संपत्ति Archive

चैक का भुगतान बैंक को लिख कर रुकवाना भी चैक अनादरण ही है।

June 24, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मैंने किसी व्यक्ति को उसके नाम से अगले महीने की डेट का चेक दिया हैतो क्या मैं उसे कैंसिल करवा सकता हूं। क्या वह मुझ पर केस कर सकता है?   मैंने उससे कोई उधार नहीं लिया है।

-राजीव यादव, आवास विकास, रुद्रपुर

समाधान-

कोई भी चैक आप ने किसी को दिया है तो वह उसे बैंक में समाशोधन के लिए प्रस्तुत कर सकता है। यदि चैक किसी भी वजह से डिसऑनर होता है तो चैक धारक आप को चैक की राशि का भुगतान करने के लिए 15 दिन मे ंकरने की लिखित सूचना देगा। आप नोटिस मिलने से 15 दिन में यदि राशि का भुगतान नहीं करते हैं तो आप के विरुद्ध धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनयम के अंतर्गत परिवाद न्यायालय में दाखिल किया जा सकता है।

यदि आप ने चैक किसी दायित्व के अधीन नहीं दिया है तो भी चैक धारक आप के विरुद्ध परिवाद दे सकता है। क्यों कि चैक के मामले में अदालत द्वारा  यह  माना जाएगा कि चैक किसी दायित्व के अधीन दिया गया था। आपको यह साबित करना होगा कि चैक किसी दायित्व के अधीन नहीं दिया गया था।

आप को चैक रुकवाने के लिए बैंक में आवेदन देना होगा कि चैक का भुगतान न किया जाए। लेकिन आप को तब बैंक को यह भी लिखना चाहिए कि वह चैक दायित्व के अधीन नहीं दिया गया था तो किस कारण से दिया गया था। जब आप को नोटिस मिल जाए तो भी आप नोटिस का जवाब देते हुए कहें कि यह चैक दायित्व के अधीन नहीं था। बल्कि अमुक कारण से दिया गया था।

एक बार चैक डिसऑनर हो जाने के बाद और नोटिस कानून के मुताबिक आप को मिल जाने के बाद केस तो हो ही सकता है, आप को लड़ना भी पड़ेगा और अपनी सफाई पेश करनी होगी अन्यथा कुछ भी निर्णय हो सकता है।

समस्या-

पटना से हर्ष कुमार ने पूछा है-

म तीन भाई थे,  जिसमें सबसे बड़ा मैं हूँ और मेरे बाद वाले भाई का निधन हो गया, जिसकी पत्नी से सबसे छोटे भाई ने  शादी कर लिया।  तो कृपया मुझे ये बताएं कि मेरे पुस्तैनी संपत्ति में सबसे छोटे भाई का क्या हिस्सा होगा?  क्या मंझले भाई की पत्नी के छोटे भाई से शादी करने के बाद उनका हिस्सा भी छोटे भाई को हस्तांतरित हो जायेगा।

समाधान-

मँझले भाई की मृत्यु के साथ ही मँझले भाई का हिस्सा उस की पत्नी को मिल गया है। यदि उस के कोई संतान थी तो आधा संतान को आधा उस की पत्नी को मिला है। वह तो उस का हो चुका। शादी कर लेने के कारण उस से वापस नहीं लिया जा चुका है। यदि आप के कोई बहिन नहीं है तो जमीन के आप, छोटा भाई और मँझले की पत्नी तीनों बराबर के हिस्सेदार हैं। पत्नी की जमीन पर छोटे भाई का कोई अधिकार नहीं है। वह उस की पत्नी को उस से विवाह के पहले ही मिल चुका था।

अब आगे आप तीनों के जीवन काल में यह हिस्से इसी तरह रहने हैं। जीवन काल के बाद जिस की मृत्यु होगी उस के उत्तराधिकारियों को मृतक की संपत्ति प्राप्त होगी।  हाँ एक छूट जरूर है कि आप चाहेँ तो अपना अपना हिस्सा किसी और को बेच सकते हैं। एक दूसरे को रिलीज कर सकते हैं या फिर बेच सकते हैं उस पर कोई पाबंदी नहीं है।

समस्या-

अनिल कुमार साहू ने धमतरी, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

म लोग 4 भाई और एक बहन हैं। पिताजी गुजर गए हैं, माता जी जीवित है। मेरा शासकीय नॉकरी के चलते गाँव से बाहर रहना होता है। घर मे 34 एकड़ खेती है। मैं परिवार से सम्बन्ध ठीक ना होने के चलते अपना बंटवारा पाना चाहता हूँ। किन्तु मेरे भाइयो के द्वारा माँ से बंटवारा ना देने की बात को बोलवाया जा रहा है। अब वो अपने जीते जी बंटवारा नहीं होने देना चाहती। क्या किया जा सकता है?

समाधान-

प गाँव छोड़ कर बाहर चले गए हैं। भाई ही जमीन को कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में वे चाहते हैं कि आप अपना हिस्सा छोड़ दें और उन से कुछ न लें। माँ के सामने भाई आप  को आप का हिस्सा देने से मना नहीं करना चाहते। माँ के बाद तो कह देंगे कि तुम ले के देख लो। इस कारण माँ को सिखा रखा है कि पुश्तैनी जमीन का तेरे सामने बंटवारा कैसे होने दें?

बेहतर तरीका यही है कि माँ को समझाइए कि वह अपने सामने संपत्ति के हिस्से कर दे। बाद में तो कोर्ट कचहरी करनी ही पड़ेगी। यदि माँ तैयार नहीं होती है तो आप को बंटवारे और अपने हिस्से पर पृथक कब्जे का वाद संस्थित कर दें। इस के लिए स्थानीय वकील की मदद से कार्यवाही करें।

वसीयत और हक-त्याग विलेख में क्या अन्तर हैं?

May 22, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

लालसोट, जिला दौसा, राजस्थान से अर्जुन मीणा ने पूछा है-

हक त्याग और वसीयत नामा में क्या अंतर है क्या कोई पुरुष या औरत हक त्याग करने के बाद उसकी संपत्ति वापस ले सकती है या नहीं?

समाधान-

क-त्याग हमेशा संयुक्त संपत्ति में अर्थात ऐसी संपत्ति में होता है जिस के एक से अधिक स्वामी हों। यह संपत्ति या तो पुश्तैनी हो सकती है या फिर  संयुक्त रूप से खरीदी गयी हो सकती है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद संपत्ति हमेशा संयुक्त हो जाती है क्यों कि मृत्यु के साथ ही उस के तमाम उत्तराधिकारी उस संपत्ति के संयुक्त स्वामी हो जाते हैं। यदि इन संयुक्त स्वामियों में से कोई एक या अधिक व्यक्ति उस संपत्ति में अपना अधिकार किसी अन्य संयुक्त स्वामी के पक्ष में त्याग दें तो हक त्याग करने वाले का हिस्सा उस संयुक्त स्वामी को मिल जाता है जिस के हक में हक-त्याग विलेख निष्पादित कराया गया है। संपत्ति में हक-त्याग विलेख से संपत्ति का हस्तांतरण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हो जाता है इस कारण इस विलेख का पंजीकृत होना भी आवश्यक है। पंजीकृत कराए बिना हक-त्याग विलेख का कोई मूल्य नहीं है।

क व्यक्ति  जिस संपत्ति का स्वामी है उस संपत्ति को पूरा या उस का कोई भाग किसी अन्य व्यक्ति के नाम वसीयत कर सकता है। वसीयत पर किसी तरह की कोई स्टाम्प ड्यूटी नहीं है और न ही उस का पंजीकृत कराया जाना जरूरी है। इस कारण वसीयत किसी सादा कागज पर भी हो सकती है, किसी भी मूल्य के स्टाम्प पर लिखी जा कर रजिस्टर भी कराई जा सकती है। वसीयत के लिए जरूरी है कि वसीयत करने वाला वसीयत (इच्छा-पत्र) पर अपने हस्ताक्षर कम से कम दो गवाहों की उपस्थिति में करे और वे दो गवाह भी अपने हस्ताक्षर वसीयत पर करें। वसीयत को पंजीकृत भी कराया जा सकता है। इस का लाभ यही है कि तब वसीयत का वसीयतकर्ता द्वारा दो गवाहों के समक्ष निष्पादित किया जाना प्रथम दृष्टया साबित मान लिया जाता है। इस के विपरीत कोई आपत्ति करे तो वह आपत्ति आपत्ति कर्ता को साबित करनी होती है। लेकिन वसीयत से संपत्ति का हस्तान्तरण तब तक नहीं होता जब तक कि वसीयतकर्ता की मृत्यु नहीं हो जाती। उस  की मृत्यु के साथ ही वसीयत प्रभावी हो जाती है और संपत्ति का हस्तान्तरण हो जाता है। लेकिन वसीयत को वसीयतकर्ता कभी भी निरस्त कर सकता है। कभी भी उसी संपत्ति के संबंध में दूसरी वसीयत कर सकता है।  दूसरी वसीयत पहली से भिन्न हो सकती है। एक ही संपत्ति के बारे ेमें कई वसीयतें हो सकती हैं। यदि अनेक वसीयतें हों तो वसीयत कर्ता ने जो वसीयत अंतिम बार की होगी वह मान्य होगी।

क्त विवरण से आप समझ गए होंगे कि वसीयत और हक-त्याग में क्या भिन्नता है। हक-त्याग केवल सहस्वामी के पक्ष में हो सकता है।  हक-त्याग एक बार होने पर निरस्त नहीं हो सकता। वसीयत वसीयतकर्ता कभी भी निरस्त कर सकता है या दूसरी बना सकता है। हक-त्याग विलेख यदि पंजीकृत है तो वह हक-त्याग करने वाले की इच्छा से निरस्त नहीं कराया जा सकता। हाँ उस में कोई अवैधानिकता हो तो उसे कानून के अनुसार न्यायालय में दावा कर के जरूर निरस्त कराया जा सकता है।

समस्या-

मेरे मामा जी ने मेरी माँ को एक घर गिफ्ट दिया उस पर क्या मेरा या मेरे बेटे का कोई अधिकार है? 

कृष्ण लाल. श्री गंगानगर, राजस्थान 

समाधान-

 

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा-14 कहती है कि किसी भी स्त्री द्वारा जो भी संपत्ति धारण की जा रही है वह स्त्री उस की पूर्ण स्वामी होगी। इस तरह किसी भी हिन्दू स्त्री को कहीं से भी किसी भी प्रकार से कोई भी संपत्ति प्राप्त हो वह उस की पूर्ण संपत्ति होती है और उस के जीवनकाल में उस पर किसी का कोई अधिकार नहीं होता। उस स्त्री के देहान्त के उपरान्त यदि उस स्त्री ने कोई वसीयत नहीं की हो तो वह संपत्ति उस स्त्री के उत्तराधिकारियों को उत्तराधिकार में प्राप्त हो जाती है।

इस कारण  से आप की माँ को जो घऱ उपहार में आप के मामा से मिला है उस में आप का व आप के पुत्र का कोई अधिकार नहीं है। आप की माताजी के जीवन काल के बाद वह घर उत्तराधिकार में आप को प्राप्त हो सकता है, यदि आप की माता जी उसे किसी अन्य को वसीयत न कर दें।

गोदनामा और वसीयत दोनों ही प्रभावी रहेंगे।

March 4, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अंकित ने ग्राम सेथवाल, रानी की सराय, जिला आजमगढ़ (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरी नानी ने अपनी दो बेटियों को वसीयत करने के बाद मुझे पंजीकृत विलेख से दत्तक ग्रहण किया है। उनकी छोटी पुत्री मेरी जन्मदात्री माता है।  मैं जानना चाहता हूँ कि सम्पत्ति के लिए गोदनामा प्रभावी है या वसीयत?

समाधान-

गोदनामा और वसीयत दोनों विलेख अपने अपने तरीके से प्रभावी होंगे। वसीयत तो वसीयत करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के उपरान्त प्रभावी होती है। वसीयत को मृत्यु के पहले तक कभी भी बदला जा सकता है। एक ही विषय में अनेक वसीयतें होने पर एक व्यक्ति की अन्तिम वसीयत सभी को सुपरसीड करेगी।

गोदनामा से आप अपनी नानी के गोद पुत्र हो गए हैं। यदि परिवार में पहले से कोई पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति हो तो जो संपत्ति नाना की मृत्यु के बाद नानी को मिली है उस में आप के गोद लेने से नानी के साथ साथ आप का हिस्सा भी तय हो चुका है। अब यदि आप की नानी की मौजूदा वसीयत बनी रहती है तो नानी के हिस्से की जो भी संपत्ति होगी वह वसीयत में आप की माँ व मौसियों को मिलेगी। इस संबंध में आप को सभी दस्तावेज बता कर किसी स्थानीय दीवानी विधि के जानकार वकील से परामर्श करना चाहिए।

मृत पुत्री की पुत्री को भी उत्तराधिकार का अधिकार है।

February 13, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

             श्रीमानजी,  हम दो भाई  ईशर राम और केशर राम और तीन बहिने नाथी, उमा और इंद्रा थे। मेरी बड़ी

 बहिन नाथी की १९७१ में मृत्यु हो गयी। वह एक लड़की पीछे छोड़ गई। उस टाइम मेरी छोटी बहिन इंद्रा कुंवारी थी और हमने सामाजिक रीती रिवाज़ के हिसाब से नाथी की जगह इंद्रा की शादी कर दी। मेरी माताजी की मृत्यु १९९१ में हो गयी और पिताजी की २०१० में मृत्यु हो गयी। उस के बाद पटवारी ने ईशर राम, केशर राम, नाथी, उमा व इंद्रा के नाम से नामकरण दर्ज कर दिया। जबकि नाथी की मृत्यु १९७१ में ही हो चुकी थी। अब नाथी की लड़की ने नाथी का death certificate व वारिस नामा पेश कर १/५ हिस्से में अपना नामकरण दर्ज करवा लिया है

१.जब नाथी की मृत्यु १९७१ में हो चुकी थी फिर भी पटवारी ने २०१० में उस के नाम नामकरण दर्ज किया है क्या यह कानूनी रूप से उचित है?

२. जब हमने नाथी की जगह इंद्रा  की शादी कर दी तो नाथी की लड़की इंद्रा की गोद की लड़की हो गई। वो इंद्रा के हिस्से में से अपना हिस्सा मांग सकती है और इंद्रा के बच्चे और नाथी की लड़की का पिता तो एक ही हुआ, वहाँ उस के गाँव में उसके पिताजी की मृत्यु के बाद में इंद्रा के बच्चो के बराबर ही हिस्सा मिलेगा, जब उसके गाँव में उसके पिताजी की सम्पति में से उसको इंद्रा के बच्चों के बराबर हिस्सा मिलेगा तो हमारे यहां उसको अलग से हिस्सा कैसे मिलेगा?  क्या मुझे उसके नामान्तरण की कोर्ट में अपील करना चाहिए या और कोई कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए?

-केशर राम, निवासी गाँव – पोस्ट–मुर्डकिया, तहसील-सुजानगढ़, जिला चूरू,  राजस्थान

समाधान-

          सब से पहले तो आप यह समझिए कि आप ने अपनी छोटी बहिन इन्द्रा का विवाह किसी दूसरे स्थान पर किया है और फिर समस्या के बारे में सोचिए।

          अब जो नामान्तरण हुआ है उस में यह गलती हुई है कि मृत नाथी के नाम भी हिस्सा चढ़ गया है। यह इस कारण हो सकता है कि नामान्तरण करने वाले अधिकारी के ज्ञान में यह तो आया कि आपके माता पिता के कितनी संतानें हैं और कौन कौन हैं, लेकिन यह ज्ञान में न आया कि उन में से नाथी की मृत्यु हो चुकी है।

          यदि नामान्तरण अधिकारी के ज्ञान में यह होता कि नाथी की मृत्यु हो चुकी है तो भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार पूर्व में मृत पुत्री की पुत्री को उस का हिस्सा प्राप्त होता। उस स्थिति में भी नाथी का हिस्सा नाथी की पुत्री को प्राप्त होता। इस कारण इस नामान्तरण से पुराने नामान्तरण की गलती दुरुस्त कर दी गयी है।

          नाथी के स्थान पर आप ने इन्द्रा का विवाह कर दिया इस से नाथी की पुत्री इन्द्रा की गोद पुत्री नहीं हुई बल्कि सौतेली पुत्री हुई। उसे इन्द्रा के हिस्से में से हिस्सा प्राप्त करने का कोई अधिकार कभी उत्पन्न नहीं होगा।

          नाथी की पुत्री को अपने पिता की किसी संपत्ति में से कुछ उत्तराधिकार में प्राप्त होता है तो वह प्राप्त होगा इस से उस के माँ या नाना नानी की संपत्ति में से उत्तराधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

          इस तरह जो भी वर्तमान स्थिति है वह कानून के अनुसार बिलकुल सही है। आप यदि किसी की खराब सलाह के कारण कोई कानूनी कार्यवाही करते हैं तो उस से आप को कुछ न मिलेगा। आप का समय और धन भी व्यर्थ ही खर्च होगा।

बैनामा कैसे खारिज कराएँ?

January 21, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राकेश  जिला-प्रतापगढ़  उत्तर प्रदेश ने समस्या भेजी है कि-

हम तीन भाई थे।सबसे बड़े बेऔलाद थे।उन्होने सितंबर के प्रथम हप्ते में मेरे एक बेटे को अपनी चल अचल संपत्ति का वारिस(रजिस्टर्ड) बनाया था।इसका पता चलने पर मझला भाई जो लखनऊ में सपरिवार रहता है आकर उन्हें बहला फुसलाकर लखनऊ ले गया(१५सितंबर2017)और सितंबर केआख़िरी हप्ते मे छल और धोखे से उनकी समस्त संपत्ति बैनामा करवा लिया (खुद और अपनी पत्नी के नाम पर)।इस बैनामे में एक गवाह खुद वकील है और दूसरा गवाह उनका बेटा है।बाज़ार में स्थित मकान का बैनामा मकान दर्शाए बिना खाली जमीन के रूप में एक लाख नकद दिखा कर करवा लिया जबकि उसकी बाजार में कीमत25 लाख रुपए है।शेष जमीन का बैनामा 9 लाख रुपए में करवाया है और पेमेंट के रूप में केवल एक चेक का नम्बर लिखा है और बैनामे के दिन की तारीख लिखी है।चेक की फ़ोटो कापी भी संलग्न नहीं है।फिर उन्हें लखनऊ लेकर चले गए।पता चलने पर मैं एक रिश्तेदार के साथ 9अक्टूबर2018कोगया तो वह बोले कि जबर्दस्ती और छल से ऐसा किया।मैं इसको ख़ारिज कराऊंगा लेकिन मुझे घर नहीं जाने दे रहे हैं।इस पर उन लोगों ने कहा कि हम खुद ख़ारिज करवा देंगे और इनको दो दिन में घर पहुंचा देंगे।उन्होंने पैसा नहीं पाने की बात भी कबूली।लेकिन उन लोगों ने पहुँचाया नहीं और21अक्टूबर18को उनकी मौत की खबर आती है।पोस्टमार्टम न कराने के प्रार्थना पत्र पर मेरा दस्तखत लेकर थाने में जमा कर दिये और मुझे दिसम्बर में समाधान करने की बात कह कर टाल दिये।मुझे ऐसा लगता है कि उन लोगों ने भेद खुलने के डर और पैसा भी हड़पने के चक्कर में उनकी हत्या कर दी।भाई ने धोखा और छल की बात कुछ और लोगों को फोन पर बताया था।
क्या अब उनकी मौत की जांच करवाई जा सकती है?यदि हाँ तो कैसे?
इस संबंध में और क्या कदम उठाए जा सकते हैं।ये जमीन पुश्तैनी है।बातचीत की मोबाइल रिकार्डिंग क्या साक्ष के रूप में अदालत में मान्य हो सकती है?
कृपया मार्ग दर्शन करें।
राकेश

 समाधान-

आप के पास पर्याप्त तथ्य और सबूत हैं जिन के आधार पर आप बैनामा खारिज कराने का वाद संस्थित कर सकते हैं। पोस्टमार्टम न कराने के आवेदन पर आप को हस्ताक्षर नहीं करने थे। इस से वे यह साबित करने का प्रयत्न करेंगे कि आप खुद आश्वस्त थे कि उ नकी मृत्यु संदेहास्पद नहीं है। पुश्तैनी जमीन  होने पर और वारिस न होने पर वसीयत की जा सकती है और संपत्ति को विक्रय भी किया जास कता है इस तरह पुश्तैनी संपत्ति होने का कोई फर्क इस मामले पर नहीं पड़ेगा। बेहतर तो यही है कि आप बैनामा खारिज कराएं जिस से वसीयत को लागू किया जा सके। बैनामा खारिज कराने के लिए आप को दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा जिस में आप को बैनामा के मूल्य पर कोर्ट फीस भी देनी होगी।

प्रिय पाठकों!

हम अपने पाठकों से प्राप्त सभी समस्याओं पर अपनी राय ई-मेल से दे रहे हैं।
हम उन्हें यहाँ भी प्रस्तुत कर सकते हैं, जिस से अन्य पाठकों को भी लाभ हो। हम जानना चाहते हैं कि समस्याओं के समाधान इस तरह प्रस्तुत करने का यह प्रारूप आप को कैसा लगा। आशा है आप की टिप्पणियाँ हमें प्राप्त होंगी।
-दिनेशराय द्विवेदी

 

दरवाजा व रास्ता कैसे बनाए रखें?

January 21, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अन्नू पांडे ने पूछा है-

नमस्ते!
मेरे घर के पीछे कुछ खाली ग्राम समाज की जमीन है।
मेरे पिता के चाचा जी जो की मेरे घर से 200 मीटर दूर मकान मे रहते है।
मेरे घर के दवाज़े को लेकर रोज़ झगड़ा करते है की मैं उस दरवाज़े को बन्द कर दूँ।उनका कहना है के ये जमनीं उनकी है।जबकि वो ग्राम समाज है। और मेरे पिता के चाचा जी के पास 15 बीघा से ज्यादा का खेत और बाग अलग से है।
तो अब आप हमे बताइये की में अपना निर्माण कार्य किस प्रकार बिना दरवज़ा बन्द किये जारी रख सकता हूँ???

सलाह  

आप का दरवाजा पहले से है आप उसे कायम रखें।
बन्द करने की कहने वाले को कहें कि वह अदालत में जा कर नालिश करे।
यदि वह आप को तंग करता है तो पुलिस में रिपोर्ट कराएँ,  और फिर भी काम न बने तो अदालत में निषेधाज्ञा का वाद दाखिल कर  निर्माण कार्य तथा रास्ते में बाधा उत्पन्न न करने के लिए विपक्षी के विरुद्ध अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करने का प्रयत्न करें।


प्रिय पाठकों!

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-दिनेशराय द्विवेदी

 

बँटवारा और पृथक कब्जा ही समस्या का हल है।

December 25, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

रामकुमार महतो ने ग्राम बाहेरी, जिला दरभंगा, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा के पिताजी तीन भाई थे, उन तीनों के नाम से एक जमीन है। जिसके पहले कॉलम मे बहिस्सा बराबर लिखा हुआ है, और कैफियत खाना में तीनों के नाम से अलग-अलग खेसरा नं देकर उनके आगे कब्जा दिखाया गया है। जिसके अनुसार सभी अपने हिस्से के जमीन पर बिना किसी विवाद के लगभग 80 वर्षों से रहते चले आ रहे हैं। उस हिस्से में किसी के पास कम जमीन है तो किसी के पास अधिक जमीन है। आगे चलकर कुछ लोगों ने अपने हिस्से की जमीन का कुछ हिस्सा बेच भी दिया है जिस पर किसी को भी कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन कुछ लोगों के कहने पर मेरे विपक्षी ने 2012 से मेरे साथ सम्पत्ति को बराबर हिस्से में बटवारा को लेकर विवाद करने लगे। अब उनके साथ ग्राम पंचायत के पूर्व सरपंच का समर्थन भी है। वे लोग जबरदस्ती मेरे हिस्से की जमीन पर (जिस पर मकान बनाकर हम लोग लगभग 50 वर्ष पूर्व से बिना किसी विवाद के रहते चले आ रहे हैं ) कब्जे की कोशिश करते हैं। जिससे जान माल के नुकसान का भय हमेशा बना रहता है। कृप्या सही सलाह दें?

समाधान-

प की उक्त वर्णित संपत्ति पुश्तैनी है और वह अभी भी आप के परदादा और उन के भाइयों के नाम दर्ज है। जब भी जमीन के किसी खातेदारी की मृत्यु हो जाती है तो उस के उत्तराधिकारियों का यह दायित्व होता है कि वे मृतक का नाम खारिज करवा कर उस के उत्तराधिकारियों के नाम और उन के हिस्से रिकार्ड में दर्ज कराएँ। यदि उत्तराधिकारी उन के नाम और हिस्से दर्ज करवा भी दें तो केवल यह दर्ज होता है कि कुल जमीन में उन का हिस्सा कितना है। उन का पृथक हिस्सा कौन सा है यह दर्ज नहीं होता। उस के लिए किसी भी जमीन के सभी मौजूदा हिस्सेदारों को आवेदन दे कर अपने अपने खाते अलग कराने चाहिए और हिस्से भी अलग अलग करा लेने चाहिए जिस से भविष्य में समस्या न हो।

आपने जो रिकार्ड भेजा है उस में पूरी संपत्ति किस की है यह दर्ज है उन के हिस्से भी दर्जै हैं साथ ही यह भी दर्ज है कि जमीन के कौन से हिस्से पर किस का कब्जा है। जब किसी कब्जे दार ने अपने हिस्से की जमीन का कोई हिस्सा विक्रय किया तो उस ने अपने कब्जे की जमीन में से उतना हिस्सा खऱीददार के कब्जे में दे दिया। जब कि विक्रय या तो खाते में दर्ज ही नहीं हुआ और दर्ज हुआ होगा तब भी वह आप के साथ संयुक्त खातेदार रहेगा जब तक कि सभी खातेदारों / हिस्सेदारों का विभाजन हो कर उन के पृथक पृथक हिस्से दर्ज हो कर उन्हें उन के हिस्सों पर कब्जा न दे दिया जाए।  इस तरह समस्या तो बनी हुई है और इस का समाधान भी आसान नहीं है। इस समस्या का हल या तो आपसी सहमति से हो सकता है या फिर अदालत में विवाद के निर्णय और निष्पादन से। अदालत में विभाजन होना और उस का निष्पादन होना बहुत लंबी प्रक्रिया है। लेकिन वही सही हल है।

आप के कब्जे में जो जमीन और मकान है वह स्पष्ट रूप से रिकार्ड में दर्ज है। इस कारण कोई भी आप को अपने कब्जे से बिना किसी अदालत के निर्णय और निष्पादन के बेदखल नहीं कर सकता। यदि किसी को बंटवारा करवा कर अपना हिस्सा अलग करवाना है तो वह अदालत में विभाजन का दावा करे। जो लोग आप को बेदखल करने का प्रयास कर रहे हैं उन से आप कह सकते हैं कि वे पहले अदालत से फैसला करवाएँ। फिर भी आप यदि परेशानी से बचना चाहते हैं तो किसी वकील से मिल कर राजस्व रिकार्ड में दर्ज आप के कब्जे की जमीन से जबरन बेदखल किए जाने के लिए निषेधाज्ञा प्राप्त करने के लिए दावा करा सकते हैं। एक बार निषेधाज्ञा प्राप्त हो जाने पर बेदखली के विरुद्ध आप को सुरक्षा मिल जाएगी।

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