Contract Archive

विक्रय संविदा का पंजीकरण वहाँ होगा जहाँ संपत्ति स्थित है।

July 23, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

partition of propertyसमस्या-

रोहित तिवारी ने फैजाबाद, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मैं फैजाबाद जिले का रहने वाला हूँ और लखनऊ शिफ़्ट होना चाहता हूँ। इस के लियेमैंने लखनऊ में एक जमीन देखी है। लेकिन उसे खरीदने के लिए मेरे पास पूरेपैसे नहीं हैं। विक्रेता मुझे 1 वर्ष का “एग्रीमेन्ट टू सेल” लिखने कोतैयार है।आप से निवेदन है कृपया इस बात के लिये मार्गदर्शन करने की कृपाकरें कि जमीन का “एग्रीमेन्ट टू सेल” किस शहर में रजिस्टर्ड करवाना होगालखनऊ या फैजाबाद में? मैं जमीन का “एग्रीमेन्ट टू सेल” फैजाबाद मेंरजिस्टर्ड करवाना चाहता हूँ। क्या यह सम्भव है कि लखनऊ स्थित जमीन का “एग्रीमेन्ट टू सेल” फैजाबाद रजिस्ट्री दफ्तर में पंजीकृत कराया जाये?

समाधान-

प ने अपनी समस्या में किए जाने वाले एग्रीमेंट का विवरण नहीं दिया है। लेकिन दिए गए विवरण से स्पष्ट होता है कि आप उक्त जमीन को खरीदने का एग्रीमेंट करेंगे और विक्रय मूल्य की राशि का एक हिस्सा अदा कर के जमीन का कब्जा प्राप्त कर लेंगे और उस में आवास का निर्माण करेंगे।

स तरह के एग्रीमेंट को पंजीकृत करवाना आवश्यक नहीं है, लेकिन भविष्य में उस एग्रीमेंट से क्रेता इन्कार न कर दे इस कारण आप उसे पंजीकृत करवाना चाहते हैं। इस एग्रीमेंट में आप विक्रय मूल्य की कुछ राशि क्रेता को देंगे उस की स्वीकृति होगी तथा जमीन का कब्जा निर्माण करने की अनुमति के साथ आप प्राप्त करेंगे जो कि अचल संपत्ति से संबंधित है। ऐसे एग्रीमेंट को केवल वहीं पंजीकृत कराया जा सकता है जहाँ वह अचल संपत्ति स्थित हो। इस तरह आप इस एग्रीमेंट को फैजाबाद में पंजीकृत नहीं करा सकते। इसे आप को लखनऊ में ही पंजीकृत कराना होगा।

समस्या-

यूनुस अन्सारी ने सारंगपुर जिला राजगढ़ से पूछा है-

मैं ने एक मकान १२ साल पहले ख़रीदा था, लेकिन रजिस्ट्री नहीं करवा सका। अब विक्रेताबदल गया है और मकान को वापस लेने के लिए दावा कोर्ट में लगा दिया है, मेराबचाव कैसे होगा?.

समाधान-

प ने जब मकान खरीदा तब खरीद का एग्रीमेंट किसी न किसी रूप में जरूर हुआ होगा तथा आप ने उस की कीमत का भुगतान कर के मकान का कब्जा भी हासिल किया होगा। इस तरह मकान खरीदने की संविदा का आंशिक प्रवर्तन हो चुका है तथा केवल रजिस्ट्री कराना शेष था। लेकिन आप सुस्त रह गए और रजिस्ट्री नहीं कराई। 12 वर्ष हो जाने से रजिस्ट्री कराने के लिए संविदा के विशिष्ट पालन का मुकदमा अब आप नहीं कर सकते क्यों कि उस के लिए निश्चित अवधि व्यतीत हो चुकी है।

ब विक्रेता के वारिसान ने आप के विरुद्ध मुकदमा किया है। इस मुकदमे में आप संपत्ति अन्तरण अधिनियम की धारा-53ए के अन्तर्गत संविदा के आंशिक प्रवर्तन का प्रतिवाद ले सकते हैं। इस धारा में प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति किसी मूल्य के लिए किसी स्थाई संपत्ति के हस्तान्तरण के लिए लिखित संविदा करता है और जिसे संपत्ति का हस्तान्तरण होना है वह उस से संपत्ति का कब्जा प्राप्त कर लेता है तो विक्रेता या उस के अधिकार के अन्तर्गत दावा करने वाला व्यक्ति उस संपत्ति का कब्जा वापस प्राप्त नहीं कर सकता। विक्रेता को यदि उस संविदा के अन्तर्गत विक्रय मूल्य या उस का कोई हिस्सा प्राप्त करना शेष है तो वह केवल मूल्य प्राप्त कर सकता है।

स तरह विक्रेता या उस के अधिकार के अन्तर्गत दावा करने वाले व्यक्ति आप से केवल उस संपत्ति का शेष मूल्य यदि कोई शेष रहा हो तो प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन संपत्ति का कब्जा आप से नहीं ले सकते। आप इसी आधार पर उक्त मुकदमे में अपनी प्रतिरक्षा खड़ी करें।

Jail-inmate-looks-outसमस्या-
सीमा ने गुड़गांव, हरियाणा से पूछा है-

क आदमी से मेरी जमीन के लिए डील हुई। सौदा तय हो गया। उसने बयाने के तौर पर मुझसे 1 लाख 50 हज़ार रुपया कैश लिया। जोकि एक 10 रुपए के स्टाम्प पेपर पर नोटरी से बनवाया गया। उस आदमी ने भी अपने हस्ताक्षर किये और मैंने भी अपने हस्ताक्षर किये। ओरिजनल कॉपी मेरे पास है। उसने अपने पास फोटो कॉपी रख ली। लेकिन ये बयाना उसने मेरे कहने के बावजूद भी तहसीलदार के पास रजिस्टर्ड नहीं करवाया। ठीक 2 महीने बाद रजिस्ट्री का वादा बयाना एग्रीमेंट में किया गया। जब में रजिस्ट्री के लिए पहुंचा तो वो नहीं आया। काफी फोन किये लेकिन जमीन बेचने वाला आदमी फोन नहीं उठाता है। उसके घर पर संपर्क किया गया तो पता चला कि वो उस जमीन को किसी दुसरे आदमी को बेचकर कहीं नामालूम जगह चला गया है। तहसील में से पता किया गया तो वो जमीन बेचीं गयी पायी गयी। उसने मेरे से पहले तो बयाना ले लिया फिर जमीन किसी और को बेच दी। लेकिन प्रूफ के तौर पर मेरे पास सिर्फ एक 10 रुपए का स्टाम्प पेपर एग्रीमेंट है।

क्या मुझे मेरे रुपए कोर्ट से वापिस मिल सकते हैं? क्या उस जमीन को बयाने के आधार पर मुझे बेचा जा सकता है? क्या उस जमीन की रजिस्ट्री मेरे बयाने के आधार पर निरस्त हो सकती है? क्या उस जमीन पर मुझे स्टे मिल सकती है? मुझे क्या कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए, कृपया मेरी समस्या का समाधान करें।

समाधान-

प ने अपनी समस्या तो रख दी है लेकिन तथ्य ठीक से नहीं बताए हैं। इस तरह के मामलों में प्रत्येक व्यवहार की तिथि और स्थान अवश्य बताया जाना चाहिए तभी कोई समाधान ठीक से बताया जा सकता है। हमारे पास रोज ही ऐसी अनेक समस्याएँ आती हैं। लेकिन उन में व्यवहारों कि तिथियाँ और स्थान ठीक से नहीं बताए गए होते हैं, इस कारण उन के समाधान नहीं सुझाए जाते हैं। आप के मामले में भी आप ने बयाना देने, उस का एग्रीमेंट लिखने व नोटेरी से प्रमाणित कराने, आप के तहसील में रजिस्ट्री के लिए जाने और जमीन दूसरे को बेची हुई देखने, तथा उसे बेचने की तारीखें आपने बताई होतीं और यह बताया होता कि बयाना देने के एग्रीमेंट पर आप दोनों के अतिरिक्त गवाहों के हस्ताक्षर हैं या नहीं तो हमें समाधान प्रस्तुत करने में आसानी होती और समाधान शुद्ध होता। समाधान चाहने वाले सभी पाठकों से हमारा आग्रह है कि वे अपनी समस्या में यदि इन आवश्यक तथ्यों को नहीं लिखेंगे तो हम उन की समस्या का समाधान प्रस्तुत करने में असमर्थ रहेंगे।

प ने बयाना दे कर जो एग्रीमेंट कराया है वह जमीन के विक्रय की संविदा है। जिस में वह व्यक्ति आप से जमीन की कीमत का एक हिस्सा प्राप्त कर चुका है। बाद में वह उस का विक्रय पत्र पंजीकृत कराने के स्थान पर गायब हो गया है। आप को पता चला है कि वह जमीन को अन्य व्यक्ति को विक्रय कर चुका है। आप को दूसरे व्यक्ति को जमीन बेचने के विक्रय पत्र की प्रतिलिपि तहसील से प्राप्त करनी चाहिए। आप के साथ छल किया गया है, आप को तुरन्त धारा 420 भा.दं.संहिता में थाने में रिपोर्ट करानी चाहिए, पुलिस थाना रिपोर्ट लिखने और कार्यवाही करने से इन्कार करे तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

प से एग्रीमेंट कर के उस ने आप से रुपया लिया है। बाद में जमीन बेचने से इन्कार कर दिया है। इस तरह वह आप के साथ हुई संविदा का पालन नहीं कर रहा है। दूसरे व्यक्ति को जमीन बेच देने के कारण अब उस संविदा का पालन कर भी नहीं सकता। इस कारण आप को उस के विरुद्ध अपनी राशि व क्षतिपूर्ति प्राप्त करने हेतु संविदा भंग का दीवानी मुकदमा करना चाहिए।

संविदा के विशिष्ट पालन का मुकदमा कर के उस से जमीन की रजिस्ट्री कराने का मुकदमा करने से कोई लाभ नहीं है, उस में जमीन के खरीददार को भी पक्षकार बनाना पड़ेगा तथा उस के नाम हुए पंजीकृत विक्रय पत्र को भी निरस्त कराना पड़ेगा जिस में बहुत अधिक न्यायालय शुल्क देना होगा और मुकदमा भी जटिल हो जाएगा। हमारी राय में पहले आप को अपराधिक मुकदमा करना चाहिए और उस के बाद आप को संविदा भंग का दीवानी मुकदमा करना चाहिए। आप ने जमीन पर कब्जा नहीं लिया है इस कारण से आप को उस मामले में कोई स्टे नहीं मिलेगा। इस मामले में आप को सारे दस्तावेज दिखा कर किसी स्थानीय वकील से सलाह ले कर ही कार्यवाही करना चाहिए।

आप के साथ छल हुआ है, धारा 420 आईपीसी में मुकदमा दर्ज करवाइए।

February 23, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
police stationसमस्या-
महेन्द्र शर्मा ने, भिलाई, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मैंने अपने पड़ोस में रहने वाले से एक जमीन का दुकड़ा ख़रीदा, जो मेरे जन्म से पहले ही हमारे कब्जे में दीखता था अर्थात उस पर बाउंड्री है। पर नक्शा में उनके नाम से दिख रहा था तो मैंने उनसे बात कर के उपरोक्त जमीन हेतु पैसा दिया। इस हेतु मैंने उन्हें पहले चेक दिया था पर बाद में परिवार में विचार कर संयुक्त परिवार के नाम से जमीन की रजिस्ट्री करेंगे निर्णय लिया क्यों कि सारा जमीन संयुक्त नाम से है। इस बात से उन्हें अवगत कराया तो वो राजी हो गए। मेरा उन पर विश्वास है क्योकि मेरे ससुराल पक्ष के तरफ से वो करीबी होते हैं।  अत: संयुक्त रूप से हमने नगदी रकम दिया और इकरारनामा बनवाया। पर पैसा लेने के बाद वो रजिस्ट्री के लिए ना नुकुर करने और विवाद करने लगे। जिस पर मैंने उन्हें क़ानूनी नोटिस भिजवाया कि रजिस्ट्री करवाएँ। उन्होंने ने जवाब में लिखा कि रजिस्ट्री की कोई बात नहीं की गई। जमीन का जो हिस्सा लिखा गया है वो गलत है और पैसा चैक से मिला है। जब कि मैंने पैसा नगदी भी दिया था। जो चेक मैंने पहले दिया था उन्हों ने ने उसे भी कैश करवा लिया था। जो मुझे उनके नोटिस मिलने के बाद जानकारी मिला। जमीन कम ज्यादा लिखने का सवाल ही नहीं होता क्यों कि तहसीलदार के नक़्शे में जो लिखा गया है वही इकरारनामा में लिखा गया है और उस पर पहले से ही बाउंड्री है। हम लोगों को बाद में ज्ञात हुआ कि उपरोक्त जमीन पर पूर्व से ही अदालत में प्रकरण चल रहा है। हमें यह ज्ञात था की उपरोक्त जमीन दो भाइयों की है। जिस मे हमने जिससे जमीन ख़रीदा है उन्होंने इकरारनामा में लिखा है कि मैं अपने हिस्से की जमीन बेच रहा हूँ। मेरा प्रश्न यह है कि उपरोक्त विवाद पर क्या किया जा सकता है? किस अधिनियम के तहत मामला चलाया जा सकता है? क्या वह जमीन मुझे मिल सकता है? और कौन कौन सा मामला उपरोक्त विवाद में हो सकता है। मुझे उपरोक्त जमीन पर दावा करने के क्या अधिकार प्राप्त है?

समाधान-

प ने अपनी गलती से खुद धोखा खाया है। पहले जाँच लेना चाहिए था कि जमीन पर कोई विवाद तो नहीं है। जब आप को जानकारी थी कि जमीन दो व्यक्तियों के नाम से है तो दोनों से इकरारनामा करना चाहिए था। अब इकरारनामे से केवल वही पाबंद है जिस ने वह लिखा है। फिर उस में उस के हिस्से की संपत्ति बेचने की बात है। यदि दूसरे का भी उस में हिस्सा है तो वह उस इकररारनामे से बाध्य नहीं है। आप चैक से पैसा दे चुके थे तब आप को दुबारा सारा पैसा नकद देने के समय उन से चैक वापस लेना चाहिए था। आप तयशुदा राशि से अधिक दे चुके हैं और जमीन का इकरारनामा भी आप के हिस्से का ही है।

प इकरारनामे में लिखे गए जमीन के हिस्से मात्र के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री करवाने के अधिकारी हैं और उस के लिए भी आप को दीवानी अदालत में संविदा के विशिष्ट पालन का मुकदमा करना पड़ेगा। जिस पर जमीन के विक्रय की कीमत पर न्याय शुल्क भी अदा करना होगा।

प के साथ छल हुआ है, जो कि धारा 420 आईपीसी के अन्तर्गत अपराध है, आप उस के लिए पुलिस थाने में रिपोर्ट करवा सकते हैं। यदि पुलिस थाना रिपोर्ट दर्ज करने से इन्कार करे तो आप एसपी को उस की शिकायत दे सकते हैं। उस पर भी काम न बने तो न्यायालय के समक्ष अपना परिवाद दर्ज करवा सकते हैं। इस के लिए आप को स्थानीय वकील से सलाह लेना चाहिए और उस के अनुरूप कदम उठाना चाहिए।

Havel handcuffसमस्या-
मोनिका यादव ने गुड़गाँव, हरियाणा से पूछा है-

मेरे पिता जी की पहली पत्नी का देहांत हो गया था। उस पहली पत्नी से एक लड़का था। जोकि मेरा भाई है। फिर मेरे पिता ने दूसरी शादी कर ली। जो दूसरी पत्नी है वह मेरी माता जी हैं और मेरे भाई की सौतेली माँ हैं। लगभग 8-10 साल पहले मेरे पिता जी ने 160 गज का एक प्लाट खरीदा। बेचने वालों ने इस प्लाट की जी०पी०ए० करवाई। उसके बाद मेरे पिता जी का देहांत हो गया। मेरे भाई ने बालिग़ होने के बाद बेचने वालों से मिलकर अपने नाम रजिस्ट्री करवा ली। इस बात का हमें पता तक नहीं लगा। जिन लोगों ने मेरे पिता जी को जमीन बेचकर जी०पी०ए० करवाई थी। उन्ही लोगों ने मेरे भाई के नाम रजिस्ट्री करवा दी। इसके कुछ साल बाद 2013 में मेरा भाई सभी कागज़ लेकर घर छोड़ कर कहीं भाग गया। अब पता चला कि उसने वह प्लाट किसी को बेच दिया है। पक्की रजिस्ट्री भी करवा दी है। हम मैं उसकी बहन और मां अपना हक़ चाहते हैं। मैं भी उसकी सौतेली बहन हूँ और मां भी उसकी सौतेली मां है।
क्या ये रजिस्ट्री केंसल हो सकती है? क्या हमें हमारा हक़ मिल सकता है? क्या इस जमीन में हमें हमारा हिस्सा मिल सकता है? क्या इस प्लाट पर स्टे हो सकती है?

समाधान-

दि उक्त प्लाट को खरीदने का सौदा आप के पिता के द्वारा किया गया था और खरीदने का इकरारनामा उन के नाम था तो उन की मृत्यु के उपरान्त प्लाट के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री भी बेचने वाले को आप के पिता जी के सभी उत्तराधिकारियों के नाम करवानी चाहिए थी। यदि आप के भाई ने बेचने वाले से मिल कर प्लाट की रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली है तो यह गैर कानूनी भी है और षड़यंत्र पूर्वक किया गया अपराध भी है।

भूखंड के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री बेचने वाले व्यक्ति ने आप के भाई के नाम गलत करवाई है। आप को बेचने वाले को नोटिस देना चाहिए कि वह उस रजिस्ट्री को निरस्त करवा कर आप तीनों के नाम रजिस्ट्री करवाए। यदि वह नोटिस के उत्तर में कुछ नहीं करता है तो आप तुरन्त पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाएँ। पुलिस कार्यवाही न करे तो आप सीधे न्यायालय में अपराधिक शिकायत दर्ज करवा कर न्यायालय से उसे पुलिस को अन्वेषण के लिए भिजवाने का निवेदन करें।

स के अतिरिक्त आप बेचने वाले व्यक्ति के विरुद्ध आप के पिता जी के साथ हुए विक्रय के इकरारनामे के आधार पर आप के पिताजी के तीनों उत्तराधिकारियों के नाम विक्रय पत्र की रजिस्ट्री करवाने के लिए विशिष्ठ पालन का दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकती हैं। इस वाद में उस प्लाट को अन्यत्र बेचने पर अस्थाई निषेधाज्ञा भी प्राप्त कर सकती हैं। इस दीवानी वाद में आप को प्लाट बेचने वाले व्यक्ति को, आप के भाई को और जिसे आप के भाई ने प्लाट बेचा है उसे पक्षकार बनाना होगा।

TELECOM COMPANYसमस्या –
मेरठ, उत्तर प्रदेश से शहजाद हसन ने पूछा है –

मैं रिलायन्स कम्पनी (रिलायन्स इन्फ्रास्ट्रक्चर कम्युनिकेशन लिमिटॅड R.I.C.L)  का डिस्ट्रीब्यूटर हूँ और मेरी फर्म कम्पनी अधिनियम 1956 के अंतर्गत रजिस्टर्ड है जिसका नाम (हसन सिद्दीकी एण्ड कम्पनी) है। मेरा डिस्ट्रीब्यूटर कोड 6123730015 है। मैंने रिलायन्स कम्पनी का कार्य करने के लिये टिन नम्बर भी लिया हे जिस में मैं कम्पनी के सिम कार्ड, ई-रिचार्ज, मोबाईल, पेपर कूपन आदि की रिटेलर को सप्लाई करता हूँ,  जिस से मुझे कम्पनी की शर्तानुसार कुछ कमीशन मिलता है। सिम बिक्री करने का एक टारगेट होता है जिस पर कम्पनी एक निश्चित इन्सेंटिव भी देती है। मैं ने सितम्बर २०१२ और अक्टूबर २०१२ में सिम बिक्री का टारगेट पूरा किया था जिसका इंसेंटिव (incentive ) नवम्बर २०१२ में आना था। परन्तु नवम्बर मे नहीं आया तब मैं ने कम्पनी के कर्मचारी  मि.प्रवीण अरोरा  से पता किया तो उन्हों ने मुझे बताया कि इस महीने किसी का भी पे आउट रिलीज नहीं हुआ है, अगले महीने दिसम्बर में आयेगा। तब मैं ने अगले महीने का इंतजार किया। मगर मैं यह देख्कर चौंक गया कि सभी डिस्ट्रीब्यूटरों  का टारगेट पे आउट रिलीज हो गया है (जिसकी पूरी डिटेल मेरे पास उपलब्ध है) परन्तु मेरा पे आउट रिलीज नही हुआ। तब मेंने मि.प्रवीण अरोरा ra) से पता किया तो उन्हों ने मुझे कुछ नहीं बताया। फिर मेंने मि.प्रवीण अरोरा जी के बॉस मि. राजकुमार यादव जी से बात की तो उन्होने भी 5 से 10 बार फोन और ई मेल करने के बाद भी कोई सही जवाब नहीं दिया और कहा कि तुमने हमारे कहे अनुसार काम नहीं किया इसलिए आप का पे आउट रिलीज नहीं कराया। फिर मैं ने उन से कहा कि मैं आप कि शिकायत आप के ऊपर के अधिकारी से करूंगा तब उन्हों ने कहा कि कुछ नहीं होगा। क्यो कि उनके कहने पर पर ही तेरा पेसा रुकवाया गया है। अगर तू ज्यदा शिकायत करेगा तो हम तुम्हें डिस्ट्रीब्यूटरशिप से डिसमिस कर देंगे और सिक्योरिटी राशि के लिए धक्के खिलायेगे। इस के बाद मैं ने मि. राजकुमार यादव जी के बॉस और मेरठ ऑफिस के क्लस्टर हेड मि. अमित सिंह जी सम्पर्क किया और मैं ने जब उनसे अपने सितम्बर 2012 और अक्टूबर 2012 के पे आउट के बारे में पता किया तो उन्होने कहा कि तुमने हमारे कहे अनुसार काम नहीं किया इसलिए आप का पे आउट मैं ने रूकवाया है और अब वो तुम्हें नहीं मिलेगा। अब मेरी पोस्टिंग मेरठ से दिल्ली हो गयी है। तब मैं ने उनसे कहा कि आप ने मेरे साथ धोखा किया है और मैं आप को इस साल की एन.ओ.सी.  नही दूंगा। तब उन्हों ने कहा कि ऐसी एन.ओ.सी. (NOC) तो हम अपने ऑफिस में तैयार कर लेते हैं। उन्हों ने कहा कि अगर तुम मुझे 10,000 रु. दो तो मे तुम्हारे 44,500 रुपये का दो माह का पे आउट रिलीज करा दूंगा।  मैं ने रिश्वत देने के लिए मना कर दिया तो उन्हों ने यह कह कर फोन काट दिया कि अब आप नये क्लस्टर हेड से मिलो।  फिर मैं ने प्रत्येक आये नये अधिकारी से बात कर ली। मगर कोई अधिकारी सही जानकारी देने को तैयार नहीं और अब धमकी देते हैं कि आप को रिलायन्स का काम करना हो तो करो, नहीं तो काम छोड दो। मैं अपना दो माह का पे आउट 44,500 रुपए कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मैं इस पे आउट को पाने के लिये कौन से कानून या कोर्ट में अपना केस डाल सकता हूँ। मुझे इसके लिए वकील की जरूरत होगी या मैं स्वयं किसी विभाग में इस केस को डाल सकता हूँ? उपभोक्ता तो, उपभोक्ता कोर्ट में केस फाईल कर सकता है मगर डिस्ट्रीब्यूटर और रिटेलर कहाँ केस फाईल कर सकेगा? क्या प्राईवेट टेलीकॉम कम्पनी आर.टी.आई. एक्ट 2005 के अंतर्गत आती है? यदि हाँ तो आर.टी.आई किस पते पर भेजनी होगी?

समाधान-

प को रिलायन्स इन्फ्रास्ट्रक्चर कम्युनिकेशन लिमिटेड ने आप के साथ एक कॉन्ट्रेक्ट कर के अपना डिस्ट्रीब्यूटर नियुक्त किया। जिस में शर्तों के अनुसार आप को माल रिटेलर्स को विक्रय करना था तथा टारगेट पूरा करने पर आप को इन्सेन्टिव मिलना था। अर्थात जो कुछ भी होना था आप के साथ हुए कॉन्ट्रेक्ट की शर्तों के अनुसार होना था। आप ने टारगेट पूरे किए लेकिन कम्पनी ने आप को इन्सेन्टिव नहीं दिया। कंपनी ने कॉन्ट्रेक्ट की शर्तों के अनुसार आप के काम का भुगतान आप को नहीं किया। इस तरह कंपनी ने कॉन्ट्रेक्ट का उल्लंघन किया है।

प ने कंपनी के अधिकारियों से बात की तो उन्हों ने रिश्वत की मांग की। यह बात आप को अच्छी नहीं लगी। लेकिन भारत में बहुत से उद्योगों और व्यापारों ने अपना यह कायदा ही बना लिया है कि किसी लाभ को देने के लिए उस के अधिकारी रिश्वत मांगें। यह बात कंपनी के ऊपर तक के अधिकारियों की जानकारी में होती है इस कारण से आप की सुनवाई कंपनी में होना कठिन है। हो सकता है वे सोचते हों कि इस इन्सेन्टिव के लिए आप को दीवानी मुकदमा करना होगा जिस में 10,000 रुपए तक का खर्चा आ जाएगा इस कारण आप परेशानी से बचने के लिए उन्हें इतनी राशि रिश्वत के रूप में दे देंगे। यह भी हो सकता है कि दूसरे डिस्ट्रीब्यूटरों ने इस तरह की रिश्वत जिसे वे कमीशन कहते हों कंपनी के अधिकारियों को दी हो। इस तरह की रिश्वत का रिवाज ईस्ट इंडिया कंपनी के जमाने से बना हुआ है. नया नहीं है। आजाद भारत में भी कंपनियाँ और इस के अफसर इस का उपयोग करते हैं।

प को चाहिए कि आप एक कानूनी नोटिस कंपनी को किसी वकील के माध्यम से भिजवाएँ जिस में आप उक्त दो माह की इन्सेन्टिव की राशि और उस का अदायगी तक का ब्याज व हर्जाने की मांग करें। यदि नोटिस की अवधि निकल जाने तक भुगतान न हो तो आप कंपनी के विरुद्ध दीवानी वाद सक्षम क्षेत्राधिकार के दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत करें यही आप के लिए एक मात्र मार्ग है।

प को इस काम में वकील की मदद लेनी पड़ेगी, आप स्वयं यह काम नहीं कर पाएंगे। आप उपभोक्ता नहीं है इस कारण से आप उपभोक्ता न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत नहीं कर सकते। कॉन्ट्रेक्ट के मामलों के लिए दीवानी अदालत ही एक मात्र अदालत है, कोई विशेष अदालत इस के लिए नहीं बनी है।  निजि कंपनियों पर आर.टी.आई. अधिनियम प्रभावी नहीं होता इस कारण से इस मामले में आप आर.टी.आई. का उपयोग नहीं कर सकते।

कापीराइट के उल्लंघन को रोकने के लिए क्या करें?

August 13, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
graphic designसमस्या-

रायपुर, छत्तीसगढ़ से रहीम खान ने पूछा है –

मैं ग्राफिक्स डिजाईन का कार्य करता हूँ। जो भी ग्राफिक्स डिजाईन बनाता हूँ। उसकी कॉपी हो जाती है। मैं कैसे कॉपीराईट कानून का इस्तेमाल करूं। और मेरे फर्म के बनाये हुए कलात्मक कलाकृतियों को सुरक्षा प्रदान करूं?

समाधान-

ग्राफिक डिजायन भी एक कलात्मक कृति है और जो जिस कृति को जन्म देता है उसी के पास उस का कापीराइट होता है। बिना उस की अनुमति के कोई भी उस कृति का उपयोग नहीं कर सकता। कापीराइट के लिए यह आवश्यक नहीं कि आप अपनी कृति को पंजीकृत करायें ही। हालाँकि किसी डिजाइन के कापीराइट के पंजीयन की सुविधा भी उपलब्ध है।

प ग्राफिक डिजाइन का कार्य किस तरह करते हैं? यह आप ने स्प्ष्ट नहीं किया है। ग्राफिक डिजाइन का कार्य या तो आप किसी के लिए संविदा पर करते हैं, या फिर किसी के नियोजन में करते हैं, या फिर स्वतंत्र रूप से अपने लिए करते हैं। यदि संविदा में यह स्पष्ट नहीं है कि डिजाइन पर कापीराइट किस का रहेगा तो उस डिजाइन का कापीराइट डिजाइन बनाने वाले का रहता है। जब आप किसी से भी डिजाइन बनाने के लिए संविदा करते हैं तो वह भी दो तरह की हो सकती है। एक संविदा में आप के ग्राहक को केवल किसी एक काम के लिए उस डिजाइन का उपयोग करने की छूट देते हैं। लेकिन बाद में उसे वह डिजाइन पसंद आ जाता है और वह अपने अन्य कामों में भी उस डिजाइन का करना चाहता है तो वह आप की अनुमति के बिना ऐसा नहीं कर सकता। ऐसी संविदा में कापीराइट आप के पास ही रहता है, लेकिन उस डिजाइन के केवल विशिष्ट उपयोग की आप उसे अनुमति देते हैं। दूसरे आप अपने ग्राहक को संपूर्ण उपयोग की छूट देते हैं तो वह उस का कोई भी उपयोग कर सकता है लेकिन फिर भी कापीराइट आप के पास रहता है। एक तीसरी संविदा ऐसी भी हो सकती है जिस में आप ग्राहक को उस का कापीराइट भी दे दें।

दि आप किसी के कर्मचारी के रूप में वेतन पर काम करते हुए डिजाइन बनाते हैं तो उस पर कापीराइट नियोजक का होता है।

किसी व्यक्ति द्वारा विशेष रूप से किया गया डिजाइन का कार्य अनेक प्रकार का हो सकता है जैसे-

  1. एक बड़े काम के लिए किया गया कोई हिस्सा, जैसे किसी अखबार या पत्रिका के लिए किया गया कार्य।
  2. किसी फिल्म या दृश्य-श्रव्य कार्यक्रम के लिए किए गए कार्य का एक हिस्सा।
  3. किसी किए गए कार्य का संपादन।
  4. किसी किए गए कार्य का अनुवाद।
  5. पूरक कार्य, जैसे किसी पुस्तक के लिए बनाए गए ग्राफ।
  6. किसी मानचित्र के लिए बनाए गए ग्राफिक्स, आदि।

स तरह के कामों को यदि आप वेतन ले कर करते हैं या काम में अपनी हिस्सेदारी का ठेका लेकर करते हैं तो उन पर कापीराइट आप का नहीं होगा। लेकिन यदि आप कार्य करने की संविदा में स्प्ष्ट करते हैं कि आप के द्वारा किए गए कार्य का कापीराइट आप के पास रहेगा तो उस पर कापीराइट आप का होगा।

स तरह ग्राफिक डिजाइन के कार्य के लिए आप जब भी संविदा करते हैं तो आप को उस संविदा को किसी वकील को अवश्य दिखा लेना चाहिए जिस से आप कापीराइट की रक्षा कर सकें।

किसी भी डिजाइन पर कापीराइट आप का है और उस का कोई अनधिकृत व्यक्ति उपयोग करता है या उस में संशोधन कर के नकल करता है तो वह व्यक्ति आप के कापीराइट का उल्लंघन करता है। यह उल्लंघन कापीराइट अधिनियम की धारा 63 के अन्तर्गत अजमानतीय अपराध है। आप इस के लिए प्रथम सूचना रिपोर्ट पुलिस थाना में दर्ज करवा सकते हैं। यदि अन्वेषण में पाया गया कि कापीराइट का उल्लंघन किया गया है तो पुलिस अभियुक्तों को गिरफ्तार कर के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगी। उसे छह माह से तीन वर्ष तक के कारावास के साथ पचास हजार से दो लाख रुपयों तक का जुर्माने के दंड से दंडित किया जा सकता है।

दि कोई व्यक्ति आप द्वारा निर्मित डिजाइन का उपयोग कर के या उसे संशोधित कर उपयोग कर के आप के कापीराइट का उल्लंघन कर रहा है तो आप उस व्यक्ति द्वारा उस डिजाइन के उपयोग करने से रोकने के लिए दीवानी न्यायालय से निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते है तथा उस के द्वारा किए गए उपयोग के लिए क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिए वाद भी कर सकते हैं।

समस्या-

मेरठ, उत्तर प्रदेश से युवराज ने पूछा है-

म एक घर में पिछले 30 साल से रह रहे हैं और जिसका मुख़्तार नामा और विक्रय पत्र हमारे पिता जी के नाम है।  विक्रेता ने संपत्ति को विक्रय कर दिया था और पिताजी ने उस संपत्ति का संपूर्ण विक्रय मूल्य अदा कर के संपत्ति पर कब्जा प्राप्त कर लिया था। एग्रीमेंट में सम्पूर्ण संपत्ति का अधिकार हर प्रकार से पिता जी को दिए जाने की बात अंकित है लेकिन पिता जी ने उसकी रजिस्ट्री नहीं कराई थी। तीन महीने पहले पिता जी की मृत्यु हो गई है, मूल विक्रेता की भी मृत्यु हो चुकी है। ऐसी स्थिति में हम किस प्रकार रजिस्ट्री अपने नाम कर सकते हैं या इस के लिए मुझे क्या करना होगा?

समाधान-

hotelकोई भी अपंजीकृत विक्रय पत्र जिस में विक्रय की गई अचल संपत्ति का मूल्य 100 रुपए से अधिक का है मान्य नहीं है। इस कारण विक्रयपत्र का पंजीकृत होना आवश्यक है।  आप ने जिसे विक्रय पत्र कहा है वह विक्रय का इकरारनामा है जिस में विक्रय का संपूर्ण मूल्य प्राप्त कर के विक्रेता ने संपत्ति का कब्जा क्रेता को दे दिया है। क्यों कि संपत्ति का मूल्य दिया जा चुका है और कब्जा भी हस्तांतरित हो चुका है वैसी अवस्था में यदि कोई उस संपत्ति पर से आप का कब्जा हटाने का प्रयत्न करता है या कब्जे के लिए दावा करता है तो आप के पास संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम की धारा 53-ए के अंतर्गत यह प्रतिरक्षा ले सकते हैं कि आप विक्रय मूल्य अदा कर चुके हैं। आप के विरुद्ध उक्त संम्पत्ति का कब्जे का कोई भी दावा निरस्त हो जाएगा। लेकिन बिना विक्रय पत्र के पंजीकरण के आप उक्त संपत्ति के स्वामी नहीं कहलाएंगे और किसी भी सरकारी रिकार्ड में संपत्ति पर आप का स्वामित्व स्थापित नहीं माना जाएगा।

प ने यह नहीं बताया कि उक्त विक्रय संविदा के अंतर्गत विक्रय पत्र का पंजीकरण कराने के लिए क्या शर्त अंकित की गई थी। यदि उस में यह अंकित था कि जब भी क्रेता तैयार होगा तभी विक्रेता विक्रय पत्र का पंजीयन करवा देगा तो आप के पास अब भी उपाय मौजूद है। जो विक्रेता की जिम्मेदारी थी वही उस के उत्तराधिकारियों की जिम्मेदारी है और जो क्रेता का अधिकार है वही क्रेता के उत्तराधिकारियों का अधिकार है। इस कारण आप अपने पिता के सभी उत्तराधिकारियों की ओर से किसी वकील के माध्यम से एक विधिक नोटिस विक्रेता के उत्तराधिकारियों को भिजवाएँ कि वे उक्त संपत्ति का विक्रय पत्र आप के पिता के उत्तराधिकारियों के पक्ष में निष्पादित कर के उस का पंजीयन कराएँ। नोटिस में इस के लिए एक माह तक का समय दिया जा सकता है। यदि इस नोटिस के उपरान्त भी विक्रेता के उत्तराधिकारी विक्रय पत्र निष्पादित कर उस का पंजीयन नहीं कराते हैं तो आप विक्रेता के उत्तराधिकारियों के विरुद्ध दीवानी न्यायालय में विक्य पत्र का निष्पादन कर उस का पंजीयन कराने के लिए संविदा के विशिष्ट पालन के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

समस्या-

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश से विभा पूछती हैं –

19 जनवरी को रेल किराया बढ़ने के पूर्व मैंने अपना टिकट बुक कराया था।  9 फ़रवरी को रेल यात्रा के दौरान रास्ते में मुझसे टिकट निरीक्षक द्वारा बढ़ा हुआ किराया वसूला गया।  मेरी समस्या यह है कि मैंने अपना टिकट आई आरसीटीसी की वेबसाईट से प्राप्त किया था।  फिर भी रेलवे द्वारा या आईआरसीटीसी द्वारा मुझको न तो मेरे मोबाइल फोन पर न ही मेरे ई-मेल पर बढ़े हुए किराये की धनराशि के सम्बन्ध में कोई सूचना दी गई।  यहाँ तक कि इस सम्बन्ध में किसी भी प्रकार की कोई व्यक्तिगत सूचना भी नहीं दी गई।  जिससे मुझे परेशानी का सामना करना पड़ा।  इस सम्बन्ध में मुझे क्या करना चाहिए।  क्या मैं उपभोक्ता फोरम से कोई अनुतोष प्राप्त कर सकती हूँ?

समाधान-

TCब भी कोई व्यक्ति किसी वाहन में यात्रा के लिए टिकट खरीदता है तो टिकट की यह खरीद एक संविदा होती है।  इस तरह की संविदा में ट्रांसपोर्टर टिकट का मूल्य प्राप्त कर के यह वायदा करता है कि वह नियत तिथि को, नियत समय पर चलने वाले नियत वाहन से उसे यात्रा की सुविधा प्रदान करेगा।  आप ने जब टिकट खरीदा तो रेल्वे ने आप से ऐसा ही वायदा किया था।  अब इस संविदा को केवल दोनों पक्षों की सहमति से ही बदला या संशोधित किया जा सकता है। लेकिन रेलवे बोर्ड ने इस बीच टिकट का मूल्य बढ़ा दिया। मूल्य बढ़ाने की तिथि के बाद से जो टिकट बेचे गए उन पर तो बढ़ा हुए किराए पर ही दोनों पक्षों के बीच संविदा हुई है इस कारण से वह तो उचित था लेकिन जिन लोगों ने पहले ही टिकट खरीद लिया था उन से यात्रा के समय टिकट का मूल्य वसूलना एक तरह से पूर्व में हुई संविदा को इकतरफा रीति से बदला गया जो संविदा विधि के अंतर्गत उचित नहीं था और इस तरह पूर्व में बेचे गए टिकटों पर बढ़ा हुआ मूल्य वसूलना पूरी तरह से गलत था।

केवल कानून को बदल कर ही इस तरह संविदा को बदला जा सकता था।  लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कानून में ऐसा संशोधन किया गया था कि रेलवे द्वारा किराया बढ़ाने से पूर्व में बेचे गए टिकटों पर भी बढ़ा हुआ किराया वसूल कर सकती है। क्यों कि कानून केवल संसद में विधेयक पारित कर के या फिर सरकार द्वारा राष्ट्रपति के अनुमोदन से ही किया जा सकता है।  हमारे ज्ञान में ऐसा कोई कदम सरकार द्वारा नहीं उठाया गया। एक और स्थिति में बढ़ा हुआ किराया पूर्व में बेचे गए टिकटों पर वसूल किया जा सकता था कि पहले से ही रेलवे के कानून में यह प्रावधान हो कि पूर्व में बेचे गए टिकटों पर रेलवे चाहे तो यात्रा के समय बढ़ा हुआ किराया वसूल कर सकती है।  लेकिन ऐसे किसी कानून की जानकारी भी नहीं हो सकी है।

स तरह मेरी राय में यात्री को व्यक्तिगत सूचना देने की बात तो दूर रही इस तरह की सूचना दे कर भी पूर्व में विक्रय किए गए टिकट पर बढ़ा हुआ किराया वसूल करना गलत था। मैं ने भी किराया बढ़ने के पहले टिकट खरीदा था और किराया बढ़ने के उपरान्त यात्रा की थी किन्तु मुझ से बढ़ा हुआ किराया वसूल करने के लिए कोई भी प्रकट नहीं हुआ। यदि ऐसा मेरे साथ होता तो मैं अवश्य ही उपभोक्ता न्यायालय के समक्ष अपना परिवाद प्रस्तुत करता। चूंकि यह मामला मात्र कुछ सौ रुपयों का हो सकता है।  इस कारण से इस में मिलने वाली राहत की कीमत भी बहुत कम हो सकती है तथा इस के लिए उपभोक्ता अदालत में शिकायत दर्ज करवाना और फिर उस की पैरवी करना या करवाना। उस के बाद रेलवे अपील कर दे तो उस अपील को लड़ने का कष्ट और खर्च बहुत अधिक हो सकता है। लेकिन अकादमिक नीयत से ऐसा मुकदमा लड़ा जाना चाहिए जिस से यह साबित किया जा सके कि रेलवे द्वारा पूर्व में बेचे गए टिकट पर बढ़ा हुआ किराया वसूल करना अनुचित तो था ही गैर कानूनी भी था।  यदि आप मुकदमा लड़ने में परेशानी महसूस न करें तो ऐसी शिकायत उपभोक्ता प्रतितोष मंच के समक्ष अवश्य उठायें जिस से सरकार दुबारा कोई मनमानी न कर सके।

समस्या-

गाजियाबाद, उत्‍तर प्रदेश से राकेश सूरी ने पूछा है –

कृपया पारिवारिक समझौते (Family Settlement)  के बारे में बतायें और इसका एक ड्राफट/सेम्पल भी बताएँ कि कैसे यह कैसे बनाया जाता है? मैं आपको अपने केस के बारे में बताता हूँ।  मेरे दो बड़े भाई हैं, और मेरे पिता जी की मृत्यु हुये 7 साल से ज्यादा का समय हो चुका है।  मेरी माताजी के जी0डी0ए0 जनता के दो फलेटस् हैं।  वे एक मकान अपने ही बेटों को कम कीमत पर सेल कर रही है और बड़े भाई के नाम रजिस्‍ट्री करवा रही है।  वह ऐसा बड़े बेटे के कहने पर कर रही हैं ताकि उससे जो पैसे मिलेंगे वह उन्हें दूसरे बड़े भाई को देगीं। यह दोनों भाईयों की आपसी सहमति से हो रहा है।  ताकि माता जी के निधन के बाद सपंति विवाद पैदा न हो और मेरी माता जी को भी इसमें कोई परेशानी नहीं है।  लेकिन मेरा यह प्रश्न है कि जो एक मकान बच गया है जिस में मैं और मेरी माता जी रहती हैं।   माता जी और दोनो बडे भाई कहते है जो मकान बच गया है वह तेरा है हम उस मकान मे हम कोई हिस्सा नहीं लेगें।  लेकिन कुछ लोगों से मैं ने बात की तो  वे कह रहे हैं कि आप अभी पारिवारिक समझौता करवा लो।  क्यों कि बाद में भाईयों में मतभेद हो सकते हैं।  जिसके कारण दूसरे बचे हुये मकान पर सपत्ति विवाद पैदा हो सकते हैं।  क्यों कि माता जी बड़े भाई को मकान बेच रही है और उसके पैसे दूसरे बड़े भाई को दे रही है जो कि क्रय-विक्रय होगा।  जिससे यह साबित नहीं किया जा सकता कि सपत्ति को दोनों भाइयों में बाँटा गया हैं। इसलिए आपसे अनुरोध है कि मुझे सही सलाह दें।

समाधान-

Giftगता है कि जो भाई अपने नाम उस मकान को हस्तान्तरित करवाना चाहता है वह उस मकान को खरीदने के लिए गृहऋण भी किसी संस्था से प्राप्त करना चाहता है जिसे वह अपने दूसरे भाई को दे सके। अन्यथा मकान को माता जी एक वसीयत के माध्यम से भी एक बेटे को दे सकती हैं। लेकिन इस तरह मकान उन के जीवनकाल में माताजी के नाम रहेगा और उस पर ऋण प्राप्त नहीं किया जा सकेगा। इस कारण से रजिस्ट्री में होने वाला व्यय बचाने के बजाय खर्च किया जा रहा है।

दोनों मकान आप की माता जी के स्वामित्व के हैं। एक मकान वे बेच देंगी तो बचे हुए मकान पर माताजी के जीवनकाल के उपरान्त तीनों भाइयों का समान अधिकार होगा। इस कारण से आप को लोगों ने जो सलाह दी है वह उचित दी है। लेकिन आप के मामले में पारिवारिक समझौते की कोई स्थिति नहीं है। यह तब संभव होता है जब संबंधित संपत्ति या संपत्तियोँ में समझौते के सभी पक्षकारों का वर्तमान में अधिकार हो। आप की स्थिति में पारिवारिक समझौते को एक तरह का संपत्ति हस्तान्तरण माना जाएगा और उस पर पूरी स्टाम्प ड्यूटी देनी होगी। उस से अच्छा तो ये है कि दूसरे मकान का विक्रय पत्र के स्थान पर उस के दानपत्र की रजिस्ट्री भी आप के नाम साथ के साथ करवा दी जाए। हाँ उस में यह अवश्य लिखा जाए कि जीवन काल में मकान में निवास का अधिकार माता जी को होगा और पूरे जीवनकाल में आप उन की भरण-पोषण और सेवा सुश्रुषा करेंगे।

माताजी एक मकान को जैसे चाहें वैसे एक बेटे को बेच कर दूसरे को उस का विक्रय मूल्य प्राप्त कर दे सकती हैं। लेकिन यदि सभी कह रहे हैं कि दूसरा मकान केवल आप का होगा। तो आप की माता जी उसे आप के नाम वसीयत कर सकती हैं, जिस में शेष दोनों भाइयों के भी हस्ताक्षर करवा लिए जाएँ और वसीयत को उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत करवा दिया जाए। इस से यह होगा कि मकान पर माताजी के जीवनकाल में उन का स्वामित्व बना रहेगा और उन के जीवनकाल के उपरान्त वसीयत के कारण आप का हो जाएगा। इस व्यवस्था में एक ही परेशानी है कि माता जी चाहें तो अपने जीवनकाल में इस वसीयत को बदल भी सकती हैं।

स की सम्भावना को समाप्त करने के लिए आप चारों सदस्य मिल कर आप के यहाँ एग्रीमेंट के लिए निर्धारित आवश्यक मूल्य के स्टाम्प पेपर पर एक एमओयू (मेमोरेण्डम ऑफ अण्डरस्टेण्डिंग) हस्ताक्षर करें जिस में यह लिखा जाए कि उन के दो मकान हैं जिसे माता जी ने आधी कीमत पर एक पुत्र को विक्रय कर के उस विक्रय से प्राप्त पैसा दूसरे पुत्र को दे दिया है। दूसरा मकान जिस में वे आप के साथ रहती हैं उस की वसीयत लिख दी है जो उन के जीवनकाल के उपरान्त आप का हो जाएगा। इस एमओयू पर साक्षियों के हस्ताक्षर करवा कर नोटेरी के यहाँ पंजीकृत करवाया जा सकता है। इस प्रकार आप को दान-पत्र के लिए आवश्यक स्टाम्प शुल्क नहीं देना होगा।

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