Civil Law Archive

हिस्से के लिए विभाजन का वाद करें।

February 23, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

हेमन्त मिश्रा ने अजमेर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं जिस मकान में रहता हूँ वो मेरे दादाजी के नाम है। उनकी कोई वसीयत नहीं है, रजिस्ट्री की कॉपी मेरे पास है। ओरिजनल रजिस्ट्री मेरी दादी और बुआ ने गायब कर दी है। मेरे दादाजी का देहांत 1992 में हो गया था। मेरे पिताजी का देहांत भी 2015 में हो गया है। अब घर में मैं, दादी, मम्मी, एक क्वांरी बहिन, मेरी पत्नी और मेरा बच्चा रहता है। हम यहाँ लगभग 30 साल से रह रहे हैं। अब दादी कहती है कि मैं अपनी लड़कियों को हिस्सा या इस मकान को बेच कर पैसे दूंगी। तुम सब जाओ यहाँ से ये मेरे पति का घर है। जबकि मेरे पिताजी ने अपनी बहनों (5) में से (3) की शादी की। अपने जीवित समय तक सारी रस्में निभाई। पर अब दादी अपनी उम्र का फायदा उठा कर मुझे और बाकी सब को परेशान करती रहती है। उन्होंने मेरी छोटी बुआ के साथ मिलकर मेरे खिलाफ झूठी पुलिस कंप्लेन भी की थी। इसके कारण मैं बहुत परेशान रहता हूँ। मैंने घर का हिस्सा करने की बात भी कह दी उनसे पर न तो दादी हिस्सा कर रही है न कोई वसीयत और न ही घर में कुछ मरम्मत करवाती है। घर भी जर्जर हो रहा है। मैं इसमें पैसे लगाने से डरता हूँ क्यूंकि कब दादी और बुआ मिलकर क्या कर दे कुछ पता नहीं। कुछ समाधान बताये।

समाधान-

दि मकान की रजिस्ट्री की मूल प्रति आप को नहीं मिल रही है तो उस की फोटो कॉपी में दर्ज विवरण के आधार पर रजिस्ट्री की प्रमाणित प्रतिलिपि सहायक कलेक्टर स्टाम्प के यहाँ से प्राप्त की जा सकती है।

मकान दादा जी के नाम था। इस कारण उन की मृत्यु के उपरान्त आप की दादी, आप के पिता और आप की 5 बुआओं के कुल सात हिस्से हुए। इस में से एक हिस्सा आप का है। आप के पिता ने अपनी बहनों का विवाह किया है तो वह उन का पारिवारिक दायित्व था। इस से बहनों का अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा कम नहीं हो जाता है।

आप की दादी आप के कहने पर भी हिस्से नहीं कर रही है तो आप न्यायालय में विभाजन का वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि आप की बुआओं में से कोई अपना हिस्सा नहीं लेना चाहती है तो उस से आप अपने नाम या अपनी माँ के नाम रिलीज डीड करवा सकते हैं। यदि आप विभाजन का वाद प्रस्तुत करने के पहले बुआओं से रिलीज डीड पंजिकृत करवा लेते हैं तो बेहतर होगा।

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पंजीकृत बैनामा को रद्द कराना आसान नहीं होगा।

January 12, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

विजयलक्ष्मी ने झिंझक, कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम विजय लक्ष्मी है। हम तीन बहिनें हैं, मेरी माँ के पास ६ बीघा जमीन थी। मेरी माँ ने मुझे सबसे पहिले 2 बीघा खेत का बैनामा किया, उसके बाद अन्य दो को। मुझे जो जमीन मिली वह माँ के नाम थी और अन्य दो को मिली वह मेरे पिता की मरने के बाद माँ के नाम हो गयी थी।  मेरी माँ ने मेरी ऊपर दीवनी वाद कर दिया कि बैनामा फर्जी तरीके से किया गया है। मेरी माँ को दिखाई नहीं देता है। मेरी दोनों बहिने माँ को गुमराह करके बैनामा निरस्त करवाना चाहती हैं। क्या बैनामा निरस्त हो सकता है? मेरे बैनामा में मेरी बहिन गवाह भी है, दूसरा गवाह भी माँ की तरफ है।  क्या मैं भी पिता की जमीन में हिस्सा मांग सकती हूँ बैनामा को ३ साल हो चुके हैं।  मैंने लव मैरिज की है, क्या लव मैरिज करने के कारण क्या किसी अपने हक़ से बहिष्कृत क्या जा सकता है मेरे दो बच्चै हैं।

समाधान-

दि बैनामा पंजीकृत है तो उसे निरस्त किया जाना आसान नहीं है वह भी तब जब कि बैनामे को पंजीकृत हुए तीन वर्ष हो चुके हों।

यदि माँ को दिखाई नहीं देता है तो रजिस्ट्री कराते समय रजिस्ट्रार कार्यालय ने सारी पूछताछ के बाद ही उसे रजिस्टर किया होगा तो उस का निरस्त होना और भी दुष्कर है। पर कोई दीवानी वाद हुआ है तो अच्छा वकील करें। कभी कभी वकीलों की गलती से भी जीता हुआ मुकदमा मुवक्किल हार बैठता है।

पिता की जमीन कृषि भूमि होगी तो उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि के उत्तराधिकार का कानून भिन्न है। इस संबंध में अपने दस्तावेज दिखा कर किसी स्थानीय वकील से सलाह करें तो बेहतर होगा।

लव मैरिज या परिवार को छोड़ कर अपनी मर्जी से विवाह करने से परिवार बहिष्कार कर सकता है लेकिन उसे उस के हकों से बेदखल नहीं कर सकता।

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पिता की संपत्ति में हिस्सा?

December 15, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

partition of propertyसमस्या-

सुबाला देवी ने रांची, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मैं एक शादीशुदा महिला हूँ। मैं अपने पिताजी के चल-अचल संपति में हिस्सा चाहती हूँ। लेकिन मेरे पिताजी माँ और मेरे भाई हिस्सा नहीं देना चाहते हैं।  इसके लिए मुझे क्या करना होगा? मेरे पास कोई कगजात भी नहीं हैं।

समाधान-

किसी भी पुत्र या पुत्री को अपने पिता या माता की स्वअर्जित सम्पत्ति में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। जब तक वे जीवित हैं यह संपत्ति उन की है और वे अपनी इच्छानुसार इस का उपयोग कर सकते हैं। यदि माता या पिता में से किसी का देहान्त हो जाए और मृतक ने अपनी संपत्ति या उस का भाग वसीयत न किया हो तो ऐसी संपत्ति का स्वामित्व मृत्यु के साथ ही उस के उत्तराधिकारियों में निहीत हो जाता है। सभी उत्तराधिकारी उस संपत्ति के संयुक्त स्वामी हो जाते हैं। ऐसे संयुक्त स्वामियों में से कोई भी संपत्ति के बंटवारे और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा प्राप्त करने का वाद न्यायालय में संस्थित कर सकता है।

यदि आप के पिता के पास कोई पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति है तो उस में जन्म से ही पुत्रों का अधिकार होता है। 2005 से पुत्रियों का अधिकार भी होने लगा है। तब आप उस संपत्ति की संयुक्त स्वामी हो सकती हैं और उस में आप का हिस्सा हो सकता है। आप चाहें तो बँटवारे और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा प्राप्त करने का वाद न्यायालय में संस्थित कर सकती हैं।

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संयुक्त स्वामी तंग करते हैं तो विभाजन का वाद संस्थित करें।

December 14, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राकेश कुमार ने बी-21/ 12 बी, ब्लॉक-बी, ओम नगर, मीठापुर, बदरपुर, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-


र्तमान में मैं जिस मकान में रहता हूँ वह मेरी माँ के नाम है। माँ का देहान्त दिसम्बर 2014 में हो चुका है। मेरे पिता और भाई मुझ से और मेरी पत्नी से रोज लड़ाई करते हैं और कहते हैं कि यहाँ तेरा कोई हक नहीं है तू अपने बीवी बच्चों को ले कर यहाँ से निकल जा। मेरे दो छोटे छोटे बच्चे हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि उस संपत्ति में मेरा कोई अधिकार है या नहीं है। मैं अपने पिता और भाई के विरुद्ध क्या कार्यवाही कर सकता हूँ?


समाधान-

जिस स्थान पर जो निवास करता है अथवा जिस मकान /जमीन पर जिस का कब्जा है वहाँ उसे कब्जा बनाए रखने और निवास करने का अधिकार प्राप्त है। किसी भी व्यक्ति से जिस  संपत्ति पर वह काबिज है उसे जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता। इस तरह आप को भी मकान के उस परिसर से जिस पर आप का कब्जा है और जिस में आऐप रहते हैं जबरन नहीं निकाला जा सकता।

यह मकान माँ के नाम था तो माँ के देहान्त के साथ ही उस का उत्तराधिकार निश्चित हो चुका है। यदि वह मकान किसी के नाम वसीयत था तो उस का स्वामी वह वसीयती हो चुका है। यदि कोई वसीयत नहीं की थी तो माँ के सभी उत्तराधिकारी उस के संयुक्त रूप से स्वामी हो चुके हैं। कोई भी उत्तराधिकारी उस मकान का बँटवारा करवा कर अपने हिस्से का पृथक रूप से कब्जा प्राप्त करने का अधिकारी है। यदि आप के केवल एक भाई है और बहिन नहीं है तो माँ के केवल 3 उत्तराधिकारी आप, आप के पिता और भाई है। इस तरह आप को उस मकान के एक तिहाई हिस्से का स्वामित्व प्राप्त है।

आप चाहें तो तुरन्त उक्त मकान का विभाजन करने और आप के हि्स्से का पृथक कब्जा देने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। इसी वाद में आप यह आवेदन भी दे सकते हैं कि जब तक इस वाद का निर्णय न हो तब तक आप के पिता और भाई आप को उस मकान के उस परिसर से बेदखल न करें और न आप को सामान्य रूप से उस परिसर में रहने में किसी तरह की बाधा उत्पन्न करें। आप को इस वाद के निर्णय तक इस आशय की अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त हो सकती है।

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प्रतिकूल कब्जा प्रतिरक्षा का सिद्धान्त है।

December 12, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

राजेश तिवारी ने सोरों बदरिया, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मारे गाँव से दो किलो मीटर की दुरी पर ४ बीघा जमीन को हमारे पूर्वज 40साल से करते आ रहे थे।  उनकी मोत के बाद अब हम कर रहे हेै।  उस जमीन में २६ लोगों के नाम हैं, सब ने वह जमीन छोड़ रखी है।  अब एक आदमी आता है  वह जमीन छोड़ने के लिए कहता है।  उस आदमी के बाप का नाम उस जमीन में है, बाप जिन्दा है।  हम जानना चाहते हैं कि क़ानूनी तरीके से उस जमीन पर हमारा कुछ हक बनता है कि नहीं, जब कि 40 साल से कोई जमीन पर अपना हक जताने नहीं आया। हम किस कोर्ट में कोन सी धारा में अपना मुकद्दमा डाल सकते हैं। हमें उचित सलाह दें।


समाधान-

जिस जमीन पर आप और आप के पूर्वज 40 वर्ष से खेती करते आ रहे हैं और इन 40 वर्षों में किसी ने आप के खेती करने पर कोई आपत्ति नहीं की इस तरह आप का उस जमीन पर प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) है। लेकिन प्रतिकूल कब्जे का यह सिद्धान्त केवल प्रतिरक्षा के लिए। यह हथियार हमले के लिए नहीं बल्कि रक्षा के लिए है। जिस का सीधा अर्थ ये है कि यदि कोई आप को उस जमीन से हटाने  के लिए वाद संस्थित करे या कोई भी कानूनी कार्यवाही करे तो आप इस हथियार का उपयोग कर सकते हैं। इस तरह आप को अदालत जा कर किसी तरह का आवेदन देने, वाद प्रस्तुत करने या कोई और कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है। आप तो जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखें।

यदि कोई आप को धमकी देता है कि वह जबरन कब्जा छीन लेगा तो यह अपराधिक कार्यवाही है। आप को उस के विरुद्ध पुलिस में रपट दर्ज करानी चाहिए और पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर अपराधिक परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए।  आप दीवानी /राजस्व न्यायालय में  इस तरह की निषेधाज्ञा प्राप्त करने का वाद संस्थित कर सकते हैं कि आप 40 वर्षों से अधिक से भूमि पर काबिज काश्त हैं, आप का कब्जा अवैध तरीके से नहीं हटाया जा सकता है, यदि किसी का अधिकार है तो वह न्यायालय से आदेश या डिक्री प्राप्त किए आप को न हटाए।

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rp_property.jpgसमस्या-

अजय कुमार ने फरीदाबद, हरियाणा से भेजी है कि-

मस्या मेरे एक संबंधी की है। व्यक्ति के द्वारा ख़रीदे गए मकान पर उस की आकस्मिक मृत्यु के बाद किस का अधिकार है? व्यक्ति का परिवार इस प्रकार है – पत्नी, एक पुत्र, दो पुत्रियां (एक विवाहित, एक अविवाहित) अभी उस मकान में व्यक्ति का पुत्र रहता है जो अपनी माँ और बहनो को रखने को तैयार नहीं है। पुत्र का पहले का आपराधिक रिकॉर्ड है। ऐसे में बेटियों को और उनकी माँ क्या करना चाहिए?

समाधान-

किसी व्यक्ति द्वारा खरीदा गया मकान उस की स्वअर्जित संपत्ति है। उस के देहान्त के उपरान्त उस का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगा। अर्थात व्यक्ति के देहान्त के उपरान्त से ही उक्त संपत्ति में उस की पत्नी, एक पुत्र व दोनों पुत्रियों में से प्रत्येक को एक चौथाई हिस्सा प्राप्त हो चुका है। सभी चारों उस संपत्ति के संयुक्त रूप से स्वामी हैं। पुत्र उस मकान में निवास करता है इस कारण से उस के पास उस मकान का कब्जा है।

इस मकान पर पुत्र का कब्जा होते हुए भी उसे सभी चारो उत्तराधिकारियों का संयुक्त रूप से कब्जा माना जाएगा। माँ और दोनों पुत्रियाँ इस संपत्ति का विभाजन कराने और अपने अपने हिस्से का पृथक कब्जा  दिलाने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। इसी दीवानी वाद में इस तरह का आवेदन दिया जा सकता है कि उक्त संपत्ति के लिए रिसीवर की नियुक्ति की जाए जो कि उस संपत्ति के लाभों को एकत्र कर के रखे जिसे बाद में न्यायालय के आदेश से वितरित कर दिया जाए। इस आशय का अस्थाई व्यादेश जारी करने का आवेदन भी न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है कि उक्त संपत्ति का कब्जा पुत्र किसी अन्य को हस्तांतरित न करे और न ही किसी तरह संपत्ति और उस के स्वामित्व को हानि पहुँचाए।

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rp_gavel-1.pngसमस्या-

आत्मानन्द पाण्डे ने गाजीपुर उत्तर प्रदेश से पूछा है-

दि किसी के मकान का निकास ग्राम पंचायत की सड़क पर बिना किसी अवरोध के खोलने की सुविधा होने के बावजूद ग्राम सड़क पर निकास ना खोलकर एक दरवाजा पडौसी की जमीन की तरफ खोल कर क्या वह कानूनी रूप से पडौसी की जमीन में रास्ता मांगने का अधिकारी हो जाता है?

समाधान-

कोई भी अपनी भूमि या संपत्ति से सार्वजनिक मार्ग पर जा सकता है, संपत्ति के स्वामी तथा उस में निवास कर रहे लोगों को इस का अधिकार है। यदि किसी भूमि से सार्वजनिक भूमि पर निकास नहीं है तो वह किसी पड़ौसी से निकास की सुविधा मांग सकता है, यह उस की जरूरत है और इसे आवश्यक्ता का सुखाधिकार कहा जाता है। आम तौर पर जब पड़ौसी भूस्वामी की भूमि खाली हो और उस पर हो कर किसी ओर जाना आसान हो तो लोग सडक तक जाने का अलग मार्ग होने पर वहाँ से निकलने लगते हैं और उसे मार्ग बना डालते हैं। बाद में पड़ौसी भूस्वामी जब अपनी भूमि पर निर्माण कराना चाहता है तो ये ही लोग उस में अड़चन पैदा करते हैं कि यह तो उन का रास्ता है और इस पर से निकलना उन का अधिकार है अथवा उन्हें इस तरफ से निकलने का सुखाधिकार प्राप्त हो चुका है।

सुखाधिकार किसी भूस्वामी को पड़ौसी की संपत्ति पर लंबे उपयोग से प्राप्त होता है। लेकिन पडौसी भूस्वामी की भूमि से निकलने का आवश्यकता आधारित सुखाधिकार तभी प्राप्त हो सकता है जब कि किसी भूस्वामी के पास पड़ौसी की भूमि में हो कर जाने के अलावा सड़क तक पहुँचने का कोई अन्य मार्ग न हो। यदि उस के पास सड़क तक पहुँचने का वैकल्पिक मार्ग है तो वह किसी पडौसी की भूमि में हो कर जाने का अधिकार नहीं मांग सकता।

 

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House constructionसमस्या-

राजेश वर्मा ने ग्राम पोस्ट पिपरौली बड़ा गाँव जिला बलिया, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरा एक नया मकान बना है ! मेरे मकान के पीछे का जो दीवार है. वो मेरे पाटीदारों के छत से लगा हुआ है। मुझे अपने पीछे की दीवार को प्लास्टर करना है, क्योंकि जब बारिश होता है तो बारिश का पानी दीवार के सहारे मेरे घर में आता है इसलिये  मै अपने छत का प्लास्टर  कराना  चाहता  हूँ! लेकिन मेरे पाटीदार वाले मुझे अपने छत पर चढने से रोक रहे हैं और मारने की धमकी देने लगते हैं कृपया मुझे उचित सलाह दें।

समाधान-

सा अक्सर होता है। जब कोई नया मकान बनाता है तो पड़ौसियों को परेशानी होती है। वे बताते हैं लेकिन उस परेशानी को मकान बनाने वाला भी कम नहीं कर सकता। नतीजा ये होता है कि पड़ौसी होते हुए भी आपसी संबंध ऐसे ही तनावपूर्ण हो जाते हैं। अभी तो बरसात निकल गयी है इस कारण सीलन आने की संभावना तो छह आठ माह के लिए नहीं है। यदि संभव हो तो आप उस मकान में जा कर रहने लगें। आपसी रिश्तों को बेहतर बनाने का प्रयत्न करें। यह कर सके तो चार माह बाद वे आप को प्लास्टर करने से मना नहीं करेंगे।

यदि फिर भी मना करें तो पहले उन्हें वकील के माध्यम से नोटिस दिलाएँ, फिर दीवानी वाद दायर कर न्यायालय से व्यादेश (Injunction) जारी कराएँ कि वह आप को प्लास्टर करने दे। इस आदेश के बाद उसे प्लास्टर करने देना होगा। यदि मारने की धमकी देता है तो पुलिस में तुरन्त रिपोर्ट दर्ज कराएँ।

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Muslim-Girlसमस्या-

पवन ने नरवाना, हरियाणा से पूछा है-

मेरे नाना की अचल संपत्ति है जो पुश्तैनी है। मेरे नाना के एक पुत्र और तीन पुत्रियाँ हैं। पुत्र की मृत्यु हो गयी है। उस की पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है। क्या दूसरा विवाह करने के बाद भी वह स्त्री मेरे नाना की अचल संपत्ति में हिस्सा प्राप्त कर सकती है?

समाधान-

जिस क्षण एक सहदायिकी के किसी सदस्य का देहान्त होता है उस के हिस्से की संपत्ति का उत्तराधिकार निश्चित हो जाता है और उस के उत्तराधिकारी हिस्सेदार बन जाते हैं।

आप की मामी मामा का देहान्त होते ही उस सहदायिकी का हिस्सा बन गयी है जिस में आप के मामा का हिस्सा था अर्थात आप के नाना की पुश्तैनी संपत्ति में। एक बार वह हिस्सेदार हो गयी तो फिर उस के द्वारा फिर से विवाह कर लेने से उस की सहदायिकी की सदस्यता समाप्त नहीं होगी। वह अपने हिस्से के बंटवारे की मांग कर सकती है और न दिए जाने पर वह न्यायालय से बंटवारा करवा सकती है।

यदि आप के नाना की संपत्ति पुश्तैनी न हो और उन की स्वअर्जित हो तब भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आप की मामी उन का हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी हैं। उन के दूसरा विवाह कर लेने से उन का यह अधिकार समाप्त नहीं होगा। इस संदर्भ में मद्रास उच्च न्यायालय का श्रीमती यमुना देवी बनाम श्रीमती डी नलिनी के प्रकरण में दिया गया निर्णय पढ़ा जा सकता है।

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सन्नी गुप्ता ने सांबा, जम्मू और कश्मीर से पूछा है-

मेरे पापा ने अपने भाई पर कोर्ट केस किया है अपनी दुकान वापस लेने के लिए। पापा के भाई ने पापा से दुकान 1995 में अपने बेटे के लिए ली थी। लेकिन अब वो खाली नहां करते। कहते हैं कि हम 1979 से दुकान करते हैं और उन्हों ने श्रम विभाग से फार्म ओ बनाया है 1979 से। जब कि वे तब सरकारी कर्मचारी थे। 2005 में रिटायर हुए हैं। हम ने आरटीआई के जरिए उन का रिकार्ड लिया और विजिलेंस में कम्प्लेंट की। लेकिन विजिलेंस वाले कहते हैं कि वे सेवा निवृत्त कर्मचारी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर सकते। क्या हम उन के इस फ्राड के विरुद्ध कोर्ट में कार्यवाही कर सकते हैं और कोर्ट से कह सकते हैं कि उन की पेंशन बन्द की जाए। क्या ये कार्यवाही उच्च न्यायालय में होगी और क्या ये सिविल पिटीशन होगी।

समाधान-

प की मूल समस्या दुकान खाली कराना है और आप उलझ रहे हैं अपने चाचा को सजा दिलाने के लिए।

आप ने यह भी नहीं बताया कि दुकान का स्वामित्व किस का है यदि आप के पिताजी दुकान के स्वामी हैं तो आप के चाचा को उन्हों ने दुकान व्यवसाय के लिए दी तो वह एक तरह से लायसेंस पर थी। आप के पिताजी को लायसेंस कैंसल करने का नोटिस दे कर नोटिस की अवधि की समाप्ति पर दुकान के कब्जे का दावा करना चाहिए था। हो सकता है ऐसा ही दावा किया गया हो। पर आपने दावे की तफसील नहीं बताई है।

आपने उन्हें दुकान 1995 में लेना बताया है जब कि वे कह रहे हैं कि यह तो 1979 से उन के पास है। श्रम विभाग से जो लायसेंस बनाया है उस का ध्यान से निरीक्षण करना चाहिए हो सकता है वह 1995 में या उस के बाद पिछली तारीखों से बनवाया गया हो।

आप को किसी स्थानीय अच्छे वकील से राय कर के अपने दीवानी मुकदमे को लड़ना चाहिए। यदि आप यह साबित करने में सफल हो गए कि उन्हों ने दुकान 1995 में बेटे के लिए लायसेंस पर ली थी तो आप अपना मुकदमा जीत जाएंगे। चाचा के श्रम विभाग से प्राप्त लायसेंस को इसी आधार पर फर्जी सिद्ध किया जा सकता है कि उस समय वे सरकारी नौकरी में थे। चाचा के विरुद्ध कोई भी कार्यवाही अब उन का पुराना विभाग नहीं करेगा। उन्हें पेंशन अपनी सेवाओं के बदले मिलती है वह बन्द होना संभव नहीं है। वैसे भी यदि आप चाचा के विरुद्ध बदले की भावना से कोई कार्यवाही करेंगे तो अपने लक्ष्य से ही भटकेंगे। किसी के भी विरुद्ध कार्यवाही करने के पहले आप को अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए। बेहतर यह है कि आप अपने दीवानी मुकदमे की पैरवी ठीक से कराने पर ध्यान दें।

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