Indian Evidence Act Archive

बँटवारा कैसे किया जाए?

August 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

नटवर साहनी ने गोबरा नवापारा, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

क्या पैतृक सम्पति का बँटवारा करवाने पर बटवारा करने वाला जीवित न रहने पर मान्य रहता है?  क्या बटवारा नामा बिना पंजीकृत मान्य रहता है? क्योंकि वह पंजीकृत करवाने में असहाय है।

समाधान-

किसी भी साझी संपत्ति का बँटवारा आपसी सहमति से हो सकता है। यदि साझीदार या परिवार किसी एक व्यक्ति के द्वारा सुझाए गए बंटवारे पर सहमत हों तो वैसे भी किया जा सकता है। पर सभी साझीदारों की सहमति जरूरी है। एक बार बँटवारा हो जाने पर और सब के अपने अपने हिस्से पर काबिज हो जाने पर एक लंबे समय तक स्थिति वैसे ही बने रहने पर उस बँटवारे को चुनौती देना संभव नहीं होता है।

यह बँटवारा मौखिक हो कर बँटवारे के अनुसार संपत्ति का कब्जा सब को मिल जाने पर उस का निष्पादन हो जाता है। बँटवारे के कुछ समय बाद चाहेँ तो सारे साझीदार बँटवारे का स्मरण पत्र लिख कर उस पर सभी के हस्ताक्षर और गवाहों के हस्ताक्षर करवा कर उसे नौटेरी से प्रमाणित करा कर रख सकते हैं इसे भविष्य में किसी भी  मामले में साक्ष्य में प्रस्तुत किया जा सकता है।

बँटवारा यदि लिखित में होता है तो उस का पंजीकृत होना आवश्यक है, यदि वह पंजीकृत न हुआ तो भविष्य में साक्ष्य में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में उस दस्तावेज का कोई महत्व नहीं रह जाता है।

बेहतर यह है कि बँटवारा पंजीकृत हो। यदि नहीं होता है तो बँटवारा मौखिक हो और बँटवारे के मुताबिक संपत्ति पर पृथक पृथक कब्जे दे दिए जाएँ और उस के बाद बँटवारे का स्मरण पत्र नौटेरी से निष्पादित करा लिया जाए तो वह पर्याप्त है।

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समस्या-

भावेश जैन ने उदयपुर, राजस्थान से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-


किसी डॉक्यूमेंट की फ़ोटो कॉपी को जो कि प्रमाणित नहीं है न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है क्या? द्वितीय पक्षकार इस पर किस प्रकार आपत्ति दर्ज करवा सकता है?


समाधान-

भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अन्तर्गत केवल मूल दस्तावेज ही साक्ष्य में ग्राह्य हैं। एक दस्तावेज की फोटो कापी प्रस्तुत की जा सकती है लेकिन उसे साक्ष्य में सीधे ग्रहण नहीं किया सकता उसे प्रदर्शित नहीं किया जा सकता।

कोई भी फोटो कापी हमेशा किसी मूल दस्तावेज की होती है। आप को न्यायालय को यह बताना होगा कि यह मूल दस्तावेज कहाँ निष्पादित हुआ था और वह किस के कब्जे में होना चाहिए। जिस के कब्जे में मूल दस्तावेज हो उस से उस दस्तावेज को न्यायालय के सामने लाना चाहिए। यदि मूल दस्तावेज यदि मुकदमे के किसी पक्षकार के कब्जे में होने की संभावना हो तो आप न्यायालय को यह आवेदन कर सकते हैं कि उस पक्षकार से कहा जाए कि वह न्यायालय के समक्ष शपथ पर यह प्रकट करे कि वह दस्तावेज उस के कब्जे में है या नहीं है। यह आवेदन सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 नियम 12 में प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि पक्षकार प्रकट करता है कि उस के कब्जे में दस्तावेज है तो न्यायालय आदेश 11 नियम 14 में उस पक्षकार को मूल दस्तावेज न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है।

यदि ऐसा मूल दस्तावेज मुकदमे के पक्षकार से भिन्न किसी व्यक्ति के शक्ति और आधिपत्य में हो तो न्यायालय यह समझे कि दस्तावेज का मुकदमें के निर्णय के लिए उस के सामने लाया जाना आवश्यक है तो न्यायालय उस व्यक्ति को वह दस्तावेज ले कर न्यायालय में उपस्थित होने का समन भेज सकता है।

यदि किसी भी तरह ऐसा मूल दस्तावेज नहीं मिल रहा हो तो यह माना जाएगा कि वह नष्ट हो चुका है वैसी स्थिति में न्यायालय धारा 65 साक्ष्य अधिनियम के अन्तर्गत फोटो प्रति को एक द्वितीयक साक्ष्य के रूप में साक्ष्य में ग्रहण करने की अनुमति दे सकता है।

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वीडियोग्राफ महत्वपूर्ण साक्ष्य

June 18, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_rapevictim.jpgसमस्या-

किशन ने सिरसा, हरियाणा से पूछा है-

क्या एक वीडियोग्राफ किसी रिश्वत के मुकदमे में एक अधिकारिक रिकॉर्ड है?

समाधान-

क वीडियोग्राफ एक इलेक्ट्रोनिक रिकार्ड है और इसे एक सबूत के रूप में साक्ष्य अधिनियम द्वारा मान्यता दी गयी है। इस कारण न केवल रिश्वत के मुकदमे में अपितु सभी अपराधिक मामलों में और दीवानी मामलों में भी कोई वीडियोग्राफ तथा अन्य कोई भी इलेक्ट्रानिक रिकार्ड एक दस्तावेज के रूप में ग्रहण किए जाने वाला दस्तावेजी सबूत है।

लेकिन आप को यह भी जान लेना चाहिए कि कोई भी रिकार्ड केवल मात्र एक सबूत है। उसे पहले साबित करना पड़ेगा कि किस इन्स्ट्रूमेंट द्वारा किस तरह और किस ने उसे रिकार्ड किया है, उस का समय क्या है आदि आदि। यह सब साबित करने के लिए विभिन्न साक्षियों के बयान भी कराने होंगे। एक मात्र सबूत से कभी अपराध साबित नहीं होता है। अपराध को संदेह से परे साबित करना होता है और इस के लिए सभी जरूरी साक्ष्य प्रस्तुत करना अनिवार्य है। 

इस लिए यह कहा जा सकता है कि वीडियोग्राफ एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है लेकिन किसी भी मामले को अकेले इस साक्ष्य से साबित नहीं किया जा सकता।

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स्वयं को अपने वास्तविक पिता की पुत्री कैसे प्रमाणित करें?

September 4, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_law-suit.jpgसमस्या-

रेनू ने जालोर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम रेनू है। मेरे पिताजी का स्वर्गवास मेरी 5 दिन की आयु में हो गया था। मैं उनकी इकलौती संतान हूँ। मेरी माँ मन्जू देवी मेरे साथ 7 वर्ष तक साथ रही बाद में उन्होंने मुझे ननिहाल छोड़कर नाता विवाह कर लिया। मेरी पढ़ाई कक्षा दूसरी तक मेरे पैतृक शहर ब्यावर में हुई थी। मेरे बड़े पिताजी मदनलाल जी ने मेरे स्कूल में दाखिला करवाते समय मेरे पिताजी ओम प्रकाश जी के स्थान पर खुद का नाम मदन लाल लिखवा दिया था। कक्षा 3 से 10 तक पढ़ाई मेरे ननिहाल सोजत सिटी में हुई। मेरे नानाजी ने कक्षा 10 बोर्ड के फॉर्म में मेरे वास्तविक पिताजी ओम प्रकाश जी का नाम लिखवाने के लिए मेरी माँ मन्जू देवी से उस समय शपथ पत्र भी लिखवाया। परन्तु स्कूल हेडमास्टर ने मेरे बड़े पिताजी मदन लाल जी से पिताजी के नाम परिवर्तन के लिए शपथ पत्र लिखवाने के लिए कहा, तब मेरे बड़े पिताजी मदनलाल जी ने शपथ देने से इनकार कर लिया। इस तरह मेरे वास्तविक पिताजी का नाम ओम प्रकाश मेरे शैक्षणिक दस्तावेजो में कहीं इन्द्राज नहीं हुआ। मैं कक्षा 11 व् 12 मेरे पैतृक शहर ब्यावर में मेरे दादाजी व् दादाजी के पास पढ़ी। मेरी शादी 1997 मेरे दादाजी और दादीजी ने मेरे पैतृक मकान ब्यावर में ही करवाई। मेरे विवाह कार्ड मेरे पिताजी का नाम ओम प्रकाश जी लिखवाया। मुझे 5 दिसम्बर 2009 को जानकारी मिली कि मेरे बड़े पिताजी ने मेरी पैतृक जायदाद बेचने का सौदा कर रहे है। उपरोक्त जायदाद के मालिक मेरे पिताजी के दादाजी हैं। कभी कानूनन बँटवारा भी नही हुआ है। मैं ने मेरे बड़े पिताजी स्व. मदनलाल जी की पत्नी यानि मेरी बड़ी माँ से व्यक्तिगत सम्पर्क कर उन से मेरे पिताजी के हिस्से की रकम की मांग रखी। तो उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया। तब मैं ने उक्त जायदाद पर मेरे अधिकार की आम सूचना 16 दिसम्बर 2009 को समाचार पत्र में प्रकाशित करवाई। 21 दिसम्बर 2009 को सिविल न्यायालय में बेचान पर रोक और परिवार की सदस्या होने की वजह से जायदाद को प्रथम खरीदने का अवसर मुझे मिले इस का वाद दायर किया। जिस के समन का जवाब मेरे बड़े पिताजी के परिवार ने 22 दिसम्बर 2009 को कोर्ट में दिया कि वो मुझे नहीं जानते हैं और मेरी पुश्तैनी जायदाद को मेरे परिवार वालों ने 30 दिसम्बर 2009 को ब्यावर के पास मसूदा जाकर रजिस्टर्ड बेचान कर लिया। मैं ने कोर्ट में मेरे स्व पिताजी ओम प्रकाशजी की हिस्से की अधिकारी बताते हुए वाद दायर किया। मेरे परिवार ने मेरे शैक्षणिक दस्तावेजो में मेरे बड़े पिताजी मदनलाल जी पुत्री लिखा है बताकर मुझे ओम प्रकाश जी की पुत्री होने का सबूत मांग रहे है। मेरे दादाजी दादीजी का स्वर्गवास हो चुका है। बाकी पूरा परिवार मेरे से विरोध में है। सम्पति पर कोर्ट आगे बेचान व् यथास्थिति का स्टे लग चुका है। स्टे की अपील भी ख़ारिज हो चुकी है। मैं ने स्टे के बाद कोर्ट में जायदाद की रजिस्ट्री की पूरी राशि की कोर्ट फीस जमा करवाकर हक शफा (परिवार की सदस्या होने के नाते पूरी जायदाद को खरीदने का) का वाद दायर किया। मेरी समस्या यह है कि मैं मुझे मेरे वास्तविक पिताजी ओम प्रकाश जी की पुत्री कोर्ट में कैसे साबित करूँ। मेरे नानाजी और मेरी वास्तविक माँ मन्जू देवी जीवित है और उनसे मेरे सम्बन्ध अच्छे है। मेरे स्व पिताजी का पूरा परिवार मेरे विरुद्ध है।

समाधान

में लगता है कि आप ने जो हक शफा का वाद प्रस्तुत किया है उस की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी यदि आपने वाद किया है तो उसे अन्तिम स्तर तक लड़ना चाहिए।

प को अपने आप को अपने पिता ओम प्रकाश जी की पुत्री साबित करने के लिए अपनी माता जी को ला कर न्यायालय में बयान कराना होगा। एक बार माता जी से मिल लेंगी तो हो सकता है आप का जन्म प्रमाण पत्र या फिर जिस अस्पताल में आप का जन्म हुआ हो उस का रिकार्ड भी मिल जाए। आप उस रिकार्ड के आधार पर अपने को ओम प्रकाश जी की पुत्री साबित कर सकती हैं।

प ने अपनी समस्या में यह उल्लेख किया है कि आप ने अपने पिता का नाम अपने शैक्षणिक रिकार्ड में दर्ज कराने के लिए अपनी माता जी का शपथ पत्र प्राप्त किया था। यदि वह वजूद में हो तो वह भी एक अच्छा दस्तावेजी साक्ष्य हो सकता है। जिन प्रधानाध्यापक जी ने मदन लाल जी का शपथ पत्र प्रस्तुत करने को कहा था उन का बयान भी इस मामले में महत्वपूर्ण हो सकता है।

स के अलावा परिवार के मित्रों या रिश्तेदारों में कोई व्यक्ति हो सकता है जो आप के ओम प्रकाश जी की पुत्री होने की हकीकत से परिचित हो। आप ऐसे व्यक्ति का बयान करवा सकती हैं। यदि आप का जन्म अस्पताल में हुआ है और अस्पताल का रिकार्ड नहीं मिलता है तो आप के जन्म समय की डाक्टर या नर्स का बयान भी महत्वपूर्ण है। यदि आप का जन्म अस्पताल में न हो कर घऱ पर हुआ हो जिस दाई ने आप की माताजी का प्रसव कराया है उस का बयान अति महत्वपूर्ण है। जन्म के समय होने वाले औपचारिक समारोह जैसे सूरज पूजन आदि में उपस्थित महिलाओं, पुरुषों, नाइन और ढोली आदि का बयान भी महत्वपूर्ण हैं।

न सब साक्ष्यों पर डीएनए का साक्ष्य सब से बड़ा है। आप की वास्तविक माताजी उपलब्ध हैं आप उन का तथा अपना डीएनए टेस्ट करवा सकती हैं तथा आप की माताजी व डीएनए टेस्ट करने वाले विशेषज्ञ का बयान डीएनए रिपोर्ट प्रस्तुत कर उसे प्रदर्शित करवाने के साथ करवा सकती हैं। यह साक्ष्य सारे साक्ष्य पर भारी पड़ेगा।

म ने आप के लिए साक्ष्य के इतन स्रोत बता दिए हैं इन में से कोई दो-तीन स्रोतों से भी आप साक्ष्य ले आएंगी तो आप का मकसद पूरा हो जाएगा।

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समस्या-Will

अनिकेत ने इन्दौर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

सीयत प्रमाणित किस तरह करवाई जा सकती है? उसकी फोटो स्टेट प्रतिलिपि को किसी अधिकारी द्वारा प्रमाणित करवाना पड़ता है? अथवा पंजीयन कार्यालय से उसकी प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त होती है। क्यों कि वसीयत के गवाह अब नहीं रहे।

समाधान-

सीयत को उस के गवाह ही प्रमाणित कर सकते हैं। यदि गवाहों का देहान्त हो गया है तो आप को न्यायालय के समक्ष यह साक्ष्य से यह साबित करना होगा कि वसीयत के गवाहों का देहान्त हो चुका है। इस के साथ ही उन गवाहों के हस्ताक्षर पहचानने वाले लोगों की गवाही करवा कर वसीयत को प्रमाणित किया जा सकता है। यदि ये हस्ताक्षर प्रमाणित करने वाले गवाह यह भी कह सकें कि उन्हें इस बात की जानकारी है कि गवाह ने वसीयत प्रमाणित की थी तो और बेहतर होगा।

किसी भी दस्तावेज की फोटो प्रति प्रमाणित नहीं कराई जा सकती है। उस के लिए उस की असल प्रति न्यायालय के समक्ष होना आवश्यक है। यदि असल प्रति उपलब्ध न हो तो वसीयत की पंजीयन कार्यालय से प्रमाणित प्रति प्राप्त की जा सकती है। प्रमाणित प्रति प्राप्त कर उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें और न्यायालय से साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 में न्यायालय से द्वितियक साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति प्राप्त कर उसे प्रमाणित कराएँ। यदि वसीयत पंजीकृत है तो वह इस स्थिति में प्राथमिक रूप से प्रमाणित मान ली जाएगी तथा वसीयत को चुनौती देने वाले व्यक्ति को प्रमाणित करना होगा कि वसीयत का पंजीकरण उचित नहीं था।

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कौन से खाता बही साक्ष्य में प्रस्तुत किए जा सकते हैं?

May 11, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_Image_115.jpgसमस्या-

मुकेश तवँर ने बागानवाला, भिवानी हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

र पर रखे बही खाता में किसी किस्म का लेन देन क्या कोर्ट में मान्य है, अगर है तो किस प्रकार से मान्य है?

समाधान-

ही खाता के संबंध में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 34 निम्न प्रकार है-

34. लेखा पुस्तकों क प्रविष्टियाँ, जिन में वे शामिल हैं, जिन्हें इलेक्ट्रोनिक रूप में रखा गया है, कब सुसंगत हैं-

कारोबार (बिजनेस) के अनुक्रम में नियमित रूप से रखी गई लेखा पुस्तकों की प्रविष्टियाँ, जिनमें वे जिन्हें इलेक्ट्रोनिक रूप में रखा गया है, जब कभी वे ऐसे विषय का निर्देश करती हैं जिस में न्यायालय को जाँच करनी है सुसंगत है, किन्तु अकेले ऐसे कथन ही ऐसे व्यक्ति को दायित्व से भारित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं होगी।

स तरह आप देख सकते हैं कि केवल वे खाता-बही जो कि कारोबार के संबंध में नियमित रूप से धारित किए जाते हों उन्हें ही न्यायालय में विवादित विषय में सुसंगत माना गया है और उन्हें साक्ष्य में प्रस्तुत किया जा सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति पर दायित्व का निर्धारण करने के लिए केवल यह लेखा पुस्तक पर्याप्त नहीं मानी जाएगी।

प के मामले में जिस लेखा पुस्तक को आप साक्ष्य में प्रस्तुत करना चाहते हैं उस के लिए आप को यह साबित करना पड़ेगा कि वह बिजनेस के सिलसिले में नियमित रूप से रखी जाती हैं, तभी आप उन का अपने मामले में साक्ष्य के रूप में उपयोग कर सकेंगे। इस के साथ ही आप को यह ध्यान भी रखना पड़ेगा कि यदि आप इस लेखा पुस्तक से किसी के ऊपर दायित्व को साबित करना चाहते हैं तो केवल यह लेखा पुस्तक पर्याप्त नहीं होगी। आप को अन्य सुसंगत साक्ष्य भी प्रस्तुत करनी पड़ेगी।

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electronic recordsसमस्या-

अनिल नागपुरी ने वारासिवनी, बालाघाट, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे विरुद्ध धारा ६७, ६७अ आई.टी.एक्ट के तहत मुकदमा न्यायालय में चल रहा है. पूरा मुकदमा फरियादी के फेसबुक प्रोफाइल के कंप्यूटर पर स्क्रीन शॉट लेकर उसके प्रिंट आउट पर चल रहा है। उक्त प्रिंट आउट को किसी भी व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित व प्रमाणित नहीं किया गया है। कोई इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी नहीं है। किन्तु माननीय न्यायालय द्वारा फेसबुक प्रोफाइल के उक्त अप्रमाणित व अहस्ताक्षरित प्रिंट आउट को न्यायालय में फरियादी से प्रदर्श अंकित करा लिया गया है। तो आपसे मेरा सवाल यह है कि क्या फेसबुक प्रोफाइल के उक्त अप्रमाणित व अहस्ताक्षरित प्रिंट आउट को साक्ष्य अधिनियम के तहत प्रदर्श अंकित कराया जा सकता है? कृपया इस संबंद्ध में केस लॉ भी बतावें।

समाधान-

फेसबुक प्रोफाइल में जो कुछ भी है वह एक इलेक्ट्रोनिक रिकार्ड है उस के लिए उसे इलेक्ट्रोनिक फोर्म में ही उसे न्यायालय में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। मसलन उस स्क्रीन शाट को सीडी में रिकार्ड कर के सीडी न्यायालय में प्रस्तुत की जानी चाहिए साथ में उस की प्रिंट भी प्रस्तुत की जा सकती है। ऐसी स्थिति में ही प्रिंट को प्रदर्शित कराया जा सकता है। यदि आपके मामले में इलेक्ट्रोनिक रिकार्ड प्रस्तुत नहीं किया गया है तो प्रिंट की साक्ष्य में महत्ता नहीं है। आप को चाहिए था कि जब प्रिंट को प्रदर्शित कराया जा रहा था तब आपत्ति की जाती। बाद में भी इस आपत्ति को न्यायालय को एक आवेदन के रूप में लिख कर दिया जा सकता है। वैसे आपको घबराने की जरूरत नहीं है किसी दस्तावेज के प्रदर्शित हो जाने मात्र से वह प्रमाणित नहीं हो जाता है।

लेक्ट्रोनिक रिकार्ड को एक दस्तावेज के रूप में कैसे साबित किया जा सकता है यह उच्चतम न्यायालय ने अनवर पी.वी. बनाम पी.के. बशीर एवं अन्य के मामले पारित निर्णय दिनांक 18 सितम्बर 2014 में निर्धारित किया है। आप इस के शीर्षक पर क्लिक कर के इस निर्णय को पढ़ सकते हैं।

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आवाज की रिकार्डिंग की साक्ष्य कैसे हो?

April 2, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

Service of summonsसमस्या-

रामेश्वर ने नदबई, भरतपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

 मेरी समस्या यह है की मेरी शादी २४-०६-११ को हुई थी व लगभग १, १/२ वर्ष बाद झगडे के कारण मैं ने तलाक का केस दर्ज करा दिया। झगडे का कारण मेरी पत्नी और उसके जीजा के अबैध सम्बन्ध हैं। जिस का पता मुझे मोबाइल की रिकॉर्डिंग से पता लगा। मैं ने रिकॉर्डिंग की सीडी कोर्ट मे पेश कर दी है। मैं यह मार्गदर्शन चाहता हूँ कि आवाज की जाँच कराने हेतु किस धारा के तहत निवेदन किया जाये। यदि निवेदन को अस्वीकार कर दिया जाये तो आगे की क्या प्रक्रिया अपनाई जाये व किस धारा के तहत जिस से सच्चाई सामने आये विस्तृत जानकारी देने का कष्ट करें।

समाधान-

प ने फोन रिकार्डिंग न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर दी है। फोन रिकार्डिंग इलेक्ट्रोनिक रिकार्ड है इस कारण इस मामले में धारा 79-ए इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट-2000 के अन्तर्गत परिभाषित एक्जामिनर की राय महत्वपूर्ण है। धारा 45-ए साक्ष्य अधिनियम के अन्तर्गत ऐसे एक्जामिनर को एक्सपर्ट माना गया है तथा धारा 45 साक्ष्य अधिनियम के अन्तर्गत इस एक्सपर्ट की राय को सुसंगत तथ्य माना गया है।

प को चाहिए कि न्यायालय से इस आवाज की जाँच कराने की अनुमति ले कर ऐसा एक्जामिनर नियुक्त कराएँ और उस की रिपोर्ट प्राप्त हो जाने के बाद उसे न्यायालय में प्रस्तुत करें तथा उस एक्जामिनर का बयान कोर्ट में कराएँ। तभी यह साक्ष्य काम में ली जा सकती है और आप उस का लाभ उठा सकते हैं।

प एक्जामिनर नियुक्त करने का आवेदन धारा 45, 45-ए साक्ष्य अधिनियम तथा धारा 79-ए इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि यह आवेदन अस्वीकार किया जाता है तो आप को इस आदेश के विरुद्ध उच्च न्यायालय के समक्ष धारा 115 दीवानी प्रक्रिया संहिता में पुनरीक्षण याचिका ही प्रस्तुत करनी होगी।

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आवाज की रिकार्डिंग कैसे प्रमाणित की जाए?

August 26, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

electronic recordsसमस्या-

रामेश्वर ने भरतपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरी शादी 26.06.2011 को हुई थी व हमदोनों लगभग एक डेढ़ वर्ष तक साथ रहे थे।इन एक डेढ़ वर्षो में मेरी पत्नी नेमुझे बहुत ही परेशान कर दिया था। मुझसे झगड़ा करती, गालियाँ देती और मरनेमारने की धमकियाँ देती। मैंने झगडेका कारण जानने के लिए मेरी पत्नी कोमोबाइल में कॉल रिकॉर्डिंग कासॉफ्टवेयर डलवा कर दे दिया, कॉलरिकॉर्डिंग के बारे में मेरी पत्नी को मालूम नहीं था।जब मैं ने रिकॉर्डिंगसुनी तो में अचंभित रह गया।क्योंकि रिकॉर्डिंग में मेरी पत्नी व मेरी पत्नीके जीजा काएक दूसरे को पति पत्नी मानने कासंवाद था। इसी प्रकार औरभी बहुत सारी बातें हैं।तब मैं ने मेरी पत्नी से तलाक लेने के लिए कोर्ट मेंफाइल लगा दी।और सारे सबूत पेश किये जैसे कि – कॉल डिटेल, कॉल रिकॉर्डिंगकी क्लिप (सी डी बना कर)। मैं यह जानना चाहता हूँ कि यदिमेरी पत्नी कोर्ट में कॉल रिकॉर्डिंग की क्लिप्स को झूठा बता कर कोर्ट कोगुमराह करती है तो मुझे उस की आवाज को सत्यापित करने के लिए क्या करना होगाया फिर कोर्ट की तरफ से क्या कार्रवाई की जाएगी, किस धारा के तहत जिससेसच्चाई सामने आ सके?

समाधान-

कॉल रिकॉर्डिंग को एक दस्तावेज जैसा सबूत माना जाता है और उस के माध्यम से किसी तथ्य को प्रमाणित किया जा सकता है। यह एक स्वाभाविक बात है कि जिस पक्ष के विरुद्ध आप किसी दस्तावेज को प्रस्तुत कर रहे हैं यदि वह उस के विरुद्ध जा रहा है तो वह उस दस्तावेज के असली होने से इन्कार कर सकता है। लेकिन न्यायालय में आरोपित व्यक्ति के मना कर देने से कोई तथ्य अप्रमाणित सिद्ध हो जाए तो फिर किसी भी मामले में निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सकता।

काल रिकार्डिंग का उपयोग भारतीय न्यायालयों में वर्षों से हो रहा है। इस संबंध में अत्यन्त स्पष्ट कानून है। राम सिंह व अन्य बनाम कर्नल रामसिंह (1986 AIR 3, 1985 SCR Supl. (2) 399) के प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में मानदंड स्पष्ट किए हैं जो निम्न प्रकार हैं-

“We think that the High Court was quite right in holding that the tape records of speeches were “documents” , as defined by Section 3 of the Evidence Act, which stood on no different footing than photographs, and that they were admissible in evidence on satisfying the following conditions:

(a) The voice of the person alleged to be speaking must be duly identified by the maker of the record or by others who knew it.

(b) Accuracy of what was actually recorded had to be proved by the maker of the record and satisfactory evidence, DIRECT or circumstances, had to be there as to rule out possibilities of tampering with the record.

(c) The subject matter recorded had to be shown to be relevant according to rules of relevancy found in the evidence Act.” (Ephes ours)

Thus, so far as this Court is concerned the conditions for admissibility of a tape recorded statement may be stated as follows:

(1) The voice of the speaker must be duly identified by the maker of the record or by others who recognise his voice. In other words, it manifestly follows as a logical corollary that the first condition for the admissibility of such a statement is to identify the voice of the speaker. Where the voice has been denied by the maker it will require very strick proof to determine whether or not it was really the voice of the speaker.

(2) The accuracy of the tape recorded statement has to be proved by the maker of the record by satisfactory evidence – direct or circumstantial. .

(3) Every possibility of tampering with or erasure of a part of a tape recorded statement must be ruled out otherwise it may render the said statement out of con text and, therefore, inadmissible.

(4) The statement must be relevant according to the rules of Evidence Act.

(5) The recorded cassette must be carefully sealed and kept in safe or official custody.

(6) The voice of the speaker should be clearly audible and not lost or distorted by other sounds or disturbances.

स मामले में यह स्पष्ट किया गया है कि

1. जिस व्यक्ति की आवाज रिकार्ड की गयी है उसे रिकार्ड बनाने वाले द्वारा अथवा अन्य व्यक्तियों द्वारा स्पष्ट रूप से पहचाना जाना चाहिए कि यह उसी व्यक्ति की आवाज है जिस की कथित की गई है।

2. इस बात की संभावना नहीं होनी चाहिए कि जो आवाज रेकार्ड की गई है उस में कोई गड़बड़ी उत्पन्न की गई है।

3. जो वार्तालाप रिकार्ड किया गया है वह मामले से सुसंगत है।

स तरह आवाज की रिकार्डिंग के मामले में सब से पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि जो आवाजें रिकार्ड की गई हैं वे उन्हीं व्यक्तियों की हैं जिन की बताई जा रही हैं। इस के लिए उन्हें संबंधित व्यक्तियों द्वारा न्यायालय के समक्ष पहचान किया जाना चाहिए कि उन्हों ने उन व्यक्तियों की आवाजें सुनी हैं और वे उन्हें पहचानते हैं और वे उन्हीं व्यक्तियों की हैं। विशेष रूप से जब कि जिस की आवाज बताई जा रही है वह खुद अपनी आवाज होने से मना करे तो बहुत ही स्पष्ट रूप से ऐसी साक्ष्य न्यायालय के समक्ष उपलब्ध होनी चाहिए और इस बात की संभावना समाप्त हो जानी चाहिए कि इस में कोई गड़बड़ी उत्पन्न की गई है।

प के मामले में रिकार्डिंग फोन में हुई है। वैसी स्थिति में वह फोन जिस में मूल रिकार्डिंग है न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यह साबित किया जाना चाहिए कि उस का प्रयोग उस समय उसी व्यक्ति द्वारा किया गया था जिस के लिए बताया गया है। किसी अन्य दवारा उस के उपयोग की कोई संभावना नहीं थी। इस के अलावा आप का तथा कुछ अन्य व्यक्तियों के बयान न्यायालय के समक्ष कराने चाहिए कि वे उस आवाज को पहचानते हैं और वह आप की पत्नी और उस के जीजा की ही हैं।

दि आप निर्विवादित रूप से ऐसी साक्ष्य प्रस्तुत कर सके तो आप वह सब प्रमाणित कर सकेंगे जो करना चाहते हैं।

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electronic recordsसमस्या-
सादुल शहर, राजस्थान से हरिकृष्ण काँटीवाल ने पूछा है –

क्या फ़ोन रिकॉर्डिंग को न्यायालय में एक मजबूत साक्ष्य के तौर पर पेश किया जा सकता है? अगर हाँ, तो किस अधिनियम के अंतर्गत? कृपया इस विषय की विधि पर विस्तृत प्रकाश डालें।

समाधान-

किसी भी न्यायालय में सारी साक्ष्य भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 के अंतर्गत प्रस्तुत की जाती है। इस कारण से न्यायालय में प्रस्तुत की जाने वाली साक्ष्य के लिए आप को इस अधिनियम का अध्ययन करना चाहिए।

साक्ष्य अधिनियम में सूचना तकनीक अधिनियम 2008 के द्वारा कुछ संशोधन किए गए थे जो कि दिनांक 27.09.2009 से प्रभावी हो चुके हैं। इन संशोधनों के माध्यम से ‘इलेक्ट्रॉनिक सिगनेचर सर्टिफिकेट’, इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म, इलेक्ट्रॉनिक रिकार्डस्, इन्फोर्मेशन, सीक्योर इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड, सीक्योर इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर, व सबस्क्राइबर शब्दों की परिभाषा को जोडा गया है। इस में  से इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डस् शब्द में टेलीफोन रिकॉर्डिंग सम्मिलित है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम में धारा 65-ए तथा धारा 65-बी 2000 के अधिनियम से ही जोड़ी जा चुकी थीं जो कि दिनांक 17.10.2000 से प्रभावी हो गई थी। धारा 65-ए में कहा गया है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकार्डस् को धारा 65-बी के अनुसार प्रमाणित किया जा सकता है। धारा 65-बी में कहा गया है कि इलेक्ट्रॉनिक रिकार्डस् को जिस में टेलीफोन रिकार्डिंग सम्मिलित है, एक दस्तावेज माना जाएगा तथा ऐसा रिकार्ड किसी भी कार्यवाही में स्वीकार्य होगा।

स तरह आप उक्त धाराओं के अन्तर्गत टेलीफोन रिकार्डिंग को एक दस्तावेज के रूप में किसी भी कार्यवाही में प्रस्तुत कर सकते हैं, चाहे वह कार्यवाही किसी न्यायालय में हो या अन्यत्र। इलेक्ट्रॉनिक रिकार्ड को दस्तावेजी साक्ष्य मानते हुए प्रमाणित किया जा सकता है।

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