Indian Penal Code Archive

अपराधिक केस फर्जी होने पर प्रतिरक्षा करना ही उपाय है।

December 21, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जितेन्द्र ने शैखपुरा बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे विरुद्ध एक सरकारी कर्मचारी द्वारा धारा 341, 323, 353, 379, 504, 506/34 में एक फर्जी केस दर्ज करवा दिया है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

जितेन्द्र जी,

प के विरुद्ध मुकदमा हुआ है। केवल आप जानते हैं कि वह फर्जी है। बाकी पुलिस ने तो गवाही और सबूतों के आधार पर ही आरोप पत्र प्रस्तुत किया होगा। इस का एक ही इलाज है कि आप इस मुकदमे में अच्छा वकील करें और अपनी प्रतिरक्षा करें। यदि यह सिद्ध हो जाता है कि यह एक फर्जी मुकदमा है तो आप न्यायालय से यह निवेदन कर सकते हैं कि उक्त मामले में फर्जी मुकदमा दर्ज कराने वाले कर्मचारी के विरुदध कार्यवाही की जा कर उसे सजा दी जाए।

यदि आप इस मुकदमे में बरी हो जाते हैं तो आप दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के लिए हर्जाना प्राप्त करने के लिए उक्त सरकारी कर्मचारी के विरुदध दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

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गिरफ्तार कर लिए जाने पर जमानत अदालत से ही होगी।

August 16, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_police-station2.jpgसमस्या-

संदीप ने सतना, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरे भाई को पुलिस ने चोरी के इल्जाम में गिरफ्तार कर लिया है आपसी रंजिश की वजह से। दो और लड़कों को गिरफ्तार किया है लेकिन वे बोलते हैं कि इसी ने चोरी की है। मैं अपने भाई को छुड़ाने के लिए क्या कर सकता हूँ। पुलिस मेरे भाई को कितने दिन में अदालत में पेश करेगी? भाई को बरी करवाने के लिए मुझे क्या करना पड़ेगा?

समाधान-

किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के बाद 24 घंटों की अवधि में मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक है। यदि गिरफ्तार व्यक्ति से पूछताछ की और बरामदगी आदि की जरूरत हो तो मजिस्ट्रेट पुलिस हिरासत की अवधि बढ़ा सकती है। यदि इन दोनों की जरूरत समाप्त हो चुकी हो तो मजिस्ट्रेट उसे न्यायिक हिरासत में ले कर जेल भिजवा देता है। जब तक न्यायिक हिरासत में गिरफ्तार व्यक्ति न आ जाए तब तक उस की जमानत की अर्जी पर कोई विचार नहीं किया जा सकता।

आप को पता करना चाहिए कि आप के भाई को गिरफ्तार भी किया है या नहीं? या फिर केवल पूछताछ के लिए थाने में बिठा रखा है? गिरफ्तार कर लिए जाने पर तो जमानत अदालत से ही होगी।

यदि पुलिस स्पष्ट जवाब नहीं देती है तो संबंधित मजिस्ट्रेट के यहाँ आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है और मजिस्ट्रेट पुलिस से रिपोर्ट मंगा सकता है।

आप को अपने तईँ यह भी पता करना चाहिए कि वाकई में आप के भाई की चोरी की वारदात में कोई भूमिका तो नहीं है?

फिर भी आप को किसी स्थानीय फौजदारी मामलों के वकील की मदद प्राप्त करनी चाहिए। वह आप के भाई की जमानत करवा सकता है। एक बार जमानत पर छूट जाने पर आप का भाई स्वयं अपने मामले को देख सकता है।

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समस्या-Havel handcuff

शीलू ने उन्नाव, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरा एक लड़के से कई दिनों से अफेयर चल रहा था। पहले उसने मेरे साथ जबरदस्ती की थी। लेकिन बाद में उसने कहा कि वह उससे शादी कर लेगा। लेकिन 2 से 3 साल बीत जाने पर अब वह मना कर रहा है। वह कह रहा है कि जो करना है कर लो वह शादी नहीं करेगा। उसके घर वालो को सब पता है। मुझे शुरू से बहुत डरा धमका रहा है इसलियें मैंने अपने घर में सबको नहीं बताया है। मेरी अपेक्षा वह पैसे वाला भी है। अब वह मुझको डराकर अपने दास्तों से सम्बन्ध बनाने के लिये कह रहा है। घर पर मैंने अपने भाई से बताया है तो वह कह रहा है कि चुपचाप रहो और मैं लड़का देखकर कहीं और शादी कर दूंगा।  नहीं तो सब जगह अपनी ही बदनामी होगी। उसके पास पैसा है उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। वह अच्छा वकील कर के छूट जायेगा।  लेकिन मैं अब उसी लड़के से शादी करना चाहती हूँ क्या करूँ। अगर कुछ हल नहीं निकला तो मैं आत्महत्या कर लूंगी।  मेरी मदद करें।

समाधान-

म उन लोगों की बात का कोई उत्तर नहीं देते जो अपने प्रश्न में यह कहते हैं कि हल न निकला तो आत्महत्या कर लूंगा/ लूंगी। इस प्रश्न का उत्तर इस कारण दे रहा हूँ कि इस तरह का प्रश्न पहली बार हमारे पास आया है।

आप के कहने से पता लगता है कि उस लड़के ने कभी आप से प्रेम नहीं किया। उस ने पहले आप के साथ जबर्दस्ती की। फिर समाज में प्रचलित इस धारणा का कि जिस लड़की के साथ किसी ने बलात्कार कर दिया वह विवाह और परिवार में रहने लायक नहीं होती, दुरूपयोग करते हुए आप को धमकाया साथ में आप को विवाह का लालच दिया। आप भी यही समझती हैं कि बलात्कार की इस श्रंखला को छुपाना ही श्रेयस्कर है आप ने भी अपने शोषण को स्वीकार कर लिया। अब उस लड़के ने पीठ दिखा दी है। वह समझता है कि आप में अब इतना नैतिक साहस शेष नहीं है कि आप पुलिस में बलात्कार की इस श्रंखला की शिकायत कर सकें। इस कारण वह अकड़ गया है।

यह सब कथानक यह बताता है कि वह लड़का आप से कभी प्रेम नहीं करता था। ऐसा व्यक्ति कभी किसी से प्रेम नहीं कर सकता। क्यों कि जो व्यक्ति किसी लड़की का बलात्कार कर सकता है और उसे धमका कर और लालच दिखा कर बलात्कार को जारी रखता है वह कभी किसी से प्रेम करने लायक हो ही नहीं सकता। वह आप का ही नहीं अपितु समस्त स्त्री समुदाय का अपराधी है, इस समाज का अपराधी है उस की शिकायत होनी चाहिए और उसे दंडित होना चाहिए।

आप के भाई का सुझाव भी जैसा हमारा समाज है वैसा ही है। अक्सर ऐसी घटनाओं की शिकार लड़कियों में से 99 प्रतिशत लड़कियाँ यही करती हैं कि वे चुपचाप विवाह कर अपनी ससुराल चली जाती हैं और सारा जीवन इस भय में गुजार देती हैं कि उन के पति को या ससुराल वालों को या अन्य किसी को उन के जीवन का यह अंधेरा पता न लगे।

यदि आप उस लड़के के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट कराती हैं तो उस का पैसा भी उसे नहीं बचा पाएगा। उस के विरुद्ध बलात्कार और ब्लेकमेल करने के अपराध में मुकदमा भी चलेगा और उसे सजा भी मिलेगी। अभी आप उस लड़के के चंगुल में हैं, जब वह चंगुल में फंसेगा तो दस बार आप के सामने विवाह के लिए नाक रगड़ेगा। हमारा सुझाव है कि आप को उस लड़के के विरुद्ध पुलिस रिपोर्ट करना चाहिए और उसे दंडित कराना चाहिए। यदि आप पूरी मुस्तैदी से यह काम करती हैं तो आप समाज का भला करेंगी, उन तमाम स्त्रियों के हक में काम करेंगी जो इस तरह शिकार बनती हैं। जब वह खुद को बचाने के लिए  पुनः विवाह का प्रस्ताव रखे तो उसे मना कर दीजिएगा, यही उस की सजा होगी। हमें विश्वास है कि आप को कोई न कोई सच्चा जीवन साथी भी मिल जाएगा जो आप के अतीत को जानते हुए भी आप के साथ पूरा जीवन बिताने को तैयार होगा।

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वकील का चुनाव ठीक से करें।

May 11, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_Desertion-marriage.jpgसमस्या-

रविन्द्र कुमार ने दिल्ली से पूछा है-

मेरे छोटे भाई का विवाह 2012 में हुआ। वो और उसकी पत्नी हमारे साथ 3 महीने रहे फिर भाई की पत्नी को को शक होने लगा की उसके सम्बन्ध भाभी के साथ है, जिस कारण मेने भाई को अलग कर दिया और अख़बार में भी निकलवा दिया कि हमारा उनसे कोई लेने देना नही है। वो तक़रीबन 3 साल अलग किराये पर रहे। दोनों का आपस में कोई विवाद हो गया और 498, 406 आईपीसी  में प्रथम सूचना रिपोर्ट हुई। अभी ये केस कोर्ट में नही लगा है। पर स्त्री धन वापसी का चल रहा है और दोनों केसों में मेरे पूरे परिवार का नाम है। सामान कोर्ट के आदेश पर वापस हो गया है। पर वो कहते हैं कि हमारा सामान लड़के के परिवार के पास है जो कि दिया ही नही गया। उन ने झूठे बिल बना के जाँच अदिकारी को दिए। विवाह में कोई वीडियो फोटो नहीं हुआ। वो और हम दोनों गरीब परिवार हैं। फिर भी तक़रीबन 10 लाख का स्त्री धन लिखा रखा है जो कि दिया ही नहीं गया।  अब मैं क्या करूँ समझ नहीं आता? हमारी अग्रिम जमानत हो चुकी है। क्या मुझे और मेरे परिवार को अरेस्ट किया जा सकता है? अगर हाँ तो मुझे क्या करना चाहिए? जो लिया ही नहीं वापस कैसे करूँ कृपया मार्गदर्शन करें।

समाधान-

ति-पत्नी में विवाद हो जाने पर 498 ए व 406 आईपीसी की शिकायत दर्ज कराना आम बात हो गयी है। ऐसी शिकायतों में कई बार केवल 10 प्रतिशत सचाई होती है। लेकिन शिकायत की है और प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होगी तो उस का अन्वेषण पुलिस को करना पड़ेगा। पुलिस अन्वेषण के दौरान जान जाती है कि कितनी सचाई है और कितनी नहीं। आम तौर पर केवल पति के विरुद्ध ऐसा मुकदमा प्रमाणित दिखाई देता है और आरोप पत्र भी उसी के विरुद्ध प्रस्तुत होता है। आप को अभी चाहिए कि आप पुलिस अन्वेषण में पूरा सहयोग करें और पुलिस को आरोप पत्र प्रस्तुत करने दें। पुलिस भी नहीं चाहती कि जिस मुकदमे में वह आरोप पत्र प्रस्तुत करे उस में अभियुक्त बरी हो जाए।

आप ने खुद लिखा है कि आप की अग्रिम जमानत हो चुकी है। इस का अर्थ है कि पुलिस आप को गिरफ्तार नहीं करेगी। बस जिस दिन आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करेगी उस की सूचना आप को देगी और आप को न्यायालय में उपस्थित हो कर जमानत करानी पड़ेगी। उस के बाद मुकदमा चलता रहेगा।

झूठे आरोपों को साबित करना आसान नहीं होता। यदि आरोप झूठे हैं तो पुलिस ही आरोप पत्र सब के विरुद्ध प्रस्तुत नहीं करेगी। यदि पुलिस ने आरोप पत्र प्रस्तुत कर भी दिया तो तो भी अभियोजन पक्ष मुकदमे को साबित नहीं कर पाएगा तो सभी लोग बरी हो सकते हैं।

आप की जरूरत सिर्फ इतनी है कि आप कोई वकील ऐसा करें जो आप के मुकदमे की पैरवी मेहनत से करे, मुकदमे पर पूरा ध्यान दे। यदि वकील ठीक हुआ तो यह झूठा मुकदमा समाप्त हो जाएगा। इस लिए आप वकील का चुनाव करने में पूरा ध्यान दें। जब भी आप को लगे कि आप का वकील लापरवाही कर रहा है या मेहनत नहीं कर रहा है तो वकील बदल लें।

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lawसमस्या-

वैभव ने जलगाँव, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मैं ने एक कांन्ट्रेक्टर को 3 लाख रुपया दिया था, मकान निर्माण के लिए। पर उस ने हमें मकान नहीं दिया और पैसे भी नही दे रहा है। उस ने पुलिस स्टेशन जाकर कंप्लेंट दी है कि इनकी वजह से मेरी जान को धोका है। पैसे मांगने पर पैसा भी नहीं दे रहा है। उसके लिए क्या करूँ?

समाधान-

प के पास कांट्रेक्टर को तीन लाख रुपया देने का कोई सबूत तो अवश्य होगा। आप किसी वकील से अथवा खुद उसे रजिस्टर्ड ए.डी. के माध्यम से एक नोटिस प्रेषित कीजिए जिस में लिखिए कि उस ने आप से मकान निर्माण करने के लिए रुपए तीन लाख एडवांस लिए थे, जिसे वह नहीं लौटा रहा है और उस धन का उस ने बेईमानी से निजी कामों में उपयोग कर लिया है जो धारा 406 आईपीसी में अपराध है। वह आप का धन 12% वार्षिक ब्याज या जो भी बाजार दर हो ब्याज सहित 15 दिनों में लौटा दे अन्यथा आप उस के विरुद्ध दीवानी और अपराधिक दोनों प्रकार की कार्यवाही करेंगे। इस नोटिस की प्रति और उस की रजिस्ट्री की रसीद तथा एडी प्राप्त हो जाए तो उसे संभाल कर रखें।

स के बाद आप किसी वकील के माध्यम से धारा 406 आईपीसी का परिवाद न्यायालय में प्रस्तुत करें और न्यायालय से आग्रह करें कि उस परिवाद को अन्वेषण हेतु धारा 156(3) दं.प्र.संहिता में पुलिस को भिजवा दिया जाए। यदि पुलिस अन्वेषण के दौरान कांट्रेक्टर आप को आप का रुपया लौटा देता है तो ठीक है अन्यथा उस के विरुद्ध या तो न्यायालय में पुलिस द्वारा आरोप पत्र प्रस्तुत किया जाएगा अथवा मामले को दीवानी प्रकृति का बताते हुए अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत होगा। यदि आरोप पत्र न्यायालय में नहीं दिया जाता है तो न्यायालय आप को सूचना दे कर न्यायालय में बुलाएगा। तब आप आपत्तियाँ प्रस्तुत कर के आप का तथा अपने गवाहों के बयान वहाँ करवाने से न्यायालय कांट्रेक्टर के विरुद्ध अपराधिक मामले में प्रसंज्ञान ले कर उस के विरुद्ध मुकदमा चला कर उसे दंडित कर सकता है।

दि आप के पास तीन लाख रुपए देने का लिखित सबूत है तो आप 3 लाख रुपया, ब्याज व न्यायालय के खर्चा प्राप्त करने के लिए कांट्रेक्टर के विरुद्ध दीवानी वाद भी संस्थित कर सकते हैं।

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rp_188157_142310595795100_543578_n.jpgसमस्या-

सीता गुप्ता ने मैसूर, कर्नाटक से समस्या भेजी है कि-

में सीता गुप्ता मैसूर निवासी हूँ। वर्ष 2000 में मेरा विवाह दिल्ली निवासी आर एस अग्रवाल के साथ हुआ था। विवाह के 4 वर्ष बाद पारिवारिक कलह के कारण मैं अपने दो बच्चों को लेकर मायके आ गयी और 125 के मुक़दमे से गुज़ारा भत्ता मुझे मिलने लगा। 2004 से मैं अपने पति से किसी संपर्क या सम्बन्ध के बिना अपने माता-पिता के पास अपने दो बच्चों उम्र 14 साल और 12 साल के साथ रह रही हूँ। मुझे पता लगा है कि मेरे पति ने किसी महिला से अपने सम्बन्ध बना लिए और उनके एक पुत्र भी है। मैंने प्रयास करके उनके पुत्र के पासपोर्ट की नक़ल प्राप्त कर ली जिसमें माता-पिता के स्थान पर मेरे पति और उस महिला का नाम लिखा हुआ है। मेरे पति और उस महिला के पासपोर्ट की नक़ल भी मुझे मिल गई है जिसमें महिला के पासपोर्ट में पति के नाम का स्थान और मेरे पति के पासपोर्ट में पत्नी के नाम का स्थान खाली है। उन दोनों के विवाह का कोई सबूत मेरे पास नहीं है लेकिन वे रहते इक्कठे ही हैं। मेरे वकील का कहना है कि उन्हों ने शादी नहीं की है वे लिव-इन-रिलेशन में रहते हैं इसलिए कोई कारवाई नहीं की जा सकती है। चूँकि, मेरे पति ने उस बच्चे को अपना नाम पासपोर्ट में दिया हुआ है तो क्या इन परिस्थितियों में मैं अपने पति के खिलाफ बायगेमी या अडलट्री या कोई अन्य केस कर सकती हूँ?

समाधान-

बायगेमी का तो कोई अपराध आप के पति के विरुद्ध नहीं बनता है। धारा 494 आईपीसी में बायगेमी का जो अपराध है उस में कोई पति किसी पुरुष के विरुद्ध तभी संस्थित कर सकता है जब दूसरे पुरुष ने उस की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाए हों।

धारा 497 में (Adultery) जारकर्म का जो अपराध वर्णित है वह भी तभी अपराध है जब कि पति या पत्नी ने अपने पति या पत्नी के रहते दूसरा विवाह कर लिया हो। यदि आप के पति किसी स्त्री के साथ लिव इन में रहते हैं तो इसे दूसरा विवाह होना नहीं कहा जा सकता। इस कारण आप धारा 497 में भी कोई परिवाद न्यायालय मे तभी दर्ज करवा सकती हैं जब कि पति ने दूसरा विवाह कर लिया हो। पति के पासपोर्ट में पत्नी का नाम और पत्नी के पास पोर्ट में पति का नाम दर्ज नहीं है लेकिन पुत्र के पासपोर्ट में पिता का नाम दर्ज है। यह लिव इन में होना संभव है।

किसी का पुत्र होने के लिए यह कतई जरूरी नहीं है कि उस के पिता का उस की माता के साथ विवाह हुआ ही हो। लिव इन रिलेशन से भी संतान का जन्म हो सकता है और उस की मां या पिता जन्म-मृत्यु पंजीयक के यहाँ पुत्र का जन्म पंजीकृत करवा सकता है। उस जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर पुत्र का पासपोर्ट बन सकता है।

ब तक आप यह सिद्ध करने की स्थिति में न हों कि आप के पति ने दूसरा विवाह कर लिया है आप यदि परिवाद करेंगी तो वह मिथ्या साबित हो सकता है और आप एक दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के मामले में फँस सकती हैं।

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अपराधिक प्रकरण का निर्णय गुणावगुण पर ही होगा।

October 27, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_judge-cartoon-300x270.jpgसमस्या-

हबीब ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 2005 में हुई थी। शादी के एक साल बाद मेरी बीवी ने मुझ पर 498ए, 406 भा.दं.संहिता तथा 125 दं.प्र.संहिता के मुकदमे लगा दिए जो आज तक चल रहे हैं। केस लगाने के तीन माह बाद मैं ने उसे लाने के लिए दिल्ली में केस भी किया। लेकिन उस ने विरोध किया और न्यायालय ने मेरे विरुद्ध उस का खर्चा बांध दिया। 2010 में मेरी पत्नी की मृत्यु उस के माता पिता के घर पर हो गयी। मरने से पहले मुकदमों में उस के बयान हो गए, लेकिन डाक्टर और पुलिस के बयान में नहीं हुए। बीवी मरने से 125 दंप्रसं का मुकदमा तो खत्म हो गया। पर 498ए व 406 भा.दं.संहिता का मुकदमा अभी भी चल रहा है। मेरे ससुर के बयान भी हो गए उन्हों ने कहा कि मुझे किसी बात का पता नहीं है। फिर भी मुझे आज महीने में दो बार बुलन्दशहर कोर्ट में जाना पड़ता है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प के विरुद्ध जो धारा 498ए व 406 भारतीय दंड संहिता का प्रकरण चल रहा है वह अपराधिक है। जिसे पुलिस के आरोप पत्र पर पंजीकृत किया गया है। इस मामले में आप की पत्नी परिवादी थी जिस के परिवाद पर यह आरंभ हुआ था। उस का बयान न्यायालय में पहले ही हो चुका है। अन्य साक्षी सभी जीवित हैं इस कारण से आप की पत्नी की मृत्यु के कारण उस मुकदमे पर कोई असर नहीं आएगा। सभी शेष साक्षियों के बयान दर्ज होने के उपरान्त गुणावगुण के आधार पर ही इस प्रकरण का निर्णय हो सकेगा।

प अपने वकील को यह कह सकते हैं कि वे आप की ओर से न्यायालय को आवेदन दें कि परिवादी का देहान्त हो चुका है और मुख्य गवाहों के बयान भी हो चुके हैं शेष गवाह औपचारिक हैं इस कारण सब को एक साथ बुला कर बयान करा दिए जाएँ जिस से इस मुकदमे का निर्णय शीघ्र हो सके। आप लगातार न्यायालय पर अभियोजन (पुलिस) की गवाही को समाप्त कराने के लिए दवाब डालेंगे तभी न्यायालय इस में गति से काम कर के मुकदमे को समाप्त कर सकेगा। तब तक आप को पेशियों पर तो उपस्थित होना पड़ेगा।

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rp_IPC-266x300.jpgसमस्या-

सीमा मिश्रा ने नवी मुंबई, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मेरी सास ने मेरे १२ साल के पुत्र को बहला फुसला कर घर रखा हुआ है और मुझे उस से बात भी नहीं करने देती। मैं यह जानना चाहती हूँ कि मैं अपने लड़के को कैसे वापस लूँ? अगर शिकायत करूँ तो कैसे करूँ? मैं कई बार सास को फ़ोन कर इस बारे में बात की पर वह मुझसे गाली गलोच करती है और लड़के से बात नहीं करने देती। मेरे पति मेरे साथ में ही हैं।

समाधान

माता पिता संतान के नैसर्गिक संरक्षक हैं, उन से उन की संतान को नहीं छीना जा सकता। यदि आप की सास आप की संतान को बहला फुसला कर अपने पास रखे हुए है और उसे आप के पास नहीं आने देती है तो आप की सास द्वारा ऐसा करना आईपीसी की धारा 361 में वर्णित व्यपहरण (Kidnapping) का अपराध है जो कि धारा 363 के अन्तर्गत सात वर्ष तक के कारावास से दंडनीय अपराध है। यह एक अजमानतीय और संज्ञेय अपराध है।

दि आप के पति आप के साथ हैं और आप की सास द्वारा संतान को उन के पास रखने के विरुद्ध हैं तो आप अपने पति के साथ जा कर सीधे अपने क्षेत्र के पुलिस स्टेशन में इस अपराध की रिपोर्ट करवा सकती हैं। यदि पुलिस आप की रिपोर्ट पर कार्यवाही करने से इनकार करती है तो आप सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं जिसे मजिस्ट्रेट जाँच हेतु संबंधित पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को निर्देशित कर सकता है।

दि आप के पति इस मामले में मौन रहते हैं तो आप अकेली भी इस कार्यवाही को कर सकती हैं।

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rp_law-suit.jpgसमस्या-

सुनील कुमार ने भोपाल, मध्यप्रदेश समस्या भेजी है कि-

मेरे भाई और उसकी पत्नी के बीच सम्बन्ध अच्छे नहीं होने की वजह से मेरे भाई ने उसे तलाक का नोटिस दिया और 2002 में न्यायालय में वाद दायर कर दिया। |उस के बाद मेरे भाई की पत्नी ने हमारे पूरे परिवार के खिलाफ दहेज़ प्रताड़ना और मारपीट का झूठा मुकदमा न्यायालय में दायर कर दिया, इसी दौरान उस ने अपने पीहर पक्ष के लोगो के साथ मिलकर हमें कई बार पुलिस की प्रताड़ना भी दी ताकि मेरा भाई तलाक की अर्जी वापस ले ले। लेकिन मेरे भाई ने ऐसा नहीं किया; और अब 2015 में दहेज़ के झूठे मामले में स्थानीय न्यायालय का फैसला आ गया जिस में पूरे परिवार को बरी कर दिया गया और माननीय न्यायालय ने उसे झूठा मुकदमा करार दिया। अब मैं आपसे सलाह लेना चाहता हूँ कि क्या मैं अपने भाई की पत्नी और उसके पीहर पक्ष वालों के खिलाफ मानहानि का दावा कर सकता हूँ। क्योंकि पूरे सात वर्ष तक हम पूरे परिवार वाले लगातार परेशान रहे, दावे की क्या प्रक्रिया होगी, क्योंकि मेरे भाई की पत्नी ने सारा झूठा मुकदमा और पुलिस प्रताड़ना अपने पीहर वालो की मदद और मिलीभगत से किया था?

समाधान-

ब यह प्रमाणित हो गया है कि मुकदमा झूठा था तो आप अब दो काम कर सकते हैं। एक तो आप और वे सभी लोग जिन्हें इस मुकदमे में अभियुक्त बनाया गया था, दुर्भावना पूर्ण अभियोजन तथा मानहानि के लिए क्षतिपूर्ति का दावा कर सकते हैं। इस के लिए आप को न्यायालय में साबित करना होगा कि 1. आप को मिथ्या रूप से अभियोजित किया गया था, 2. उक्त अभियोजन का समापन होने पर आप को दोष मुक्त कर दिया गया है, 3. अभियोजन बिना किसी उचित और उपयुक्त कारण के किया गया था, 4. अभियोजन करने में दुर्भावना सम्मिलित थी और 5. आप को उक्त अभियोजन से आर्थिक तथा सम्मान की हानि हुई है। आप को उक्त मुकदमे की प्रथम सूचना रिपोर्ट, आरोप पत्र तथा निर्णय की प्रमाणित प्रतियों की आवश्यकता होगी इन की दो दो प्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त कर लें। जितनी राशि की क्षतिपूर्ति के लिए आप दावा प्रस्तुत करेंगे उस पर आप को न्यायालय शुल्क नियम के अनुसार देनी होगी। प्रक्रिया दीवानी होगी और वैसे ही चलेगी जैसे क्षतिपूर्ति के लिए दीवानी वाद की होती है।

स के अतिरिक्त आप उक्त दस्तावेजों के साथ साथ मिथ्या अभियोजन व मानहानि के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 211 व 500 में परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। इस पर प्रसंज्ञान लेने और अपराधिक मुकदमे की तरह प्रक्रिया पूर्ण हो कर न्यायालय निर्णय प्रदान करेगा। इस में मिथ्या अभियोजन करने वाले दो वर्ष तक के कारावास और अर्थदंड की सजा हो सकती है। आप को इन दोनों ही कार्यवाहियाँ करने के लिए किसी स्थानीय वकील की सेवाएँ प्राप्त करना होगा।

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सामान्य आशय और धारा-34 भारतीय दंड संहिता

May 12, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_Lady-Justice.jpgसमस्या-

धर्मेन्द्र बट्ट ने दमोह, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

भारतीय दण्ड संहिता की धारा ३४ क्या है? इस के अंतर्गत दर्ज अपराध में क्या सजा और क्या जुर्माने का प्रावधान है?

समाधान-

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 का मूल पाठ निम्न प्रकार है-

34. सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किए गए कार्य–जबकि कोई आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा अपने सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया जाता है, तब ऐसे व्यक्तियों में से हर व्यक्ति उस कार्य के लिए उसी प्रकार दायित्व के अधीन है, मानो वह कार्य अकेले उसी ने किया हो।

धारा-34 भारतीय दण्ड संहिता के मूल पाठ को पढ़ने के उपरान्त आप को यह तो समझ आ गया होगा कि इस धारा में किसी विशिष्ट अपराध का वर्णन नहीं है और किसी विशेष दण्ड का प्रावधान भी नहीं है। यह धारा सामान्य आशय से एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा संपन्न किए गए अपराधों के संबंध में है। यदि दो या दो से अधिक व्यक्ति कोई कार्य संयुक्त रूप से करते हैं तो विधि के अंतर्गत स्थिति वही होगी कि मानो उन में से प्रत्येक के द्वारा वह कार्य स्वयं व्यक्तिगत रूप से किया गया है।

दाहरण के रूप में चार व्यक्ति मिल कर किसी को चोट पहुँचाना चाहते हैं और इस के लिए वे अपने स्थान से रवाना हो कर वहाँ पहुँचते हैं जहाँ वह व्यक्ति मौजूद है, जैसे ही वह व्यक्ति दिखाई पड़ता है उन चारों में एक व्यक्ति लाठी से उस के सिर पर हमला करता है, वह व्यक्ति लाठी को सिर पर पड़ने से बचाने के लिए हाथ पर झेल लेता है और चार व्यक्तियों को सामने देख कर चिल्लाते हुए भाग लेता है। जब तक हमलावर उसे पकड़ पाएँ आस पास के लोग इकट्ठे हो जाते हैं जिन्हें देख कर चारों हमलावर भाग लेते हैं। यहाँ चोटिल व्यक्ति को चोट पहुँचाने का कार्य एक व्यक्ति ने ही किया है इस कारण केवल उसी ने धारा 323 आईपीसी का अपराध किया है, लेकिन अन्य तीन व्यक्ति उस व्यक्ति को चोट पहुँचाने के उददेश्य से साथ थे इस कारण वे तीनों भी लाठी से हमला करने वाले के समान ही अपराधी हैं क्यों कि उन का सामान्य आशय एक ही था। उन पर जब अभियोग चलाया जाएगा तो धारा 323 के साथ धारा 34 भी आरोपित की जाएगी। यदि उस अभियोग में सभी को दंडित किया गया तो सभी को उसी व्यक्ति के समान दंड मिलेगा जैसा कि लाठी से हमला करने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाएगा।

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