सेवा विधि Archive

समस्या-

ना़जिया खान ने लखनऊ, उत्तर प्रदेश  से भेजी है कि-

क्या सरकारी नौकरी वाला बिना सरकारी इजाजत के दूसरी शादी कर सकता है? और दूसरी बात ये कि क्या पीएफ में जिस का नाम नौमिनी के रूप में दर्ज  है उसी को मिलता है?

समाधान-

दि किसी व्यक्ति की पर्सनल लॉ में दूसरा विवाह करना अवैध नहीं है तो वह व्यक्ति दूसरा विवाह कर सकता है। यदि किसी नौकरी के नियमों में यह शर्त है कि वह दूसरा विवाह बिना अनुमति के नहीं कर सकता तो वैसी स्थिति में दूसरा विवाह करने के बाद शिकायत हो जाने पर ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध नौकरी मेें अनुशासनिक कार्यवाही की जा सकती है और परिणाम स्वरूप नौकरी से बर्खास्त किया जा सकता है। लेकिन यदि उस की मृत्यु हो गयी है तो फिर कुछ भी नहीं किया जा सकता।

यदि कोई आपत्ति नहीं करे तो पीएफ अर्थात भविष्यनिधि की राशि नौमिनी को ही दी जाती है। लेकिन नौमिनी के पास यह राशि एक ट्रस्टी के रूप में होती है और नौमिनी की यह जिम्मेदारी होती है कि वह इस राशि को उस के उत्तराधिकारियों में नियम के अनुसार वितरित कर दे। यदि किसी उत्तराधिकारी को आशंका हो कि नौमिनी सारी राशि उस के उत्तराधिकारियों को देने के बजय खुद रख सकता है तो वे उस की विभाग को शिकायत कर सकते हैं और जिला न्यायाधीश के यहाँ उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं और पीएफ की राशि के भुगतान को रोकने का आदेश जिला न्यायाधीश से प्राप्त कर सकते हैं।

 

 

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समस्या-

दीपक के. बगौरिया ने श्रीमाधोपुर, सीकर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


मैं अनुसूचित जाति से हूँ।  मेरे 4 साल का बेटा है और मेरी बीवी 4 माह की गर्भवती है जिसके गर्भ में जुड़वाँ बच्चे (twins) हैं। इस तरह मेरे 3 बच्चे हो जाएंगे। मैं राजनीति में भी सक्रिय हूँ तथा सरकारी नौकरी की तैयारी भी कर रहा हूँ।  3 बच्चे होने की वजह से मुझे कोई दिक्कत तो नही होगी न? कृपया मार्गदर्शन करें।


समाधान-

स मामले में आप को बिलकुल भी परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को एक संतान है और एक संतान के होते हुए उसे या उस की पत्नी को कोई प्रसव होता है और उस से जुड़वाँ बच्चों का जन्म होता है जिस से उस के तीन संतानें हो जाती हैं तो उन्हें राजनीति में चुनाव लड़ने अथवा इसी कारण से सरकारी नौकरी से वंचित नहीं होना पड़ेगा।

आप के दिमाग में जो प्रश्न है वही प्रश्न उक्त कानून और नियम बनाने वाले विधायकों के मन भी रहा होगा। इस कारण उन्होंंने इस नियम को  इस तरह बनाया है कि इस तरह अंतिम प्रसव से यदि जुड़वाँ सन्तानें जन्म लेती हैं तो इस तरह के जन्म से हुई तीसरी संतान का कोई असर इस कानून पर नहीं होगा।

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अनापत्ति का निर्णय तो सभी आश्रितों को आपस में ही करना होगा।

June 3, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

नाज़िया ख़ान ने लखनऊ, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पापा रेलवे में कर्मचारी थे। वो मेरी मम्मी को बहुत मारते थे कि पैसा लाओ। फिर उन्ही ने मार के 10 रुपए के स्टांप पेपर पर हस्ताक्षर करा लिया बोले ये तलाक़ है। लेकिन मेरी मम्मी नहीं मानी फिर उन्हों ने घर से भगा दिया। मम्मी ने फॅमिली कोर्ट में केस कर दिया। उनको वहाँ 5 हजार रुपए अंतरिम मिलने लगे। अदालत ने तलाक को नहीं माना। हम दो भाई बहन हैं। फिर मेरे पापा ने दूसरी औरत रख ली। रेलवे वाले उन्हे पास और मेडिकल सुविधा दे रहे थे। मेरे पापा की सेवाकाल में ही मृत्यु हो गई 7 महीना पहले। रेलवे वाले बोल रहे हैं कि तुम लोग इनको पेन्शन और पैसा लिखो फिर वो दूसरी औरत तुमको नौकरी लिखेगी। मैं ने कहीं नहीं सुना कि सब दूसरी पत्नी का होता है। उसके कोई बच्चे नहीं हैं।  हमारी मदद करें।

समाधान-  

दि आप के पिता का आप की माता के साथ तलाक को वैध नहीं भी मानने पर भी मुस्लिम पर्सनल ला के अनुसार दूसरा विवाह वैध था। अर्थात दोनों पत्नियों को समान अधिकार प्राप्त था। आप दोनों बहन भाइयों को भी अपना अधिकार प्राप्त है। लेकिन अनुकंपा नियुक्ति तो किसी एक आश्रित को तभी मिल सकती है जब अन्य सभी आश्रित उस के नाम पर अपनी अनापत्ति दर्ज कराएँ। अनापत्ति का निर्णय तो सब आश्रितों को मिल बैठ कर ही करना होगा।

ऐसी स्थिति में आप के पिता की दूसरी पत्नी पूरी तरह से बारगेन कर सकती है कि उसे पेंशन और नौकरी से मिलने वाली ग्रेच्युटी आदि दी जाए तो वह आप के या आप के भाई के नौकरी पाने पर अपनी अनापत्ति दे सकती है। यह बात उस ने रेलवे वालों को कही होगी और उन्हों ने आप को बताई है। इस का निर्णय तो आपसी समझ से ही करना पड़ेगा। वैसे भी यदि आप के भाई को नौकरी मिलती है तो उस के एवज में बाकी चीजें छोड़ देना बुरा नहीं है।

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अनुकंपा नियुक्ति के लिए पत्नी सब से अधिक योग्य व्यक्ति है।

June 2, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अजय कुमार शर्मा ने तहसली थानागाजी , जिला अलवर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क सरकारी कर्मचारी ने अपनी सेवा पुस्तिका में माता को नोमिनी बना रखा था। उस की मृत्यु हो गयी है। इस कर्मचारी ने भी अपने पिता के स्थान पर अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त की थी। क्या मृत्यु के उपरान्त उस की पत्नी अनुकम्पा नियुक्ति प्राप्त कर सकती है?

समाधान-  

सेवा पुस्तिका में नोमिनी अंकित कराने का अर्थ है कि यदि कर्मचारी की मृत्यु हो जाए तो उस के बकाया लाभ नोमिनी को दे दिए जाएँ। हालांकि हर नोमिनी केवल ट्रस्टी होता है उस का कर्तव्य होता है कि वह इस तरह प्राप्त धनराशि को उस के असली उत्तराधिकारियों में बांट दे। यदि कोई नोमिनी सारे लाभ स्वयं रख ले और उत्तराधिकारियों को न दे तो उस से लाभ प्राप्त करने के लिए उत्तराधिकारी दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। यहाँ तक कि विभाग से लाभ प्राप्त करने पर रोक भी लगवा सकते हैं।

नोमिनी नियुक्त करने का कोई भी संबंध अनुकंपा नियुक्ति से नहीं है। मृत्यु के दिन यदि कोई व्यक्ति सरकारी कर्मचारी था तो उस का कोई एक आश्रित उस के स्थान पर अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त कर सकता है। मृतक की पत्नी सब से बेहतर व्यक्ति है जिसे अनुकंपा नियुक्ति मिलनी चाहिए। इस के लिए किसी की अनापत्ति की आवश्यकता भी नहीं है। आप मृतक की पत्नी से समय रहते आवेदन कराएँ।

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गोद गया भाई परिवार का सदस्य नहीं है।

January 5, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

डाडम चन्द रैदास ने पनमोदी, प्रतापगढ़, राजस्थान समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी पशुपालन विभाग में कार्यरत थे, जिनका सेवाकाल के दौरान ही निधन हो गया। हम तीन भाई हैं, मेरा छोटा भाई जो मेरे चाचा जी के सन्तान नहीं होने से उनके दत्तक पुत्र के रूप में उनके पास ही रह रहा है। जो कि पशुपालन विभाग में ही डॉ. के पद पर कार्यरत है वह हमारे साथ नहीं रहता है।  मेरे पिताजी के देहान्त के दौरान मैंने अनुकम्पा नियुक्ति के लिए आवेदन किया है। लेकिन मुझे यह कह कर मना कर दिया कि आपका भाई पहले से सरकारी सेवा में कार्यरत हैं। क्या मुझे यह अनुकम्पा नियुक्ति मिल सकती है।

समाधान-

दि परिवार का कोई सदस्य पहले से सरकारी या अर्धसरकारी सेवा में हो तो अनुकम्पा नियुक्ति नहीं दी जा सकती। ऐसा करना नियम विरुद्ध होगा। आप ने कहा है कि आप का भाई चाचा के यहाँ गोद चला गया था। यदि वह गोद चला गया था तो उसे आप के परिवार का सदस्य नहीं माना जा सकता है।

लेकिन उस के गोद जाने के सबूत के रूप में पंजीकृत व वैध गोदनामा होना चाहिए। मुझे लगता है कि आप ऐसा कोई सबूत प्रस्तुत नहीं कर पाए जिस से आप के भाई को गोद चले जाना सिद्ध हो सकता।

यदि आप के पिताजी के देहान्त के पूर्व कोई गोदनामा रजिस्टर हुआ हो तो आप अब उच्च न्यायालय में रिट याचिका कर सकते हैं और गोदनामा के आधार पर भाई को चाचा के परिवार का सदस्य सिद्ध करते हुए अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं।

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आप को अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त होना संभव नहीं।

November 11, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_Compassionate-Appointment.jpgसमस्या-

मनोज राठौर ने उदयपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे पिता जी चिकित्सा विभाग में एलडीसी पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2004 में मेरे पिताजी की मृत्यु हो गयी जिसके बाद मेरे विवाहित भाई ने मेरे पिताजी की सरकारी नौकरी अनुकम्पा नियुक्ति के तोर पर प्राप्त की। वर्ष 2008 में उसकी पत्नी और  ससुराल वालों के साथ पारिवारिक झगडे के कारण उसने आत्महत्या कर ली। मेरे भाई की मृत्यु के बाद मेरे भाई की सर्विस के कारण मिलने वाला पैसा लगभग 5 लाख रूपया भी भाई की पत्नी ने ले लिया और वर्तमान में विधवा कोटे में अध्यापिका के रूप में सरकारी नोकरी कर रही है। मेरे भाई की एक बच्ची भी है। मेरी भाभी और उसकी बच्ची दोनों मेरे भाई की मृत्यु के बाद उसके पीहर में रह रही हैं। मेरे भाई की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट में पोइजन आया है। अब मेरा सवाल ये है की क्या मैं मेरे पिता की, अनुकम्पा नियुक्ति के रूप में मेरे भाई (मृत) द्वारा की गयी सरकारी नोकरी को पा सकता हूँ?

समाधान-

किसी सरकारी कर्मचारी की नौकरी में रहते हुए मृत्यु हो जाने पर उस के एक परिजन को जो नौकरी प्रदान की जाती है वह अनुकंपा का नियम है। किसी के द्वारा की जाने वाली अनुकंपा कभी भी लाभ प्राप्त करने वाले का अधिकार नहीं होता है। उसे अधिकार के रूप में नहीं मांगा जा सकता है। किन्तु राज्य ने इस तरह के नियम बनाए हैं और उस नियम के अंतर्गत राज्य सरकार को सही तरीके से काम करना होता  है।

आप के पिता के स्थान पर आप के भाई को अनुकंपा नौकरी दे दी गयी थी। चार वर्ष उस ने नौकरी भी की। वह अनुकंपा तो सरकार कर चुकी है। ऐसा कोई नियम नहीं है कि वह पीढ़ी दर पीढी दी जाती रहे। इस कारण आप को यह नौकरी प्राप्त होना संभव प्रतीत नहीं होता है।

आप के भाई के पोस्टमार्टम में जहर से मृत्यु होने का तथ्य होने से भी इस पर कोई अन्तर नहीं पड़ेगा।

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rp_Compassionate-Appointment.jpgसमस्या-

अरविन्द्र कुमार ने वाराणसी, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे पिता वाराणसी विकास प्राधिकरण में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे, जिनका सेवाकाल के दौरान ही बीमारी की वजह से 24/6/2014 को देहांत हो गया। तत्पश्चात मेरे व्दारा  विभागीय कर्मचारियों की सलाह (मौखिक) के बाद से लिपिक के पद पर मृतक आश्रित के रुप में आवेदन किया गया। लेकिन विगत दो वर्षों तक लगातार टालमटोल विभाग के द्वारा किया जाता रहा,और दिनांक 16/10/2016 को मेरी शैक्षिक योग्यताओं को नजरअंदाज करते हुए चपरासी के पद पर नियुक्ति पत्र का आर्डर जारी कर दिया गया। तमाम अधिकारियों से संपर्क करने के पश्चात भी कोई तार्किक जवाब नहीं दिया जा रहा है और उपेक्षित रवैया अपनाया जा रहा हैं। मैंने अभी तक ज्वाइनिंग नही किया है, मुझे क्या करना चाहिए, कृपया करके मेरी सहायता कीजिए कि मुझे अब क्या करना चाहिए?

समाधान-

पिता के देहान्त के उपरान्त उन के स्थान मिली नौकरी अनुकम्पा है अधिकार नहीं। वह भी तभी दी जा सकती है जब कि विभाग में स्थान रिक्त हो। आप को जानना चाहिए कि क्या विभाग में लिपिक का पद रिक्त है। यदि लिपिक का पद रिक्त है तो विभाग द्वारा आप को लिपिक के रिक्त पद पर नियुक्ति दी जानी चाहिए थी।

लेकिन आज के भीषण बेरोजगारी के युग में कोई भी नौकरी त्यागनी नहीं चाहिए। विशेष रूप से आप की परिस्थितियों में। आज तक सरकारी नौकरी के लिए इंजिनियरिंग पास लोग तक आवेदन देते दिखाई देते हैं। वैसी स्थिति में हमारी सलाह यह है कि आप को तुरन्त प्रस्तावित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी पर ज्वाइनिंग दे देनी चाहिए। नौकरी पर जाने के बाद आप को उच्च न्यायालय के किसी वकील से संपर्क कर रिट याचिका दाखिल करनी चाहिए कि लिपिक का रिक्त पद होते हुए भी जानबूझ कर आप को चतुर्थश्रेणी कर्मचारी की नौकरी दी गयी है। विभाग को आदेश दिया जाए कि वह आप की नियुक्ति लिपिक के

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अपराधिक मुकदमा लंबित होने पर सेवा से निलंबित रखा जा सकता है।

July 24, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

Trialसमस्या-

ओम प्रकाश शर्मा ने 12, नई सड़क उज्जैन (म.प्र.) से पूछा है-

मैं विगत एक वर्ष से एक वित्तीय संस्थान में कार्यरत हूँ! पिछले माह 5 जून को मेरे सहकर्मी जिनसे मेरा मनमुटाव है की पत्नी ने मुझ पर छेड़छाड़ का झूठा आरोप लगाकर रिपोर्ट दर्ज करवा दी। धारा ३५४ के तहत मामला कोर्ट में है और मैं ने सेशन से जमानत ले ली है! वर्तमान में मुझे कंपनी द्वारा सस्पेंड कर दिया गया है, जब कि ये पूरा मामला झूठा है! मुझे क्या करना चाहिये?

समाधान-

प के विरुद्ध न्यायालय में एक अपराधिक मुकदमा लंबित है और संभवतः आप 24 घंटों से अधिक न्यायिक हिरासत में भी रह चुके हैं वैसी स्थिति में कंपनी द्वारा आप को निलंबित करना गैर कानूनी नहीं है। लेकिन यह निलम्बन कोई दंड नहीं है। इस निलम्बन में आप को कंपनी के स्थाई आदेशों के अनुसार कुछ समय तक 50% तथा उस के उपरान्त 75% वेतन प्रतिमाह प्राप्त होगा। आप अपना निलम्बन समाप्त करने के लिए अपने प्रबंधन को आवेदन दे सकते हैं जिस में आप लिख सकते हैं कि किन परिस्थितियो में आप पर मिथ्या आरोप लगाए गए हैं। प्रबन्धन आप का निलम्बन समाप्त कर सकता है।

यदि प्रबंधन आप का निलम्बन समाप्त नहीं करता है तो इस संबंध में आप स्वयं कोई औद्योगिक  विवाद नहीं उठा सकते। लेकिन यदि आप की यूनियन आप का साथ देने को तैयार हो तो वह इस विवाद को उठा सकती है। यदि यूनियन निलम्बन समाप्त करने के इस विवाद को उठाने को तैयार न हो तो आप स्वयं भी इस मामले को दीवानी न्यायालय में ले जा सकते है और निलम्बन समाप्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। लेकिन यदि मामला बिना न्यायालय जाए बन जाए तो बेहतर है।

 

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मजदूरों के लिए श्रम विभाग और न्यायालयों में कोई न्याय नहीं।

July 20, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_retrenchment-300x300.jpgसमस्या-

टीकम सिंह परिहार ने चौपासनी स्कूल तिलवारियॉ बैरा राजस्थान से पूछा है-

मैं “मेक शॉट ब्लास्टिंग इक्विपमेंट प्राईवेट लिमिटेड” में पिछले 7 साल से काम करता था यह 30 साल पुरानी प्राइवेट लिमिटेड़ कंपनी है यहाँ पर PF, ESI की सुविधा भी है। यहाँ पर 200 से 250 वर्कर्स हैं जो परमानेंट कर्मचारी हैं। मैं भी उन में से एक हूँ। पहले हमें इनसेंटिव मिलता था जो इन लोगो ने बंद कर दिया और दिपावली का बोनस भी 10,000 से ज्यादा सेलेरी वालों को यह कहते हुए नहीं देते कि यह सरकार का नियम हे और 10000 से कम वालो को अभी तक नही दिया  आज़ कल आज़ कल कर रहे हैं, जब कि पहले 20% देते थे। इस के अलावा ड्रेस, जुते, साबुन आदि की सुविधा भी बंद कर दी गई और पिछले साल जुलाई 2014 से महिने की सैलेरी भी समय पर नहीं मिल रही है। इस से पहले सैलेरी 07 तारीख से पहले मिल जाती थी। फिर 07 से 08, 10, 12, 14, 16, 18 और अब अगले महिने कि 20 से 25 तारिख को मिलती है। ओवर टाईम भी यहां पर रोज 3, 4 घंटे होता है उस का भुगतान पहले ड़बल किया जाता था अब सिंगल देते हैं, वो भी 1, 1 1/2 महिना चढ़ा कर। कंपनी साफ सफाई का भी ध्यान नहीं रखती। बाथरूम व पीने के पानी की जगह इतनी गंदगी है कि नाक पर रूमाल लगा कर जाना पड़ता है। इस के बारे में जीएम, मैनेजर, व कंपनी मालिक से भी बात कर चुके हैं लेकिन समस्याओ का कोई समाधान नहीं हुआ। यहाँ पर फैब्रिकेशन का काम है बड़ी बड़ी मशीनें बनती हैं। हमारा काम बहुत ही मेहनत का है। मेन्टीनेंस का काम भी समय पर नहीं करवाते। बिजली के तार भी जगह जगह से खुले पड़े हैं। 4-5 साल तक भी मेन्टीनेंस की परवाह नहीं करते। इन सभी समस्याऔ के कारण मैं ने अपना त्याग पत्र 01/06/2016 को नोटिस देकर 30/06/2016 तक मेरा कम्पलीट हिसाब करने को लिखित में दिया जिस में वैतन,दिपावली बोनस,गे्चुटी ,व अन्य परिलाभ शामिल हैं जिस की फोटो कापी मय हस्ताक्षर मेरे पास है, मगर आज़ 18/07/2016 तक भी मुझे 1 पेसा भी नहीं मिला।  कानूनन मुझे क्या करना चाहिए? क्या मैं वेतन, दीपावली बोनस, ग्रेच्युटी के साथ बकाया ओवर टाईम पिछले 7 साल का (सिंगल जो बाकी है), 3 साल वेतन लेट का ब्याज क्या कानूनन ले सकता हूँ?    कृपया हमें मार्ग बताएँ। क्या कोई नियम नहीं है। मैं जोधपुर श्रम आयुक्त के कार्यालय भी गया। उन्होंने कारवाही करने कि बजाय कम्पनी को ही फोन कर के बता दिया कि मैं मुकदमा दर्ज़ करवाने आया हूँ और मुझे वहाँ से भगा दिया, कृपया समाधान बताएँ।

समाधान-

राजस्थान ही नहीं देश भर में श्रमिकों के मामलों में न्याय की स्थिति अत्यन्त खराब है। इस का कारण श्रम संगठनों का ह्रास है। अधिकांश श्रम संगठन श्रमिकों के संगठन नहीं है बल्कि उन्हें या तो कुछ राजनैतिक दल चलाते हैं जिन्हें राजनीति के लिए श्रमिकों के वोटों की जरूरत होती है, या फिर कुछ लोग व्यक्तिगत रूप से या सामुहिक रूप से मिल कर इसे एक व्यवासय के रूप में चलाते हैं। मजदूर वर्ग की जरूरत के कारण बने श्रमसंगठनों का लगभग अभाव है। जोधपुर की भी यही स्थिति है। आप किसी श्रम संगठन से संबद्ध प्रतीत नहीं होते जिस के कारण आप ने यहाँ यह समस्या पोस्ट की है।

आप ने उद्योग की जो स्थिति बताई है उस से लगता है कि अब यह उद्योग इस के मालिकों के लिए अधिक मुनाफे का सौदा नहीं रहा। इस कारण वे इस उद्योग की हालत जानबूझ कर खराब कर रहे हैं। उद्योग को बिना राज्य सरकार की इजाजत के बिना बन्द नहीं किया जा सकता। लेकिन धीरे धीरे मजदूरों का बकाया बढ़ाया जा रहा है इसी तरह बाजार के लेनदारों का भी बकाया बढ़ा रखा होगा और बैंकों से ऋण भी ले रखा होगा। कुछ दिन बाद यह उद्योग अपनी कंपनी को बीमार बता कर बीआईएफआर में आवेदन करेगी और मजदूरों को उकसा कर हड़ताल वगैरा करने पर मजबूर करेगी या अपने ही एजेंटों के माध्यम से कारखाने में कोई हिंसा करवा कर कारखाने में तालाबंदी करवा देगी। उस के बाद यह कारखाना कभी नहीं खुलेगा। मजदूर बरसों तक अपनी बकाया राशि के लिए अदालतों के चक्कर लगाते रहेंगे। ऐसा देश के सैंकड़ों कारखानों में हो चुका है।

मालिकों की यह योजना किसी मुकाम तक पहुंचती उस के पहले ही आप ने हालात को भांप कर स्तीफा दे दिया है। अब मालिक समझ नहीं रहा है कि आप का हिसाब दे या न दे। उस के सलाहकारों ने यह सलाह दी होगी कि हिसाब मत दो, जब मुकदमा करे और लड़ लड़ कर पक जाए तब मजदूर को आधा अधूरा हिसाब दे देना।

श्रम न्यायालयों, व  श्रम विभाग की स्थिति यह है कि श्रम न्यायालय जितने होने चाहिए उस के आधे भी राज्य में  नहीं हैं। अधिकांश न्यायालयों में उन की क्षमता से दस दस गुना मुकदमे लंबित हैं। मकदमों का निर्णय 20-30 वर्षों तक नहीं हो पा रहा है। वेतन भुगतान, न्यूनतम वेतन, ग्रेच्युटी, कामगार क्षतिपूर्ति आदि के न्यायालयों में श्रम विभाग राजस्थान के अधिकारी पीठासीन होते हैं। आधे से अधिक न्यायालयों में अधिकारी नहीं हैं। एक एक अधिकारी चार चार न्यायालयों को संभालता है  जिस का नतीजा यह है कि वहाँ भी न्याय नहीं हो रहा है।

इतना सब हो जाने के बावजूद राजस्थान का मजदूर वर्ग सोया पड़ा है। मजदूरों के नाम पर जितने भी संगठन राजस्थान में काम कर रहे हैं वे सिर्फ अपने स्वार्थों के लिए काम कर रहे हैं उन में से कोई भी वास्तविक मजदूर संगठन या ट्रेडयूनियन नहीं है। ऐसा लगता है कि श्रमिकों के लिए इस राज्य में न्याय है ही नहीं।

इन विपरीत परिस्थितियों में आप को चाहिए कि आप अपने नगर में ही किसी ऐसे वकील से मिलें जो श्रम संबंधी मामलों की वकालत करता हो। सीधे उस से बात करें कि आप त्याग पत्र दे चुके हैं और आप को अपना हिसाब अपने नियोजक से लेना है। यह हिसाब लेने के लिए उन के माध्यम से कार्यवाही करें। इस के लिए आप को दो तीन मुकदमे करने पड़ सकते हैं। ग्रेच्युटी के लिए एक फार्म में आवेदन प्रेषित कर दें ग्रेच्यूटी न देने पर उस का आवेदन प्रस्तुत करें। एक आवेदन बकाया वेतन व अन्य लाभ जो वेतन की परिभाषा में आते हों उन के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में कार्यवाही करें। अन्य सभी परिलाभों के लिए भी आप की स्थिति देख कर तथा तमाम तथ्यों की जानकारी कर के आप के वकील निर्धारित करेंगे कि क्या कार्यवाही करनी चाहिए?

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अपनी सेवा के नियमितिकरण के लिए कार्यवाही करें।

July 9, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मिथिलेश पटेल ने जबलपुर मध्यप्रदेश से पूछा है-rp_gavel12.jpg

मैं जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित, जबलपुर (मध्य प्रदेश) में कलेक्टर जबलपुर द्वारा निर्धरित दैनिक कुशल श्रेणी वेतन पर कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर सितम्बर 2008 से कार्यरत हूँ।  मुझे पहला आदेश कंप्यूटर ऑपरेटर पद का दिया गया, फिर बाद में प्रोसेस सर्वर पद का आदेश दिया गया पर कार्य कंप्यूटर ऑपरेटर का ही कराया जा रहा है। मैं जोइनिंग दिनांक से लगातार बिना कोई रुकावट के कार्य कर रहा हूँ। पहले हमारा PF नहीं काटा जाता था तो PF ऑफिस में शिकायत करने पर उनके द्वारा हमारे कार्यालय को आदेशित किया गया कि मेरा PF मेरी जोइनिंग दिनांक से काटा जाएँ। जबकि मेरा PF जून २०१६ से काटा जा रहा है। फिर से PF कार्यालय का जोइनिंग दिनांक से PF काटने का नोटिस मिलने पर हमारे कार्यालय द्वारा हमें सेवा से पृथक करने की धमकी दी जा रही है। जबकि हम लगातार दैनिक वेतन पर कार्य कर रहे हैं। इस तरह हम तीन कर्मचारी बैंक कार्यालय में कार्यरत हैं। मेरी पिछले एक वर्ष 366 दिनों में 360 दिनों की पेमेंट बनी हैं मेरे पास सिर्फ पेमेंट आर्डर शीट है।

समाधान-

प्रोविडेण्ट फण्ड विभाग का यह काम है कि वह जिन उद्योगों पर प्रोविडेण्ट फण्ड प्रभावी है वहाँ उस की पालना कराए। जब आप का प्रोविडेण्ट फण्ड एक बार कट चुका है तो पिछला बकाया भी उन्हें देना ही होगा। पर एक बार तसल्ली कर लें कि प्रोविडेण्ट फण्ड जो आप के वेतन से काटा जा रहा है वह विभाग में जमा भी कराया जा रहा है या नहीं।

आप के पास सितम्बर 2008 से नौकरी करने के सबूत हैं। यदि न भी हों तो भी बैंक की कैशबुक आदि को मिटाया नहीं जा सकता। कभी भी उन्हें अदालत में मंगाया जा कर यह साबित किया जा सकता है कि आप ने कब से कब तक काम किया है।

इस तरह की धमकियों से डरने की कोई जरूरत नहीं है। बल्कि यदि कोई धमकी देता है उस का कोई गवाह सबूत हो तो पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा देना चाहिए।

आप एक लंबे समय से काम कर रहे हैं,आप को मांग करनी चाहिए कि आप की सेवा का नियमितिकरण कर आप को स्थायी किया जाए तथा वेतन श्रंखला में वेतन दिया जाए। यह काम आप यूनियन के माध्यम से कर सकते हैं तथा इस का औद्योगिक विवाद उठा सकते हैं। यदि यूनियन यह करने को तैयार न हो तो इस के लिए आप व्यक्तिगत रूप से रिट याचिका भी उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत  कर सकते हैं। इस मामले में आप को स्थानीय उच्च न्यायालय के सेवा सम्बन्धी मामलों के अनुभवी वकील से परामर्श करना चाहिए।

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