Civil Law Archive

समस्या-

अभी जैसवाल ने 14/459,भोली नगर, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

ड़की का परिवार अपनी जाति (जब रिश्ता लेकर आते हैं तब खुद को लड़के का जाति का ही हूँ कहते हैं), धर्म (शायद आदिवासी क्रिश्चियन होते हुए सब छुपाते हैं, खुद को हिन्दू कहते हैं। बाद में लड़के द्वारा लड़की की माँ (नानाजी का नाम और उनका गाँव आदि तथा रिश्तेदार आदि) और पिताजी के रिश्तेदार कहाँ हैं पूछने पर कुछ बताने के जगह लड़की धमकी देती है टार्चर करने का केस कर दूंगी तथा उसके घर वाले गाली गलोज करते हैं जिसका आडिओ रिकार्डिंग भी है! जन्मपत्री में उम्र कम बताते हैं मगर बाद में लड़के को पता चलता है की लड़की लड़के से बड़ी है। साथ ही लड़का जब उनके यहाँ लड़की देखने गया था तब 4 दिन लड़के को रोके रहे तथा दबाव देकर अकेले लड़के (लड़के का परिवार से कोई नहीं था) को रिंग सेरामनी करने को को विवेश किये थे जहाँ सिर्फ लड़की परिवार ही था बाकी और कोई नहीं। एक तरह से लड़के को फंसा दिए थे और उसी दवाब में लड़का मजबूर हो शादी को बाध्य हुआ था। शादी को 10 साल से ऊपर हो गया है उन दोनों के एक लड़का भी है और लड़की यहीं ससुराल में ही रहती है। बातें तो बहुत लम्बी हैं। मगर यहाँ संक्षेप में सारी बात कह चुका अब इसमें लड़की के परिवार पर किस तरह और क्या केस किया जा सकता है?

समाधान-

प की समस्या है कि भिन्न जाति, धर्म, जन्मपत्री में कम उम्र बताना, लड़के से लड़की का बड़ा होना, रिंग सेरेमनी दबाव से करवा देना जिस के दबाव में विवाह कर लेना, विवाह से एक संतान पैदा होना, अभी तक लड़की का ससुराल में रहते रहना फिर भी विवाह के 10 वर्ष बाद तक किसी अदालत में किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं उठाना।

महोदय, आप किस दुनिया में रहते हैं? विवाह के लिए कानूनन जाति, धर्म, उम्र का कोई बंधन नहीं है इन के आधार पर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती। फिर 10 वर्ष तक लड़की विवाहित जीवन निबाह कर अपनी ससुराल में रह रही है, उस से एक संतान पैदा हो जाती है। आप आपत्ति नहीं करते। अब आपत्ति का कोई नया कारण नहीं है। भाई क्या अब एक स्त्री से मन  भर गया है या कोई दूसरी भा गयी है?

आप रुपया उधार देते हैं और तीन साल तक अदालत में कोई दावा नहीं करते तो फिर अदालत में दावा नहीं कर सकते। अब विवाह पर दस साल बाद आपत्तियाँ उठा रहे हैं इस दुनिया की तो कोई अदालत आप को सुनेगी नहीं। बल्कि यह कहेगी कि आप खुद दोषी हैं। आप के लिए इस शादी से निकल भागने का कोई रास्ता नहीं है। आपकी हर कोशिश आ बैल मुझे मार वाली होगी।

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समस्या-

इति श्रीवास्तव ने रांची , झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरी माता का देहांत 2013 में हुआ, वे माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश में सहायक अध्यापिका के पद पर पिछले 30 सालों से अधिक से कार्यरत थीं। 2015 में वह रिटायर होने वाली थीं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी तीन पुत्रियों में से किसी को भी अब तक उनके सेवा से जुड़ी कोई भी राशि प्राप्त नहीं हुई है। जब मैं जे.डी. ऑफिस गई तो मुझे यह बताया गया कि तीनों लड़कियों में से किसी एक को नौकरी मिलेगी और मेरे पिता को पेंशन मिलेगी हालांकि मेरी माता के अन्य बकाया के सम्बंध में कोई बात नहीं की गई। मेरी माता का मेरे पिता से कोई लेना-देना नहीं था, हालांकि दोनों में तलाक नहीं हुआ था, और माँ की सेवा पंजिका में भी उनका नाम है जिसे वो हटाना चाहती थीं लेकिन हटा नहीं सकीं। मेरे पिता कोऑपरेटिव सोसायटी, इलाहाबाद में क्लर्क हैं। मेरी माँ की मृत्यु के समय हम तीनों बहने बेरोजगार थीं और माँ के रिश्तेदारों के घर में रहती थीं। हालांकि 2015 में मुझे केंद्र सरकार में नौकरी मिल गई। पर अन्य दोनों बहनें कम सैलरी पर प्राइवेट जॉब करती हैं और कभी-कभी छोड़ना भी पड़ता है। माँ की जगह पर नौकरी हम तीनों ही नहीं करना चाहते हैं। हम तीनों अविवाहित हैं। अभी हमारी माँ की एक पैतृक अचल सम्पत्ति बिकी उसमें से माँ के रिश्तेदारों, जिनका हिस्सा भी उस सम्पत्ति में था, ने यह कहकर की कानून के अनुसार उनको एक हिस्सा मिलेगा, हमारे शेयर में से पिता को एक हिस्सा दिया जबकि हमलोग उनसे कोई मतलब नहीं रखते। अब मेरे सवाल हैं कि, मेरी माँ के विभाग से नियमतः हम तीनों को किस-किस मद में पैसे मिलने हैं। और एल आई सी तो मुझे पता क्या उनका कोई और भी देय बनता है? उनके पैसे को प्राप्त करने के लिए क्या कागजी कार्रवाई करनी होगी? कैसे मैं अपने पिता को कुछ भी लाभ प्राप्त होने से रोक सकती हूँ, क्योंकि मेरी माँ उनको पैसे नहीं देना चाहती थीं, उनका नाम सेवा पंजिका में सिर्फ इसलिए देना पड़ा क्योंकि हमतीनों नाबालिग थे। और पिता के नाम के नीचे हमतीनों के नाम भी लिखे हैं। एक महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि क्या मैं माध्यमिक शिक्षा परिषद, इलाहाबाद के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकती हूं कि उन्होंने हमारा देय अभी तक नहीं दिया, मेरी माँ की मृत्यु के 4 साल बाद भी! यदि मेरी नौकरी न लगती तो हम तीनों बहनों की हालत दयनीय होती क्योंकि हमारे पिता ने कभी हम पर या माँ पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि हम लड़कियां थे। लेकिन मेरी माँ के सारे पैसे लेने के लिए वो प्रयास कर रहे हैं।

समाधान-

प की समस्या और आप के तर्क वाजिब हैं लेकिन संपत्ति आदि का जो भी निपटारा होना है वह कानून के अनुसार ही होना है। आप की माताजी की मृत्यु के समय तक उन का आप के पिता से तलाक नहीं हो सका था। इस कारण आप की माताजी के उत्तराधिकारियों में आप तीनों बहनों के साथ साथ आप के पिता भी शामिल हैं। उन की जो भी बकाया राशि विभाग, बीमा विभाग, जीवन बीमा, प्रावधायी निधि विभाग और बैंक आदि में मौजूद हैं उन्हें प्राप्त करने का अधिकार आप चारों को है। आप चारों प्रत्येक ¼ हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

यदि आप की माताजी का पिता से विवाद चल रहा था तो उन्हें चाहिए था कि वे अपनी वसीयत लिख देतीं जिस में अपनी तमाम संपत्ति को आप तीनों बेटियों को वसीयत कर सकती थीं और आप के पिता को उत्तराधिकार से वंचित कर सकती थीं। लेकिन उन्हों ने ऐसा नहीं किया जिस के कारण आपके पिता भी उत्तराधिकार प्राप्त करने के अधिकारी हैं। उन्हें यह सब राशियाँ प्राप्त करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं हो सकता है लेकिन वे कानूनी रूप से अधिकारी हैं।

यदि कहीं या सभी स्थानों पर नामांकन आप के पिता का है तो वे यह सारी राशि प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि नोमिनी हमेशा एक ट्रस्टी होता है औऱ उस का कर्तव्य है कि वह राशि को प्राप्त कर के मृतक के सभी उत्तराधिकारियों में उन के अधिकार के हिसाब से वितरित करे। लेकिन अक्सर देखा गया है कि नोमिनी सारी राशि प्राप्त कर के उस पर कब्जा कर के बैठ जाता है और बाकी उत्तराधिकारियों को अपना हिस्सा प्राप्त करने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। इस कारण आप को चाहिए कि आप अपनी माताजी के विभाग, प्रावधायी निधि विभाग, कर्मचारी बीमा विभाग और जीवन बीमा व बैंक आदि को तीनों संयुक्त रूप से लिख कर दें कि नोमिनी होने पर भी आपके पिता को किसी राशि का भुगतान नहीं किया जाए क्यों कि ऐसा करने पर वे आप को आप के अधिकार से वंचित कर सकते हैं।

आप स्वयं अपनी माता जी के विभाग में जा कर संबंधित विद्यालय या जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय से पता कर सकती हैं कि आप की माताजी की कौन कौन सी राशियाँ विभाग के पास बकाया हैं। उन राशियों का मूल्यांकन भी आप पता सकती हैं। यदि समस्या आए तो आप सूचना के अधिकार का उपयोग कर के विभाग से ये सूचनाएं प्राप्त कर सकती हैं। जब आप को पता लग जाए कि कौन कौन सी राशिया विभाग और अन्यत्र बकाया हैं तो आप उन सब के लिए जिला न्यायालय में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकती हैं।  इस के साथ ही जिला न्यायालय में आवेदन कर के विभाग/ विभागों के विरुद्ध यह आदेश भी जारी करवा सकती हैं उत्तराधिकार प्रमाण पत्र बनने के पहले किसी को भी आप की माताजी की बकाया राशियों का भुगतान नहीं किया जाए।

इस मामले में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए आप को स्थानीय वकील की मदद लेनी होगी। इस कारण बेहतर है कि किसी अच्छे स्थानीय वकील से सलाह करें और उस के मुताबिक यह काम करें।

आप तीनों अनुकम्पा नियुक्ति नहीं चाहती हैं, आप के पिता की अनापत्ति के बिना आप  में से किसी बहिन को अनुकम्पा नियुक्ति मिल भी नहीं सकती थी। आप की अनापत्ति के बिना आप के पिता को नहीं मिलेगी। वैसे भी वे अब नौकरी प्राप्त करने की उम्र के नहीं रहे होंगे।

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समस्या-

प्रभात झा ने आरा, प्रतापगंज, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे पापा दो भाई हैं। मेरे पापा और बड़े चाचा ने मिलकर जमीन खरीदी परंतु सारी ज़मीन बड़े चाचा ने अपने नाम से ले ली और पापा भी इस पर ध्यान नहीं दे सके क्योंकि वो बाहर रहकर काम करते थे। अब मेरे चाचा जी ने मौखिक रूप से जमीन बँटवारा किया है। लेकिन वो लिखित रूप से जमीन देने के लिए तैयार नही हैं, वो मनमाना ढंग से जमीन का बटवारा करना कहते हैं, साथ ही जेठांस की भी मांग करते हैं। हम लोगों के जोर देने पे वो सारा ज़मीन अपने बेटों के नाम से करने की धमकी देते हैं। हम लोगों के पास जमीन से सम्बंधित कोई दस्तावेज भी नहीं है। मैं जानना चाहता हूँ कि उस जमीन पर पापा का कितना हक़ है और क्या वह जमीन क़ानूनी रूप से दोनों भाई में बटवारा हो सकता है। अगर हाँ तो अब हमें क्या करना चाहिए? साथ ही अगर मेरे चाचा ने जमीन धोखे से अपने बेटों के नाम पर कर दी तो उस स्थिति में हम लोग जमीन पे दावा कर सकते हैं या नहीं।

समाधान-

ब भी कोई संपत्ति संयुक्त रूप से खरीदी जाए तो उस के विक्रयपत्र में इस बात का उल्लेख किया जाना चाहिए कि विक्रय मूल्य की राशि में किस का कितना योगदान है, और खरीददार कौन कौन हैं। लेकिन भारत में अक्सर ये होता है कि रिश्तेदार एक दूसरे के भरोसे में इस तरह के सौदे करते हैं और बाद में उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। हमारा कहना है कि विश्वासघात वहीं होता है जहाँ विश्वास होता है। इस कारण कम से कम चल-अचल संपत्ति और नकदी के मामलों में सहज विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि कैसे भी नहीं किया जाना चाहिए। आप के पिता ने आँख मूंद कर अपने भाई का विश्वास किया और अब उस की परेशानी न केवल वे भुगत रहे हैं बल्कि आप सभी भुगत रहे हैं।

आपके मामले में जमीन के कागजात अर्थात विक्य पत्र में आपके पिता का नाम नहीं है। लेकिन यदि उस जमीन को खरीदने में उन का भी आर्धिक योगदान है तो उस धन को जुटाने और जमीन के लिए भाई को देने के संबंध में कुछ न कुछ सबूत अवश्य होंगे। ये सबूत दस्तावेजी भी हो सकते हैं और मौखिक साक्ष्य से उन्हें साबित किया जा सकता है। य़दि आप के पिता जमीन खरीदने के लिए धन भाई को देना साबित करने की स्थिति में हों तो आप के पिता को तुरन्त भाई के विरुद्ध धोखाधड़ी के लिए पुलिस में रिपोर्ट लिखानी चाहिए। यदि पुलिस रिपोर्ट लिखने और कार्यवाही करने से मना करे तो वकील की सहायता ले कर सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर अन्वेषण के लिए पुलिस थाने को भेजे जाने का की प्रार्थना करना चाहिए। यही एक मात्र रास्ता है जिस से आप के पिता अपनी संपत्ति को वापस प्राप्त कर सकते हैं।

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प्रत्येक पक्षकार को दावे की सूचना होना जरूरी है।

October 12, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मनोज ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी माँ ने अपने स्वर्गीय पिता की कृषि भूमि पर अपना उतराधिकार का दावा कर रखा है। कोर्ट ने मेरी माँ की अन्य बहनों को नोटिस भेजा है, उनको भी दावा करने हेतु हिदायत दी है ताकि एक एक करके न आये और केस में लम्बी प्रक्रिया ना हो। दो बार नोटिस भेजे गये हैं लेकिन उन्होंने कोर्ट में अपनी उपस्थिति नहीं दी। दो नोटिस भेजने में 2 साल हो गए हैं। वैसे में ये जानना चाहता हूँ कि कानूनन रूप से कितनी बार नोटिस भेजा जाता है? और अन्य क्या प्रक्रिया करने के बाद, कोर्ट स्वतंत्र रूप से उनकी गैर हाजरी में अपना फैसला सुना सकता है?

समाधान-

किसी भी मुकदमे में सभी संबंधित लोगों को पक्षकार बनाना जरूरी होता है जिन का हित प्रभावित होने वाला हो। आप की माताजी के इस मुकदमे में उन के पिता के सभी उत्तराधिकारियों को पक्षकार बनाना जरूरी था क्यों कि माताजी के पिताजी की संपत्ति का बंटवारा सभी उत्तराधिकारियों के मध्य होना है। इस के लिए सभी को दावे का समन भी भेजा जाना जरूरी है और इस समन का सभी पक्षकारों को मिलना भी जरूरी है।

आम तौर पर समन एक ही बार भेजा जाता है। यदि समन के संबंध में कोर्ट को यह रिपोर्ट प्राप्त हो कि समन संबंधित व्यक्ति ने प्राप्त कर लिया है या उसे सम्यक प्रकार से समन और दावे की सूचना मिल गयी है तो दुबारा समन नहीं भेजा जाता है। इस तरह यह आवश्यक है कि समन जिस व्यक्ति को भेजा गया है उसे मिल जाए और उस की सूचना भी पर्याप्त रूप से न्यायालय को मिल जाए। जब तक समन संबधित व्यक्ति को नहीं मिलता है तब तक यह प्रक्रिया चालू रहती है। एक बार प्रतिवादी को समन मिल जाने पर यदि वह अदालत में उपस्थित नहीं होता है तो अदालत उस के विरुद्ध एक तरफा कार्यवाही कर सकती है। एक तरफा कार्यवाही हो जाने पर उपस्थित पक्षकारों की साक्ष्य प्राप्त कर निर्णय किया जाता है।

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समस्या-

शशि भूषण कुमार ने समस्तीपुर, झितकाही, बिहार वैशाली से समस्या भेजी है कि-

दो बच्चों की विधवा माँ से शादी कर लिया और उसके दोनों बच्चों को अपना लिया। पुनर्विवाह के बाद दो और बच्चा हुआ है। पूर्वजों ने किसी के नाम वसीयत ना की। इस संपत्ति का अधिकार सब बच्चो को बराबर मिलेगा या उस विधवा के पुनर्विवाह होने के बाद जन्में बच्चो को मिलेगा?

समाधान-

पूर्वजों से चली आई संपत्ति को सहदायिक संपत्ति कहा जाता है। इस संपत्ति में केवल पुरुष संतानों को ही अब तक अधिकार मिलता था। 2005 में हुए हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के बाद से इस संपत्ति में पुत्रियों को भी अधिकार मिलना आरंभ हुआ है। इस संपत्ति में से केवल पुरुष की औरस तथा गोद ली हुई संतानो को ही उत्तराधिकार प्राप्त हो सकता है अन्य किसी को नहीं।

विधवा के पूर्व विवाह से जन्मी संतानों को किसी प्रकार का कोई अधिकार अपनी माँ के नए पति की संपत्ति या उस के पूर्वजों की संपत्ति में प्राप्त नहीं होगा। विधवा के नए पति ने बच्चों को अपनाया है तो वह उन का लालन पालन कर सकता है। स्वअर्जित संपत्ति में से कुछ भी अपनी इच्छा से दे सकता है लेकिन बच्चों को उत्तराधिकार का कोई अधिकार माता के नए पति या पूर्वजों से चली आई सहदायिक संपत्ति में उत्पन्न नहीं होता है।

विधवा की मृत्यु के बाद जो भी संपत्ति वह छोड़ कर जाएगी उस संपत्ति में उस के पूर्व पति तथा पुनर्विवाह के बाद वर्तमान पति दोनों से जन्मी संतानों को समान रूप से उत्तराधिकार प्राप्त होगा।

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समस्या-

विशाल कुमार ने मवई कलाँ, मलीहा बाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या यह है कि मेरे पापा ने दो शादियाँ की थी। उनकी पहली पत्नी के लडका पैदा हुआ, उसके बाद किसी बीमारी के कारण पहली पत्नी की मृत्यु हो गई उसके बाद मेरे पापा ने दूसरी शादी की जिनका पुत्र मै हूँ।  कुछ समय बाद मेरे पापा की भी मृत्यु हो गयी। उसके बाद मेरे पापा की सारी संपत्ति 1/3 हो गई जिसमें पहले पत्नी के लडके व मेरी माँ को एवम मुझे अधिकार प्राप्त हुआ था अब मेरी माता जी की भी मृत्यु हो गई है क्या मेरी माता जी की संपत्ति मुझे अकेले को प्राप्त होगी।

समाधान-

प की माता जी को जो संपत्ति आपके पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई वह उन की व्यक्तिगत संपत्ति हो चुकी थी। अब आप की माता जी के देहान्त के उपरान्त आप के माताजी का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-15 व 16 से शासित होगा।

इन धाराओं के अनुसार सब से पहले स्त्री की संपत्ति उस के पुत्रों व पुत्रियों को प्राप्त होगी। इस तरह यदि आप के अपनी माता से कोई भाई व बहिन नहीं हैं तो फिर उनकी सारी संपत्ति आप को ही प्राप्त होगी। धारा 15 की उपधारा (2) (बी) में यह उपबंध है कि स्त्री को कोई संपत्ति यदि उस के पति या ससुर से प्राप्त हुई थी तो वह मृतका की संतानों को प्राप्त होगी। निश्चित रूप से आप का सौतेला भाई आप की माँ की संतान नहीं है। इस कारण उसे आप की माता से उत्तराधिकार के रूप में कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।

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सहदायिक संपत्ति में पुत्रियों/ स्त्रियों का अधिकार

September 21, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मोहिनी देवी ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

रदादा द्वारा खरीदी गयी कृषि भूमि है जो 1956 के पूर्व खरीदी गयी है, परदादा की मृत्यु 1956 के पूर्व हुई है, मृत्यु पश्चात दादा के नाम हो गयी, दादा की मृत्यु 1956 के बाद हुई है और मेरे पिता की मृत्यु 1993 में हुई है। कृपया मुझे ये बताये की उक्त भूमि में मेरे पिता की मृत्यु पश्चात पुत्रियों का अधिकार उक्त कृषि भूमि में है क्या? इस कृषि भूमि में मेरे पिता द्वारा कोई वसीयत नही बनायीं गयी है?

समाधान-

क्त कृषि भूमि में आप का तथा आपके पिता की अन्य पुत्रियों का अधिकार है।

17 जून 1956 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी हुआ था। इस अधिनियम की धारा-6 में यह व्यवस्था थी कि जो संपत्ति सहदायिक है उस का उत्तराधिकार सर्वाइवरशिप से अर्थात प्राचीन हिन्दू विधि के अनुसार ही होता रहेगा न कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार।  सहदायिक संपत्ति का अर्थ था जो संपत्ति किसी पुत्र को उस के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हो वह सहदायिक है और उस में उस  पुरुष सन्तानों और उन की पुरुष सन्तानों को जन्म से अधिकार प्राप्त हो जाता है।

आपके परदादा की स्वयं की खरीदी हुई कृषि भूमि 1956 के पूर्व उन की मृत्यु के कारण आप के दादा को उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है। इस तरह यह संपत्ति सहदायिक हो गयी और हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने के उपरान्त भी उस में आप के पिता और यदि उन का कोई भाई हुआ तो उस को जन्म से ही अधिकार प्राप्त होता रहा। किन्तु आप को व आप की अन्य बहनों को यह अधिकार जन्मसे प्राप्त नहीं हुआ।

इस तरह की सहदायिक संपत्ति में हिस्सा रखने वाले किसी पुरुष की मृत्यु होने पर उस के हिस्से का उत्तराधिकार सहदायिक संपत्ति के दाय के उत्तरजीविता (सर्वाइवरशिप) के नियम के अनुसार होता था। किन्तु इसी अधिनियम की धारा-6 में यह प्रावधान था कि ऐसे पुरुष की मृत्यु के समय अधिनियम की अनुसूची प्रथम में वर्णित कोई ऐसी स्त्री उत्तराधिकारी या ऐसी स्त्री के माध्यम से अपना उत्तराधिकार क्लेम करने वाला पुरुष उत्तराधिकारी हुआ तो उस के हिस्से का दाय उस पुरुष की वसीयत के द्वारा और वसीयत न होने पर अधिनियम के अनुसार होगा।

आपके पिता की मृत्यु 1993 में हुई तब आप और आप की बहने मौजूद थीं। इस कारण आप के दादा की छोड़ी हुई संपत्ति में जो हिस्सा आप के पिता को प्राप्त हुआ था वह पुश्तैनी होने पर भी उस का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार हुआ और आप को तथा आप की बहनो को पिता की संपत्ति में उन की मृत्यु के उपरान्त हिस्सा प्राप्त हुआ।जब कि आप के भाई को उसी संपत्ति में जन्म से ही अधिकार प्राप्त था। उस को जितना अधिकार जन्म से प्राप्त हो चुका था। इस कारण आपके पिता की छोड़ी हुई अविभाजित संपत्ति में आप को आपके पिता की मृत्यु के दिन से ही उत्तराधिकार के कारण हिस्सा प्राप्त है। यदि आप का कोई भाई जीवित है  तो उसे भी उस संपत्ति में आप के ही समान अधिकार प्राप्त है। लेकिन आपके भाई की कोई पुत्री 2005 के पहले पैदा हो चुकी है तो उसे 2005 में धारा 6 में किए गए संशोधन के प्रभावी होने की तिथि से आप के भाई के जीवनकाल में ही अधिकार प्राप्त हो चुका है, और यदि भाई की कोई पुत्री 2005 के संशोधन के प्रभावी होने के बाद जन्मी है तो उसे जन्म से इस सहदायिक संपत्ति में अधिकार प्राप्त है।

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समस्या-

संगीता ने प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं शादी शुदा हूँ और मेरी एक बहन है, वो भी शादी शुदा हैं। मेरे पिता जी सरकारी नौकरी पर कार्यरत थे। दोनों बेटियों की शादी कर देने पर उन्होंने हम दोनों बहनो को बिना बताये अपने सगे भतीजे के बेटे को पंजीकृत गोद ले लिया। उसे  अपनी सम्पति का मालिक बना दिया सेवा के दौरान उनका देहांत हो गया तो क्या हम दोनों बहनो गोद नामा कैंसल करवा सकती हैं और अनुकम्पा के आधार पर नौकरी किसे मिल सकती है? हम को या दत्तक पुत्र को और मेरी सहमति के बिना दत्तक पुत्र को नौकरी मिल सकती है?

समाधान-

आप कैसे कहती हैं कि दत्तक पुत्र को आप के पिता ने संपूर्ण संपत्ति का स्वामी बना दिया? क्या उन्हों ने कोई वसीयत की है। यदि कोई वसीयत नहीं की है तो जैसे एक पुत्र के होते हुए विवाहित पुत्रियों को जो अधिकार प्राप्त हैं वे सभी अधिकार आपको प्राप्त हैं। आप कृषि भूमि के अतिरिक्त तमाम संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार हैं और दत्तक पुत्र भी। आप तीनों  में से प्रत्येक पिता की छोड़ी हुई संपत्ति में एक तिहाई हिस्से की हकदार हैं। अनुकंपा के आधार पर उस आश्रित को नियुक्ति मिल सकती है जो शेष आश्रितों की अनापत्ति ले आए।  आप की आपत्ति करेंगी या अनापत्ति नहीं देंगी तो दत्तक पुत्र अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त नहीं कर सकेगा। गोदनामा आप तभी निरस्त करवा सकती हैं जब कि वह कानून के अनुसार न हो। इस के लिए आप गोदनामा की प्रति प्राप्त कर किसी स्थानीय वकील से सलाह कर सकती हैं और गोद के नियमों का उल्लंघन हुआ हो तो उसे निरस्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं।

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विक्रय निरस्त करने, विभाजन और पृथक हिस्से के कब्जे का वाद

September 6, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

कल्पना ने फरीदाबाद, हरयाणा से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी ने अपनी पैतृक जमींन अपनी पुत्र वधू के नाम 6 वर्ष पूर्व बेच दी। पिताजी को किसी प्रकार की आर्थिक आवश्यकता नहीं थी तथा पुत्र वधू किसी प्रकार की आय नहीं करती थी। अब मेरे पिताजी और मेरा बड़ा भाई मुझे, मेरे बच्चों व मेरे पति का मान सम्मान नहीं करते व हमें गाली-गालोंज भी करते है। .क्या अब मैं अपना हक/ ज़मीन वापस ले सकती हूँ?  समाज में बेटी के मान-सम्मान का भी प्रश्न है। कृपया राह सुझाएँ।

समाधान-

प पहले जाँच लें कि जमीन पैतृक ही है। कौन सी जमीन पैतृक है जिस में संतानों का जन्म से अधिकार होता है इस पर तीसरा खंबा पर पहले पोस्टें लिखी जा चुकी हैं, उन्हें सर्च कर के पढ़ लें। लड़कियों को 2005 से पैतृक संपत्ति में अधिकार मिला है। आप की जमीन की बिक्री बाद में हुई है। इस तरह आप जमीन के विक्रय को चुनौती दे सकती हैं। इस मामले में लिमिटेशन की बाधा भी नहीं आएगी। यदि पिता किसी संतान का का हक किसी और को दे देता है तो वाद 12 वर्ष तक की अवधि में किया जा सकता है। आप को चाहिए कि आप विक्रय पत्र निरस्त करवाने तथा संपत्ति का बँटवारा कर आप का हिस्सा अलग करते हुए उस का पृथक कब्जा आप को देने का वाद दीवानी न्यायालय में संस्थित करें।

 

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संयुक्त संपत्ति में हिस्सेदार अपना हिस्सा विक्रय कर सकता है।

September 2, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जमीला खातून ने सीतापुर उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ज़मीला खातून निवासी बाराबंकी, हाल सीतापुर मैंने सन १९९५ में एक ६०० स्क्वायर फुट का घर ख़रीदा था। उस बैनामे पर मेरा नाम व मेरी ५ पुत्रियों के नाम भी अंकित हैं। अब मैं अपना मकान बेचना चाहती हूँ, लेकिन मेरी बड़ी पुत्री उसमे टांग मार रही है और उससे मेरा विवाद चल रहा है। तो कृपा करके उसके बेचने का हल बताएँ कि किस प्रकार मैं उसे बेच सकती हूँ? क्या उसमें मैं कोई केस करूँ या पुलिस से शिकायत करूँ? अभी मकान में ताला पड़ा है। मेरी ५ नंबर की पुत्री जिससे मेरा विवाद चल रहा है वो भी अब उस मकान में नहीं रहती है परन्तु जबरन पूरा मकान हथियाना चाह रही है।

समाधान-

प का मकान एक संयुक्त संपत्ति है। इस के छह हिस्सेदार हैं। इस कारण कोई भी हिस्सेदार पूरा मकान नहीं बेच सकते। पूरा मकान सभी छह हिस्सेदार मिल कर ही बेच सकते हैं। हाँ आप पाँच हिस्सेदार अर्थात आप और आप की चार बेटियाँ मिल कर मकान के पाँच हिस्से बेच सकते हैं और मकान का कब्जा आप के पास हो तो खरीददार को हस्तान्तरित कर सकते हैं। लेकिन इस के बाद आपत्ति करने वाली पुत्री का छठा हिस्सा उस मकान में उसी का बना रहेगा। चाहे तो खरीददार प्रयत्न कर के आप की बेटी से छठा हिस्सा भी बाद में खरीद सकता है। या आप की आपत्ति करने वाली बेटी विभाजन का वाद कर सकती है। मकान छोटा होने से उस के भौतिक विभाजन की संभावना नहीं होने से स्थिति यही होगी कि बेटी को कहा जाएगा कि जो भी बाजार मूल्य है उस का छठा हिस्सा ले कर अपना हिस्सा छोड़ दे।

दूसरा रास्ता है कि आप बंटवारे का वाद प्रस्तुत करें और विभाजन करवाएँ विभाजन की कार्यवाही में भी वही होगा जो पहले हम बता चुके हैं। जब आप बेटी का हिस्सा खरीद लें तब आप पूरा मकान बेच सकती हैं।

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