Human Rights Archive

कानून, अदालत और पुलिस दमन का औजार बन कर रह गए हैं।

July 10, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
Rape victimसमस्या

पटना, बिहार से प्रदीप कुमार ने पूछा है-

मेरी शादी जुलाई 2010 में हुई थी, पत्नी से मेरा रिश्ता बहुत अच्छा है।  शादी के 1 साल बाद मुझे मेरी दूर की साली (वो बहुत गरीब है) ने मुझे बताया कि मेरा सगा साला और उसका दूर का मौसेरा भाई उसका मोबाइल नम्बर अपने दोस्तो को दे कर उसे परेशान करता है।  इस मामले में जब मैं ने अपने साले से इस बारे में बात की तो वह शर्मिन्दा होने के जगह बोला कि वो मेरी दुश्मन है,  मैं उसे बरबाद कर दूँगा।  मैं ने अपने ससुर से भी बात की।  पर कोई हल नहीं निकला।  मैं ने अपनी साली से बहुत पूछा तो बोली कि मैं ने भैया से पापा की नौकरी लगवा देने की बात की थी, तब से परेशान कर रहे हैं।  मुझे उसके परिवार पर दया आ गयी।  मैं ने उसके पिता की नौकरी लगवा दी तथा उसे आगे पढ़ने की सलाह दी।  मेरी सलाह मान कर वो होस्टल में रह कर पढ़ने लगी।  जब यह बात मेरे ससुराल वालों को पता चली तो हमारे सम्बन्ध खराब होने लगे।  तब मेरे साले के दोस्त ने मुझे बताया कि मेरे साले और उस लड़की के बीच हमारी शादी के दिन से अवैध सम्बन्ध था। मेरे बीच में आने के कारण मेरा साला अपने घर वालों के कान भरता है।  जब मैं ने अपनी साली से पुछा तो उस ने सारी बातें सच बता दी उसने बताया कि मेरी शादी के दिन उसका बलात्कार हुआ और लोक लाज के कारण वह ये बात किसी को नही बता सकी।  उस के बाद मेरा साला माफ़ी मांगने के बहाने उस के पास फिर आया और शादी कर लेने की बात कर साल भर तक सम्बन्ध बनाता रहा, जब उस का मन भर गया तो अपने दोस्तो के साथ भी वही सब करने का दबाब देने लगा। अपने दोस्तों को उसका मोबाइल नम्बर दे देता था।  ये सब बात जब मैं ने अपने साले से पूछा तो वह भड़क गया।  तब मैं ने अपनी पत्नी को सारी बातें बताई।  मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि मेरे साले के अवैध सम्बन्ध मेरी पत्नी,  एक और रिस्ते की बहन, एक पड़ौस की लड़की से भी रह चुका था।

ब मैं ने तय किया कि मैं उसे सजा दिला कर रहूँगा।  उस समय मेरी पत्नी ने भी मेरा साथ देने का वादा किया। मैं ने ये बात उन दोनों के परिवार को साथ बिठा कर उन के सामने रखी।  पर कोई बात नहीं बनी।  मेरे ससुर लड़की के माँ बाप को जान से मार देने की धमकी देने लगे तथा लड़की के सगे मामा जो कि एक दलित के नाम पर गलत तरीके से नौकरी कर रहे है को नौकरी से निकलवा देने की धमकी दे कर मेरी पीड़ित साली की पढ़ाई बन्द करवा कर उसे घर में कैद करवा दिया। उसकी शादी की बात चलने लगी।  वो मुझसे एक दो बार मदद के लिये बोली भी।  पर मैं उस समय उसकी मदद करने मे असमर्थ था।  लड़की के माँ बाप भी उसके धमकी के कारण मेरे ससुर की बात मान रहे थे।  उस समय मेरी पत्नी ने अपने पिता का बहुत विरोध किया और अपनी बहन को हमारे पास बुला कर रख लिया।  यहाँ तक बोली कि मैं इसे जिन्दगी भर अपने साथ रखूंगी।  कुछ दिन बाद मेरी पत्नी गर्भवती हो गयी और मेरे घर वालों के दबाब के कारण अपने मायके चली गयी। एक दिन मेरी साली का फोन आया कि उसकी शादी तय हो गयी है और वो जान दे देगी पर ये शादी नहीं करेगी।  मेरे समझ में नही आ रहा था कि मैं उसकी मदद कैसे करुँ।  तब मैं ने उसे बोला कि तुम घर छोड़ कर आ जाओ, मैं तुम्हारा रहने और पढने की व्यवस्था राँची के होस्टल में करवा देता हूँ। वह आ गयी, पर वह कहाँ है? इसका पता मेरे ससुर को चल गया वह डर कर होस्टल छोड़ कर मेरे पास आ गई।  अब मैं समझ नहीं पा रहा था कि रात को उसे कहाँ रखूँ और मैं कहाँ रहूँ।  होटल जाते तो वहाँ उसका परिचय पत्र मांगा जाता।  पर वह सारा समान होस्टल में छोड़ कर आई थी।  दो दिन हमे अपनी गाड़ी में बिताना पडा।  तब मैं ने अपनी साली को शादी का सारा समान खरीद कर दिया और उसे अपनी पत्नी बता कर होटल में उस के साथ कुछ दिन रहा।  उसी समय हमारे बीच सम्बन्ध भी बन गये। (मेरी पत्नी को इस रिश्ते में कोई आपत्ति नहीं थी) उसके बाद मैं ने उसे अपनी पत्नी के रूप में साली का दूसरे होस्टल में दाखिला करवा दिया। तब  मेरे ससुर ने लड़की के पिता पर दबाब बना कर मुझ पर अपहरण का मुकदमा करवा दिया और मुझे साली को उस के घर पहुँचाना पड़ा।

मेरी पत्नी अभी अपने मायके में है और अपने माँ बाप के दबाब में पिछली सारी बातों से इन्कार करती है।  वो अब कहती है कि हम को पता है कि आप हमको नहीं रखेंगे। मेरे बच्चा नहीं था तो आप को बोला था कि मैं उसको (साली) को साथ रखूंगी पर अब तो मेरा खुद का बच्चा है, अब मैं उसको नहीं रखूंगी।  अगर आप उसकी मदद करेंगे तो आप पर दहेज और मार पीट का एफ़आइआर कर दूंगी।  फोन पर वो सारी पुरानी बातें स्वीकार करती है। लेकिन मैं जानता हूँ कि वह अदालत में  मुकर जायेगी।  मैं ने फोन पर होने वाली सारी बातें रिकोर्ड कर ली हैं। मेरी साली घर में है और उसके माँ बाप तक उसका साथ नहीं दे रहे हैं।  मैं उससे कहता हूँ कि मदद के लिये पुलिस के पास जाओ, तो कहती है कि माँ पिताजी ने बोला है कि अगर उस ने कुछ किया तो अब मैं जिन्दगी भर के लिये रिश्ता खतम कर लूंगा।  मैं ने उसे यहाँ तक कहा है कि तुम्हारा सारा खर्च मैं दूंगा, जिस ने तुम्हारी जिन्दगी बरबाद की है, उसे सजा दिलाओ।  मैं तुम्हारे साथ हूँ तो कहती है अब दीदी भी साथ नहीं दे रही है।  आप मेरा फ़िक्र छोड़ दीजिये जब तक ठीक-ठाक चलता है देखते हैं।  नहीं तो फिर आत्मह्त्या कर लूंगी।  मेरे कारण आप क्यों मुसीबत ले रहे हैं? अगर आप के कहने पर मैं सब से लड़ भी लूंगी तो दीदी आप पर एफ़आइआर कर देगी तो आप को जेल हो जायेगी तब मैं अपना खर्च कहाँ से लाउँगी? फिर भी मुझे आत्महत्या करनी पड़ेगी।  आप की भी जिन्दगी ख्रराब हो जायेगी।  आप कानून में रह कर मुझ से शादी कर के ले जाइयेगा तभी आप के साथ जा सकती हूँ ताकि फिर हमें कोई परेशान न करे।

मैं अपनी पत्नी को तलाक नहीं देना चाहता हूँ। अगर मैं तलाक दे दूँगा तो उसकी जिन्दगी खराब हो जायेगी और हमारे यहाँ तलाक के बाद लड़की की शादी बहुत मुश्किल से होती है और मेरी पत्नी तो दिमागी रुप से कमजोर है।  मुझे पता है कि मेरी पत्नी मेरे साथ रहने लगेगी तो वो फिर से मेरे पक्ष में हो जायेगी।  उसे लगता है कि मैं उसे अब नहीं रखना चाहता।  क्योंकि जब से वो मायके गयी है। बहुत बार उस ने मुझे बुलाया है पर मैं अपने ससुर से खराब रिश्ते की वजह से कभी नहीं गया।  मेरे ससुर कहते हैं कि जब तक वे मेरी साली की शादी नहीं करा देंगे मेरी पत्नी को मेरे यहाँ आने नहीं देंगे।  मेरी साली समाज में इतना बदनाम हो गयी है कि उसकी शादी अगर होगी भी तो कोई मजबूरी में ही करेगा जिस से उसकी जिन्दगी बर्बाद हो जायेगी। वह कहती है कि मैं आपको अपना पति मान चुकी हूँ।  मैं जिन्दगी भर आपके नाम के सहारे अकेले जी लूंगी और अगर जबर्दस्ती मेरी शादी करवाई जायेगी तो आत्महत्या कर लूंगी।  मैं चाहता हूँ कि मेरी साली को पढ़ने का अवसर मिले, जिस से वह अपने पैरों पर खड़ी हो कर अपनी जिन्दगी का सही फ़ैसला ले सके और मेरे साले को सजा दिला सके। उसके बाद भी उसे यह लगे कि वो मेरे साथ खुश रहेगी मैं उसे भी रखने को तैयार हूँ।  पर कानून मुझे दूसरी शादी का इजाजत नहीं देता। मेरा साला जिस ने न जाने कितनी जिन्दगियाँ बर्बाद की हैं विजयी मुस्कान के साथ घूम रहा है।  उसे इस बात का तनिक भी अफसोस नहीं है।  मुझे समझ में नही आता कि मैं क्या करुँ,? क्या करना उचित रहेगा? हमेशा मैं परेशान रहता हूँ।

समाधान-

हुत जटिल समस्या है आप की। यह केवल आप की समस्या न हो कर पूरी तरह एक सामाजिक समस्या बन चुकी है। एक तरफ आप के ससुर का परिवार है जो सम्पन्न है और अपनी संपन्नता के बल पर कुछ भी कर सकता है। फर्जी मुकदमे खड़े कर के लोगों को परेशान कर सकता है और अपने विरुद्ध लगाए गए मुकदमों में अपना बचाव कर सकता है, यहाँ तक कि गवाहों को भी अन्यान्य तरीकों से प्रभावित कर सकता है। दूसरी तरफ आप की रिश्ते की साली का परिवार है जो विपन्न है, जिसे जीवन जीने के लिए कुछ भी करना पड़ता है। अपने और अपने परिवार के सदस्यों के साथ हुए हर अन्याय को सहना पड़ता है। विपन्न लोग अपने जीवन यापन का मामूली स्थाई समाधान प्राप्त करने के चक्कर में गैरकानूनी रूप से नौकरी हासिल करने का काम भी कर सकते हैं, इस काम को करने के समय उन्हें यह भय भी नहीं होता कि नौकरी चली जाएगी या फिर फर्जीवाड़े के कारण उन्हें सजा भी हो सकती है। लेकिन एक बार नौकरी मिल जाए तो उसे बचाने को कुछ भी कर सकते हैं। उन के लिए अपना, पत्नी और बच्चों का सम्मान वगैरा सब थोथी चीजें हैं, वे सिर्फ और सिर्फ अपने जीवन को बनाए रखने के लिए ही संघर्ष करते रहते हैं।

न दो परिवारों में से एक परिवार के पुरुष ने दूसरे परिवार की लड़की और अन्य भी अनेक लड़कियों के साथ बलात्कार किए और अपनी संपन्नता के बल पर उन्हें छिपाए रख कर समाज में सम्मान बनाए हुए हैं। वे अपनी संपन्नता के साधनों और अपने मिथ्या सम्मान को बनाए रखने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। ये दोनों तरह के परिवार अपने तरीके से जी रहे हैं। एक अपनी संपन्नता और मिथ्या सम्मान को बनाए हुए और दूसरा अपने जीवन के लिए कड़ा संघर्ष करते हुए। कानून और नैतिकता का दोनों के लिए बस इतना अर्थ है कि जब भी उन में से किसी का अपने साध्य के लिए उपयोग किया जा सके कर लो, वर्ना ये दोनों व्यर्थ हैं।

न दो तरह के परिवारों में से जो संपन्न परिवार था उस की बेटी के साथ विवाह कर के आप उस के दामाद हो गए। इस विवाह का स्वाभाविक परिणाम यह होना चाहिए था कि आप अपने ससुराल के सदस्यों के सभी नैतिक अनैतिक, कानूनी और गैर कानूनी कामों में उन के साथ खड़े हों। यदि आप उन के विरुद्ध खड़े होंगे तो वे अपनी संपन्नता और मिथ्या सम्मान को बचाए रखने के लिए आप के विरुद्ध भी खड़े होंगे। क्यों कि उन की यह सामाजिक स्थिति ही उन के लिए सब से प्रमुख है, शेष सभी बातें बिलकुल गौण हैं।

मारे समाज में कुछ आत्मनिर्भर स्वतंत्र स्त्रियों को छोड़ कर सभी स्त्रियाँ परतंत्रता का जीवन व्यतीत करती हैं। आप की पत्नी भी उन में से एक है। समाज के मूल्य ऐसे हैं कि किसी स्त्री को जबरन बलात्कार का शिकार बनाया जाए तो वही बरबाद होती है, बलात्कारियों का कुछ नहीं बिगड़ता, वे बने रहते हैं। अधिकांश स्त्रियाँ अपने बचपन या किशोरावस्था में ही अपने ही परिजनों के इस बलात्कर्म का शिकार होती हैं और अत्याचारों को बनाए रखने के लिए अस्तित्व में लाए गए स्त्री के कौमार्य और सतीत्व के बेढ़ब सामाजिक मूल्यों की कंदराओं में कैद स्त्रियों के पास यह सब अत्याचार सहने के अलावा कोई मार्ग नहीं होता। वे इसे ही अपनी नियति के रूप में स्वीकार कर लेती हैं, और इसी तरह जीती रहती हैं। वे इस स्थिति से जरा भी विचलित होती हैं तो समाज उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता। आप की पत्नी के साथ उस के ही भाई ने यह अत्याचार किया और फिर रिश्ते की बहिन के साथ भी और अन्य कुछ और स्त्रियों के साथ भी।

ह सारी स्थिति चलती रहती, यदि आप को आप के रिश्ते की साली ने अपनी व्यथा न बताई होती। आप के ससुराल का परिवार, विशेष रूप से आप का साला और ससुर इस मामले में आप का दखल पसंद नहीं था। किसी भी विवाद की स्थिति में उन की सामान्य अपेक्षा यही है कि आप अपने साले और ससुर के साथ खड़े हों चाहे वे कितने ही गलत हों। (हमारे सामाजिक मूल्य यही कहते हैं) इस आप के ससुराल के पुरुषों ने जो भी संतुलन बनाया हुआ था उस में आप की बात से खलल पड़ गया। आप ने रिश्ते की साली के पिता की मदद की उन्हें रोजगार दिला दिया और रिश्ते की साली की पढ़ाई की व्यवस्था कर दी। वहीं से आप के साले और ससुर आप के विरुद्ध हो गए। उन्हें यह खतरा लगने लगा कि लड़की और उस के पिता का जीवन जैसे ही कुछ स्थिर होगा। वे उन के काले कारनामों के लिए उन्हें कानून के सामने खड़ा कर सकते हैं जिस से उन का ताश का महल गिर सकता है। उन्हों ने उस लड़की और उस के पिता को डराना धमकाना आरंभ कर दिया और लड़की और उस के पिता ने जो इन धमकियों का सामना नहीं कर सकते थे हथियार डाल दिए। आप की पत्नी जो स्वयं पीड़ित थी उस ने आप का साथ देना पसंद किया लेकिन किसी बहाने से आप के ससुर उसे अपने कब्जे में ले गए। जहाँ पहुँच कर वही हुआ जो होना था। एक बंदी स्त्री तो केवल उसी का साथ दे सकती है जिस के वह कब्जे में हो।

जो लड़की अनेक बार बलात्कार का शिकार हो चुकी हो। उस के लिए देह की पवित्रता का क्या अर्थ रह जाता है। यह बात आप की पत्नी और रिश्ते की साली के लिए पूरी तरह सच है। आप ने उस का साथ दिया। उस उपकार का आभार प्रकट करने के लिए आप की साली के पास उस की देह आप को समर्पित करने के अलावा कुछ भी नहीं था। परिस्थितियों ने आप को साथ कर दिया और आप के संबंध बन गए। आप की पत्नी को भी इस में क्या आपत्ति हो सकती थी? वह भी तब जब कि वह स्वीकार कर चुकी हो कि वह विवाह के पहले अपने ही भाई के अत्याचार से अपना कौमार्य खो बैठी है। लेकिन जैसे ही वह अपने पिता और भाई के संरक्षण (कब्जे) में गई उस के स्वर बदल गए। आप समझ सकते हैं कि हमारे समाज में स्त्री का अपना कोई स्वर नहीं होता। उस का स्वर उसी पुरुष का स्वर होता है जिस के वह कब्जे में होती है।

न सारी परिस्थितियों में आप अपने ही साले को उस के अपराधों के लिए दंडित कराना चाहते हैं। एक तो उस के अपराध इतने पुराने हो चुके हैं कि उन के सबूत तक नहीं मिलेंगे। दूसरे आप यदि इस कामं को हाथ में लेते हैं तो आप का साला और ससुर हाथ धो कर आप के पीछे पड़ जाएंगे। वे इस काम के लिए कानून का भी इस्तेमाल करेंगे। पलड़ा उन के पक्ष में इसलिए है कि आप की पत्नी आप के पास न हो कर अपने मायके में भाई और पिता के कब्जे में है। आप के रिश्ते की साली इन परिस्थितियों को अच्छी तरह समझती है। इसी लिए उस ने यह शर्त रखी है कि वह आप के साथ केवल वैध विवाह में ही साथ रहने को तैयार है अन्यथा नहीं। क्यों कि उस का सर्वस्व आप के अस्तित्व पर निर्भर करता है और वह नहीं चाहती कि इस लड़ाई में आप को कोई नुकसान पहुँचे। क्योंकि आप का नुकसान उस का बहुत बड़ा नुकसान है। आप को तो सिर्फ नुकसान होगा, जब कि उस का तो सब से बड़ा सहारा छिन जाएगा।

सारी समस्या की कुंजी इस बात में है कि किसी तरह आप की पत्नी आप के ससुर और साले के कब्जे से निकल कर आप के पास आए।  लेकिन आप के ससुर व साले ने इस के लिए यह शर्त रखी है कि पहले आप के रिश्ते की साली का विवाह हो जाए। यदि ऐसा विवाह हो जाता है तो वह केवल फर्जी विवाह होगा और आप के व आप की रिश्ते की साली के मार्ग में एक स्थाई बाधा और खड़ी हो जाएगी।

किसी भी तरह यदि आप आप की रिश्ते की साली का विवाह कराए बिना अपनी पत्नी और बच्चे को अपने ससुराल से निकाल कर अपने पास ला सकते हैं तो फिर पत्नी आप के साथ होगी और संतुलन आप के पक्ष में हो जाएगा। तब आप इस लड़ाई को आगे लड़ सकते हैं। इस के बिना आप के ऊपर कभी खत्न न होने वाली कानूनी कार्यवाहियों, गिरफ्तारी जमानत आदि की तलवार लटकी रहेगी। फिर आप सारी लड़ाई को भूल कर अपने बचाव में लग जाएंगे। आप अपनी पत्नी को इस तरह उस के मायके से निकाल कर अपने पास कैसे लाएंगे यह आप ही तय कर सकते हैं। यदि आप ऐसा कर सकें तो आगे का मार्ग खुल सकता है।

क मार्ग और है। यदि आप की पत्नी आप के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवाती है तो गिरफ्तारी केवल 498 ए तथा 406 आईपीसी के मामलों में हो सकती है। आप इस गिरफ्तारी से बचने की या गिरफ्तारी के बाद एक दो सप्ताह में जमानत पर छूटने की व्यवस्था स्थानीय रूप से बना लें तथा अपनी पत्नी और बच्चे के लिए साल दो साल बाद न्यायालय द्वारा दिलाए जाने वाले निर्वाह भत्ते की राशि देने का साहस कर लें तो एक बार गिरफ्तार हो कर जमानत पर छूटने के बाद इस लड़ाई को आगे ले जा सकते हैं।

क तीसरा मार्ग यह है कि किसी तरह अपनी रिश्ते की साली का विवाह करा दें और पत्नी व बच्चे को ला कर अपने साथ रखें और साली व उस के परिवार को उन के हाल पर छोड़ दें। पर यह भी न होने वाला है क्यों कि साली इस के लिए तैयार नहीं है।

प के तीनों में से एक मार्ग चुनना है। यह आप के ऊपर है कि आप क्या चुनते हैं। लेकिन इतना समझ लें कि कानून, अदालत और पुलिस दमन का औजार बन कर रह गए हैं। उन का उपयोग आप अत्याचारियों को सजा दिलाने के लिए कर सकते हैं तो आप का साला और ससुर भी उन का उपयोग आप के और आप की रिश्ते की साली व उस के परिवार के दमन के लिए कर सकते हैं। परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन इन औजारों का उपयोग करने में बाजी मार ले जाएगा।  इस तरह की समस्याओं का अंत तो समाज में मूल्यों में परिवर्तन से ही संभव है जो अभी बहुत दूर दिखाई पड़ता है।

पुलिस तथा प्रशासन केवल समर्थों की मदद करते हैं

November 11, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
समस्या-

सीहोर, मध्यप्रदेश से देवेन्द्र चौहान से पूछा है-

मैं ने हनमत से 2009 में पंजीकृत वि‍क्रय पत्र से जमीन खरीदी तथा वि‍क्रेता से जमीन का कब्‍जा भी ले लि‍या, नामान्तरण भी हो गया।  चूंकि भूमि सडक के कि‍नारे थी तो कई लोगों का हि‍त था।  वे सभी लोग जमीन बेचने के लि‍ए दबाब बनाने के लि‍ए कि‍सी न कि‍सी प्रकार का विवाद रोज करने लगेा।  वे सभी लोग गांव के सम्‍पन्‍न तथा राजनीतिक दखल वाले व्‍यक्ति हैं।  फसल मेरे द्वारा बोई गर्इ।  काटते समय वि‍वाद कि‍या।  मैं थाने गया, धारा 145 का प्रकरण बनाया।  पुलि‍स तथा पटवारी की मि‍ली भगत से कब्‍जा उनका लि‍ख गया और फसल प्रति‍वादी को देने का फैसला कि‍या।  एसडीएम द्वारा मुझे ही सलाह दी गई कि धारा 250 भू राजस्‍व अधिनियम के तहत कब्‍जा लो।  तहसीलदार ने मौके पर कब्‍जा दि‍लाया। मैं ने आदेश 39 नियम 1, 2 सिविल प्रक्रिया संहिता का दीवानी वाद दायर कि‍या कि मेरे आधि‍पत्‍य में हस्‍ताक्षेप न करे।  पुलिस तथा प्रशासन कि‍सी प्रकार की मदद नहीं करता।  मामला अदालत में है।  थाने में कोई सुनवाई नहीं करते हैं। राजस्‍व का मामला है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

मारे देश में कहा तो यह जाता है कि कानून का राज है।  लेकिन अदालतें केवल आदेश और निर्णय करती हैं। उन की पालना पुलिस और सामान्य प्रशासन द्वारा ही संभव है। यदि पुलिस और सामान्य प्रशासन न्यायालयों के आदेशों का पालन न करें तो किसी भी व्यक्ति के लिए अपनी संपत्ति बचाना दुष्कर हो जाता है।  देश में सामान्य प्रशासन और पुलिस दोनों ही पूंजीपतियों, व्यापारियों और जमींदारों के पक्ष में काम करते हैं। संविधान और कानून प्रदत्त अधिकार इन के सामने निरीह साबित होते हैं। इस स्थिति को केवल तब बदला जा सकता है जब कि श्रमजीवियों और किसानों के मजबूत जनतांत्रिक संगठन मौजूद हों और वे राजनीति को प्रभावित करने की स्थिति में आ जाएँ।  लेकिन यह स्थिति अभी नहीं है।

फिर भी नागरिकों को अपने अधिकारों के लिए लड़ाई को नहीं छोड़ना चाहिए। आप ने अब तक जो कानूनी कार्यवाही की है वह बिलकुल सही की है। इसी रास्ते से आप को राहत मिल सकती है।  आप ने जो मुकदमा आदेश 39 नियम 1, 2 सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत किया है उस में निषेधाज्ञा जारी करानी चाहिए। इस के बाद पुलिस के लिए आप के कब्जे में दखल करने वालों के विरुद्ध कार्यवाही कर सकना कठिन होगा। इस के अतिरिक्त आप को स्थानीय जन संगठन जो कि मानवाधिकारों और नागरिकों के सिविल अधिकारों के लिए काम करते हैं उन का भी साथ प्राप्त करना चाहिए। जब आप के साथ कोई संगठन खड़ा होगा तो आप के विरुद्ध खड़े लोग भी आसानी से आप के कब्जे में हस्तक्षेप करने से डरेंगे। इस के अतिरिक्त आप अपने विरुद्ध होने वाली प्रत्येक घटना को मीडिया तक अवश्य पहुँचाएँ। मीडिया ने यदि आप के मामले में सचाई को सब के सामने रखना आरंभ किया तो भी आप का पक्ष मजबूत होगा। पुलिस प्रशासन केवल समर्थों की मदद करती है। आप जैसे लोगों के अपने मजबूत जनतांत्रिक संगठन हों तो पुलिस और सामान्य प्रशासन को कानून की पालना करने पर मजबूर होना होगा।

समस्या-

ठाणे, महाराष्ट्र से गुड्डू यादव ने पूछा है –

मुझे एक वरिष्ठ पुलिस उपनिरीक्षक द्वारा फँसाया और मारा व पीटा गया है।  रात 9 बजे की घटना है,  मेरे घर के नजदीक पुलिस स्टेशन है, वहाँ पर रात्रि को रामलीला हो रही थी।  मैं अपने दोस्त के साथ घर आ रहा था, रास्ते में पुलिस स्टेशन आया तब वहाँ पर रामलीला चल रही थी और बहुत भीड़ थी।  उसी समय मेरे दोस्त ने जोर से चिल्लाकर कह दिया कि “जागते रहो” इतने में वहाँ ड्यूटी पर उपस्थित वरिष्ठ पुलिस उप निरीक्षक ने सुन लिया।  उस समय उन्होंने कुछ भी नहीं किया।  जब हम लोग वहाँ से कुछ दूर चले गए तो पुलिस साहेब ने कुछ कांस्टेबल को भेजकर मुझे और मेरे दोस्त को बुलाया और पुलिस स्टेशन में अन्दर ले जाकर मारने लगे।  वे कह रहे थे कि पुलिस वालों का मजाक उड़ाते हो और कहते हो “जागते रहो”।  हम ने कहा कि हम लोगों ने आपको देखकर नहीं कहा था, तो उन्हें और गुस्सा आ गया।   फिर तो वे डंडे और लात (पैर) से मारने लगे।  कुछ समय के बाद वे हमें पुलिस हेड ऑफिस में ले गये,  ले जाते समय पुलिस गाड़ी में 3 स्टार पुलिस अधिकारी  भैया और यू पी वाला कहकर हमें गाली देने लगा।  कह रहा था कि तुम्हारे नाम पर ऐसी शिकायत (एफ.आइ.आर.) दर्ज करेंगे कि कहीं तुम भैया लोगों को नौकरी भी नहीं मिलेगी।  तुम लोग चरित्र सर्टिफिकेट के लिए यहाँ आओगे तब देख लेंगे, कैसे मिलता है?  यह सब कहकर और माँ-बहन की अश्लील गालियाँ देकर महिला पुलिस के सामने मजाक उडाते रहे और हमें डराते रहे।  इसके बाद जब हमें पुलिस स्टेशन ले गए तो रात के 1:30 बजे तक हमारे खिलाफ कोई शिकायत नहीं लिखी और हमें लॉकअप में बंद करके रखा।  जब हमारे परिवार वाले वहाँ पहुँचे तो उनके साथ बड़े कठोर बर्ताव किया।  कह रहे थे कि सालों को कहीं नौकरी भी नहीं मिलेगी।  अंतत: रात को 2:00 बजे मुझे और मेरे दोस्त को 1250-1250 रुपये का दंड वसूल कर के छोड़ दिए और उसकी रसीद भी दी।  परन्तु मेरा कहना यह है कि हमने उस वरिष्ठ अधिकारी को देखकर ऐसा कुछ नहीं कहा।  हमने माफी भी मांगी, पर अधिकारी सुनने को तैयार नहीं थे।  उन्होंने हमारे खिलाफ धारा 112/117 के अंतर्गत शिकायत दर्ज करके छोड़ दिया है और कोर्ट में जाने के लिए कहा है।

1) मैं आप से ये जानना चाहता हूँ कि मैं ऐसे वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ अपनी शिकायत कहाँ और कैसे दर्ज कराऊँ?  उसका प्रारूप क्या होगा? जैसा कि वरिष्ठ अधिकारी को “जागते रहो” बात से चिढ़ आ गयी थी, जिसका मतलब है कि वो अपने ड्यूटी पर सो रहे थे और हमने उनके सोने पर मजाक उड़ाया है।  अतः मुझे ये बताइए कि क्या “जागते रहो” एक गाली है?  या पुलिस वालों के लिए अपमान जनक (सूचक) शब्द है?  यदि ऐसा नहीं है तो कल भविष्य में इन्कलाब जिंदाबाद¡  वन्दे मातरम¡ और भारत माता की जय¡ जैसे स्लोगन कहने पर भी पुलिस स्टेशन जाना पड़ेगा?

2)मुझे कोर्ट में हाजिर होना है अतः मुझे ये बताइए कि क्या मैं इस शब्द को लेकर अपना गुनाह कबूल करूँ या मैं उस अधिकारी के खिलाफ शिकायत दर्ज करुँ?

3) उस अधिकारी ने मुझे पुलिस स्टेशन में लातों से मारा है मुझे अपमानित किया।  क्या मैं इसके साथ अपनी मानहानि का दावा बिना किसी वकील के कर सकता हूँ?

4) क्या मुझे अपने बचाव के लिए सरकारी वकील मिल सकता है?

5) क्या लात से मारना हमारे मानव अधिकार की अवहेलना नहीं है? यदि है तो क्या इसकी शिकायत मानवाधिकार आयोग को की जा सकती है?

6) क्या वरिष्ठ अधिकारी माँ-बहन की कठोर गाली देकर अपमानित करे तो उसे सहन कर लेना चाहिये?

7)पुलिस द्वारा झूठे मामले में फँसाने की धमकी देने के बारे में कैसे और कहाँ शिकायत दर्ज करानी चाहिये?

8) क्या मैं बचाव के लिए पुलिस स्टेशन में लगे सीसीटीवी  कैमरे की फुटेज सूचना के अधिकार के अंतर्गत ले सकता हूँ?

समाधान-

प के साथ जो व्यवहार पुलिस ने किया है वह केवल निन्दनीय तो है ही। इस मामले में लिप्त पुलिस कर्मियों के विरुद्ध कार्यवाही भी होनी चाहिए।  किसी भी पुलिस अधिकारी को किसी नागरिक के साथ इस तरह का व्यवहार करना उचित ही नहीं अपराधिक भी है। लेकिन आप ने जो विवरण दिया है उस में कुछ बातें समझ नहीं आई हैं। आप पर धारा 112/117 बोम्बे पुलिस अधिनियम का आरोप लगाया गया है। इस मे मात्र जुर्माने का प्रावधान है जो आप से वसूल लिया गया है। इस के बाद भी आप को पुलिस ने अदालत में किस बात के लिए उपस्थित होने को कहा है? यह स्पष्ट नहीं हुआ है। हाँ आप से जुर्माना वसूल किया है उसे आप गलत मानते हैं तो आप उस के विरुद्ध न्यायालय में जा सकते हैं। आप के प्रश्नों के उत्तर निम्न प्रकार हैं-

1. आप पुलिस अधिकारी के विरुद्ध इलाके के पुलिस सुपरिण्टेंडेंट को या आई.जी. पुलिस को शिकायत कर सकते हैं। इसे आप रजिस्टर्ड डाक से भेज दें। घटना की जाँच होगी।

2. आप को अदालत में गुनाह कबूल करने की आवश्यकता नहीं है।  जब आप ने कुछ नहीं किया है तो आप को उस का प्रतिवाद करना चाहिए। न्यायालय जो भी आदेश दे यदि उसे गलत समझें तो आगे अपील करें।

3. यह मानहानि का नहीं अपमानित करने और मारपीट करने का मामला है। इस मामले में आप को न्यायालय में व्यक्तिगत परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

4.यदि आप की आमदनी कम है तो आप अपने जिला न्यायालय में स्थित विधिक सहायता केंद्र में निशुल्क वकील उपलब्ध कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

5. आप मानवाधिकार आयोग को शिकायत कर सकते हैं।

6. बिलकुल सहन नहीं करना चाहिए, प्रतिरोध करना चाहिए। किन्तु पुलिस पूरी व्यवस्था का एक अंग है। उस का प्रतिरोध अकेले नहीं किया जाना चाहिए। यह वैसा ही है जैसे एक बड़े गिरोह से एक साहसी व्यक्ति अकेला टकरा जाए। आप को व्यवस्था से सदैव ही समूह बद्ध हो कर मुकाबला करना चाहिए। आप को इस मामले में अपने क्षेत्र के सिविल राइट्स के लिए काम करने वाले जन संगठनों के साथ जुड़ना चाहिेए और उन के माध्यम से प्रतिवाद करना चाहिए।

7. इस प्रश्न का उत्तर पहले प्रश्न के साथ दिया जा चुका है।

8. पुलिस स्टेशन के सीसीटीवी कैमरे में कुछ नहीं मिलेगा। कैमरा उस समय बंद रहा होगा। पुलिस वाले मूर्ख नहीं हैं जो आप के साथ सीसीटीवी कैमरे के सामने मारपीट और अभद्र व्यवहार करेंगे। सीसीटीवी कैमरे में कुछ दर्ज हुआ भी होगा तो उसे हटा दिया गया होगा। फिर भी इस के लिए आप सूचना के अधिकार के अंतर्गत सूचना अधिकारी, कार्यालय एसपी, पुलिस को आवेदन कर सकते हैं।

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