Industrial Dispute Act Archive

समस्या-

राहुल ने ट्रांजिट कैंप रुद्रपुर (उत्तराखंड) से समस्या भेजी है कि-

मैं रूद्रपुर में दिनांक 01-06-2015 से एक निजी आटो पार्ट्स कंपनी में पे रोल पर डिप्लोमा मैकेनिकल इंजिनियर की हैसियत से कार्यरत था। लेकिन तबीयत खराब होने की वजह से मैं पूरा महीने (जनवरी 2017) अनुपस्थित रहा। मैंने अपने सुपरवाइजरों को फोन द्वारा सूचित किया तो उन्होंने कोई दिक्कत न होने की बात कही। परन्तु मेरे मेडिकल लेकर वापस आने के बाद एचआर विभाग द्वारा यह कह कर कि तुम्हारा नाम कट गया है। एक महीने बाद रीजोइनिंग करानी पड़ेगी। धोखे से कैजुअल ट्रेनिंग में डाल दिया है और सैलरी के नाम पर छह महीने से स्टाईपेंड दे रही है। अब कम्पनी बार बार कहने पर भी रीजोइनिंग नही करा रही है। अब एक्जिट क्लियरिंग फार्म में रिजाइन दिखा कर साइन करने के लिये दबाव बना रही है, ऐसा न करने पर कम्पनी नो एंट्री लगाने की धमकी दे रही है। कृपा करके मुझे बतायें कि क्या मैं स्थानीय श्रम न्यायालय में शिकायत दर्ज करा सकता हूं? कम्पनी ने एक साल पूरे होने पर मुझे इंक्रीमेंट दे रखा है।

समाधान-

आप 01.06.2015 से पे-रोल पर डिप्लोमा मैकेनिकल इंजिनियर की हैसियत से नियोजित थे। आप का काम जिस तरह का है आप एक श्रमिक हैं। दिसम्बर 2016 तक आप ने काम किया, इस तरह आप एक वर्ष सात माह काम कर चुके थे। आप इन्क्रीमेंट भी प्राप्त कर चुके थे। इस तरह आप स्थाई कर्मचारी हो चुके थे। इस के बाद आप बीमारी के कारण उपस्थित नहीं हो सके और फोन पर सुपरवाइजरों को सूचित किया। फिर आप फरवरी में ड्यूटी पर उपस्थित हुए। लेकिन आप को ड्यूटी पर नहीं लिया गया, बल्कि कहा गया कि आप का नाम पे-रोल से कट गया है। इस तरह आप की सेवा समाप्त हो गयी। पे रोल से नाम काट देने को सुप्रीम कोर्ट ने कई मुकदमों में छंटनी माना है। इस तरह आप की यह सेवा समाप्ति आप की छंटनी है। इस सेवा समाप्ति के पहले आप को एक माह का नोटिस दिया जाना चाहिए था या उस की एवज में एक माह का वेतन सेवा समाप्ति के दिन दिया जाना चाहिए था। इस के साथ ही छंटनी का मुआवजा भी दिया जाना चाहिए था। इस छँटनी के पहले नियोजक को एक वरिष्ठता सूची भी प्रकाशित करनी चाहिए थी। यह भी कि छंटनी केवल सब से नए कर्मचारी की की जा सकती है। किसी सीनियर की नहीं।

अब छंटनी के इन मानदंडों पर आप की छंटनी को परखेंगे तो वह अवैधानिक है। आप इस के विरुद्ध श्रम विभाग में शिकायत कर सकते हैं। शिकायत प्रस्तुत करने की रसीद शिकायत की दूसरी प्रति पर प्राप्त कर अपने पास अवश्य रखें जिस पर प्राप्त करने की तिथि और प्राप्त करने वाले कर्मचारी के हस्ताक्षर व विभाग की सील जरूर लगी हो। विभाग उस में समझौते के लिए प्रयास करेगा या फिर नहीं करेगा। दोनों ही स्थितियों में यदि 45 दिन में कोई परिणाम नहीं मिलता है तो आप श्रम विभाग से शिकायत प्रस्तुत होने के 45 दिन पूरे हो जाने का प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर प्राप्त कर लें। तब आप सीधे श्रम न्यायालय के समक्ष अपना अवैधानिक छंटनी का मुकदमा पेश कर सकते हैं। इस मुकदमे में आपकी जीत होगी। अदालत से आप को नौकरी पर वापस लेने, सेवा की निरन्तरता बनाए रखने और पिछला पूरा वेतन या उस का कोई अंश दिए जाने का अधिनिर्णय पारित किया जाएगा।

कंपनी भी जानती है कि आप मुकदमा कर सकते हैं और कंपनी को उस में नुकसान उठाना पड़ेगा। पर वे आप की अनभिज्ञता और मजबूरी का लाभ उठा रहे हैं। आप को किसी रिजाइन या त्याग पत्र पर अपने हस्ताक्षर नहीं करने चाहिए। वैसे भी कंपनियों की नौकरियों का कोई भरोसा तो है नहीं। इस कारण आप को तुरन्त श्रम विभाग में शिकायत करें। किसी स्थानीय वकील से मदद लें। आप नौजवान हैं, डिप्लोमा इंजिनियर हैं, आप को कहीं भी काम मिल जाएगा। घबराएँ नहीं और अपने अधिकारों के लिए लड़ें।

यहाँ क्लिक कर सबसे पहले टिप्पणी कीजिए

मजदूरों के लिए श्रम विभाग और न्यायालयों में कोई न्याय नहीं।

July 20, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_retrenchment-300x300.jpgसमस्या-

टीकम सिंह परिहार ने चौपासनी स्कूल तिलवारियॉ बैरा राजस्थान से पूछा है-

मैं “मेक शॉट ब्लास्टिंग इक्विपमेंट प्राईवेट लिमिटेड” में पिछले 7 साल से काम करता था यह 30 साल पुरानी प्राइवेट लिमिटेड़ कंपनी है यहाँ पर PF, ESI की सुविधा भी है। यहाँ पर 200 से 250 वर्कर्स हैं जो परमानेंट कर्मचारी हैं। मैं भी उन में से एक हूँ। पहले हमें इनसेंटिव मिलता था जो इन लोगो ने बंद कर दिया और दिपावली का बोनस भी 10,000 से ज्यादा सेलेरी वालों को यह कहते हुए नहीं देते कि यह सरकार का नियम हे और 10000 से कम वालो को अभी तक नही दिया  आज़ कल आज़ कल कर रहे हैं, जब कि पहले 20% देते थे। इस के अलावा ड्रेस, जुते, साबुन आदि की सुविधा भी बंद कर दी गई और पिछले साल जुलाई 2014 से महिने की सैलेरी भी समय पर नहीं मिल रही है। इस से पहले सैलेरी 07 तारीख से पहले मिल जाती थी। फिर 07 से 08, 10, 12, 14, 16, 18 और अब अगले महिने कि 20 से 25 तारिख को मिलती है। ओवर टाईम भी यहां पर रोज 3, 4 घंटे होता है उस का भुगतान पहले ड़बल किया जाता था अब सिंगल देते हैं, वो भी 1, 1 1/2 महिना चढ़ा कर। कंपनी साफ सफाई का भी ध्यान नहीं रखती। बाथरूम व पीने के पानी की जगह इतनी गंदगी है कि नाक पर रूमाल लगा कर जाना पड़ता है। इस के बारे में जीएम, मैनेजर, व कंपनी मालिक से भी बात कर चुके हैं लेकिन समस्याओ का कोई समाधान नहीं हुआ। यहाँ पर फैब्रिकेशन का काम है बड़ी बड़ी मशीनें बनती हैं। हमारा काम बहुत ही मेहनत का है। मेन्टीनेंस का काम भी समय पर नहीं करवाते। बिजली के तार भी जगह जगह से खुले पड़े हैं। 4-5 साल तक भी मेन्टीनेंस की परवाह नहीं करते। इन सभी समस्याऔ के कारण मैं ने अपना त्याग पत्र 01/06/2016 को नोटिस देकर 30/06/2016 तक मेरा कम्पलीट हिसाब करने को लिखित में दिया जिस में वैतन,दिपावली बोनस,गे्चुटी ,व अन्य परिलाभ शामिल हैं जिस की फोटो कापी मय हस्ताक्षर मेरे पास है, मगर आज़ 18/07/2016 तक भी मुझे 1 पेसा भी नहीं मिला।  कानूनन मुझे क्या करना चाहिए? क्या मैं वेतन, दीपावली बोनस, ग्रेच्युटी के साथ बकाया ओवर टाईम पिछले 7 साल का (सिंगल जो बाकी है), 3 साल वेतन लेट का ब्याज क्या कानूनन ले सकता हूँ?    कृपया हमें मार्ग बताएँ। क्या कोई नियम नहीं है। मैं जोधपुर श्रम आयुक्त के कार्यालय भी गया। उन्होंने कारवाही करने कि बजाय कम्पनी को ही फोन कर के बता दिया कि मैं मुकदमा दर्ज़ करवाने आया हूँ और मुझे वहाँ से भगा दिया, कृपया समाधान बताएँ।

समाधान-

राजस्थान ही नहीं देश भर में श्रमिकों के मामलों में न्याय की स्थिति अत्यन्त खराब है। इस का कारण श्रम संगठनों का ह्रास है। अधिकांश श्रम संगठन श्रमिकों के संगठन नहीं है बल्कि उन्हें या तो कुछ राजनैतिक दल चलाते हैं जिन्हें राजनीति के लिए श्रमिकों के वोटों की जरूरत होती है, या फिर कुछ लोग व्यक्तिगत रूप से या सामुहिक रूप से मिल कर इसे एक व्यवासय के रूप में चलाते हैं। मजदूर वर्ग की जरूरत के कारण बने श्रमसंगठनों का लगभग अभाव है। जोधपुर की भी यही स्थिति है। आप किसी श्रम संगठन से संबद्ध प्रतीत नहीं होते जिस के कारण आप ने यहाँ यह समस्या पोस्ट की है।

आप ने उद्योग की जो स्थिति बताई है उस से लगता है कि अब यह उद्योग इस के मालिकों के लिए अधिक मुनाफे का सौदा नहीं रहा। इस कारण वे इस उद्योग की हालत जानबूझ कर खराब कर रहे हैं। उद्योग को बिना राज्य सरकार की इजाजत के बिना बन्द नहीं किया जा सकता। लेकिन धीरे धीरे मजदूरों का बकाया बढ़ाया जा रहा है इसी तरह बाजार के लेनदारों का भी बकाया बढ़ा रखा होगा और बैंकों से ऋण भी ले रखा होगा। कुछ दिन बाद यह उद्योग अपनी कंपनी को बीमार बता कर बीआईएफआर में आवेदन करेगी और मजदूरों को उकसा कर हड़ताल वगैरा करने पर मजबूर करेगी या अपने ही एजेंटों के माध्यम से कारखाने में कोई हिंसा करवा कर कारखाने में तालाबंदी करवा देगी। उस के बाद यह कारखाना कभी नहीं खुलेगा। मजदूर बरसों तक अपनी बकाया राशि के लिए अदालतों के चक्कर लगाते रहेंगे। ऐसा देश के सैंकड़ों कारखानों में हो चुका है।

मालिकों की यह योजना किसी मुकाम तक पहुंचती उस के पहले ही आप ने हालात को भांप कर स्तीफा दे दिया है। अब मालिक समझ नहीं रहा है कि आप का हिसाब दे या न दे। उस के सलाहकारों ने यह सलाह दी होगी कि हिसाब मत दो, जब मुकदमा करे और लड़ लड़ कर पक जाए तब मजदूर को आधा अधूरा हिसाब दे देना।

श्रम न्यायालयों, व  श्रम विभाग की स्थिति यह है कि श्रम न्यायालय जितने होने चाहिए उस के आधे भी राज्य में  नहीं हैं। अधिकांश न्यायालयों में उन की क्षमता से दस दस गुना मुकदमे लंबित हैं। मकदमों का निर्णय 20-30 वर्षों तक नहीं हो पा रहा है। वेतन भुगतान, न्यूनतम वेतन, ग्रेच्युटी, कामगार क्षतिपूर्ति आदि के न्यायालयों में श्रम विभाग राजस्थान के अधिकारी पीठासीन होते हैं। आधे से अधिक न्यायालयों में अधिकारी नहीं हैं। एक एक अधिकारी चार चार न्यायालयों को संभालता है  जिस का नतीजा यह है कि वहाँ भी न्याय नहीं हो रहा है।

इतना सब हो जाने के बावजूद राजस्थान का मजदूर वर्ग सोया पड़ा है। मजदूरों के नाम पर जितने भी संगठन राजस्थान में काम कर रहे हैं वे सिर्फ अपने स्वार्थों के लिए काम कर रहे हैं उन में से कोई भी वास्तविक मजदूर संगठन या ट्रेडयूनियन नहीं है। ऐसा लगता है कि श्रमिकों के लिए इस राज्य में न्याय है ही नहीं।

इन विपरीत परिस्थितियों में आप को चाहिए कि आप अपने नगर में ही किसी ऐसे वकील से मिलें जो श्रम संबंधी मामलों की वकालत करता हो। सीधे उस से बात करें कि आप त्याग पत्र दे चुके हैं और आप को अपना हिसाब अपने नियोजक से लेना है। यह हिसाब लेने के लिए उन के माध्यम से कार्यवाही करें। इस के लिए आप को दो तीन मुकदमे करने पड़ सकते हैं। ग्रेच्युटी के लिए एक फार्म में आवेदन प्रेषित कर दें ग्रेच्यूटी न देने पर उस का आवेदन प्रस्तुत करें। एक आवेदन बकाया वेतन व अन्य लाभ जो वेतन की परिभाषा में आते हों उन के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में कार्यवाही करें। अन्य सभी परिलाभों के लिए भी आप की स्थिति देख कर तथा तमाम तथ्यों की जानकारी कर के आप के वकील निर्धारित करेंगे कि क्या कार्यवाही करनी चाहिए?

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

एकता, संगठन और संघर्ष ही मजदूर को विजय दिला सकते हैं।

September 26, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_retrenchment-300x300.jpgसमस्या-

मानव ने वेलकम-3, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

म 10 सफाई कमॅचारी दैनिक वेतन पर केन्द्र सरकार की संस्था में कार्य कर रहे हैं। हम पहले ठेकेदारी में काम करते थे। हमें संस्था के अधिकारी ने दैनिक वेतन पर संस्था की तरफ रख लिया था। अप्रेल 2012 से सितम्बर 2015 तक 1100 हाजिरी हो गई है। अब हमें ठेकेदारी में काम करने को कहा जा रहा है। टेन्डर भी निकाल दिया है। हमें क्या करना चाहिए।

समाधान

हले आप ठेकेदार के माध्यम से संस्था में काम कर रहे थे। उस के बाद संस्था ने स्वयं आप को नियोजन दे दिया। करीब ढाई वर्ष तक आप लोग संस्था में लगातार काम कर चुके हैं और निरन्तर सेवा में हैं। यदि आप के स्थान पर यह काम ठेकेदार को सौंप दिया जाता है तो निश्चित ही संस्था को आप को छंटनी करना होगा। नोटिस देना होगा या फिर नोटिस वेतन व मुआवजा एक साथ सेवा समाप्ति के साथ देना होगा। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो यह छंटनी होगी।

लेकिन आज कल ऐसा होता है कि काम ठेकेदार को दे दिया जाता है। कर्मचारी वही काम करते रहते हैं। बाद में माह पूरा होने पर ठेकेदार के नाम बिल बना कर उस के नाम से वेतन का भुगतान उठा कर मजदूरों को भुगतान कर दिया जाता है। मजदूरों को पता ही नहीं लगता है कि उन का नियोजक बदल दिया गया है।

स तरह जो काम आप कर रहे हैं वह नियोजक का काम है जिस में उस ने पिछले ढाई वर्ष से आप को नियोजित कर रखा है। संस्था इस काम को ठेकेदार को नहीं दे सकती। ऐसा करना श्रमिकों की सेवा शर्तों में परिवर्तन है। इस से श्रमिक काम तो उसी उद्योग का वही कर रहे होते हैं लेकिन उन का वेतन भुगतान का तरीका और नियोजक दोनों ही बदल जाते हैं। ऐसा करने के लिए संस्थान को एक नोटिस अन्तर्गत धारा 9 औद्योगिक विवाद अधिनियम देना आवश्यक है। यदि ऐसा नोटिस कोई संस्थान/ नियोजक श्रमिकों और श्रम विभाग को देता है तो उस पर औद्योगिक विवाद उठाया जा सकता है।

दि आप की संस्था संविधान के अन्तर्गत राज्य की परिभाषा में आती है तो आप सभी लोग एक रिट याचिका प्रस्तुत कर इस काम को ठेकेदार को देने तथा आप को छंटनी करने या आप की स्टेटस बदलने पर रोक लगवाई जा सकती है। इस के लिए आप को दिल्ली उच्च न्यायालय के किसी वकील से संपर्क करना चाहिए जो कि श्रम संबंधी मामले देखता है।

बेहतर तो यह होगा कि किसी पुरानी ट्रेड युनियन के पदाधिकारियों से आप मिलें और उन्हें अपनी समस्या बताएँ। वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कोई अच्छा हल निकालने में आप की मदद कर सकते हैं। इस से भी बेहतर यह है कि आप सब अपने जैसा काम करने वाले उद्योगों की यूनियन में शामिल हो कर इस काम को करें। मजदूर के पास कोई और ताकत नहीं होती। वह लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने में अक्षम होता है उस की एक मात्र ताकत उस का संगठन और बिरादराना मजदूर संगठनों के साथ उस की एकता होती है। आप को उस दिशा में बढ़ना चाहिए। एकता, संगठन और संघर्ष की राह ही उसे विजय दिला सकती है।

अब तक 3 टिप्पणियाँ, आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

rp_industrial-dispute.jpgसमस्या-

लोकेश ने बाल्को नगर, कोरबा, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मैं यूनियन का सचिव हूँ। 1 जुलाई को हमारे लेबर को बिना नोटिस के निकाल दिया गया है। फिर सभी विरोध में हड़ताल कर रहे हैं। आज 10 दिन हो गये लेकिन हल न निकला। मामले को देखते ठेकेदार 10 महिलाओं और 20 पुरुषों को दूसरी जगह कम देने को तैयार हो गया। लेकिन फिर भी लेबर ने वहाँ जाने से इनकार कर दिया है। अब मामला सहायक श्रम आयुक्त के पास है। 7-जुलाई को पहली बैठक हुई। पर प्रबंधन का कोई प्रतिनिधि वार्ता में नहीं आया तो सहायक श्रम आयुक्त ने 9-7-15 का टाइम दिया। तब भी प्रंबंधन से कोई नहीं आया। फिर से हल्ला करने आयुक्त ने 10-7-15 का टाइम दिया.हम क्या करे.ठेकेदार चटनी करने क प्रयास मे ह. जुलाई का समया दिया है। ठेकेदार छंटनी करने के प्रयास में है।

समाधान

ह पूरे देश के मजदूरों की समस्या है। सारे उद्योग अधिक से अधिक ठेकेदार के माध्यम से श्रमिकों को नियोजित करते हैं और जम कर उन से श्रम करवाते हैं। यदि वे यह जबरिया श्रम नहीं करते हैं तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है। नौकरी से निकालने में श्रम कानूनों की भी अनदेखी की जाती है। क्यों कि वे ठेकेदार का ठेका समाप्त कर देते हैं। ठेकेदार का ठेका समाप्त होते ही वह उदयोग बंद होने की श्रेणी में आ जाता है जिस के लिए पहले से कोई नोटिस और मुआवजा आदि देने की कोई बाध्यता नहीं है। चाहे तो श्रमिक लड़ कर ले ले। श्रमिक इस मसले पर हड़ताल करते हैं तो उन्हें अनुपस्थित दिखा कर उन का नियोजन समाप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। इस कारण ऐसे वक्त में हड़ताल से कोई लाभ नहीं होता। उलटा नुकसान हो जाता है।

श्रमिकों की यह लड़ाई अब नियोजकों और श्रम विभाग के स्तर की नहीं रही है। अब यह वर्गीय लड़ाई हो कर राजनैतिक हो गयी है। अब जब पूर्ण रूप से निजिकरण हो रहा है तो श्रम कानून कड़े होने चाहिए उस के स्थान पर सरकारें उन्हें कमजोर कर रही हैं। सरकार कहती है कि कानून के समक्ष सब बराबर हैं, अरबपति पूंजीपति और न्यूनतम मजदूरी पाने वाला श्रमिक उन के लिए एक समान हैं। सीधा अर्थ यह है कि कानून सिर्फ पूंजीपतियों के लिए है। सरकार श्रमिकों के लिए अदालतें इतनी सी खोलती हैं कि मुकदमे का निर्णय होने में ही 10-20 बरस लग जाएँ। तब न्याय हो भी जाए तो श्रमिक के लिए कोई न्याय नहीं है।

ब जरूरत है कि कानून ऐसे हों कि कोई नाजायज रूप से किसी मजदूर को नौकरी से न निकाल सके। निकाले तो पर्याप्त मुआवजा पहले दे। यदि कोई विवाद हो तो एक साल में अदालत से फैसला हो। इस के लिए मजदूर वर्ग को राजनैतिक लड़ाई लड़नी होगी। जब तक मजदूर पक्षीय सरकारें देश में नहीं होंगी मजदूर को ऐसे ही शोषण और अन्याय का शिकार होते रहना होगा। फिलहाल तो यही रास्ता है कि श्रमिक यदि नए स्थान पर नौकरी करना चाहें तो इस नौकरी को जारी रख सकते हैं अन्यथा वे कोई दूसरा काम तलाशें और इस अवैधानिक छंटनी के विरुद्ध मुकदमा लड़ते रहें। फैसला जब होगा तब होगा। अवैध छंटनी के मामले में समझौता अधिकारी के यहाँ शिकायत प्रस्तुत करने के 45 दिन हो जाने के बाद समझौता अधिकारी से अवैध छंटनी की शिकायत प्रस्तुत करने का प्रमाण पत्र प्राप्त कर श्रम न्यायालय में सीधे धारा 2 ए (2) औद्योगिक विवाद अधिनियम के अन्तर्गत मुकदमा पेश किया जा सकता है।

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

rp_industry-300x157.jpgसमस्या-

टीकमसिंह ने चौपासनी स्कूल, जोधपुर से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मैं “मेक शॉट ब्लास्टिंग इक्विपमेंट प्राईवेट लिमिटेड” में काम करता हूँ। यह 30 साल पुरानी प्राइवेट लिमिटेड़ कंपनी है यहाँ पर PF, ESI की सुविधा भी है। यहाँ पर 200 से 250 वर्कर्स हैं जो परमानेंट कर्मचारी हैं। मैं भी उन में से एक हूँ। पहले हमे इनसेंटिव मिलता था जो इन लोगो ने बंद कर दिया और दिपावली का बोनस भी 10,000 से ज्यादा सेलेरी वालों को यह कहते हुए नहीं देते कि यह सरकार का नियम है। जब कि पहले 20% देते थे। इस के अलावा ड्रेस, जुते, साबुन आदि की सुविधा भी बंद कर दी गई और पिछले साल जुलाई 2014 से महिने की सैलेरी भी समय पर नहीं मिल रही है। इस से पहले सैलेरी 07 तारिख से पहले मिल जाती थी। फिर 07 से 08, 10, 12, 14, 16, 18 और अब 20 से 25 तारिख को मिलती है। ओवर टाईम भी यहा पर रोज 3, 4 घंटे होता है उस का भुगतान पहले ड़बल किया जाता था अब सिंगल देते हैं, वो भी 1, 1 1/2 महिना चढ़ा कर। कंपनी साफ सफाई का भी ध्यान नहीं रखती। बाथरूम व पीने के पानी की जगह इतनी गंदगी है कि नाक पर रूमाल लगा कर जाना पड़ता है। इस के बारे में जीएम, मैनेजर, व कंपनी मालिक से भी बात कर चुके हैं लेकिन समस्याओ का कोई समाधान नहीं हुआ। यहाँ पर फैब्रिकेशन का काम है बड़ी बड़ी मशीनें बनती हैं। हमारा काम बहुत ही मेहनत का है। मेन्टीनेंस का काम भी समय पर नहीं करवाते। बिजली के तार भी जगह जगह से खुले पड़े हैं। 4-5 साल तक भी मेनटीनेंस की परवाह नहीं करते। कृपया हमें मार्ग बताएँ। क्या सैलेरी समय पर मिलने का कोई नियम नहीं है।

समाधान-

प की समस्या भारत के लाखों मजदूरों की समस्या है। सब चीज के नियम बने हुए हैं। वेतन 7 तारीख तक मिल जाना चाहिए। यदि नहीं मिलता है तो यह कानून का उल्लंघन है इसे देखने की जिम्मेदारी श्रम विभाग की है। ओवर टाइम भी दुगना ही मिलना चाहिए और माह के वेतन के साथ मिलना चाहिए। ड्रेस, जुते, साबुन आदि की सुविधाएँ बन्द नहीं की जानी चाहिए थी। यह कानून के अनुसार गलत है। साफ सफाई व सुरक्षा आदि का ध्यान रखने के लिए फैक्ट्रीज एण्ड बॉयलर इंस्पेक्टर को कार्यवाही करनी चाहिए। बोनस भी पहले देते थे तो यह परंपरा बन चुकी थी इसे भी बंद नहीं किया जा सकता था।

लेकिन इन सब समस्याओं के लिए कोई अच्छी यूनियन ही लड़ सकती है। इस के लिए आप की फैक्ट्री के मजदूरों की यूनियन कार्यवाही कर सकती है। यदि यूनियन नहीं है तो मजदूरों की यूनियन बनानी चाहिए और इन सब सुविधाओं के लिए लड़ना चाहिए।

कानून से मिलने वाली सुविधाओं के लिए पहले श्रम विभाग काम करता था। लेकिन आज कल उस ने इन सब चीजों पर ध्यान देना और उद्योगपतियों के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल करना बंद कर दिया है। अब कोई उन के यहाँ शिकायत करता है तो वे कहते हैं आप मुकदमा कर दें। राजस्थान में मुकदमों के निर्णय की गति इतनी कमजोर है कि बरसों लग जाते हैं। अनेक श्रम संबंधी अदालतों में अधिकारी ही नहीं हैं। एक एक अधिकारी दो तीन अदालतें सम्भाल रहा है। सरकार इन अधिकारियों की संख्या बढ़ाना नहीं चाहती। राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने ही मजदूरों को सुविधाएँ कम होने पर कार्यवाही करना बंद कर दिया था। अब मौजूदा सरकार तो इस से बहुत आगे है। उन्हों ने तो उद्योग बंदी करण के लिए सरकार की अनुमति लेने के कानून को और अधिक लचीला बना दिया है।

प के उद्योग के लक्षणों को देख कर लगता है कि उद्योग में मुनाफा घटा है जिस के कारण अब आप के उद्योग के मालिक इस उद्योग को चलाना नहीं चाहते। वे कोई न कोई बहाना बना कर कुछ सालों में इस उद्योग को बंद कर अपनी पूंजी इस उद्योग से निकाल कर कहीं और लगाना चाहते हैं। उन्हों ने उद्योग से पूंजी को निकालना आरंभ कर दिया है। इसी क्रम में उन्हों ने मजदूरों की सुविधाएँ कम कर दी हैं। वे चाहते हैं कि श्रमिक परेशान हो कर आमने सामने की लड़ाई लड़ें, हड़ताल वगैरह करें तो उन्हें उद्योग में तालाबंदी करने, श्रमिकों को कुचलने और बाद में उद्योग को बन्द करने के लिए अच्छा बहाना मिल जाए। श्रमिकों को इन लक्षणों को समझना चाहिए। जिन्हें इस समय किसी और उद्योग में अच्छी नौकरी मिल सकती हो उन्हें उस के लिए प्रयत्न आरंभ कर देना चाहिए और जैसे ही मिले इस नौकरी को छोड़ कर नई नौकरी पर चले जाना चाहिए। जिस तरह की हालत है उस तरह की हालत में यदि फैक्ट्री बंद की गयी और श्रमिकों की छंटनी की गई तो श्रमिकों को उन के मुआवजे, ग्रेच्यूटी व अन्य लाभों के लिए भी कई वर्ष तक लटकाए रखा जा सकता है।

फिलहाल आप को यही सलाह दी जा सकती है कि जोधपुर बड़ा औद्योगिक केन्द्र है और वहाँ बड़े मजदूर संगठन भी हैं। आप अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी बड़े मजदूर संगठन से सलाह कर अपने यहाँ मजदूरों की यूनियन बनाएँ और यूनियन के माध्यम से इन छीन ली गई सुविधाओं के लिए कार्यवाही करें।

अब तक 2 टिप्पणियाँ, आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

राज्य और केन्द्रीय कानूनों में प्रतिकूलता (Repugnancy)

March 25, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
समस्या-

भिलाई, छत्तीसगढ़ से नरेन्द्र कुमार ने पूछा है –

मैं भिलाई इस्पात संयंत्र में सीनियर आपरेटर के पद पर कार्यरत हूँ।  हमारे संयंत्र में 1960  से मध्यप्रदेश औद्योगिक संबंध अधिनियम (MPIR Act/CGIR Act) लागू है। औद्योगिक विवाद अधिनियम में हुए संशोधन के पश्चात रजिस्ट्रार ट्रेड यूनियन का कहना है कि अब औद्योगिक विवाद अधिनियम में 2010 में हुए संशोधन के फलस्वरूप भिलाई इस्पात संयंत्र में मध्यप्रदेश/ छत्तीसगढ़ औद्योगिक संबंध अधिनियम की जगह औद्योगिक विवाद अधिनियम लागू होगा।  उसऩे (1 Oct 2012) अपने आदेश द्वारा भिलाई इस्पात संयंत्र से औद्योगिक संबंध अधिनियम को हटा दिया।  क्या किसी को कानून एक रजिस्ट्रार ट्रेड यूनियन अपने अपने आदेश द्वारा हटा सकता है। जिस कानून (मध्यप्रदेश /छत्तीसगढ़ औद्योगिक संबंध अधिनियम) को राष्ट्रपति की अनुमति से लागू किया गया था।  अब हम पर कौन सा कानून लागू होगा और किस धारा के तहत?  कयों कि हम औद्योगिक संबंध अधिनियम के आदी हो चुके हैं।

समाधान-

THE_INDUSTRIAL_DISPUTES_ACTप ने ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार के जिस आदेश का उल्लेख किया है उसे पढ़े बिना आप के प्रश्न का उत्तर देना संभव नहीं है।  मुझे लगता है कि आप ने उक्त आदेश को सही तरीके से समझा नहीं है। हो सकता है आप ने उसे पढ़ा ही न हो।

प को जानना चाहिए कि देश में तीन तरह के कानून बनते हैं। एक वे कानून जो केवल केन्द्र बना सकता है और पूरे देश पर प्रभावी होते हैं। दूसरे वे कानून जिन्हें सिर्फ राज्य बना सकते हैं और जो केवल राज्य में ही प्रभावी होते हैं। तीसरी तरह के कानून वे हैं जिन्हें दोनों ही सरकारें बना सकती हैं और यदि केन्द्र सरकार बनाती है तो पूरे देश में व राज्य सरकार बनाती है तो केवल राज्य में प्रभावी होते हैं। भारत के संविधान में उन तीनों तरह के कानून जिन विषयों पर बनाए जा सकते हैं उन की तीन सूचियाँ बनी हुई हैं। केन्द्र सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची। केवल तीसरी समवर्ती सूची के विषयों पर बनने वाले कानून हैं जिन में केन्द्रीय कानून और राज्य के कानून में प्रतिकूलता की संभावना हो सकती है। किसी मामले में राज्य का कानून भी वैसा ही हो जैसा कि केन्द्र सरकार का कानून है तो एक ही मामले में दो तरह के कानून होने से समस्या खड़ी हो सकती है। जब भी ऐसी समस्या सामने आती है तो केन्द्रीय कानून राज्य के कानून पर प्रभावी होता है।

क्सर यह होता है कि केन्द्रीय कानून जिन विषयों पर पहले से बने हुए हों उन पर राज्य कानून नहीं बनाते हैं। यदि कानून बनाए भी जाते हैं तो एक ही मामले में दोनों के प्रावधान भिन्न नहीं होते हैं। यदि किसी कानून में एक ही मामले पर केन्द्र और राज्य के कानून में भिन्नता हो तो वह प्रावधान प्रभावी होता है जो केन्द्र ने बनाया हो। लेकिन यदि राज्य समझता है कि केन्द्र द्वारा बनाया गया कानूनी उपबंध उस के राज्य की परिस्थितियों में सही नहीं है और भिन्न होना चाहिए तो राज्य उस विषय पर अपना भिन्न कानून या उपबंध को विधानसभा में पारित करवा सकता है। लेकिन जब तक वह राष्ट्रपति की अनुमति नहीं ले लेता तब तक वह केन्द्रीय कानून के स्थान पर प्रभावी नहीं हो सकता। लेकिन राष्ट्रपति की अनुमति के बाद वह केन्द्रीय कानून के बदले राज्य में प्रभावी रहेगा।

द्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के स्थान पर जो कानून मध्यप्रदेश में बनाया गया था उसे राष्ट्रपति की अनुमति ली गई थी और वह केन्द्रीय कानून के स्थान पर प्रभावी था। लेकिन 2010 में हुए संशोधनों से कुछ नए उपबंध नए मामलों पर औद्योगिक विवाद अधिनियम में जोड़े गए हैं। जिन मामलों में ये उपबंध जोड़े गए हैं उन पर राज्य के कानून में कोई उपबंध नहीं है। इस कारण से 2010 का संशोधन अधिनियम के उपबंध मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में प्रभावी होंगे। लेकिन जिन मामलों पर पहले राष्ट्रपति की अनूमति प्राप्त राज्य का कानून उपलब्ध है उन मामलों में राज्य का कानून प्रभावी होगा।

स कारण से आप को ट्रेड यूनियन रजिस्ट्रार ने जो आदेश दिया है वह केवल मात्र स्पष्टीकरण होना चाहिए कि जिन मामंलों में केन्द्रीय कानून बना है उस मामले में राज्य के कानून में कोई प्रावधान नहीं होने के कारण संशोधन अधिनियम के प्रावधान प्रभावी होंगे। इस कारण आप को उक्त आदेश को ठीक तरह से पढ़ना चाहिए और स्पष्ट हो जाना चाहिए कि राज्य के कानून के कौन से प्रावधान प्रभावी होंगे और कौन से प्रावधान केन्द्रीय कानून के प्रभावी होंगे। यदि आप उक्त आदेश की प्रति हमें उपलब्ध करा दें तो हम स्पष्ट कर सकते हैं कि वास्तविक स्थिति क्या है?

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

पर्यवेक्षक (Supervisor) कब कर्मकार है?

March 16, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
समस्या-

भिलाई, छत्तीसगढ़ से नरेन्द्र कुमार लोधी ने पूछा है-

द्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में 2010 में हुए संशोधन के फलस्वरूप 10,000/- या 15,000/- रुपए से अधिक वेतन प्राप्त करने वाले सुपरवाइजर कर्मकार माने जाएंगे?

समाधान-

THE_INDUSTRIAL_DISPUTES_ACTद्योगिक विवाद अधिनियम,1947 में कर्मकार की जो परिभाषा दी हुई है उस पर आप को ध्यान देना चाहिए।  वहाँ यह परिभाषा वर्तमान में इस प्रकार है-

(s) “Workman” means any person (including an apprentice) employed in any industry to do any manual, unskilled, skilled, technical, operational, clerical or supervisory work for hire or reward, whether the terms of employment be express or implied, and for the purposes of any proceeding under this Act in relation to an industrial dispute, includes any such person who has been dismissed, discharged or retrenched in connection with, or as a consequence of, that dispute, or whose dismissal, discharge or retrenchment has led to that dispute, but does not include any such person-

 (i) Who is subject to the Air Force Act, 1950 (45of l950),or the Army Act, 1950 (46 of 1950), or the Navy Act, 1957 (62 of 1957); or

 (ii) Who is employed in the police service or as an officer or other employee of a prison; or

 (iii) Who is employed mainly in a managerial or administrative capacity; or

 (iv) Who, being employed in a supervisory capacity, draws wages exceeding ten thousand rupees per mensem or exercises, either by the nature of the duties attached to the office or by reason of the powers vested in him, functions mainly of a managerial nature.

श्रमिक’ या कर्मकार’ का अर्थ है किसी भी उद्योग में वेतन या इनाम के लिए शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, परिचालन, लिपिकीय, या पर्यवेक्षीय कार्य करने हेतु नियोजित कोई व्यक्ति (जिस में एक प्रशिक्षु भी सम्मिलित है), जिस के नियोजन की शर्तें व्यक्त या निहित हों सकती हैं, और इस अधिनियम के अंतर्गत औद्योगिक विवाद से संबंधित किसी भी कार्यवाही के संबंध में वे सभी व्यक्ति सम्मिलित हैं और उस औद्योगिक  विवाद के कारण सेवामुक्त, सेवाच्युत या छंटनी कर दिया गया है या उसे सेवामुक्त, सेवाच्युत या छंटनी किए जाने से उत्पन्न हुआ है, लेकिन उस में निम्न लिखित सम्मिलित नहीं है-

 (i)  जो वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45oवाँ, या सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46वाँ), या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का62वां) के अधीन है, या

(ii) जो पुलिस सेवा में या जेल के एक कर्मचारी या अधिकारी के रूप में कार्यरत है, या

(iii) जो मुख्य रूप से एक प्रबंधकीय या प्रशासनिक क्षमता में कार्यरत है, या

(iv) जो पर्यवेक्षीय क्षमता में नियोजित है और दस हजार रुपए प्रतिमाह से अधिक मजदूरी प्राप्त करता है, या कार्यालय से जुड़ी कर्तव्यों की प्रकृति द्वारा या उस में निहित शक्तियों के कारण, मुख्य रूप से एक प्रबंधकीय प्रकृति के कार्य के लिए नियोजित है।

क्त परिभाषा के अनुसार यदि कोई व्यक्ति पर्यवेक्षीय (Supervisory) क्षमता में कार्यरत है और उस का वेतन दस हजार रुपए प्रतिमाह से अधिक है तो उसे कर्मकार नहीं माना जाएगा। पर्यवेक्षकों के लिए वेतन की 10000/- रुपए की यह सीमा संशोधन अधिनियम 2010 के द्वारा ही स्थापित की गई है, इस से पूर्व यह सीमा केवल मात्र 1600/- रुपए ही थी। यह सीमा इस से अधिक (15000/- रुपए) कभी नहीं की गई।

लेकिन उद्योगों में जो पर्यवेक्षक पद पर नियुक्त लोग हैं उन्हें केवल पर्यवेक्षीय कार्य ही नहीं करने पड़ते अपितु उन्हें अन्य अकुशल, कुशल, तकनीकी, परिचालन, लिपिकीय, कार्य भी करने पड़ते हैं। कभी कभी तो होता यह है कि कर्मचारी का पर्यवेक्षीय कार्य केवल नाम मात्र का होता है, उसे अधिकाँश अन्य कार्य ही करने पड़ते हैं लेकिन उस का पदनाम पर्यवेक्षक होता है। वैसी स्थिति में पदनाम का कोई विशेष प्रभाव यह निर्धारित करने में नहीं है कि कर्मचारी पर्यवेक्षक है या नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया है कि यदि इस तरह का विवाद हो कि कोई कर्मचारी कर्मकार है या नहीं तो यह देखा जाएगा कि वह जो कार्य उद्योग में कर रहा था उन का अधिकांश कार्य किस तरह का है। यदि पर्यवेक्षीय कार्य की मात्रा अत्यन्त कम है और कर्मचारी दूसरे कार्य अधिक कर रहा है तो फिर उस कर्मचारी को कर्मकार ही माना जाएगा चाहे उस का वेतन 10000/- रुपए से अधिक क्यों न हो।

स संबंध में आप को तीसरा खंबा पर उपलब्ध औद्योगिक विवाद अधिनियम से संबंधित सभी आलेखों को यहाँ चटका लगा कर पढ़ना चाहिए।

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये

केंटोनमेंट बोर्ड एक स्थानीय निकाय और उद्योग है।

January 12, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
समस्या-

प्रशान्त चौहान, ने महू, जिला इन्दौर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मैं केन्टोंमेंट बोर्ड, महू केंट में विगत १९९९ से कनिष्ठ लिपिक पद पर कार्यरत हूँ।  विगत वर्ष नवम्बर २०११ में मेरी हर्निया सर्जरी केंद्रीय चिकित्सा परिचर्या नियम अंतर्गत पालन करते हुए सम्पादित की गई थी।   जिसका वास्तविक चिकित्सा व्यय लगभग १९५००/- के भुगतान हेतु मैं ने  निर्धारित चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा प्रपत्र में योग्य संलग्नको के साथ विगत फरवरी २०१२ को कार्यालय में जमा कराया।  महीनों तक कोई कार्यवाही न होने पर मैं ने इस दौरान स्मरण पत्र भी कार्यालय को दिए।  एक दिन अचानक विगत सितम्बर २०१२ में कार्यालय द्वारा मेरा दावा तकनीकी कारण दर्शाते हुए निरस्त कर दिया गया।  मैं ने उक्त निरस्त दावे की अपील हमारे वरिष्ठ कार्यालय मध्य कमान, लखनऊ को विगत माह अक्तूबर २०१२ में प्रेषित कर दी। वहां से तत्काल मेरे प्रकरण में अपील का बिन्दुवार प्रतिउत्तर प्रेषित किये जाने हेतु महू कार्यालय को पत्र माय अपील भेजा गया। किन्तु कार्यालय द्वारा आज दिनांक तक उसका प्रतिउत्तर वरिष्ठ कार्यालय, लखनऊ को प्रेषित नहीं किया गया है।  इस सम्बन्ध में मेरे प्रकरण हेतु मैने माह दिसंबर में वरिष्ठ कार्यालय, लखनऊ को स्मरण पत्र भी प्रेषित किया है।

ब मैं यह विधिक सलाह चाहता हूँ कि आगामी पंद्रह दिन और मैं वरिष्ठ कार्यालय की कार्यवाही या मुझे सम्बंधित सुचना प्राप्ति का इंतज़ार कर लेता हूँ, तत्पश्चात सक्षम न्यायलय में परिवाद दायर करता हूँ। कृपया सलाह देवें की क्या मैं उपभोक्ता फोरम, इंदौर में अपने चिकित्सा दावा व्यय क्षतिपूर्ति के सम्बन्ध में वाद दायर कर सकता हूँ?  या यह प्रकरण कर्मचारी-नियोक्ता से सम्बंधित होने के कारण वहां दायर नहीं किया जा सकता है?  अतः इस हेतु किस सक्षम न्यायलय में वाद दायर किया जाना उचित होगा जहाँ न्यूनतम व्यय में त्वरित न्याय प्राप्ति हो सके।  चूँकि मैं एक नौकरीपेशा कर्मचारी हूँ अतः यह बात ध्यान में रखते हुए कृपया उक्त विधिक सलाह प्रदान करें।

समाधान-

malicious prosecutionकेंटोनमेंट बोर्ड, एक तरह का स्थानीय निकाय है जो नगर निगम, ग्राम पंचायत आदि की तरह है। इस बोर्ड का भी उसी तरह एक प्रशानिक क्षेत्र होता है, जिस पर सेना का नियंत्रण रहता है। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2 की उपधारा (ए) में इस के लिए केन्द्र सरकार को समुचित सरकार बताया गया है। इस से यह स्पष्ट है कि यह औद्योगिक विवाद अधिनियम में परिभाषित उद्योग की श्रेणी में भी है। यदि इस अधिनियम में आप कर्मकार के रूप में परिभाषित हैं तो आप के संबंध में औद्योगिक विवाद उठाया जा सकता है।

द्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 की उपधारा (के) में ओद्योगिक विवाद को परिभाषित किया गया है। इस के अनुसार नियोजको और कर्मचारियों के मध्य नियोजन, अनियोजन, कर्मचारियों की नियोजन की स्थितियों व शर्तों के संबंध में कोई भी विवाद या मतभेद औद्योगिक विवाद है। लेकिन एक कर्मचारी द्वारा उस के किसी मामले में उठाया गया विवाद औद्योगिक विवाद नहीं हो सकता। वह ओद्योगिक विवाद का रूप उसी स्थिति में धारण करता है जब कि उसे कर्मचारियों के किसी समूह या उन की ट्रेड यूनियन द्वारा समर्थित हो। लेकिन धारा 2-ए में किसी कर्मकार और उस के नियोजक के मध्य, सेवाच्युति, सेवासमाप्ति, छँटनी और सेवाअवसान के विवाद को किसी कर्मचारी अथवा ट्रेड युनियन के समर्थन के बिना भी औद्योगिक विवाद माना गया है।  जिस का अर्थ यही है कि अकेला कर्मचारी केवल उस की सेवाच्युति, सेवासमाप्ति, छँटनी और सेवाअवसान के विवाद को तो समाधान के लिए औद्योगिक विवाद के रूप में प्रस्तुत कर सकता है किन्तु उस के अन्य विवाद इस अधिनियम में औद्योगिक विवाद के रूप में बिना कर्मचारियो के समूह या यूनियन के समर्थन के बिना औद्योगिक विवाद नहीं होंगे जिस से उन्हें व्यक्तिगत रूप से उठाने का कर्मचारी को कोई अधिकार नहीं है।

प का विवाद आप के चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा के निरस्त होने से संबंधित है। यदि इसे किसी कर्मकार समूह या यूनियन का समर्थन प्राप्त नहीं है तो यह भी एक औद्योगिक विवाद नहीं है और आप इसे अधिकार के रूप में समाधान हेतु औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत स्थापित समझौता कार्यवाही के लिए प्रस्तुत नहीं कर सकते और इस का समाधान औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत स्थापित प्रक्रिया से नहीं हो सकता। यदि आप के मामले को किसी यूनियन या कर्मकारों के समूह का समर्थन प्राप्त नहीं है तो आप इस मामले में औद्योगिक विवाद प्रस्तुत नहीं कर सकते।

किन्तु केंटोनमेंट बोर्ड के कर्मचारियों की सेवाएँ और सेवा शर्तें वैधानिक नियमों से शासित होती हैं। जिस के कारण उन के अंतर्गत उत्पन्न अधिकारों या उन नियमों के उल्लंघन से अधिकारों में कमी होने के मामले दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत किए जा सकते हैं। आप के मामले में आप दीवानी वाद प्रस्तुत कर उक्त चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा के नियम विरुद्ध निरस्त किए जाने की घोषणा और चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा के अनुरूप राशि दिलाने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। दीवानी न्यायालय आप को राहत प्रदान कर सकता है। इस के साथ ही आप इस मामले में केंटोनमेंट बोर्ड के राज्य के रूप में परिभाषित होने के कारण रिट याचिका भी प्रस्तुत कर सकते हैं।

न दोनों ही उपायों के लिए आप को किसी वकील की मदद लेनी पड़ेगी जिस में कुछ तो खर्च होगा ही क्यों कि जो वकील मुकदमा लड़ेगा अपनी फीस तो लेगा ही। जहाँ तक शीघ्र न्याय का प्रश्न है तो भारत में ऐसे न्यायालय उंगलियों पर गिने जा सकते हैं जिन के पास उस की क्षमता से पाँच से दस गुना मुकदमे न हों।  उच्च न्यायालयों में तो मुकदमों का अंबार है। दीवानी न्यायालयों के पास भी काम की कमी नहीं है। इस कारण आप के मुकदमें के निर्णय में कितना समय लगेगा यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये
समस्या-

खुदाना, जिला झुन्झुनू, राजस्थान से सुरेश शर्मा ने पूछा है –

मेरी उम्र 52 वर्ष की है।  मैं जेबीएफ इंडस्ट्रीज लिमिटेड, 8वाँ माला, एक्सप्रेस टावर, नरीमन पाइंट, मुम्बई में सेल्स असिस्टेंट के रूप में 29.03.1997 से काम करता था। 13 वर्ष की नौकरी के बाद दिनांक 17.10.2010 को मुझे अचानक एक दिन कंपनी के वायस प्रेसिडेंट सुधीर गुप्ता ने मेरे साथ गाली गलौच की और बिना किसी नोटिस के व बिना कोई कारण बताए नौकरी से निकाल दिया। मैं ने जून 2010 में वकील से नोटिस दिलवाया तो मुझे जान से मारने की धमकी दी गई। मैं अत्यन्त विपन्न अवस्था में हूँ। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प को नौकरी से निकाले जाने के अगले दिन ही रजिस्टर्ड ए.डी. पत्र से अपने नियोजक को लिखना चाहिए था कि उन्हों ने आप को बिना नोटिस, बिना कारण और बिना अन्तिम भुगतान किए नौकरी से निकाल दिया है। या तो वे आप को नौकरी पर सप्ताह भर में वापस लें अन्यथा आप मुकदमा करेंगे। बाद में भी जब नोटिस देने पर उन्हों ने जान से मारने की धमकी दी तब आप को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवानी चाहिए थी।

प का पद सेल्स असिस्टेंट का था। लेकिन आप ने यह नहीं बताया कि आप का काम किस प्रकार का था, अर्थात आप से नौकरी के दौरान क्या क्या काम कराया जाता था। यदि आप यह बताते तो हम यह पता कर सकते थे कि आप औद्योगिक विवाद अधिनियम में वर्णित कर्मकार हैं या नहीं? यदि आप कर्मकार हैं तो फिर आप को अभी भी तुरन्त मुम्बई श्रम विभाग में अपना औद्योगिक विवाद प्रस्तुत करना चाहिए। आप के औद्योगिक विवाद प्रस्तुत करने के 45 दिनों के भीतर यदि श्रम विभाग द्वारा आप के मामले को श्रम न्यायालय को नहीं भेजा जाता है तो आप स्वयं श्रम न्यायालय के समक्ष उठा सकते हैं।

दि आप कर्मकार (Workman) हैं तो आप के मुकदमा जीतने की संभावना पूरी है। आप को तुरन्त कार्यवाही करना चाहिए। आप पहले ही बहुत देरी कर चुके हैं।

यहाँ क्लिक कर सबसे पहले टिप्पणी कीजिए

बोनस का समझौता केवल एक वर्ष का ही हो सकता है …

October 31, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
समस्या-

खरगौन, मध्यप्रदेश से हरि यादव पूछते हैं –

 कारखाने में अगर मजदूरों को बोनस जो कि 15 सालों से एक जैसा दिया जा रहा है तो क्या बोनस की बढ़ोतरी को लेकर की गई अहिंसात्मक शांतिपूर्ण ह्ड़ताल सही है।  हमारे समझौते की अवधि अगस्त 2012 में समाप्त हो चुकी है।  हमें 15 सालों से 3000/- रुपए से से भी कम बोनस दिया जाता रहा है।  इस दीपावली पर बोनस बढ़ोतरी की माँग की तो कंपनी ने कहा कि आपके समझौते में बोनस तीन हज़ार है जो 5 सालों का है और इस साल भी समझौते के अनुसार 3000/- हज़ार ही मिलेगा। जब कि समझौते की अवधि 2007-2012 है।  इसके बाद मजदूरों ने बोनस वृद्धि लिए ह्ड़ताल कर दी।   पहले हमने हड़ताल की सूचना दी जिसे कंपनी ने नहीं लिया।  हमें क़ानूनी सलाह दीजिए कि क्या मजदूर सही है?

 समाधान-

बोनस कानून के अंतर्गत बोनस कम से कम 8.33 प्रतिशत और अधिक से अधिक 20 प्रतिशत दिया जा सकता है। इस का अर्थ यह है कि किसी मजदूर ने वर्ष भर में मूल वेतन और महंगाई भत्ते की जितनी राशि अर्जित की है उस का 8.33 से 20 प्रतिशत तक बोनस मजदूर प्राप्त कर सकता है। हर वर्ष मजदूरों की वेतन वृद्धि होती है, महंगाई भी बढ़ती है और आम तौर पर हर तीन वर्ष में वेतन पुनरीक्षण भी हो जाता है। इसलिए बोनस की राशि में तो अंतर आना चाहिए। ऐसा संभव नहीं है कि पिछले 15 वर्ष से 3000/- रुपए या उस के आसपास ही बोनस मिल रहा हो।  बोनस का आधार पिछले वर्ष की कारखाने की बैलेस शीट पर निर्भर करता है।  बैलेंस शीट केवल पिछले वर्ष की हो सकती है। आगामी वर्ष की नहीं। इस कारण बोनस का समझौता पिछले एक वर्ष की अवधि के लिए ही हो सकता है, इस से अधिक का नहीं। बोनस का कोई भी समझौता 5 वर्ष का नहीं हो सकता।

 आप ने यह कहा है कि मजदूरों ने नोटिस दिया था जिसे प्रबंधक ने नहीं लिया। इस का अर्थ यह है कि आप के कारखाने में या तो मजदूरों की कोई यूनियन है जिस ने नोटिस दिया होगा। यदि यूनियन नहीं है तो कारखाने के बहुसंख्यक मजदूरों की आमसभा में आठ-दस मजदूरों की कमेटी बनाई गई होगी और उस ने नोटिस दिया होगा।  यह कहना भी उचित नहीं है कि प्रबंधक ने नोटिस नहीं लिया। यदि प्रबंधक ने नोटिस नहीं लिया है तो नोटिस रजिस्टर्ड डाक से उसे भेजा जा सकता था। यदि वह नहीं ले कर डाक को वापस कर देता तो भी यही माना जाता कि नोटिस दे दिया गया था। एक रीति और है कि यूनियन श्रम विभाग को नोटिस देती जिसे श्रम विभाग प्रबंधन को भेज देता।

मारा अनुमान है कि आप के कारखाने में मजदूरों की यूनियन और प्रबंधन के बीच पाँच वर्ष का वेतन पुनरीक्षण का समझौता हुआ होगा और उस की अवधि पाँच वर्ष की रही होगी। अवधि समाप्त हो जाने के कारण फिर से वेतन पुनरीक्षण की मांग उठाई गई होगी। चूँकि वार्षिक बोनस का समय भी है इस कारण से बोनस की मांग भी उसी मांग पत्र में सम्मिलित कर दी गई होगी।  इसी कारण से आप इसे बोनस का ही विवाद समझ रहे हैं।

 हमें लगता है आप अपनी समस्या को ठीक से समझ नहीं सके हैं और इस कारण से यहाँ ठीक से हमें भी नहीं बता पा रहे हैं।  आप को चाहिए कि आप मजदूरों की यूनियन के नेता से पूरी जानकारी हासिल करें कि वास्तविक समस्या क्या है।  यदि यूनियन को कोई समस्या है तो आप यूनियन के अध्यक्ष या मंत्री को कहें कि वे उचित कानूनी सहायता प्राप्त करें और जो कुछ भी हो चुका है उसे दुरुस्त करने का प्रयत्न करें।

1 टिप्पणी. आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिये
Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada