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विधवा द्वारा ग्रहण की गई दत्तक संतान का पिता कौन कहलाएगा?

August 3, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

पुरुषोत्तम शर्मा ने हनुमानगढ़, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

श्रीमती कमला पत्नी स्व. लालचन्द कमला देवी की आयु 45 वर्ष थी और कमला देवी के कोई औलाद नहीं थी और ना ही होने की सम्भावना थी। कमला के पति लालचन्द की मृत्यु हो चुकी.थी। कमला.ने अपने जेठ लक्ष्मीनारायण के लड़के धर्मवीर को हिन्दू रीति रिवाज के अनुसार बचपन से गोद ले रखा है। गोदनामा बना हुआ है कमला.ने अपनी सम्पति का त्याग कर धर्मवीर के नाम कर दी है। तो आप मुझे ये बताएँ कि पहले सभी डाँक्यूमेन्ट में धर्मवीर पुत्र श्री  लक्ष्मीनारायण था अब पि.मु./दत्तक पुत्र होने के बाद भविष्य में सभी धर्मवीर के डाक्युमेन्ट में क्या नाम करवाया जाए? लालचन्द की मृत्यु के बाद कमला ने धर्मवीर को गोद लिया था। अब.पहचान पत्र, आधार कार्ड, राशन कार्ड, भामाशाह कार्ड, बैक खाता, लाईसेन्स, सभी डाक्युमेन्ट में क्या नाम करवाया जाए, जो भविष्य मे पूर्ण रुप से सही हो और कोई समस्या ना आए? कोई कहता है. धर्मवीर पि.मु./दत्तक पुत्र कमला करवा लो और कोई कहता है धर्मवीर पि.मु./दत्तक पुत्र लालचन्द करवा लो। तो आप ही बताएँ कि भविष्य में क्या नाम पूर्ण रूप से सही होगा? आपका सुझाव यह था कि बच्चे का दत्तक ग्रहण होने के उपरान्त उस के पिता के स्थान पर उस के दत्तक पिता का ही नाम होना चाहिए। अन्यथा अनेक प्रकार की परेशानियाँ हो सकती हैं। मुझे थोड़ा समझने मे समस्या आ रही है कि धर्मवीर को कमला देवी ने गोद लिया था, ना कि लालचन्द ने। धर्मवीर को गोद लेने से पहले ही लालचन्द की मृत्यु हो चुकी थी। लालचन्द की मृत्यु होने के कुछ समय बाद कमला देवी ने धर्मवीर को गोद लिया था।

समाधान-

मारा जो सुझाव था वही सही है। यदि विधवा किसी पुत्र को दत्तक ग्रहण करती है तो उस का दत्तक पिता दत्तक ग्रहण करने वाली स्त्री का पति ही होगा। उस के पिता के स्थान पर उस के जन्मदाता पिता का नाम तो इस कारण अंकित नहीं किया जा सकता कि वह तो अपनी पत्नी की सहमति से अपने पुत्र को दत्तक दे चुका होता है और पिता होने की हैसियत को त्याग देता है।

हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण पोषण अधिनियम 1956 की धारा 14 की उपधारा (4) में उपबंधित किया गया है कि जब एक विधवा या अविवाहित स्त्री किसी बालक को दत्तक ग्रहण करती है और बाद में किसी पुरुष से विवाह करती है तो जिस पुरुष से वह विवाह करती है वह उस दत्तक बालक का सौतेला पिता कहलाएगा।

इस उपबंध से स्पष्ट है कि किसी विधवा द्वारा दत्तक ग्रहण करने पर दत्तक ग्रहण किए गए बालक का पिता उस विधवा स्त्री का मृत पति ही होगा। इस मामले में दत्तक ग्रहण किए गए बालक के दस्तावेजों में धर्मवीर पुत्र स्व. श्री लालचंद लिखवाना होगा। जो कि दत्तक ग्रहण विलेख की प्रति प्रस्तुत कर परिवर्तित कराया जा सकता है। हर दस्तावेज में परिवर्तन की प्रक्रिया भिन्न भिन्न हो सकती है जो आप संबंधित विभाग से पता करें।

समस्या-

वत्सला कुमारी ने पटना, बिहार से  समस्या भेजी है कि-

म लोग तीन बहन और एक भाई है। तीनों बहन औार भाई की शादी हो चुकी है। भाई का एक बेटा है। एक बहन की एक बेटी है। एक बहन की कोई संतान नहीं है। हमारे दो संतान है, एक बेटा और बेटी है। हमारे दादा जी के दो मकान हैं। एक मकान जिला-पटना, राज्य-बिहार में है जो पटना पीपुल्स कॉपरेटिव से सन् 1968 में खरीदी गई थी, और दूसरा मकान जिला-मुंगेर, राज्य-बिहार में है जो सन् 1969 में मेरे दादा जी ने अपने भाई से खरीदा था जो खास महल की जमीन पर बनाया हुआ है। मेरे दादा जी को एक ही संतान मेरे पिताजी थे। मेरे दादा जी का देहांत सन 1983 में, पिताजी का देहांत सन 1999 में तथा मेरे माता जी की देहांत सन 2017 में हुई। मेरे भाई ने पिताजी की देहांत के बाद पटना के मकान जो पिपुल्स कॉपरेटीव में हैं बिना किसी सूचना के अपना नाम सन् 2000 में अपना नाम से करबा लिया। उक्त मकान का विभाजन किस प्रकार किया जा सकता है। मेरा भाई दोनों मकान पर अपना दावा करता है। क्या उक्त मकान पर हमारा अधिकार है?

समाधान-

दोनों मकान आप के दादा जी ने 1956 के बाद खरीदे थे। आप के दादाजी और पिता जी की संपत्ति का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 के अनुसार तय होगा। आप के दादाजी के देहान्त के बाद यदि दादी जीवित रही होंगी तो इन दोनों मकानों के दो हिस्सेदार आप के पिता और आप की दादी हुईं। दादी के देहान्त के बाद केवल आप के पिता उस के स्वामी हुए। अब पिता के तीन बेटियाँ और एक पुत्र है। माताजी का देहान्त भी हो चुका है। ऐसी स्थिति में तीनों पुत्रियाँ और एक पुत्र कुल संपत्ति के ¼ एक चौथाई हिस्से के स्वामी हैं। बंटवारा होने पर चारों को बराबर के हिस्से प्राप्त होंगे।

आप ने लिखा है कि भाई ने मकान अपने नाम करा लिया है। तो अधिक से अधिक यह हुआ होगा कि भाई ने नगर पालिका या नगर निगम में नामान्तरण करवा लिया होगा। लेकिन नामान्तरण से किसी अचल संपत्ति का स्वामित्व निर्धारित नहीं होता है। आप के पिता के देहान्त के साथ ही संपत्ति चारों संतानों की संयुक्त हो चुकी थी। चारों का यह स्वामित्व केवल किसी स्थानान्तरण विलेख ( विक्रय पत्र, दानपत्र, हकत्याग पत्र) आदि के पंजीयन से ही समाप्त हो सकता है अन्यथा नहीं। इस तरह सभी संतानें एक चौथाई हिस्से की अधिकारी हैं।

हमारी राय है कि आप को आप के पिता की समस्त चल अचल संपत्ति के विभाजन के लिए वाद संस्थित कर देना चाहिए। यह वाद पटना या मुंगेर दोनों स्थानों में से किसी एक में किया जा सकता है। आप पटना रहती है  तो वहाँ यह  वाद संस्थित करना ठीक रहेगा। इस काम में जितनी देरी करेंगी उतनी ही देरी से परिणाम प्राप्त होगा। इस कारण बिना देरी के यह काम करें।

समस्या-

राजीव गुप्ता ने सकरा, मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा के नाम से कुछ ज़मीन और मकान की ज़मीन है, मगर सारी पुश्तैनी है। मेरे पापा 4 भाई हैं दादा गुज़र चुके हैं मेरे पापा ओर चाचा को ज़मीन घर बनाने के लिए मौखिक रूप से बाँट दिया गया। हम सबका 20 साल से मकान पर समान रूप से क़ाबिज हैं। दिल्ली में भी ह्मारा 1 मकान है जो मेरी माँ के नाम है मेरे छोटे चाचा ने उसपर दावा किया था। लेकिन हम केस जीत गये अब चाचा और दादी मिलकर उस मकान का बदला लेने के लिए गाँव की ज़मीन चाचा के नाम करना चाहती है। क्या मेरी दादी का भी मेरे दादा की पुश्तैनी ज़मीन में अधिकार है? वो ऐसा बदला लेने के लिए कर रही है। एक बात और ह्मारा मकान पर 20 सालों से क़ब्ज़ा तो है मगर ज़्यादा प्रूफ सर्टिफिकेट नहीं हैं। चुनाव का पहचान पत्र, ओर स्कूल सर्टिफिकेट हैं। हम दादी का पूरा खर्च उठाने को भी तैयार हैं, मगर वो अब तैयार नहीं है। इससे पहले 20 साल तक हमने ही उनकी सेवा की है। क्या हमें अब मकान बनाने के बाद इस में से दादी को हिस्सा देना होगा?

समाधान-

दि आप के गाँव की संपत्ति पुश्तैनी है तो उस में दादी का हिस्सा तो अवश्य है। लेकिन पुश्तैनी संपत्ति में जिसे वास्तव में सहदायिक संपत्ति कहा जाता है। पुरुष संतानों का जन्म से ही अधिकार होता है, 2005 से पुत्रियों का भी जन्म से अधिकार हो गया है। यदि संयुक्त /सहदायिक संपत्ति में हिस्सेदार की मृत्यु होती है तो उस का उत्तराधिकार वसीयत से अथवा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार होगा न कि उत्तरजीविता के पुराने नियमों से। इस कारण दादी का उस में हिस्सा है।

आप के पिता का कुछ तो हिस्सा तब भी था जब दादाजी जीवित थे। फिर दादा जी की मृत्यु के समय कुछ हिस्सा उन से उत्तराधिकार में मिला है। इस तरह आप के अधिकार में काफी हिस्सा आ सकता है। दादी का हिस्सा भी बहुत थोड़ा होगा। आप बंटवारे में कह सकते हैं कि आप के पिता को यह जमीन दादा ने मकान बनाने के लिए दी थी।  मकान आप के पिताजी ने अपनी आय से बनाया है। आप यह साबित कर देते हैं कि मकान आप के पिता ने अपनी निजी आय से बनाया है तो बंटवारे में उस का भी ध्यान रखा जा सकता है।

बेहतर तो यह है कि आप इस तरह अंदाज लगाना बंद करें। यदि दादी चाचा के नाम वसीयत करती हैं या दादी बंटवारे का वाद करती हैं तो आप के पिताजी अपने अधिकार के लिए लड़ सकते हैं। बंटवारा भी होता है तो हमारी राय में आप के पिता दादी के आंशिक हिस्से की राशि का भुगतान कर के अपना बनाया हुआ मकान पर अपना पूर्ण स्वामित्व प्राप्त कर सकते हैं।

समस्या-

राजेश कुमार ने पटना बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरी माँ का देहांत 1994 में हुआ था, उस वक़्त मेरी आयु 10 वर्ष थी। मेरी एक विवाहित बहन और एक अविवाहित भाई है। माँ के नाम के घर को आज मेरे पिताजी अपनी दूसरी पत्नी के बहकावे में आकर बेचना चाहते हैं। माँ की इस निशानी को बचाने का उपाय बताएं। क्या हम भाई बहनों का इसमें कोई अधिकार नहीं?

समाधान-

दि मकान आप की मृत माता के नाम था तो उन की मृत्यु से उत्तराधिकार में यह मकान उन की संतानों और पति के संयुक्त स्वामित्व में है। आप तीन भाई बहन और एक पिता, इस तरह चार व्यक्ति उक्त संपत्ति के संयुक्त स्वामी हैं और प्रत्येक का एक चौथाई हिस्सा ही है। पिता का भी एक चौथाई हिस्सा ही है। इस तरह वे मकान का विभाजन हुए बिना नहीं बेच सकते।

आप तीनों या तीनों में से कोई एक उक्त मकान को बेचे जाने के विरुद्ध न्यायालय में स्थाई व्यादेश हेतु वाद प्रस्तुत कर के अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर के मकान को बेचे जाने से रोक सकता है।

समस्या-

धर्मेन्द्र सिंह ने बालोतरा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी का मकान है जिनकी मृत्यु हो गयी है। अब इस मकान पर उनका छोटा पुत्र कब्जा करना चाहता है। मेरी दादीजी जिंदा है वो यह मकान नहीं देना चाहती हैं। ये मकान दादीजी के नाम करवाना है और उनके छोटे पुत्र को बाहर निकलना है। इसके लिए मैं क्या करुँ?

समाधान-

प के दादा जी का देहान्त होने के पहले उन्हों ने कोई वसीयत नहीं की है। आप के दादा जी के देहान्त के साथ ही उन का उत्तराधिकार खुल गया है औोर उन की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उन के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो चुकी है। आप के दादा जी के उत्तराधिकारी, उन के पुत्र, पुत्रियाँ, मृत पुत्र/ पुत्रियों की पत्नी/ पति और उन की संतानें, उन की पत्नी (आप की दादीजी) हैं। ये सभी उस मकान के संयुक्त रूप से स्वामी हो चुके हैं। आप के दादाजी के छोटे पुत्र को भी उस मकान के स्वामित्व में हिस्सेदारी प्राप्त हुई है। इस हिस्सेदारी से उसे अलग नहीं किया जा सकता।

आप की दादी या अन्य कोई भी उत्तराधिकारी यह कर सकता है कि मकान के बंटवारे का दावा करे और सब को अलग अलग हिस्सा देने की राहत प्रदान करने की मांग करे, या फिर यह भी राहत मांगी जा सकती है कि आप के दादाजी के छोटे पुत्र को उस के हिस्से की कीमत अदा कर के उस मकान से बेदखल करने की डिक्री की मांग की जाए। इस बीच अस्थाई निषेधाज्ञा जारी कराई जा सकती है कि दादाजी का छोटा पुत्र न्यूसेंस पैदा न करे। यदि वह फिर भी कुछ गड़बड़ करता है या तंग करता है तो दादी जी की ओर से महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा का प्रतिषेध अधिनियम में कार्यवाही की जा सकती है।

 

रजिस्टर्ड बंटवारानामा संपत्ति के स्वत्व का दस्तावेज है।

May 17, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जितेन्द्र ने उज्जैन, से मध्य प्रदेश -समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी की मुत्यु हो चुकी है। मेरे दादाजी की स्वंय अर्जित सम्पत्ति का एक मकान जो कि हॉउसिंग बोर्ड द्वारा लीज होल्ड है एवं नगर निगम सीमा में है जिसका सम्पत्ति कर वगैरह उस सम्पत्ति पर निवासरत् दादाजी के 3 पुत्रों द्वारा सम्मिलित रूप से जमा किया जाता है। दादीजी का भी देहान्त दिनांक हो गया है। दादाजी की कुल 7 संतानें (5 पुत्र एवं 2 पुत्रियां) हैं। दादाजी ने अपनी मृत्यु के पूर्व कोई भी वसियत भी नहीं की थी। इस सम्पत्ति पर वर्तमान में 3 पुत्रों के परिवार निवासरत है, अन्य में से 1 पुत्र लापता है, 1 पुत्र अन्यत्र निवासरत है, 1 पुत्री का देहान्त कुछ समय पूर्व हो चुका है एवं 1 पुत्री अन्यत्र निवासरत होकर अविवाहित है। इस सम्पत्ति का बंटवारा किस प्रकार किया जा सकता है? सभी संतानों का मालिकाना हक किस प्रकार इस सम्पत्ति पर हो सकता है? मालिकाना हक से संबंधित क्या दस्तावेज तैयार करवा सकते हैं? कृपया बतायें- 1. क्या इस सम्मत्ति की रजिस्ट्री होगी? 2. हॉउसिंग बोर्ड इस सम्पत्ति में क्या कार्यवाही कर सकता है ? 3. रजिस्टर्ड बंटवारा ओर रजिस्ट्री में क्या कोई अंतर है? क्या रजिस्टर्ड बंटवारा में रजिस्ट्री के सभी अधिकार प्राप्त होते है या नहीं?

समाधान-

ब आप रजिस्ट्री शब्द का उल्लेख करते हैं तो आम तौर पर उसका अर्थ पंजीकृत विक्रय पत्र से या पंजीकृत लीज डीड से होता है। लेकिन पंजीकरण का कानून यह है कि यदि 100 रुपए से अधिक कीमत की कोई अचल संपत्ति का हस्तांतरण हो तो उस की रजिस्ट्री होना जरूरी है। बंटवारा भी ऐसा ही एक विलेख है। पंजीकरण कानून कहता है कि बंटवारे के विलेख का पंजीकृत होना जरूरी है वर्ना वह विलेख जरूरत पड़ने पर किसी कार्यवाही में नहीं पढ़ा जाएगा।

संपत्ति के सभी साझेदारों के बीच आपसी सहमति से बंटवारा होता है तो उसे पंजीकृत कराना जरूरी है। यह पंजीकृत विलेख ही संपत्ति के स्वामित्व का विलेख होगा। हाउसिंग बोर्ड या नगर निगम में जहाँ संपत्ति का रिकार्ड रहता है वे अपने रिकार्ड में नामान्तरण करते हैं लेकिन नामान्तरण हो जाने से किसी को स्वत्वाधिकार प्राप्त नहीं होता है। नामान्तरण गलत होने पर न्यायालय के आदेश से उसे हटाया या दुरुस्त किया जा सकता है। स्वअर्जित संपत्ति में सभी पुत्रों और पुत्रियों का समान हिस्सा है। यदि किसी का देहान्त हो गया है तो उस की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों को जाएगी। किसी के मर जाने से या गायब हो जाने से उस का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता है।

समस्या-

नीलम खन्ना ने मनीमाजरा, चंडीगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी को उनके पिताजी से साल 1911 में संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। मेरे पिताजी को दादा जी से उनकी संपत्ति साल 1971 में उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। हम दो भाई बहन हैं। मेरे पिताजी ने सारी संपत्ति की वसीयत मेरे भाई के बेटे के नाम कर दी, मेरे पिताजी के देहांत के बाद सारी संपत्ति मेरे भतीजे के नाम हो गई। मैंने जुलाई 2016 में अपने हिस्से के लिए केस दायर किया, मैंने संपत्ति को बेचने से रोकने के लिए अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन किया, लेकिन उस समय मेरे पास संपत्ति का पिछला रिकॉर्ड ना होने के कारण अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन रद्द हो गया। मैंने अब पिछला सारा रिकॉर्ड निकलवा लिया है क्या मैं अब दोबारा अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन कर सकती हूँ? क्या मुझे अपना हिस्सा मिल सकता है?

समाधान-

प के द्वारा दिए गए विवरण से यह स्पष्ट है कि उक्त संपत्ति सहदायिक है। आप ने विवरण में यह नहीं बताया है कि आप के पिताजी की मृत्यु कब हुई है। यदि आप के पिता जी की मृत्यु. 2005 के बाद हुई है तब आप को 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में हुए संशोधन से इस सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त हो चुका था। उस वक्त आप के पिता केवल अपने हिस्से की वसीयत कर सकते थे न कि पूरी संपत्ति की। इस प्रकार आप का हिस्से का दावा सही है आप को हिस्सा मिलना चाहिए।

दावा तो पहले भी हिस्से का ही हुआ होगा। अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन तो उसी दावे में प्रस्तुत किया गया होगा। यदि वह दावा अभी चल रहा है तो उसी दावे में अस्थाई निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र पुनः प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि दावा भी आप ने खारिज करवा लिया है या अदम हाजरी अदम पैरवी में खारिज हो चुका है तो उस का रिकार्ड देख कर तय करना पड़ेगा कि उसे दुबारा किस प्रकार किया जा सकता है। बेहतर है आप वहीं दीवानी मामलों के किकसी अच्छे वकील से सलाह कर आगे कार्यवाही करें।

समस्या-

प्रशान्त ने ग्राम नूरपुर, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे दादाजी चार भाई थे जिस में एक निस्सन्तान थे। मेरे दादा जी से पहले उन के दो भाइयों की मृत्यु हो गयी। उन के हिस्से कि संपत्ति उन के उत्तराधिकारियों को मिल गयी। 2004 में निस्सन्तान दादाजी की संपत्ति मेरे दादाजी को मिल गयी।  अब 2012 में मेरे दादाजी की भी मृत्यु हो गयी। उन की संपत्ति हमारे नाम आ गयी। अब मेरे दादा जी के भाई का लड़का बोलता है कि मेरा भी हिस्सा था इस में, तो क्या 29.06.2004 को  भाई का हक भतीजे को भी मिलता था?

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में कोई व्यक्ति निस्सन्तान मर जाए और उस की पत्नी और पिता भी जीवित न हों तो फिर उस की सम्पत्ति जीवित भाई को ही प्राप्त होगी।  इस तरह आप के दादा जी के भाई की मृत्यु पर आप के दादा जी को प्राप्त हुई वह सही थी। उस में मृत भाई के पुत्र का का कोई हिस्सा नहीं था।

लेकिन यदि दादाजी के निस्संतान भाई की संपत्ति में उत्तरप्रदेश में स्थित कोई कृषि भूमि है तो उस भूमि का उत्तराधिकार उ.प्र. जमींदारी विनाश अधिनियम से तय होगा और उस स्थिति में पूर्व मृत भाई के पुत्र को भी हि्स्सा पाने का अधिकार है। यह विधि 29.06.2004 को भी प्रचलित थी।

 

 

समाधान-

राम नारायण ने बड़ौदा, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या ये है कि मेरे पिता की स्वअर्जित सम्पति है।  जिसे मेरे पिता ने 1965 में लिया था।  मेरे पिता का देहांत 03/10/2005 को हो गया है।  मेरे पिता ने कोई वसीयत नहीं बनाई थी।  देहांत के बाद मेरी 3 बहनो में से एक बहन ने अपनी परिस्थिति का रोना रोकर मेरे से मेरा एक रूम ले लिया और बोली की मेरी परिस्थिति ठीक होने के बाद मैं चली जाउंगी। लेकिन अब 8 साल हो गया है। लेकिन वो जाने को नहीं बोलती है और झगड़ा करती है। मेरी माँ मेरे साथ ही रहती है। उससे भी झगड़ा करती है। मेरी बहन को रूम से निकालने के लिए क्या करना होगा? मेरी बहन का आदमी भी उसके साथ ही रहता है।


समाधान-

प के पिता की स्वअर्जित संपत्ति पर आप के पिता की मृत्यु के साथ ही उन के उत्तराधिकारियों का स्वत्वाधिकार स्थापित हो गया। आप अकेले उस संपत्ति के स्वामी नहीं हैं। पुत्र होने के नाते आप अकेले उस मकान के स्वामी नहीं हो सकते। इस मकान में फिलहाल पाँच हिस्से हैं। एक आप की माँ का तीन आप की बहनों के और पाँचवाँ आपका। यदि आप बहिन से कुछ कहेंगे तो वह अदालत में बंटवारे का दावा करेगी। दूसरी बहनों और माँ को भी साथ ले लेगी तो आप को केवल पाँचवाँ हिस्सा ही प्राप्त होगा, जो आप का है। वैसे भी जब तकआप को सभी बहनों से रिलीज डीड के माध्यम से हक प्राप्त नहीं हो जाए उन सभी का हि्स्सा बना रहेगा।

बहिन ने परिस्थिति का रोना रो कर जो कमरा प्राप्त किया है वह उस का हक है। उस ने कैसे भी मकान पर कब्जा प्राप्त कर लिया है और उसी में रहती भी है आप अपनी बहन को रहने दें। जो भी समाधान हो वह प्यार से आपसी समझ से करें।

समस्या-

घनश्याम पाण्डेय ने सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


 मेरे पड़ोस में मेरी मुँह बोली बहन रहती है। जिसका विवाह मात्र १२ वर्ष के उम्र १९९८ में ही कर दिया गया। यह बाल विवाह ही था, लड़के की उम्र १२ साल ही थी।  खैर यह शादी मात्र चार वर्ष ही चली और २००२ में पंचायत के सामने तलाक करवा दिया गया और उनसे कोई संतान नहीं हुई।  बहन का दूसरा विवाह लगभग १८ की उम्र में २००४ में हुआ, जहाँ पर उसे दो लड़की संताने भी हुई, साल २०११ में उसे दूसरी लड़की पैदा होने पर घर से निकाल दिया गया। अतः वह तब से मायके में ही रहती है। उसके ननद, देवर और पति सभी उस पर अत्याचार करते हैं। जब वह जाती है, बड़ी बेरहमी से पति, देवर मार कर उसे भगा देते हैं।  बहन के मायके वाले भी ज्यादा सहयोगी नहीं। अतः पुनः २०१५ के एक साधारण समारोह द्वारा उसका तीसरी जगह जबरदस्ती घरवालों ने विवाह करवा दिया।  जो कि वैवाहिक संस्कार करके नहीं किये गए थे, उसे कुछ भी नाम दिया जा सकता है। लेकिन यह विवाह भी मात्र २ महीने न चला। अब बहन आज भी बार बार दूसरे विवाह के पति के घर जाती है, जहाँ पर उसकी बड़ी बेटी ले ली गयी, जब कि दूसरी बेटी को पति अपनी संतान स्वीकार नहीं करता है। जब उसका जन्म पति के घर में ही हुआ। अतः ऐसी परिस्थिति में बच्चों के क्या अधिकार अपने नैसर्गिक पिता से बनते हैँ तथा बहन भी क्या अपने दूसरे पति के अधिकार प्राप्त कर सकती है। वह अत्यंत गरीब अवस्था में है, माँ-बाप तथा पति सभी उसके खिलाफ हो गए। वह अपनी छोटी बेटी के साथ किसी तरह गुजारा कर रही है। अतः बच्चों और बहन का क्या अपने दूसरे पति के ऊपर क़ानूनी अधिकार बनता है। बहन आज भी अपने पति के घर जाना चाहती है तथा लगभग पागलपन की अवस्था पर पहुँच गयी है।

समाधान-

हिन्दू विवाह केवल और केवल न्यायालय की डिक्री से ही समाप्त हो सकता है इस कारण से आप की मुहँबोली बहिन यदि अनुसूचित जनजाति से नहीं है तो उस का पहला विवाह आज तक भी समाप्त नहीं हुआ है। उस का पहला पति ही उस का वैधानिक पति है। पहले पति से विवाह विच्छेद वैधानिक न होने से दूसरा विवाह वैध नहीं था। इस कारण आपकी बहिन का दूसरे पति से कोई अधिकार नहीं है। लेकिन उस की दोनों संतानें दूसरे पति से हैं इस कारण संतानों को अपने पिता से भरण पोषण पाने का अधिकार है। तीसरे पति के साथ आप की बहिन दो माह से भी कम समय रही है वह रिश्ता एक लघु अवधि का लिव इन था। इस कारण इस संबंध से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं हुआ है।

अभी तक आपकी मुहँ बोली बहिन का पहले पति से रिश्ता समाप्त नहीं हुआ है इस कारण वह पहले पति से भरण पोषण की मांग कर सकती है। इस के लिए न्यायालय में अर्जी दाखिल कर सकती है। इस के साथ ही वह अपनी छोटी पुत्री के लिए अपने दूसरे पति से भरण पोषण की मांग कर सकती है।

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