Criminal Procedure Code Archive

अभियुक्त को फरार घोषित कराएँ।

August 16, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

दशरथ वर्मा ने उज्जैन, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

न्यायालय में चैक बाउंस का धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनयम का परिवाद प्रस्तुत किया था जिस पर प्रसंज्ञान लिए जाने पर अभियुक्त के विरुद्ध समन जारी हुए हैं। लेकिन अभियुक्त उस के दिए पते से मकान खाली कर अन्यत्र चला गया है इस लिए उसे समन की तामील नहीं हो रही है। क्या किया जाए?

समाधान-

किसी भी अपराधिक प्रकरण में अभियोजक (मुकदमा चलाने वाले) की यह जिम्मेदारी है कि वह अभियुक्त का पता ठिकाना मालूम करे और उसे किसी भी तरह न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कराए। अपराधिक मामलों में अभियुक्त की अनुपस्थिति (यदि अभियुक्त की स्वयं की प्रार्थना पर अदालत द्वारा उपस्थिति से कोई मुक्ति प्रदान न कर दी गयी हो) में कोई कार्यवाही हो सकना संभव नहीं है।

इस के लिए अभियोजक न्यायालय से पुलिस के नाम समन, गिरफ्तारी या जमानती वारंट जारी करवा सकता है। जिन मामलों में स्वयं सरकार अभियोजक होती है उन में भी यही प्रक्रिया है। इस मामले में अभियोजक भी आप ही हैं तो अभियुक्त का पता तो आप को ज्ञात करना होगा और न्यायालय को दे कर उस पते के लिए समन या वारंट जारी कराना होगा। अदालत यह कर सकती है कि जारी समन या वारंट को आप को वह दस्ती देने का आदेश दे दे जिस से आप खुद उसे ले जा कर पुलिस को साथ ले कर निशादेही से तामील करवा सकें।

यदि फिर भी अभियुक्त नहीं मिलता है और जानबूझ कर छुपा रहता है तो आप न्यायालय को धारा 82 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत फरार घोषित करने की उद्घोषणा के लिए आवेदन कर सकते हैं। जिस के अंतर्गत अभियुक्त की संपत्ति को कुर्क किया जा सकता है। अभियुक्त का ऐसी स्थिति में मिलना आप की कोशिश पर ही निर्भर करता है। पुलिस और अदालत आप की मदद कर सकते हैं लेकिन अभियुक्त को तो आप को तलाश करना ही होगा अन्यथा आप का यह मुकदमा करना बेकार हो जाएगा।

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समस्या-

विजय ने बस्ती, बस्ती से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

कुछ दिन पहले मैने मॅट्रिमोनियल वेबसाइट से किसी लड़की से शादी करने का प्रस्ताव रखा और वह मान गये। फिर हम लड़की को देखने उनके घर गोंडा उत्तर प्रदेश गये, हमने लड़की पसंद की। फिर मैं लड़की से कभी कभी फोन पर बात भी कर लेता था और फिर थोड़े दिन बाद हमारी एंगेज्मेंट का कार्यक्रम रखा गया और हमारी एंगेज्मेंट हो गई और फिर उसी दिन मैं ने घर पहुँचकर लड़की के घरवालों से शादी करने से मना कर दिया। पहले तो वो मान ही नहीं रहे थे फिर मैंने उन्हें समझाया और वो इस बात पर मान गए कि हमारा जो खर्चा हुआ है आप उतने पैसे हमें दे दो। यही पर बात ख़तम हो गई और फिर हमने उन्हें पैसे दे दिए। उनके अकाउंट में ट्रान्स्फर कर दिए। फिर आज मुझे लड़की के भाई का व्हाट्स अप पर मेसेज आया लड़के ने लिखा कि मैं तुम पर केस करने लगा हूँ तुम्हारी ज़िंदगी खराब कर दूँगा और भी उसने मेरे लिए बहुत अभद्र भाषा का प्रयोग किया।  मैं ने लड़की से शादी करने से इसलिए मना कर दिया क्यों कि मुझे ऐसा लगा कि मैं इस लड़की के साथ खुश नहीं रहूँगा और ना ही मैं इस लड़की को खुश रख पाऊंगा। मैंने सोचा कि मैं अभी मना कर दूँ तो अपनी और किसी अन्य की ज़िंदगी कराब करने से अच्छा होगा। अब आप मुझे यह बताइये कि अब मैं क्या करूं? क्या लड़का मुझ पर सच में केस करेगा अगर वह मुझ पर केस कर देता है तो फिर मैं क्या करूंगा।

 

समाधान-

प ने बहुत समझदारी का काम किया है कि संबंध को तोड़ लिया और दो जीवन खराब होने से बचा लिए।  आप की सगाई हो चुकी थी जो एक तरह से इस बात का अनुबंध होता है कि दोनों शीघ्र विवाह करेंगे। लेकिन आपने सगाई के तुरन्त बाद उस अनुबंध को तोड़ने का प्रस्ताव किया जिसे खर्चे के रुपये ले कर विपक्ष ने सहमति दे दी। इस कारण यह अनुबंध आपसी सहमति से समाप्त हो गया। इस मामले में किसी तरह का कोई विवाद ही शेष नहीं रहा। इस कारण कोई वैध मुकदमा लड़की का भाई या खुद लड़की या अन्य कोई परिजन नहीं कर सकता, यदि करेगा तो वह निरस्त हो जाएगा। लेकिन यदि कोर्ट से आप को समन मिलते हैं तो आप को उस मुकदमे में अपना बचाव तो करना होगा। यदि ऐसा होता है तो बेहतर वकील करें और अपना प्रतिवाद करें।

उस लड़के ने जो गाली गलौज और धमकी आप को व्हाट्स-एप्प मैसेज से भेजी है। वह भारतीय दंड संहिता और सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम के अन्तर्गत अपराध है। आप इस मैंसेज को डिलिट न करें। आप चाहें तो इस संबंध में आप पुलिस को रिपोर्ट दर्ज करवा सकते हैं, यदि पुलिस रिपोर्ट दर्ज न करे या कार्यवाही  न करे तो एस पी को सूचना करें उस की रसीद अपने पास रखें और फिर न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

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जारता का आरोप तभी लगाएँ जब आप उसे साबित कर सकते हों।

June 27, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

श्रीमती कृष्णा नाथ ने जगदलपुर, जिला बस्तर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 21 जून 2010 को मध्यप्रदेश के बीनागज जिला गुना के रहने वाले प्रदीप नाथ से हुई थी और मेरी 5 साल की बेटी है। मेरे पति ने मेरा विश्वास तोड़ा है किसी और लड़की के साथ उनका रिलेशनशिप है। मुझे वो खर्चा पानी भी नहीं देते, वो कुछ काम नहीं करते हैं। अगर मैं उन पे भरण पोषण के लिए केस करूँ तो मुझे कितने पैसे मिलेंगे? मैं ये भी बता दू मैं मेरे पति से बड़ी हूँ, इससे मेरे केस में परेशानी होगी क्या? मुझे मेरी बेटी को पालने में परेशानी हो रही इसलिए मुझे कुछ मागदर्शन देने की कृपा करें।

समाधान-

प अपने पति पर जारता और उपेक्षा का आरोप लगा रही हैं। यदिआप यह आरोप अपने आवेदन में भी लगाती हैं तो आप को यह आरोप साबित करना होगा। यदि आप यह आरोप साबित नहीं कर पाती हैं तो आप के पति भविष्प में मिथ्या आरोप लगा कर बदनाम करने की क्रूरता करने का आधार बना कर आप के विरुद्ध विवाह विच्छेद का मुकदमा कर सकते हैं और जीत भी सकते हैं।

आप के पति कुछ नहीं कमाते। इस कारण यह नहीं कहा जा सकता कि आप को मुकदमा कर देने पर कितनी भरण पोषण राशि प्राप्त हो सकती है। लेकिन कानून बहुत स्पष्ट है यदि किसी व्यक्ति ने विवाह किया है और उस विवाह से किसी संतान का जन्म भी हो चुका है तो पति यह नहीं कह सकता कि उस की कमाई कुछ भी नहीं है। यदि उस ने विवाह किया है और संतान को जन्म दिया है तो उसे भरण पोषण की राशि तो देनी होगी। यह राशि आप दोनों के परिवारों के जीवन यापन के स्तर से तय होगा।

आप भघरण पोषण का मुकदमा जहाँ आप निवास कर रही हैं वहाँ के न्यायालय में धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत प्रस्तुत कर सकती हैं।

 

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समस्या-

अनिल कुमार ने नागदा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैंने एक इंदौर के दुकानदार को ऑनलाइन पेमेंट किया, फिंगर प्रिंट डिवाइस के लिए रू=२३००/-। लेकिन उस दुकानदार ने वो सामान मुझे नहीं भेजा और लगभग 1 माह बीत जाने के बाद उसने मुझे उतनी ही राशी का एक चेक दिया, /जो की बाउंस हो गया और मेरे खाते से लगभग २०० रू कटे  बैक चार्ज के रूप में। अब मैं उस दुकानदार पर क्या कार्यवाही कर सकता हूँ?

समाधान-

दि चैक बाउंस हुए 30 दिन नहीं हुए हैं तो चैक बाउंस होने की तिथि से 30 दिनों में एक नोटिस दुकानदार को रजिस्टर्ड एडी डाक से भेजें कि वह नोटिस मिलने से 15 दिन में चैक की रकम, बैंक द्वारा काटे गए चार्ज और हर्जाने की राशि ( जो भी आप खुद तय करें) सहित नकद आप को भुगतान कर के रसीद प्राप्त कर ले अन्यथा आप धारा 138 परक्राम्य अधिनियम में परिवाद दाखिल करेंगे। यदि चैक बाउंस होने की सूचना मिले 30 दिन से अधिक हो गए हों और चैक पर दर्ज तारीख को तीन माह न हुए हों तो चैक को दुबारा बैंक में प्रस्तुत करें। यदि फिर भी चैक बाउंस हो जाए तो यही सब करें।

यदि वह यह राशि दे दे तो ठीक वर्ना  नोटिस देने के 45 दिनों के भीतर अपना परिवाद न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर दें। इस परिवाद मे न्यायालय आप को चैक की रकम के साथ साथ उतनी ही राशि हर्जाने के रूप में दिला सकती है और उस दुकानदार को कारावास की सजा भी दे सकती है। यदि चैक पर दर्ज तारीख पुरानी होने से दुबारा बैंक में प्रस्तुत न किया जा सकता हो तो धारा 420 के अंतर्गत धोखाधड़ी की शिकायत पुलिस थाने में कर सकते ैहैं, कार्रवाई न होने पर एसपी को शिकायत करें और फिर भी कार्यवाही न होने पर इस धारा के अंतर्गत परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है।

 

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समस्या-

राधेश्याम गुप्ता ने इंदौर , मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मैंने इंदौर जिला कोर्ट में २०१३ से धारा १३८ का परिवाद प्रस्तुत किया था, आरोपी ने मुझे २,१५०००/- का चेक दिया था जो बैंक में अनादरित हो गया था। उसके पश्चात मैंने केस दायर किया था, जो कि अभी तक चल रहा है। नोटिस, जमानती वारंट के बाद अब गिरफ्तारी वारंट तक जारी हो चुका है, परन्तु आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर है।  मैंने परिवाद में आरोपी के दो पते दिए हुए हैं, एक उसका स्वयं का घर जहाँ उसकी माँ रहती है और दूसरा उसके ससुराल का जहाँ वह ज्यादातर रहता था। आरोपी कैसे पकड़ में आये और पुलिस और कोर्ट से मुझे कैसे राहत मिल सकती है, जिससे कि मेरा पैसा मुझे जल्द से जल्द मिल सके। कृपया मार्गदर्शन प्रदान करें।


समाधान-

ह एक बड़ी समस्या है। कोर्ट में मुकदमा करने के बाद कोई भी व्यक्ति आप की तरह यह सोचता है कि अब तो पैसा वसूल हो ही जाएगा। वह हो  भी जाता है यदि अभियुक्त पकड़ में आ जाए। लेकिन इस के लिए कोर्ट केवल समन, जमानती या गैरजमानती वारंट जारी कर सकता है। पुलिस ही अभियुक्त को पकड़ कर लाएगी। पुलिस के पास पहले ही बहुतेरे काम हैं। अब 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अभियुक्तों को पकड़ने का काम भ ी उस के जिम्मे है। पुलिस की स्थिति आप जानते हैं कि यदि उसे पता हो कि किसी को गरज है तो अदना सा सिपाही भी अकड़ कर चलता है, जब तक उस की पर्याप्त फीस नहीं मिल जाती वह सरकता नहीं है या फिर ऊटपटांग रिपोर्ट लिख कर समन /वारंट अदालत को वापस लौटा देता है। इस मामले में आप अधिक से अधिक यह कर सकते हैं कि अदालत से वारंट दस्ती प्राप्त कर लें उस थाने के नाम पर जिस थाने के सिपाही को आप साथ ले जा सकें। जैसे ही आप को पता लगे कि अभियुक्त एक खास स्थान पर है तब आप सिपाही को ले जा कर उसे गिरफ्तार करवा सकते हैं।

इतना तो आप भी जानते होंगे कि यह एक अपराधिक मुकदमा होता है, अभियुक्त की उपस्थिति के बिना इस मेंं आगे कोई कार्यवाही नहीं हो सकती। यदि एक बार पकड़ में आ कर अदालत से जमानत पर छूट जाने के बाद भी यदि अभियुक्त गैर हाजिर हो जाता है तो भी मुकदमा वहीं रुक जाता है,आगे नहीं बढ़ता है। यह एक प्रकार का छिद्र है जिस के कारण देश में हजारों मामलों की सुनवाई लटकी पड़ी है।

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गवाह की समन और वारंट से तलबी

May 21, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

निधि जैन ने उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं किसी व्यक्ति की गवाही कोर्ट में करवाना चाहता हूँ। मुझे विश्वास है कि वह व्यक्ति मेरे पक्ष में बयान देगा, लेकिन पारिवारिक विवाद की वजह से मेरे कहने पर वह व्यक्ति मेरा गवाह नहीं बनेगा। मैं आप से यह जानना चाहता हूँ कि क्या किसी केस में कोर्ट से समन जा सकता है कि वह व्यक्ति गवाही अथवा अपने बयान देवे? अगर ऐसा कोई प्रावधान है तो इसके लिए क्या किया जा सकता है?

समाधान-

किसी भी व्यक्ति की गवाही अदालत में कराये जाने के लिए उस का नाम गवाह की सूची में होना चाहिए। यदि है तो आप अदालत से निवेदन कर सकते हैं कि उस गवाह को समन भेज कर अदालत में गवाही देने के लिए बुलाया जाए। अदालत उसे समन जारी कर के गवाही के लिए बुलाएगी। समन तामील हो जाने पर भी गवाह न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं होता है तो ऐसे गवाह को जमानती वारंट से और जमानती वारंट से भी अदालत में न आने पर गिरफ्तारी वारंट से उसे बुलाया जा सकता है। इस संबंध में दंड प्रक्रिया संहिता तथा दीवानी प्रक्रिया संहिता दोनों में उपबंध हैं।

यदि किसी वजह से गवाह सूची पेश न हो या सूची में गवाह का नाम न हो तो न्यायालय को आवेदन दे कर गवाह का नाम सूची में बढ़ाया जा सकता है।

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मिथ्या प्रकरणों के आधार का उपयोग करने में जल्दबाजी न करें।

May 7, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

रवि ने जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी जनवरी 2015 मे हुई थी, जुलाई 2016 में मुझे उसके प्रेम प्रसंग के बारे मे पता चला, जो शादी से पहले से ही था। लड़का उसकी भाभी का चचेरा भाई है। 9 अगस्त 2016 को लड़की के घर वाले लड़की को ले गये।  23 अगस्त 2016 को मेने अवैध संबंध के आधार तलाक का केस कर दिया। उसके कुछ दिन बाद मुझे पता चला कि लड़की वालों ने मुझपर और मेरे परिवार पर झूठा 498ए का दहेज का केस कर दिया है।  7 सितम्बर 2016 को पुलिस ने समझाइश को बुलाया, उस दिन दोनों परिवारों की पंचायत हुई, उस दिन 1150000 रुपये, 14 सितम्बर तक पंचो को देने की बात हुई तथा केस वापसी व तलाक की बात मौखिक रूप से तय हुई।  7 सितम्बर 2016 को एक स्टाम्प दहेज केस में कार्रवाई न करवाने बाबत दिया, हमने कुछ दिन बाद पंचो को रूपए दे दिए।  इसके कुछ दिन बाद जिस पंच के पास रूपए जमा थे उसने लड़की वालो को पैसे दे दिए, और उसने लड़की के बाप से एक स्टाम्प लिखवा लिया कि इस 1150000 रूपए मैंने प्राप्त कर लिए हैं, जो परिवार, समाज कहेगा वो मेैं करुंगा।  लड़की वालों ने उसके बाद झूठे 498ए, 406, व 125 के केस दर्ज करवा दिए। वो पंच गवाही देने को पुलिस स्टेशन नहीं आया।  दहेज केस मे पुलिस ने मुझे मुलजिम बनाया।  दहेज केस में मुझे जमानत मिल गई। उसके बाद लड़की वालों ने लड़की के द्वारा दिसम्बर 2016 के लास्ट वीक मे मेरे छोटे भाई पर बलात्कार (अक्टूबर 2015 में ) का झूठा केस व मेरी मम्मी, मुझ पर सबूत मिटने का झूठा केस कोर्ट के जरिये दर्ज करवा दिया। मार्च 2017 मे 376 केस को पुलिस झूठा केस मानकर कोर्ट मे अपनी जाँच रिपोर्ट दे दी।  लड़की वालों की सभी को मुलजिम बनाने की 190 की एप्लीकेशन निरस्त कर दी।

१. क्या मैं 376 के झूठे केस के आधार पर तलाक पा सकता हूँ, तो उसका क्या प्रोसेस है? २. 125 का केस तो झूठा है क्युँकि हमने तो पहले ही 1150000 रूपए दे चुके हैं। तो इस में हमको क्या करना चाहिए, कैसे उन पंचो को अदालत मे बुलायें?  ३. 376 case में मानहानि का क्या प्रोसेस है और इसके साथ और क्या क्या किया जा सकता है? इसमें ४. 498a मे 190 की एप्लीकेशन निरस्त होने का तलाक के केस में कोई यूज़ है क्या?


समाधान-

प ने जारता के आधार पर विवाह विच्छेद का मुकदमा पत्नी के विरुद्ध किया है। विवाह के पूर्व क्या संबंध स्त्री के किसी पुरुष से थे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह तलाक का आधार नहीं हो सकता। जारता के लिए आप को प्रमाणित करना होगा कि विवाह के उपरान्त आप की पत्नी ने किसी अन्य पुरुष से यौन संबंध स्थापित किया है। इसे साबित करना आसान नहीं होता।

पहले 498ए में केवल पुलिस को शिकायत दर्ज हुई है, केस दर्ज नहीं हुआ होगा। उसी में आपने समझौता कर लिया। आप के रुपये दे देने के बाद लड़की और उस का पिता बदल गया। इस कारण उस ने दुबारा 498ए का केस दर्ज कराया हैं, वह अभी न्यायालय के पास लंबित है यह साबित नहीं हुआ है कि आप निर्दोष हैं। तीसरे उस ने आप के भाई पर 476 तथा आप व माँ पर सबूत छुपाने का केस लगाया है जिस में पुलिस ने अभी न्यायालय को अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की है। अभी आपकी पत्नी उसमें आपत्तियाँ कर सकती है कि पुलिस ने आप से मिल कर ठीक जाँच नहीं की। न्यायालय उस में सुनवाई कर के उसे दर्ज कर के आप के विरुद्ध समन जारी कर सकता है। इस कारण जब तक न्यायालय उस में पुलिस की अंतिम रिपोर्ट को मंजूर न कर ले तब तक अंतिम रूप से उसे झूठा केस नहीं कहा जा सकता।

यदि आप साबित कर देते हैं कि पत्नी पहले ही आजीवन भरण पोषण के लिए 11,50,000/- रुपए प्राप्त कर चुकी है तो धारा 125 दं.प्र.संहिता का प्रकरण खारिज हो सकता है। लेकिन उस के लिए आप को उस का लिखा एग्रीमेंट साबित करना होगा। गवाह (पंच) को न्यायालय में बुलाने के लिए न्यायालय को आवेदन दे कर समन भेज कर गवाह को अदालत में बुलाया जा सकता है। मुझे यह समझ नहीं आया कि आप ने कैसे पंच तय किए जो पुलिस में बयान तक देने नहीं आ सके।

यदि बलात्कार के केस में एफआर न्यायालय द्वारा मंजूर हो जाती है और 498ए में आप बरी हो जाते हैं तो यह विवाह विच्छेद के लिए एक नया आधार होगा। आप को चाहिए कि तब आप अपने वर्तमान विवाह विच्छेद के प्रकरण में संशोधन करवा कर इन नए आधारों को शामिल करें। या फिर एक नया विवाह विच्छेद आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत करें। मान हानि के संबंध में भी जब तक किसी प्रकरण में अन्तिम रूप से सिद्ध न हो जाए कि आप के विरुद्ध की हुई रिपोर्ट मिथ्या थीं हमारी राय में कोई कार्यवाही करना  उचित नहीं है। समय से पहले की गयी कार्यवाही कभी कभी  खुद के गले भी पड़ जाती है।

 

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किसी को भी स्थावर संपत्ति से जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता।

May 6, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

गोलू साहू ने पंडुका, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-


मेरे पिता ने पैतृक संपत्ति को बिना हमारे जानकारी व सहमति तथा बिना हमारा हिस्सा अलग किये बिना ही 1/2 एकड़ जमीन को अज्ञात महिला व्यक्ति के नाम पर रजिस्ट्री कर दी है। तथा उस व्यक्ति द्वारा नामांतरण व रिकॉर्ड में अपना नाम भी दर्ज करवा लिया है।  लेकिन जमीन पर कब्जा हमारा है , सर क्या हम कब्जे पर बने रहे..? क्या वह व्यक्ति जबरदस्ती हमसे कब्जा छीन सकता है….? हमें क्या करना चाहिए…….?


समाधान-

कोई भी व्यक्ति जबरन किसी से स्थावर सम्पत्ति का कब्जा छीन कर वर्तमान में काबिज व्यक्ति को बेदखल नहीं कर सकता। यदि कोई ऐसी कोशिश करता है या बेदखल करता है तो तुरन्त पुलिस को रिपोर्ट करें तथा एसडीएम के न्यायालय में धारा 145-146 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत करें। यदि किसी को ऐसा आवेदन प्रस्तुत करने के पहले के 60 दिनों में बेदखल भी कर दिया गया है तो उसे संपत्ति का कब्जा वापस दिलाया जाएगा।

पैतृक/ सहदायिक संपत्ति का बंटवारा हुए बिना कोई भी पिता अपनी संतानों को पैतृक संपत्ति से अलग नहीं कर सकता। इस तरह संपत्ति का उक्त हस्तान्तरण वैध नहीं है। लेकिन उस जमीन में पिता अपने हिस्से की जमीन को बिना बंटवारा किए भी हस्तांतरित कर सकता है, उस हस्तान्तरण के आधार पर नामान्तरण भी खोला जा सकता है। लेकिन जिस व्यक्ति को संपत्ति का हिस्सा हस्तांतरित किया गया है वह व्यक्ति संपत्ति पर कब्जा केवल बंटवारे के माध्यम से ही प्राप्त कर सकता है। आप रजिस्ट्री को निरस्त कराने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं तथा संपत्ति से बेदखली के विरुद्ध इसी न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। इस मामले में दस्तावेजों को किसी स्थानीय वकील को दिखा कर सलाह लें और आगे की कार्यवाही करें।

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समस्या-

नेहा सोनी ने इंदौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति मुझे मेरे मायके छोड़ कर चले गये और मुझे आने के लिए भी मना कर दिया। वो मुझे साथ रखना नहीं चाहते। मैं ने कोर्ट में 125 और 498 ए के मुकदमे लगा रखे हैं।  मेरे पति प्राइवेट कॉलेज मे प्रोफसर हैं। मेरे पास  उन की सैलरी का प्रमाण नहीं है।   मेरा अंतरिम मेंटेनेन्स 1700 रुपए प्रतिमाह तय हुआ है। जबकि मेरे ससुराल वाले काफ़ी संपन्न हैं। वो मुकदमे की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं, ना ही कोई हाल निकालना चाहते हैं।  क्या करूँ बहुत परेशान हूँ। मेरी मदद करें।

समाधान-

भारत में अदालतों की संख्या आबादी के मुकाबले बहुत कम है। दस लाख की आबादी पर अमरीका में 140 अदालतें हैं और ब्रिटेन में 55 जब कि भारत में इसी जनसंख्या पर केवल 12 अदालतें हैं। वैसी स्थिति में न्याय में देरी होना स्वाभाविक है। 498ए की कार्यवाही तो धीमे ही चलेगी उस पर आपका नियंत्रण नहीं हो सकता। वहाँ अभियोजक सरकार होती है। आपको केवल गवाही के लिए बुलाया जाएगा।

धारा 125 दं.प्र.सं. के भरण पोषण के मामले में आप को अंतरिम राहत न्यायालय ने दे दी है। अब जब भी अन्तिम निर्णय होगा तब जो भी गुजारा भत्ता आप का तय होगा वह आप के द्वारा आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने की तिथि से प्रभावी होगा। इस तरह यदि आप का गुजारा भत्ता 5000 प्रतिमाह तय होता है तो 1700 के अलावा जितना गुजारा भत्ता बकाया होगा वह आप को बाद में मिल जाएगा। इस लिए आप को चाहिए कि आप 125 दं.प्र.सं. के प्रकरण में उचित गुजारा भत्ता तय होने पर अधिक ध्यान दें। गुजारा भत्ता का आधार हमेशा पति की आर्थिक स्थिति और मासिक आय होती है। मासिक आय तो आप को प्रमाणित  करनी होगी।

आप को चाहिए कि आप पति के निजी कालेज का पता लगाएँ अपने स्तर पर उन की सेलरी की जानकारी करें और आर्थिक स्थिति का ज्ञान करें। धारा 125 दं.प्र.संहिता का प्रकरण अपराधिक कानून का हिस्सा होने के साथ साथ दीवानी प्रकृति का है। इस कारण से दीवानी प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के प्रावधान सिद्धान्त रूप में इस प्रकरण में प्रभावी होते हैं। इकबाल बानो बनाम स्टेट ऑफ यूपी के मामले में 05.06. 2007 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दीवानी प्रकृति का माना है।आप इस मामले में सीपीसी के प्रावधानों केअनुरूप प्रतिपक्षी को देने के लिए प्रश्नावली दे सकती हैं और न्यायालय उन का उत्तर देने का आदेश प्रतिपक्षी को दे सकता है इसी तरह आप कोई भी दस्तावेज जो प्रतिपक्षी के शक्ति और आधिपत्य में है उसे प्रकट और प्रस्तुत कराने के लिए आवेदन न्यायालय को दे सकती हैं। दं.प्र.संहिता में भी धारा 91 में दस्तावेज प्रतिपक्षी से अथवा किसी से भी मंगाया जा सकता है और दस्तावेज लाने वाले को दस्तावेज साथ ला कर बयान देने के लिए कहा जा सकता है। इस तरह जिस संस्था में आप के पति काम करते हैं उस संस्था के प्रमुख को दस्तावेज ले कर न्यायालय में बुलाने के लिए समन जारी किया जा सकता है। आप इस मामले में अपने वकील से बात करें कि वह सीपीसी और दं.प्र.सं. के प्रावधानों में ऐसे आवेदन प्रस्तुत करे और इस संबंध में न्यायालयों के निर्णय तलाश कर उन का उपयोग करते हुए वस्तु स्थिति को न्यायालय के समक्ष रखे जिस से उचित रूप से आप का गुजारा भत्ता न्यायालय तय कर सके।

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समस्या-

कौशल पटेल ने ग़ाजियाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मैं कौशल पटेल उम्र 36 वर्ष गाजियाबाद (उ0प्र0) में निवास करता हूँ। मेरी शादी सन् 2008 में हुई थी। मेरी आर्थिक स्थिति के चलते मेरी पूर्व पत्नी ने मुझसे तलाक ले लिया था। मेरा तलाक सन् 2014 में मेरठ (उ0प्र0) न्यायालय में हुआ था। तलाक के बाद धारा 125 में खर्चे के मुकदमें का भी फैसला भी 2014 में ही हो गया था। जिसके बाद कोर्ट के आदेश पर प्रति माह मुझे अपनी पूर्व पत्नी को रूप्यै 3500/- का भुगतान करना पड़ता है। जो मैं कोर्ट में जमा करवाता हूँ। भुगतान में 2000/-रूपये मेरी पत्नी का और 1500/-रूपये मेरी बेटी का होता है। मेरी बेटी जो कि अब 7 वर्ष की है जो की मेरी पूर्व पत्नी के साथ ही है। चूंकि मैं अपने बुजुर्ग माता-पिता के साथ रहता हूँ। मेरी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। अभी मुझे मालूम हुआ है कि मेरी पूर्व पत्नी डिग्री काॅलेज में प्राईवेट लेक्चरार हो गई है। सैलरी का मुझे नहीं पता कि कितनी मिलती है लेकिन प्राईवेट लेक्चरार को भी लगभग 20-25 हजार की सैलरी मिलती है। मैं यह जानना चाहता हूँ कि क्या मेरी पूर्व पत्नी नौकरी करते समय भी मुझसे खर्चा लेने की अधिकारी है? क्या मुझे न्यायालय से कोई समाधान मिल सकता है? जिससे मुझे खर्चा ना देना पड़े क्यूंकि मेरी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। कृपया उचित समाधान बतायें।


समाधान-

कौशल जी, आप को न्यायालय के समक्ष दो तथ्य प्रमाणित करने होंगे। पहला यह कि आप की आय नहीं है या बहुत कम है। दूसरा यह कि आप की पत्नी वास्तव में 20-22 हजार रुपया कमाने लगी है। आप इन्हें प्रमाणित करने के लिए सबूत जुटाइए। केवल आप के कहने मात्र से अदालत ये दोनों तथ्य साबित नहीं मानेगी।

यदि आप पर्याप्त सबूत जुटा लेते हैं और उक्त दोनों तथ्यों को साबित करने में सफल हो सकते हों तो धारा 127 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अपना आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं और पूर्व में जो आदेश धारा 125 के अंतर्गत दिया गया है उसे संशोधित किया जा सकता है।

यदि वास्तव में आप की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है और आप इस तथ्य को प्रमाणित कर देते हैं तो पत्नी को दी जाने वाली मासिक भरण पोषण राशि बन्द की जा सकती है। लेकिन बेटी के लिए दी जाने वाली राशि कम होने की बिलकुल सम्भावना नहीं है।

 

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