Crime Archive

समस्या-

प्रभात झा ने आरा, प्रतापगंज, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे पापा दो भाई हैं। मेरे पापा और बड़े चाचा ने मिलकर जमीन खरीदी परंतु सारी ज़मीन बड़े चाचा ने अपने नाम से ले ली और पापा भी इस पर ध्यान नहीं दे सके क्योंकि वो बाहर रहकर काम करते थे। अब मेरे चाचा जी ने मौखिक रूप से जमीन बँटवारा किया है। लेकिन वो लिखित रूप से जमीन देने के लिए तैयार नही हैं, वो मनमाना ढंग से जमीन का बटवारा करना कहते हैं, साथ ही जेठांस की भी मांग करते हैं। हम लोगों के जोर देने पे वो सारा ज़मीन अपने बेटों के नाम से करने की धमकी देते हैं। हम लोगों के पास जमीन से सम्बंधित कोई दस्तावेज भी नहीं है। मैं जानना चाहता हूँ कि उस जमीन पर पापा का कितना हक़ है और क्या वह जमीन क़ानूनी रूप से दोनों भाई में बटवारा हो सकता है। अगर हाँ तो अब हमें क्या करना चाहिए? साथ ही अगर मेरे चाचा ने जमीन धोखे से अपने बेटों के नाम पर कर दी तो उस स्थिति में हम लोग जमीन पे दावा कर सकते हैं या नहीं।

समाधान-

ब भी कोई संपत्ति संयुक्त रूप से खरीदी जाए तो उस के विक्रयपत्र में इस बात का उल्लेख किया जाना चाहिए कि विक्रय मूल्य की राशि में किस का कितना योगदान है, और खरीददार कौन कौन हैं। लेकिन भारत में अक्सर ये होता है कि रिश्तेदार एक दूसरे के भरोसे में इस तरह के सौदे करते हैं और बाद में उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। हमारा कहना है कि विश्वासघात वहीं होता है जहाँ विश्वास होता है। इस कारण कम से कम चल-अचल संपत्ति और नकदी के मामलों में सहज विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि कैसे भी नहीं किया जाना चाहिए। आप के पिता ने आँख मूंद कर अपने भाई का विश्वास किया और अब उस की परेशानी न केवल वे भुगत रहे हैं बल्कि आप सभी भुगत रहे हैं।

आपके मामले में जमीन के कागजात अर्थात विक्य पत्र में आपके पिता का नाम नहीं है। लेकिन यदि उस जमीन को खरीदने में उन का भी आर्धिक योगदान है तो उस धन को जुटाने और जमीन के लिए भाई को देने के संबंध में कुछ न कुछ सबूत अवश्य होंगे। ये सबूत दस्तावेजी भी हो सकते हैं और मौखिक साक्ष्य से उन्हें साबित किया जा सकता है। य़दि आप के पिता जमीन खरीदने के लिए धन भाई को देना साबित करने की स्थिति में हों तो आप के पिता को तुरन्त भाई के विरुद्ध धोखाधड़ी के लिए पुलिस में रिपोर्ट लिखानी चाहिए। यदि पुलिस रिपोर्ट लिखने और कार्यवाही करने से मना करे तो वकील की सहायता ले कर सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर अन्वेषण के लिए पुलिस थाने को भेजे जाने का की प्रार्थना करना चाहिए। यही एक मात्र रास्ता है जिस से आप के पिता अपनी संपत्ति को वापस प्राप्त कर सकते हैं।

कोशिश करें और लोक अदालत की भावना से मुकदमे को निपटाएँ!

October 2, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

स्वाती ठाकुर ने रायपुर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरा कोर्ट मे एक केस चल रहा है 294, 323, 506 आईपीसी की धाराओँ में, जिसमे मैं और मेरी ३ सहेलियाँ भी शामिल हैं। जो सामने वाली लड़की है, जिसने हमारे खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई है, वो एक बार भी कोर्ट नहीं आयी है और मेरे साथ जो ३ लड़कियाँ हैं वो भी कोर्ट नहीं आती हैं। सिर्फ़ मैं ही हर महीने पेशी में जाती हूँ इस केस में आगे क्या होगा? वक़ील भी मुझे कुछ नहीं बताते हैं? मैं क्या करूँ? क्या जैसे सब इस केस में कोई और लड़की नहीं आती हैं मैं भी जाना बंद कर दूँ? इस केस को एक साल होने जा रहा है, कृपया राह दिखाएँ।

समाधान-

प के विरुद्ध जो मुकदमा है उस में धारा 294 आईपीसी संज्ञेय भी है और इस में आपस में राजीनामा भी नहीं हो सकता। इस धारा के कारण आप के विरुद्ध जिस लड़की ने रिपोर्ट की है उस की रिपोर्ट पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया, अन्वेषण किया और आप चारों के विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा प्रस्तुत कर दिया है। अब वह लड़की केवल फरियादी है लेकिन अभियोग राज्य सरकार की ओर से है इस कारण उसे हर पेशी पर आने की जरूरत नहीं है। उसे तो न्यायालय तब बुलाएगा जब उस की गवाही अदालत को दर्ज करनी होगी।

इस मुकदमे में शिकायतकर्ता लड़की से सुलह हो जाए तो भी राजीनामा संभव नहीं है। यह हो सकता है कि 294 के सिवा दो अन्य धाराओं में राजीनामा पेश कर दिया जाए और 294 को स्वीकार कर के आइंदा ऐसी हरकत नहीं करने की चेतावनी के आधार पर न्यायालय लोकअदालत की भावना से मुकदमे का निपटारा कर दे। इस संबंध में आप को अपने वकील से बात करनी चाहिए। आप उन से बात करने की जिद करेंगी तो वे आप को सब बताएंगे। यदि नहीं बताएँ तो आप वकील बदल सकती हैं।

यदि तीन सहेलियाँ मुकदमे में पेशी पर हाजिर नहीं होती हैं तो उन की हाजरी माफी का आवेदन हर तारीख पर पेश किया जाता होगा या फिर उन की जमानत जब्त हो कर उन के वारंट निकल चुके होंगे। आप पेशी पर नहीं आएंगी तो आप के भी गिरफ्तारी के वारंट निकल जाएंगे।

सब से बेहतर तरीका यह है कि यदि इस मामले में अपना अपराध स्वीकार करना किसी लड़की के कैरियर को प्रभावित न करता हो तो आप चारों अपना अपराध स्वीकार कर लें और अदालत से कहें कि इस मामले में लोक अदालत की भावना से निर्णय कर दिया जाए। वैसी स्थिति में आप को चेतावनी के दंड से दंडित कर के या थोड़ा बहुत जुर्माना कर के मुकदमे का निर्णय हो सकता है। बेहतर है कि आप इस मामले में अपने वकील से बात कर के तय करें कि क्या करना चाहिए।

समस्या-

मनोज राठोड़ ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या ऐसा कोई प्रावधान है? जिस में पत्नी पति के साथ 5 वर्षो से साथ न रहती हो तो लिव इन रिलेशनशिप के तहत किसी अन्य महिला के साथ कानूनी रूप से एक नियत समय के एग्रीमेंट के साथ वह पुरुष रह सके? यदि ऐसा हो सकता है  तो किस कानून के तहत और ना तो किस कानून के तहत नहीं रह सकते?

समाधान-

ह समस्या बड़ी व्यापक है। पहले इस के कारणों पर कुछ रोशनी डाना चाहूंगा। यदि पति पत्नी के बीच विवाद हो और पति पत्नी का साथ रहना संभव नहीं रहा हो तो दोनों के बीच इन सब समस्याओं का हल केवल और केवल न्यायालय के माध्यम से ही संभव है। इस के लिए पति या पत्नी दोनों में से कोई एक को या दोनों को न्यायालय की शरण लेनी पड़ेगी। अब आप की जो समस्या है उस का मूल इस तथ्य में है कि न्यायालय कम समय में वैवाहिक विवादों का हल नहीं कर पा रहे हैं। यदि वे एक दो साल में विवाद को अंतिम रूप से हल कर दें तो यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।

एक बार जब यह तय हो गया है कि न्यायालय की मदद के बिना कोई वैवाहिक विवाद हल नहीं किया जा सकता और न्यायालयों के संचालन के लिए साधन जुटाने की जिम्मेदारी सरकार की है तो उसे पर्याप्त संख्या में पारिवारिक न्यायालय स्थापित करने चाहिए जिस से किसी भी वैवाहिक विवाद का समापन कम से कम समय में व अधिकतम एक वर्ष की अवधि में अन्तिम रूप से किया जा सके। यदि ऐसा हो सके तो यह आदर्श स्थिति होगी। लेकिन न तो इस आदर्श स्थिति में देश को पहुँचाने की मानसिकता किसी राजनैतिक पार्टी और सरकार में है और न ही सिविल सोसायटी या जनता की ओर से इस तरह का कोई आंदोलन है। इस कारण यह स्थिति फिलहाल कई सालों तक बने रहने की संभावना है। यह भी सही है कि जब हमारी न्याय व्यवस्था किसी समस्या का हल कम समय में प्रस्तुत करने में असमर्थ रहती है तो लोग न्याय व्यवस्था से इतर  उस के लिए अस्थाई हल तलाशने लगते हैं। अनेक बार ये अस्थायी हल ही लगभग स्थायी हल का रूप ले लेते हैं। लिव इन रिलेशन वैवाहिक मामलों में वर्तमान विधि और न्याय व्यवस्था की असफलता का ही परिणाम हैं।

आप ने समस्या का जो हल सुझाया है उस पर विचार करें तो पाँच वर्ष से पत्नी किसी पति से अलग रह रही है और यह अकारण है तो यह विवाह विच्छेद का एक मजबूत आधार है। यदि पृथक रहने का कोई कारण भी है तो भी इस से सप्ष्ट है कि विवाह पूरी तरह से असफल हो चुका है और न्यायालय को तलाक की डिक्री पारित कर देनी चाहिए। लेकिन हमारी न्याय व्यवस्था यह सब समय रहते नहीं कर सकती उस के पास इन कामों के लिए जज बहुत कम लगभग चौथाई हैं और समस्याएँ चार गुनी। इस कारण ऐसे पति और पत्नी लिव इन रिलेशन की बात सोचते हैं। यदि आप एग्रीमेंट के साथ किसी स्त्री के साथ लिव इन रिलेशन बनाते हैं तो उस में यौन संबंध बनना अनिवार्य होगा और आप का तलाक नहीं हुआ है तो विवाह में रहते हुए दूसरी स्त्री से यौन संबंध बनाना ऐसा कृत्य होगा जिस के कारण तलाक के लिए आप की पत्नी के पास एक मजबूत आधार तैयार हो जाएगा। चूंकि आप एक नियत समय के लिए यह एग्रीमेंट कर रहे हैं इस कारण इसे विवाह की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वैसी स्थिति में यह आईपीसी या किसी अन्य कानून के अंतर्गत  किसी तरह का अपराध  तो नहीं होगा, लेकिन इसे पत्नी के प्रति क्रूरता की श्रैणी में रखा जा सकता है। जिस से पत्नी या पति मानसिक रूप से पीड़ित हो कर आत्महत्या के लिए प्रेरित हो सकता/ सकती है।  तब यह धारा 498-ए का अपराध हो सकता है। हमारी राय यह है कि तलाक होने के पूर्व किसी भी तरह किसी भी पक्ष द्वारा एग्रीमेंट के माध्यम से लिव इन रिलेशन में रहना अपराध हो सकता है। इस से बचना चाहिए।

फिर भी जो वर्तमान परिस्थितियाँ हैं उन में लोग ऐसे वैकल्पिक मार्ग निकालते रहेंगे जिन से जीवन को कुछ आसान बनाया जा सके। यह तब तक होता रहेगा जब तक हमारी न्याय व्यवस्था पर्याप्त और कानून सामाजिक परिस्थितियों के लिए पूरी तरह उचित नहीं हो जाएंगे।

अभियुक्त को फरार घोषित कराएँ।

August 16, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

दशरथ वर्मा ने उज्जैन, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

न्यायालय में चैक बाउंस का धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनयम का परिवाद प्रस्तुत किया था जिस पर प्रसंज्ञान लिए जाने पर अभियुक्त के विरुद्ध समन जारी हुए हैं। लेकिन अभियुक्त उस के दिए पते से मकान खाली कर अन्यत्र चला गया है इस लिए उसे समन की तामील नहीं हो रही है। क्या किया जाए?

समाधान-

किसी भी अपराधिक प्रकरण में अभियोजक (मुकदमा चलाने वाले) की यह जिम्मेदारी है कि वह अभियुक्त का पता ठिकाना मालूम करे और उसे किसी भी तरह न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कराए। अपराधिक मामलों में अभियुक्त की अनुपस्थिति (यदि अभियुक्त की स्वयं की प्रार्थना पर अदालत द्वारा उपस्थिति से कोई मुक्ति प्रदान न कर दी गयी हो) में कोई कार्यवाही हो सकना संभव नहीं है।

इस के लिए अभियोजक न्यायालय से पुलिस के नाम समन, गिरफ्तारी या जमानती वारंट जारी करवा सकता है। जिन मामलों में स्वयं सरकार अभियोजक होती है उन में भी यही प्रक्रिया है। इस मामले में अभियोजक भी आप ही हैं तो अभियुक्त का पता तो आप को ज्ञात करना होगा और न्यायालय को दे कर उस पते के लिए समन या वारंट जारी कराना होगा। अदालत यह कर सकती है कि जारी समन या वारंट को आप को वह दस्ती देने का आदेश दे दे जिस से आप खुद उसे ले जा कर पुलिस को साथ ले कर निशादेही से तामील करवा सकें।

यदि फिर भी अभियुक्त नहीं मिलता है और जानबूझ कर छुपा रहता है तो आप न्यायालय को धारा 82 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत फरार घोषित करने की उद्घोषणा के लिए आवेदन कर सकते हैं। जिस के अंतर्गत अभियुक्त की संपत्ति को कुर्क किया जा सकता है। अभियुक्त का ऐसी स्थिति में मिलना आप की कोशिश पर ही निर्भर करता है। पुलिस और अदालत आप की मदद कर सकते हैं लेकिन अभियुक्त को तो आप को तलाश करना ही होगा अन्यथा आप का यह मुकदमा करना बेकार हो जाएगा।

धमकी दे कर धन संपत्ति की वसूली उद्दापन का अपराध है।

July 27, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मन मोहन ने पूर्वी जोहरीपुर पूर्वी दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

पिछले दो महीने पूर्व मेरी रिश्ता पक्का हो गया था, पर इस रिश्ते से मेैं खुश नहीं था। मुझ पर रिश्ते के लिए कई माह से दबाव बनाया गया था। जिस में लड़की वालों की तरफ से बिचौलिए शामिल हैं। पर अब रिश्ते के लिए मेैंने किसी प्रकार लड़की के भाई से मना कर दी है,पर वो रिश्ता तोड़ने को तेयार नहीं हैं और शादी का दबाव बना रहा है। हमारे फ़ोटो लड़की के घर पर गोद भराई की रस्म में खींचे हुए हैं जिस से वे अब रिश्ता तोडने के लिए तीन लाख की मांग कर रहे हैं। जबकि मुश्किल से उनका ख़र्चा 20 से 30 हज़ार हुआ है, लेकिन लड़की का भाई कह रहा है शादी न होने के कारण पिताजी बीमार हो गए थे और डेढ़ लाख पिताजी की बीमारी में, और डेढ लाख प्रोग्राम मे लग गया,  इतनी रकम दो वर्ना हम आदमी इकट्ठा कर के तुम्हारे घर पर हंगामा करेंगे।

समाधान-

गाई या गोद भराई विवाह का अनुबंध हो सकता है विवाह नहीं। विवाह का अनुबंध तोड़ा जा सकता है। इस अनुबंध को तोड़ने वाले से दूसरा पक्ष खर्चा और हर्जाना मांग सकता है। पर मुझे नहीं लगता कि आप के मामले में खरचा और हरजाना इतना अधिक हो सकता है। आप दूसरे पक्ष को कह सकते हैं कि वे बहुत अधिक मांग रहे हैं जो आप को मंजूर नहीं है। वे चाहें तो खर्चे और हर्जाने के लिए अदालत में दावा कर सकते हैं।

उन्हों ने आप के घर पर हंगामा करने की धमकी दी है। यह धमकी है। इस तरह किसी को धमका कर उस से धन वसूल करना उद्दापन का अपराध है जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 383 में दण्डनीय है। इस कारण इस धमकी की सूचना आप अपने इलाके के पुलिस थाने को दें और कहें कि वे इस मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करें। इस की सूचना लिखित में एस पी को भी दें। यदि आप को लगे कि पुलिस कोई कार्यवाही नहीं कर रही है तो आप धमकी देने वाले और उस के परिवार के वे लोग जो इस धमकी में शामिल हैं के विरुद्ध न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर पुलिस को जाँच के लिए भिजवाने हेतु निवेदन करें।

 

समस्या-

विजय ने बस्ती, बस्ती से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

कुछ दिन पहले मैने मॅट्रिमोनियल वेबसाइट से किसी लड़की से शादी करने का प्रस्ताव रखा और वह मान गये। फिर हम लड़की को देखने उनके घर गोंडा उत्तर प्रदेश गये, हमने लड़की पसंद की। फिर मैं लड़की से कभी कभी फोन पर बात भी कर लेता था और फिर थोड़े दिन बाद हमारी एंगेज्मेंट का कार्यक्रम रखा गया और हमारी एंगेज्मेंट हो गई और फिर उसी दिन मैं ने घर पहुँचकर लड़की के घरवालों से शादी करने से मना कर दिया। पहले तो वो मान ही नहीं रहे थे फिर मैंने उन्हें समझाया और वो इस बात पर मान गए कि हमारा जो खर्चा हुआ है आप उतने पैसे हमें दे दो। यही पर बात ख़तम हो गई और फिर हमने उन्हें पैसे दे दिए। उनके अकाउंट में ट्रान्स्फर कर दिए। फिर आज मुझे लड़की के भाई का व्हाट्स अप पर मेसेज आया लड़के ने लिखा कि मैं तुम पर केस करने लगा हूँ तुम्हारी ज़िंदगी खराब कर दूँगा और भी उसने मेरे लिए बहुत अभद्र भाषा का प्रयोग किया।  मैं ने लड़की से शादी करने से इसलिए मना कर दिया क्यों कि मुझे ऐसा लगा कि मैं इस लड़की के साथ खुश नहीं रहूँगा और ना ही मैं इस लड़की को खुश रख पाऊंगा। मैंने सोचा कि मैं अभी मना कर दूँ तो अपनी और किसी अन्य की ज़िंदगी कराब करने से अच्छा होगा। अब आप मुझे यह बताइये कि अब मैं क्या करूं? क्या लड़का मुझ पर सच में केस करेगा अगर वह मुझ पर केस कर देता है तो फिर मैं क्या करूंगा।

 

समाधान-

प ने बहुत समझदारी का काम किया है कि संबंध को तोड़ लिया और दो जीवन खराब होने से बचा लिए।  आप की सगाई हो चुकी थी जो एक तरह से इस बात का अनुबंध होता है कि दोनों शीघ्र विवाह करेंगे। लेकिन आपने सगाई के तुरन्त बाद उस अनुबंध को तोड़ने का प्रस्ताव किया जिसे खर्चे के रुपये ले कर विपक्ष ने सहमति दे दी। इस कारण यह अनुबंध आपसी सहमति से समाप्त हो गया। इस मामले में किसी तरह का कोई विवाद ही शेष नहीं रहा। इस कारण कोई वैध मुकदमा लड़की का भाई या खुद लड़की या अन्य कोई परिजन नहीं कर सकता, यदि करेगा तो वह निरस्त हो जाएगा। लेकिन यदि कोर्ट से आप को समन मिलते हैं तो आप को उस मुकदमे में अपना बचाव तो करना होगा। यदि ऐसा होता है तो बेहतर वकील करें और अपना प्रतिवाद करें।

उस लड़के ने जो गाली गलौज और धमकी आप को व्हाट्स-एप्प मैसेज से भेजी है। वह भारतीय दंड संहिता और सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम के अन्तर्गत अपराध है। आप इस मैंसेज को डिलिट न करें। आप चाहें तो इस संबंध में आप पुलिस को रिपोर्ट दर्ज करवा सकते हैं, यदि पुलिस रिपोर्ट दर्ज न करे या कार्यवाही  न करे तो एस पी को सूचना करें उस की रसीद अपने पास रखें और फिर न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

समस्या-

अनिल कुमार ने नागदा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैंने एक इंदौर के दुकानदार को ऑनलाइन पेमेंट किया, फिंगर प्रिंट डिवाइस के लिए रू=२३००/-। लेकिन उस दुकानदार ने वो सामान मुझे नहीं भेजा और लगभग 1 माह बीत जाने के बाद उसने मुझे उतनी ही राशी का एक चेक दिया, /जो की बाउंस हो गया और मेरे खाते से लगभग २०० रू कटे  बैक चार्ज के रूप में। अब मैं उस दुकानदार पर क्या कार्यवाही कर सकता हूँ?

समाधान-

दि चैक बाउंस हुए 30 दिन नहीं हुए हैं तो चैक बाउंस होने की तिथि से 30 दिनों में एक नोटिस दुकानदार को रजिस्टर्ड एडी डाक से भेजें कि वह नोटिस मिलने से 15 दिन में चैक की रकम, बैंक द्वारा काटे गए चार्ज और हर्जाने की राशि ( जो भी आप खुद तय करें) सहित नकद आप को भुगतान कर के रसीद प्राप्त कर ले अन्यथा आप धारा 138 परक्राम्य अधिनियम में परिवाद दाखिल करेंगे। यदि चैक बाउंस होने की सूचना मिले 30 दिन से अधिक हो गए हों और चैक पर दर्ज तारीख को तीन माह न हुए हों तो चैक को दुबारा बैंक में प्रस्तुत करें। यदि फिर भी चैक बाउंस हो जाए तो यही सब करें।

यदि वह यह राशि दे दे तो ठीक वर्ना  नोटिस देने के 45 दिनों के भीतर अपना परिवाद न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर दें। इस परिवाद मे न्यायालय आप को चैक की रकम के साथ साथ उतनी ही राशि हर्जाने के रूप में दिला सकती है और उस दुकानदार को कारावास की सजा भी दे सकती है। यदि चैक पर दर्ज तारीख पुरानी होने से दुबारा बैंक में प्रस्तुत न किया जा सकता हो तो धारा 420 के अंतर्गत धोखाधड़ी की शिकायत पुलिस थाने में कर सकते ैहैं, कार्रवाई न होने पर एसपी को शिकायत करें और फिर भी कार्यवाही न होने पर इस धारा के अंतर्गत परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है।

 

समस्या-

राधेश्याम गुप्ता ने इंदौर , मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मैंने इंदौर जिला कोर्ट में २०१३ से धारा १३८ का परिवाद प्रस्तुत किया था, आरोपी ने मुझे २,१५०००/- का चेक दिया था जो बैंक में अनादरित हो गया था। उसके पश्चात मैंने केस दायर किया था, जो कि अभी तक चल रहा है। नोटिस, जमानती वारंट के बाद अब गिरफ्तारी वारंट तक जारी हो चुका है, परन्तु आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर है।  मैंने परिवाद में आरोपी के दो पते दिए हुए हैं, एक उसका स्वयं का घर जहाँ उसकी माँ रहती है और दूसरा उसके ससुराल का जहाँ वह ज्यादातर रहता था। आरोपी कैसे पकड़ में आये और पुलिस और कोर्ट से मुझे कैसे राहत मिल सकती है, जिससे कि मेरा पैसा मुझे जल्द से जल्द मिल सके। कृपया मार्गदर्शन प्रदान करें।


समाधान-

ह एक बड़ी समस्या है। कोर्ट में मुकदमा करने के बाद कोई भी व्यक्ति आप की तरह यह सोचता है कि अब तो पैसा वसूल हो ही जाएगा। वह हो  भी जाता है यदि अभियुक्त पकड़ में आ जाए। लेकिन इस के लिए कोर्ट केवल समन, जमानती या गैरजमानती वारंट जारी कर सकता है। पुलिस ही अभियुक्त को पकड़ कर लाएगी। पुलिस के पास पहले ही बहुतेरे काम हैं। अब 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अभियुक्तों को पकड़ने का काम भ ी उस के जिम्मे है। पुलिस की स्थिति आप जानते हैं कि यदि उसे पता हो कि किसी को गरज है तो अदना सा सिपाही भी अकड़ कर चलता है, जब तक उस की पर्याप्त फीस नहीं मिल जाती वह सरकता नहीं है या फिर ऊटपटांग रिपोर्ट लिख कर समन /वारंट अदालत को वापस लौटा देता है। इस मामले में आप अधिक से अधिक यह कर सकते हैं कि अदालत से वारंट दस्ती प्राप्त कर लें उस थाने के नाम पर जिस थाने के सिपाही को आप साथ ले जा सकें। जैसे ही आप को पता लगे कि अभियुक्त एक खास स्थान पर है तब आप सिपाही को ले जा कर उसे गिरफ्तार करवा सकते हैं।

इतना तो आप भी जानते होंगे कि यह एक अपराधिक मुकदमा होता है, अभियुक्त की उपस्थिति के बिना इस मेंं आगे कोई कार्यवाही नहीं हो सकती। यदि एक बार पकड़ में आ कर अदालत से जमानत पर छूट जाने के बाद भी यदि अभियुक्त गैर हाजिर हो जाता है तो भी मुकदमा वहीं रुक जाता है,आगे नहीं बढ़ता है। यह एक प्रकार का छिद्र है जिस के कारण देश में हजारों मामलों की सुनवाई लटकी पड़ी है।

समस्या-

मितेश पालीवाल ने नाथद्वारा, जिला राजसमन्द , राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


मेरी शादी 5 साल पूर्व हिन्दू रीती से हुई थी। हम दोनों ने शादी से पूर्व b.ed. की थी। मेरे एक लड़का भी है जिसे मेरी पत्नी मुझे देना नहीं चाहती क्योंकि मेरी पत्नी मुझसे सिर्फ सरकारी नौकरी पाने के इरादे से मुझसे तलाक चाहती है। मेरे द्वारा मना करने पर उसने मेरे व मेरे परिवार पर दहेज़, महिला उत्पीडन, मेन्टेनेंस आदि केस कर दिए हैं कोर्ट ने 4000 की डिग्री भी कर दी है। मेरी पत्नी ने RPSC सेकण्ड ग्रैड में ऑनलाइन आवेदन भी कर दिया है। जिसमें उसने अपने आप को तलाकशुदा बताया है।  उसका कहना है कि जब तक rpsc का exam होगा तब तक तो वो मुझ से तलाक भी ले लेगी,  मेने उस तलाक के फॉर्म को ऑनलाइन निकाल कर कोर्ट में पेश कर दिया है कोर्ट ने भी उसे गलत माना। साथ ही उसे आगे से एसा नहीं करने की नसीहत दी। श्रीमान मेरी पत्नी व सास-ससुर लालची प्रवृत्ति के हैं,  ये सब मुझसे पैसों की डिमांड करते रहते हैं।   मेरा सवाल है की मेरी पत्नी ने तलाक नहीं होने के बावजूद rpsc में तलाकशुदा का आवेदन किया है क्या यह गैरक़ानूनी है। अगर है तो किस धारा के अंतर्गत साथ ही और कोई उपाय हो तो अवगत करावे। मैं अपनी बात को मिडिया में भी बताना चाहता हूँ।

समाधान-

प की पत्नी नौकरी करना चाहती है और आत्मनिर्भर बनना चाहती है, यह एक अच्छी बात है। पर उस ने नौकरी पाने के लिए जो कदम उठाया है खुद को तलाकशुदा बता कर, वह गलत है और इस तरह वह नौकरी प्राप्त करती है तो वह धारा 420 आईपीसी का अपराध होगा। इस से प्राप्त की हुई नौकरी भी जा सकती है और उस पर अपराधिक मुकदमा चलाया जा कर उसे कारावास के दंड से दंडित भी किया जा सकता है।

मुझे नहीं लगता कि आप की पत्नी ने आप का घर छोड़ा है वह केवल इस कारण छोड़ा है कि वह तलाक की डिक्री प्राप्त कर नौकरी कर सके। लगता है यह योजना बाद में दिमाग में आई हो। आप के बीच विवाद का कारण कुछ और है जो आप यहां बताना नहीं चाहते। मीडिया में इस तथ्य को उजागर करना आप के लिए ठीक नहीं होगा। आप उस के पति हैं और यह पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण होगा। मेरे  विचार से आप को अपनी पत्नी को ऐसा गलत कदम उठाने से रोकना चाहिए। जब तक वाकई तलाक नहीं  हो जाता है तब तक आप की ओर से कोई कदम ऐसा नहीं उठाया जाना चाहिए जो पत्नी के प्रति दुर्भावना को व्यक्त करता हो।

मिथ्या प्रकरणों के आधार का उपयोग करने में जल्दबाजी न करें।

May 7, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

रवि ने जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी जनवरी 2015 मे हुई थी, जुलाई 2016 में मुझे उसके प्रेम प्रसंग के बारे मे पता चला, जो शादी से पहले से ही था। लड़का उसकी भाभी का चचेरा भाई है। 9 अगस्त 2016 को लड़की के घर वाले लड़की को ले गये।  23 अगस्त 2016 को मेने अवैध संबंध के आधार तलाक का केस कर दिया। उसके कुछ दिन बाद मुझे पता चला कि लड़की वालों ने मुझपर और मेरे परिवार पर झूठा 498ए का दहेज का केस कर दिया है।  7 सितम्बर 2016 को पुलिस ने समझाइश को बुलाया, उस दिन दोनों परिवारों की पंचायत हुई, उस दिन 1150000 रुपये, 14 सितम्बर तक पंचो को देने की बात हुई तथा केस वापसी व तलाक की बात मौखिक रूप से तय हुई।  7 सितम्बर 2016 को एक स्टाम्प दहेज केस में कार्रवाई न करवाने बाबत दिया, हमने कुछ दिन बाद पंचो को रूपए दे दिए।  इसके कुछ दिन बाद जिस पंच के पास रूपए जमा थे उसने लड़की वालो को पैसे दे दिए, और उसने लड़की के बाप से एक स्टाम्प लिखवा लिया कि इस 1150000 रूपए मैंने प्राप्त कर लिए हैं, जो परिवार, समाज कहेगा वो मेैं करुंगा।  लड़की वालों ने उसके बाद झूठे 498ए, 406, व 125 के केस दर्ज करवा दिए। वो पंच गवाही देने को पुलिस स्टेशन नहीं आया।  दहेज केस मे पुलिस ने मुझे मुलजिम बनाया।  दहेज केस में मुझे जमानत मिल गई। उसके बाद लड़की वालों ने लड़की के द्वारा दिसम्बर 2016 के लास्ट वीक मे मेरे छोटे भाई पर बलात्कार (अक्टूबर 2015 में ) का झूठा केस व मेरी मम्मी, मुझ पर सबूत मिटने का झूठा केस कोर्ट के जरिये दर्ज करवा दिया। मार्च 2017 मे 376 केस को पुलिस झूठा केस मानकर कोर्ट मे अपनी जाँच रिपोर्ट दे दी।  लड़की वालों की सभी को मुलजिम बनाने की 190 की एप्लीकेशन निरस्त कर दी।

१. क्या मैं 376 के झूठे केस के आधार पर तलाक पा सकता हूँ, तो उसका क्या प्रोसेस है? २. 125 का केस तो झूठा है क्युँकि हमने तो पहले ही 1150000 रूपए दे चुके हैं। तो इस में हमको क्या करना चाहिए, कैसे उन पंचो को अदालत मे बुलायें?  ३. 376 case में मानहानि का क्या प्रोसेस है और इसके साथ और क्या क्या किया जा सकता है? इसमें ४. 498a मे 190 की एप्लीकेशन निरस्त होने का तलाक के केस में कोई यूज़ है क्या?


समाधान-

प ने जारता के आधार पर विवाह विच्छेद का मुकदमा पत्नी के विरुद्ध किया है। विवाह के पूर्व क्या संबंध स्त्री के किसी पुरुष से थे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह तलाक का आधार नहीं हो सकता। जारता के लिए आप को प्रमाणित करना होगा कि विवाह के उपरान्त आप की पत्नी ने किसी अन्य पुरुष से यौन संबंध स्थापित किया है। इसे साबित करना आसान नहीं होता।

पहले 498ए में केवल पुलिस को शिकायत दर्ज हुई है, केस दर्ज नहीं हुआ होगा। उसी में आपने समझौता कर लिया। आप के रुपये दे देने के बाद लड़की और उस का पिता बदल गया। इस कारण उस ने दुबारा 498ए का केस दर्ज कराया हैं, वह अभी न्यायालय के पास लंबित है यह साबित नहीं हुआ है कि आप निर्दोष हैं। तीसरे उस ने आप के भाई पर 476 तथा आप व माँ पर सबूत छुपाने का केस लगाया है जिस में पुलिस ने अभी न्यायालय को अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की है। अभी आपकी पत्नी उसमें आपत्तियाँ कर सकती है कि पुलिस ने आप से मिल कर ठीक जाँच नहीं की। न्यायालय उस में सुनवाई कर के उसे दर्ज कर के आप के विरुद्ध समन जारी कर सकता है। इस कारण जब तक न्यायालय उस में पुलिस की अंतिम रिपोर्ट को मंजूर न कर ले तब तक अंतिम रूप से उसे झूठा केस नहीं कहा जा सकता।

यदि आप साबित कर देते हैं कि पत्नी पहले ही आजीवन भरण पोषण के लिए 11,50,000/- रुपए प्राप्त कर चुकी है तो धारा 125 दं.प्र.संहिता का प्रकरण खारिज हो सकता है। लेकिन उस के लिए आप को उस का लिखा एग्रीमेंट साबित करना होगा। गवाह (पंच) को न्यायालय में बुलाने के लिए न्यायालय को आवेदन दे कर समन भेज कर गवाह को अदालत में बुलाया जा सकता है। मुझे यह समझ नहीं आया कि आप ने कैसे पंच तय किए जो पुलिस में बयान तक देने नहीं आ सके।

यदि बलात्कार के केस में एफआर न्यायालय द्वारा मंजूर हो जाती है और 498ए में आप बरी हो जाते हैं तो यह विवाह विच्छेद के लिए एक नया आधार होगा। आप को चाहिए कि तब आप अपने वर्तमान विवाह विच्छेद के प्रकरण में संशोधन करवा कर इन नए आधारों को शामिल करें। या फिर एक नया विवाह विच्छेद आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत करें। मान हानि के संबंध में भी जब तक किसी प्रकरण में अन्तिम रूप से सिद्ध न हो जाए कि आप के विरुद्ध की हुई रिपोर्ट मिथ्या थीं हमारी राय में कोई कार्यवाही करना  उचित नहीं है। समय से पहले की गयी कार्यवाही कभी कभी  खुद के गले भी पड़ जाती है।

 

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