Judicial Reform Archive

न्यायाधीशों और वकीलों ने काले कोट वाली पोशाक  इंग्लेंड में पहली बार 1685 ईस्वी में किंग जॉर्ज द्वितीय की मृत्यु पर शोक संकेत के लिए अपनाई थी। तब यह विश्वास किया जाता था कि काला गाउन और विग जजों और न्यायाधीशों को गुमनामी की पहचान देती है। कुछ भी  हो काला कोट वकीलों और न्यायाधीशों की पोशाक में ऐसा सम्मिलित हुआ कि  ब्रिटिश साम्राज्य के साथ यह सारी दुनिया में पहुँच गया। न्याय करने का दायित्व और अधिकार सामंती समाज में राजा का होता था। लेकिन राज्य के विस्तार के साथ यह संभव नहीं रह गया था कि राजा ही सब स्तरों पर न्याय करेगा। इस के लिए राजा को बहुत से न्यायाधिकारी नियुक्त करने होते थे। हालांकि अंतिम अपील राजा को  ही की जा सकती थी। इस तरह एक न्यायाधिकारी राजा के प्रतिनिधि के रूप में ही न्याय करता था। जिस तरह राजा अपने दरबार में विशिष्ठ पोशाक में होता था और दरबार में उपस्थित होने वाले दरबारी भी केवल विशिष्ठ पोशाक में ही दरबार में उपस्थित हो सकते थे। इस तरह राजा और दरबारियों की पोशाक राज्य की शक्ति का प्रतीक थी। राजा के प्रतिनिधि के रूप में न्यायाधीश की पोशाक भी इसी तरह से शक्ति का प्रतीक थी। वकालत के पेशे का आरंभ वकील न्यायार्थियों के पैरोकार नहीं हुआ करते थे, बल्कि वे न्यायाधीश को न्याय करने में सक्षम बनाने के लिए उस के सलाहकार हुआ करते थे। कालांतर में कुछ लोगों को न्यायार्थियों का पक्ष न्यायाधीश के समक्ष रखने की अनुमति  मिलने लगी। केवल वे ही व्यक्ति जो न्यायाधीश या राज्य की ओर से अधिकृत थे किसी पक्षकार की पैरवी कर सकते थे। आरंभ में न्यायाधीशों के सलाहकारों को ही इस तरह का अधिकार प्राप्त हुआ। इस तरह काला कोट वकीलों की भी पोशाक बन गई। 
लेकिन वे सामंती राज्यों के अथवा साम्राज्य के न्यायालय थे।  वहाँ न्यायाधीशों और वकीलों की पोशाकें शक्ति का प्रतीक थीं। ये पोशाकें  आम जनता को राज्य की शक्ति का लगातार अहसास कराती थीं। लेकिन अब  तो यह जनतंत्र का युग है। उन की पोशाकों को शक्ति का प्रतीक होना आवश्यक नहीं है उसे तो जनता के बीच न्याय का प्रतीक होना चाहिए। लेकिन फिर भी सामंती और साम्राज्यवादी शक्ति का प्रतीक ये पोशाकें न्यायालयों की शोभा बढ़ा रही हैं। निश्चित रूप से आज इस पोशाक को कोई भी इस रूप में न तो व्याख्यायित करना चाहता है और न ही करना चाहेगा। लेकिन उस के लिए कुछ नए तर्क सामने आने लगे हैं। अब यह कहा जाता है कि ये पोशाकें आप शक्ति का प्रतीक नहीं बल्कि वकीलों के बीच अनुशासन पैदा करती हैं और उन्हें न्याय के लिए लड़ने को प्रेरित करती हैं। यह भी कहा जाता है कि यह पोशाक उन्हें अन्य प्रोफेशन वाले लोगों से अलग पहचान देती है। यह भी कहा जाता है कि काला रंग न्याय का प्रतीक है जब कि सफेद रंग के बैंड्स शुद्धता और निर्लिप्तता का अहसास कराते हैं। 
न सब तर्कों के होते हुए भी भारत के वकील काले कोट में असुविधा महसूस करते हैं। वस्तुतः भारत के गर्म वातावरण में काला कोट पहन कर वकील स्वयं अपने शरीर के साथ क्रूरता का व्यवहार करते हुए उस का शोषण करते हैं। बहुत से वकीलों से पूछने पर पता लगा कि वे यह महसूस करते हैं कि काला कोट उन के लिए पहचान बन गया है। भीड़ भरे न्यायालय परिसरों में उन की पहचान केवल काले कोट से ही हो प

न्यायाधीश और वकील काला कोट क्यों पहनते हैं?

July 8, 2011 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

भारत में कहीं भी आप किसी अदालत में जाएंगे। आप को काले कोटों की बहुतायत दिखाई देगी। चाहे भीषण गर्मी क्यों न पड़ रही हो। चेहरे से पसीने की बूंदें झर-झर झर रही हों। कोट के नीचे कमीज बनियान तर हो चुके हों लेकिन वकील कोट में ही दिखाई देंगे। यही नहीं, अंदर कमीज का भी गले का बटन बंद होगा और ऊपर से बैंड्स या टाई और बंदी दिखाई देगी। कहीं ऐसा न हो कि गले के रास्ते कहीं से हवा घुस जाए। आप यदि सर्वोच्च न्यायालय या किसी हाईकोर्ट में पहुँच जाएंगे तो वहाँ कोट के ऊपर एक गाउन और डाला हुआ मिलेगा।  वकील नहीं सारे न्यायाधीश भी यही वर्दी पहने नजर आएंगे। आप के मन में यह प्रश्न भी उठेगा कि क्या वकीलों और न्यायाधीशों को गर्मी नहीं लगती?  मुझ से तो कई लोग पूछ भी लेते हैं कि क्या आप को गर्मी नहीं लगती? मैं सहज रूप से उन्हें कह भी देता हूँ कि नहीं लगती। सिर्फ सुबह जब पहनते हैं तब लगती है, फिर कुछ देर में अंदर की बनियान, कमीज सब पसीने से भीग जाते हैं, तब जरा भी हवा अंदर प्रवेश करती है तो सब ठण्डे भी हो जाते हैं। 

लेकिन मेरा यह उत्तर सहज मिथ्या से अधिक कुछ नहीं। मुझे गर्मी लगती है, कई बार तो लगातार पसीने के कारण त्वचा पर खुजली होने लगती है। जब एक से दूसरी अदालत जाने के लिए धूप में हो कर गुजरना होता है तो काला रंग उष्मा का अच्छा ग्राहक होने के कारण कोट से तेजी से गर्मी अंदर प्रवेश करती है और पसीना गर्म हो उठता है। तब ऐसा लगता है जैसे खोलते हुए पानी में घुस गए हों। तब तुरंत ही पंखे के नीचे शरण लेनी होती है। पाँच मिनट हवा लगने के बाद ही कुछ राहत मिलती है।  एक दो बरसात हो जाएँ तो हालत और बुरी होती है। तब बाहर भी ऊमस होती है और पसीना सूखना बंद हो जाता है। लगता है जैसे दिन भर खौलते पानी में बैठे रहे। उसी में दिन भर काम भी करना होता है। बरसात होते ही बिजली आने-जाने लगती है और पंखे का सहारा भी छिन जाता है। कभी कभी तो यह सोचने लगता हूँ कि मैं ने क्या सोच कर वकालत के प्रोफेशन का चुनाव  किया था।

र्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय में यह परेशानी कम है। वहाँ सभी न्यायालय वातानुकूलित हैं। न्यायाधीशों को वहाँ कोट पहनने में कोई परेशानी नहीं होती। जितनी देर वकील अंदर न्यायालय कक्ष में रहते हैं उन्हें भी परेशानी नहीं होती। परेशानी होती है तो जिला न्यायालय और उस से नीचे के न्यायालयों के वकीलों को। अब आप को समझ आ रहा होगा कि भारत में दीवानी न्यायालय गर्मी के मौसम में क्यों  बंद कर दिए जाते हैं और क्यों राजस्थान जैसे सब से गर्म प्रदेश में ढाई माह के लिए न्यायालयों का समय सुबह सात से साढ़े बारह का क्यों कर दिया जाता है? लेकिन वकीलों को इस से भी राहत नहीं मिलती उन के काम केवल दीवानी अदालतों में ही नहीं होते उन्हें फौजदारी, राजस्व और दूसरी अदालतों में भी जाना होता है। इन में से राजस्थान में राजस्व न्यायालय और अनेक न्यायाधिकरण 10 से 5 बजे तक काम करते हैं। परिणामतः वकीलों को लगभग दिन भर अदालतों में रहना होता है।

प सोच रहे

खिर यह तय हो ही गया है कि लोकपाल विधेयक संसद के अगले सत्र में प्रस्तुत होगा। इस के लिए जिस प्रकार का वातावरण बना है उसे देखते हुए इस विधेयक को सर्वसम्मति से इसी सत्र में पारित भी हो लेगा। जन-लोकपाल विधेयक का जो मसौदा सरकार को दिया गया है वह 32 पृष्ठों का है और अभी उस का हिन्दी अनुवाद अभी उपलब्ध नहीं है। इस विधेयक के प्रावधानों के अनुसार इस कानून से केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों का गठन होगा। इस कानून के अंतर्गत बनी संस्थाएँ चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय की तरह सरकार से स्वतंत्र होंगी। लोकपाल व लोकायुक्तों का चयन जज, नागरिक और संवैधानिक संस्थाएं मिलकर करेंगी। नेताओं का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। 
लोकपाल व लोक आयुक्त को किसी जज, नेता या अफसर के खिलाफ जांच करने और मुकदमा चलाने की शक्तियाँ प्राप्त होंगी। लोकपाल/ वलोक आयुक्तों का काम पूरी तरह पारदर्शी होगा। लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच 2 महीने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा। किसी भी मुकदमे की जांच एक साल के भीतर पूरी होगी। सुनवाई अगले एक साल में पूरी कर ली जाएगी। इस तरह किसी भी भ्रष्ट नेता, अधिकारी या जज को दो साल के भीतर जेल भेजा जा सकेगा।  
भ्रष्टाचार के कारण सरकार और सार्वजनिक संपत्ति को जो भी हानि हुई है, अपराध साबित होने पर उसे दोषी से वसूला जाएगा। किसी नागरिक का काम तय समय में नहीं होता तो लोकपाल दोषी अधिकारी पर जुर्माना लगाएगा जो शिकायतकर्ता को मुआवजे के तौर पर प्राप्त होगा। 
लोकपाल/ लोक आयुक्तों का काम पूरी तरह पारदर्शी होगा। लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच दो महीने में पूरी कर दोषी पाए जाने पर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा। सीवीसी, विजिलेंस विभाग और सीबीआई के ऐंटि-करप्शन विभाग का लोकपाल में विलय हो जाएगा। 
स तरह लोकपाल विधेयक के कानून बन जाने पर एक नई स्वतंत्र संस्था अस्तित्व आ जाएगी। लेकिन इस संस्था के खर्चे सरकार को वहन करने होंगे। यदि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा इन संस्थाओं को पर्याप्त वित्त उपलब्ध न कराया गया तो ये संस्थाएँ भी देश की न्यायपालिका की तरह पंगु हो कर रह सकती हैं। वर्तमान में न्यायपालिका के पास जितनी अदालतें होनी चाहिए उस की केवल 23 प्रतिशत हैं, जिस का नतीजा यह है कि जनता को इतनी देरी से न्याय मिल रहा है कि उस के मिलने का कोई अर्थ नहीं रह गया है। कहीं ऐसा न  हो कि इसी तरह लोकपाल संस्थाओं को भी पंगु न बना दिया जाए। इस के लिए यह स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए कि सरकार अपने बजट का एक निश्चित प्रतिशत भाग लोकपाल संस्थाओं के लिए देना होगा। इसी तरह का प्रावधान न्यायपालिका के लिए भी होना चाहिए। 

पैबंद लगी पैरहन

April 5, 2011 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
ल के आलेख न्यायालयों की श्रेणियाँ और उन में न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ पर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की टिप्पणी थी कि “इसमें परिवार न्यायालयों, उपभोक्ता फोरम व विविध ट्रिब्यूनल्स के बारे मे भी बता दें तो अच्छा रहेगा”। लेकिन मैं उस से पहले यह बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि आखिर इतने सारे भाँति-भाँति के न्यायालयों की आवश्यकता क्या है? और है भी या नहीं?  किसी भी देश की न्याय प्रणाली के लिए दो ही तरह के दीवानी और अपराधिक न्यायालय पर्याप्त हैं। एक तरह के न्यायालय अपराधों की रोकथाम के लिए तथा दूसरे तरह के न्यायालय सामाजिक व्यवहार को बनाए रखने के लिए। इन के माध्यम से सभी प्रकार के मामलों का निपटारा किया जा कर समाज में न्यायपूर्ण व्यवहार को स्थापित किया जा सकता है और उसे बनाए रखा जा सकता है।
किसी शरीर को चलाने के लिए यह आवश्यक है कि उसे उस की आवश्यकतानुसार आवश्यक खुराक मिलती रहे। यदि पर्याप्त खुराक न मिले तो शरीर कुपोषण का शिकार हो जाता है और फिर अनेक प्रकार के संक्रमण उसे घेर लेते हैं। तब इन संक्रमणों के लिए अनेक प्रकार की चिकित्सा पद्धतियाँ विकसित होने लगती हैं। हमारी न्याय व्यवस्था की स्थिति ऐसी ही है। हमारी न्याय व्यवस्था कभी भी आवश्यकता के अनुरूप नहीं रही है, अपितु उस का आकार जितना होना चाहिए उस का चौथाई भी नहीं है। यह बात अनेक बार इस ब्लाग पर कही जा चुकी है। हमें दस लाख की आबादी पर कम से कम पचास अधीनस्थ न्यायालय चाहिए। आबादी के ताजा आँकड़ों 121 करोड़ के लिए हमें देश में 65000 अधीनस्थ न्यायालयों  की आवश्यकता है लेकिन हमारे पास वर्तमान में 15000 न्यायालय भी नहीं हैं। हम हरदम अपनी तुलना अमरीका से करना चाहते हैं, लेकिन उन के पास 10 लाख की आबादी पर 111 न्यायालय हैं और ब्रिटेन में 55 न्यायालय। 
ब पर्याप्त संख्या में न्यायालय नहीं हैं तो हर क्षेत्र में अन्याय की उपस्थिति और उस से निपटने का अभाव दिखाई देता है। वैसी स्थिति में सरकारें जहाँ भी वस्त्र फटा हुआ दिखाई देता है वहीं पैबंद लगाने की कोशिश करती है। श्रमिकों के साथ अन्याय है तो श्रम-न्यायालय स्थापित कर दिए गए। अनुसूचित जाति के लोगों के साथ अन्याय है तो उन के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना कर दी गई। वैवाहिक और पारिवारिक मामलों में जल्दी निर्णय नहीं हो रहे हैं तो पारिवारिक न्यायालयों की स्थापना कर दी गई। चैक बाउंस के मामले बढ़ गए तो उन के लिए विशेष न्यायालय स्थापित कर दिए गए। मकान मालिक-किराएदारों के विवादों के लिए, टैक्स न चुकाने के मामलों के लिए, बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के कर्जों के मामलों के लिए, उपभोक्ता मामलों के लिए, भ्रष्टाचार के मामलों आदि के लिए अलग अलग न्यायालय स्थापित कर दिए गए। लेकिन इन सब की उत्पत्ति का कारण एक ही है कि हमारी सामान्य दीवानी और अपराधिक न्याय व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। 
विशेष रुप से स्थापित किए गए इन न्यायालयों की प्रकृति या तो दीवानी है या फिर अपराधिक। इन की प्रक्रिया भी या तो दीवानी है या फिर अपराधिक। इन सभी न्यायालयों के निर्णयों की अपील या पुनरीक्षण उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय कर सकता है। जब सारे प्रकार के मामले उच्च न्यायालय कर सकता है तो फिर केवल दीवानी और अपराधिक न्यायालयों से ही न्याय की स्थापना की जा सकती है।  इस से यह स्पष्ट है कि ये न्यायालय केवल यह संतुष्टि प्रदान करने के लिए हैं कि जनता यह महसू

कोई इस आग को लगने से रोक पाएगा?

March 30, 2011 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
कोई व्यक्ति जब किसी कंपनी में ऐसा नियोजन प्राप्त कर लेता है, जिस में सेवा की अवधि उल्लखित नहीं होती तो सामान्यतः  उस का नियोजन सुरक्षित है, वह नियोजन की चिंता से मुक्त हो कर काम में जुट जाता है। लेकिन बहुत कर्मचारियों के साथ यह होता है कि अचानक किसी दिन उस का बॉस कहता है कि तुम त्यागपत्र दे दो। इस तरह कर्मचारी अचानक साँसत में आ जाता है। वह जानता है कि यदि उस ने त्यागपत्र नहीं दिया तो किसी भी तरीके से उसे नियोजन से अलग कर दिया जाएगा। उस की बकाया राशियाँ ग्रेच्युटी, भविष्य निधि आदि को प्राप्त करने में उसे रुला लेगी। उसे अनुभव प्रमाण पत्र भी प्राप्त नहीं होगा। यह भी हो सकता है कि उस की सेवाएँ समाप्त करते समय ऐसा आदेश पारित कर दिया जाए कि उस के भविष्य के कैरियर पर प्रश्नचिन्ह लग जाए। ऐसे में वह सोचता है कि त्याग-पत्र देने में ही उस की भलाई है। कम से कम उसे बकाया राशियाँ एक-मुश्त मिल जाएंगी। अनुभव प्रमाण पत्र मिलेगा जिस के माध्यम से वह नया नियोजन प्राप्त कर सकेगा। किसी भी कर्मचारी को त्याग-पत्र देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। यह गैरकानूनी है। 
से में यदि त्याग-पत्र मांगा जाए, और कर्मचारी न दे तो क्या करे? कर्मचारी के पास यह विकल्प है मौजूद है कि वह अपने बॉस को कहे कि वह नया नियोजन तलाश कर रहा है। जैसे ही कोई ऑफर मिलता है, वह त्याग पत्र दे देगा। हो सकता है उस का बॉस या कंपनी इस बात के लिए तैयार हो जाए। लेकिन इस के लिए वह दो-तीन माह से अधिक का समय नहीं देगी। इस बीच दूसरा नियोजन न मिले तो बॉस/कंपनी और कर्मचारी के मध्य संबंध खराब होने लगेंगे। स्थिति खरबूजा और चाकू जैसी बन जाती है। कर्मचारी त्यागपत्र दे तो तुरंत नियोजन से हाथ धो बैठेगा और बेरोजगारों की कतार में जा खड़ा होगा। नहीं देता है तो कंपनी न केवल उस का नियोजन समाप्त कर देगी, अपितु ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर देगी कि उसे नियोजन मिलने में कठिनाइयाँ आने लगें। 
से में यदि कोई कर्मचारी त्याग पत्र नहीं देता है और कंपनी उसे नौकरी से निकाल देती है, तो कर्मचारी की सेवा समाप्ति गैर-कानूनी होगी। कर्मचारी उसे कानून के समक्ष चुनौती दे सकता है। यदि वह औद्योगिक विवाद अधिनियम में वर्णित श्रमिक (workman) है तो उसे इसी अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही करनी चाहिए। यदि किसी कर्मचारी की सेवा समाप्ति अवैध है तो वह न्यायालय से यह अधिनिर्णय प्राप्त  कर सकता है कि उसे पुनः नौकरी पर लिया जाए, बीच की अवधि का पूरा या आंशिक वेतन व अन्य लाभ भी अदा किए जाएँ। लेकिन भारत के सभी नियोजक जानते हैं कि देश में पर्याप्त अदालतें नहीं हैं। यदि कर्मचारी ने अदालत का रुख किया तो सामान्य रूप से ही मुकदमे में निर्णय में पाँच-दस वर्ष और कहीं कहीं बीस या उस से भी अधिक समय लग जाएगा। नियोजक अपने धन-बल का उपयोग कर इस पाँच-दस वर्ष की अवधि को दुगना भी कर सकते हैं। इस बीच कर्मचारी थक जाएगा। वह कहीं तो नियोजन प्राप्त कर ही लेगा। धीरे-धीरे मुकदमे से उस का मोह टूट जाएगा और  तब अपनी शर्तों पर मुकदमा समाप्त करने के लिए उसे तैयार किया जा सकता है। कुल मिला कर नियोजक को कुछ भी हानि नहीं होगी।  
स तरह भारत में त्वरित न्याय उपलब्ध न होने के कारण सभी नियोजक अपने कर्मचारियों के साथ मनमानी करने लगे हैं। कर्मचारियों के लिए न्याय की उपलब्धि असंभव की सीमा छू चुकी है

तीसरा खंबा में 26 जनवरी, 2009 की पोस्ट थी, न्याय रोटी से पहले की जरूरत है, ….
जीवन के लिए जितना हवा और पानी आवश्यक है उतना ही न्यायपूर्ण जीवन और समाज भी।  यदि परिवार में खाने को पूरा न हो तो भी परिवार आधे पेट भी प्रेम से जीवन बिता सकता है।  बस लोगों को विश्वास होना चाहिए कि जितनी रोटियाँ हैं, उन का बंटवारा न्यायपूर्ण हो रहा है।   यदि यह विश्वास टूट गया तो परिवार बिखऱ जाएगा।   परिवार के बिखरने का अंजाम सब जानते हैं।  गट्ठर को कोई नहीं तोड़ सकता लेकिन एक एक लकड़ी को हर कोई तोड़ सकता है।  इस लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था परिवार के एकजुट रहने की पहली शर्त है। इसीलिए न्याय रोटी से पहले की जरूरत है।  कम रोटी से काम चलाया जा सकता है, लेकिन न्याय के बिना नहीं।   लेकिन हमारी न्याय प्रणाली अपंग है।   वह हमारी जरूरत का चौथाई भी पूरा नहीं करती।  एक न्यायार्थी को उस के जीवन में न्याय मिलना असंभव होता जा रहा है।  यदि इस स्थिति से युद्ध स्तर पर नहीं निपटा गया तो।  समझ लीजिए कि परिवार खतरे में है।  गणतंत्र खतरे में है।
र्तमान में देश में लगभग16000 अदालतें हैं उन में भी 2000 से अधिक अदालतों में  जज नहीं हैं।  स्वयं संसद  में सरकार  द्वारा निर्धारित  क्षमता  के अनुसार प्रत्येक दस लाख जनसंख्या पर पचास अधीनस्थ न्यायालय  होने चाहिए। भारत की  वर्तमान आबादी लगभग एक  अरब बीस करोड़ के लगभग है, इस आबादी की न्याय की जरूरतों को पूरा करने को अदालतों की  संख्या 60 हजार होनी चाहिए। यही हमारी वास्तविक आवश्यकता है।  अधीनस्थ न्यायालयों की स्थापना का  काम राज्य सरकारों का है। लेकिन किसी  भी राज्य सरकार में इस बात पर चिंता और हलचल तक नहीं दिखाई पड़ती  है कि उन के यहाँ न्याय और न्यायालयों की क्या स्थिति है और  वे घोषित लक्ष्य की  प्राप्ति  के लिए क्या कदम  उठाने जा रहे हैं।
भारत का 2011-12 का संघीय बजट संसद में प्रस्तुत किया जा चुका है। देश और समाज में न्याय की स्थापना के लिए सरकार और संसद कितनी चिंतित है इस का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हों ने इस के लिए क्या प्रावधान अपने बजट में किए हैं। विभिन्न संघीय मंत्रालयों और विभागों का कुल खर्च  इस वर्ष 1216575.73 करोड़ रुपए था। जो आगामी वर्ष के लिए 1257728.83 करोड़ रुपयों का रखा गया है। इस तरह इन मंत्रालयों और विभागों के कुल खर्च में चालीस हजार करोड़ की वृद्धि की गई है। लेकिन वस्तुओं के महंगा हो जाने से  यह वृद्धि न केवल बराबर हो जाती है अपितु बजट में बढ़ाई गई इस राशि में पहले जितनी वस्तुएँ और सेवाएँ नहीं खरीदी जा सकेंगी। 
न्याय के लिए इस वर्ष के लिए 944 करोड़ का प्रावधान किया गया था, अब अगले वर्ष के लिए 1432 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस तरह करीब 488 करोड़ रुपयों की वृद्धि की गई है। इस वर्ष योजना खर्च में रुपए 280 करोड़ रुपए रखे गए थे जिन्हें अगले वर्ष के लिए बढ़ा कर 1000 करोड़ कर दिया गया है। इस में से अधिकांश धनराशि कंप्यूटराइजेशन, इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रामीण न्यायालय स्थापित करने के लिए राज्यों की सहायता के लिए रखी गई है। लेकिन गै

जनता का गुस्सा सब से भयंकर होता है

February 12, 2011 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
कुछ दिन पहले ही प्रधानमंत्री ने न्यायपालिका को नसीहत दी थी कि न्यायाधीशों को सरकार पर अनावश्यक टिप्पणियाँ नहीं करनी चाहिए। यह अवसर राष्ट्रमंडल विधि सम्मेलन का था, और ऐसे मौके पर किसी देश क प्रधानमंत्री को अपने ही देश के मुख्य न्यायाधीश की उपस्थिति में ऐसी कोई बात नहीं कहनी चाहिए थी। लेकिन उन्हों ने फिर भी कहा। इस से लगता है कि हमारी सरकारों और न्यायपालिका के बीच की दूरी बहुत अधिक बढ़ गई है। बढ़े भी क्यों न, जब चीखती हुई न्यायपालिका के आर्तनाद को सरकार, संसद, विधानसभाएँ लगातार वर्षों से अनसुना कर रही हों। हालाँकि उसी अवसर पर मुख्य न्यायाधीश ने प्रधानमंत्री की ही उपस्थिति में यह भी कहा कि जनता को यह अपेक्षा  नहीं करनी चाहिए कि सरकार उन्हें खाने को देगी। इस वक्तव्य को यदि सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश की पृष्ठभूमि में देखा जाए जिस में यह कहा गया था कि यदि अनाज सड़ रहा है, सरकार उसे सड़ने से नहीं रोक सकती तो गरीब जनता को मुफ्तबाँट दे। सरकार ने इस आदेश को मानने से साफ इन्कार कर दिया था।
लेकिन न तो प्रधानमंत्री के वक्तव्य का कोई असर न्यायपालिका पर हुआ और न ही सरकारों के कानों तक न्यायपालिका का आर्तनाद पहुँच रहा है। इस बीच सर्वोच्च न्यायालय की सब से महत्वपूर्ण टिप्पणी आ गई। इस बार न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी और न्यायमूर्ति ए.के. गांगुली की खंडपीठ ने अमरसिंह के फोन टेपिंग मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि “कोई भी सरकार मज़बूत न्यायपालिका नहीं चाहती है। न्यायपालिका को बजट का एक प्रतिशत से भी कम आबंटित किया जाता है। न्यायपालिका आधारभूत समस्याओं से जूझ रही है और उसके पास काफ़ी कम न्यायाधीश और कर्मचारी हैं। जल्दी से जल्दी मामलों का निपटारा करने के लिए देश में अदालतों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता है। मेरी राय में ही नहीं, देश भर के विद्वानों की राय में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई यह टिप्पणी अब तक की कठोरतम है।
निश्चित रूप से सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी तब आई है जब पानी सर के ऊपर से गुजर चुका है। देश भर में जरूरत की केवल बीस प्रतिशत अदालतें हैं, और अदालतों में हालत यह है कि आज यदि कोई न्याय के लिए अदालत में गुहार लगाता है तो न्यायालय से अंतिम फैसला आने और उस के निष्पादित होने के बीच एक-दो पीढ़ियाँ अवश्य गुजर जाती हैं। हालात वाकई बद से बदतर हैं। यदि अब भी केन्द्र और राज्य सरकारें नहीं चेतीं और अदालतों की संख्या में तेजी से वृद्धि नहीं की गई तो ये हालात जनता के गुस्से में तेजी से वृद्धि करेंगे। जनता के गुस्से के बारे में महर्षि चाणक्य ने कहा है –

प्रकृतिकोप: सर्वकोपेभ्यो गरीयान्। 

अर्थात् प्रजा का कोप सभी कोपों से भयंकर होता है।

जनता ही किसी देश की सबसे बडी शक्ति होती है, अत: सरकार को चाहिए कि वह जनता को सदा सुखी रखे। यदि सरकार उसे दु:खी रखेगी तो वह (जनता) सरकार के खिलाफ बगावत कर देगी। तब सरकार को कोई भी नहीं बचा सकेगा। इसीलिए कहा गया है कि जनता का गुस्सा सबसे भयंकर होता है।

सरकारों के माई-बाप

February 7, 2011 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

ज फिर खबर है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने कहा है कि न्यायपालिका को अतिसक्रियता दिखाते हुए ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिस से शासनप्रणाली के अन्य घटक प्रभावित हों। वे हैदराबाद में आयोजित सत्रहवें राष्ट्रमंडल विधि सम्मेलन में बोल रहे थे। हालाँकि उन्हों ने और दूसरी बातें भी कहीं, जैसे सरकारी जिम्मेदारियाँ तय करने में न्यायिक समीक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन इस का इस्तेमाल कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के कामकाज में हस्तक्षेप के रूप में नहीं होना चाहिए।  उन्हों ने यह भी कहा कि तेजी से बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य में देश में अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नीतियाँ और कानून बनाए जाने चाहिए जिस से आतंकवाद, गरीबी, भूख, कुपोषण, मानवाधिकारों का संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसी समान अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियों से निपटा जा सके। उन का कहना था कि तेज आर्थिक विकास के जरिए ही दूर किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री जी! मुझे यह समझ नहीं आया कि आखिर आप न्याय पालिका से कहना क्या चाहते थे? या सिर्फ कहना नहीं अपितु हड़काना चाहते थे। आतंकवाद, गरीबी, भूख, कुपोषण, मानवाधिकारों का संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसी समान अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियों से निपटने में कहाँ न्यायपालिका आड़े आ रही है? उस ने शायद एक भी निर्णय ऐसा नहीं किया है जिस से सरकार को इन चुनौतियों से निपटने में कोई बाधा उत्पन्न हुई हो। वैश्विक परिदृश्य में देश में अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नीतियाँ और कानून बनाने का काम तो खुद कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और विधायिका के हैं, उस से उन्हें कौन रोक रहा है? 
न दिनों तो सब तरफ सरकार में फैले भ्रष्टाचार और विदेशी बैंकों में जमा भारतियों के काले धन की चर्चा है। इसी मामले में न्यायपालिका ने कुछ फैसले दिए हैं और कुछ निर्देश दिए हैं। कहीं आप  का इशारा उन्हीं की तरफ है तो यह एक गंभीर बात है। क्या आप चाहते हैं कि सरकारें भ्रष्टाचार में ऊब-डूब होती रहें और न्यायपालिका चुपचाप बैठी रहे। वह तो ऐसा नहीं कर सकती। न्यायपालिका के दरवाजे हर व्यक्ति के खुले हैं। वह वहाँ याचिका दायर कर सकता है, किसी नागरिक को न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाने से कौन रोकेगा? यह काम तो वह खुद भी नहीं कर सकती। जब ऐसी याचिकाओं में तथ्य होंगे तो उसे सुनवाई भी करनी पड़ेगी और सरकारों को आदेश-निर्देश भी देने पड़ेंगे। प्रधानमंत्री जी! आप का इशारा कहीं इस ओर तो नहीं कि न्यायपालिका ऐसी याचिकाओं की सुनवाई न करे, या उन्हें सुनवाई के लिए स्वीकार न करे। 
क और तो केन्द्र और राज्य सरकारों ने पर्याप्त अदालतें न खोल कर जनता के लिए न्याय के दरवाजे लगभग बंद कर दिए हैं। जनता है कि अदालत में दरख्वास्त तो कर सकती है। लेकिन अदालत से उस की दरख्वास्त का फैसला उस के जीवनकाल में हो जाएगा इस का उसे भरोसा नहीं है। एक गरीब आदमी तो अदालत की देहरी चढ़ने में हिचकता है। ऐसे में धनिकों, बाहुबलियों की चढ़ बनी है। प्रधानमंत्री जी! राज आप का नहीं उन का है। आप तो एक सिपाही की तरह उस की रक्षा कर रहे हैं। काहे खाली-पीली आतंकवाद, गरीबी, भूख, कुपोषण, मानवाधिकारों का संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों की बातें करते हैं? अब तो इन बातों का कोई प्रभाव जनता पर पड़ता नहीं है। 
रीब और श्रमजीवी जनता न्याय के लिए अदालत के दरवाजे चाहे फटक भी न पाए, लेकिन आप के विधिमंत्री मोईली जी को  उच्च न्यायालयों में लंबित वाणिज्यिक और कारपोरेट मामलों की बेहद चिंता है। उन्हों ने इसी सम्मेलन में बताया है कि इन मामलों के निपटारों के लिए एक अलग शाखा के गठन के लिए संसद में विधेयक पेश किया है। क्या जनता नहीं समझती कि आप एक अधिकरण बनाएंगे जिस का नियंत्रण सरकार के हाथ में होगा, तब मामला उच्च न्यायालयों की जद से बाहर चला जाएगा। लेकिन भारत के संविधान का क्या करेंगे आप जिस में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय को उन के विरुद्ध मामले सुनने का क्षेत्राधिकार है। अधिकरण के आदेशों और प्रक्रिया के मामले में रिटें जारी करने का अधिकार तो फिर भी इन न्यायालयों को ही रहेगा। प्रधानमंत्री जी! मोईली जी के इस बयान से आप की और आप की सरकार की प्रतिबद्धता साफ नजर आती है। देश की गरीब मध्यवर्गीय जनता जो देश की आबादी का 80 प्रतिशत हिस्सा है, उस के साथ कोई आप की सरकार का कोई लेना-देना नहीं, लेकिन मुट्ठीभर कारपोरेटों की अवश्य चिंता है। आखिर वे ही तो सरकारों के माई बाप हैं।
कैरीकेचर बालाकृष्णन के अनत के ऑनलाइन कार्टून एक्जीबीशन से साभार।

कीडों का कनस्तर खुलता है तो उसे खुलने दो!

January 15, 2011 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
हलका में प्रकाशित प्रशांत भूषण के साक्षात्कार में भारत के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश श्री एस.एच. कपाड़िया के संबंध में की गई टिप्पणी पर कि ‘उन्हें उस कंपनी के मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी जिस के वे शेयरधारक हैं,’  सर्वोच्च न्यायालय में चल रही अवमानना कार्यवाही के दौरान प्रशांत भूषण के वकील राम जेठमलानी ने अपने मुवक्किल का लिखित बयान पेश किया। इस बयान में कहा गया था कि ‘उन के मुवक्किल के बयान का यह गलत अर्थ लगाया गया कि ‘न्यायमूर्ति कपाड़िया किसी आर्थिक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं,  न्यायमूर्ति कपाड़िया आर्थिक शुचिता के लिए जाने जाते हैं और मेरा मुवक्किल भी इस धारणा को सही मानता है। उन का मुवक्किल न्यायमूर्ति कपाड़िया का बहुत सम्मान करता है।’
स बयान को देखने के उपरांत न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर ने जेठमलानी से पूछा कि उन का मुवक्किल अदालत के सामने क्षमा याचना या खेद क्यों नहीं प्रकट कर देता?
ब जेठमलानी ने कहा कि ‘आप (अदालत) मेरे मुवक्किल से क्षमायाचना या खेद प्रकट करने को नहीं कह सकते। अवमानना कार्यवाही किसी दबाव में नहीं चलनी चाहिए, केवल वे कायर ही जो कार्यवाही का सामना नहीं कर सकते क्षमा याचना या खेद प्रकट कर सकते हैं। मैं अपने मुवक्किल को क्षमायाचना या खेद प्रकट करने की सलाह नहीं दे सकता।’
स के उपरांत न्यायालय ने संक्षिप्त आदेश पारित किया कि वह प्रशांत भूषण के लिखित बयान को स्वीकार नहीं करती, मामले का निर्णय गुणावगुण पर करने के लिए कार्यवाही को आगे चलाया जाए। तब जेठमलानी ने कहा कि ‘यदि कार्यवाही आगे चलाई जाती है तो वह कीड़ों का कनस्तर खोल देगी’। तब न्यायमूर्ति कबीर का उत्तर था कि ‘वह खुलता है तो खुलने दिया जाए’। 
स पर जेठमलानी ने कहा कि ‘हर कोई जानता है कि पिछले दो वर्षों से इस न्यायालय में क्या चल रहा है, लेकिन कोई मुहँ नहीं खोलना चाहता। यदि जनता को सच बोलने के लिए भुगतना चाहिए तो लाखों लोग सींखचों के पीछे जाने को तैयार हैं’
सी अवमानना कार्यवाही में तहलका के अरुण तेजपाल के वकील राजीव धवन ने उन की ओर से कहा कि उन का मुवक्किल भी प्रशांत भूषण के रुख का समर्थन करता है। यदि सच ही अवमानना की प्रतिरक्षा बनने जा रहा है तो कुछ पूर्व मुख्यन्यायाधीश भी एक्स-रे की जद में आ सकते हैं।
न्यायमूर्ति सिरिक जोसेफ ने कहा कि जब कभी न्यायाधीश यह महसूस करते हैं कि उन का कही गई बात का अर्थ कुछ और समझ लिया गया है, तो वे भी खेद प्रकट करते हैं। अवमानना कार्यवाही का सामना करने वालों के लिए खेद प्रकट करने में कोई खराबी नहीं है।
पूर्व कानून मंत्री शान्तिभूषण जिन्होंने यह कहा था कि उच्च-न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, चाहते थे कि इस अवमानना कार्यवाही में उन्हें भी पक्षकार बनाए जाने की उन के आवेदन पर विचार किया जाए, इस पर अदालत ने उन के आवेदन पर अगली तिथि पर विचार करने को कहा। अब इस मामले की सुनवाई 13 अप्रेल को की जाएगी।
देशी विदेशी पूंजीपतियों को देश की जनतांत्रिक संस्थाओं की गतिविधियाँ अब रास नहीं आ रही है, जिस के कारण उन के हितों के लिए काम करने वाली केंद्र और राज्य सरकारें इन संस्थाओं के पर कतरने की तैयारी में हैं। वकीलों की जनतांत्रिक संस्था बार कौंसिल ऑफ इंडिया अभी तक देश में कानून की शिक्षा को नियंत्रित करती आ रही है। प्रत्येक राज्य के वकील, जिन्हें बार कौंसिल ने वकालत का अधिकार प्रदान किया हुआ है, पाँच वर्ष के लिए अपने-अपने राज्य की बार कौंसिल के लिए मतदान के माध्यम से सदस्यों का चुनाव करते हैं। राज्यों की बार कौंसिलों के यही चुने हुए सदस्य अपने बीच से बार कौंसिल ऑफ इंडिया के लिए सदस्यों का चुनाव करते हैं। इस तरह बार कौंसिल ऑफ इंडिया एक जनतांत्रिक संस्था है। कानून के अनुसार उसे देश में विधि शिक्षा को नियंत्रित करने का अधिकार प्राप्त है। लेकिन अब केंद्र सरकार विधि शिक्षा का नियंत्रण एक जनतांत्रिक संस्था से छीन कर अपने अधिकार में लेना चाहती है।
केन्द्रीय विधि मंत्रालय मानव संसाधन विकास और दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल के उस निर्णय को मंजूरी दे चुका है जिस के अनुसार देश में विधि शिक्षा को नियंत्रित करने की शक्तियाँ बार कौंसिल ऑफ इंडिया से छीन ली जाएँगी। अब केन्द्रीय विधि मंत्रालयविधि शिक्षा और शोध के लिए एक राष्ट्रीय समिति का गठन किए जाने पर विचार कर रहा है जिस में मशहूर शिक्षाविद और विधि के पर्याप्त विशेषज्ञता प्राप्त तथा प्रोफेशनल अनुभव प्राप्त वरिष्ठ प्रोफेसर सम्मिलित किए जाने की योजना है। सरकार के अनुसार इस का लक्ष्य विधि शिक्षा के स्तर ऊँचा उठाना है। बार कौंसिल ऑफ इंडिया ने सरकार की इस योजना को पूरी तरह से खारिज करते हुए इस का विरोध करते हुए कहा है कि इस के लिए सरकार को एडवोकेट एक्ट में संशोधन करना होगा। जब कि सरकार का कहना है कि इस तरह के संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं है।
स तरह वकीलों की सर्वोच्च संस्था और सरकार के बीच विधि शिक्षा के बारे में गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए हैं, जो निकट भविष्य में बड़े टकराव का आधार बन सकते हैं। यदि सरकार देश में विधि शिक्षा के ढाँचे में बदलाव लाना ही चाहती है तो उसे इस मामले में बार कौंसिल से टकराव का मार्ग अपनाने के स्थान पर अपने सुझाव बार कौंसिल को प्रस्तुत करने चाहिए जिन के आधार पर वह विधि शिक्षा को एक नया रूप प्रदान कर सके। लेकिन विधि शिक्षा के नियंत्रण को वकीलों की शीर्ष संस्था से वापस लेना एक गैरजनतांत्रिक कदम है। बार कौंसिल ही नहीं देश का संपूर्ण वकील समुदाय सरकार की इस नीति के विरोध में खड़ा हो सकता है जो न केवल सरकार के लिए एक बड़ी मुसीबत हो सकता है। यदि वकीलों ने इस मुद्दे पर देश भर में असहयोग का रवैया अख्तियार किया तो एक बार देश की संपूर्ण न्याय व्यवस्था कुछ दिन के लिए ठप्प हो सकती है।