कब्जा हटाने की कार्यवाही कर सकते हैं और किसी जरूरतमंद को जमीन मकान बनाने के लिए बेच सकते हैं। आखिर गाँव में जमीन सीमित होती है और लगातार आबादी बढ़ने से मकानों के लिए जमीन की जरूरत होती है।

लेकिन किसी भी व्यक्ति का कब्जा यदि 30 वर्ष से अधिक का है तो उसे हटाया जाना संभव नहीं है। यदि आप को आशंका है कि आप का कब्जा जबरन हटा दिया जाएगा तो आप दीवानी न्यायालय में जा कर कब्जा हटाए जाने के विरुद्ध पंचायत तथा उस के द्वारा जिस को विक्रय की जाए दोनों के विरुद्ध स्थगन आदेश प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन फिर भी उस जमीन पर आप का स्वामित्व स्थापित नहीं होगा।   उस के लिए जमीन पंचायत से खरीदनी होगी या पट्टा बनवाना पड़ेगा।

 

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समस्या-

धर्मेन्द्र सिंह ने बालोतरा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी का मकान है जिनकी मृत्यु हो गयी है। अब इस मकान पर उनका छोटा पुत्र कब्जा करना चाहता है। मेरी दादीजी जिंदा है वो यह मकान नहीं देना चाहती हैं। ये मकान दादीजी के नाम करवाना है और उनके छोटे पुत्र को बाहर निकलना है। इसके लिए मैं क्या करुँ?

समाधान-

प के दादा जी का देहान्त होने के पहले उन्हों ने कोई वसीयत नहीं की है। आप के दादा जी के देहान्त के साथ ही उन का उत्तराधिकार खुल गया है औोर उन की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उन के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो चुकी है। आप के दादा जी के उत्तराधिकारी, उन के पुत्र, पुत्रियाँ, मृत पुत्र/ पुत्रियों की पत्नी/ पति और उन की संतानें, उन की पत्नी (आप की दादीजी) हैं। ये सभी उस मकान के संयुक्त रूप से स्वामी हो चुके हैं। आप के दादाजी के छोटे पुत्र को भी उस मकान के स्वामित्व में हिस्सेदारी प्राप्त हुई है। इस हिस्सेदारी से उसे अलग नहीं किया जा सकता।

आप की दादी या अन्य कोई भी उत्तराधिकारी यह कर सकता है कि मकान के बंटवारे का दावा करे और सब को अलग अलग हिस्सा देने की राहत प्रदान करने की मांग करे, या फिर यह भी राहत मांगी जा सकती है कि आप के दादाजी के छोटे पुत्र को उस के हिस्से की कीमत अदा कर के उस मकान से बेदखल करने की डिक्री की मांग की जाए। इस बीच अस्थाई निषेधाज्ञा जारी कराई जा सकती है कि दादाजी का छोटा पुत्र न्यूसेंस पैदा न करे। यदि वह फिर भी कुछ गड़बड़ करता है या तंग करता है तो दादी जी की ओर से महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा का प्रतिषेध अधिनियम में कार्यवाही की जा सकती है।

 

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हक तर्क करना या रिलीज डीड निष्पादित करना क्या है?

June 15, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

सुरेन्द्र पाल सिंह ने बालोतरा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या किसी नाबालिग (18 वर्ष से कम) के नाम जमीन का हक तर्क किया जा सकता हे? हक तर्क करने के नियम क्या है ?  हक तर्क से सम्बंधित नियम और कानून की जानकारी कौन सी किताब या नियमावली या अधिनियम में मिल सकती है? जानकारी प्रदान करवाने की कृपा करावे।

समाधान-

क तर्क करना अथवा रिलीजी डीड निष्पादित करने का अर्थ है किसी संपत्ति में अपने अधिकार को किसी दूसरे के हक में छोड़ देना है। लेकिन  इस के लिए जरूरी है कि जो हक तर्क कर रहा है और जिस के हक में हक तर्क किया जा रहा है दोनों एक ही सम्पत्ति में हिस्सेदार हों और संपत्ति संयुक्त हो। जैसे किसी व्यक्ति के देहान्त के उपरान्त उत्तराधिकार में संपत्ति उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाती है। तब कोई एक या अधिक उत्तराधिकारी किसी दूसरे उत्तराधिकारी के हक में अपना हक छोड़ सकते हैं। दो लोगों ने संयुक्त रूप से संपत्ति खरीदी हो और दोनों संयुक्त स्वामी हों तो उन में से एक दूसरे के हक में हक त्याग कर सकता है।
हक तर्क करने वाले का वयस्क होना जरूरी है।  जिस के हक में हक तर्क किया जा रहा है उस का बालिग होना जरूरी नहीं है वह नाबालिग हो सकता है। हक तर्क करना एक प्रकार से संपत्ति का हस्तान्तरण है और 100 रुपए से अधिक मूल्य की अचल संपत्ति के हस्तान्तरण का पंजीकरण होना जरूरी है। यदि हक तर्क की जाने वाली सम्पत्ति का मूल्य यदि 100 रुपए से अधिक है और वह अचल संपत्ति है तो हक तर्क करने के दस्तावेज का पंजीकृत होना जरूरी है।
हक तर्क करने / रिलीज डीड निष्पादन के मामले में दो अधिनियम सामने हैं। एक तो संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम और दूसरा पंजीकरण अधिनियम। पंजीकरण के लिए स्टाम्प ड्यूटी और फीस का पता करना भी जरूरी है क्यों कि रिलीज डीड पर पंजीकरण शुल्क अन्य हस्तान्तरणों से कम है।

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व्यर्थ मुकदमे में भी प्रतिरक्षा करना जरूरी है।

June 14, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

शिवानी ने इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे ताऊजी का अपनी पत्नी से 2008 से घरेलू हिंसा का मुकदमा चल रहा है, जिस में न्यायालय ने सितम्बर 2016 में निर्णय देते हुए भरण पोषण के लिए 5000 रूपये प्रति माह देने और 20000 रुपए एक मुश्त क्षतिपूर्ति देने के लिए कहा है। ताऊजी सेंट्रल गवर्नमेंट के पेंशनर है और चलने फिरने उठने बैठने में असमर्थ है। उनके कोई संतान नहीं है। लड़का था, उसकी मृत्यु 2005 में रोड एक्सीडेंट में हो गयी थी। ताऊजी की देखभाल मेरी माँ करती है । वह भी केंद्रीय कर्मचारी है । मेरे पिताजी की भी मृत्यु हो चुकी है 1994 में। मेरे चाचा भी हैं हम सभी एक घर में रहते हैं। चाचा ने बटवारे का मुकदमा दर्ज किया था 2008 में, जिस में  प्राथमिक डिक्री 2011 में हुई जिसमें चाचा का एक तिहाई हिस्सा घोषित किया गया। फाइनल डिक्री के लिए मेरी माँ की तरफ से 2017 जनवरी में आवेदन दिया गया है जो विचाराधीन है। मैं जानना चाहती हूँ की क्या ताऊ जी के हिस्से में ताईं जी का भी हिस्सा बनता है? ताऊजी के मरने के बाद ताऊ जी ने अपनी रजिस्टर्ड वसीयत मेरे यानि अपनी भतीजी के नाम कर रखी है। ताईजी क्या हिस्से की मांग कर सकती है। डाइवोर्स का केस ख़ारिज हो चुका है। ताई जी का कहना है कि वह परेशान करने के लिए ये सब कर रही है, मुझे कुछ मिले न मिले वकीलो को दिलवाऊंगी और भरना पोषण के लिए और ज्यादा पैसों की मांग के लिए 127 में केस करुंगी। ताऊजी की जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है मार्गदर्शन करें।क्योंकि मेरी माँ ही उनकी देखभाल करती है तो यदि ताऊजी को कुछ हो जाता है तो उसमें मेरी माँ को तो कोई दिक्कत नहीं हो जायेगी। क्योंकि ताई जी ने माँ के ऊपर भी ताऊजी से सम्बन्ध के आरोप लगाए हैं।

समाधान-

केवल आरोप लगा देने से कोई चीज सिद्ध नहीं हो जाती। और कानूनी निर्णय और अधिकार ठोस सबूतों पर निर्भर करते हैं। आप की माँ पर आरोप लगा देने से उन का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। उन्हें कानून की तरफ से कोई परेशानी नहीं होगी। ताऊजी का जो हिस्सा है यदि उन्हों ने उसे वसीयत कर दिया है तो उस का दाय वसीयत के अनुसार होगा बशर्ते कि ताऊजी और कोई वसीयत न करें या की हुई वसीयत में अपने जीवनकाल में कोई बदलाव न करें।

जहाँ तक नाराज और बदले पर उतारू ताईजी का प्रश्न है तो वे कुछ भी कर सकती हैं। वे जितने चाहें मुकदमे करें। आप और आप की माँ पर उस का कोई असर नहीं होगा। हाँ वे यह कर सकती हैं ताऊजी के जीवनकाल के उपरान्त वसीयत को चुनौती दे दें। तब आप को फिजूल में मुकदमा लड़ना पड़ सकता है। आप को कोई अन्य फर्क नहीं पड़ेगा। पर यह भी याद रखें कि यदि किसी के विरुद्ध बेकार और बेदम मुकदमा भी होता है और उस में प्रतिरक्षा ठीक से न की जाए तो उस से नुकसान भी हो सकता है। इस लिए सावधान रहना और अपनी प्रतिरक्षा करने की सजगता रखना आप के लिए आवश्यक है।

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आप ने मकान का स्वामित्व नहीं बल्कि केवल कब्जा खरीदा है।

June 12, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राधेश्याम ने इंदौर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी ने २०१२ में इंदौर में एक मकान ३०० वर्गफुट जिस पर चद्दर का शेड है, 1,25,000/- रूपये में ख़रीदा था, जिसकी १०० रूपये के स्टाम्प पर नोटरी करायी गयी थी! उस वक़्त पिताजी के पास रजिस्ट्री कराने के पैसे उपलब्ध नहीं थे इसलिए उस वक़्त सिर्फ नोटरी कराकर कब्ज़ा हासिल कर लिया था, बाद में पैसे आने पर जब पुराने मकान मालिक से रजिस्ट्री कराने के लिए कहा तो उसने साफ़ इनकार कर दिया और कहा कि मकान का अब न तो हमारे पास पट्टा है और न हॉं कोई लिखा पढ़ी है ! जबकि पुराना मकान मालिक उस मकान में पिछले बीस वर्षों से रह रहा था! और नगर पालिका में संपत्ति कर भी भर रहा था, जो की अब हम भर रहे हैं, लेकिन मकान मालिक के नाम से (हस्ते में पिताजी का नाम)। एक नयी बात पता चली कि उस मकान सम्बन्धी और आसपास के मकान पर जमीन विवादित कोर्ट में केस चल रहा है। लेकिन अभी तक हमारे पास उक्त सम्बन्ध में कोई भी नोटिस या कानूनी तौर पर किसी ने कुछ भी नहीं कहा। सिर्फ आसपास वाले ही हमें भयभीत करते है कि आपने यह मकान क्यों लिया यह तो कभी भी टूट सकता है। मेरे पिताजी मकान में दूसरी मंजिल बनाना चाहते हैं परन्तु अनचाहे डर से भयभीत हैं! मेरे पिताजी की उम्र ७५ वर्ष है, और इस विषय को लेकर वो बहुत चिंतित रहते हैं! इस स्थिति में हमें क्या कदम उठाना चाहिए?

समाधान-

प के पिताजी ने 300 वर्गफुट जमीन और उस पर बने मकान को खरीदा नहीं है बल्कि केवल खरीदने का सौदा किया है। किसी भी अचल संपत्ति का जिस का मूल्य 100 रुपये या उस से अधिक का हो खऱीदना तभी पूर्ण हो सकता है जब कि उस का विक्रय पत्र पंजीकृत करवा दिया हो। इस कारण जो नोटेरी से प्रमाणित दस्तावेज है वह केवल मकान खरीदने का एग्रीमेंट या अनुबंध है।

किसी भी वस्तु को वही विक्रय कर सकता है जिस का वह स्वामी हो या स्वामी से उसे उस वस्तु को विक्रय करने का लिखित अधिकार मुख्तार नामे से प्राप्त हो। आप बता रहे हैं कि विक्रेता के पास न तो पट्टा है और न ही कोई लिखा पढ़ी है। इस से पता लगता है कि उक्त विक्रेता के पास भी उस मकान का कब्जा ही है हो सकता है यह कब्जा बीस वर्ष से बना हुआ हो। इस प्रकार आप के पिताजी ने उस व्यक्ति से केवल उस मकान का कब्जा खरीदा है जो उस व्यक्ति के पास था।

अब आप को यह पता करना चाहिए कि वह जमीन किस की है और उस पर कैसा मुकदमा चल रहा है। यह तो स्थानीय रूप से पता करने पर ही पता चल सकता है। नगर निगम आदि से यह पता किया जा सकता है कि वह जमीन किस की है। उसी से यह भी पता लग सकता है कि यदि कोई मुकदमा चल रहा है तो वह किस का किस के विरुद्ध हो सकता है। आम तौर पर यदि वह जमीन किसी की निजी हुई तो उस पर से आप को कोई हटा नहीं सकेगा। बस आप को प्रमाणित करना पड़ेगा कि जिस व्यक्ति ने आप को कब्जा बेचा है वह उस पर बीस वर्ष से काबिज था। और उस जमीन या मकान से संबंधित मुकदमे से बेचने वाले का कोई लेना देना नहीं था। वैसे भी जिस मूल्य में आप के पिताजी ने मकान लिया है उस में इसी तरह का विवादित भूखंड मिल पाना इंदौर नगर में  मुमकिन था। हो सकता है कभी उस मामले में निर्णय हो जाए और बाद में नगर निगम या न्यास आदि वहाँ काबिज लोगों को पट्टे जारी कर दे। तब आप के पिताजी उस संपत्ति के स्वामी हो जाएँ। पर इस सब के लिए सतर्क रहना होगा और पट्टा जारी करने की कार्यवाही करते रहना होगा। तब तक यदि आप दूसरी मंजिल बनाना चाहते हैं तो बना कर रह सकते हैं। जितना रिस्क इस संपत्ति के छिनने का है उतना ही दूसरी मंजिल का भी होगा। पर कब्जा बना कर उसी मकान में रहते रहेंगे तब ही इस संपत्ति को आप बचा सकेंगे।

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बंटवारे का वाद प्रस्तुत कर न्यायालय से बंटवारा कराएँ।

June 10, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

उमाकान्त ने देवी तहसील सौसर, जिला छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

दादाजी ने अपने जीवनकाल में कोई बंटवारा नहीं किया और न ही नाप के हिसाब से जोतने के लिए दिया। लेकिन उन की मृत्यु के बाद जिन्हें जोतने को ज्यादा मिला वे बंटवारा नहीं चाहते लेकिन बाकी हिस्सेदार बंटवारा चाहते हैं। हमन कुछ कानूनी कार्यवाही की लेकिन उन्हों ने जानपहचान से रद्द करवा दी। बताए हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

प ने क्या कानूनी कार्यवाही की यह नहीं बताया। हमें लगता है कि आप ने कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की बल्कि आप राजस्व अधिकारियों को फिजूल मैं आवेदन देते रहे। अब आप की समस्या का हल न्यायालय द्वारा बंटवारे में है। आप ने यह भी नहीं बताया है कि दादाजी के देहान्त के बाद नामान्तरण भी हुआ है या नहीं। यदि नहीं हुआ है तो नामान्तरण कराना चाहिए।

यदि नामान्तरण हो गया है तो ठीक वर्ना नामान्तरण की कार्यवाही के साथ साथ आप को चाहिए कि आप राजस्व न्यायालय में अपनी जमीन के बंटवारे, खाते अलग अलग करने और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा दिलाए जाने के लिए वाद प्रस्तुत करें। बाकी सभी हिस्सेदार और राज्य सरकार जरिए तहसीलदार पक्षकार बनेंगे। यह वाद तब तक चलेगा जब तक कि बंटवारा हो कर सब को अपने अपने हिस्से पर अलग कब्जा न मिल जाए।

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समस्या-

रोहन ने लुधियाना, पंजाब से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे नाना का देहान्त2015 में हुआ। वो हमारे साथ लुधियाना ही रहते थे। सारी संपत्ति हरदोई उत्तर प्रदेश में है। मृत्यु के पहले उन्हों ने वसीयत की इच्छा की थी, वो हमने करवाई। उन्हों ने 4 हिस्सों में अपनी सम्पति वसीयत की क्यों कि उनके 3 लड़के थे। चौथा हिस्सा उन्हों ने हमारी मां को वसीयत किया। उत्तराधिकार में उस सम्पति का नामान्तरण नायब की कोर्ट से 3 लोगो के हक़ में था। बाद में वसीयत दाखिल की हमने और तहसीलदार ने पंजीकृत वसीयत के आधार पर मेरी माँ का नाम भी नामान्तरण करवा दिया। समस्या ये है कि आर्डर के 70 दिन बाद एक मामा ने आर्डर के खिलाफ अपील की है। क्या अपील अवधि बाधित नहीं है?  क्या नामान्तरण हो जाने से भी हमें कोई लाभ नहीं मिलेगा? नाना ने चौथा हिस्सा हमारे नाम किया है क्या उस पे हम कब्जा नहीं ले सकते।  वसीयत के समय छोटे मामा साथ थे, उन्होंने हमारे हक़ में एफिडेविट भी लगाया था । क्या एसडीएम ऑर्डर बदल सकते हैं। हम को कब्जा कैसे मिलेगा एग्रीकल्चर लैंड का,वो 14 बीघा का है? उसका पार्टीशन कैसे करवाए? उसका अलग खाता कैसे करवाएँ?

समाधान-

दि  किसी नामान्तरण के मामले में वसीयत प्रस्तुत हो और  उसे चुनौती दी जाए तो तहसलीदार या नायब उस मामले में नामान्तरण नहीं कर सकता। वैसी स्थिति में नामान्तरण कराने के लिए न्यायालय ही जाना होगा। इस  मामले में आप ने जब वसीयत पेश की तो तहसलीदार ने अन्य पक्षकारों को बुलाया या नहीं या आपत्तियाँ ली या नहीं उस पर बहुत कुछ निर्भर करता है। अपील तो व्यथित पक्षकार का अधिकार है, इस कारण उस पर सुनवाई होगी और तभी उस का निर्णय होगा। अपील यदि अवधि बाधित है तो आप अपील में यह आपत्ति ले सकते हैं। यदि वसीयत में कोई खेोट नहीं है तो अपील भी आप की माँ के पक्ष में निर्णीत हो जाएगी। लेकिन अपील आप के हक में निर्णीत हो जाने मात्र से आप को जमीन का कब्जा नहीं मिल जाएगा। .

नामान्तरण से किसी भी कृषि भूमि में उस के हिस्सेदारो का हिस्सा निर्धारित हो जाता है लेकिन भूमि संयुक्त बनी रहती है उस पर सभी हिस्सेदारों का संयुक्त स्वामित्व बना रहता है। अलग अलग खाता करने के लिए और अपने खाते की भूमि पर अलग कब्जा प्राप्त करने के लिए आप की माता जी को संयुक्त स्वामित्व की भूमि के बंटवारे और अपने हिस्से पर कब्जा दिलाए जाने का दावा करना पड़ेगा। चूँकि नामान्तरण आज भी आप के पक्ष में है इस कारण आप यह दावा तुरन्त कर सकते हैं। आप को अपील का निर्णय होने का इन्तजार किए बिना बंटवारे का दावा कर देना चाहिए।

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समस्या-

अनिल ने भोपाल, मध्य प्रदेश से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी के नाम एक मकान है। मेरे पिता वर्ष २००३ से लापता हैं। मेरे पिता ४ भाई हैं। तीनों भाइयों ने मुझे ये मकान मौखिक हिस्से में दे दिया था। मैं २० बर्षो से इस मकान कि देख रेख व टेक्स देता आ रहा हूँ।  मकान पर मेरा कब्ज़ा है तथा किरायेदार भी मुझे ही किराया देते हैं। वर्ष २०१२ में मैंने मकान का नामांतरण अपनी माँ के नाम से करा लिया था।  अब उन्होंने उससे निरस्त करा के उसे मेरी दादी के नाम करा लिया है? क्या वे उसे बेच सकती हैं? उन्हें कैसे रोका जाये?

समाधान-

नामान्तरण किसी भी प्रकार से स्वामित्व और स्वामित्व के हस्तांतरण को प्रकट नहीं करता है। आप का उस मकान पर 20 वर्षों से कब्जा है, इस कारण कोई आप को उस मकान से बेदखल नहीं कर सकता। किन्तु मौखिक बंटवारे में आप को मकान मिला था इसे साबित करना आसान नहीं होगा। देख-रेख करना और टैक्स जमा करने मात्र से यह उपधारणा नहीं ली जा सकती है कि वह मकान आप को मौखिक बंटवारे में दे दिया गया था। यदि यह साबित होता है कि कोई बंटवारा नहीं हुआ था तो दादाजी के मकान और शेष संपत्ति का बंटवारा होना चाहिए और उस स्थिति में उन के सभी उत्तराधिकारियों को उस का हिस्सा मिलना चाहिए।

आप के पिता 2003 से लापता हैं तो आप दीवानी न्यायालय में घोषणा का दावा कर के उन्हें मृत घोषित करवा सकते हैं और इस घोषणा के आधार पर मृत्यु प्रमाण पत्र आप को मिल सकता है। वैसी स्थिति में आप अपने पिता के उत्तराधिकारी हो जाएंगे। चूंकि दादी के नाम मकान का नामान्तरण हो जाने से वह मकान दादी का नहीं हो जाता बल्कि संयुक्त संपत्ति बना रहता है। इस कारण उन्हें इस मकान को बेचना तो नहीं चाहिए। फिर भी ऐसी कोशिश हो सकती है। इस के लिए स्थाई निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत कर विक्रय पर अस्थाई   निषेधाज्ञा प्राप्त की जा सकती है। इस वाद में आप यह कथन कर सकते हैं कि आप के पिता 14 वर्षों से लापता है इस कारण साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत उपधारणा के अंतर्गत उन्हें मृत माना जाना चाहिए और आप उन के उत्तराधिकारी होने के नाते यह वाद प्रस्तुत कर रहे हैं।

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भाई आप से मकान छीन नहीं सकेंगे।

June 4, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अंगद ने बेगूंसराय, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता ने सन 1969 एक जमीन मेरे बडे भाई के नाम से खरीदा, उस समय मेरे बड़े भाई की उम्र 19 या 20 साल थी मेरी उम्र 15 साल थी। सन 1995 ई. में हम दोनो भाई ने उस जमीन पर एक सयुंक्त घर बनाया। जिस में दो अलग अलग पलैट हैं। दोनो भाई ने अपना अपना पलैट अपने अपने पैसा से बनाया। जिस में हम दोनो भाई आज भी रह रहे हैं। जिस समय मैं ने उस जमीन पर घर बनाना आरंभ किया उस समय तक मुझे पता नहीं था कि वह जमीन मेरे भाई के नाम है और मेरे बडें भाई ने भी मुझे नहीं बताया था। मुझे लगता था की वह जमीन मेरे पिता के नाम हैं। इसका पता मुझे अब चला कि वह जमीन मेरे भाई के नाम है। अब मेरे बडा भाई मुझे कहता है कि मेरी जमीन व घर खाली करो। मेरे माता व पिता का देहांत हो चुका हैं। बहुत मेंहनत से मैंने अपना घर बनाया है मैं भूतपूर्व फौजी हूँ। बताएं कि मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

मीन आप के पिताजी ने खरीदी थी लेकिन भाई के नाम है इस कारण प्राथमिक रूप से उस भूमि का स्वामी आप के भाई हैं। जब तक आप यह साबित नहीं कर देते कि यह जमीन पिताजी ने भाई के नाम से खरीदी जरूर थी लेकिन पूरे परिवार के लाभ के लिए खऱीदी थी।

आप उस जमीन पर मकान बना चुके हैं। आप ने अपने पैसे से बनाया है तो आप यह साबित कर सकते हैं कि इस मकान को आप ने अपने धन से खुद बनाया है।

आप को इस मकान को बना कर उस में रहते हुए 22 वर्ष हो चुके हैं। आप के भाई यदि अदालत में यह दावा करें कि आप से उस मकान का कब्जा दिलाया जाए तो यह दावा लिमिटेशन के आधार पर ही खारिज हो जाएगा क्यों कि कब्जे का दावा केवल 12 वर्ष की अवधि में किया जा सकता है। मकान में बिजली और नल के कनेक्शन भी आप के नाम से होंगे। वोटर कार्ड आदि में भी पिछले 22 वर्ष से आप के नाम अंकित होंगे। आप 22 वर्ष का पजेशन उक्त संपत्ति पर अच्छे से साबित कर सकते हैं। इस तरह आप का कब्जा मकान पर प्रतिकूल कब्जा है।

आप के भाई आप को मकान खाली करने को कहें तो उन्हें कहें कि मकान तो मेरा है और मैं खाली नहीं कर रहा हूँ और यदि वे समझते हैं कि यह मकान उन का है तो वे अदालत में दावा कर दें अदालत फैसला कर देगी। जब अदालत में दावा पेश हो तो दावे की प्रतिलिपि आप को मिल जाए तब आप किसी अच्छे दीवानी मामलों के वकील से सलाह ले कर मुकदमे में अपनी प्रतिरक्षा करें। आप के भाई आप से उस मकान को किसी स्थिति में नहीं छीन सकते।

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किराएदार को परिसर खरीदने का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता।

May 31, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राधेश्याम सिंह ने सीरमपुर, पश्चिम बंगाल से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी करीब 50 साल से किराएदार हैं, घर के मालिक का निधन के बाद किराया नियंत्रण न्यायालय में जमा कराते हैं। अब हम लोगों का प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत नम्बर आया है। हम ये घर खरीदना चाहते हैं लेकिन दिवंगत मकान मालिक के छह बेटों में से कोई राजी नहीं हो रहा है। कृपया बताएँ कि क्या कानूनी तरीके से हम इस घर को खऱीद सकते हैं कि नहीं?

समाधान-

संपत्ति का अधिकार एक मूल अधिकार है। इसे बाधित किया जाना संभव नहीं है। यदि कोई मकान मालिक अपना मकान बेचना नहीं चाहता है तो उसे बाध्य नहीं किया जा सकता है।  मैं यहाँ अनेक बार लिख चुका हूँ कि किराएदार हमेशा किराएदार ही रहेगा चाहे वह पूरे सौ साल तक किराये पर उस संपत्ति में रह ले। उसे किराए वाले मकान का मालिक बनने का कोई अधिकार नहीं है। एक लंबे समय तक किसी परिसर में किराए से रह लेने से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता है।

इस तरह जब तक स्वयं मकान मालिक ही अपना मकान बेचने को तैयार न हो तो किराएदार को यह अधिकार भी नहीं कि वे किसी भी प्रकार से मकान मालिक पर घर बेचने के लिए कोई दबाव  बना सकें। इस तरह का कोई कानून नहीं है। हमारी राय है कि आप को प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत घर खरीदने की सुविधा मिल रही  है तो उस का उपयोग कर कैसा भी घऱ जो कहीं भी हो खऱीद लें और इस मकान में जिस में आप लोग रह रहे हैं उस के मोह में न पड़ें।

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