सायबर कानून Archive

for Rentसमस्या-

भोपाल, मध्यप्रदेश से राम हर्ष पटेल पूछते हैं –

मेरे यहाँ एक किरायेदार हैं। जिन्हों ने जिला अभियोजन अधिकारी की नेम प्लेट लगा रखी है।  शुरू में जब कमरे की बात हुई थी तब उनकी छोटी बहनें आई थीं।  मैने एग्रीमेंट, किराया, आई डी आदि की शर्तें रख दी थी लेकिन मैं ड्यूटी चला गया और इन्हों ने कमरे में समान रख लिया।  जब एग्रीमेंट की बात की तो टालते गये। इस बीच संबंधों में कोई बुराई नहीं आई जो अब तक जारी है। उनकी उम्र लगभग 33 साल है। बहनें जबलपुर शिफ्ट हो गयी अपनी पढ़ाई के संबंध में।  लेकिन किराया देने में आदतन चूक करते हैं। जो में पर्ची देता हूँ उस में मेरे साइन मांगते हैं लेकिन जब मैं अपने रजिस्टर में उनके साइन मांगता हूँ तो कहते हैं इसकी क्या ज़रूरत है। कभी भी मकान के संबंध में बात करता हूँ तो बोल देते हैं की बहन से पूछूंगा या पापा से पूछूंगा, और ऐसा बिहेव करते हैं कि जैसे कुछ जानते ही नहीं। शांत पागल जैसे चुप हो जाते हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि मेंटल हैं।  लेकिन ज्यों ही मैं उन से चैक देने की बात करता हूँ तो कहते हैं कि 1-2 दिन में किराया दे दूँगा। तब मेरी राय बदल जाती है कि मेंटल नही हैं। कभी-कभी अचानक मकान से चले जाते हैं और गाँव पहुँच जाते हैं। फोन रिसीव नहीं करते हैं। ड्यूटी में भी लापरवाही करते हैं। सबसे बड़ी समस्या ये है कि इनका कोई संबंधी भोपाल में नहीं है जिसे मैं जानता। जब भी मैं कुछ बोलता हूँ तो पैसे की कमी का बहाना बनाते हैं और बाद में तीन महीने तक का किराया एक साथ दे देते हैं। इनकी मासूमियत और लापरवाही से में चिंतित हो जाता हूँ कि कोई साजिश तो नहीं है। अभी ये घर गये तो मोटरसाइकल पार्क करके रीवाँ चले गये। लौट कर आए तो मोटर सायकिल नहीं मिली। अब पता चल रहा है कि हनुमानगंज थाना भोपाल में हैं। लेकिन इन्होने अभी तक कोई उचित कार्यवाही मोटरसाइकल प्राप्त करने के लिए नहीं की।  इस प्रकार की आदत बनाए हुए हैं। मकान में किसी से कोई बातचीत नहीं, घर से ऑफिस-ऑफिस से घर। कुछ भी पूछो तो कोई जवाब नहीं यहाँ तक कि नाम पता, जन्मतिथि भी नही बताते हैं, कहते हैं कि पापा से पूछकर बताऊंगा। इनको रहते हुए साल भर हो गया। मैं कहता हूँ कि कहीं छोटा कमरा ले लो तो टाल जाते हैं।  आज रजिस्टर में साइन कर दिए हैं। क्या मैं खाली करवाने का लिखित नोटिस दे सकता हूँ या 11 महीने का एग्रीमेंट करवाकर आगे देखूँ?

समाधान-

भी तक किराएदारी के संदर्भ में आप के किराएदार ने ऐसी कोई समस्या उत्पन्न नहीं की है जिस के कारण आप के पास उस से मकान खाली कराने का कोई अधिकार उत्पन्न हुआ हो।  इस कारण से आप के द्वारा मकान खाली करा सकना संभव नहीं है। यदि मकान खाली करा सकना संभव नहीं है तो खाली कराने के नोटिस से कुछ नहीं होगा। इस से तो अच्छा है कि आप उस से मौखिक रूप से कहते रहें जब वे मकान खाली कर दें करा लें।

दि आप दोनों के बीच आज तक कोई किरायानामा नहीं लिखा गया है, तो लिखवा लें। क्यों कि किरायानामा इस बात का सबूत होता है कि वह आप के किराएदार की हैसियत से वहाँ रहता है, किराए की राशि क्या है? किराए पर मकान का कितना और कौन सा हिस्सा दिया गया है? किस उद्देश्य के लिए परिसर किराए पर दिया गया है? बाकी सब चीजें इतनी कानूनी हैं कि उन के लिए किरायेनामे का कोई महत्व नहीं है।

दि किराएदार किराया अदायगी में चूक करे और छह माह से अधिक का किराया बकाया हो जाए, या किराया कानून में वर्णित कोई अन्य कारण पैदा हो जाए तो आप मकान खाली कराने का नोटिस दे सकते हैं और खाली कराने के लिए न्यायालय के समक्ष कार्यवाही कर सकते हैं।

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Jhola doctorसमस्या-

शुक्लागंज, उन्नाव, उत्तर प्रदेश से राजा सिंह ने पूछा है –

मेरे पिता जी ने फरवरी 2012 में कस्बे की व्यवसायिक सड़क पर एक मकान खरीदा जिस की चौड़ाई 13 फुट है जिसमे 10 फुट दुकान 3 फुट की गॅलरी है। दुकान की लंबाई 12 फुट है और पीछे 37 फुट में कुछ भी नहीं बना था। दुकान में 25 साल से एक डॉक्टर बीएएमएस डिग्री से सेल्फ़ प्रॅक्टिस करता है। उस ने जब हम लोग मकान ले रहे थे तो कहा था कि हम मकान छोड़ देंगे क्यों कि हम बूढ़े हो गये हैं। हम अपने घर वाली दुकान मे सेल्फ़ प्रॅक्टिस कर लेंगे। हम लोग उसकी बातों में आ गये। मकान लेने के बाद जब हम लोग उसके पास गये तो उस ने कहा कि हमें 5-6 महीने का समय दो तो हम लोगो ने सीधा समझ के दे दिया।  जब हम लोग नवम्बर 2012 में उसके पास गये तो वो हम लोगों को धमकी देते हुए बोला कि उसे 2 लाख रुपये चाहिए नहीं तो क़ानून भी कभी दुकान खाली नही करा पाएगा। हम लोग बहुत चिंतित हुए हम लोगों ने कुछ पैसों का इंतज़ाम कर के मई 2013 में उस के पास गये तो वो कहने लगा कि मैं 2 लाख से एक भी कम नहीं लूंगा।  पिताजी मायूस होकर आ गये। फिर पिताजी 21 अगस्त को उस के पास हाथ पैर जोड़ कर उसे मनाने के लिए गये। क्यों की वो दुकान की दीवार गिरने की हालत में थी और वो उसे बनवाने जा रहा था। तो वो एक सरिया ले के पिताजी की तरफ दौड़ा। पिताजी पुलिस के पास गये तो पुलिस ने काम बंद करा दिया। पुलिस ने 2 घंटे उसे बिठा कर छोड़ दिया। फिर पुलिस हम ही लोगों को धमका कर कहती है कि अगर यह दुकान हल्की भी टूटी तो तुम (पिताजी) पर इतनी दफ़ा लगाउंगा कि तुम्हारी सरकारी नौकरी भी चली जाएगी। यथा स्थिति बनाए रखो। फिर 5 सितम्बर को 2 वकील दुकान की फोटो खींच कर ले गये और पता चला है की उसने केस कर दिया है स्टे के लिए। उस ने हम लोगों को आज तक एक रुपया किराया नहीं दिया है और हमें ही धमकाता है। उस के 2 लड़के 30-35 साल के हम को धमकाते हैं और कहते हैं कि तुम्हारे वकील भी हमारे हो जाएंगे। तुम तो गये काम से। हमारे पास कोई मकान नहीं है उस के पास उसी रोड पर मकान और दुकान है वो एक प्राइवेट डाक्टर है। 15 रुपये में दवाई देता है। हम लोग पागल हुए जा रहे हैं। क्या हम लोग कभी मकान में कब्जा नहीं ले पाएँगे हमारे पिताजी 2017 मे रिटायर हो रहे हैं मेरी उम्र 20 साल और 3 बहनें हैं।  उस डाक्टर को) को गुण्डों का संरक्षण प्राप्त है।  हम लोग को मजबूरी मारे डाल रही है।  कोई सार्थक उपाय बताएँ।  हमारे पास ज़्यादा बैंक बैलेन्स भी नहीं है।  हमें दीदी की शादी भी करनी है। हम लोग किराए के मकान में रहते हैं।

समाधान-

प का परिवार एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार है जिस के पास कस्बे में अपना आवास तक नहीं है और वह किराए के मकान में निवास करता है। परिवार में माता पिता के सिवा तीन बहनें भी हैं। पिताजी सरकारी कर्मचारी हैं और दीदी का विवाह करना है। आप के पिता ने जैसे तैसे कुछ बचत कर के अपने मकान और रिटायरमेंट के बाद कुछ आय का जुगाड़ करने के लिए व्यावसायिक सड़क पर एक दुकान और उस के पीछे का खाली प्लाट खरीदा है। अब दुकान का किरायेदार दुकान खाली नहीं कर रहा है जब कि दुकान खरीदने के पहले उस ने वायदा किया था कि वह दुकान खाली कर देगा। आप के पिता से उस ने झगड़ा किया और वे पुलिस के पास गए। पुलिस ने कार्यवाही तो की लेकिन आप के पिता को भी धमका दिया। अब दुकानदार अदालत में स्टे के लिए गया है और उस के लड़के आप को धमका रहे हैं। आप ने अपने मकान का सुखद सपना देखा था लेकिन वह अब खटाई में पड़ गया है और मुसीबतें सामने है। लगता है दुकान खरीदने में जो पैसा लगाया था वह सब बेकार चला गया है और संकट के बादल मंडरा रहे हैं। लेकिन यह सब स्वाभाविक है और उस से घबराने की तनिक भी जरूरत नहीं है। वह किराएदार डाक्टर, उस के लड़के और पुलिस ने अपने अपने चरित्र के मुताबिक ही भूमिकाएँ अदा की हैं।

प का डाक्टर किराएदार भी उसी मध्यवर्ग का हिस्सा हैं, जिस के आप हैं। उस ने भी पन्द्रह रुपए में दवाई बेच बेच कर केवल जीवन यापन ही किया है और हो सकता है उस के लड़के अभी तक अपने पैरों पर खड़े भी न हो पाए हों, रहने को मकान बना लिया हो जिस में प्रेक्टिस करने लायक दुकान भी हो लेकिन 25 साल से जिस दुकान में वह किराएदार था उस दुकान को खाली करने मात्र से लाख दो लाख रुपए की कमाई होने की गुंजाइश दिखने पर वह इस मौके को नहीं छोड़ना चाहता हो। किराएदार का व्यवहार एक सामान्य मध्यवर्गीय व्यक्ति की तरह है। आप को मकान की आवश्यकता है।  बिना किसी बड़ी मुसीबत के उस का कब्जा हासिल करने के लिए आप के पिता ने कुछ धन की व्यवस्था कर लेना इसी बात का द्योतक है।

पुलिस किसी किराएदार से मकान खाली नहीं करा सकती यह उस के अधिकार क्षेत्र के बाहर का मामला है। आप के पिताजी मकान की गिरने वाली दीवार के मामले में किराएदार से बात की उस ने झगड़ा करने का प्रयत्न किया। शान्ति भंग होने की स्थिति बनी वैसी स्थिति में पुलिस ने डाक्टर को दो घंटे थाने में बिठा लिया। इस से अधिक पुलिस अधिक से अधिक यह कर सकती थी कि डाक्टर और आप के पिता के विरुद्ध शान्ति भंग न करने के पाबंद करने हेतु एक शिकायत किसी कार्यपालक दंडनायक की अदालत में दाखिल कर देती। हो सकता है उस ने ऐसा किया भी हो। उस ने आप के पिता को धमकाया भी कि वे डाक्टर से न उलझें यह भी सही किया। क्यों कि किसी मकान दुकान को खाली कराने के लिए ताकत का प्रयोग करना उचित और कानूनी नहीं है। इस के लिए आप के पिताजी को दीवानी न्यायालय में कार्यवाही करनी चाहिए। जिस में कुछ समय तो लगेगा लेकिन किराएदार को दुकान खाली करना पड़ेगी।

जिस उम्र में आज आप हैं जब मैं उस उम्र में था तब मेरे पिता जी ने भी एक मकान खरीदा था जिस के एक हिस्से में किराएदार रहता था। उस समय उस किराएदार ने भी यही कहा था कि वह मकान खाली कर देगा। लेकिन उस ने नहीं किया। हम ने उस से कोई झगड़ा न किया। केवल कुछ समय बाद जब वह मकान के शौचालय का नवनिर्माण कराने लगा तो हमने मकान खाली कराने का मुकदमा कर के शौचालय के निर्माण पर स्टे ले लिया। बाद में कुछ समय तो लगा लेकिन मकान खाली हो गया। इस तरह आप को और आप के पिता जी को भी थोड़ा धीरज रखना पड़ेगा। दुकान निश्चित रूप से खाली हो जाएगी।

ह तो सही है कि आप के पिता जी ने वह संपत्ति रहने के लिए खरीदी है। लेकिन उस संपत्ति में कोई रहने लायक मकान नहीं है, दुकान के अतिरिक्त केवल एक खाली प्लाट है। निश्चित रूप से आप के पिता जी की योजना इस खाली प्लाट पर आवासीय मकान बनाने की रही होगी। तो आप के पिता जी खाली प्लाट पर मकान बनाएँ तो कोई उन्हें रोक नहीं सकता।

प ने मकान फरवरी 2012 में खरीदा था। इस तरह उसे खरीदे लगभग डेढ़ वर्ष हो चुका है और तब से किराएदार ने मकान का किराया नहीं दिया है। इस तरह किराएदार ने अठारह माह का किराया न दे कर किराया अदायगी में चूक की है। यह दुकान खाली कराने के लिए एक मजबूत आधार है।  इस के अतिरिक्त एक आधार यह भी हो सकता है कि उन का पुत्र वयस्क हो चुका है और वे उसे उस दुकान में व्यवसाय कराना चाहते हैं जिस के लिए उन्हें उस दुकान की निजि आवश्यकता है। इस तरह आप के पिता जी इन दो मजबूत आधारों पर दुकान खाली करने का दावा कर डाक्टर पर कर सकते हैं। कुछ समय तो लगेगा लेकिन दुकान खाली हो जाएगी। उस के लिए किसी भी तरह झगड़ा वगैरह करने या डाक्टर से संबंध खराब करने की कोई जरूरत नहीं है। डाक्टर इसी लिए आप के पिता से रुपया मांग रहा है कि आप दुकान को जल्दबाजी में खाली कराना चाहते हैं और न्यायालय की प्रक्रिया से डरते हैं। यदि वह रुपया आप के पिताजी उसे दे दें तो वह तुरन्त खाली कर देगा वर्ना जानबूझ कर मुकदमे को लंबा करेगा। पर मेरे विचार में अदालत की कार्यवाही से दुकान खाली कराना उचित है।

प के पिताजी जब मकान खाली कराने का मुकदमा करें तो इस बात की अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए भी आवेदन करें कि मुकदमा चलने के दौरान दुकाने के पीछे के खाली प्लाट और दुकान के ऊपर मकान का निर्माण करने में वह किराएदार बाधा उत्पन्न न करे। इस से आप के पिता प्लाट पर निर्माण कर के मकान बना सकते हैं और उस में जा कर निवास कर सकते हैं। दुकान मुकदमा निपटेगा तब खाली हो जाएगी। डाक्टर ने जो मुकदमा किया है उस में इस के अतिरिक्त और कोई आदेश न होगा कि आप उस से केवल न्यायिक प्रक्रिया अपना कर ही दुकान खाली कराएँ जबरन न कराएँ और यह आदेश उचित है।

प शान्तिपूर्वक अपनी पढ़ाई आदि जारी रखें। आप के पिताजी दुकान खाली करने का मुकदमा करें और मकान का निर्माण करवा कर उस में रहने जाएँ। दुकान तो कभी न कभी खाली हो ही जानी है। आखिर किराएदार हमेशा किराएदार ही रहता है वह कभी उस का मालिक नहीं बन सकता। इस के लिए आप के पिता जी को नगर के अच्छे दीवानी मामलों के वकील से सम्पर्क करना चाहिए। किराएदार के पुत्रों की इस धमकी में कोई वजन नहीं है कि जो भी वकील करेंगे वह उन का हो जाएगा। इस दुनिया में लोग बिकते हैं लेकिन सब फिर भी नहीं बिकते। जिस वकील की प्रतिष्ठा ईमानदारी से काम करने की हो उसे वकील करें। आप के परिवार को कुछ परेशानी तो होगी लेकिन कुछ समय बाद हल भी हो जाएगी। यदि आप के पिताजी ऐसी संपत्ति खरीदते जिस में कोई किराएदार न होता तो यह समस्या नहीं होती। निश्चित रूप से किराएदार होने के कारण वह संपत्ति आप के पिताजी को बाजार दर से कुछ कम कीमत पर ही मिली होगी। अब उस के कारण यह समस्या तो झेलनी पड़ेगी। संपत्ति सदैव कुछ न कुछ झगड़ा साथ ले कर बनती है, यह मौजूदा दुनिया का नियम है।  संपत्ति बनानी है तो इस से समझदारी से निपटना पड़ेगा।

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कापीराइट के उल्लंघन को रोकने के लिए क्या करें?

August 13, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
graphic designसमस्या-

रायपुर, छत्तीसगढ़ से रहीम खान ने पूछा है –

मैं ग्राफिक्स डिजाईन का कार्य करता हूँ। जो भी ग्राफिक्स डिजाईन बनाता हूँ। उसकी कॉपी हो जाती है। मैं कैसे कॉपीराईट कानून का इस्तेमाल करूं। और मेरे फर्म के बनाये हुए कलात्मक कलाकृतियों को सुरक्षा प्रदान करूं?

समाधान-

ग्राफिक डिजायन भी एक कलात्मक कृति है और जो जिस कृति को जन्म देता है उसी के पास उस का कापीराइट होता है। बिना उस की अनुमति के कोई भी उस कृति का उपयोग नहीं कर सकता। कापीराइट के लिए यह आवश्यक नहीं कि आप अपनी कृति को पंजीकृत करायें ही। हालाँकि किसी डिजाइन के कापीराइट के पंजीयन की सुविधा भी उपलब्ध है।

प ग्राफिक डिजाइन का कार्य किस तरह करते हैं? यह आप ने स्प्ष्ट नहीं किया है। ग्राफिक डिजाइन का कार्य या तो आप किसी के लिए संविदा पर करते हैं, या फिर किसी के नियोजन में करते हैं, या फिर स्वतंत्र रूप से अपने लिए करते हैं। यदि संविदा में यह स्पष्ट नहीं है कि डिजाइन पर कापीराइट किस का रहेगा तो उस डिजाइन का कापीराइट डिजाइन बनाने वाले का रहता है। जब आप किसी से भी डिजाइन बनाने के लिए संविदा करते हैं तो वह भी दो तरह की हो सकती है। एक संविदा में आप के ग्राहक को केवल किसी एक काम के लिए उस डिजाइन का उपयोग करने की छूट देते हैं। लेकिन बाद में उसे वह डिजाइन पसंद आ जाता है और वह अपने अन्य कामों में भी उस डिजाइन का करना चाहता है तो वह आप की अनुमति के बिना ऐसा नहीं कर सकता। ऐसी संविदा में कापीराइट आप के पास ही रहता है, लेकिन उस डिजाइन के केवल विशिष्ट उपयोग की आप उसे अनुमति देते हैं। दूसरे आप अपने ग्राहक को संपूर्ण उपयोग की छूट देते हैं तो वह उस का कोई भी उपयोग कर सकता है लेकिन फिर भी कापीराइट आप के पास रहता है। एक तीसरी संविदा ऐसी भी हो सकती है जिस में आप ग्राहक को उस का कापीराइट भी दे दें।

दि आप किसी के कर्मचारी के रूप में वेतन पर काम करते हुए डिजाइन बनाते हैं तो उस पर कापीराइट नियोजक का होता है।

किसी व्यक्ति द्वारा विशेष रूप से किया गया डिजाइन का कार्य अनेक प्रकार का हो सकता है जैसे-

  1. एक बड़े काम के लिए किया गया कोई हिस्सा, जैसे किसी अखबार या पत्रिका के लिए किया गया कार्य।
  2. किसी फिल्म या दृश्य-श्रव्य कार्यक्रम के लिए किए गए कार्य का एक हिस्सा।
  3. किसी किए गए कार्य का संपादन।
  4. किसी किए गए कार्य का अनुवाद।
  5. पूरक कार्य, जैसे किसी पुस्तक के लिए बनाए गए ग्राफ।
  6. किसी मानचित्र के लिए बनाए गए ग्राफिक्स, आदि।

स तरह के कामों को यदि आप वेतन ले कर करते हैं या काम में अपनी हिस्सेदारी का ठेका लेकर करते हैं तो उन पर कापीराइट आप का नहीं होगा। लेकिन यदि आप कार्य करने की संविदा में स्प्ष्ट करते हैं कि आप के द्वारा किए गए कार्य का कापीराइट आप के पास रहेगा तो उस पर कापीराइट आप का होगा।

स तरह ग्राफिक डिजाइन के कार्य के लिए आप जब भी संविदा करते हैं तो आप को उस संविदा को किसी वकील को अवश्य दिखा लेना चाहिए जिस से आप कापीराइट की रक्षा कर सकें।

किसी भी डिजाइन पर कापीराइट आप का है और उस का कोई अनधिकृत व्यक्ति उपयोग करता है या उस में संशोधन कर के नकल करता है तो वह व्यक्ति आप के कापीराइट का उल्लंघन करता है। यह उल्लंघन कापीराइट अधिनियम की धारा 63 के अन्तर्गत अजमानतीय अपराध है। आप इस के लिए प्रथम सूचना रिपोर्ट पुलिस थाना में दर्ज करवा सकते हैं। यदि अन्वेषण में पाया गया कि कापीराइट का उल्लंघन किया गया है तो पुलिस अभियुक्तों को गिरफ्तार कर के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगी। उसे छह माह से तीन वर्ष तक के कारावास के साथ पचास हजार से दो लाख रुपयों तक का जुर्माने के दंड से दंडित किया जा सकता है।

दि कोई व्यक्ति आप द्वारा निर्मित डिजाइन का उपयोग कर के या उसे संशोधित कर उपयोग कर के आप के कापीराइट का उल्लंघन कर रहा है तो आप उस व्यक्ति द्वारा उस डिजाइन के उपयोग करने से रोकने के लिए दीवानी न्यायालय से निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते है तथा उस के द्वारा किए गए उपयोग के लिए क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिए वाद भी कर सकते हैं।

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हैकिंग आई टी एक्ट में गंभीर अपराध है।

December 29, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
समस्या-

दुर्ग, छत्तीसगढ़ से सचिन ने पूछा है-

ई लोगों से करोड़ों की ठगी कर एक शातिर व प्रभावशील ठग पिछले तीन साल से फरार है आरोपी के राजनैतिक प्रभाववश पुलिस आज तक मामले को लटका कर रखी है।  एक पीड़ित ने आरोपी का ई-मेल हेक किया उस में कई सबूत प्राप्त हुए तथा उसके कुछ अन्य साथियों के बारे में जानकारी व सबूत प्राप्त हुए हैं।  सबूत अत्यंत महत्वपूर्ण हैं जिससे उसका व उसके सहयोगियों का अपराध सिद्ध हो सकता है, मगर समस्या यह है कि उन सबूतों का किस तरह से उपयोग करें ताकि उस ठग व उसके सहयोगियों पर कार्यवाही हो सके? क्या इस तरह से प्राप्त सबूत आई टी एक्ट का उलंघन हैं?  क्या हम उस सबूतों का उपयोग न्यायालय में कर सकते हैं?

समाधान-

Hackingबूत तो सबूत हैं।  वे किस तरह हासिल किए गए हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है।  हैकिंग आई टी एक्ट में एक गंभीर अपराध है।  लेकिन इस अपराध साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को साबित करना होगा कि वाकई हैकिंग की गई थी।  उस के लिए हैकर के विरुद्ध सबूत अभियोजन कैसे हासिल करेगा  यह आप को कोई तकनीकी व्यक्ति ही बता सकता है।

दि आप को सबूत प्राप्त हुए हैं तो आप उन का उपयोग न्यायालय में परिवाद के माध्यम से कर सकते हैं।  परिवाद को धारा 156 (3) दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत पुलिस को अन्वेषण के लिए भेजा जा सकता है।  पुलिस उन्हीं सबूतों को कानूनी रूप से प्राप्त कर सकती है।  पुलिस कार्यवाही को त्वरित और असरदार बनाने के लिए मीडिया का उपयोग किया जा सकता है।

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