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रजिस्टर्ड बंटवारानामा संपत्ति के स्वत्व का दस्तावेज है।

May 17, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जितेन्द्र ने उज्जैन, से मध्य प्रदेश -समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी की मुत्यु हो चुकी है। मेरे दादाजी की स्वंय अर्जित सम्पत्ति का एक मकान जो कि हॉउसिंग बोर्ड द्वारा लीज होल्ड है एवं नगर निगम सीमा में है जिसका सम्पत्ति कर वगैरह उस सम्पत्ति पर निवासरत् दादाजी के 3 पुत्रों द्वारा सम्मिलित रूप से जमा किया जाता है। दादीजी का भी देहान्त दिनांक हो गया है। दादाजी की कुल 7 संतानें (5 पुत्र एवं 2 पुत्रियां) हैं। दादाजी ने अपनी मृत्यु के पूर्व कोई भी वसियत भी नहीं की थी। इस सम्पत्ति पर वर्तमान में 3 पुत्रों के परिवार निवासरत है, अन्य में से 1 पुत्र लापता है, 1 पुत्र अन्यत्र निवासरत है, 1 पुत्री का देहान्त कुछ समय पूर्व हो चुका है एवं 1 पुत्री अन्यत्र निवासरत होकर अविवाहित है। इस सम्पत्ति का बंटवारा किस प्रकार किया जा सकता है? सभी संतानों का मालिकाना हक किस प्रकार इस सम्पत्ति पर हो सकता है? मालिकाना हक से संबंधित क्या दस्तावेज तैयार करवा सकते हैं? कृपया बतायें- 1. क्या इस सम्मत्ति की रजिस्ट्री होगी? 2. हॉउसिंग बोर्ड इस सम्पत्ति में क्या कार्यवाही कर सकता है ? 3. रजिस्टर्ड बंटवारा ओर रजिस्ट्री में क्या कोई अंतर है? क्या रजिस्टर्ड बंटवारा में रजिस्ट्री के सभी अधिकार प्राप्त होते है या नहीं?

समाधान-

ब आप रजिस्ट्री शब्द का उल्लेख करते हैं तो आम तौर पर उसका अर्थ पंजीकृत विक्रय पत्र से या पंजीकृत लीज डीड से होता है। लेकिन पंजीकरण का कानून यह है कि यदि 100 रुपए से अधिक कीमत की कोई अचल संपत्ति का हस्तांतरण हो तो उस की रजिस्ट्री होना जरूरी है। बंटवारा भी ऐसा ही एक विलेख है। पंजीकरण कानून कहता है कि बंटवारे के विलेख का पंजीकृत होना जरूरी है वर्ना वह विलेख जरूरत पड़ने पर किसी कार्यवाही में नहीं पढ़ा जाएगा।

संपत्ति के सभी साझेदारों के बीच आपसी सहमति से बंटवारा होता है तो उसे पंजीकृत कराना जरूरी है। यह पंजीकृत विलेख ही संपत्ति के स्वामित्व का विलेख होगा। हाउसिंग बोर्ड या नगर निगम में जहाँ संपत्ति का रिकार्ड रहता है वे अपने रिकार्ड में नामान्तरण करते हैं लेकिन नामान्तरण हो जाने से किसी को स्वत्वाधिकार प्राप्त नहीं होता है। नामान्तरण गलत होने पर न्यायालय के आदेश से उसे हटाया या दुरुस्त किया जा सकता है। स्वअर्जित संपत्ति में सभी पुत्रों और पुत्रियों का समान हिस्सा है। यदि किसी का देहान्त हो गया है तो उस की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों को जाएगी। किसी के मर जाने से या गायब हो जाने से उस का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता है।

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समस्या-

नीलम खन्ना ने मनीमाजरा, चंडीगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी को उनके पिताजी से साल 1911 में संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। मेरे पिताजी को दादा जी से उनकी संपत्ति साल 1971 में उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। हम दो भाई बहन हैं। मेरे पिताजी ने सारी संपत्ति की वसीयत मेरे भाई के बेटे के नाम कर दी, मेरे पिताजी के देहांत के बाद सारी संपत्ति मेरे भतीजे के नाम हो गई। मैंने जुलाई 2016 में अपने हिस्से के लिए केस दायर किया, मैंने संपत्ति को बेचने से रोकने के लिए अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन किया, लेकिन उस समय मेरे पास संपत्ति का पिछला रिकॉर्ड ना होने के कारण अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन रद्द हो गया। मैंने अब पिछला सारा रिकॉर्ड निकलवा लिया है क्या मैं अब दोबारा अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन कर सकती हूँ? क्या मुझे अपना हिस्सा मिल सकता है?

समाधान-

प के द्वारा दिए गए विवरण से यह स्पष्ट है कि उक्त संपत्ति सहदायिक है। आप ने विवरण में यह नहीं बताया है कि आप के पिताजी की मृत्यु कब हुई है। यदि आप के पिता जी की मृत्यु. 2005 के बाद हुई है तब आप को 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में हुए संशोधन से इस सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त हो चुका था। उस वक्त आप के पिता केवल अपने हिस्से की वसीयत कर सकते थे न कि पूरी संपत्ति की। इस प्रकार आप का हिस्से का दावा सही है आप को हिस्सा मिलना चाहिए।

दावा तो पहले भी हिस्से का ही हुआ होगा। अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन तो उसी दावे में प्रस्तुत किया गया होगा। यदि वह दावा अभी चल रहा है तो उसी दावे में अस्थाई निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र पुनः प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि दावा भी आप ने खारिज करवा लिया है या अदम हाजरी अदम पैरवी में खारिज हो चुका है तो उस का रिकार्ड देख कर तय करना पड़ेगा कि उसे दुबारा किस प्रकार किया जा सकता है। बेहतर है आप वहीं दीवानी मामलों के किकसी अच्छे वकील से सलाह कर आगे कार्यवाही करें।

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समस्या-

प्रशान्त ने ग्राम नूरपुर, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे दादाजी चार भाई थे जिस में एक निस्सन्तान थे। मेरे दादा जी से पहले उन के दो भाइयों की मृत्यु हो गयी। उन के हिस्से कि संपत्ति उन के उत्तराधिकारियों को मिल गयी। 2004 में निस्सन्तान दादाजी की संपत्ति मेरे दादाजी को मिल गयी।  अब 2012 में मेरे दादाजी की भी मृत्यु हो गयी। उन की संपत्ति हमारे नाम आ गयी। अब मेरे दादा जी के भाई का लड़का बोलता है कि मेरा भी हिस्सा था इस में, तो क्या 29.06.2004 को  भाई का हक भतीजे को भी मिलता था?

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में कोई व्यक्ति निस्सन्तान मर जाए और उस की पत्नी और पिता भी जीवित न हों तो फिर उस की सम्पत्ति जीवित भाई को ही प्राप्त होगी।  इस तरह आप के दादा जी के भाई की मृत्यु पर आप के दादा जी को प्राप्त हुई वह सही थी। उस में मृत भाई के पुत्र का का कोई हिस्सा नहीं था।

लेकिन यदि दादाजी के निस्संतान भाई की संपत्ति में उत्तरप्रदेश में स्थित कोई कृषि भूमि है तो उस भूमि का उत्तराधिकार उ.प्र. जमींदारी विनाश अधिनियम से तय होगा और उस स्थिति में पूर्व मृत भाई के पुत्र को भी हि्स्सा पाने का अधिकार है। यह विधि 29.06.2004 को भी प्रचलित थी।

 

 

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समाधान-

राम नारायण ने बड़ौदा, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या ये है कि मेरे पिता की स्वअर्जित सम्पति है।  जिसे मेरे पिता ने 1965 में लिया था।  मेरे पिता का देहांत 03/10/2005 को हो गया है।  मेरे पिता ने कोई वसीयत नहीं बनाई थी।  देहांत के बाद मेरी 3 बहनो में से एक बहन ने अपनी परिस्थिति का रोना रोकर मेरे से मेरा एक रूम ले लिया और बोली की मेरी परिस्थिति ठीक होने के बाद मैं चली जाउंगी। लेकिन अब 8 साल हो गया है। लेकिन वो जाने को नहीं बोलती है और झगड़ा करती है। मेरी माँ मेरे साथ ही रहती है। उससे भी झगड़ा करती है। मेरी बहन को रूम से निकालने के लिए क्या करना होगा? मेरी बहन का आदमी भी उसके साथ ही रहता है।


समाधान-

प के पिता की स्वअर्जित संपत्ति पर आप के पिता की मृत्यु के साथ ही उन के उत्तराधिकारियों का स्वत्वाधिकार स्थापित हो गया। आप अकेले उस संपत्ति के स्वामी नहीं हैं। पुत्र होने के नाते आप अकेले उस मकान के स्वामी नहीं हो सकते। इस मकान में फिलहाल पाँच हिस्से हैं। एक आप की माँ का तीन आप की बहनों के और पाँचवाँ आपका। यदि आप बहिन से कुछ कहेंगे तो वह अदालत में बंटवारे का दावा करेगी। दूसरी बहनों और माँ को भी साथ ले लेगी तो आप को केवल पाँचवाँ हिस्सा ही प्राप्त होगा, जो आप का है। वैसे भी जब तकआप को सभी बहनों से रिलीज डीड के माध्यम से हक प्राप्त नहीं हो जाए उन सभी का हि्स्सा बना रहेगा।

बहिन ने परिस्थिति का रोना रो कर जो कमरा प्राप्त किया है वह उस का हक है। उस ने कैसे भी मकान पर कब्जा प्राप्त कर लिया है और उसी में रहती भी है आप अपनी बहन को रहने दें। जो भी समाधान हो वह प्यार से आपसी समझ से करें।

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समस्या-

घनश्याम पाण्डेय ने सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


 मेरे पड़ोस में मेरी मुँह बोली बहन रहती है। जिसका विवाह मात्र १२ वर्ष के उम्र १९९८ में ही कर दिया गया। यह बाल विवाह ही था, लड़के की उम्र १२ साल ही थी।  खैर यह शादी मात्र चार वर्ष ही चली और २००२ में पंचायत के सामने तलाक करवा दिया गया और उनसे कोई संतान नहीं हुई।  बहन का दूसरा विवाह लगभग १८ की उम्र में २००४ में हुआ, जहाँ पर उसे दो लड़की संताने भी हुई, साल २०११ में उसे दूसरी लड़की पैदा होने पर घर से निकाल दिया गया। अतः वह तब से मायके में ही रहती है। उसके ननद, देवर और पति सभी उस पर अत्याचार करते हैं। जब वह जाती है, बड़ी बेरहमी से पति, देवर मार कर उसे भगा देते हैं।  बहन के मायके वाले भी ज्यादा सहयोगी नहीं। अतः पुनः २०१५ के एक साधारण समारोह द्वारा उसका तीसरी जगह जबरदस्ती घरवालों ने विवाह करवा दिया।  जो कि वैवाहिक संस्कार करके नहीं किये गए थे, उसे कुछ भी नाम दिया जा सकता है। लेकिन यह विवाह भी मात्र २ महीने न चला। अब बहन आज भी बार बार दूसरे विवाह के पति के घर जाती है, जहाँ पर उसकी बड़ी बेटी ले ली गयी, जब कि दूसरी बेटी को पति अपनी संतान स्वीकार नहीं करता है। जब उसका जन्म पति के घर में ही हुआ। अतः ऐसी परिस्थिति में बच्चों के क्या अधिकार अपने नैसर्गिक पिता से बनते हैँ तथा बहन भी क्या अपने दूसरे पति के अधिकार प्राप्त कर सकती है। वह अत्यंत गरीब अवस्था में है, माँ-बाप तथा पति सभी उसके खिलाफ हो गए। वह अपनी छोटी बेटी के साथ किसी तरह गुजारा कर रही है। अतः बच्चों और बहन का क्या अपने दूसरे पति के ऊपर क़ानूनी अधिकार बनता है। बहन आज भी अपने पति के घर जाना चाहती है तथा लगभग पागलपन की अवस्था पर पहुँच गयी है।

समाधान-

हिन्दू विवाह केवल और केवल न्यायालय की डिक्री से ही समाप्त हो सकता है इस कारण से आप की मुहँबोली बहिन यदि अनुसूचित जनजाति से नहीं है तो उस का पहला विवाह आज तक भी समाप्त नहीं हुआ है। उस का पहला पति ही उस का वैधानिक पति है। पहले पति से विवाह विच्छेद वैधानिक न होने से दूसरा विवाह वैध नहीं था। इस कारण आपकी बहिन का दूसरे पति से कोई अधिकार नहीं है। लेकिन उस की दोनों संतानें दूसरे पति से हैं इस कारण संतानों को अपने पिता से भरण पोषण पाने का अधिकार है। तीसरे पति के साथ आप की बहिन दो माह से भी कम समय रही है वह रिश्ता एक लघु अवधि का लिव इन था। इस कारण इस संबंध से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं हुआ है।

अभी तक आपकी मुहँ बोली बहिन का पहले पति से रिश्ता समाप्त नहीं हुआ है इस कारण वह पहले पति से भरण पोषण की मांग कर सकती है। इस के लिए न्यायालय में अर्जी दाखिल कर सकती है। इस के साथ ही वह अपनी छोटी पुत्री के लिए अपने दूसरे पति से भरण पोषण की मांग कर सकती है।

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विधवा को ससुर की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं।

April 28, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

किरन सोनी ने गिरजाबाग, जिला उन्नाव, उत्तरप्रदेश से अपनी समस्या भेजी है-

मेरे पति का देहान्त 1987 में हो चुका है। मेरे ससुर के पास स्वअर्जित 12 बीघा सम्पत्ति है। उनकी उम्र लगभग 96 साल है। मेरे ससुर के चार लड़के और चार लडकिया हैं। इस जमीन पर मेरे पति ईट भट्ठा चलाते थे जो उनके मरने के बाद मेरे देवर सब बर्बाद कर दिया। मेरे ससुर ने अपनी जरूरत के लिये मेरे लड़के का मकान उसको बहला फुसलाकर बिकवा दिया और उसको दो बीघा जमीन रजिस्ट्री करके लिख दी। मेरा लडका प्राईवेट नौकरी करके किसी तरह अपना और मेरा गुजारा करता है। अब वो 2 बीघा जमीन फिर से वापस मांग रहे हैं। उन्होंने अपने छोटे लड़के को करीब 17 दुकानें जो कि उनका मार्केट था। उसमें बिना पैसा लिये रजिस्ट्री कर दी थी। छोटा लड़का उनका पुलिस में दरोगा है और मेरे ससुर उन्हीं के साथ रहते हैं व उनकी बात मानते हैं। बाकी दोनों लड़कों को बहुत कुछ दिया जिसमें नकदी व कुछ जमीन भी शामिल है। लेकिन पैसे के लेन देन का कोई रिकार्ड नहीं है। मेरे पति का दिया हुआ सारा जेवर और सारा सामान, बर्तन तक ले लिये और मुझसे कोई वास्ता नहीं रखा। सब मेरे व मेरे लड़के के खिलाफ हैं क्योकि हम गरीब हैं। मेरे लड़के से मेरे ससुर बात तो करते हैं लेकिन और लड़कों के मतलब के लिये। आज अपने बाकी लड़कों और लड़कियों को रजिस्ट्री करने तहसील में गये हुये है और रजिस्ट्री कर दी होगी। जबकि पैसा मेरे लड़के ने दिया है। और किसी ने कुछ नहीं दिया है मुझे आज तक कुछ नहीं मिला है। मुझे किसी प्रकार से कोई पेंशन वगैरह भी नहीं मिलती है। आज मेरी 3 ननदें मिलकर उस जमीन का बँटवारा मेरे ससुर से करवा रही हैं और मुझे कुछ भी नहीं देने को कह रही है मेरा लड़का भी परेशान है क्योंकि सारी जमा पूंजी भी मेरे ससुर ले चुके है और कुछ देने को नहीं कह रहे हैं। क्या विधवा औरत का ससुर की सम्पत्ति में कोई हक नहीं है जब उसका पति भी नहीं जिन्दा है। क्या मुझे कुछ नहीं मिलेगा? कृपया मेरा मार्गदर्शन करें।

समाधान-

किसी की स्वअर्जित संपत्ति पर उस व्यक्ति के जीते जी किसी अन्य व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं होता है। उस की स्वंय की पत्नी, माता, पिता या संतानों का भी कोई अधिकार नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति बिना कोई वसीयत किए मर जाए तो मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार में उस की पत्नी, माँ व संतानों को उत्तराधिकार प्राप्त होता है। आप के पति का देहान्त हो चुका है। तथा आप के ससुर के पास स्वअर्जित संपत्ति 12 बीघा है। इस संपत्ति पर किसी का कोई अधिकार नहीं है वे जिसे चाहें दे सकते हैं। उस जमीन में से दो बीघा जमीन उन्हों ने आप के बेटे को रजिस्ट्री करवा कर दे दी है। इस के अलावा भी उन के सात लड़के लड़कियाँ हैं। इस तरह उन्हों ने पहले ही जमीन में से आप के पति को आप के ससुर के मरने के बाद मिलने वाले अधिकार से अधिक आप के बेटे को दे दिया है।

यदि आप का लड़का आप के ससुर को या परिवार के दूसरे सदस्यों को कुछ देता है तो उस की मर्जी है और आपके ससुर उस का क्या करते है यह भी उन की इच्छा पर निर्भर करता है। यदि आप के पास धन नहीं हैं तो किसी को देते क्यों हैं और ससुर की बातों में भी क्यों आते हैं। हमारी राय है कि आप के बेटे को जो दो बीघा जमीन रजिस्ट्री से मिल गयी है उसे किसी हालत में वापस न करे। अन्यथा आप को और आप के बेटे को अधिकार के रूप में कुछ भी नहीं मिलने वाला है। बाकी जमीन या संपत्ति जो भी है उसे आप के ससुर कैसे बाँटते हैं यह उन की मर्जी पर है। वे अपनी स्वअर्जित संपत्ति के स्वयं मालिक हैं उस का कुछ भी कर सकते हैं। यह सही है कि विधवा पत्नी का ससुर की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है। उस का अधिकार सिर्फ अपने मृत पति की संपत्ति पर है।

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समस्या-

राकेश कुमार ने अलवर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी ओर मेरे भाई की शादी फऱवरी 2015 में हुई। शादी के 1 साल तक सही रहा।  इसके बाद हम दोनों भाई की उनसे बनी नहीं वो बिना बात पे ही हम से लड़ाई करती थी।  फिर वो दोनों चली गई, हम लेने गए तो दोनो नहीं आई।  बड़ी बहन गर्भ से थी। हम ने धारा 9 का केस डाल दिया। चार माह बाद जब डिलीवरी होने का टाइम आया तो उन्होने कहा कि इनको ले जाओ।  हम दोनों को ले आए। डिलीवरी के दो माह बाद छोटी बहन, मेरी घरवाली कहती है कि मुझे नहीं रहना तलाक चाहिए। हम ने उसको कई बार रहने को बोला लेकिन वो अपने माँ बाप के पास चली गई और उसके बाद उसने मुझे नोटरी करवा कर रुपए 100 के स्टांप पर तलाक़ दे दिया और बड़ी बहन अभी रह रही है, क्या ये तलाक़ मान्य है।

समाधान-

प खुद हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत एक आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर चुके हैं। इस का अर्थ है कि आप हिन्दू विवाह अधिनियम से शासित होते हैं। इस अधिनियम में कोई भी तलाक केवल तभी मान्य होता है जब कि न्यायालय से डिक्री पारित हो जाए।

आप की पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती है और उस ने 100 रुपए के स्टाम्प पर आप को तलाकनामा लिख भेजा है। यह अपने आप में क्रूरता पूर्ण व्यवहार है। आप इसी स्टाम्प के आधार पर तथा अन्य आधारों पर परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी प्रस्तुत कर सकते हैं। आप को तुरन्त कर ही देनी चाहिए। न्यायालय से डिक्री पारित होने और निर्धारित अवधि में उस की कोई अपील दाखिल न होने पर यह तलाक अन्तिम हो सकता है।

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पिता की संपत्ति में सन्तान का हिस्सा …

January 11, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

रश्मि ने भोपाल मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी को अपने पिता जी से संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी अब पिताजी उस की वसीयत सिर्फ मेरे भाई के नाम करना चाहते हैं। हम तीन बहनें हैं क्या इस संपत्ति में हम बहनों का भी अधिकार है।

 

 

समाधान-

दि आप के पिताजी को प्राप्त यह संपत्ति उन के पिताजी या दादा जी को उन के किसी पूर्वज से उत्तराधिकार में 17 जून 1956 के पूर्व प्राप्त हुई थी और तब से लगातार उत्तराधिकार में ही प्राप्त होती रही है तो वह संपत्ति सहदायिक हो सकती है और उस में आप का हिस्सा हो सकता है।

लेकिन 17 जून 1956 के बाद कोई भी व्यक्तिगत संपत्ति उत्तराधिकार के आधार पर सहदायिक नहीं हो सकती। यदि ऐसा है तो आप के पिता जी को उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति उन की व्यक्तिगत हो सकती है, उस में उन के जीवनकाल में किसी का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होगा और उसे वे जिसे चाहें वसीयत कर सकते हैं। वैसी स्थिति में आप बहनों या भाई को कोई अधिकार उक्त संपत्ति में प्राप्त नहीं होगा। जिसे भी प्राप्त होगा वसीयत के कारण प्राप्त होगा।

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पिता की संपत्ति में हिस्सा?

December 15, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

partition of propertyसमस्या-

सुबाला देवी ने रांची, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मैं एक शादीशुदा महिला हूँ। मैं अपने पिताजी के चल-अचल संपति में हिस्सा चाहती हूँ। लेकिन मेरे पिताजी माँ और मेरे भाई हिस्सा नहीं देना चाहते हैं।  इसके लिए मुझे क्या करना होगा? मेरे पास कोई कगजात भी नहीं हैं।

समाधान-

किसी भी पुत्र या पुत्री को अपने पिता या माता की स्वअर्जित सम्पत्ति में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। जब तक वे जीवित हैं यह संपत्ति उन की है और वे अपनी इच्छानुसार इस का उपयोग कर सकते हैं। यदि माता या पिता में से किसी का देहान्त हो जाए और मृतक ने अपनी संपत्ति या उस का भाग वसीयत न किया हो तो ऐसी संपत्ति का स्वामित्व मृत्यु के साथ ही उस के उत्तराधिकारियों में निहीत हो जाता है। सभी उत्तराधिकारी उस संपत्ति के संयुक्त स्वामी हो जाते हैं। ऐसे संयुक्त स्वामियों में से कोई भी संपत्ति के बंटवारे और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा प्राप्त करने का वाद न्यायालय में संस्थित कर सकता है।

यदि आप के पिता के पास कोई पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति है तो उस में जन्म से ही पुत्रों का अधिकार होता है। 2005 से पुत्रियों का अधिकार भी होने लगा है। तब आप उस संपत्ति की संयुक्त स्वामी हो सकती हैं और उस में आप का हिस्सा हो सकता है। आप चाहें तो बँटवारे और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा प्राप्त करने का वाद न्यायालय में संस्थित कर सकती हैं।

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Muslim-Girlसमस्या-

पवन ने नरवाना, हरियाणा से पूछा है-

मेरे नाना की अचल संपत्ति है जो पुश्तैनी है। मेरे नाना के एक पुत्र और तीन पुत्रियाँ हैं। पुत्र की मृत्यु हो गयी है। उस की पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है। क्या दूसरा विवाह करने के बाद भी वह स्त्री मेरे नाना की अचल संपत्ति में हिस्सा प्राप्त कर सकती है?

समाधान-

जिस क्षण एक सहदायिकी के किसी सदस्य का देहान्त होता है उस के हिस्से की संपत्ति का उत्तराधिकार निश्चित हो जाता है और उस के उत्तराधिकारी हिस्सेदार बन जाते हैं।

आप की मामी मामा का देहान्त होते ही उस सहदायिकी का हिस्सा बन गयी है जिस में आप के मामा का हिस्सा था अर्थात आप के नाना की पुश्तैनी संपत्ति में। एक बार वह हिस्सेदार हो गयी तो फिर उस के द्वारा फिर से विवाह कर लेने से उस की सहदायिकी की सदस्यता समाप्त नहीं होगी। वह अपने हिस्से के बंटवारे की मांग कर सकती है और न दिए जाने पर वह न्यायालय से बंटवारा करवा सकती है।

यदि आप के नाना की संपत्ति पुश्तैनी न हो और उन की स्वअर्जित हो तब भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आप की मामी उन का हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी हैं। उन के दूसरा विवाह कर लेने से उन का यह अधिकार समाप्त नहीं होगा। इस संदर्भ में मद्रास उच्च न्यायालय का श्रीमती यमुना देवी बनाम श्रीमती डी नलिनी के प्रकरण में दिया गया निर्णय पढ़ा जा सकता है।

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