Industrial Dispute Act Archive

संविदा के अवसान से कर्मकार की सेवा समाप्ति, जो छँटनी नहीं है

July 1, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

छँटनी की परिभाषा में हम ने पाया था कि नियोजक द्वारा किसी भी कर्मकार की सेवा समाप्ति चाहे वह किसी भी कारण से क्यों न की गई हो छँटनी है।  किसी भी कर्मकार को छँटनी किए जाने के लिए नियोजक को क्या क्या करना आज्ञात्मक है यह औद्योगिक विवाद अधिनियम के  अध्याय 5-क तथा अध्याय 5-ख में निर्देशित किया गया है।  लेकिन धारा 2 (ओओ) में छँटनी के अपवाद प्रदर्शित किये गये हैं। इन में से तीन की हम पहले चर्चा कर चुके हैं। चौथा अपवाद उपधारा 2 (ओओ) (बीबी)  निम्न प्रकार है —

    [(bb) Termination of the service of the workman as a result of the non-renewal of the contract of employment between the employer and the workman concerned on its expiry or of such contract being terminated under a stipulation in that behalf contained therein;

अर्थात् –

(खख) किसी कर्मकार की सेवा संविदा का अवसान हो जाने पर नियोजक और कर्मकार के मध्य सेवा संविदा का नवीनीकरण न होने के फलस्वरुप या संविदा में अंकित किसी शर्त के अतर्गत सेवा संविदा की समाप्ति से हुई  सेवा समाप्ति;

    इस अपवाद के दो भाग हैं,

1. जब सेवा संविदा में संविदा की अवधि निश्चित कर दी गई हो तो उस अवधि के समाप्त हो जाने से सेवा संविदा का अवसान हो जाने पर सेवा संविदा का नवीनीकरण न किया गया हो तब होने वाली कर्मकार की सेवा समाप्ति; तथा

2. सेवा संविदा में अंकित किसी शर्त के कारण सेवा संविदा का अवसान हो जाने से हुई सेवा समाप्ति, को भी छँटनी की परिभाषा के बाहर रखा गया है।

मूल अधिनियम में यह अपवाद नहीं था। इसे 1984 में औद्योगिक विवाद अधिनियम में हुए 49वे संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया। इस संशोधन ने संपूर्ण औद्योगिक नियोजन के स्वरूप को ही बदल डाला। अब नया नियोजन देने के समय नियोजक अक्सर यह शर्त रखने लगे कि उस की नियुक्ति एक निश्चित अवधि के लिए की जा रही है।  यदि उस अवधि के उपरान्त नियोजक कर्मकार की सेवा संविदा का नवीनीकरण नहीं करता है तो कर्मकार की सेवा समाप्त हो जाती है जिसे छँटनी नहीं माना और नियोजक को किसी तरह की आज्ञापक प्रक्रिया को अपनाने की आवश्यकता समाप्त हो गई। इस प्रावधान का सर्वाधिक लाभ स्वयं सरकारों ने उठाया।  वे निश्चित अवधि के लिए ही सेवा संविदा करने लगे और एक नए प्रकार का कर्मकार अस्तित्व आ गया जिसे आज कल संविदाकर्मी कहा जाता है।

सी तरह नियुक्ति पत्र, प्रमाणित या संस्थान पर प्रभावी मॉडल स्थाई आदेशों या सेवा नियमों में किसी शर्त के होने पर उस शर्त के अनुसार संविदा का अवसान हो जाने से होने वाली सेवा समाप्ति को भी छँटनी की परिभाषा के बाहर कर दिया गया और इस तरह की सेवा समाप्ति के लिेए भी छँटनी के लिए निर्धारित आज्ञापक प्रक्रिया के अपनाने की आवश्यकता नहीं रही।

द्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (ओओ) में परिभाषित “छँटनी” को किसी भी कारण से नियोजक द्वारा की गई कर्मकार की सेवा समाप्ति कहा गया है, लेकिन साथ ही उस के कुछ अपवाद भी बताए गए हैं। स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति उस का पहला अपवाद था।  छँटनी का दूसरा अपवाद निम्न प्रकार है-

 (b) Retirement of the workman on reaching the age of Superannuation if the contract of employment between the employer and the workman concerned contains a stipulation in that behalf.

(ख) यदि कर्मकार और नियोजक के मध्य हुई सेवा संविदा में उपबंध हो तो एक निश्चित उम्र पूर्ण कर लेने के कारण हुई सेवा निवृत्ति।

क्त अपवाद से स्पष्ट है कि यदि कर्मकार और नियोजक के बीच जो भी सेवा संविदा है उस में कर्मकार के एक निश्चित आयु का हो जाने पर उस की सेवा निवृत्ति की शर्त का होना आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि इस शर्त में उम्र निश्चित की गई हो।

र्मकार और नियोजक के बीच की सेवा संविदा वह संविदा है जिसे कर्मकार द्वारा स्वीकार किया गया हो।  बम्बई उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने एक मामले में यह निर्णय दिया कि एक तो कथित सेवा संविदा एक तो सेवा संविदा ही नहीं है। दूसरे उस कथित संविदा में सेवा निवृत्ति की कोई उम्र निश्चित ही नहीं की गई है।

दि किसी सेवा संविदा में सेवा निवृत्ति की कोई उम्र निश्चित नहीं की गई हो तो उस संस्थान पर प्रभावी प्रमाणित स्थाई आदेशों में निश्चित की गई सेवा निवृत्ति की उम्र को सेवा निवृत्ति माना जाएगा, क्योंकि स्थाई आदेशों को वैधानिक मान्यता प्राप्त होती है। यदि किसी संस्थान में स्थाई आदेश प्रमाणित न हों तो उस संस्थान में प्रभावी मॉडल स्थाई आदेशों में निश्चित की गई सेवानिवृत्ति की उम्र को उस संस्थान कर्मकारों की सेवा निवृत्ति की उम्र माना जाएगा।

 लेकिन यदि कोई सेवा संविदा न हो और कोई स्थाई आदेश भी प्रभावी न हों तो किसी निश्चित उम्र पर कर्मकार की सेवा समाप्ति को सेवा निवृत्ति नहीं माना जा सकता। उसे छँटनी ही माना जाएगा और उस के लिए छँटनी के लिए आवश्यक प्रक्रिया का अनुसरण नियोजक को करना ही होगा।

कर्मकार की स्वेच्छिक सेवानिवृत्ति क्या है?

June 14, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

तीसरा खंबा की पोस्ट औद्योगिक कर्मकार को नौकरी से हटाये जाने के तरीके में हमने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (ओओ) में परिभाषित “छँटनी” शब्द का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया था कि किस किस तरह की सेवा समाप्ति को छँटनी नहीं माना जा सकता है।  छँटनी की परिभाषा में स्पष्ट कहा गया है कि नियोजक द्वारा कर्मकार की किसी भी कारण से की गई सेवा समाप्ति छँटनी है यदि वह धारा 2 -(ओओ)  में वर्णित अपवादों में नहीं आती है।  कर्मकार की स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति उस का पहला अपवाद है।

हाँ स्वैच्छिक शब्द का प्रयोग किया गया है, जिस से स्पष्ट है कि यहाँ स्वयं कर्मकार की इच्छा से हुई सेवा समाप्ति का उल्लेख किया जा रहा है। कोई व्यक्ति किसी नियोजक के यहाँ नियोजन प्राप्त कर लेता है उस का यह अर्थ नहीं है कि वह सदैव उस के यहाँ नियोजन में रहेगा। वह जब चाहे स्वैच्छा से अपनी सेवा त्याग सकता है। लेकिन इस संबंध में स्थाई आदेशों तथा नियुक्ति पत्र में एक शर्त सदैव रहती है कि यदि कर्मकार स्वैच्छा से सेवा त्याग करना चाहता है तो उसे एक माह या अधिक समय पूर्व इस की सूचना नियोजक को देनी होगी। अनेक नियुक्ति पत्रों में यह भी शर्त होती है कि यदि कर्मकार इस तरह का नोटिस नहीं देता है तो उसे नोटिस की निश्चित अवधि के वेतन के बराबर राशि नियोजक को अदा करनी होगी। जिसे नियोजक कर्मकार को देय परिलाभों में से भी काट सकता है।

दि कोई कर्मकार त्याग पत्र देता है और उस में यह शर्त अंकित करता है कि वह निश्चित अवधि के उपरान्त सेवा त्याग देगा यदि उसे उस तिथि को उस के बकाया परिलाभ और ग्रेच्युटी दे दी जाए। यदि नियोजक उक्त त्याग पत्र का कोई उत्तर नहीं देता है या जिन परिलाभों को देने का उल्लेख उस ने अपने त्याग पत्र में किया है उन्हें या उन में से किसी को देने से मना कर देता है जिस के कारण कर्मकार निश्चित तिथि को नौकरी छोड़ने से मना करता है। बाद में नियोजक यह कहता है कि उस का त्याग पत्र स्वीकार कर लिया गया है तो इसे स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति नहीं कहा जा सकता। इस तरह की सेवा समाप्ति नियोजक द्वारा की गई छँटनी ही कही जाएगी।  इसे कामगार चुनौती दे सकता है।

दि कोई कर्मकार एक लंबे समय तक अनुपस्थित रहता है  तो नियोजक यह मान कर कि कर्मकार स्वैच्छा से नौकरी छोड़ गया है उस का नाम मस्टर रोल से हटा सकता है। यदि कोई कर्मकार उस की इच्छा के विपरीत किसी कारण से अपने कर्तव्य पर अनुपस्थित रहता है और उस का नाम मस्टर रोल से नियोजक द्वारा हटा दिया जाने के बाद वह कर्तव्य पर उपस्थित होता है तो नियोजक को उसे सेवा पर लेना चाहिए। क्यों कि वह कभी भी नौकरी छोड़ना नहीं चाहता था। लेकिन यदि नियोजक उसे कर्तव्य पर वापस नहीं लेता है तो यह नियोजक द्वारा की गई छँटनी मानी जाएगी जो कि अवैध होगी।

स्तुतः स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति पूर्णतः कर्मकार द्वारा किया गया कृत्य है। यदि इस तरह की सेवा समाप्ति में किसी भी तरह से कर्मकार की इच्छा का लोप होता है तो वह स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति नहीं होगी। दबाव दे कर लिया गए त्याग पत्र से सेवा समाप्ति स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति नहीं है।

औद्योगिक कर्मकार को नौकरी से हटाये जाने के तरीके

June 3, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
समस्या-

किसी स्थाई या स्थाई श्रमिक को उस का नियोजक (कंपनी) किस क़ानून का उपयोग करके नौकरी से निकाल सकता है,  या किस अपराध में उसे सेवाच्युति का दंड दे सकता है? मुझे इस से सम्बन्धितप्रमुख श्रमिक कानूनों की जानकारी दें जिस से मैं यह जान सकूँ कि श्रमिकों के हित में क्या क़ानूनी प्रावधान हैं?

-हीरा लाल यादव, इंदौर, मध्य प्रदेश

समाधान-

हाँ भी किसी उद्योग में श्रमिक नियोजित किए जाते हैं वहाँ औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 प्रभावी होता है जो श्रमिक और नियोजक के संबंधों को शासित करता है। कोई भी व्यक्ति जो श्रम विवादों में रुचि रखता है और श्रमिकों के हित में काम करना चाहता है उसे सब से पहले इस अधिनियम का गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए। इस अधिनियम में बारह अध्याय और पाँच अनुसूचियाँ हैं।  इन में से अध्याय 5-ए तथा 5-बी श्रमिकों का नियोजन समाप्त करने के विषय में हैं। इस के अतिरिक्त अध्याय 1 की धारा 2 (ओओ) का अध्ययन करना आवश्यक है जिस में छँटनी शब्द को परिभाषित किया गया है। हम सब से पहले इसी छँटनी शब्द की परिभाषा पर विचार करते हैं।

छँटनी की परिभाषा अधिनियम में निम्न प्रकार दी गई है-

[(oo) “Retrenchment” means the termination by the employer of the service of a workman for any reason whatsoever, otherwise than as a punishment inflicted by way of disciplinary action but does not include-

 (a) Voluntary retirement of the workman; or

 (b) Retirement of the workman on reaching the age of Superannuation if the contract of employment between the employer and the workman concerned contains a stipulation in that behalf; or

 [(bb) Termination of the service of the workman as a result of the non-renewal of the contract of employment between the employer and the workman concerned on its expiry or of such contract being terminated under a stipulation in that behalf contained therein; or]

 (c) Termination of the service of a workman on the ground of continued ill-health;

इस परिभाषा में कहा गया है कि-

(ओओ) ‘छँटनी’ का अर्थ नियोजक द्वारा एक कर्मकार की किसी भी कारण से की गई सेवा समाप्ति है, लेकिन उस में अनुशासनिक कार्यवाही के माध्यम से दंड स्वरूप दी गई सेवा समाप्ति सम्मिलित नहीं है और उस के सिवा निम्न चीजें भी सम्मिलित नहीं हैं-

(क)  कर्मकार द्वारा स्वेच्छा से प्राप्त की गई सेवा निवृत्ति; .या

(ख) यदि कर्मकार और नियोजक के मध्य हुई सेवा संविदा में उपबंध हो तो एक निश्चित उम्र पूर्ण कर लेने के कारण हुई सेवा निवृत्ति; या

(खख) किसी सेवा संविदा की अवधि समाप्त होने पर संविदा के नवीनीकरण न होने या संविदा में अंकित किसी कारण से हुई कर्मचारी की सेवा समाप्ति; या

(ग) लगातार बीमार रहने के कारण की गयी कर्मकार की सेवा समाप्ति। 

स तरह एक अकेले यह परिभाषा बताती है कि किसी उद्योग में नियोजित श्रमिक की सेवाएँ समाप्त करने या नौकरी से निकाले जाने के कितने तरीके हो सकते हैं? ये निम्न प्रकार हैं-

1. यदि कोई कर्मकार स्वयं ही स्वेच्छा से नौकरी छोड़ सकता है अर्थात त्याग-पत्र दे कर अपनी सेवाएँ समाप्त कर सकता है। यह भी हो सकता है कि कोई कर्मकार बिना सूचना दिए नौकरी पर न आए, या फिर अवकाश पर जाए और एक लंबे समय तक नौकरी पर न लौटे, तब भी कुछ परिस्थितियों में यह समझा जा सकता है कि कर्मकार स्वैच्छा से नौकरी छोड़ कर चला गया है। ऐसी सेवा समाप्ति छँटनी नहीं होगी।

2. अक्सर सेवा संविदा में या औद्योगिक संस्थान के स्थाई आदेशों या प्रारूप स्थाईआदेशों में सेवा निवृत्ति की आयु के बारे में उपबंध होता है। इस उपबंध के द्वारा निश्चित की गई आयु प्राप्त कर लेने पर उसे सेवा निवृत्त कर दिया जाता है। ऐसी सेवानिवृत्ति भी छँटनी के बाहर है।

3. प्रत्येक कर्मकार को सेवा आरंभ किए जाने के समय, उसे पद पर स्थाई किए जाने के समय या पदोन्नति होने पर नियुक्ति पत्र दिए जाते हैं। अनेक उद्योगों में ऐसे नियुक्तिपत्र कर्मकार को दिए ही नहीं जाते लेकिन उन पर हस्ताक्षर करवा कर नियोजक अपने पास रख लेते हैं। ये नियुक्ति पत्र अक्सर अंग्रेजी में होते हैं। कर्मकार को पता ही नहीं होता है कि उस से किसी नियुक्तिपत्र पर हस्ताक्षर करवाए गए हैं। कर्मकार द्वारा हस्ताक्षर युक्त यह नियुक्ति पत्र जो नियोजक के पास होता है वास्तव में सेवा संविदा है। यदि इस संविदा में लिखा हैा कि यह नियुक्ति किसी निश्चित तिथि तक के लिए है या निश्चित अवधि के लिए है या फिर उस में लिखा है कि किसी घटना के घटित होने पर सेवा समाप्त हो जाएगी। वैसी स्थिति में उस निश्चित तिथि या अवधि या घटना के घटित हो जाने पर की गई सेवा समाप्ति भी कर्मकार की सेवा समाप्ति का एक तरीका है। आज कल नियोजक इसी का सर्वाधिक उपयोग कर रहे हैं। वे नियोजन देने के समय ही नियुक्ति पत्र में इस तरह की शर्तों पर कर्मकार के हस्ताक्षर ले लेते हैं और कर्मकार को पता भी नहीं होता कि उस की नियुक्ति किसी निश्चित तिथि या अवधि तक के लिए है या फिर किसी खास घटना के घटित होने पर समाप्त हो जाएगी। उसे तो पता भी तभी लगता है जब उस की सेवा समाप्त कर दी जाती है। इस तरह की सेवा समाप्ति भी छँटनी नहीं है।

4. यदि कोई कर्मकार नियोजन में रहते हुए, सेवा संविदा का उलंघन करने का, स्थाई आदेशों या प्रारूप स्थाई आदेशों या सेवा नियमों में उल्लखित कोई दुराचरण करता है तो उसे आरोप पत्र दे कर, नैसर्गिक न्याय सिद्धान्तों के अनुरूप घरेलू जाँच कर के, जाँच में आरोप सिद्ध हो जाने पर उसे दंडित कर सकता है। यदि यह दंड सेवा च्युति या सेवा समाप्ति का दंड है तो ऐसी सेवाच्युति या सेवा समाप्ति भी छँटनी नहीं होगी।

5. यदि कोई कर्मकार लगातार  लंबें समय तक बीमार रहे और उस कारण से वह लंबे समय के लिए कर्तव्य पर उपस्थित नहीं हो सके। यदि उपस्थित हो जाए तो भी कर्तव्य करने में असमर्थ रहे तो उसे इस लंबी बीमारी के आधार पर सेवा से पृथक किया जा सकता है। ऐसी सेवा समाप्ति भी छँटनी नहीं होगी।

6. यदि उक्त पाँचों तरह से कर्मकार की सेवा समाप्त न कर के किसी अन्य कारण से उस की सेवा समाप्ति की गई है तो वह छंटनी होगी।

स तरह किसी भी औद्योगिक संस्थान में किसी कर्मकार की सेवा समाप्ति के यही छह तरीके हैं। इन में से प्रत्येक रीति के बारे में विस्तार से व्याख्या की जा सकती है। लेकिन वह फिर कभी।

औद्योगिक विवाद अधिनियम में कामगार की परिभाषा

January 28, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

पिछली पोस्ट औद्योगिक नियोजक एवं श्रमिक/कर्मकार में हमने नियोजक और कर्मकार की परिभाषाएँ जानी थीं। इन में कर्मकार की परिभाषा कुछ व्यापक और विस्तृत है। इस परिभाषा को सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने बार बार परिभाषित किया है। इस परिभाषा को हम तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं। पहला भाग कर्मकार को उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है जो किसी उद्योग में शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, परिचालकीय, लिपिकीय या पर्यवेक्षीय कार्यों के लिए वेतन या ईनाम के  नियोजित है। इस भाग में यह परिभाषित किया गया है कि कर्मकार का अर्थ क्या है? दूसरे भाग में कुछ अन्य चीजों को भी सम्मिलित किया गया है जो पहले भाग में सम्मिलित नहीं था। ‘जिन की सेवाच्युति, सेवामुक्ति और छंटनी के कारण कोई औद्योगिक विवाद उत्पन्न हुआ है वे उस औद्योगिक विवाद से संबंधित किसी भी कार्यवाही के लिए कामगार होंगे। इस भाग से कामगार शब्द में कुछ लोग और शामिल किए गये हैं। तीसरा भाग विशेष रूप से कुछ लोगों को इस परिभाषा से बाहर कर देता है। जिस का अर्थ है कि यदि वह पहले दो भागों के आधार पर कामगार माना जाए तब भी वह इस भाग के कारण कामगार नहीं माना जाएगा।

रिभाषा का प्रथम भाग में यह संकल्पना प्रस्तुत की गई है कि एक व्यक्ति को कामगार होने के लिए किसी के द्वारा नियोजित होना चाहिए। अर्थात उस व्यक्ति और किसी औद्योगिक नियोजक के मध्य नियोजन की संविदा होनी चाहिए। यदि दोनों के मध्य कोई नियोजन संविदा नहीं है या नियोजक और नियोजिति का संबंध नहीं है तो कामगार की परिभाषा की भूमिका आरंभ नहीं हो सकती। एक बार यह संबंध स्थापित होना सिद्ध हो जाए तो वह कितने समय का था, आकस्मिक अस्थाई या स्थाई प्रकृति का था, पूर्णकालिक था या अंशकालिक था यह सब गौण हो जाता है। कोई भी व्यक्ति जो उद्योग में नियोजित है वह कामगार हो सकता है उस की प्रास्थिति गौण हो जाती है।

परिभाषा के प्रथम भाग में प्रशिक्षु (एप्रेंटिस) को विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है। जिस का अर्थ है कि यदि किसी व्यक्ति को केवल कोई काम सीखने की संविदा पर भी नियोजित किया गया है तो वह कामगार होगा। लेकिन प्रशिक्षु अधिनियम के प्रावधानों की समीक्षा करने के बाद यह निर्धारित किया गया कि इस अधिनियम अंतर्गत के अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति उद्योग में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए आता है तो वह कामगार नहीं होगा। लेकिन अन्य व्यक्ति जो प्रशिक्षु अधिनियम के अंतर्गत उ्दयोग में नहीं आए हैं लेकिन जिन्हें किसी प्रशिक्षु संविदा के अंतर्गत काम सीखने के लिए नियोजित किया गया है वे व्यक्ति कामगार माने जाएंगे। इस उपबंध का एक विशिष्ठ कारण यह भी रहा कि बहुत से उद्योग प्रशिक्षु संविदा के अंतर्गत कई वर्षों तक लोगों से नाम मात्र की मजदूरी पर काम कराते रहते हैं और फिर उन्हें नौकरी से हटा कर नए लोगों को प्रशिक्षु संविदा के अंतर्गत काम पर रख लेते हैं। इस तरह गरीब मजबूर बेरोजगारों का शोषण चलता रहता है। इसी को रोकने के उपाय के अंतर्गत प्रशिक्षु शब्द को कामगार की परिभाषा में सम्मिलित किया गया।

रिभाषा के प्रथम भाग में कहा गया कि नियोजित व्यक्ति किसी उद्योग में नियोजित होना चाहिए। यदि जिस संस्थान में उसे नियोजित किया गया है वह उद्योग नहीं है तो उस व्यक्ति को कर्मकार नहीं माना जा सकता। एक और बात है कि नियोजित व्यक्ति को किसी ईनाम या वेतन के लिए नियोजित होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के काम के बदले में कोई प्रतिफल निश्चित न किया गया हो कोई संविदा ही अस्तित्व में नहीं होगी। संविदा न होने की स्थिति में किसी व्यक्ति को कर्मकार नहीं कहा जा सकता। ईनाम शब्द का उल्लेख यहाँ विशेष रूप से किया गया है जिस का अर्थ है कि हमेशा काम के लिए वेतन ही प्रतिफल नहीं हो सकता। किसी व्यक्ति को उस के काम के परिमाण के आधार पर अर्थात किए गए काम के आधार पर प्रतिफल दिया जाना भी तय किया जा सकता है और यहाँ तक कि कमीशन के आधार पर भी मजदूरी चुकाई जा सकती है।

कामगार की परिभाषा के प्रथम भाग की महत्वपूर्ण शर्त यह है कि दो व्यक्तियों के मध्य नियोजन की संविदा होनी चाहिए। पुराने जमाने में इसे मालिक-मजदूर संबंध कहा जाता था, पर इस औद्योगिक युग में इसे नियोजन संविदा कहा जाना उचित ही है।अगले शनिवार को हम देखेंगे इस संविदा को पहचानने के तरीके क्या हैं?

औद्योगिक नियोजक और श्रमिक/कर्मकार

January 21, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

म संक्षेप में औद्योगिक विवाद अधिनियम और उस में परिभाषित ‘उद्योग’ शब्द के बारे में बात कर चुके हैं। हम यह जानने की और आगे बढ़ें कि औद्योगिक विवाद क्या हैं इस से पहले हमें ‘नियोजक’ और ‘श्रमिक’ शब्दों के बारे में जानना आवश्यक है। नियोजक को इस अधिनियम में निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है-

(g) “Employer” means-

 (i) In relation to any industry carried on by or under the authority of any department of the Central Government or a State Government, the authority prescribed in this behalf, or where no authority is prescribed, the head of the department;

 (ii) In relation to an industry carried on by or on behalf of a local authority, the chief executive officer of that authority;

नियोजक का अर्थ-

(i) केन्द्रीय अथवा राज्य सरकार द्वारा अथवा उन के किसी विभाग की प्राधिकारिता के अंतर्गत संचालित उद्योग के लिए इस संबंध में विहित प्राधिकारी और जहाँ कोई प्राधिकारी विहित नहीं किया गया हो वहाँ उस विभाग का प्रधान;

(ii) स्थानीय प्राधिकरण द्वारा और उन के लिए संचालित किसी उद्योग के संबंध में उस स्थानीय प्राधिकरण का मुख्य कार्यकारी अधिकारी है।

 इस प्रकार हम देखते हैं कि नियोजक शब्द की परिभाषा निदर्शी है न कि संपूर्ण। यहाँ केन्द्र व राज्य सरकारों और स्थानीय प्राधिकारणों द्वारा या उन के लिए संचालित उद्योगों  के लिए तो नियोजक को परिभाषित किया गया है लेकिन अन्य उद्योगों के लिए नहीं। इस का सामान्य अर्थ यही है कि अन्य उद्योगों के लिए नियोजक का निर्धारण करने के लिए हमें नियोजक शब्द के शब्दकोषीय अर्थ को ही मानना होगा। जिस के अनुसार किसी व्यक्ति के लिए नियोजक वही होगा जो उसे नियोजन में नियुक्त करता है, वेतन आदि का भुगतान करता है। जैसे किसी एकल स्वामित्व वाले उद्योग के लिए नियोजक उस उद्योग का स्वामी होगा। यदि उद्योग भागीदारी फर्म द्वारा संचालित किया जा रहा है तो उस के भागीदार नियोजक होंगे और उद्योग किसी जोइंट स्टॉक कंपनी द्वारा संचालित किया जा रहा है तो उस का निदेशक मंडल उस के कर्मचारियों का नियोजक होगा।

इस अधिनियम में ‘श्रमिक’ अथवा ‘कर्मकार’ शब्द को निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है-

(s) “Workman” means any person (including an apprentice) employed in any industry to do any manual, unskilled, skilled, technical, operational, clerical or supervisory work for hire or reward, whether the terms of employment be express or implied, and for the purposes of any proceeding under this Act in relation to an industrial dispute, includes any such person who has been dismissed, discharged or retrenched in connection with, or as a consequence of, that dispute, or whose dismissal, discharge or retrenchment has led to that dispute, but does not include any such person-

 (i) Who is subject to the Air Force Act, 1950 (45of l950),or the Army Act, 1950 (46 of 1950), or the Navy Act, 1957 (62 of 1957); or

 (ii) Who is employed in the police service or as an officer or other employee of a prison; or

 (iii) Who is employed mainly in a managerial or administrative capacity; or

 (iv) Who, being employed in a supervisory capacity, draws wages exceeding ten thousand rupees per mensem or exercises, either by the nature of the duties attached to the office or by reason of the powers vested in him, functions mainly of a managerial nature.

‘श्रमिक’ या ‘कर्मकार’ का अर्थ है किसी भी उद्योग में वेतन या इनाम के लिए शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, परिचालन, लिपिकीय, या पर्यवेक्षीय कार्य करने हेतु नियोजित कोई व्यक्ति (जिस में एक प्रशिक्षु भी सम्मिलित है), जिस के नियोजन की शर्तें व्यक्त या निहित हों सकती हैं, और इस अधिनियम के अंतर्गत औद्योगिक विवाद से संबंधित किसी भी कार्यवाही के संबंध में वे सभी व्यक्ति सम्मिलित हैं और उस औद्योगिक  विवाद के कारण सेवामुक्त, सेवाच्युत या छंटनी कर दिया गया है या उसे सेवामुक्त, सेवाच्युत या छंटनी किए जाने से उत्पन्न हुआ है, लेकिन उस में निम्न लिखित सम्मिलित नहीं है-

 (i)  जो वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45oवाँ, या सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46वाँ), या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का62वां) के अधीन है, या

(ii) जो पुलिस सेवा में या जेल के एक कर्मचारी या अधिकारी के रूप में कार्यरत है, या

(iii) जो मुख्य रूप से एक प्रबंधकीय या प्रशासनिक क्षमता में कार्यरत है, या

(iv) जो पर्यवेक्षीय क्षमता में नियोजित है और दस हजार रुपए प्रतिमाह से अधिक मजदूरी प्राप्त करता है, या कार्यालय से जुड़ी कर्तव्यों की प्रकृति द्वारा या उस में निहित शक्तियों के कारण, मुख्य रूप से एक प्रबंधकीय प्रकृति के कार्य के लिए नियोजित है।

 

र्मकार की परिभाषा में आप यहाँ देख सकते हैं कि यह निदर्शी होने के स्थान पर संपूर्ण है। लेकिन इस तरह की परिभाषा अक्सर ही पक्षकारों के बीच विवाद उत्पन्न करती है जिस की व्याख्या न्यायालयों द्वारा की जाती है। किसी भी औद्योगिक विवाद में अक्सर ही यह आपत्ति नियोजक द्वारा उठाई जाती है कि उस औद्योगिक विवाद से संबंधित व्यक्ति अधिनियम में परिभाषित कर्मकार नहीं है। ऐसी आपत्ति का निराकरण साक्ष्य और उक्त परिभाषा की व्याख्या के आधार पर ही किया जा सकता है। परिभाषा की व्याख्या सदैव ही एक विधिक विवाद-बिंदु होता है और जिस के लिए रिट याचिका आसानी से अनुमत हो जाती है। इसी आधार को ले कर अक्सर नियोजक किसी भी औद्योगिक विवाद को सर्वोच्च न्यायालय तक ले जाते हैं और समय निकालते हैं। एक साधारण कर्मकार में इतनी क्षमता नहीं होती है कि वह सर्वोच्च न्यायालय तक मुकदमे को लड़ सके। वह अपनी लड़ाई को बीच में छोड़ देता है। न्याय से वंचित होने पर उस में संपूर्ण व्यवस्था के प्रति रोष और वितृष्णा उत्पन्न होती है जो जीवन भर उस के साथ तो रहती ही है। उस का परिवार भी यह धारणा बना लेता है कि इस व्यवस्था में कमजोर लोगों के लिए कोई न्याय नहीं है।

अगले शनिवार हम ‘कर्मकार’ शब्द की की गई व्याख्याओं की चर्चा करेंगे।

"उद्योग" क्या हैं ?

January 14, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

पिछले शनिवार हम ने औद्योगिक विवाद अधिनियम के बारे में बात आरंभ की थी। आप जानना चाह रहे होंगे कि औद्योगिक विवाद क्या हैं?  लेकिन उस से पहले यह जान लें कि औद्योगिक विवाद उत्पन्न कहाँ होते हैं? यह एक सामान्य बात है कि औद्योगिक विवाद किसी उद्योग में ही उत्पन्न हो सकते हैं। इस कारण पहले यह जानना बेहतर होगा कि उद्योग क्या है?

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 में “उद्योग”  शब्द को निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है।

(j) “Industry” means any business, trade, undertaking, manufacture or calling of employers and includes any calling, service, employment, handicraft, or industrial occupation or avocation of workmen;

(ञ) “उद्योग” का अर्थ है कोई भी व्यवसाय, व्यापार, उपक्रम, निर्माण या नियोक्ताओं द्वारा किया जाने वाला धंधा और कोई भी धंधा, सेवा, रोजगार, हस्तकला, ​​या   औद्योगिक धन्धा या कामगार द्वारा किया जाने वाली उपजीविका भी शामिल है;

द्योग की इस परिभाषा का विस्तार अत्यन्त वृहत् है। उक्त परिभाषा पर बैंगलौर वाटर सप्लाई एण्ड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय के सात न्यायाधीशों की विस्तृत पीठ ने गंभीरता से विचार किया और बताया कि क्या क्या काम-धंधे उद्योग हो सकते हैं। इस मुकदमे का मुख्य निर्णय न्यायाधीश वी.आर. कृष्णा अय्यर ने लिखा था।  इस निर्णय में उन्हों ने कहा कि जहाँ भी नियोजकों और नियोजितों के बीच सहयोग से व्यवस्थित कार्यकलाप हो रहे हों और जो माल उत्पादन और/या वितरण, या मानव आवश्यकताओं और इच्छाओं की पूर्ति के लिए निश्चित सेवाएँ प्रदान की जा रही हों वे सब उद्योग हैं। इस में  लाभ प्राप्त करने की इच्छा या उद्देश्य का होना आवश्यक नहीं है। इसी निर्णय में कहा गया कि सरकार के प्रभुतासंपन्न कार्यो को उद्योग नहीं कहा जा सकता लेकिन सरकार और विधिक निकायों द्वारा की जाने वाले कल्याण कार्यों और आर्थिक गतिविधियों को उद्योग की परिभाषा से पृथक नहीं किया जा सकता। यहाँ तक कि सरकार के जो विभाग प्रभुतासंपन्न गतिविधियाँ करते हैं उन की वे शाखाएँ जो उक्त प्रकार के कार्य करती हैं वे उद्योग की परिभाषा में आती हैं।

भारत सरकार का टेलीकॉम विभाग, डाक विभाग, नगरपालिकाओं, पंचायतों, पंचायत समितियों का कर विभाग, जनपरिवहन विभाग, अग्निशमन विभाग, विद्युत विभाग, जलप्रदाय विभाग, नगर अभियांत्रिकी विभाग, सफाई विभाग, स्वास्थ्य विभाग, बाजार विभाग, शिक्षा  विभाग, निर्माण विभाग, उद्यान विभाग, मुद्रण विभाग अनेक विभाग,  सामान्य प्रशासन विभाग एवं कुछ अन्य विभागों को न्यायालयों ने उद्योग माना है। जिन अस्पतालों और चेरिटेबल संस्थाओं में कर्मचारी नियोजित किए जाते हैं या जो लाभ कमाते हैं वे भी उद्योग माने गए हैं। भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी, भारतीय कैंसर सोसायटी, रीयल ऐस्टेट कंपनी जो मकानों को लीज पर देती है और उन की मरम्मत व देखरेख के लिए कर्मचारी नियोजित करती है, सरकार द्वारा चलाए जाने वाले ट्य़ूबवैल तथा हैण्डपंप सुधारने वाले विभागों को उद्योग माना गया है। बड़े क्लबों को, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को भी उद्योग माना गया है। सहकारी समितियाँ, इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स, कृषि कार्य करने वाली कंपनियाँ, खादी ग्रामोद्योग संघ, सिंचाई विभाग, राज्य कर्मचारी बीमा व प्रोवीडेण्ट फण्ड विभाग, समाज कल्याण विभाग, पर्यटन विभाग, स्टेट लॉटरी विभाग, अन्य अनेक विभागों को उ्दयोग माना गया है।

स तरह हम मान सकते हैं कि प्रत्येक वह गतिविधि जिस में कर्मचारी नियोजित किए जाते हैं वह उद्योग हो सकती है। इस कारण से कर्मचारी नियोजित करने वाले नियोजकों को जाँच लेना चाहिए कि वे जो गतिविधि कर रहे हैं वह उद्योग तो नहीं है। यदि वह उद्योग है तो उन्हें औद्योगिक विवाद अधिनियम के प्रावधानों का पालन करना होगा। हमारे यहाँ छोटे नियोजक इन कानूनों पर ध्यान नहीं देते हैं और अक्सर इस के उपबंधों की पालना न करने के कारण मुसीबत में फँस जाते हैं। इस तरह प्रत्येक कर्मचारी को यह जाँच लेना चाहिए कि वह जहाँ काम कर रहा है वह उद्योग है या नहीं। कर्मचारी भी अज्ञान के कारण अक्सर नुकसान उठाते हैं और अपने अधिकारों से वंचित रहते हैं।

औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 क्या है ?

January 7, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

ज जब किसी उद्योग के कर्मचारी को नौकरी से निकाल दिया जाए, उसे उस की नौकरी का लाभ न दिया जाए, या कर्मचारी अपनी सेवा शर्तों को गैरवाजिब मान कर हड़ताल कर दें या फिर स्वयं उद्योग के प्रबंधक ही उद्योग में तालाबंदी, छंटनी या ले-ऑफ कर दें तो हमें तुरंत औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की याद आती है। मौजूदा औद्योगिक विवाद अधिनियम आजादी के तुरंत पहले 1 अप्रेल 1947 को अस्तित्व में आया था। इस के लिए केन्द्रीय असेम्बली में विधेयक 8 अक्टूबर 1946 को प्रस्तुत हुआ था तथा दिनांक 31 मार्च 1947 को पारित कर दिया गया था। तब से अब तक 1956, 1964, 1965, 1971, 1972, 1976, 1982, 1984,1996 तथा 2010 में इस अधिनियम में संशोधन किए गये हैं। इस के अतिरिक्त अन्य विधेयकों के द्वारा भी इस में 28 बार संशोधित किया गया है। इस तरह इस अधिनियम को कुल 38 बार संशोधित किया गया है।

ब्रिटिश भारत में सर्वप्रथम 1929 में ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल लाया गया था। इस बिल के द्वारा जनउपयोगिता के उद्य़ोगों में हड़ताल और तालाबंदी को प्रतिबंधित कर दिया गया था। लेकिन उन औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए कोई विकल्प प्रदान नहीं किया गया था और इसे दमनकारी माना गया था। युद्ध के दौरान इस अधिनियम के इस अभाव को दूर करने के लिए डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स के नियम 81-ए में प्रावधान किया गया था कि केन्द्र सरकार किसी भी ओद्योगिक विवाद को न्यायाधिकरण को सौंप सकती है और उस के द्वारा प्रदान किए गए अधिनिर्णय को लागू करवा सकती है। ये नियम युद्ध की समाप्ति के साथ ही दिनाक 1 अक्टूबर 1946 को समाप्त हो गये लेकिन नियम 81-ए को इमर्जेंसी पावर्स (कंटीन्यूएंस) ऑर्डीनेंस 1946 से इसे जारी रखा गया। इसी ऑरडीनेंस के स्थान पर बाद में औद्योगिक विवाद अधिनियम अस्तित्व में आया।

द्योगिक विवादों का अन्वेषण तथा उन का समाधान करना औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 का प्रमुख उद्देश्य है। इस अधिनियम के अंतर्गत दो तरह की संस्थाएँ बनाई गईं। बड़े उद्योगों में जहाँ 100 या उस से अधिक श्रमिक नियोजित हों श्रमिकों और नियोजकों के प्रतिनिधियों की संयुक्त वर्क्स कमेटी बनाने का उपबंध किया गया। वहीं औद्योगिक विवादों के समाधान केलिए समझौता अधिकारियों की नियुक्ति और बोर्डों का गठन करने के उपबंध किये गए। समझौता संपन्न न होने पर औद्योगिक विवादों के न्याय निर्णयन के लिए श्रम न्यायालय, औद्योगिक न्यायाधिकरण की व्यवस्था की गई तथा हड़तालों व तालाबंदियों को रोकने के लिए भी उपबंध किए गए हैं।

ब तक आप यह सोचने लगे होंगे कि ये औद्योगिक विवाद क्या हैं? इस का समाधान कैसे संभव होता है? क्या किसी एक श्रमिक के साथ उस के नियोजक द्वारा की गई हर नाइंसाफी का कोई इलाज इस अधिनियम में है? यदि नहीं तो फिर उन के लिए क्या मार्ग हैं? ऐसे ही अनेक और भी प्रश्न आपके जेहन में उभर रहे होंगे। हम तीसरा खंबा पर सप्ताह में एक बार इन्ही प्रश्नों से रूबरू होने का प्रयत्न करेंगे। संभवतः प्रत्येक शनिवार को। औद्योगिक विवादों की जानकारी में लेने वाले पाठक हर शनिवार को इस की प्रतीक्षा कर सकते हैं। यदि इस कानून से संबंधित कोई भी जिज्ञासा किसी पाठक को हो तो वह अपने प्रश्न हमें टिप्पणियों के माध्यम से रख सकता है। हर जिज्ञासा का उत्तर देने का प्रयत्न किया जाएगा।

सभी पाठकों और मित्रों का विधि और न्याय प्रणाली पर प्रथम हिन्दी जालस्थल तीसरा खंबा पर स्वागत है

सभी को नववर्ष की शुभकामनाएँ !

नया वर्ष सभी के लिए नयी खुशियाँ लाए !!

समस्या-

मैं एक समाचार पत्र में सीनियर एकजीक्यूटिव के पद पर सेवारत हूँ। मेरा कार्य विज्ञापन विभाग में आने वाले विज्ञापन आदेशों को प्राप्त करना आदि है। मुख्यतः मेरा काम लिपिकीय है। मुझे मेरी ट्रेड यूनियन गतिविधियों के कारण मेरे नियोजक ने मेरठ से पटना स्थानान्तरित कर दिया है। इस का विवाद मेरी यूनियन ने श्रम विभाग उत्तर प्रदेश के मेरठ कार्यालय में उठाया था। समझौता कार्यवाही असफल हो जाने पर रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रेषित की गई थी। इस पर राज्य सरकार ने मेरे स्थानान्तरण का विवाद श्रम न्यायालय लखनऊ को न्याय निर्णयन के लिए संप्रेषित कर दिया। जब कि मेरठ में भी उत्तर प्रदेश सरकार का श्रम न्यायालय मौजूद है। मेरी यूनियन राज्य सरकार को उक्त विवाद को श्रम न्यायालय मेरठ में स्थानान्तरित करने के लिए आवेदन कर दिया है, तथा तीन बार उस का स्मरण पत्र लिख चुकी है। लेकिन राज्य सरकार कोई निर्णय नहीं कर रही है। मुझे अपना विवाद श्रम न्यायालय मेरठ में स्थानान्तरित करवाने के लिए क्या करना चाहिए?

-दिनेश कुमार, मेरठ उत्तर प्रदेश

सलाह-

राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह राज्य में उत्पन्न ऐसे औद्योगिक विवाद को जिस पर उसे क्षेत्राधिकार प्राप्त है। राज्य के किसी भी श्रम न्यायालय या औद्योगिक अधिकरण को न्याय निर्णयन हेतु संप्रेषित कर सकती है। लेकिन राज्य सरकार का यह अधिकार न्यायोचित होना चाहिए। आप विवाद के पूर्व मेरठ में नियोजित थे तथा मेरठ में आप के नियोजक का कार्यालय है। विवाद को मेरठ के श्रम विभाग के मेरठ कार्यालय में ही उठाया गया था और समझौता कार्यवाही भी वहीं संपन्न हुई थी। मेरठ में राज्य सरकार का श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण होने के कारण राज्य सरकार के लिए न्यायोचित यही होता कि वह आप के औद्योगिक विवाद को मेरठ के श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण को ही न्याय निर्णयन हेतु संप्रेषित करती। इस संदर्भ में राज्य सरकार के इस निर्णय को न्यायोचित नहीं कहा जा सकता है। राज्य सरकार को चाहिए कि वह आप की यूनियन के आवेदन पर उक्त विवाद को लखनऊ के न्यायालय से श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण मेरठ को स्थानान्तरित कर दे।

मेरी राय में आप को राज्य के सचिव श्रम विभाग को व्यक्तिगत रूप से मिल कर अपनी बात कहनी चाहिए और उन्हें इस बात से संतुष्ट करना चाहिए कि आप का विवाद मेरठ स्थानान्तरित कर दिया जाए। व्यक्तिगत रूप से मिलने से यह काम हो जाएगा। यदि इस पर भी राज्य सरकार आप के विवाद को मेरठ स्थानान्तरित नहीं करती है तो आप न्याय प्राप्ति के लिए एक पंजीकृत नोटिस सचिव श्रम विभाग राज्य सरकार उत्तर प्रदेश को भिजवाएँ जिस में आप के स्थानान्तरण आवेदन पर निर्धारित समय (15 दिन) में निर्णय करने की बात कहें और यह अंकित करें कि इस अवधि में आप के आवेदन पर मामले को श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण मेरठ स्थानान्तरित नहीं किया गया तो आप उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका प्रस्तुत करेंगे।

दि आप के इस नोटिस की अवधि के समाप्त होने तक भी आप का विवाद स्थानान्तरित नहीं किया जाता है तो आप को उच्च न्यायालय लखनऊ बैंच में अथवा उच्च न्यायालय इलाहाबाद में रिट याचिका प्रस्तुत करनी चाहिए। उच्च न्यायालय आप के विवाद को श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण में स्थानान्तरित करने का आदेश राज्य सरकार को दे सकता है।

ठेकेदार श्रमिक उन्मूलन अधिनियम 1970 के नाम से ऐसा प्रतीत होता है, जैसे इस कानून का निर्माण उद्योगों में ठेकेदार श्रमिकों को नियोजित करने की प्रथा का उन्मूलन करने के लिए हुआ है। यह सही है कि इस का उपयोग इस काम के लिए किया जा सकता है। लेकिन उस के लिए प्रक्रिया इतनी दुष्कर बना दी गई है और निर्णय करने का अधिकार केन्द्र/राज्य सरकारों को प्रदान किया गया है कि इस प्रथा का उन्मूलन किया जाना असंभव जैसा हो चुका है। सब से पहले तो कोई इस के लिए तथ्य एकत्र करे, फिर राज्य सरकार के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करे। फिर राज्य सरकार इस प्रश्न पर आवेदनकर्ता और उद्योग के स्वामियों/प्रबंधकों की सुनवाई करे। आवेदक का उद्योग के श्रमिकों का उचित प्रतिनिधि होना भी आवश्यक है। कानून बना कर ठेकेदार श्रमिक प्रथा का उन्मूलन करने की शक्तियाँ सरकार को प्रदान कर देने के कारण न्यायालय भी इस मामले में सुनवाई नहीं कर सकते क्यों कि उन्हें इस का क्षेत्राधिकार ही नहीं है।
स कानून का उपयोग नियोजकों द्वारा श्रमिकों के विरुद्ध किया जा रहा है। नियोजक अपनी प्रत्येक स्थाई और नियमित प्रकृति की आवश्यकताओं के लिए श्रमिकों को नियोजित करते हैं, उन का चयन स्वयं करते हैं, उन्हें वेतन भी नियोजक का कार्यालय ही देता है और उन के कार्यों पर नियंत्रण भी नियोजक का ही होता है। लेकिन कागजों में उन्हें ठेकेदार का कर्मचारी बताया जाता है। ऐसे श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी तक प्राप्त नहीं होती, यदि वे कानूनी अधिकारों और सुविधाओं की मांग करते हैं तो नियोजक तुरंत कहते हैं कि श्रमिक उन के कर्मचारी न हो कर ठेकेदार के कर्मचारी हैं। विवाद बढ़ता दिखाई देता है तो ठेकेदार का ठेका समाप्त कर दिया जाता है और उस के साथ ही इन श्रमिकों का नियोजन समाप्त हो जाता है।
क सितंबर 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने भीलवाड़ा दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति बनाम विनोद कुमार शर्मा के मामले में निर्णय पारित करते हुए कहा है कि न्यायालय कानून के इस तरह के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं कर सकता वैश्वीकरण और उदारीकरण के नाम पर मानव शोषण को अनुमति नहीं दी जा सकती। इस मामले में नियोजक द्वारा ठेकेदार के कर्मचारी घोषित किए गए श्रमिकों को मूल उद्योग के कर्मचारी घोषित करते हुए उन्हें मूल उद्योग में मिलने वाली सुविधाएँ दिलाने के श्रम न्यायालय के निर्णय को उचित ठहराया गया है।
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