Civil Law Archive

समस्या-

निशी ने उदयपुर राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या 25 वर्ष पूर्व शपथ पत्र के माध्यम से बक्शीश या दान में दी गई अचल सम्पत्ति जिसे ग्रहिता ने स्वीकार कर निर्माण किया और वर्तमान में भी काबिज है को दानदाता अपने जीवन में किसी अन्य के नाम पंजीकृत कर सकता या सकती है? जिसका पता ग्रहिता को दाता की मौत के बाद चले, तो क्या उससे वह सम्पत्ति पंजीकृत कराये दूसरे व्यक्ति को मिल जायेगी या होगी जबकि दानग्रहिता जीवित है और सम्पत्ति पर काबिज है?

समाधान-

चल संपत्ति का दान या बख्शीश शपथ पत्र के माध्यम से नहीं हो सकता। दान और बख्शीश संपत्ति का अंतरण हैं और संपत्ति का मूल्य 100 रुपए से अधिक होने के कारण उस का पंजीकृत होना आवश्यक है। आप  दान या बख्शीश पंजीकृत विलेख से नहीं होने के कारण अमान्य है। लेकिन यह दस्तावेज बताता है कि दान प्राप्तकर्ता को उक्त संपत्ति का कब्जा खुद उस के मालिक ने दिया था। कब्जे को 25 वर्ष हो चुके हैं। 25 वर्ष का अबाधित कब्जा होने तथा उस पर ग्रहीता द्वारा निर्माण कार्य भी कराया गया है।

यदि उक्त संपत्ति मूल स्वामी के द्वारा किसी को पंजीकृत विलेख से हस्तांतरित कर भी दी गयी हो तब भी उस का कब्जा तो वास्तविक रूप से नहीं दिया गया है। हस्तांतरण से संपत्ति का स्वामित्व प्राप्त करने वाले को ग्रहीता से संपत्ति का कब्जा प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित करना होगा। यह वाद मियाद के बाहर होने के कारण निरस्त हो सकता है। क्यों कि 25 वर्ष का अबाधित कब्जा होने से ग्रहीता का कब्जा प्रतिकूल हो चुका है और उस से संपत्ति का कब्जा मूल स्वामी या हस्तान्तरण से स्वामित्व प्राप्त व्यक्ति मियाद के बाहर होने से प्राप्त करने में अक्षम रहेगा।

बिना न्यायालय की डिक्री के हिन्दू विवाह विच्छेद संभव नहीं है।

October 30, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

प्रियंका जैन ने उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी नवंबर 2016 में हुई थी शादी के कुछ दिनों बाद ही मुझे ससुराल में मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताण्डित किया जाने लगा। एक दो महीने तक तो बर्दाश्त किया लेकिन फिर मैं ने अपने माता पिता को यह बात बताई और शादी के 5 महीने बाद अलग हो जाने का निर्णय लिया। आपसी रज़ामंदी एवं सामाजिक स्तर पर स्टाम्प वगैरह लिखवाकर हम अलग हो गए। न्यायालय का इस में कोई योगदान नहीं था। अब घरवाले मेरे लिए लड़का ढूंढ रहे हैं, मुझे इस बात का डर है कि मेरा तलाक वैध है या नहीं? कहीं इस तरह शादी कर के मैं अपने होने वाले पति की मुसीबत तो नही बढ़ा रही हूँ?  डिक्री क्या है? इसका होना आवश्यक है क्या? कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

समाधान-

प जैन हैं और आप पर हिन्दू विवाह विधि प्रभावी है। हिन्दू विवाह विधि में कोई भी विवाह विच्छेद बिना न्यायालय के निर्णय और डिक्री के संभव नहीं है। आपसी समझौते से आप लोग अलग हो गए हैं लेकिन वैवाहिक संबंध वैध रूप से समाप्त नहीं हुआ है। अभी भी कानूनी रूप से आप के पूर्व पति ही आप के पति हैं और आप उन की पत्नी हैं। यदि आप विवाह विच्छेद के न्यायालय के निर्णय व डिक्री के बिना विवाह करती हैं तो वह पूरी तरह अवैध होगा। क्यों कि इस के बाद आप के नए पति से यौन संबंध स्थापित होंगे जो आप के पूर्व पति की सहमति के बिना होंगे तो आप के नए पति भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अंतर्गत दोषी माने जाएंगे। इस कारण आप के लिए यह आवश्यक है कि आप न्यायालय से विवाह विच्छेद का निर्णय व डिक्री प्राप्त करें।

न्यायालय का निर्णय कई पृष्ठ का होता है। उस में विस्तार से दोनों पक्षों के अभिकथन, साक्ष्य व उन की विवेचना के साथ निर्णय अंकित होता है। जब कि डिक्री किसी भी दीवानी (सिविल) मामले में हुए निर्णय की प्ररूपिक अभिव्यक्ति है जिस में वाद के पक्षकारों के अधिकारों को प्रकटीकरण होता है। किसी विवाह विच्छेद के मामले में डिक्री दो पृष्ठ की होगी जिस में पक्षकारों का नाम पता लिखा होगा तथा यह लिखा होगा कि इन दोनों के बीच विवाह विच्छेद हो चुका है। कहीं भी आप को बताना हो कि आप का विवाह समाप्त हो गया है तो दो पृष्ठ की इस डिक्री की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करना पर्याप्त होगा।

किसी भी मामले में सामान्य रूप से विवाह के एक वर्ष तक विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कोर्ट में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। इस कारण आप के मामले में भी नवंबर 2017 में पूरा एक वर्ष व्यतीत हो जाने तक यह आवेदन प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। यदि दोनो पक्ष सहमत हों तो जिस समय आप के विवाह को एक वर्ष पूर्ण हो आप और आपके पति मिल कर सहमति से विवाह विच्छेद के लिए न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करें। आवेदन प्रस्तुत करने के छह माह बाद न्यायालय से विवाह विच्छेद का निर्णय व डिक्री मिल जाएगी। यदि दोनो पक्ष सहमति से तलाक के लिए अर्जी प्रस्तुत नहीं करते तो फिर आप को अकेले किसी आधार पर संभवतः क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत करना होगा। उस में विवाह विच्छेद में समय लग सकता है।

दादी उन के पति से मिले हिस्से की वसीयत कर सकती है।

October 29, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

योगेश सोलंकी ने नामली (रतलाम), मध्य्प्रदेश से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मारे दो मकान ओर एक खेत हैं। कुछ महीनों पूर्व ही मेरी दादी की मृत्यु हुई है और मेरी दादी ने एक रजिस्टर्ड वसीयतनामा किया है उसमें एक बड़ा मकान और वो खेत मेरे चाचा के नाम किया गया और सिर्फ छोटा मकान मेरे पापा को दिया गया। जबकि खेत मेरी दादी के नाम का था और दोनों मकान नगर परिषद में के रजिस्टर में और रजिस्ट्री भी मेरे दादाजी के नाम से है और कानूनी तौर पर भी दोनों मकान मेरे दादा जी के नाम से है। वसीयत सिर्फ खुद की खरीदी हुई या स्वअर्जित संपत्ति पर ही की जाती है। तो ये जो वसीयत की गई वो सही है या गलत और मुझे क्या करना चाहिये?

समाधान-

प बिलकुल सही हैं। दादाजी के नाम की जो संपत्ति है उस का उत्तराधिकार तो दादाजी के समय ही निश्चित हो गया। यदि आप के दादाजी के दो पुत्र ही हैं और कोई पुत्री नहीं थी तो उन की समूची संपत्ति उन के देहान्त पर तीन हिस्सों में विभाजित हो कर एक एक हिस्सा दादी और आप के पिता और चाचा को मिलना चाहिए। इस तरह दोनों मकानों का एक तिहाई हिस्सा आप के पिता को मिला, एक चाचा को और एक दादी को। अब यदि दादी उन मकानों की वसीयत नहीं कर सकती है तो भी वह अपने हिस्से की वसीयत कर सकती है। इस तरह मकानों का 2/3 हिस्सा चाचा को मिलेगा और जमीन दादी के नाम होने से वसीयत से चाचा को मिलेगी।

अब आप को खुद सोचना चाहिए कि अभी जो मकान मिला हुआ है वह दोनों मकानों के मूल्य के एक तिहाई से अधिक मूल्य का है तो कुछ भी करने में कोई लाभ नहीं है। और यदि लड़ाई लड़ी जाए और फिर भी इतना ही अधिक मिले की उस से केवल लड़ाई का खर्च भी न निकले तो लड़ाई लड़ने से कोई लाभ नहीं।

समस्या-

संदीप कुमार ने ब्यावर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता की पहली पत्नी से 1979 में सीमाजिक रीति से तलाक हो चुका था, उस से एक पुत्र का जन्म हुआ था। दूसरी पत्नी से चार पुत्र तथा एक पुत्री का जन्म हुआ। जिनमें से दो अविवाहित पुत्रियों तथा एक विवाहिता पुत्री की मृत्यु हो गई। इसके बाद मेरे पिताजी का भी स्वर्गवास हो गया है। अब मेरे पिताजी की निर्वसीयती सम्पत्ती पर किस किस का अधिकार है। जबकि पहली पत्नी के पुत्र से पिताजी के जीवन काल में कोई वास्ता नहीं था। कृपया सुझाव दें।

समाधान-

दि आप की पिता की पहली पत्नी का तलाक सामाजिक रीति से हुआ था और न्यायालय ने विवाह विच्छेद की डिक्री पारित नहीं की थी तो आप के पिता का दूसरा विवाह अवैध है इस कारण दूसरी पत्नी को वैधानिक दर्जा नहीं मिलेगा। किन्तु सभी संतानों को बराबर उत्तराधिकार मिलेगा।

इस प्रकार यदि न्यायालय में यह कहा गया और साबित हुआ कि दूसरा विवाह वैध नहीं था तो पिताजी की संपत्ति में दूसरी पत्नी को कोई हिस्सा नहीं मिलेगा। जितने जीवित पुत्र पुत्री हैं उन सभी को एक एक हिस्सा मिलेगा तथा एक विवाहित पुत्री जिस की मृत्यु हो गयी है, यदि उस की संतानें और पति जीवित है तो उस का हिस्सा उन्हें प्राप्त होगा। आप ने जो विवरण दिया है उस में यह तथ्य सही अंकित है कि दूसरी पत्नी से चार पुत्र व एक पुत्री हुई है, तो फिर दो अविवाहित व एक विवाहित पुत्री की मृत्यु कहाँ से हो गयी है। आप अपने तथ्यों के हिसाब से इस राय को दुरुस्त कर सकते हैं।

कब्जा किसी भी संपत्ति के स्वामित्व का प्राथमिक साक्ष्य है।

October 27, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

घनश्याम गहलोत ने गंगापुर, भीलवाड़ा राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा परिवार एक मकान में 70 वर्षो से बिना किराए के निवास कर रहा है, बिजली का बिल मेरे दादाजी के नाम पर है जिनका स्वर्गवास हो गया है। अब हमारे पास इस मकान के स्वामित्व के लिए क्या अधिकार है?

समाधान-

कान का बिजली कनेक्शन आप के दादाजी के नाम है। आप पुराने से पुराना दस्तावेज प्राप्त कर के सुरक्षित रखिए जिस से आप दादाजी के नाम के बिजली कनेक्शन को साबित कर सकें। उक्त मकान आप के दादाजी के उत्तराधिकारियों के स्वामित्व की संपत्ति ही मानी जाएगी क्यों कि उन का उस संपत्ति पर 70 वर्ष से अबाधित कब्जा है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 110 में यह प्रावधान है कि –

Burden of proof as to ownership:

When the question is whether any person is owner of anything of which he is shown to be in possession, the burden of proving that he is not the owner is on the person who affirms that he is not the owner.

यदि कभी यह प्रश्न उठे कि क्या कोई व्यक्ति उस संपत्ति का स्वामी है जो उस के कब्जे में है तो यह साबित करने का भार उस व्यक्ति पर होगा जो यह कहता हो कि यह संपत्ति उस व्यक्ति की नहीं है।

यदि आप का परिवार उस मकान में विगत 70 वर्षों से अबाधित रूप से निवास कर रहा है तो उस मकान के स्वामी आप ही हैं। यदि कोई इस बात पर आपत्ति करता है तो उसे साबित करना पड़ेगा कि आप उस के स्वामी नहीं है। इस तरह पूरी दुनिया में यह सिद्धान्त प्रचलित है कि कब्जा किसी भी संपत्ति के स्वामित्व का प्रथम दृष्टया सबूत है। इसीलिए कहा जाता है ‘कब्जा सच्चा दावा झूठा’।

समस्या-

अभी जैसवाल ने 14/459,भोली नगर, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

ड़की का परिवार अपनी जाति (जब रिश्ता लेकर आते हैं तब खुद को लड़के का जाति का ही हूँ कहते हैं), धर्म (शायद आदिवासी क्रिश्चियन होते हुए सब छुपाते हैं, खुद को हिन्दू कहते हैं। बाद में लड़के द्वारा लड़की की माँ (नानाजी का नाम और उनका गाँव आदि तथा रिश्तेदार आदि) और पिताजी के रिश्तेदार कहाँ हैं पूछने पर कुछ बताने के जगह लड़की धमकी देती है टार्चर करने का केस कर दूंगी तथा उसके घर वाले गाली गलोज करते हैं जिसका आडिओ रिकार्डिंग भी है! जन्मपत्री में उम्र कम बताते हैं मगर बाद में लड़के को पता चलता है की लड़की लड़के से बड़ी है। साथ ही लड़का जब उनके यहाँ लड़की देखने गया था तब 4 दिन लड़के को रोके रहे तथा दबाव देकर अकेले लड़के (लड़के का परिवार से कोई नहीं था) को रिंग सेरामनी करने को को विवेश किये थे जहाँ सिर्फ लड़की परिवार ही था बाकी और कोई नहीं। एक तरह से लड़के को फंसा दिए थे और उसी दवाब में लड़का मजबूर हो शादी को बाध्य हुआ था। शादी को 10 साल से ऊपर हो गया है उन दोनों के एक लड़का भी है और लड़की यहीं ससुराल में ही रहती है। बातें तो बहुत लम्बी हैं। मगर यहाँ संक्षेप में सारी बात कह चुका अब इसमें लड़की के परिवार पर किस तरह और क्या केस किया जा सकता है?

समाधान-

प की समस्या है कि भिन्न जाति, धर्म, जन्मपत्री में कम उम्र बताना, लड़के से लड़की का बड़ा होना, रिंग सेरेमनी दबाव से करवा देना जिस के दबाव में विवाह कर लेना, विवाह से एक संतान पैदा होना, अभी तक लड़की का ससुराल में रहते रहना फिर भी विवाह के 10 वर्ष बाद तक किसी अदालत में किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं उठाना।

महोदय, आप किस दुनिया में रहते हैं? विवाह के लिए कानूनन जाति, धर्म, उम्र का कोई बंधन नहीं है इन के आधार पर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती। फिर 10 वर्ष तक लड़की विवाहित जीवन निबाह कर अपनी ससुराल में रह रही है, उस से एक संतान पैदा हो जाती है। आप आपत्ति नहीं करते। अब आपत्ति का कोई नया कारण नहीं है। भाई क्या अब एक स्त्री से मन  भर गया है या कोई दूसरी भा गयी है?

आप रुपया उधार देते हैं और तीन साल तक अदालत में कोई दावा नहीं करते तो फिर अदालत में दावा नहीं कर सकते। अब विवाह पर दस साल बाद आपत्तियाँ उठा रहे हैं इस दुनिया की तो कोई अदालत आप को सुनेगी नहीं। बल्कि यह कहेगी कि आप खुद दोषी हैं। आप के लिए इस शादी से निकल भागने का कोई रास्ता नहीं है। आपकी हर कोशिश आ बैल मुझे मार वाली होगी।

समस्या-

इति श्रीवास्तव ने रांची , झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरी माता का देहांत 2013 में हुआ, वे माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश में सहायक अध्यापिका के पद पर पिछले 30 सालों से अधिक से कार्यरत थीं। 2015 में वह रिटायर होने वाली थीं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी तीन पुत्रियों में से किसी को भी अब तक उनके सेवा से जुड़ी कोई भी राशि प्राप्त नहीं हुई है। जब मैं जे.डी. ऑफिस गई तो मुझे यह बताया गया कि तीनों लड़कियों में से किसी एक को नौकरी मिलेगी और मेरे पिता को पेंशन मिलेगी हालांकि मेरी माता के अन्य बकाया के सम्बंध में कोई बात नहीं की गई। मेरी माता का मेरे पिता से कोई लेना-देना नहीं था, हालांकि दोनों में तलाक नहीं हुआ था, और माँ की सेवा पंजिका में भी उनका नाम है जिसे वो हटाना चाहती थीं लेकिन हटा नहीं सकीं। मेरे पिता कोऑपरेटिव सोसायटी, इलाहाबाद में क्लर्क हैं। मेरी माँ की मृत्यु के समय हम तीनों बहने बेरोजगार थीं और माँ के रिश्तेदारों के घर में रहती थीं। हालांकि 2015 में मुझे केंद्र सरकार में नौकरी मिल गई। पर अन्य दोनों बहनें कम सैलरी पर प्राइवेट जॉब करती हैं और कभी-कभी छोड़ना भी पड़ता है। माँ की जगह पर नौकरी हम तीनों ही नहीं करना चाहते हैं। हम तीनों अविवाहित हैं। अभी हमारी माँ की एक पैतृक अचल सम्पत्ति बिकी उसमें से माँ के रिश्तेदारों, जिनका हिस्सा भी उस सम्पत्ति में था, ने यह कहकर की कानून के अनुसार उनको एक हिस्सा मिलेगा, हमारे शेयर में से पिता को एक हिस्सा दिया जबकि हमलोग उनसे कोई मतलब नहीं रखते। अब मेरे सवाल हैं कि, मेरी माँ के विभाग से नियमतः हम तीनों को किस-किस मद में पैसे मिलने हैं। और एल आई सी तो मुझे पता क्या उनका कोई और भी देय बनता है? उनके पैसे को प्राप्त करने के लिए क्या कागजी कार्रवाई करनी होगी? कैसे मैं अपने पिता को कुछ भी लाभ प्राप्त होने से रोक सकती हूँ, क्योंकि मेरी माँ उनको पैसे नहीं देना चाहती थीं, उनका नाम सेवा पंजिका में सिर्फ इसलिए देना पड़ा क्योंकि हमतीनों नाबालिग थे। और पिता के नाम के नीचे हमतीनों के नाम भी लिखे हैं। एक महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि क्या मैं माध्यमिक शिक्षा परिषद, इलाहाबाद के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकती हूं कि उन्होंने हमारा देय अभी तक नहीं दिया, मेरी माँ की मृत्यु के 4 साल बाद भी! यदि मेरी नौकरी न लगती तो हम तीनों बहनों की हालत दयनीय होती क्योंकि हमारे पिता ने कभी हम पर या माँ पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि हम लड़कियां थे। लेकिन मेरी माँ के सारे पैसे लेने के लिए वो प्रयास कर रहे हैं।

समाधान-

प की समस्या और आप के तर्क वाजिब हैं लेकिन संपत्ति आदि का जो भी निपटारा होना है वह कानून के अनुसार ही होना है। आप की माताजी की मृत्यु के समय तक उन का आप के पिता से तलाक नहीं हो सका था। इस कारण आप की माताजी के उत्तराधिकारियों में आप तीनों बहनों के साथ साथ आप के पिता भी शामिल हैं। उन की जो भी बकाया राशि विभाग, बीमा विभाग, जीवन बीमा, प्रावधायी निधि विभाग और बैंक आदि में मौजूद हैं उन्हें प्राप्त करने का अधिकार आप चारों को है। आप चारों प्रत्येक ¼ हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

यदि आप की माताजी का पिता से विवाद चल रहा था तो उन्हें चाहिए था कि वे अपनी वसीयत लिख देतीं जिस में अपनी तमाम संपत्ति को आप तीनों बेटियों को वसीयत कर सकती थीं और आप के पिता को उत्तराधिकार से वंचित कर सकती थीं। लेकिन उन्हों ने ऐसा नहीं किया जिस के कारण आपके पिता भी उत्तराधिकार प्राप्त करने के अधिकारी हैं। उन्हें यह सब राशियाँ प्राप्त करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं हो सकता है लेकिन वे कानूनी रूप से अधिकारी हैं।

यदि कहीं या सभी स्थानों पर नामांकन आप के पिता का है तो वे यह सारी राशि प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि नोमिनी हमेशा एक ट्रस्टी होता है औऱ उस का कर्तव्य है कि वह राशि को प्राप्त कर के मृतक के सभी उत्तराधिकारियों में उन के अधिकार के हिसाब से वितरित करे। लेकिन अक्सर देखा गया है कि नोमिनी सारी राशि प्राप्त कर के उस पर कब्जा कर के बैठ जाता है और बाकी उत्तराधिकारियों को अपना हिस्सा प्राप्त करने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। इस कारण आप को चाहिए कि आप अपनी माताजी के विभाग, प्रावधायी निधि विभाग, कर्मचारी बीमा विभाग और जीवन बीमा व बैंक आदि को तीनों संयुक्त रूप से लिख कर दें कि नोमिनी होने पर भी आपके पिता को किसी राशि का भुगतान नहीं किया जाए क्यों कि ऐसा करने पर वे आप को आप के अधिकार से वंचित कर सकते हैं।

आप स्वयं अपनी माता जी के विभाग में जा कर संबंधित विद्यालय या जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय से पता कर सकती हैं कि आप की माताजी की कौन कौन सी राशियाँ विभाग के पास बकाया हैं। उन राशियों का मूल्यांकन भी आप पता सकती हैं। यदि समस्या आए तो आप सूचना के अधिकार का उपयोग कर के विभाग से ये सूचनाएं प्राप्त कर सकती हैं। जब आप को पता लग जाए कि कौन कौन सी राशिया विभाग और अन्यत्र बकाया हैं तो आप उन सब के लिए जिला न्यायालय में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकती हैं।  इस के साथ ही जिला न्यायालय में आवेदन कर के विभाग/ विभागों के विरुद्ध यह आदेश भी जारी करवा सकती हैं उत्तराधिकार प्रमाण पत्र बनने के पहले किसी को भी आप की माताजी की बकाया राशियों का भुगतान नहीं किया जाए।

इस मामले में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए आप को स्थानीय वकील की मदद लेनी होगी। इस कारण बेहतर है कि किसी अच्छे स्थानीय वकील से सलाह करें और उस के मुताबिक यह काम करें।

आप तीनों अनुकम्पा नियुक्ति नहीं चाहती हैं, आप के पिता की अनापत्ति के बिना आप  में से किसी बहिन को अनुकम्पा नियुक्ति मिल भी नहीं सकती थी। आप की अनापत्ति के बिना आप के पिता को नहीं मिलेगी। वैसे भी वे अब नौकरी प्राप्त करने की उम्र के नहीं रहे होंगे।

समस्या-

प्रभात झा ने आरा, प्रतापगंज, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे पापा दो भाई हैं। मेरे पापा और बड़े चाचा ने मिलकर जमीन खरीदी परंतु सारी ज़मीन बड़े चाचा ने अपने नाम से ले ली और पापा भी इस पर ध्यान नहीं दे सके क्योंकि वो बाहर रहकर काम करते थे। अब मेरे चाचा जी ने मौखिक रूप से जमीन बँटवारा किया है। लेकिन वो लिखित रूप से जमीन देने के लिए तैयार नही हैं, वो मनमाना ढंग से जमीन का बटवारा करना कहते हैं, साथ ही जेठांस की भी मांग करते हैं। हम लोगों के जोर देने पे वो सारा ज़मीन अपने बेटों के नाम से करने की धमकी देते हैं। हम लोगों के पास जमीन से सम्बंधित कोई दस्तावेज भी नहीं है। मैं जानना चाहता हूँ कि उस जमीन पर पापा का कितना हक़ है और क्या वह जमीन क़ानूनी रूप से दोनों भाई में बटवारा हो सकता है। अगर हाँ तो अब हमें क्या करना चाहिए? साथ ही अगर मेरे चाचा ने जमीन धोखे से अपने बेटों के नाम पर कर दी तो उस स्थिति में हम लोग जमीन पे दावा कर सकते हैं या नहीं।

समाधान-

ब भी कोई संपत्ति संयुक्त रूप से खरीदी जाए तो उस के विक्रयपत्र में इस बात का उल्लेख किया जाना चाहिए कि विक्रय मूल्य की राशि में किस का कितना योगदान है, और खरीददार कौन कौन हैं। लेकिन भारत में अक्सर ये होता है कि रिश्तेदार एक दूसरे के भरोसे में इस तरह के सौदे करते हैं और बाद में उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। हमारा कहना है कि विश्वासघात वहीं होता है जहाँ विश्वास होता है। इस कारण कम से कम चल-अचल संपत्ति और नकदी के मामलों में सहज विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि कैसे भी नहीं किया जाना चाहिए। आप के पिता ने आँख मूंद कर अपने भाई का विश्वास किया और अब उस की परेशानी न केवल वे भुगत रहे हैं बल्कि आप सभी भुगत रहे हैं।

आपके मामले में जमीन के कागजात अर्थात विक्य पत्र में आपके पिता का नाम नहीं है। लेकिन यदि उस जमीन को खरीदने में उन का भी आर्धिक योगदान है तो उस धन को जुटाने और जमीन के लिए भाई को देने के संबंध में कुछ न कुछ सबूत अवश्य होंगे। ये सबूत दस्तावेजी भी हो सकते हैं और मौखिक साक्ष्य से उन्हें साबित किया जा सकता है। य़दि आप के पिता जमीन खरीदने के लिए धन भाई को देना साबित करने की स्थिति में हों तो आप के पिता को तुरन्त भाई के विरुद्ध धोखाधड़ी के लिए पुलिस में रिपोर्ट लिखानी चाहिए। यदि पुलिस रिपोर्ट लिखने और कार्यवाही करने से मना करे तो वकील की सहायता ले कर सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर अन्वेषण के लिए पुलिस थाने को भेजे जाने का की प्रार्थना करना चाहिए। यही एक मात्र रास्ता है जिस से आप के पिता अपनी संपत्ति को वापस प्राप्त कर सकते हैं।

प्रत्येक पक्षकार को दावे की सूचना होना जरूरी है।

October 12, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मनोज ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी माँ ने अपने स्वर्गीय पिता की कृषि भूमि पर अपना उतराधिकार का दावा कर रखा है। कोर्ट ने मेरी माँ की अन्य बहनों को नोटिस भेजा है, उनको भी दावा करने हेतु हिदायत दी है ताकि एक एक करके न आये और केस में लम्बी प्रक्रिया ना हो। दो बार नोटिस भेजे गये हैं लेकिन उन्होंने कोर्ट में अपनी उपस्थिति नहीं दी। दो नोटिस भेजने में 2 साल हो गए हैं। वैसे में ये जानना चाहता हूँ कि कानूनन रूप से कितनी बार नोटिस भेजा जाता है? और अन्य क्या प्रक्रिया करने के बाद, कोर्ट स्वतंत्र रूप से उनकी गैर हाजरी में अपना फैसला सुना सकता है?

समाधान-

किसी भी मुकदमे में सभी संबंधित लोगों को पक्षकार बनाना जरूरी होता है जिन का हित प्रभावित होने वाला हो। आप की माताजी के इस मुकदमे में उन के पिता के सभी उत्तराधिकारियों को पक्षकार बनाना जरूरी था क्यों कि माताजी के पिताजी की संपत्ति का बंटवारा सभी उत्तराधिकारियों के मध्य होना है। इस के लिए सभी को दावे का समन भी भेजा जाना जरूरी है और इस समन का सभी पक्षकारों को मिलना भी जरूरी है।

आम तौर पर समन एक ही बार भेजा जाता है। यदि समन के संबंध में कोर्ट को यह रिपोर्ट प्राप्त हो कि समन संबंधित व्यक्ति ने प्राप्त कर लिया है या उसे सम्यक प्रकार से समन और दावे की सूचना मिल गयी है तो दुबारा समन नहीं भेजा जाता है। इस तरह यह आवश्यक है कि समन जिस व्यक्ति को भेजा गया है उसे मिल जाए और उस की सूचना भी पर्याप्त रूप से न्यायालय को मिल जाए। जब तक समन संबधित व्यक्ति को नहीं मिलता है तब तक यह प्रक्रिया चालू रहती है। एक बार प्रतिवादी को समन मिल जाने पर यदि वह अदालत में उपस्थित नहीं होता है तो अदालत उस के विरुद्ध एक तरफा कार्यवाही कर सकती है। एक तरफा कार्यवाही हो जाने पर उपस्थित पक्षकारों की साक्ष्य प्राप्त कर निर्णय किया जाता है।

समस्या-

शशि भूषण कुमार ने समस्तीपुर, झितकाही, बिहार वैशाली से समस्या भेजी है कि-

दो बच्चों की विधवा माँ से शादी कर लिया और उसके दोनों बच्चों को अपना लिया। पुनर्विवाह के बाद दो और बच्चा हुआ है। पूर्वजों ने किसी के नाम वसीयत ना की। इस संपत्ति का अधिकार सब बच्चो को बराबर मिलेगा या उस विधवा के पुनर्विवाह होने के बाद जन्में बच्चो को मिलेगा?

समाधान-

पूर्वजों से चली आई संपत्ति को सहदायिक संपत्ति कहा जाता है। इस संपत्ति में केवल पुरुष संतानों को ही अब तक अधिकार मिलता था। 2005 में हुए हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के बाद से इस संपत्ति में पुत्रियों को भी अधिकार मिलना आरंभ हुआ है। इस संपत्ति में से केवल पुरुष की औरस तथा गोद ली हुई संतानो को ही उत्तराधिकार प्राप्त हो सकता है अन्य किसी को नहीं।

विधवा के पूर्व विवाह से जन्मी संतानों को किसी प्रकार का कोई अधिकार अपनी माँ के नए पति की संपत्ति या उस के पूर्वजों की संपत्ति में प्राप्त नहीं होगा। विधवा के नए पति ने बच्चों को अपनाया है तो वह उन का लालन पालन कर सकता है। स्वअर्जित संपत्ति में से कुछ भी अपनी इच्छा से दे सकता है लेकिन बच्चों को उत्तराधिकार का कोई अधिकार माता के नए पति या पूर्वजों से चली आई सहदायिक संपत्ति में उत्पन्न नहीं होता है।

विधवा की मृत्यु के बाद जो भी संपत्ति वह छोड़ कर जाएगी उस संपत्ति में उस के पूर्व पति तथा पुनर्विवाह के बाद वर्तमान पति दोनों से जन्मी संतानों को समान रूप से उत्तराधिकार प्राप्त होगा।

Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada