Consumer Archive

समस्या-

पत्रकार रमेश कुमार जैन निर्भीक ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-


जकल बाज़ार में से कोई भी चीज खरीदों. जैसे – मोबाइल की बैटरी, कम्प्यूटर के यू.पी.सी की बैटरी, स्कुटरी की बैटरी या अन्य कोई भी वस्तु जिसपर सीमित समय के लिए गारंटी/ वारंटी होती है. गारंटी अवधि में वस्तु के खराब होने पर दुकानदार/कम्पनी उपरोक्त वस्तु को बदलकर तो दे देते हैं. लेकिन बदली हुई वस्तु पर पहले वाली वस्तु की बची अवधि की ही गारंटी देते हैं. उदाहरण से समझे : पहले वाली वस्तु छह महीने की गारंटी है और वो वस्तु चार महीने के बाद खराब हो गई तो दुकानदार/कम्पनी दूसरी वस्तु पर केवल दो महीने की गारंटी की ही गारंटी देते हैं. कुछ वस्तुओं पर वारंटी होती है तो उस वस्तु में बार-बार कोई खराबी आती है तब उनका सर्विस सेंटर बहुत दूर होने के कारण बार-बार सर्विस सेंटर हर उपभोक्ता के लिए जाना सम्भव नहीं होता है. अनेक बार तो वस्तु इतनी कम कीमत की होती है कि उसको सर्विस सेंटर पर लेकर जाने का खर्चा उससे अधिक होता है. ऐसी समस्याओं के क्या उपाय है और इस विषय में उपभोक्ता कानून क्या कहते हैं ? उपरोक्त समस्या आज दिल्ली या किसी विशेष शहर की समस्या न होकर पूरे भारत वर्ष की आम जनता की है.


समाधान-

वारंटी या गारंटी पर न जाएँ। इसे ऐसा समझें कि किसी माल पर जो बेचा गया है उस पर कोई वारंटी या गारंटी नहीं है। फिर भी कोई व्यक्ति कोई खराब चीज किसी व्यक्ति को नहीं बेच सकता। यदि वह कोई खराब चीज बेचता है तो यह उपभोक्ता के साथ अन्याय है और उपभोक्ता कानून में इस तरह के अन्याय से पीड़ित कोई भी व्यक्ति उपभोक्ता न्यायालय को शिकायत प्रस्तुत कर सकता है और राहत प्राप्त कर सकता है। यदि किसी माल में मैन्युफैक्चरिंग दोष है तो उसे बदलने के लिए किसी वारंटी की कोई जरूरत नहीं है। उपभोक्ता अदालतों ने वारंटी के बिना बेचे गए माल के और वारंटी की अवधि के बाद मैन्युफेक्चरिंग दोष का पता लगने पर किए गए मामलों में उपभोक्ता के पक्ष में निर्णय किए हैं।

कम कीमत के माल के मामले में भी शिकायक की जा सकती है। आखिर अदालत मानसिक संताप के लिए भी तो क्षतिपूर्ति दिलाती है। यदि सर्विस सेंटर जाने में बहुत पैसा खर्च हुआ है और आप उसे साबित कर सकते हैं तो वह खर्चा और आने जाने में हुए समय व कष्ट के लिए भी क्षतिपूर्ति उपभोक्ता न्यायालय दिला सकते हैं।

अब तक 4 टिप्पणियाँ, आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

समस्या-

गुलाम मोहम्मद ने रायपुर छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है-

मैं ने 30 जनवरी 2016 को अपनी बहन की शादी की है। 3 दिनों तक शादी का कार्यक्रम चला। मैं ने नवम्बर 2015 को शादी में फोटोग्राफी और वीडियो के लिए रायपुर के ही एक फोटोग्राफर को फोटोग्राफी का कुल 15000/- रू. में और वीडियो का 8000/- रू. में बुक करवाया। मैं फोटोग्राफर को एडवांस राशि के रूप में दोनों काम के लिए 3000/- रू. दिया। जिसकी रसीद मेरे पास है। जून 2016 में मैंने उनको 10000/- रू. दिया। मगर इस राशि का रसीद मेरे पास नहीं है। फिर मैंने उनको बोला कि जब फोटो एलबम और वीडियो सीडी आप देंगे तब मैं आपको आपका बचा हुआ 10000/- रू. दूंगा तब उसने स्वीकार कर लिया। फोटोग्राफर ने मुझे फोटो का एलबम बना के तो दे दिया है मगर वह कहता है कि जो वीडियो उन्होने शादी में लिया था वह पुरा वीडियो धोखे से डिलिट हो गया है। उनका यह कहते ही मेरा दिमाग खराब हो गया। जब मैं उनको इस लापरवाही के लिए डांटा तो वो मुझसे ही झगड़ने लग गया और उनको अपनी गलती का एहसास ही नहीं है। वीडियो डिलिट हो गया है कहॉ से लाकर दूँ जाओ जो करना है कर लो कहता है। अभी मैं ने उनको उनकी बची हुई राशि नहीं दी है। यहाँ बात यह है कि मैंने अपनी बहन की शादी बड़े धूम-धाम से करवायी है। व्यक्ति फोटो एलबम और वीडियो वगैरह इस पल की यादों को जिन्दगी भर के लिये सँजोये रखने के लिए करवाता है। शादी जैसे कार्यक्रम में फोटोग्राफी, वीडियो भी अहम होते हैं। मैं उस फोटोग्राफर की लापरवाही, गैरजिम्मेदराना रवैय्ये और उनके अपशब्द व्यवहार से दुखी हूँ। मैं उनको अच्छे से सबक सिखाना चाहता हूँ ताकि वह भविष्य में किसी व्यक्ति के ऐसे अहम पलो के यादो को संजोये रखने के इरादे और सपनों को ना तोड़े और धोखा ना दे सकें। मैं आपसे यह पूछना चाहता हूँ। कि मैं उस फोटोग्राफर के खिलाफ क्या कदम उठा सकता हॅू? क्या किसी प्रकार का मानसिक क्षतिपूर्ति प्राप्त कर सकता हूँ? क्या किसी प्रकार से उसको हर्जाना/जुर्माना या सजा दिलवा सकता हूँ? आपकी राय से मुझे उनके खिलाफ क्या कार्यवाही करना चाहिए?

समाधान-

प ने फोटोग्राफर से वीडियो रिकार्डिंग तथा फोटोग्राफ लेने की सेवाएँ प्रदान करने के लिए कांट्रेक्ट किया था। उस ने फोटोग्राफ तो बना दिए। लेकिन वीडियो रिकार्डिंग उस से डिलिट हो गयी। आप फोटोग्राफर के एक उपभोक्ता हैं और फोटोग्राफर ने वीडियो रिकार्डिंग को गलती से या किसी लापरवाही के कारण डिलिट कर के अपनी सेवा में गंभीर त्रुटि की है। इस से आप को गहरा मानसिक संताप भी हुआ है। ऐसी क्षति हुई है जिस की धन से पूर्ति संभव नहीं है। फिर भी फोटोग्राफर का यह दोष ऐसा नहीं है जिस से वह कोई अपराध हो। इस कारण फोटोग्राफर को किसी तरह के कारावास या जुर्माने का दंड नहीं दिया जा सकता है।

लेकिन उस के सेवादोष से हुई अपार क्षति के लिए तथा मानसिक संताप के लिए उस से हर्जाना मांगा जा सकता है। आप इस सेवा दोष से हुई क्षति तथा मानसिक संताप की अपने हिसाब से रुपयों में मूल्यांकन कर सकते हैं और एक लीगल नोटिस के माध्यम से उस से क्षतिपूर्ति की मांग कर सकते हैं। क्षतिपूर्ति की मांग को पूर्ण न करने पर उस के विरुद्ध जिला उपभोक्ता मंच में अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं। बेहतर है कि इस परिवाद को तैयार कर प्रस्तुत करने और आप की पैरवी करने के लिए किसी अच्छे वकील की सेवाएँ प्राप्त करें।

यहाँ क्लिक कर सबसे पहले टिप्पणी कीजिए

consumer protectionसमस्या-

प्रशान्त चौहान ने इन्दौर मध्यप्रदेश से पूछा है-

मैं रक्षा मन्त्रालय अधीनस्थ अर्ध-शासकीय निकाय में स्थायी कर्मचारी के रूप में कार्यरत होकर वेतनभोगी कर्मचारी हूँ। मेरे द्वारा एक राष्ट्रीयकृत जहाँ मेरा वेतन प्रतिमाह जमा होता है, उस बैंक से जून-2012 में रु.1,50,000/- का व्यक्तिगत ऋण 48 माह की समयावधि हेतु ग्राह्य किया गया था। तत्समय बैंक द्वारा की गणना अनुसार बैंक द्वारा मेरी EMI रु.3850/- निर्धारित की गई थी।  तदुपरांत से मेरे बचत खाते से उक्त ऋण-राशि की मासिक किश्त बिना किसी गैप/अन्तराल के नियमित रूप से लोन खाते में समायोजित होती रही है एवं समय-समय पर EMI के अतिरिक्त राशि भी मैंने सीधे अपने लोन खाते में जमा की है। विगत दिनांक 01-07-16 को बैंक के मोबाइल से आये मेसेज से ज्ञात हुआ कि मेरा वेतन (लगभग-21,100/- रु.) बैंक में मेरे बचत खाते में जमा होते ही सीधे मेरे लोन खाते में समायोजित कर लिया गया है एवं इसके उपरांत 5000/- का डेबिट बेलेंस हो गया है। याने कुल 26,000/- कि राशि एक मुश्त बैंक द्वारा बिना किसी नोटिस/ सूचना के मेरे बचत खाते से लोन खाते में समायोजित कर ली गई। बैंक में अधिकारियों से चर्चा पश्चात बताया गया कि बीता माह आपकी लोन अवधि का अंतिम माह था एवं लोन ग्राह्य समय से आज तक ब्याज के उतार चडाव इत्यादि से जो राशि का फर्क है वो कम्प्यूटर ने अपने आप काट लिया है। चूँकि मैं एक वेतन भोगी कर्मचारी हूँ, एवं उक्त कार्यवाही से मेरे सामने अपने परिवार सहित सम्पूर्ण माह के निर्वाह का प्रश्न उत्पन्न हो गया है, एवं मानसिक रूप से व्यथित हूँ। अतः आपसे स-निवेदन पूछना चाहूँगा कि क्या बैंक का लोन वसूली का उक्त तरीका सही है?  क्या एक वेतनभोगी कर्मचारी का पूरा वेतन इस प्रकार से लोन खाते में समायोजित किया जा सकता है? जबकि उक्त सम्बन्ध में मुझे कोई पूर्व-सूचना नहीं दी गई।  यदि समय पर मेरा लोन चुकता नहीं हो रहा था तो ये राशि बीच अवधि से ही मेरी मासिक किश्त में वृद्धि कर के भी वसूली की जा सकती थी? इस प्रकार की घटना मेरे अन्य साथी कर्मचारियों के साथ भी हो चुकी है, एवं सभी मानसिक आर्थिक रूप से आहत हो चुके हैं। कृपया मार्गदर्शन देवें कि चूँकि मैं उक्त बैंक का ऋणी होकर आभारी भी हूँ कि तत्समय बैंक ने मुझे ऋण प्रदाय कर अनुग्रहित किया, तो इस स्थिति में भी क्या मुझे मेरे मौलिक एवं मानवीय अधिकारों के तहत उक्त सम्बन्ध में बैंक प्रबंधन को अपनी आपत्ति दर्ज कराने, शिकायत  अथवा अन्य विधिक कार्यवाही सम्पादित कर सकता हूँ अथवा नहीं?

समाधान-

ब से पहले तो आप बैंक के आभारी होना बन्द कीजिए। बैंक ने ऋण दे कर आप पर कोई अनुग्रह नहीं किया था। ऋण देना बैंक का धंधा है उसी से बैंक के मुनाफे निकलते हैं। वे ऋण दे कर व्यवसाय कर रहे हैं किसी पर कोई कृपा नहीं कर रहे।

बैंक ने जब ईएमआई तय कर रखी थी तो ईएमाई से अधिक राशि बैंक किसी भी सूरत में आप के बचत खाते से बिना सूचना दिए नहीं काट सकता था। बैंक ने आप की पूरी सैलरी काट कर आप को शारीरिक मानसिक पीड़ा पहुँचाई है। बैंक आप को सेवाएँ प्रदान करता है इस कारण उस ने सेवा में त्रुटि की है। यह बैंक का अनुचित व्यवसायिक कृत्य भी है। आप को पूरी सैलरी कटने से जो पीड़ा हुई है उस की कीमत लाखों से कम नहीं है और आप इस शारीरिक मानसिक पीड़ा के लिए बैंक से क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

आप को बैंक को नोटिस दे कर इस मानसिक शारीरिक पीड़ा के लिए क्षतिपूर्ति की मांग करनी चाहिए, उस के लिए नोटिस देना चाहिए और बैंक द्वारा सुनवाई न किए जाने पर आप को उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच के समक्ष परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

अब तक 2 टिप्पणियाँ, आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

private schoolसमस्या-

रूपबास, भरतपुर, राजस्थान के एक किशोर भुवनेश्वर शर्मा ने तीसरा खंबा को समस्याएँ भेजी हैं-

1- हम एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हैं सभी बच्चे कक्षा टेंथ में पढ़ते है। हमारे यहां पर सामाजिक का कोई टीचर नहीं है क्या यह बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है या नहीं? कक्षा 10 राजस्थान बोर्ड की बोर्ड क्लास है, बच्चे सामाजिक में फेल भी हो सकते है। वहां पर सामाजिक विज्ञान पढ़ाने वाला कोई टीचर नहीं है, प्रधानाध्यापक से कहते हैं तो कहती हैं कोई बुराई नहीं, इस टीचर से सामाजिक विज्ञान पढ़ने में। इस के लिए कहां शिकायत करनी चाहिए?

2- एक व्यक्ति ऑफिस में लिपिक के पद पर कार्यरत है उसे उस की जाति से जाना जाएगा अथवा नाम से?

3- एक मास्टर है जो बच्चों के चूतड़ पर डंडा मारता है उस पर कोई कार्यवाही हो सकती है?

4- मिनरल वाटर का पानी खराब आने की सूचना हम कहां दे वाटर प्लांट सरकारी है?

5- हमने एक दुकानदार से एक नया सिम कार्ड खरीदा अब उसी पहचान पत्र की फोटो कॉपी करवाकर दुकानदार ने हमारे आईडी कार्ड और फोटो से अन्य सिम खरीद रखी है। उस के लिए क्या करना चाहिए? हमें कहां दावा पेश करना चाहिए?

6- हमने दुकानदार से नया मोबाइल खरीदा था। अब मोबाइल खराब हो गया है और वह गारंटी में है। वह दुकानदार उस मोबाइल को सर्विस सेंटर पर नहीं ले जा रहा है इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

7- हमने दुकानदार से एशियन पेण्ट  की पांच किलो की बाल्टी खरीदी अब उस बाल्टी में ऊपर पानी निकल आया है, इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

8- मेरे दादा जी ने एक व्यक्ति के गाल पर थप्पड़ मार दिया था वह जाति से जाट है क्या वह हम पर दावा कर सकता है?

समाधान-

कुछ दिन पहले इस किशोर ने तीसरा खंबा के ई-मेंल बाक्स में प्रश्नों की लाइन लगा दी और उसे भर दिया। हम इस किशोर की अपनी, अपने साथियों, परिवार और समाज की चिन्ता करने की प्रवृत्ति की सराहना करते हैं। अपनी समस्याओं के समाधान खुद खोजने की प्रवृत्ति एक अच्छा गुण है। आगे चल कर यह प्रवृत्ति इस किशोर में नेतृत्वकारी गुण पैदा कर सकती है। लेकिन इस उम्र में जब कि वह दसवीं कक्षा का विद्यार्थी है उसे इन चिन्ताओं से मुक्त होना चाहिए। उसे ये चिन्ताएँ अपने अभिभावकों को बतानी चाहिए और स्वयं इन चिन्ताओं से मुक्त हो जाना चाहिए। अभिभावकों को चाहिए कि वे इन चिन्ताओं को दूर करने के लिए प्रयास करें। किशोरों का काम है कि वे अपने अध्ययन पर अधिक ध्यान दें। पहले ही उन के स्कूल में सामाजिक विज्ञान का शिक्षक नहीं है। इस समस्या को बच्चो ने अपनी प्रथानाध्यापिका को बताया लेकिन लगता है इस समस्या का हल उन के पास नहीं है। उन्हों ने एक अन्य विषय के अध्यापक को सामाजिक विज्ञान पढाने के लिए लगाया है लेकिन लगता है वह ठीक से बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहा है। जिस से बच्चों को कष्ट हो रहा है। यह बात प्रधानाध्यापिका को समझनी चाहिए और स्कूल में उपलब्ध ऐसे अध्यापक को सामाजिक विज्ञान पढाने के लिए लगा देना चाहिए जो बच्चों को संतुष्ट कर सके। यदि यह भी संभव नहीं हो तो यह काम खुद प्रधानाध्याप्क को करना चाहिए।

1- राजस्थान में शिक्षकों की बहुत कमी है। सरकार नए शिक्षक भर्ती नहीं रही है। उस के स्थान पर उस ने सैंकड़ों विद्यालयों को बन्द कर के उन्हें समामेलित कर दिया है। इस से बच्चों को दूर दूर स्कूलों में जाना पड़ रहा है। फिर भी समस्या का अन्त नहीं हुआ है। इस से स्पष्ट है कि राज्य का धन बचाने का जो जुगाड़ सरकार ने निकाला था वह ठीक नहीं था। बच्चों के अध्ययन का पैसा बचा कर आप कैसा भारत बनाना चाहते हैं? ऐसा भारत या तो अशिक्षित होगा या फिर अर्ध शिक्षित, न घर का न घाट का।

स समस्या का कानूनी हल यह है कि बच्चे राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को जो कि जोधपुर में बैठते हैं एक पत्र लिख कर स्कूल के अधिक से अधिक बच्चों के हस्ताक्षर करवा कर भेजें और उन से प्रार्थना करें कि वे राज्य सरकार के शिक्षा विभाग को रिट जारी कर यह निर्देश दें कि बच्चों की इस कमी को पूरा किया जाए। यदि स्कूल सरकारी न हो कर प्राइवेट है तो सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। क्यों कि यह सरकार का कर्तव्य है कि उस के राज्य में ऐसा निजी स्कूल संचालित न हो जिस में विषयों को ठीक से पढ़ाने वाले अध्यापक ही न हों।

2- किशोर ने दूसरी समस्या लिखी है कि कोई व्यक्ति अपने नाम से जाना जाएगा या उस की जाति से? हालांकि हमारे संविधान ने अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़ी जातियों को आरक्षण का अधिकार दिया है। लेकिन यह अधिकार उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए दिया है, इस लिए नहीं कि यह उन की पहचान बन जाए। सही बात तो यह है कि किसी भी व्यक्ति को उस की जाति से नहीं पहचाना जाना चाहिए। उसे उस के नाम से ही पहचाना जाना चाहिए। लेकिन यह सब बातें समाज के समक्ष धरी की धरी रह जाती हैं। समाज में एक व्यक्ति अन्ततः अपने काम से पहचाना जाता है। भले ही लोगों को यह पता हो कि गांधी, नेहरू, अम्बेडकर, भगतसिंह आदि की जाति क्या है। लेकिन वे अपनी अपनी जातियों से नहीं अपितु अपने अपने कामों से जाने जाते हैं। इस कारण दीर्घकाल तक लोग केवल उन के काम से पहचाने जाते हैं।

3- अध्यापक का काम बच्चो को शिक्षा प्रदान करना है। उन्हें दंडित करना नहीं। किसी भी स्थिति में किसी भी विद्यार्थी को शारीरिक या आर्धिक रूप से दंडित नहीं किया जाना चाहिए। यदि शिक्षक की उचित बात को बच्चे नहीं मानते हैं तो कमी शिक्षक में है, बच्चो में नहीं। यह शिक्षक का कर्तव्य है कि वह ऐसे तरीकों की खोज करे जिस से बच्चों को उचित शिक्षा प्रदान की जा सके। ऐसे शिक्षक की शिकायत बच्चों को अपने अभिभावकों से करनी चाहिए। अभिभावक इस मामले में स्कूल के प्रधानाध्यापक से और जिला शिक्षाधिकारी से शिकायत कर सकते हैं। यदि समस्या का समाधान फिर भी न हो तो अभिभावक सीधे पुलिस या न्यायालय में परिवाद संस्थित कर सकते हैं।

4- मिनरल वाटर खराब आने की शिकायत भी किशोरों को अपने अभिभावकों से करनी चाहिए। इस मामले में अभिभावक अपने इलाके के खाद्य विभाग के निरीक्षक और अधिकारी को लिखित में शिकायत कर सकते हैं। यह उस का दायित्व है कि वह उचित कार्यवाही करे। यदि वह कार्यवाही नहीं करता है तो जिला कलेक्टर को शिकायत लिखी जा सकती है और मिनरल वाटर खरीदने वाला व्यक्ति उपभोक्ता न्यायालय में भी परिवाद प्रस्तुत कर सकता है।

5-किशोर कोई सिम कार्ड नहीं खरीद सकता। सिम कार्ड अवश्य ही किसी वयस्क ने खरीदा होगा। उस वयस्क को चाहिए कि वह इस की शिकायत पुलिस को करे। किसी व्यक्ति की आई डी से स्वयं कोई सिम खरीद लेना अत्यन्त गंभीर अपराध है। लेकिन शिकायत करने के पहले यह शिकायतकर्ता को चाहिए कि वह जाँच ले कि ऐसी गलत सिम का फोन नं. क्या है?

6-मोबाइल खराब हो जाने पर उपभोक्ता को सीधे सर्विस सेन्टर जाना चाहिए जो मोबाइल बनाने वाली कंपनी का होता है। इस मामले में दुकानदार की कोई जिम्मेदारी नहीं होती। वह मोबाइल को सर्विस सेन्टर नहीं ले जाएगा।

7-एशियन पेंट्स खऱाब निकलने पर दुकानदार से बदल कर नया डब्बा देने का आग्रह करना चाहिए। यदि वह सुनवाई न करे तो दुकानदार और कंपनी के विरुद्ध उपभोक्ता न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

8- आप के दादा जी ने किसी व्यक्ति को थप्पड़ मार दिया था तो उस के परिणाम की चिन्ता भी दादा जी को करनी चाहिए, उन के पोते को नहीं। पोते को सिर्फ उस की पढ़ाई करनी चाहिए। थप्पड़ खाया हुआ व्यक्ति चाहे तो न्यायालय में परिवाद कर सकता है और अपमान के लिए क्षतिपूर्ति चाहने के लिए दीवानी वाद भी कर सकता है। लेकिन पुलिस इस मामले में कार्यवाही नहीं कर सकती। थप्पड़ खाने वाला जाट होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि वह व्यक्ति किसी अनुसूचित जाति या जनजाति का होता तो पुलिस इस मामले में कार्यवाही कर सकती थी। जिस में दादा जी को गिरफ्तार किया जा सकता था। हाँ, आप दादाजी को समझा सकते हैं कि लोगों के साथ मारपीट करने और उन्हें गालियों से नवाजने का जमाना कब का समाप्त हो चुका। अब हर एक को सभ्यता से एक इन्सान की तरह पेश आना चाहिए। समाज में औरों से सभ्यता से पेश आने वालों का ही सम्मान होता है।

अब तक 3 टिप्पणियाँ, आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

consumer protectionसमस्या-

बिपुल ने दरभङ्गा, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मैंने नया चौथी जेनरेशन का लैपटॉप दुकानदार से मांगा लेकिन उसने तीसरी जेनरेशन का लैपटॉप दिया। लैपटॉप खरीदने के पहला सप्ताह में समस्या आने लगी मैंने डेल कंपनी को शिकायत की लेकिन कोई सुनबाई नहीं की। अब मेरा लैपटॉप ऑन नहीं हो रहा है मैं क्या करूँ।|

समाधान-

प ने दुकानदार से क्या मांगा था यह कतई महत्वपूर्ण नहीं है। क्यों कि हो सकता है उस के पास जो आप ने मांगा था वह उपलब्ध न हो। उस ने आप के सामने दूसरा माल बेचने का प्रस्ताव रखा, और आप ने स्वीकार कर लिया। इस तरह उस ने आप को वही माल बेचा है जो आप ने स्वीकार कर लिया है। इस कारण आप की इस शिकायत में कोई दम नहीं है कि आपने जो माल मांगा था वह न दे कर दुकानदार ने कोई दूसरा माल आप को दे दिया है।

प के लैपटॉप में शिकायत आ रही है तो आप को डेल कंपनी में ऑन लाइन कस्टमर केयर को शिकायत करनी चाहिए। आम तौर पर डेल कंपनी अपने उपभोक्ता की परवाह करती है। यदि बेचे हुए माल में कोई शिकायत हो तो उसे दूर कर के अपने उपभोक्ता को संतुष्ट करने का प्रयास करती है। यदि आप की शिकायत का समाधान समय पर न हो तो कंपनी को नोटिस दे कर सूचित करें कि आप की शिकायत दूर न करने पर आप उपभोक्ता मंच के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करेंगे। नोटिस की अवधि व्यतीत हो जाने के बाद भी शिकायत दूर हो तो जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच के समक्ष अपनी शिकायत प्रस्तुत करें।

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

consumer protectionसमस्या-

हसन सिद्दीकी ने मेरठ, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या इन्टरनेट बैंकिंग से जुडी है जो इस प्रकार है कि मैंने यूनिवर्सिटी का ऑनलाइन एग्जाम का आवेदन भरा और इन्टरनेट के माध्यम से ही पेमेंट किया लेकिन सर्वर मेंटिनेंस के कारण वेबसाइट बंद हो गयी और अकाउंट से धनराशि काट ली गयी। लेकिन फॉर्म सब मिट नहीं हुआ उस के बाद मैं ने कंपनी में (जो कंपनी फॉर्म भरा रही है) ईमेल के माध्यम से सूचना कंपनी को उसी दिन प्रेषित कर दी। लेकिन कम्पनी धनराशि वापस नहीं कर रही है क्या इस केस में उपभोक्ता अदालत में अपील की जा सकती है? यदि हाँ तो कृपया उसका पूरा विवरण बताएँ।

समाधान-

प ने आवेदन पत्र  भर दिया था और आप के खाते से शुल्क की राशि काटी जा चुकी थी। इस तरह आप से शुल्क की वसूली की जा चुकी थी। आप अपने बैंक से पता कर सकते हैं कि आप के खाते से काटी गई धनराशि किस खाते में गई है। हो सकता है वह विश्वविद्यालय के खाते में गई हो। वैसे भी शुल्क प्राप्ति हो आवेदन पत्र भराने के लिए संबंधित कंपनी की सेवाएँ विश्वविद्यालय द्वारा प्राप्त की गई थीं। इस कारण आप को सेवा प्रदाता कंपनी के साथ ही विश्वविद्यालय को भी पक्षकार बनाना होगा। मूल रूप से आप का प्रकरण है भी विश्वविद्यालय के विरुद्ध।

च्छा हो आप यह पता कर के कि राशि किस के खाते में गई है। विश्वविद्यालय तथा सेवा प्रदाता कंपनी को तुरन्त एक नोटिस दे दें कि वे आप की राशि वापस कर दें साथ ही आवेदन पत्र निरस्त हो जाने या विश्वविद्यालय तक न पहुँचने से आप को हुई हानि के लिए हर्जाना भी अदा करें। हर्जाने की यह राशि आप की स्थिति के मुताबिक कई हजार से ले कर लाख रुपए से अधिक की भी हो सकती है।

नोटिस से कुछ प्रक्रिया न होने पर आप को जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच के समक्ष अपना परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए। बेहतर होगा कि उपभोक्ता विवाद प्रस्तुत करने के लिए आप किसी स्थानीय वकील की मदद लें।

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

कालेज की सेवा में कमी के लिए उपभोक्ता परिवाद प्रस्तुत करें।

January 12, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

consumer protectionसमस्या-

सौरभ ने प्रतापगढ़, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं ने 2007-08 में भानपुरा एम.एड. कालेज में एम.एड. हेतु प्रवेश लिया था। प्रवेश के समय कालेज ने मुझे एन.सी.आर.टी. से मान्यता प्राप्त होने के प्रमाण दिखाये थे। मैं ने कुल 1 लाख रुपये फीस दी। जिस में से रु. 25000/- की उन्होंने रसीद दी। शेष की कच्ची रसीद मेरे पास है। 2009 में परीक्षा हुई किन्तु आज तक परिणाम नहीं आया। बाद में पता चला उन को विश्वविद्यालय से मान्यता नहीं हुई थी। उन्होने कोर्ट के द्वारा परीक्षा करवाई थी। अब कोर्ट में मामला है। कालेज बनाम वि.वि.। मैं ने 2013 में कालेज को नोटिस भी भेजा किन्तु कोई जवाब नहीं आया। अब मैं कालेज के खिलाफ क्या कानूनी कार्रवाई कर सकता हूँ क्यों कि कालेज ने धोखे में रख कर मेरे 5 वर्ष एवम् 1 लाख रुपये से लूटा है तथा मानसिक रुप से भी में परेशान हुआ हूँ।

समाधान-

प कालेज के उपभोक्ता हैं। आप की परीक्षा का परिणाम का कालेज की कमी से रुका है जिस से आप को असुविधा हुई है। वैसी स्थिति में कालेज को न केवल आप से प्राप्त की गई समस्त शुल्क लौटाना चाहिए बल्कि उस राशि पर ब्याज भी देना चाहिए।

स के अतिरिक्त आप को शारीरिक व मानसिक संताप भी सहन करना पड़ा है और कालेज की कमी के कारण आप का बहुमूल्य समय भी नष्ट हुआ है। इस के लिए भी पर्याप्त क्षतिपूर्ति कालेज को करना चाहिए।

न सब क्षतियों की पूर्ति मूल्य में संभव नहीं है। इस कारण मैं मानता हूँ कि इस मामले में आप को कुल मिला कर कम से कम 20 लाख रुपए क्षतिपूर्ति के रूप में कालेज से मिलना चाहिए। इस राशि में कमी तभी हो सकती है जब कि कालेज किसी तरह आप को एमएड की डिग्री दिलाने में सफल हो जाए।

प को इस के लिए जिला उपभोक्ता प्रतितोष मंच के समक्ष अपना परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

consumer protectionसमस्या-

दिनेश कुमार ने नई दिल्ली के मुनिरका गाँव से समस्या भेजी है कि-


मैं ने 4000 रुपए में 3 महीने में ssc कोर्स कराने वाले प्राइवेट संस्थान में प्रवेश लिया। किन्तु मैं एक सप्ताह तक ही जा सका। आठवें दिन मैंने कारण देकर वहाँ आने से मना कर दिया। पैसे के लिए उन्होंने मुझे 15 दिन का समय दिया। जब गया तो फिर सप्ताह भर के लिए टाल दिया एवं अंत में कह दिया की फ़ीस वापस नहीं दी जाती। मैं ने उसे लीगल नोटिस भी भेजा लेकिन उन्होंने कोई जवाब नही दिया है।  मेरे पास सबूत के लिए प्रवेश स्लिप और फ़ोन की रिकार्डिंग है जिस में उन्होंने कहा है की हम आपके 07 दिन के पैसे काट कर बाकी पैसा वापस लौटा देंगे। मुझे आगे क्या करना चाहिए?


समाधान-

प का मामला पूरी तरह से एक उपभोक्ता मामला है। एक कोर्स में प्रवेश लेने के कारण आप संस्थान के उपभोक्ता हैं। आप ने शुल्क के रूप में सेवाओं की कीमत अदा की है। आप ने बीच में कारण वश सेवाएँ लेने से इन्कार कर दिया। जिस पर उन्हों ने आप को 07 दिन की सेवाओं का मूुल्य काट कर शेष नहीं ली गई सेवाओं का मूल्य वापस लौटाने का आश्वासन दिया। जिस के सबूत के रूप में आप के पास फोन की रिकार्डिंग उपलब्ध है। आप फोन की रिकार्डिंग को फोन में सुरक्षित रखें और उस की एक प्रतिलिपि एक सीडी में कापी करें।

प जिला उपभोक्ता समस्या प्रतितोष मंच के समक्ष अपना परिवाद प्रस्तुत करें। साथ में फीस की रसीद, आपने जो लीगल नोटिस दिया उस की प्रति, डाक की रसीद और प्राप्ति स्वीकृति तथा सीड़ी को अपने दस्तावेजों के रूप में तथा अपना बयान शपथ पत्र के रूप में परिवाद के साथ प्रस्तुत करें। आप परिवाद में न केवल बकाया फीस अपितु न्यायालय खर्च तथा आप को हुई परेशानी के लिए क्षतिपूर्ति की भी मांगा करें। आप को अवश्य राहत प्राप्त होगी।

अब तक 3 टिप्पणियाँ, आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

consumer protectionसमस्या-

चतुरेश कुमार तिवारी ने इन्दौर, मध्य प्रदेश से पूछा है-

मैं इंदौर में एक निजी कंपनी में कार्यरतहूँ। मेरे फ़ोन पर दिनांक 13 अगस्त को दोपहर 2:56 मिनट पर एक अज्ञात कॉल 044-61607475 आया था जिसमें एक महिला ने स्वयं को बैंक प्रतिनिधि बताकरमुझसे मेरे क्रेडिट कार्ड की लिमिट जाननी चाही, जिसे मैंने देने से इंकार कर दिया था। इसके तुरंत बाद मुझे अपने मोबाइल पर 4.64 रुपए के अवैधट्रांज़ेक्शन का संदेश मिला तो मैंने तत्काल बैंक को सूचित कर अपना कार्डब्लॉक करवा दिया और लेनदेन संबंधी विवाद-प्रपत्र भी बैंक को मेल पर उसी दिनभेज दिए। बैंक ने मुझे भरोसा दिलाया था कि मेरे अगस्त माह के स्टेटमेंटमें इन विवादित लेनदेनों को नहीं जोड़ा जाएगा और इनकी जांच की जाएगी। अबबैंक ने 21 अगस्त को मेरे मेल पर जो स्टेटमेंट भेजा में उसमें विवादित 9 लेनदेनों में से 6 लेनदेनों का पैसा जोड़कर मुझे भुगतान करने को कहा है।इतना ही नहीं विवादित लेनदेनों का दिनांक 14 अगस्त दिखाया गया है जबकिमैंने अपना कार्ड 13 अगस्त को ही ब्लॉक करवा दिया था। ऐसे में मुझे क्याकरना चाहिए?

समाधान-

प ने जो सूचना यहाँ दी है उस में 4.64 रुपए से आप का क्या तात्पर्य है? समझ नहीं आया। आप ने जिस समय बैंक को अपना कार्ड ब्लाक करने की सूचना दी वह टेलीफोन पर मौखिक दी या फिर बैंक को एसएमएस किया था या फिर आप ने लिखित में बैंक को सूचना दी थी? यह भी स्पष्ट नहीं है। निश्चित रूप से बैंक ने आप का कार्ड 13 अगस्त को ब्लाक नहीं किया था। अन्यथा बैंक 14 अगस्त में ट्रांजेक्शन नहीं किया था। आप के पास इस बात का सबूत होना चाहिए कि आप ने फर्जी ट्रांजेक्शन को रोकने के लिए अपना कार्ड 13 को ही ब्लाक करवा दिया था। यदि आप के पास ऐसा सबूत है तो आप बैंक के विरुद्ध कार्यवाही कर सकते हैं।

ब भी हम बैंक को इस तरह का कोई आदेश देते हैं तो तुरन्त यह भी पक्का कर लेना चाहिए कि आप के आदेश की पालना तुरन्त कर दी गई है या नहीं। हो सकता है आप के आदेश को प्रोसेस करने में एक दिन का समय लगा हो और तब तक ये ट्रांजेक्शन हो चुके हों।

चूंकि आप खुद कह रहे हैं कि आपने विवाद पत्र 13 अगस्त को भेज दिया था। यदि आप इसे साबित कर सकते हैं तो बैंक को तुरन्त नोटिस दें कि यह ट्रांजेक्शन आप के कार्ड को ब्लाक करने का आदेश देने के उपरान्त हुए हैं, इस कारण इन की जिम्मेदारी आप की नहीं है। बैंक यदि इन की जिम्मेदारी लेने से बचता है तो आप बैंक के विरुद्ध उपभोक्ता न्यायालय के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कीजिए।

अब तक 3 टिप्पणियाँ, आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

बिजली विभाग बिल दुरुस्त न करे तो उपभोक्ता मंच को शिकायत करें।

August 2, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

consumer protectionसमस्या-

पूर्णिया, बिहार से राजीव ने पूछा है-

मैं ने अपना बिजली का बिल उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक में जमा करवाया था, परन्तु बैंक स्टाफ ने मेरे खाते के बदले किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में पैसा स्थानान्तरित कर दिया और रसीद मुझे दी। बाद में बैंक अधिकारी कोकहने पर उस ने टालमटोल करना शुरु कर दिया और बिजली कार्यालय में सम्पर्क करने को कहा। इस बार फिर उन्हों ने पिछला बिल मेरे बिल में जोड़ दिया है। अब बेंक अधिकारी रोज टालमटोल कर रहा है। मुझे क्या करना चाहिए।

 

समाधान-

प ने बैंक में बिल जमा कराया जिस की आप के पास रसीद है। यहाँ बैंक में गलती से आप का पैसा किसी दूसरे के खाते में जमा हो गया। यह गलती बैंक की थी। बिजली विभाग में आप के खाते में बिल बकाया बोल रहा है तो बिजली विभाग ने आप को पिछला बिल ताजा बिल में जोड़ कर भेज दिया। बिजली विभाग उन के यहाँ खाते में बकाया रहते आप की बात सुनने को तैयार नहीं है और बैंक टालमटोल कर रहा है।

प बैंक के उपभोक्ता नहीं हैं। बिजली के बिल जमा करने के मामले में बैंक बिजली विभाग के एजेंट के रूप में काम कर रहा है इस कारण से यदि बैंक से कोई गलती हुई है तो भी उस की जिम्मेदारी बिजली विभाग की है। आप का दायित्व यह था कि आप ने बिजली विभाग को बैंक की रसीद बता दी। अब बिजली विभाग वालों को बैंक से बात कर के मामले को खुद ठीक करना चाहिए।

प बिजली विभाग के उपभोक्ता हैं, आप को तुरन्त बिजली विभाग को नोटिस देना चाहिए कि यदि वे बिल ठीक नहीं करते हैं तो आप उपभोक्ता मंच में शिकायत करेंगे। इस नोटिस की एक प्रतिलिपि बैंक को भी प्रेषित करनी चाहिए। यदि नोटिस की अवधि में आप का बिल दुरुस्त नहीं किया जाता है तो आप को उपभोक्ता मंच में बिजली विभाग और बैंक दोनों के विरुद्ध शिकायत प्रस्तुत कर के बिल दुरुस्त करने तथा आप को हुई परेशानी के लिए हर्जाने व न्यायालय खर्च की मांग करनी चाहिए।

यहाँ क्लिक कर सबसे पहले टिप्पणी कीजिए
Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada