Landlord-Tenant Archive

किराया बढ़ाने के लिए अदालत में वाद संस्थित करें।

August 9, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rental-agreementसमस्या-

सैफ उल्लाह खान ने बरेली उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मैं ने अपने कुछ गोदाम 800 माहवार पर 2001 से 2006 के मध्य 11 माह किराये के एग्रीमेंट पर दिए। जिस पर एक लाइन यह लिखी कि यदि किरायेदार अपनी किरायेदारी आगे भी कायम रखना चाहेगा तो हर 3 साल के बाद किराये में 10% कि वृद्धि करेगा। आज 10 साल से अधिक हो जाने के बाद भी किराया केवल 1100-1200 तक ही पहुँच पाया है जबकि मार्किट वैल्यू इस समय 2500-3000 है। मैं आपसे ये जानना चाहता हूँ कि क्या इस एग्रीमेंट में एक लाइन हर 3 साल के बाद किराये में 10% कि वृद्धि लिखने से ये तमाम उम्र (मेरी अगली कितनी पीढ़ी तक) वैध हो गया या इस एग्रीमेंट को मैं 5,10 या 15 साल बाद नवीनीकृत करवा सकता हूँ। क्यों कि किरायेदार मुझे हमेशा 3 साल के बाद किराये में 10% कि वृद्धि का ही उल्लेख कर देता है।

समाधान-

क्या आप बता सकते हैं कि आप ने किरायानामा केवल 11 माह की अवधि का ही क्यों कराया? और बाद में तीन साल और किराया वृद्धि की बात क्यों अंकित कर दी गयी? इस का जवाब आप को पता नहीं, बस सब लोग 11 माह का किरायानामा लिखाते हैं तो आपने  भी लिख दिया। सड़क पर, अदालत के आसपास अनेक टाइपिस्ट अपनी मशीनें कम्प्यूटर लिए बैठे हैं, उन के पास किराएनामे के ड्राफ्ट हैं। आप भी उन के पास गए और टाइप करवा लिया तथा नोटेरी से अटेस्ट करवा कर काम पूरा कर लिया। भाई जब पहली बार किरायानामा लिखवा रहे थे तो किसी ढंग के वकील से बात करते। एग्रीमेंट में अंकित एक एक शब्द का अर्थ समझने की कोशिश करते तो यह परेशानी नहीं होती।

ग्यारह मार का किरायानामा मात्र इस कारण लिखाया जाता है कि एक वर्ष का होते ही किरायानामा उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत कराना जरूरी हो जाता है वर्ना उसे साक्ष्य में पढ़ने योग्य नहीं समझा जाता है। उस पर स्टाम्प ड्यूटी भी अधिक लगती है। इन सब से बचने के लिए किरायानामा 11 माह का लिखाया जाता है। फिर यह किरायानामा तो 11 माह के बाद समाप्त हो गया। उस के बाद से वह किराएनामे के कारण नहीं बल्कि किराया कानून के कारण किराएदार है। किराया कानून में यह अंकित है कि किराया बाजार दर के अनुसार कराने  के लिए दावा किया जा सकता है और न्यायालय किराया निर्धारित कर सकता है।

आप को चाहिए कि आप किसी स्थानीय वकील से सलाह ले कर किराया बढ़ाने के लिए वाद संस्थित करें। और इस काम में जल्दी करें क्यों कि किराया उसी तारीख से बढ़ाया जाएगा जिस तारीख को आप वाद न्यायालय में प्रस्तुत कर देंगे।

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माता-पिता व वृद्धों के भरण पोषण का कानून

August 3, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

hinduwidowसमस्या-

शीला देवी ने जबलपुर म.प्र. से पूछा है-

मेरी बेटी और दामाद मेरे मकान में कब्जा कर के बैठ गये हैं। ना तो किराया देते हैं ना मकान खाली करते हैं। जब कि मकान मेरे नाम पे है। मेरे पति का देहान्त 1986 में हो गया था। किराए से ही गुजारा चलता था। वो भी ये लोगों ने बन्द कर दिया। मेरा बेटा हैदराबाद में रहता है।

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि आप के बेटी दामाद ने किस तरह आप के मकान में कब्जा किया है? क्या वे किराएदार के बतौर मकान में रहे थे? क्या उन का किरायानामा लिखा गया था। क्या उन्हों ने कभी किराया दिया और आप ने रसीद दी, क्या किसी रसीद पर आप की बेटी या दामाद के हस्ताक्षर हैं? इन तथ्यों के बिना सही उपाय बताया जाना संभव नहीं है। यदि आप दस्तावेजी रूप से यह साबित करने में सक्षम हों कि वे किराएदार की हैसियत से वहाँ निवास कर रहे थे तो आप न्यायालय में उन के विरुद्ध बकाया किराया और बेदखली के लिए वाद प्रस्तुत कर सकती हैं।

यदि ऐसा नहीं है तो आप माता पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण अधिनियम 2007 तथा उस के अंतर्गत बने मध्यप्रदेश के नियम 2009 के अन्तर्गत अपनी बेटी-दामाद तथा पुत्र के विरुद्ध भरण पोषण के लिए आवेदन इस अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप जिला न्यायालय परिसर में स्थापित विधिक सहायता केन्द्र में स्थापित कानूनी समस्या क्लिनिक से भी सहायता प्राप्त कर सकती हैं।

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मकान खाली कराना है तो जल्दी से जल्दी मुकदमा पेश करें।

July 18, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_law-suit.jpgसमस्या-

गणेश ने कानपुर उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मैं कानपुर में रहता हूँ, मेरे दादाजी ने 35 वर्ष पूर्व एक विधवा महिला को किराए पर कमरा दिया था। अब हम उसे मकान खाली करने को कहते हैं तो वह कमरा खाली नहीं कर रही है। उस की उम्र अधिक होने से वह अपने रिश्तेदारों को अपने साथ रखे हुए है। हमें क्या करना चाहिए?

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि आप उस वृद्ध किराएदार स्त्री से मकान या कमरा खाली क्यों कराना चाहते हैं। नगरीय क्षेत्रों में जहाँ जहाँ किराया नियंत्रण कानून प्रभावी है वहाँ बिना किसी वैध कारण के मकान या परिसर खाली कराया जाना संभव नहीं है। आप को पहले कोई वैध आधार तलाशना पड़ेगा।

इस के लिए आप को किसी स्थानीय वकील से मिल कर उसे सारी बात बतानी चाहिए। फिर वह आप से कानून के अनुसार आवश्यक जानकारी प्राप्त कर यह पता लगाएगा कि आप के पास कमरा खाली कराने के लिए क्या आधार हो सकते हैं? यदि वकील आप को सुझाता है कि एक या एक से अधिक आधारों पर मकान खाली कराने का दावा किया जा सकता है तो आप को वकील की सलाह मानते हुए तुरन्त कमरा खाली कराने का दावा कर देना चाहिए।

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देर से कार्यवाही तो परिणाम भी देर से

June 21, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

clothshopसमस्या-

हृदयेश दीक्षित ने फरुक्खाबाद, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

र के नीचे दुकान है 30 साल से दुकान किराए पर है सात साल पहले किराएदार की मृत्यु हो गए  तब से दुकान  उसके पुत्र के पास है जो की ना दुकान खोलता है ना  खाली कर रहा है नाही किराया दे रहा है  अब हम दुकान खाली कराना चाहते हैं, क्या करें?

समाधान-

प बड़े अजीब आदमी हैं। सात साल से दुकान बन्द है और आप हाथ पर हाथ धर कर बैठे हैं। यदि किराएदार जिस काम के लिए परिसर किराए पर ले उसे लगातार छह माह तक उपयोग न करे तो मालिक उस परिसर को खाली कराने का अधिकारी हो जाता है। दुकान के बन्द हुए छह माह होने के बाद यदि आप ने कार्यवाही कर दी होती तो अब तक दुकान आप के कब्जे में होती।

किराया छह माह से अधिक का बकाया होने पर उसे वसूले जाने और परिसर खाली कराने का वाद संस्थित किया जा सकता है। आप को तो सात सालसे किराया नहीं मिला है।

आप तुरन्त किसी स्थानीय वकील से मिलिए और परिसर को खाली कराने का वाद संस्थित करिए। आप के सामने समस्या आएगी कि अदालत से तो बरसों लग जाएंगे। जितना समय लगना है वह तो लगेगा। आप के पास और कोई रास्ता नहीं है। जितनी देर करेंगे उतना ही देर से परिणाम आएगा।

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समस्या-rp_courtroom1.jpg

अभिनव ने रीवा मध्यप्रदेश से पूछा है-

मारे किराएदार जो बहुत पहले से है वह अभी बहुत ही कम किराया देते हैं। ओर खाली करने कीकहने पर 20 लाख रुपयों की मांग कर रहे हैं। दूसरे लोगों को किराए पर दे कर खुद अच्छा किराया वसूल करते हैं। क्या उन से आसानी से हटाया जा सकता है या किराया बढ़ाया जा सकता है। क्या लोक अदालत में इस की कार्यवाही हो सकती है?

समाधान-

म ने हमेशा कहा है कि किराएदार किराएदार ही रहता है वह कभी मकान मालिक नहीं हो सकता। किराएदार कम किराया देता है तो उस का कारण है कि आप ने किराया बढ़ाने के लिए कभी कानूनी कार्यवाही नहीं की। यदि समय रहते आप ने किराया बढ़ाने की कार्यवाही की होती तो अब तक किराया बढ़ चुका होता। यदि आप किराया बढ़ाना चाहते हैं तो आप को न्यायालय में कार्यवाही करनी ही होगी।

आप के किराएदार आप को कम किराया देता है और उस ने अन्य व्यक्ति को वही परिसर या उस का कोई भाग अधिक किराये पर दे रखा है तो आप को इस बात के सबूत एकत्र करना चाहिए कि आप के किराएदार ने परिसर को शिकमी किराएदारी पर चढ़ा दिया है। यदि आप के किराएदार ने परिसर को शिकमी किराएदार को चढ़ा दिया है तो आप इसी आधार पर अपना परिसर खाली करवा सकते हैं।

किराएदार से परिसर खाली कराने का हर राज्य में अलग कानून बना है। इसी तरह मध्यप्रदेश में भी है। आप को तुरन्त किसी वकील से संपर्क करना चाहिए। आप किराया भी बढ़ा सकते हैं और परिसर खाली भी करवा सकते हैं। वकील आप से जरूरी सारे तथ्य जान कर उपाय बता सकता है।

कई लोग सोचते हैं कि अदालत में मुकदमा करने से बहुत समय लगेगा। तो अदालत में समय तो लगता है। कितना समय लगेगा यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। यदि अदालत में मुकदमे बहुत अधिक संख्या में लंबित हैं तो समय भी अधिक लगेगा। मुकदमों में देरी होने का कारण अदालतों की संख्या का बहुत कम होना है। देश के मुख्य न्यायाधीश ने देश भर में 70000 अदालतों की और जरूरत बताई है। जब तक देश में पर्याप्त अदालतें नहीं होतीं तब तक मुकदमों के निर्णय में देरी होना जारी रहेगा। वैसे अधीनस्थ न्यायालय स्थापित करने का दायित्व राज्य सरकार का है। लोगों को चाहिए कि अधिक अदालतें स्थापित करने के लिए राज्य सरकार पर दबाव बनाएँ।

लेकिन यह सोच गलत है कि अदालत में मुकदमा करने से देरी होगी इस कारण अन्य उपाय तलाशा जाए। अन्य कोई भी वैध उपाय उपलब्ध नहीं है इस कारण आप को जाना तो अदालत ही पड़ेगा। आप अदालत जाने में जितनी देरी करेंगे उतनी ही देरी से आप को राहत प्राप्त होगी। इस कारण मुकदमा करने में देरी न करें।

लोक अदालत में न्याय बिलकुल नहीं मिलता। वहाँ भी मजबूर पक्ष को ही झुकना पड़ता है और जो कुछ मिल रहा है उस पर इसलिए सब्र करना पड़ता है कि अदालतें समय रहते न्याय करने में सक्षम नहीं हैं। वस्तुतः लोक अदालतें तो लोगों को न्याय प्राप्ति से दूर करने की तरकीब है जो सरकारों और न्यायपालिका ने मिल कर तलाश कर ली है। यह पूरी तरह से न्याय से विचलन है।

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Shopsसमस्या-

संजीव ने लुधियाना, पंजाब से समस्या भेजी है कि-

मेरी दुकान 42 साल से किराये पर है। दुकान के मालिक ने उसको अपनी निजी जरुरत बता कर खाली करवाने के लिए एक साल पहले केस किया हुआ है। हम ने आज तक का जो भी बनता किराया है वह दिया हुआ है। क्या मेरी दूकान का मालिक इसको अदालत द्वारा खाली करवा सकता है।

समाधान-

दि किसी व्यक्ति ने अपनी संपत्ति वह चाहे आवासीय हो अथवा व्यवसायिक किराए पर दे रखी है और उसे स्वयं अपनी निजी आवश्यकता के लिए उस की सद्भाविक और युक्तियुक्त आवश्यकता हो तो वह किराएदार से अपनी संपत्ति को खाली करवा कर कब्जा ले सकता है। किराएदारी को समाप्त करने और संपत्ति का कब्जा किराएदार से वापस प्राप्त करने का यह सब से मजबूत आधार है।

संपत्ति के स्वामी को न्यायालय के समक्ष बस इतना साबित करना है कि उसे या उस के परिवार के किसी सदस्य को उस संपत्ति की सद्भाविक और युक्तियुक्त आवश्यकता है।

स तरह के मामलों में आम तौर पर न्यायालय का निर्णय मकान मालिक के पक्ष में ही होता है। अपील में भी निर्णय अक्सर मकान मालिक के पक्ष में रहता है। दो न्यायालयों का निर्णय मकान मालिक के पक्ष में होने पर कोई विधिक बिन्दु न होने पर दूसरी अपील में प्रारंभिक स्तर पर ही निर्णय हो जाते हैं।

स तरह के मामलों में दूसरी अपील में किराएदार अधिक से अधिक कुछ समय अपने व्यवसाय को दूसरे स्थान पर स्थानांतरित करने के लिए समय मांग सकता है। हमारी राय में यदि मकान मालिक की निजी या किसी परिवार के सदस्य की जरूरत के आधार पर व्यवसायिक परिसर खाली कराने का मुकदमा किराएदार के विरुद्ध हो तो उस किराएदार को अपने व्यवसाय के लिए वैकल्पिक स्थान की व्यवस्था करना आरंभ कर देना चाहिए। जिस से परिसर का कब्जा देने की स्थिति में उस के व्यवसाय को नुकसान न उठाना पड़े।

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सद्भाविक आवश्यकता के आधार पर दुकानें खाली कराई जा सकती हैं।

November 4, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_law-suit.jpgसमस्या-

संजय शर्मा ने भरतपुर, राजस्थान समस्या भेजी है कि-

रतपुर में मेरे पिताजी की 3 दुकाने हैं। वो बहुत सालों से करीब 40 साल से किराये पर चल रही है और उनका किराया मात्र 300 रु. प्रतिमाह मिल रहा है। आज हमारी ये हालत है की खाने तक के पैसे नहीं हैं। उनका कोई किरायानामा नहीं हैं। क्या हम उन्हें खाली करवा सकते हैं, तो कैसे? जिस से की परिवार का अच्छे से पालन पोषण हो सके। दुकानदारों का व्यवहार भी बहुत खराब है।

समाधान-

भाई दुकान खाली कराने से कैसे आप का परिवार चलेगा? परिवार चलेगा ठीक ठीक आमदनी से वह आमदनी कोई काम करने से होगी। नौकरियाँ नहीं हैं तो आप इन तीन दुकानों में व्यवसाय कर सकते हैं। आप किसी व्यवसाय की योजना बनाइए। उसे कागजों पर लाइए। फिर आप न्यायालय से कह सकते हैं कि आप को इस योजना के लिए अर्थात अपने व्यवसाय के लिए दुकानों की सद्भाविक जरूरत है। दुकानदारों का खराब व्यवहार भी न्यूसेंस तो पैदा करता ही है।

दि 2003 या उस के बाद आप की दुकानों का किराया नए किराया कानून के अनुसार नहीं बढ़ाया गया है तो आप इस कानून के अन्तर्गत किराया बढ़ाने का आवेदन भी न्यायालय से कर सकते हैं।

स प्रकार आप अपने नगर के किराया अधिकरण के समक्ष सद्भाविक आवश्यकता और न्यूसेंस के आधारों पर दुकानों को खाली कराने का आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। इसी आवेदन में आप दुकान खाली होने तक किराया बढ़ाने के लिए भी आवेदन कर सकते हैं। इस मामले में किसी स्थानीय वकील से सलाह और मदद हासिल करें।

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समस्या का हल बँटवारे के दावे से ही निकलेगा।

November 1, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

partition of propertyसमस्या-

रज़ाउल हक़ ने संभल उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

म पाँच बहने और दो भाई हैं। हमारे पिता ने अपने बाद एक मकान छोड़ा था जिसका कोई बटवारा नहीं हुआ है। लेकिन इस मकान का हाउस टैक्स मेरे भाई ज़ियॉलहक़ ने सन् 2007 में अपने नाम करवा लिया नगरपालिका के सरवे में। अब ज़ियॉलहक़ ने इस मकान में कुछ किरायेदार रखे हुए हैं, कुछ साल से। अब मैं और मेरी बहने चाहते हैं कि हमको तकसीम का दावा न करना पड़े। क्यों कि दीवानी के मुक़दमे बहुत लंबे चलते हैं। हम केवल इतना चाहते हैं कि किरायेदार किराया या तो हमें भी दें या अदालत में जमा करें। या मकान खाली कर दें। ज़ियाउल हक़ ने कोई किराया नामा नहीं लिखा रखा है, न उनको रसीद देता है। मेरे सवाल हैं कि हाउस टैक्स को कैसे सब के नाम कराया जाये? हाउस टैक्स नाम होने का स्वामित्व पर क्या असर पड़ता है? क्योंकि मेरे भाई ने कोई किरायानामा नहीं लिख रखा है तो क्या हम पुलिस द्वारा मकान खाली करा सकते हैं? क्या बिना तकसीम के दावे के किरायेदारों को किराया अदालत में जमा करने के लिए मजबूर किया जा सकता है?

समाधान-

सल में आप की समस्या है कि आप अदालत में कोई कार्यवाही नहीं करना चाहते क्यों कि वहाँ समस्या का हल बहुत देरी से होता है। आप का कहना बिलकुल वाजिब है। भारत में अदालतें जरूरत की 10-20 प्रतिशत हैं। अमरीका के मुकाबले 10 प्रतिशत और ब्रिटेन के मुकाबले 20 प्रतिशत। तो यही कारण है कि अदालत में फैसले बहुत देर से होते हैं। इस का असर यह होता है कि लोग विवादों के हल के लिए अदालत के स्थान पर गैर कानूनी तरीके अपनाते हैं। इसी कारण देश में अपराध बढ़ रहे हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों की यह नीति देश को शनै शनै अराजकता की ओर धकेल रही है। उत्तर प्रदेश में कानून और व्यवस्था के खराब होने का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है।

पुलिस किसी भी किराएदार से या कब्जेदार से किसी संपत्ति का कब्जा वापस नहीं दिला सकती। वह ऐसा करने के लिए कोई कार्यवाही करेगी तो वह भी गैरकानूनी होगी। पुलिस ऐसी कोई कार्यवाही कर के खुद अराजकता बढ़ा रही होगी। आप को चाहिए कि आप तकसीम अर्थात बंटवारे का दावा कर दें। यही आप की समस्या का उचित हल है। आप इस दावे को प्रस्तुत करते ही अदालत को आवेदन कर के रिसीवर नियुक्त करवा सकते हैं जो मकान को अपने कब्जे में ले कर किराया वसूल करे और अदालत में जमा करे। इस से आप की बहुत सी तात्कालिक समस्याओं का हल निकल आएगा। साथ ही तकसीम का दावा भी चलता रहेगा जिस में कभी न कभी तो फैसला होगा ही।

दि कोई किरायानामा नहीं लिखाया गया है तो आप अपनी बहनों के साथ जो कि उक्त मकान के संयुक्त स्वामी हैं, मिल कर संयुक्त रूप से किराएदारों को नोटिस दें कि वे किराया अदा नहीं कर रहे हैं इस कारण मकान खाली करें। वे कहेंगे कि वे तो किराया अदा कर रहे हैं। लेकिन बिना रसीद के तो किराया बकाया ही माना जाएगा। किराया बकाया मान कर आप किराएदारों के विरुद्ध मकान खाली करने के दावे भी कर सकते हैं। ऐसे दावों में किराएदारों को किराया अदालत में जमा कराना होगा। इस तरह भी आप का आशय पूरा हो जाएगा। यदि इस विवाद के कारण आप का भाई आप के साथ सहमति से बंटवारा करने को तैयार हो जाए आप लोग मिल बैठ कर भी बंटवारा कर सकते हैं।

प दोनों कार्यवाहियाँ एक साथ भी कर सकते हैं। अधिकांशतः होता यह है कि लोग लम्बी कार्यवाही के भय से कार्यवाही नहीं करते और यह सब चलता रहता है। इस से मकान पर कब्जा बनाए रखने वाले व्यक्ति को नाजायज फायदा मिलता रहेगा। समस्या का हल केवल अदालत से ही निकलेगा। आप जितना देर करेंगे उतनी देर से समस्या हल होगी। इस कारण जितना जल्दी हो कार्यवाही करें।

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दुकान खाली कराने और बकाया किराए की वसूली के लिए मुकदमा करें।

October 3, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

for Rentसमस्या-

एस.के.जैन ने बंगलुरू, कर्नाटक से कर्नाटक राज्य की समस्या भेजी है कि-

बंगलुरू में नगराथ्पेट के एक काम्प्लेक्स में मेरी दुकान है, जो मेने किराये पर दी है। दुकान की छत से पानी लीकेज होता है। लेकिन कहाँ से होता है पता नहीं चल रहा। शायद पास की बिल्डिंग से आता होगा। किरायेदार किराया और बिल्डिंग मेन्टीनेन्स भी नहीं दे रहा है। मैं ने कहा दुकान खाली कर दो तो खाली भी नहीं कर रहा है। मैं बंगलोर से बाहर रहता हूँ। मैं वहाँ जाकर उस को रिपयेर भी नहीं करा सकता। मैं ने बोला आप सही करा लो जो भी खर्च होगा में दूंगा। उस में भी वो सहमत नहीं। मुझे लगता है वो मेरी शॉप कम रेट में हड़पना चाहता है।

समाधान

प का सोचना सही है। जब आप बंगलुरू जा कर अपनी दुकान को संभाल नही सकते तो किराएदार को यह समझ आना स्वाभाविक है कि मालिक को आगे पीछे दुकान बेचनी होगी। खाली कराने में बहुत कष्ट होगा इस कारण गरज से ओने पौने दामों पर बेच कर जाएगा ही। इसी सोच के तहत वह किराया नहीं दे रहा है और आप की किसी बात को मानने को तैयार नहीं है।

प को उक्त किराएदार के विरुद्ध दुकान को खाली करने तथा बकाया किराया वसूलने का मुकदमा कर देना चाहिए। इस के लिए आप को एक दो बार तो जाना होगा। बाद में जब आप की गवाही तो आप जा सकते हैं। आप जिस भी वकील को नियुक्त करें वह विश्वसनीय और कुशल होना चाहिए।

दि आप का कोई विश्वसनी व्यक्ति हो तो आप उसे मकान खाली कराने के लिए अपना मुख्तार खास नियुक्त कर के उस के माध्यम से भी यह मुकदमा कर सकते हैं। समय तो लगेगा, कुछ पैसा भी खर्च होगा। लेकिन आप की संपत्ति की कीमत बढ़ती रहेगी और जब भी खाली होगी तब आप को अच्छी कीमत दे जाएगी।

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House and shopसमस्या-

दिवेश कुमार ने मवाना (मेरठ), उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता व्यापार करते हैं। उनके दो बेटे है बडा बेरोजगार है, दूसरा पढ़ता है। दो दुकानें मेरठ उत्तर प्रदेश के मवाना में तीस साल से किराये पर दे रखी हैं। किराया २००४ से न्यायालय में जमा हो रहा है। ३५० रुपये प्रति माह से। जब कि यहाँ २००० रुपये में भी दूकान नही मिलेगी। खाली कराना चाहता हूँ।

समाधान

प की समस्या से पता नहीं लग रहा है कि आप दुकान को क्यों खाली कराना चाहते हैं। उस के दो कारण हो सकते हैं। एक कारण तो यह है कि आप को किराया कम मिल रहा है और आप बाजार दर से किराया चाहते हैं। लेकिन किराया कम होने के कारण आप दुकान को खाली नहीं करवा सकते। आप किराया बढ़ाने के लिए न्यायालय में वाद संस्थित कर सकते हैं। जिस में वाद प्रस्तुत करने की तिथि से बाजार दर से किराया बढ़ाया जा सकता है।

लेकिन आप बेरोजगार हैं और आप को खुद का व्यवसाय करने के लिए दुकान की आवश्यकता है तो आप अपनी आवश्यकता के लिए उस दुकान को खाली करवा सकते हैं।

मारी राय है कि आप को अपनी आवश्यकता के लिए दुकान खाली कराने का दावा न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए साथ में इसी दावे में यह भी अंकित करना चाहिए कि दुकान का किराया अत्य़धिक कम है और आप को दावे की तिथि से दुकान खाली करने की तिथि तक बाजार दर से किराया बढ़ा कर दिलाया जाना चाहिए।

किराया कानून हर प्रदेश का भिन्न भिन्न है। इस कारण इस मामले में किसी अच्छे स्थानीय वकील से संपर्क करें और उस की सेवाएँ प्राप्त कर न्यायालय में दावा दाखिल करें। इस तरह के दावों के निर्णय में कुछ समय अधिक लगता है लेकिन आप दावा करने में जितनी देरी करेंगे उतनी ही देरी से आप का निर्णय भी होगा दुकान देरी से खाली होगी। इस कारण इस मामले में तुरन्त निर्णय ले कर दावा करें।

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