Constitution Archive

lawसमस्या-
डॉ. महावीर सिंह ने झुन्झुनु, राजस्थान से पूछा है-

युर्वेद विभाग राजस्थान में साक्षात्कार के माध्यम से जून 2009 में 378 आयुर्वेद चिकित्साधिकारी पद पर नियुक्ति /पदस्थापन हुआ। यह भर्तियाँ राजस्थान ग्रामीण आयुर्वेद होमोपथी यूनानी एवं प्राकृतिक सेवा अधिनियम-2008 के अंतर्गत कि गई थीं।  दो वर्ष का प्रोबेशन पीरियड पूरा होने से तीन माह पहले राजस्थान हाईकोर्ट के एक निर्णय द्वारा भर्ती को अवैध घोषित कर दुबारा मेरिट बनाने का आदेश दिया तथा दुबारा भर्ती प्रक्रिया पूरे होने तक कोर्ट ने इन चिकित्सकों को ग्रामीण चिकित्सा का हवाला देकर कार्य करते रहने का निर्देश दिया। आदेश के मुख्य बिंदु थे कि 1. सरकार द्वारा सर्विस रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकने से कोर्ट ने माना कि चयन समिति ने रिकॉर्ड बनाया ही नहीं, 2.  दुबारा चयन प्रक्रिया पूरे होने तक इनको डिस्टर्ब नहीं किया जाये! आज तक सरकार दुबारा भर्ती प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकी है। मार्गदर्शन देने का श्रम करें। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि राजस्थान सरकार में दो वर्ष के प्रोबेशन पीरियड में प्रोबेशन ट्रेनी के रूप में फिक्स-रिमुनरेशन 16800/- पर रखा जाता है, हमें आज तक यही मिल रहा है।

समाधान-

प की नियुक्ति को उच्च न्यायालय द्वारा अवैध घोषित किया जा चुका है। हो सकता है राजस्थान सरकार ने उस निर्णय को आगे चुनौती दी हो, जानकारी करें। आवश्यक सेवाएँ होने के कारण नई चयन प्रक्रिया पुनः पूर्ण हो जाने तक के लिए आप को सेवा में यथावत बनाए रखने का आदेश दिया गया है। निश्चित रूप से आप को वही निश्चित वेतन तब तक मिलेगा जब तक कि आप को पुनः चयन प्रक्रिया के द्वारा चयन किया जा कर पिछली तिथि से नियुक्ति नहीं दे दी जाती है।

दि सरकार इस काम में देरी कर रही है तो यह उस का दोष है और न्यायालय के निर्णय की अवमानना भी है। इस के लिए आप न्यायालय के समक्ष अवमानना याचिका भी प्रस्तुत कर सकते हैं और एक नई रिट भी प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप को उच्च न्यायालय के वकील से संपर्क कर के उन्हें पूर्व निर्णय व संबंधित आदेश व आवश्यक दस्तावेज दिखा कर राय करना चाहिए और उन की सलाह के अनुसार कार्यवाही करना चाहिए।

Havel handcuffसमस्या-

रामसिंह राजपूत ने अहमदाबाद, गुजरात से पूछा है-

मैं महाराष्ट्र पुलिस में था। 1991 में मेरे ऊपर तीन मुकदमे डाल कर मुझे निलम्बित कर दिया गया। 1993 में हमारे जिले में नया एसपी आया और उस ने बिना कोई विभागीय जाँच किए मुझे सेवाच्युत कर दिया। जब कि मेरा मामला न्यायालय में लबिंत था। 2000 में न्यायालय ने मेरे हक में निर्णय सुनाया। और मैं केस जीत गया। मुझ आज तक नौकरी पर वापस नहीं लिया गया। जब कि मैंने मुम्बई मंत्रायलय में अर्जी दाखिल की थी। वहाँ से भी मेरी अर्जी खारिज कर दी गई। मुझे अब क्या करना चाहिए?

समाधान-

प पर जो भी मुकदमे (अपराधिक) लगाए गए उन का संबंध आप के निलम्बन और सेवाच्युति से होते हुए भी वे केवल अपराधिक मामले थे। लेकिन जैसे ही आप को सेवाच्युति का दंड दिया गया उस दंडादेश के विरुद्ध विभागीय नियमों के अनुसार विभागीय अपील करनी चाहिए थी। यदि सभी विभागीय अपीलें निरस्त कर दी गई थीं तो आप को समय रहते आप को दिए गए सेवाच्युति के दंडादेश और अपीलीय आदेशों के विरुद्ध सेवा अधिकरण में अपील दाखिल करनी चाहिए थी। मुझे लगता है कि आप ने यह काम करने में कहीं देरी की है या चूक की है।

प को अब भी मुम्बई जा कर सेवा संबंधी मामलों में वकालत करने वाले वकील को अपने सारे दस्तावेज दिखा कर उस से राय करनी चाहिए कि अब आप क्या कर सकते हैं? किस तरह आप की अवैधानिक सेवा च्युति के विरुद्ध न्याय प्राप्त कर सकते हैं। यह काम आप जितना जल्दी करेंगे उतना ही आप को राहत मिलने की संभावना बनी रहेगी। वैसे 2000 में आप के विरुद्द मामलों का निस्तारण हो चुका था उस के बाद तुरन्त आप को कार्यवाही करनी चाहिए थी। लेकिन उस बात को भी 13 वर्ष से अधिक समय व्यतीत हो चुका है। आप को अपने मामले की जाँच किसी अच्छे वकील से करवा कर ही आगे कार्यवाही करनी चाहिए। क्यों कि हमें लगता है कि आप समय पर उचित कार्यवाही नहीं करने की गलती के शिकार हुए हैं। किसी भी अन्याय के विरुद्ध न्याय प्राप्त करने की कार्यवाही की भी एक समय सीमा होती है। उस के बाद न्याय प्राप्त करना असंभव हो जाता है।

Rural development NGOसमस्या-
शरणजोत सिंह और नवदीप ने अनूपगढ़, राजस्थान पूछा है-

मैं शरणजोत सिंह एक सामाजिक कार्यकर्ता हूँ मेरा गाँव चाक 27/ए तहसील अनूपगढ़ जिला श्रीगंगानगर है। हमारे गाँव की गलियों का बहुत बुरा हाल है, हम ने कोशिश की लेकिन कोई मदद नहीं कर रहा है। मुझे सलाह दें कि मैं क्या कर सकता हूँ?

हीं नवदीप ने पूछा है कि मैं एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) खोलना चाहता हूँ, मैं इसे कैसे आरंभ कर सकता हूँ? इस का पंजीयन कहाँ से हो सकता है?

समाधान-

नजीओ का शाब्दिक अर्थ गैर सरकारी संगठन है। इस का विकास अमरीका से हुआ है। अमरीका में सरकार बहुत से सामाजिक कार्य स्वयं करने के स्थान पर इन संगठनों के माध्यम से अनुदान दे कर कराती है। इस कारण से वे लाभ या व्यवसाय के कामों के अतिरिक्त अन्य कार्यों को करने के उद्देश्य से निर्मित गैर सरकारी संगठन जो कि सरकार से या किसी धनी संस्था से अनुदान प्राप्त कर के सामाजिक कार्य करते हैं एनजीओ कहे जाते हैं।

कोई एक व्यक्ति एनजीओ नहीं होता अपितु एक संस्था के रूप में पंजीकृत होने के बाद विधिक व्यक्ति बन जाता है। भारत में लगभग सभी एनजीओ सोसायटीज एक्ट के अन्तर्गत बनाए जाते हैं। इस के लिए केन्द्रीय कानून सोसायटीज एक्ट है तथा राजस्थान में राजस्थान सोसायटीज एक्ट बना हुआ है। कोई भी 7 या अधिक व्यक्ति आपस में मिल कर कोई सोसायटी बना सकते हैं और सोसायटीज एक्ट के अन्तर्गत उसे पंजीकृत करवा सकते हैं। सोसायटी बनाने के लिए यह स्पष्ट करना जरूरी होता है कि उस संगठन की कार्यकारी समिति कैसे बनेगी और कैसे कार्यकरेगी, उस के लिए धन कैसे एकत्र किया जाएगा और कैसे खर्च किया जाएगा आदि आदि। इस को लिए नियम बनाने होते हैं और उन्हें पंजीकृत करवाना होता है। राजस्थान में सहकारी समिति के पंजीयक, अतिरिक्त पंजीयकों और डिप्टी पंजीयकों को ही सोसायटीज एक्ट के अंतर्गत पंजीयक बना रखा है। आप उन के कार्यालय से नमूने के नियम की प्रतिलिपि, आवेदन पत्र की प्रति प्राप्त कर सकते हैं और उस में अपने अनुरूप संशोधन कर के अपने नियम बना कर सोसायटी का पंजीयन करवा सकते हैं। यहाँ नवदीप जी ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वे किस उद्देश्य के लिए एनजीओ बनाना चाहते हैं। लेकिन यदि उन का इरादा कोई व्यक्तिगत लाभ का काम करने का है तो एनजीओ उस के लिए उचित माध्यम नहीं है।

धर शरणजोत सिंह की समस्या यह है कि गाँव में अव्यवस्था है और उस बारे में उन की कोई सुनता नहीं है। वैसे यह काम गाँव की पंचायत का है। उसे ये सब कार्य करना चाहिए। लेकिन जब तक जनता का दबाव नहीं होता और ग्राम पंचायत में संसाधन और काम करने की इच्छा शक्ति नहीं होती ऐसे कार्य नहीं होते। इस के लिए गाँव में जन दबाव निर्मित करना आवश्यक है। यह काम कोई गैर सरकारी संगठन ही कर सकता है।

रणजोत सिंह जी गाँव के अन्य कम से कम छह और लोगों को एकत्र कर के सोसायटीज एक्ट में एक सोसायटी का निर्माण कर सकते हैं और उसे पंजीकृत करवा सकते हैं। वे इस सोसायटी की सदस्यता बढ़ा सकते हैं। इस के माध्यम से वे ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद पर जन दबाव पैदा कर सकते हैं। वे इस सोसायटी के माध्यम से गाँव के विकास के लिए काम कर सकते हैं, रोजगार के साधन जुटाने के काम कर सकते हैं। गाँव और ग्रामीणों के विकास के लिए बनने वाली सरकारी योजनाओं से सोसायटी के लिए धन प्राप्त कर गाँव और ग्रामीणों के सर्वांगीण विकास के लिए काम कर सकते हैं।

Supreme Court India
समस्या-
हलद्वानी, उत्तराखण्ड से बीना ने पूछा है-

च्च न्यायालय में प्रस्तुत किसी प्रकरण की सुनवाई में हो रहे अनावश्यक विलम्ब हेतु क्या कहीं शिकायत की जा सकती है? या कार्यवाही शीघ्र करने हेतु कहां अपील करनी चाहिए?

समाधान –

किसी भी उच्च न्यायालय में किसी भी मुकदमे में कोई अनावश्यक देरी नहीं की जाती है। देरी का मुख्य कारण न्यायालय में लम्बित मुकदमों की संख्या है। वास्तव में हमारे न्यायालयों में केवल इतनी संख्या में मुकदमे होने चाहिए कि छह माह से दो वर्ष की अवधि में हर प्रकार के मुकदमे में अन्तिम निर्णय हो जाए। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के पद कम होने तथा जितने पद हैं उतने न्यायाधीश नियुक्त नहीं होने से लम्बित मुकदमों की संख्या बढ़ती जाती है। मुकदमे की ग्रहणार्थ सुनवाई के बाद यदि उस में कोई अन्तरिम राहत का कोई आवेदन नहीं होता या फिर अन्तरिम राहत के प्रार्थना पत्र के निर्णीत कर दिया गया होता है तो उसे क्रमानुसार (ड्यू कोर्स मे) सुनवाई के लिए रख दिया जाता है। इस तरह रखे गए मुकदमों में से प्रति सप्ताह उतने ही सब से पुराने मुकदमे सुनवाई के लिए न्यायालय में रखे जाते हैं जितने मुकदमों का प्रति सप्ताह निर्णय हो जाता है। इस तरह किसी मुकदमे में अनावश्यक देरी नहीं होती।

स देरी को समाप्त करने का यही एक तरीका है कि सर्वोच्च न्यायालाय व उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या पर्याप्त मात्रा में बढ़ाई जाए जिस से जितने मुकदमे प्रति वर्ष न्यायालय में प्रस्तुत होते हैं उन से कम से कम सवाए मुकदमों का निर्णय प्रति सप्ताह किया जा सके और धीरे धीरे मुकदमो की सुनवाई में लगने वाले समय को कम किया जा सके।

सी तरह अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या जरूरत की मात्र 20 प्रतिशत होने के कारण वहाँ मुकदमों के निपटारे में अत्यधिक समय लगता है। वहाँ भी न्यायालयों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए।

र्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या केवल केन्द्र सरकार बढ़ा सकती है क्यों कि उसे बढ़े हुए न्यायाधीशों के खर्च और व्यवस्था के अनुपात में वित्तीय व्यवस्था और करनी पड़ेगी। इस कारण मुकदमों में लगने वाले अधिक समय के लिए केन्द्र सरकार दोषी है। उसी तरह अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या बढ़ाने के लिए राज्य सरकार जिम्मेदार है। वह इस के लिए पर्याप्त वित्तीय व्यवस्था नहीं करती है। सरकारों को केवल मतदाताओं की नाराजगी ही इस काम के लिए बाध्य कर सकती है। लेकिन जब चुनाव होते हैं तो दूसरे रोजमर्रा के मामले अधिक महत्व प्राप्त करते हैं और त्वरित न्याय का मुद्दा सिरे से ही गायब हो जाता है।

हली बार आम आदमी पार्टी यह वायदा कर रही है कि वह इतने न्यायालय खोले जाने के पक्ष में है जिस से जल्दी से जल्दी मुकदमे निपटाए जा सकें। यदि इस पार्टी द्वारा इस मुद्दे को गौण नहीं  किया जाए तो दूसरी पार्टियों को भी यह काम करना होगा। तभी न्याय प्राप्त करने में जो देरी होती है उसे कम किया जा सकेगा।

वैसे यदि किसी मुकदमे में कोई ऐसी बात हो कि उसे तात्कालिक रूप से निपटाए जाने का कोई मजबूत कारण हो तो उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को आवेदन दे कर यह बताया जा सकता है कि उस मुकदमे में तुरन्त सुनवाई की क्या जरूरत है। तब यदि मुख्य न्यायाधीश समझते हैं कि मुकदमे की सुनवाई जल्दी की जानी चाहिए तो वे उस मुकदमे की तत्काल सुनवाई करने का आदेश दे सकते हैं।

सेवा में नियमित वेतनमान प्राप्त करने के लिए क्या किया जाए?

December 16, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
justiceसमस्या-
इन्दौर, मध्य प्रदेश से हेमन्त ने पूछा है –

शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय, इन्दौर (म.प्र.) में वर्ष 2002 में दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित विज्ञप्ति के आधार पर कम्प्यूटर ऑपरेटर के पद हेतु मैंने आवेदन दिया था। साक्षात्कार एवं अन्य प्रक्रियाओं के पूर्ण होने के उपरान्त मैं प्रथम पाँच सफल आवेदकों में सम्मिलित था। वर्ष 2003 में डाक द्वारा मुझे पत्र प्राप्त हुआ कि उक्त महाविद्यालय के एक विभाग में आपको संविदा आधार पर 89 दिवस के लिए नियुक्ति प्रदान की जाती है। मैंने फरवरी 2003 में उक्त विभाग ज्वाइन कर लिया। वर्ष 2003 से वर्तमान तक 89 दिवस की संविदा नियुक्ति मुझे दी जा रही है। यहाँ ज्वाइन करने के पश्चात मुझे पता चला कि मैंने आवेदन एवं साक्षात्कार तो शासकीय महाविद्यालय में दिया था। किन्तु मेरी नियुक्ति उसी महाविद्यालय के एक स्ववित्त पोषित (महाविद्यालय के अन्तर्गत कार्यरत एक ऑटोनोमस सोसायटी) विभाग में की गई है। इन्हीं परिस्थितिवश कम्प्यूटर ऑपरेटर के पद पर कार्य करते हुए करीब 10-11 वर्ष हो गये हैं। इस दौरान विभागीय प्रबंधकारिणी समिति की अनुशंसा पर समय-समय पर मेरे वेतन में वृद्धि होती रही है।  मुझे कानूनी सलाह यह चाहिये कि क्या मैं इस पद पर नियमित होने एवं नियमित वेतनमान के लिए क्या प्रक्रिया अपनाना चाहिए। वो प्रक्रिया कानूनी हो या विभागीय। क्या म.प्र. शासन के ऐसे कुछ नियमों की जानकारी आप दे सकते हैं जिसे अपनाकर मैं अपने पद पर नियमित होकर नियमित वेतनमान का लाभ ले सकूँ।

समाधान-

र्ती की प्रक्रिया शासकीय महाविद्यालय द्वारा पूरी की गई हो, लेकिन आप की नियुक्ति महाविद्यालय के अधीनस्थ स्ववित्तपोषित विभाग में की गई है। इस कारण आप की नियोजक तो सोसायटी ही है शासकीय महाविद्यालय या शासन नहीं। लेकिन वह सोसायटी शासकीय महाविद्यालय के अधीन, उसी के कर्मचारियों जैसा का काम आप से ले रही है इस कारण से आप की सेवा शर्तें भी शासकीय महाविद्यालय के अनुरूप होनी चाहिए।

स आधार पर आप शासकीय महाविद्यालय के कर्मचारियों के समान लाभ प्राप्त करने की मांग सोसायटी से कर सकते हैं। इस के लिए आप को उच्चन्यायालय के किसी वकील से संपर्क कर के सलाह करनी चाहिए और उन के माध्यम से न्याय प्राप्ति हेतु सोसायटी तथा महाविद्यालय दोनों को नोटिस प्रेषित करवाना चाहिए। इस नोटिस की अवधि समाप्त होने के बाद आप उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं।

gujrat policeसमस्या-
(भुज) कच्छ, गुजरात से वारिस ए. कुरैशी, ने पूछा है-

मेरी उम्र 31 वर्ष है, बी.ए (मनोविज्ञान, 2nd क्लास) तक पढ़ा हूँ तथा घरेलू कम्प्यूटर क्लास चलाने का काम करता हूँ। ११ जून, २००६ के दिन मेरे अब्बा ‘अब्दुलसत्तार इस्माइल कुरैशी’ अपनी दोनों किड्नी फेल होने के कारण वफात कर गए।  वह पुलिस डिपार्टमेंट में  ‘वायरलेस ऑपरेटर’ की नौकरी में थे| और 9 वर्ष से  इस बीमारी से पीड़ित थे। जिन का वर्ष २००० में किड्नी ट्रांसप्लांट ऑपरेशन हुआ था, और मेरी अम्मा ने अब्बू को अपनी एक किड्नी दी थी| भारतीय कानून अनुसार मेरे घर में और कोई कमाने वाला न होने के कारण मैं ने गुजरात राज्य से आश्रित नियुक्ति मांगी|  अब सरकारी नौकरी के लिए क़ानूनी मापदंड अनुसार नियम है कि किसी भी तकनीकी या बिना-तकनीकी जगह की नोकरी के लिए आश्रित योग्यता के अनुसार नियुक्ति दी जाये।  सरजी मेरी हाईट-बोडी कुदरती इतना नहीं कि मैं पुलिस या किसी सुरक्षाबल में नियुक्त हो सकूँ  और चेस्ट के मापदंड में भी मैं खरा नहीं उतरा।  क्लास १०वीं से मुझे दोनों आँखों में डिग्री नम्बर है।  जबकि, सुरक्षा दस्तों में एकदम गुणवत्ता युक्त आँखोंवाले, चुस्त दुरुस्त युवक-युवतियों को भरती करने के नियम हैं। अब मैं तो दुरुस्त था नहीं, फिर भी ‘सरकारी नौकरी’ एक ऐसा शब्द है कि कोई भी इंसान इस नियुक्ति को छोड़ने की बचकानी हरकत नहीं कर सकता।  मैं ने भी नहीं की।  मैं शरुआती दौर में ही पुलिस ट्रेनिंग सेंटर में चला गया। जहाँ, मुझे मेरे मास्टर और उपरी अधिकारियों द्वारा भी कहा गया कि, ‘भाई तेरी भरती कैसे हो गई पुलिस में?  इन हाईट-बोडी और चश्मों के साथ’। मैं ने तो नोकरी करनी ही थी, सो मैं डटा रहा।  अपनी ट्रेनिंग में अच्छे से अच्छे रेंक लाने में। जो कुदरती हे वो  तो कुदरती ही है।  मैं न ही मेरे साथ वाले ट्रेनिंग ले रहे जवानों के साथ ड्रिल (परेड) में मैच हो पा रहा था और ना ही दौड़ और अन्य एथलेटिक गतिविधियों एवं कसरतों में। “मेरी बुरी तरह से बातें होती रहती थी कि , कैसे कैसे इंसान आ जाते हैं भरती हो के।” अब मैं ने तो नोकरी ही करनी थी, और वो भी सरकार…की, जिस से मेरा घर चल सके, जिस में मेरी अम्मी और छोटा भाई भी थे। एक दिन दौड में मैं ने अपनी छाती में हल्की सी चुभन महसूस की, लेकिन फिर भी दौड़ता रहा।  सोचा नया नया है, बाद में रोजाना कसरतें करने से तंदुरुस्ती आ जायेगी। पर ऐसा हुआ नहीं, मैं रोज ये चुभन मेरे सीने में महसूस करने लगा, एक दिन ऐसा आया की मेरी हालत खस्ता हो गयी।  मैं दौड भी नहीं पा रहा था और अब तो चलने से भी ये पीड़ा होने लगी थी। साथ ही साथ मेरे चश्मो के कारण भी ट्रेनिंग में मुझे बहुत तकलीफ होती रहती थी, मैं चश्मे निकाल कर दौड़ता और कसरतें ड्रिल वगेरा करता।  पर चश्मे न पहनने के कारण भी कुछ चिन्ह  और आदेश समज नहीं पा रहा था| उस में भी गड़बड़ी होने लगी| मैं ने ट्रेनिंग सेंटर से अपने इलाज के लिए पासवाले दवाखाने में गया।  उन्होंने मुझे गुजरात के राजकोट में चेकिंग करवाने के आदेश दिए।  मैं वहाँ गया और दो दिन तक दाखिल रहा। पीड़ा भी बहुत थी। (मैं वह शारीरिक कसरतें झेल नहीं पाया था) अब मुझे डर लगने लगा कि मेरी नौकरी जायेगी। फिर से मैं ट्रेनिंग सेंटर में पहुँच गया।  पर अफ़सोस, मेरे शरीर में अब इतनी ताकत ही नहीं थी कि मैं ऐसी शारीरिक कवायदें झेल सकूँ। अब कोई रास्ता नहीं था। मैं ट्रेनिंग सेंटर से आराम के लिए घर आ गया। अब गुजरात सरकार के नीति नियम अनुसार मुझे नौकरी से ख़ारिज कर दिया गया। बहुत अफ़सोस हुआ, कि सरकारी नौकरी गया।  अब मैं अपना परिवार केसे चलाऊंगा? बाद में कम्पयूटर क्लास चलाने लगा।  ईश्वर के करम से मैं मेरा खर्च निकाल लेता हूँ। पर अभी भी लोगों के ताने सुनता हूँ कि। मैं सरकारी नौकरी छोड़ आया।  जब कि ऐसा था नहीं।  क्यों कि मैं कुदरती रूप से लायक ही नहीं था उस जगह के लिए। आज तक मुझे यही सवाल सताते रहते हैं कि क्यों मुझे ऐसी जगह नियुक्त किया जिस के लिए में नालायक हूँ?  क्यों मुझे ऐसी नोकरी नहीं दी कि जो मैं अपनी शारीरिक क्षमताओं के अनुसार कर सकता? और अपने परिवार का गुजारा कर सकता। जैसे की कम्पाउंडर या क्लास तीन या क्लास चार।  नौकरी चाहे पुलिस की न हो पर ऐसी जरूर हो जो मैं कर सकूँ| आप की ये साइट तीसरा खंबा मैं ने इंटरनेट पर देखी, और आपके समाधान पढ़ने के बाद मुझे विश्वास है कि आप मुझे इस राह में उचित सलाह कि क्या मैं अब भी सरकार से आश्रित नियुक्ति (रहमराह भरती) की मांग कर सकता हूँ? क्या मुझे अभी भी अपने परिवार के गुजारे के लिए नौकरी मिल सकती है?

समाधान-

प ने तथ्य विस्तार से लिखे हैं, यह अच्छी बात है। फिर भी आप यह लिखना भूल गए कि आप को ट्रेनिंग/ नौकरी से कब खारिज किया गया? यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है। इस से हमें पता लगता कि आप को क्या उपाय बताना चाहिए। खैर।

नुकम्पा नियुक्ति तो आप के पिता के सरकारी विभाग ने आप को दे दी थी। इस कारण आप की यह शिकायत तो वाजिब नहीं होगी कि आप को अनुकम्पा नियुक्ति नहीं दी गई। लेकिन यह सही है कि आप को अनुकम्पा नियुक्ति ऐसे पद पर देनी चाहिए थी जिसे करने के लिए आप शैक्षणिक और शारीरिक रूप से योग्य हों। आप को जिस नौकरी के लिए उपयुक्त पाया उस के लिए शैक्षणिक योग्यता तो आप के पास थी किन्तु शारीरिक योग्यता आप के पास नहीं थी। इस शारीरिक योग्यता में आप को अयोग्य पाए जाने के कारण आप की नियुक्ति को निरस्त कर दिया गया। इस निरस्तीकरण के उपरान्त आप को चाहिए था कि आप नियुक्ति निरस्त करने वाले अधिकारी से उच्च अधिकारी को यह अपील करते कि शारीरिक योग्यता तो प्रकृति प्रदत्त है। इस कारण से आप को ऐसी नौकरी दी जाए जो कि आप की शारीरिक योग्यता के अनुरूप हो। ऐसे बहुत से पद पुलिस में हो सकते हैं जो आप की शारीरिक योग्यता के अनुसार आप को दिए जा सकते हैं। खैर¡ आप अब भी ऐसा प्रार्थना पत्र गुजरात पुलिस विभाग को कर सकते हैं। मेरा मत है कि ऐसा आवेदन ले कर आप को स्वयं आप के विभाग के उच्च अधिकारी से मिलना चाहिए।

स प्रार्थना पत्र को यदि गुजरात पुलिस निरस्त कर देती है या एक दो माह में कोई निर्णय नहीं लेती है तो आप को उच्च न्यायालय में सेवा संबंधी मामलों की प्रेक्टिस करने वाले किसी वकील से मिल कर उसे अपने सारे दस्तावेज दिखाने चाहिए और राय करते हुए एक नोटिस न्याय प्राप्ति की मांग करते हुए गुजरात पुलिस व गुजरात सरकार को प्रेषित करना चाहिए जिस में यह मांग करनी चाहिए कि आप को पुलिस विभाग में आप की शारीरिक क्षमता के अनुसार नौकरी प्रदान की जाए या किसी अन्य विभाग में आप को नौकरी दी जाए। इस नोटिस की अवधि गुजर जाने के उपरान्त इस मांग की पूर्ति के लिए आप को सरकार के विरुद्ध एक रिट याचिका गुजरात उच्च न्यायालय में प्रस्तुत करनी चाहिए। यह रिट याचिका ही एक मात्र माध्यम है जिस से आप राहत प्राप्त कर सकते हैं।

लेकिन हमारे यहाँ न्यायालयों में इतने अधिक मुकदमे हैं कि एक मुकदमा कब निर्णीत होगा यह निश्चित नहीं है। हो सकता है इस मुकदमे को निर्णीत होने में दस वर्ष भी लग जाएँ और तब आप को राहत प्राप्त हो। इस कारण से आप को अपने वर्तमान व्यवसाय कम्प्यूटर कक्षा को विकसित करने पर भी ध्यान देना चाहिए। कम्प्यूटर कक्षा के साथ आप आप कुछ आनुषंगिक कार्य कर सकते हैं। अपने व्यवसाय को इस तरह विकसित कर सकते हैं कि आप उस में कुछ अन्य व्यक्तियों को भी नियोजन प्रदान कर सकें और आप की आय में वृद्धि भी हो। अनेक बार ऐसा होता है कि शारीरिक योग्यताएँ कम होने पर व्यक्ति का मस्तिष्क आदि अधिक क्षमता से कार्य करता है और प्रयास करने पर वह अधिक सक्षम कार्य करते हुए सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित करता है। वैसी स्थिति में अक्षमता वरदान बन जाती है। आप रिट अवश्य करें, लेकिन उस से अधिक आस न लगाएँ और अपने व्यवसाय को विकसित करने का प्रयत्न करें। हो सकता है उसी क्षेत्र में आप सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित करें।

विवाह, दत्तक आदि से जाति परिवर्तन आरक्षण हेतु मान्य नहीं . . .

November 7, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
lawसमस्या-
दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल से जॉन लेप्का ने पूछा है –

मैं एक अनुसूचित जाति से हूँ। मेरा विवाह 16 फरवरी 2007 को मन्दिरा प्रधान से हुआ है जो कि अन्य पिछड़ी जाति से है। मैं जानना चाहता हूँ कि मेरी पत्नी श्रीमती मन्दिरा प्रधान की जाति क्या होगी? वह अनुसूचित जाति की मानी जाएगी या फिर अन्य पिछड़ी जाति की मानी जाएगी। क्या उसे अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र प्राप्त हो सकता है?

समाधान-

भारत में जाति का महत्व वैवाहिक और पारिवारिक मामलों में काफी समय से रहा है। अब अन्तर्जातीय विवाहों के बाद उन कारणों से जाति का कोई महत्व नहीं रह गया है। लेकिन भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों को शैक्षणिक संस्थानों व नौकरियों में आरक्षण प्रदान किया गया है। इस कारण से इस तरह के विवाद हुए भी हैं और न्यायालयों तक पहुँचे भी हैं। जाति प्रमाण पत्र का भी इसी कारण से महत्व है।

स तरह के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय का नवीनतम मत यह है कि एक व्यक्ति को आरक्षण का लाभ इस कारण से मिलता है कि वह किसी जाति में उत्पन्न हुआ है और उस ने उस जाति की असुविधाओं को झेला है या उसे विरासत में प्राप्त हुई हैं। लेकिन कोई यदि ऐच्छिक रीति से विवाह, या दत्तक ग्रहण के माध्यम से अपनी जाति बदलता है और फिर उसे इस कारण से आरक्षण का लाभ दिया जाता है तो इस से फर्जी जाति परिवर्तन के मामले बहुत बढ़ जाएंगे और लोग इस तरह जाति बदल कर आरक्षण का लाभ उठाने लगेंगे। वैसे भी जब एक व्यक्ति वयस्क होने तक एक जाति के लाभ प्राप्त कर लेता है और फिर सोच समझ कर विजातीय से विवाह करता है तो यह उस का  ऐच्छिक कृत्य है। इस कारण से उस का लाभ उसे प्राप्त नहीं होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय द्वारा 4 जनवरी 1996 को श्रीमती वलसम्मा पॉल बनाम कोचिन विश्वविद्यालय व अन्य के प्रकरण में दिए गए निर्णय में इस संबंध में विस्तृत रूप से विचार किया गया है।

प दोनों का वयस्क होने के उपरान्त विवाह हुआ है जो दोनों की इच्छा से संपन्न हुआ है। इस कारण से इस ऐच्छिक कृत्य से आप दोनों की ही जाति का परिवर्तन होना मान्य नहीं हो सकता। आप की पत्नी की जाति पूर्व की तरह अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी) बनी रहेगी। उन का अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र नहीं बन सकेगा। यदि किसी तरह बनवा भी लिया जाता है और उस के आधार पर कोई लाभ प्राप्त किया जाता है तो उसे कोई भी चुनौती दे सकता है तथा वैसी स्थिति में वह जाति प्रमाण पत्र सही नहीं माना जाएगा और उस के आधार पर प्राप्त लाभ भी आप की पत्नी से छिन जाएगा।

उच्च न्यायालय में हिन्दी में रिट व अन्य याचिकाएँ …

August 31, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
jabalpur highcourtसमस्या-

चुरहट, मध्यप्रदेश से पूनम सिंह ने पूछा है-

क्या उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका या अन्य कोई आवेदन हिन्दी भाषा में प्रस्तुत किया जा सकता है? क्या याचिका को पोस्ट के माध्यम से भेजने पर स्वीकृत हो सकता है।

समाधान-

देश के कुछ राज्यों के उच्च न्यायालयों में हिन्दी में रिट याचिका या अन्य किसी भी प्रकार की याचिका प्रस्तुत की जा सकती है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार राज्यों के उच्च न्यायालयों में हिन्दी में कार्य होता है। उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, और झारखंड राज्य भी इन्हीं राज्यों से पृथक हुए हैं इस कारण इन राज्यों के उच्च न्यायालय भी हिन्दी में कार्य होना चाहिए।  आप मध्यप्रदेश से हैं। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में हिन्दी में कार्य होता है वहाँ रिट याचिका या अन्य कोई भी कार्यवाही हिन्दी में संस्थित की जा सकती है।

न्यायालय में संस्थित प्रत्येक मामले में कम से कम दो पक्ष होते हैं और न्यायालय दोनों ही पक्षों को सुन कर अपना निर्णय प्रदान करता है। सुनवाई में दोनों पक्षों का उपस्थित होना अनिवार्य है। इस कारण कोई भी प्रकरण व्यक्तिगत रूप से ही न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इस से पक्षकार को यह भी ज्ञान रहता है कि उस के द्वारा प्रस्तुत या उस के विरुद्ध प्रस्तुत प्रकरण में क्या कार्यवाही हो रही है। इस कारण डाक से याचिका प्रस्तुत करने का अभी तक कोई प्रावधान नहीं है। हालाँ कि सर्वोच्च न्यायालय में ई-फाइलिंग सुविधा अवश्य प्रदान की गई है।

डाक से भेजी गई याचिका या पत्र के किसी महत्वपूर्ण जनहित से संबद्ध होने पर को याचिका के रूप में स्वीकार करने की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय को है लेकिन यह न्यायालय की इच्छा है कि वे उसे याचिका के रूप में स्वीकार करें या न करें। इस कारण यदि आप किसी मामले को उच्च न्यायालय के समक्ष ले ही जाना चाहते हैं तो आप को स्वयं ही उपस्थित हो कर, यहाँ तक कि किसी सक्षम वकील के माध्यम से ही उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

unconstitutionalसमस्या-

बीकानेर, राजस्थान से सुजागु सिन्धी ने पूछा है-

विधानसभा द्वारा पारित किसी कानून की किसी धारा को असंवैधनिक करार देने के लिए प्रक्रिया बताएँ।

समाधान-

किसी भी विधायिका द्वारा निर्मित कानून के प्रभावी होने पर उस कानून की किसी धारा या अंश के जिस भाग के असंवैधानिक होने से जो व्यक्ति विपरीत रूप से प्रभावित हो रहा है वह कानून के उस अंश को असंवैधानिक करार देने के लिए कार्यवाही कर सकता है।

स के लिए उस व्यक्ति को उच्च न्यायालय में रिट याचिका प्रस्तुत करनी होगी जिस में उसे बताना होगा कि वह कानून या उस का कोई अंश किस तरह से असंवैधानिक है? और उस की असंवैधानिक होने के कारण उस का कोई मूल अधिकार या कानूनी अधिकार किस तरह प्रभावित हो रहा है?

Adoption
समस्या-

दौसा (राजस्थान) से राजेश कुमार ने पूछा है-

मेरे मौसी अन्य पिछड़ी जाति की हैं मेरी मौसी कोई संतान नहीं होने के कारण मुझे गोद लेना चाहती हैं। उनका दतक पुत्र बनने में मुझे और मेरी माँ को कोई आपति नहीं है, मेरे पिता जी का भी देहांत हो चुका है| जिस अनुसूचित जाति वर्ग से मैं सरकारी कर्मचारी हूँ।  क्या अन्य जाति वर्ग के गोद जाने से सरकारी विभाग में भी वो जाति वर्ग भी बदल जायेगा? यदि हाँ तो कौन से नियम के तहत ऐसा संभव होगा? केंद्रीय सरकार और राजस्थान सरकार के क्या अलग अलग नियम हैं? यदि जाति बदल जाती है तो इसमें सरकार को कोई आपत्ति तो नहीं होगी और क्या सर्विस बुक में भी मेरी जाति बदल जायेगी|

समाधान-

प का प्रश्न अत्यन्त जटिल है। इस में विधि के अनेक पहलू और सिद्धान्त छिपे हैं। सब से पहला प्रश्न तो यह है कि क्या आप को दत्तक ग्रहण किया जा सकता है? हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण पोषण अधिनियम के अनुसार केवल 15 वर्ष तक की आयु के बालकों को ही दत्तक ग्रहण किया जा सकता है वह भी उस के माता-पिता की सहमति और दत्तक ग्रहण करने वाले माता-पिता की सहमति से। 15 वर्ष से अधिक के व्यक्ति और विवाहित व्यक्ति को भी दत्तक ग्रहण किया जा सकता है लेकिन तभी जब कि उस परिवार या जाति में ऐसी परंपरा हो। इस परंपरा को साबित करना दुष्कर है। इस के अलावा जब कोई स्त्री किसी पुरुष को दत्तक ग्रहण करती है तो यह भी आवश्यक है कि दत्तक ग्रहण किए जाने वाले पुरुष से दत्तक ग्रहण करने वाली स्त्री की उम्र कम से कम 21 वर्ष अधिक हो। आप को दत्तक ग्रहण के पूर्व इन सब बातों को जाँचना होगा।

दि यह मान लिया जाए कि आप का दत्तक ग्रहण हो जाता है तो समस्या यह होगी कि आप की जाति दत्तक ग्रहण के उपरान्त क्या होगी। भारत का संविधान जाति के आधार पर भेद करने की मनाही करता है इस कारण से संविधान की दृष्टि में जाति का कोई महत्व नहीं है। लेकिन दूसरी ओर संविधान हिन्दू विधि से शासित होने वाले लोगों को पाँच भिन्न जाति आधारित श्रेणियों में विभाजित करता है। अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति, अन्य पिछड़ी जाति और सवर्ण जातियाँ। इन में से पहली चार श्रेणियों को शिक्षा, नौकरी, निर्वाचन आदि मामलों में आरक्षण प्राप्त है। इस कारण इन लाभों को प्राप्त करने के दृष्टिकोण से जाति परिवर्तन के प्रश्न पर विचार करना आवश्यक है।

हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण पोषण अधिनियम की धारा 12 के अनुसार दत्तक ग्रहण होते ही एक व्यक्ति प्रत्येक मामले में अपने दत्तक ग्रहण करने वाले माता-पिता की संतान समझा जाता है। इस हिसाब से उस की जाति भी बदल जानी चाहिए। लेकिन इस धारा में जो संदर्भ हैं वे केवल विवाह की वर्जित श्रेणियों तथा संपत्ति से संबंधित हैं। जब कि जाति का मामला सामुदायिक है। किसी व्यक्ति की जाति तभी परिवर्तित हो सकती है जब कि जाति का संपूर्ण समुदाय उसे अपनी जाति में सम्मिलित कर ले। यह काम केवल जाति की पंचायत कर सकती है।

स के अलावा एक बिन्दु भी है कि अब तक भारतीय न्यायालयों का दृष्टिकोण इस मामले में क्या रहा है। एक बालक यदि छोटी उम्र में द्त्तक ग्रहण कर लिया जाता है और उस का पालन पोषण दत्तक ग्रहण करने वाले माता पिता के यहाँ होता है तो यह माना जा सकता है कि उस ने उन असुविधाओं को भी झेला है जो कि दत्तक ग्रहण करने वाले माता पिता की जाति झेलती है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति बड़ी उम्र् में दत्तक ग्रहण किया जाए तो इस बात को मानना संभव नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने In Murlidhar Dayandeo Kesekar v. Vishwanath Pandu and R. Chandevarappa v. State of Karnataka , के मामले में 22 फरवरी 1995 को पारित निर्णय में निम्न सिद्धान्त प्रतिपादित किया है –

Therefore, when a member is transplanted into the Dalits, Tribes and OBCs, he/she must of necessity also undergo have had same the handicaps, and must have been subject to the same disabilities, disadvantages, indignities or sufferings so as to entitle the candidate to avail the facility of reservation. A candidate who had the advantageous start in life being born in forward caste and had march of advantageous life but is transplanted in backward caste by adoption or marriage or conversion, does not become eligible to the benefit of reservation either under Article 15(4) and 16(4), as the case may be. Acquisition of the Status of Scheduled Caste etc. by voluntary mobility into these categories would play fraud on the Constitution, and would frustrate the benign constitutional policy under Articles 15(4) and 16(4) of the Constitution.

स निर्णय और अन्य सभी निर्णयों में विवाद इस बात पर हुआ है कि क्या दत्तक ग्रहण से जाति परिवर्तन के बाद कोई व्यक्ति परिवर्तित जाति को प्राप्त आरक्षण के लाभ प्राप्त कर सकता है? और उत्तर नहीं में दिया गया है। लेकिन आप का मामला उलटा है आप अनुसूचित जाति वर्ग से हैं जिन्हें आरक्षण की अधिक सुविधाएँ प्राप्त हैं तथा आप अन्य पिछड़ी जाति में  दत्तक ग्रहण होना चाहते हैं। आप को भय है कि दत्तक ग्रहण से आप को प्राप्त आरक्षण की सुविधाएँ छिन न जाएँ।

र्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित उक्त सिद्धान्त के अनुसार तो आप की सुविधाएँ छीनी नहीं जानी चाहिए। पर यदि कोई शिकायत करे तो वे सुविधाएँ विवाद में अवश्य आ जाएंगी फिर मामला जब न्यायालय में जाएगा तो क्या निर्णय होगा यह अभी से नहीं कहा जा सकता।

मेरी राय यह है कि आप की मौसी केवल सामाजिक रूप से इस कारण से दत्तक ग्रहण करना चाहती हैं कि धार्मिक रूप से उनका क्रिया कर्म करने वाला और उन का श्राद्ध करने वाला उन का पुत्र हो और जो कुछ संपत्ति है वह उसे मिल जाए। तो इस मामले में यह किया जा सकता है कि वे सामाजिक-धार्मिक रूप से आप को दत्तक ग्रहण कर लें जिस से उन की इच्छा पूरी हो जाए और संपत्ति जो भी उन के पास है उसे वे आप को वसीयत कर दें जो आप को उन के जीवन काल में आप की हो जाएगी। लेकिन दत्तक ग्रहण करने का दस्तावेज पंजीकृत न कराया जाए। जब तक दस्तावेज पंजीकृत न होगा तब तक आप को सरकारी रूप से दत्तक नहीं माना जाएगा और आप की मौसी और आप का उद्देश्य भी पूरा हो लेगा। वैसे भी इस दस्तावेज को पंजीकृत कराने में अनेक बाधाएँ हैं जिस से उस का पंजीकरण असंभव प्रतीत होता है।

Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada